रविवार, 30 जनवरी 2011

समीर जी की किताब- इतना पहले कभी नहीं हंसा...खुशदीप

पिछली पोस्ट से आगे...



समीर जी की उपन्यासिका देख लूँ, तो चलूँ पर कुछ लिखूं, इससे पहले ही बता दूं कि इस किताब में एक अंश पढ़कर इतना हंसा, इतना हंसा कि बस में आस-पास के लोग भी मुझे शक से देखने लगे...शायद मन ही मन सोचने भी लगे हों...देखने में तो ठीक-ठाक लगता है, बेचारा बस...


उपन्यासिका के फाइनर पाइंट्स पर भी कल आऊंगा लेकिन आज पहले उसी अंश को पढ़ कर लीजिए, जिसे पढ़कर और समीर जी को उस हाल में सोच-सोच कर मेरी हंसी मेरठ तक बंद नहीं हुई..

कुछ साल पहले भारत से कनाडा आते वक्त फ्रेंकफ्रर्ट, जर्मनी में एक दिन के लिए रुक गया था...सोचा, ज़रा शहर समझा जाए और बस, इसी उद्देश्य से वहां की सबवे (मेट्रो) का डे पास खरीद कर रवाना हुए...जो भी स्टेशन आए, मैं और मेरी पत्नी उतरें, आस-पास घूमें...वहां म्यूज़ियम और दर्शनीय स्थल देखें और लोगों से बातचीत करें, ट्रेन पकड़ें और आगे...यह एक अलग ढंग से घूम रहे थे तो मज़ा बहुत आ रहा था...जर्मन न आने की वजह से बस कुछ तकलीफ़ हो रही थी, मगर काम चल रहा था...

इसी कड़ी में एक स्टेशन पर उतरे...बाहर निकलते ही मन प्रसन्न हो गया...एकदम उत्सव सा माहौल...स्त्री-पुरुष सभी नाच रहे थे रंग बिरंगी पोशाक में...ज़ोरों से मस्त संगीत बज रहा था..संगीत की तो भाषा होती नहीं वो तो एहसास करने वाली चीज़ है...इतना बेहतरीन संगीत कि खुद ब खुद आप थिरकने लगें...खूब बीयर वगैरह पी जा रही थी...जगह जगह रंग बिरंगे गुब्बारे, झंडे और बैनर...क्या पता क्या लिखा था, उन पर जर्मन में...शायद होली मुबारक टाइप उनके त्योहार का नाम हो...

एक बात जिससे मैं बहुत प्रभावित हुआ कि महिलाएं एक अलग समूह बना कर नाच रही थीं और पुरुष अलग...न रामलीला जैसे रस्से से बंधा अलग एरिया केवल महिलाओं के लिए और न कोई एनाउंसमेंट कि माताओं, बहनों की अलग व्यवस्था बाईं और वाले हिस्से में हैं...कृपया कोई पुरुष वहां न जाए और न कोई रोकने टोकने वाला...बस सब स्वत:...


सोचने लगा कि कितने सभ्य और सुसंस्कृत लोग हैं दुनिया के इस हिस्से में भी..महिलाओं के नाचने और उत्सव मनाने की अलग से व्यवस्था...इतनी बीयर चल रही है फिर भी मजाल कि कोई दूसरे पाले में चला जाए नाचते हुए...पत्नी महिलाओं की तरफ जा कर एक तरफ बैन्च पर बैठ गई और हमने बीयर का गिलास उठाया और लगे पुरुष भीड़ के साथ-साथ झूम कर नाचने...अम्मा बताती थी मैं बचपन में भी मोहल्ले की किसी भी बरात में जाकर नाच देता था...बड़े होकर नाचने का सिलसिला आज भी जारी है...वो ही शौक कुलाँचे मार रहा होगा...


चारों तरफ नज़र दौड़ाई नाचते नाचते तो देखा ढेरों टीवी चैनल वाले, अखबार वाले अपना अपना बैनर कैमरा और संवाददाताओं के साथ इस उत्सव की कवरेज कर रहे थे...लगता है जर्मनी के होली टाइप किसी उत्सव में आ गए हैं...टीवी वालों को देख उत्साह दुगना हो गया...कमर मटकाने की और झूमने की गति खुद ब खुद बढ़ गई...झनझना कर लगे नाचने...दो एक गिलास बीयर और सटक गए...


वहीं बीयर स्टॉल के पास एक झंडा भी मिल गया जो बहुत लोग लिए थे...हमने भी उसे उठा लिया...फिर तो क्या था, झंडा लेकर नाचे...इतनी भीड़ में अकेला भारतीय...प्रेस वाले नज़दीक चले आए...टीवी वालों ने पास से कवर किया...प्रेस वालों ने तो नाम भी पूछा और हमने भी असल बात दबा कर बता दिया कि इसी उत्सव के लिए भारत से चले आ रहे हैं और सबको शुभकामनाएं दीं...


खूब फोटो खिंची...मज़ा ही आ गया...खूब रंग बरसाए गए...कईयों ने हमारे गाल पर गुलाबी, हरा रंग भी लगाया, गुब्बारे उड़ाए गए, फव्वारे छोड़े गए और हम भीग-भीग कर नाचे...कुल मिलाकर पूरी तल्लीनता से नाचे और उत्सव मनाया गया...भीड़ बढ़ती जा रही थी...मगर व्यवस्था में कोई गड़बड़ी नहीं...स्त्रियां अलग और पुरुष अलग...कभी ग़लती से नज़र टकरा भी जाए तो तुरंत नीचे...कितने ऊंचे संस्कार हैं...मन श्रद्धा से भर भर आए...पूरा सम्मान, स्त्री की नज़र में पुरुष का और पुरुष की नज़र में स्त्री का...एकदम धार्मिक माहौल...जैसे कोई धार्मिक उत्सव हो...शायद वही होगा...थोड़ी देर में ही भीड़ अच्छी खासी हो गई..प्रेस प्रशासन सब मुस्तैद...जबकि कोई ज़रूरत नहीं थी पुलिस की, क्यूंकि लोग यूं ही इतने संस्कारी हैं, मगर फिर भी...अपने यहां तो छेड़े जाने की गारंटी रहती है, फिर भी पुलिस वाला ऐन मौके पर गुटका खाने निकल लेता है, मगर यहां एकदम मुस्तैद..


धीरे-धीरे भीड़ ने जुलूस की शक्ल ले ली...मगर महिलाएं अलग, पुरुष अलग...वाह...निकल पड़ा मुंह से और सब निकल पड़े...पता चला कि अब ये जुलूस शहर के सारे मुख्य मार्गों पर घूमेगा...जगह जगह ड्रिंक्स और खाना सर्व होगा...मज़ा ही आ जाएगा...हम भी इसी बहाने नाचते गाते शहर घूम लेंगे...खाना पीना बोनस और प्रेस कवरेज क्या कहने...पूरे विश्व में दिखाए जाएंगे...


कई नए लोग जुड़ गए...नए नए बैनर झंडे निकल आए...अबकी अंग्रेज़ी वाले भी लग लिए...हम भी एक वही पुराना वाला जर्मन झंडा उठाए थे तो सोचा किसी अंग्रेज़ी से बदल लें...इसलिए पहुंच लिए झंडा बंटने वाली जगह...अंग्रेज़ी झंडा मिल गया...लेकर लगे नाचने...फिर सोचा कि पढ़ लें तो कम से कम कोई प्रेस वाला पूछेगा तो बता तो पाएंगे...


पढ़ा !!!!!!!

अब काटो तो ख़ून नहीं...तुरंत मुंह छुपा कर भागे...पत्नी को साथ लिया और ट्रेन से वापस एयरपोर्ट...मगर अब क्या होना था टीवी और अख़बार ने तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कवर कर ही लिया...दरअसल अंग्रेज़ी के जो बैनर और झंडे पढ़े तो पता चला कि अंतरराष्ट्रीय समलैंगिक महोत्सव मनाया जा रहा था जिसे वो रेनबो परेड कहते हैं और वो जो झंडा मेरे हाथ में था, वो कह रहा था कि मुझे समलैंगिक होने का गर्व है...क्या बताएं, कैसा कैसा लगने लगा..


कनाडा के जहाज़ में बैठकर बस ईश्वर से यही प्रार्थना करते रहे कि कोई पहचान वाला इस कवरेज को न देखे या पढ़े...सोचिए, ऐसा भी होता है कि सीएनएन और बीबीसी टाइप चैनल आपको कवर करें और आप मनाएं कि कोई पहचान वाला आपको देखे न...

क्रमश:

देख लूँ तो चलूँ (उपन्यासिका)
समीर लाल 'समीर'
प्रकाशक- शिवना प्रकाशन
पी. सी. लैब, सम्राट कॉम्पलेक्स बेसमेंट
बस स्टैंड, सीहोर-466001 (म.प्र.)

शनिवार, 29 जनवरी 2011

देख लूँ तो चलूँ...समीर जी को पढ़ने से पहले की तैयारी...खुशदीप

गुरुदेव समीर लाल समीर जी की हाल ही में विमोचित हुई उपन्यासिका...देख लूँ तो चलूँ... 21 जनवरी को मेरे लखनऊ जाने से पहले ही डाक के ज़रिए मुझे मिल गई थी...उपन्यासिका को मुझे एक ही गो में पढ़ना था, इसलिए ऐसा मौका ढूंढ रहा था कि बिना कहीं ध्यान भंग किए इस पुनीत कार्य को करूं...पहले सोचा लखनऊ साथ ले जाऊं, लेकिन नई दिल्ली से लखनऊ का सफर रात को ही होना था...यानि ट्रेन में लाइट जला कर पढ़ता...इससे दूसरों की नींद में व्यवधान पड़ता...कोई न कोई महानुभाव मुझे ज़रूर टोकता और मुझे लाइट बंद करते हुए कुढ़ कर रह जाना पड़ता...और लखनऊ में शादी की रेलम-पेल में तो पढ़ने का मौका मिलना ही नहीं था...

ऊपर से तुर्रा ये कि मेरी पत्नीश्री उपन्यासिका को पढ़ने के बाद समीर जी की लेखन-शैली की इतनी कायल हो चुकी थी कि इसे पढ़ने की मेरी इच्छा और हिलोरे मारने लगी...लेकिन मेरी भी शर्त थी कि पढ़ूंगा तो एक ही स्ट्रेच में...आज 29 जनवरी को मुझे ये मौका मिल गया...दरअसल मुझे एक ज़रूरी काम के लिए मेरठ जाना था...अकेले ही जाना था, इसलिए टैक्सी की जगह बस से ही जाने का फैसला किया...मैं जब अकेला सफ़र करता हूं तो ज़्यादा से ज़्यादा पैसे बचाने की कोशिश करता हूं...और जब परिवार के साथ होता हूं तो इसका ठीक उलट होता है, ज़्यादा से ज़्यादा खर्च...

हां तो मैंने घर से चलने से पहले बैग के साथ उपन्यासिका भी साथ ली तो पत्नीश्री की एक्स-रे दृष्टि से बचा नहीं सका...उसी वक्त ताकीद कर दिया, उपन्यासिका साथ ले जा रहे हो तो संभाल कर वापस भी ले आना...दरअसल पत्नीश्री सफ़र में साथ होती है तो बैगेज, टिकट वगैरहा को लेकर काफ़ी सजग रहती है..मेरा ठीक उलटा स्वभाव है...मस्तमौला कुछ कुछ लापरवाह...इसी चक्कर में कई बार जेब से वैलेट निकल चुका है...ट्रेन में जब भी पत्नीश्री साथ होती है तो एक बार इस बात पर ज़रूर तकरार होती है कि बैगेज को कहां रखा जाए...मैं कहता हूं सीट के नीचे रखा जाए...पत्नीश्री कहती है बैगेज को बांट कर सिरों के नीचे रखा जाएगा...अब मैं ठहरा छह फुटा...सिर के नीचे बैग आ जाता है तो गर्दन शतुरमुर्ग की तरह उठ जाती है और टांगे जंगलजलेबी जैसी अकडू़ हो जाती है...यानि आराम से लमलेट नहीं हो सकता...लेकिन क्या करूं पहला और अंतिम फैसला पत्नीश्री का ही होता है...इसलिए गर्दन अकड़ाए ही सफ़र करना पड़ता है...चलिए ऐसे ही सही कभी कभी हमारे जैसे अनइम्पॉर्टेंन्ट जीवों को भी इस बहाने अकड़ने का मौका तो मिल जाता है...

खैर छोड़िए, समीर जी को जैकेट की जेब के हवाले किया...मतलब समीर जी की उपन्यासिका को...बस स्टैंड पहुंचा...यहां बस अड्डे पहुंचना भी किसी किले को फतेह करने से कम नहीं है...नोएडा में इन्फ्रास्ट्र्क्चर बेशक दुनिया के बड़े से बड़े शहरों को होड़ दे रहा हो लेकिन यहां की कुछ विसंगतियां भी हैं...नोएडा से पूरे दिल्ली के लिए मेट्रो की कनेक्टिविटी है...लेकिन ये दुनिया के सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क यानि भारतीय रेलवे से नहीं जुड़ा है...यहां सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन गाज़ियाबाद जंक्शन है...

अब बस अड्डे पहुंचा तो पता चला कि एक मिनट पहले ही मेरठ की बस निकली है...अगली बस आधे घंटे बाद मिलेगी...अब घर भी वापस नहीं जा सकता...टाइम तो पास करना ही था...पास ही मूंगफली का ठेला खड़ा था...सोचा कुछ प्रोटीन इनटेक ही हो जाए...मूंगफली चाबने की जगह पीनट्स प्रोटीन इनटेकिंग कितना हाई-क्लास लगता है...दस रुपये की मूंगफली तौलने को कहा...वो मूंगफली तौलने लगा और मैं इस दौरान उसके ठेले से नॉन स्टाप जितनी मूंगफलियां उठा कर खा सकता था, खाता रहा...हम भारतीयों को इस तरह उठा-उठा कर या टेस्ट-टेस्ट के नाम पर मुफ्त का माल खाने में जो मज़ा आता है वो भला खऱीद कर खाए हुए माल में कहां आता है...मल्टीनेशन कंपनियों ने मॉल या रिटेल स्टोर खोले तो भारतीयों की इसी नब्ज़ पर रिसर्च कर बाय वन गेट वन..टू...थ्री जैसी स्कीम निकालीं...हम इन आफर्स के फेर में जो चीज़ खऱीदनी है उसके ब्रैंड, कीमत, क्वालिटी पर ज्यादा ध्यान नहीं देते बशर्ते कि साथ में फ्री में कुछ मिल रहा हो...बचपन में देखा था कि जब किराना स्टोर पर सामान खरीदने कोई आता था तो साथ में लुभाव मांगा करता था...लाला जी भी लुभाव में गुड़ की टांगड़ी या लेमनचूस जैसी कोई चीज़ फ्री में पकड़ा देते थे...इससे लाला जी का ग्राहक भी पक्का रहता था और और ग्राहक भी खुश...अब उसी लुभाव को बड़े रिटेल स्टोर्स ने आफर्स की शक्ल दे दी है...

बस आ गई, और मैं बस में चढ़ गया...

क्रमश:
(गुरुदेव समीर जी की उपन्यासिका को पढ़ कर समीक्षा जैसी न तो मेरी कोई मंशा है और न ही सामर्थ्य...मैं तो बस इसे पढ़ते हुए जैसा दिल से महसूस हुआ, जिस एम्बियेंस में महसूस हुआ, बस वही आप तक पहुंचाने की कोशिश करुंगा...)


देख लूँ तो चलूँ (उपन्यासिका)
समीर लाल 'समीर'
प्रकाशक- शिवना प्रकाशन
पी. सी. लैब, सम्राट कॉम्पलेक्स बेसमेंट
बस स्टैंड, सीहोर-466001 (म.प्र.)

श्री समीर-सलाह, डॉ दराल प्रेस्क्रिप्शन, अनवांटेड एडवाइज़...खुशदीप

कल की पोस्ट पर लखनऊ में सरदार बच्चे के सामने मिमियाते दो सांडों का ज़िक्र किया था..सभी ने इस पोस्ट को अपने अंदाज़ से लिया...लेकिन मेरे उस अनुरोध पर लखनऊ के किसी ब्लॉगर भाई ने गौर नहीं किया जो मैंने उनसे किया था...कृपया नया गणेशगंज जाकर सरदार बच्चे और सांडो का वीडियो तैयार करें...वीडियो न बन सकें तो कम से कम फोटो खींचकर ही ब्लॉगजगत को उस नज़ारे से ज़रूर रू-ब-रू कराएं...

कल की पोस्ट पर सबसे ज़्यादा चुटीले कमेंट्स गुरुदेव समीर लाल समीर जी और डॉ टी एस दराल की तरफ़ से आए...

समीर लाल जी ने सलाह दी कि जिस सरदार बच्चे को देखकर सांड उलटे पैर हवा-हवाई हो जाते हैं, उसका ब्लॉग शुरू कराना चाहिए, काम आएगा...

ठीक कह रहे हैं गुरुदेव, ब्लॉग जगत में जो भी फाउल लेखन करे या छुट्टे सांड जैसा व्यवहार करे, उसके सामने बस सरदार बच्चे को ले जाकर दिखवा दो....फाउल करने वाला खुद ही अपना ब्लॉग डिलीट न कर दे, तो कहना...फिर ब्लॉग गलियों में वो भी डरा-डरा ही घूमेगा, न जाने कब सरदार बच्चा आकर सामने न खड़ा हो जाए...

डॉ दराल का लाफ्टर का नुस्खा था-


कभी कभी पिछले जन्म की बातें याद रह जाती हैं,
पिछले जन्म में सांड पति और सरदार पत्नी रहा होगा...

अब बात समझ में आई, शादी के इस रिश्ते को जन्म-जन्म का बंधन क्यों कहते हैं...

वो गाना है न...जाइए आप कहां जाएंगे, ये नज़र लौट के आएगी...

स्लॉग समझदारी

एक स्मोकर एयरपोर्ट पर सिगरेट पी रहा था, साथ ही हवा में धुंए के छल्ले बना-बना कर छोड़ रहा
था...
तभी एक सज्जन उस स्मोकर के पास आए और सवाल किया...बंधु आप दिन में कितने सिगरेट पी जाते हैं...
स्मोकर...आप ये सवाल क्यों पूछ रहे हो...
सज्जन...आपने जो पैसा सिगरेट में उड़ाया है, अगर उसे बचाया होता तो पीछे जो हवाई जहाज़ खड़ा है, वो आज आपका होता...
स्मोकर सज्जन पुरुष से...क्या आप स्मोक करते हैं...
सज्जन पुरुष...नहीं, बिल्कुल नहीं...
स्मोकर...क्या ये हवाई जहाज़ आपका है....
सज्जन...नहीं तो...
स्मोकर...ये हवाई जहाज़ मेरा है...

जानते हैं उस स्मोकर का नाम क्या था...वो जनाब थे विजय माल्या...

वैधानिक चेतावनी...धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए ख़तरनाक है
नैतिक चेतावनी...किसी को बिन मांगे सलाह देना भी कम ख़तरनाक नहीं...

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

लखनऊ में चूहा बने दो सांड...खुशदीप

कल की पोस्ट के वादे के मुताबिक आपको दो सांडों के चूहा बनने का आंखों देखा हाल सुनाऊंगा...लेकिन पहले महागुरुदेव अनूप शुक्ल की पोस्ट से बिना अनुमति लेकिन साभार लिया हुआ एक छोटा सा किस्सा...

फ़िराक साहब मुंहफ़ट थे। किसी को कभी भी कुछ भी कह देते थे। एक बार इलाहाबाद युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर अमर नाथ झा के लिये भी कुछ कह दिये। लोगों ने चुगली कर दी दरबार में। फ़िराक साहब को पता चला तो अमर नाथ झा से मिलने गये। दरबार लगा था झा जी का। अपना नम्बर आने पर आने पर फ़िराक साहब जब अन्दर गये तो पहले बाल बिखेर लिये। शेरवानी के बटन खोल लिये। कपड़े अस्त-व्यस्त कर लिये। अमर नाथ झा बोले -फ़िराक अपने कपड़े तो ठीक कर लो। सलीके से रहा करो।


फ़िराक बोले- अरे ये सलीका तो तुमको आता है अमरू! तुम्हारे मां-बाप इतने समझदार थे। सिखाया तुमको। हमारे मां-बाप तो जाहिल थे। कौन सिखाता हमको।


अमरनाथ झा बोले- फ़िराक अपने मां-बाप को इस तरह कोसना ठीक नहीं।


फ़िराक बोले- अमरू मैं अपने लोगों को नहीं कोसूंगा तो किसको कोसूंगा। अपने मां-बाप को , भाई- दोस्तों को नहीं कोसूंगा तो किसको कोसूंगा। तुमको नहीं कोसूंगा तो किसको कोसूंगा।


अमरनाथ झा बोले – ओके, ओके फ़िराक। आई गाट योर प्वाइंट। चलो आराम से रहो।


अनूप जी, मुझे भी किसी को कोई पाइंट देना था तो आपके किस्से से बढ़िया साधन और कोई नहीं दिखा...हां तो चलिए इस पाइंट पर यही फुलस्टॉप लगाता हूं...और आता हूं लखनऊ में अपने इतवार के प्रवास पर...शनिवार रात को सगन की पार्टी देर तक चलती रही...इसलिए सोना भी काफी देर से हुआ...लेकिन सुबह घड़ोली जैसी रस्मों की वजह से उठना जल्दी ही हो गया...अब दोपहर अपनी थी किया क्या जाए...सोचा चलो पत्नीश्री को अमीनाबाद घुमा कर ही खुश कर दिया जाए...अमीनाबाद जाने के लिए रिक्शा लिया...किसी भी शहर को जानना हो तो गाड़ी में मत घूमिए...अगर रिक्शा चलता है तो शहर का मिज़ाज जानने से बढ़िया और कुछ नहीं हो सकता...लखनऊ के रिक्शा वैसे भी एक्स-एक्स-एल यानि काफी बड़े होते हैं...लेकिन यहां रिक्शे वाले कम पैसे ही चार्ज करते नज़र आए...नोएडा या अन्य महानगरों की तरह मनमाने दाम वसूल नहीं करते...


खैर अमीनाबाद पहुंचे तो वहां का नज़ारा देखकर पत्नीश्री की तो जैसे लाटरी खुल गई...अगर जूतियों की दुकानें तो दुकानें ही दुकानें....लेडीज़ सूट, आर्टिफिशियल जूलरी, बैग्स...सभी का यही हाल था...मुझे एहसास हो गया कि पत्नीश्री को अब कम से कम दो तीन घंटे तो लगेंगे हीं...लेकिन मैं क्या करूंगा...अनमना सा साथ घूमता रहा...दिमाग में ब्लॉगिंग और ब्लॉगर ही घूमते रहे...इसी उधेड़बुन में था कि होटल से फोन आ गया...साथ ही आदेश भी जल्दी पहुंचों, लड़के वालों के घर से किसी रस्म के लिए लड़के की बहनें-भाभियां आई हुई हैं...मैं तो इस कॉल से खुश था लेकिन पत्नीश्री शॉपिंग सफारी में खलल पड़ने से ज़रूर परेशान दिखीं...होटल वापस आने के बाद रस्म पूरी हुई और मैं फिर खाली...

सोचा समय का सदुपयोग किया जाए और जागरण और आई-नेक्स्ट अखबारों के दफ्तर जाकर ब्लॉगर बिरादरी के राजू बिंदास (राजीव ओझा) और प्रतिभा कटियार से ही मिल आया जाए...जागरण के दफ्तर जाने का मेरा मकसद एक और भी था...मुझे खबर मिली थी कि मेरे पत्रकारिता के गुरु रामेश्वर पांडेय जी ने आजकल लखनऊ में ही जागरण की कमान संभाल रखी है...मैं मीराबाई मार्ग पर जागरण के दफ्तर पहुंच गया...वहां बाहर कुछ खाली खाली देखकर दिमाग थोड़ा खटका...लेकिन फिर मैं दफ्तर में दाखिल हो गया...अंदर जाकर पता चला कि रविवार होने की वजह से न तो पांडेय जी दफ्तर में थे और न ही राजीव ओझा जी...वापस चलने को हुआ तो ध्यान आया कि प्रतिभा कटियार भी तो आई-नेक्सट में ही कार्यरत हैं...आई-नेक्सट के आफिस में जाकर पूछा ही था कि प्रतिभा कटियार...तो प्रतिभा सामने ही बैठी हुई थीं...मैंने अपने नाम का परिचय दिया...थैंक्स गॉड, प्रतिभा कम से कम मेरे नाम से तो वाकिफ़ थीं...प्रतिभा से मिलकर और थोड़ी देर बात कर अच्छा लगा...उनके बोलने से ही पता चल गया कि लेखनी चलाते वक्त भी वो कमाल ही करती होंगी...प्रतिभा ने चाय-बिस्किट भी मंगाई...वहीं मैंने पांडेय जी का सेल नंबर लेकर बात की...वो तब गोरखपुर में थे...काफ़ी साल बाद पांडेय जी से बात करने पर मैंने खुद को धन्य महसूस किया...प्रतिभा से विदा लेकर वापस होटल आया...

सोचा, शाम हो चली है, तैयार ही हो लिया जाए...लेकिन फिर वही प्रॉब्लम...सूट प्रेस करवाना था..नोएडा से करवा कर चला था...लेकिन बैग में तह कर रखने की वजह से सिलवटें आना लाज़मी था...लेकिन इस प्रेस के चक्कर ने मुझे वो नज़ारा दिखाया जिसे मैं ज़िंदगी में कभी नहीं भूल सकता...

नाका हिंडोला के जिस होटल में ठहरा था, वहीं साथ ही सटा हुआ नया गणेशगंज बाज़ार था...वहां मैंने एक दुकान पर सूट प्रेस होने के लिए दिया...और टाइम पास करने के लिए वहीं पान के खोमचे के पास खड़ा होकर बाज़ार की रौनक देखने लगा...तभी सामने से एक सांड आता दिखाई दिया...वो सांड जैसे हम छींक मारते हैं, इसी तरह बार-बार गर्दन हिला कर ज़ोर से हुंकार लगा रहा था......आने जाने वालों के दिल में दहशत भरने के लिए सांड का ये रौद्र रूप काफ़ी था...सब बचकर निकल रहे थे...तभी क्या देखता हूं कि हरी टी-शर्ट में एक 15-16 साल का किशोर (सरदार) सांड के सामने आ खड़ा होता है...अपना एक हाथ ऊपर कर उंगली उठाता है ठीक वैसा ही अंदाज़ जैसे श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उंगली पर उठाया था...किशोर को देखते ही सांड तेज़ी से 180 डिग्री के एंगल में उलटा घूमा और सरपट भागने लगा...ऐसे जैसे 100 मीटर की रेस लगा रहा हो...तभी गली से किशोर के लिए आवाज़ आई कि एक सांड वहां भी खड़ा है...किशोर ने उसके सामने जाकर भी वही एक्शन-रीप्ले किया...उस सांड की भी फर्राटा दौड़ देखने को मिल गई...ये सांड काफी दूर जाकर मुड़ कर देखने लगे कि सरदार बच्चा अब भी खड़ा है या नहीं...सांडों की ऐसी दयनीय हालत मैंने पहले कभी नहीं देखी ...वहीं दुकान वाले बताने लगे कि कभी भी सांडों को भगाना होता है तो उसी सरदार बच्चे की सेवाएं ली जाती हैं...अब बेचारे दोनों सांड वहीं गलियो में सरदार बच्चे के डर से छुप-छुप कर घूमते रहते हैं...मुझे ये सब देखकर यही ताज्जुब हो रहा था कि आखिर इस सरदार बच्चे में ये कौन सा जादू है जो सांडों को भी डर के मारे चूहा बना देता है...अगर मेरे पास वहां वीडियो कैमरा होता तो ज़रूर ये नज़ारा कैद कर आपकी खिदमत में पेश करता...इसके लिए मैं लखनऊ के ब्लॉगर भाइयों से ही अनुरोध करता हूं कि एक बार खुद भी अपनी आंखों से नया गणेशगंज जाकर ये नज़ारा देंखें...हो सके तो इसका वीडियो भी ज़रूर बनाएं...वहां किसी भी दुकानदार से सरदार बच्चे और सांडों के बारे में पूछा जाए तो वो आपको उनका सारा पता बता देगा...वाकई ये नज़ारा लिखने की बजाय देखने की चीज़ है...

हां, एक बात तो बताना भूल ही गया कि महफूज़ से मुलाकात बेशक नहीं हो पाई, लेकिन उसने फोन पर मेरा एक बहुत ज़रूरी काम करा दिया...दरअसल मेरी बहन और जीजाजी की गोरखपुर धाम एक्सप्रेस से सेकंड एसी में वापसी की वेटिंग में 3-4 नंबर की टिकट थीं...कन्फर्म नहीं हो पा रही थीं...महफूज को मैंने पीएनआर नंबर एसएमएस किया...महफूज़ ने गोरखपुर स्टेशन पर अपने जानने वाले किन्हीं उपाध्याय जी से संपर्क किया...दोपहर बाद तक टिकट कन्फर्म होने की सूचना आ गई....मेरी ट्रेन 24 जनवरी की सुबह पांच बजकर पांच मिनट की थी...ट्रेन एक घंटा देरी से ज़रूर आई लेकिन उसने दोपहर तीन बजे तक गाजियाबाद पहुंचा दिया...

स्लॉग चिंतन

Respect yourself but never fell in love with you

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

ब्लॉगरों की शाम-ए-अवध, महफूज़ की गोली...खुशदीप


मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं...

या
लखनऊ हम पर फिदा, हम फिदा-ए-लखनऊ,
किसमें है दम इतना, कि हम से छुड़वाए लखनऊ...


वाकई लखनऊ की बातें लखनऊ वाले ही जानते हैं...इस शनिवार और इतवार को नवाबों की नगरी नखलऊ सॉरी लखनऊ जाना हुआ...एक शादी में शिरकत करनी थी...एक दिन सगन सेरेमनी थी, दूसरे दिन शादी का समारोह था...लखनऊ स्टेशन के पास ही होटल में कमरा बुक था...सगन-शादी का अरेंजमेंट भी आस-पास ही होटलों में था...इसलिए ज़्यादा दिक्कत की बात नहीं थी...सोचा यही था कि शाम रिश्तेदारों के बीच गुज़रेगी और दिन ब्लॉगर भाइयों के साथ बीतेगा...अब ये भरोसा भी था कि महफूज़ लखनऊ में बैठा है, इसलिए सब ब्लॉगरजन से मिलवाने का बंदोबस्त करा ही देगा...मैं इतना निश्चिंत था कि किसी और ब्लॉगर का फोन नंबर जानने की कोशिश भी नहीं की...लेकिन कहते हैं न हर तज़ुर्बा आदमी को और समझदार बनाता है...महफूज़ को करीब डेढ़ महीने पहले से ही मेरे लखनऊ आने का पता था...लेकिन वो हैं न man proposes god disposes...महफूज़ मियां ठहरे महफूज़ मियां...मैंने दिल्ली से ट्रेन चलने के बाद महफूज़ को फोन मिलाया तो पता चला जनाब खुद दिल्ली आए हुए हैं...लेकिन जनाब ने ताल ठोककर कहा कि वो अगले दिन शताब्दी से लखनऊ पहुंच जाएंगे...मैंने भी सोचा चलो कल सुबह आराम कर लूंगा, दोपहर बाद महफूज़ लखनऊ पहुंच जाएगा तो रवींद्र प्रभात जी, ज़ाकिर अली रजनीश भाई, प्रतिभा कटियार, मिथिलेश दूबे, सलीम और बाकी सब ब्लॉगरजन से भी मुलाकात हो जाएगी...

अगले दिन दोपहर तक महफूज़ का कोई अता-पता नहीं चला तो झख मारकर मैंने ही फोन मिलाया...पता चला कि प्यारे अभी तक दिल्ली में ही फंसे हुए हैं...शताब्दी मिस हो गई है...महफूज ने ये भी बताया कि वो दोपहर दिल्ली से कोई ट्रेन पकड़कर रात तक लखनऊ पहुंच जाएगा...महफूज़ की बातों से मुझे अचानक शोले फिल्म का एक सीक्वेंस याद आ गया...गब्बर की एंट्री से ठीक पहले ठाकुर के घर का दृश्य दिखाया गया था...ठाकुर का बेटा बाहर शहर जाने की बात करता है तो पोता साथ जाने की जिद करता है...बच्चे की मां टोकती है कि वहां रेलगाड़ियां होती हैं...इस पर ठाकुर का बेटा हंसते हुए कहता है कि हां रेलगाड़ियों को तो दुश्मनी है तुम्हारे बेटे से...जहां भी ये दिखेगा, वहीं पटरियां छोड़कर तुम्हारे बेटे के पीछे दौड़ने लगेंगी...तो यही हाल कुछ अपने महफूज़ मास्टर का भी है...ट्रेनों को इनसे न जाने क्या दुश्मनी है जहां इनका नाम सुना नहीं कि खुद ही मिस हो जाती हैं...खैर छोड़िए मैंने सोचा, महफूज़ तो जब आएगा सो आएगा, अभी तो अपना हाथ जगन्नाथ बनो...

तब तक मैं साइबर कैफे से सतीश सक्सेना भाई की पोस्ट पर कमेंट के ज़रिए खुद के लखनऊ में होने की बात लिख चुका था...मेरे सामने समस्या ये थी कि लखनऊ में रवींद्र प्रभात जी या ज़ाकिर भाई से संपर्क कैसे करूं...मिथिलेश का जो नंबर था वो लगातार स्विच ऑफ आ रहा था...खुद पर गुस्सा भी आया कि आड़े वक्त के लिए क्यों सबके फोन नंबर संभाल कर नहीं रखता...मैंने मैनपुरी शिवम मिश्रा को फोन मिलाकर रवींद्र जी और ज़ाकिर भाई के सेल नंबर लिए...अभी ये नंबर लिए ही थे कि मेरे सेल पर डॉ अमर कुमार जी की कॉल आ गई...डॉक्टर साहब सतीश भाई की पोस्ट पर मेरे कमेंट के ज़रिए जान चुके थे कि मैं लखनऊ में हूं...उन्होंने बड़े अपनत्व से  कहा कि मैं गाड़ी भेज रहा हूं, रायबरेली लखनऊ से सिर्फ 72 किलोमीटर दूर है, आकर मिल जाओ...सच पूछो तो मेरी भी डॉक्टर साहब के दर्शन की बड़ी इच्छा थी, लेकिन शादी की ज़िम्मेदारियों की वजह से ज़्यादा देर तक कहीं आ-जा नहीं सकता था...मैंने डॉक्टर साहब से अगली बार लखनऊ आने पर ज़रूर रायबरेली पहुंचने के वादे के साथ अपनी मजबूरी जताई...डॉक्टर साहब मेरी परेशानी समझ गए...इसके बाद मैंने ज़ाकिर भाई और रवींद्र प्रभात जी को फोन मिलाया...लगा ही नहीं दोनों से पहली बार बात कर रहा हूं...दोनों ने ही शाम को मेरे होटल पहुंचने के लिए रज़ामंदी दी...जब तक ये बात हो रही थी चार बज चुके थे...सगन सेरेमनी का टाइम शाम सात बजे का था...मेरा सूट भी प्रेस नहीं था...मैंने सोचा रवींद्र जी और ज़ाकिर भाई से मुश्किल से आधा घंटा ही मुलाकात हो पाएगी...खैर मैं जल्दी सूट प्रेस कराने के लिए बाज़ार दौड़ा...मैं हाथ में हैंगर में टंगा सूट लेकर वापस होटल आ ही रहा था कि सीढ़ियों से रवींद्र जी उतरते दिखाई दिए...ब्लॉग की फोटो से कहीं ज़्यादा स्मार्ट...काली जैकेट में और भी डैशिंग लग रहे थे...रवींद्र भाई जिस गर्मजोशी से मुझे गले मिले, वो मैं भूल नहीं सकता...
 
मैंने यही सोचा ऊपर तो कमरों में शादी का हो-हल्लड़ मचा है, इसलिए कहीं नीचे ही रेस्टोरेंट में बैठकर आराम से बातें करते हैं...रवींद्र जी ने भी कहा, नीचे कार पार्किंग की समस्या है...टो करने वाले गाड़ी उठा कर ले जाते हैं, इसलिए ऐसी किसी जगह पर बैठना ही सही रहेगा, जहां से गाड़ी दिखती भी रहे...ऊपर वाले की मेहरबानी से नाका हिंडोला चौराहे पर ही एक ओपन रेस्तरां था- हरियाली फास्ट फूड कॉर्नर...वहीं हम दोनों ने डेरा जमा लिया...रवींद्र जी ने बताया कि ज़ाकिर भाई भी आते ही होंगे...थोड़ी देर बाद ही ज़ाकिर भाई भी हमें ढूंढते-ढांढते पहुंच ही गए...ज़ाकिर भाई ने बताया कि मिथिलेश भी थोड़ी देर में पहुंच जाएगा...खैर हम तीनों में ब्लॉगिंग के साथ दुनिया-जहां की चर्चा होने लगी...रवींद्र भाई ने बताया कि अप्रैल में वो लखनऊ में ब्लॉगर्स के लिए एक बड़ा कार्यक्रम करने की सोच रहे हैं...मैंने अनुरोध किया कि जब भी प्रोग्राम करें बस शनिवार-रविवार का ज़रूर ध्यान रख लीजिएगा...रवींद्र भाई ने मेरा अनुरोध मान लिया...तब तक मिथिलेश भी अपने दोस्त शिवशंकर के साथ आ पहुंचा...इस बीच मिथिलेश की डॉ अरविंद मिश्रा जी से फोन पर बात हुई.....मिश्रा जी ने चिरपरिचित अंदाज़ में कहा कि शाम-ए-अवध का मज़ा लिया जा रहा है...
 
वाकई बातों में टाइम का कुछ पता ही नहीं चल रहा था...मैंने तब तक फास्ट फूड सेंटर वाले से जाकर पूछा कि खाने के लिए तो बहुत कुछ दिख रहा है लेकिन पीने के लिए क्या-क्या है...गलत मत समझिए, मैं रेस्तरां के बोर्ड पर लिखे लस्सी, बादामी दूध, कॉफी की बात कर रहा था...अब उस रेस्तरां से जो जवाब मिला, वो माशाअल्लाह था, बोला पीने के लिए बताशों का पानी है, चलेगा क्या...मैंने हाथ जोड़ा और चुपचाप सीट पर जाकर बैठ गया...तभी रवींद्र भाई ने टिक्की चाट का ऑर्डर दे दिया...टिक्की के तीखे जायके के साथ बातों में और भी रस आने लगा..महफूज़ की बात चली तो मिथिलेश ने बताया कि वो अब कई महीनों से लखनऊ में है लेकिन महफूज़ मियां उसके हाथ नहीं लगे हैं...मैंने सोचा मुझे तो लखनऊ में दो ही दिन रहना है, फिर महफूज़ मेरे हाथ कहां से लगता....इन्हीं बातों के बीच पत्नीश्री की मेरे सेल पर कॉल आ चुकी थी कि जनाब कहां हो, सगन के लिए तैयार होना है या नहीं...लेकिन ब्लॉगरों की महफिल चल रही हो तो फिर दूसरी बातें कहां याद रहती हैं...ये तो उस रेस्तरां वाले ने ही आखिर आकर हमें टोका कि भाई जी आप सीट खाली करो तो उसके कुछ और ग्राहक भी एडजस्ट हो सकें...हमने अब उठने में ही अपनी बेहतरी समझी...रवींद्र भाई ने चलते चलते मुझे ये भी कहा कि अगले दिन जब भी मैं खाली हूं तो उन्हें फोन कर दूं...वो गाड़ी भेजकर मुझे बुलवा लेंगे...खैर सबने विदा ली...लखनऊ का किस्सा ज्यादा ही लंबा हो चला है...बाकी कल की पोस्ट तक बचा लेता हूं...कल की पोस्ट में बताऊंगा कि कैसे मैंने लखनऊ में दो सांडों को चूहा बनते देखा...

बुधवार, 26 जनवरी 2011

26 जनवरी विशेष...गणतंत्र का ये कैसा उत्सव...खुशदीप


पिछले पांच दिनों में गणतंत्र के सफ़र के कुछ पहलुओं को आप तक पहुंचाने की कोशिश की...इस तरह की पोस्ट पर तात्कालिक सफ़लता बेशक न मिले लेकिन इनका महत्व कालजयी रहता है...नेट के ज़रिए अतीत में झांकने वालों को कुछ प्रमाणिक तथ्य मिल जाएं...बस यही मेरा उद्देश्य था...आज इस श्रृंखला की समापन किस्त आप तक पहुंचा रहा हूं...लेकिन श्रृंखला के इतिश्री होने के बाद आप को कुछ ऐसा भी बताऊंगा जो गणतंत्र का उत्सव मनाने से ठीक पहले देश में हुआ...जिसे देखकर कोई भी हिल सकता है और ये सवाल ज़ेहन में कौंधेगा कि क्या हम गणतंत्र के 61 बरसों में इतने ही परिपक्व हो पाए...लेकिन पहले अंतिम किस्त...

1997 से 2011...देश ने देखे पहले दलित, पहले साइंटिस्ट, पहली महिला राष्ट्रपति

25 जुलाई 1997 को के आर नारायणन देश के राष्ट्रपति बने। नारायणन देश के पहले और अकेले राष्ट्रपति रहे जो दलित समुदाय से सर्वोच्च पद तक पहुंचे। नारायणन को इसलिए याद किया जाएगा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में राज्यों में अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने की कैबिनेट की सिफारिशों पर सख्त रुख अपनाते हुए कई बार वापस किया था।

देश में 2002 में राष्ट्रपति पद के लिए हुआ चुनाव सबसे चर्चित रहा। एपीजे अब्दुल कलाम के रूप में एक साधारण परिवार में जन्मा व्यक्ति सिर्फ अपनी योग्यता के बल पर आगे बढ़ा, मिसाइल टैक्नोलाजी में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई, राजनीति से कोई जुड़ाव न होने के बावजूद देश के सर्वाच्च पद तक पहुंचने में सफल रहा।

कलाम ने राष्ट्रपति रहते हुए भी खास तौर तरीकों से पीपुल्स प्रेज़ीडेंट की पहचान बनाई।
कलाम के कार्यकाल में 2004 के आम चुनाव में भी किसी अकेली पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी और यूपीए सबसे बड़े गठबंधन के तौर पर उभरा। कलाम ने परंपरा से हटते हुए सबसे बड़े गठबंधन के नेता को नहीं, बल्कि उस नेता (सोनिया गांधी) के चुने हुए व्यक्ति यानि राज्यसभा के सदस्य डॉ मनमोहन सिंह को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया।

सांसदों के लाभ के पद की अवैधता को वैध करने करने के लिए संसद में 1959 से ही की जा रही कोशिशों को लेकर वक्त वक्त पर विवाद होता रहा है। संसद के दोनों सदनों ने लाभ के पद को लेकर संसद (अयोग्यता रोकथाम) विधेयक पारित कर राष्ट्रपति कलाम के पास भेजा तो उन्होंने 30 मई 2006 को इसे दोबारा विचार करने के लिए वापस भेज दिया। बिल को दोबारा पारित कर राष्ट्रपति के पास भेजा गया तो उन्हें इसे अपनी मंजूरी देनी पड़ी। कलाम के राष्ट्रपति रहते ही 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव के बाद तत्कालीन राज्यपाल बूटा सिंह ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश केंद्र को भेजी थी। बूटा सिंह के मुताबिक राज्य में किसी भी पार्टी को बहुमत न मिलने की वजह से सरकार बनना मुमकिन नहीं था। केंद्र को भेजी एक और रिपोर्ट में बूटा सिंह ने कहा था कि एक खास पार्टी (नीतीश कुमार के नेतृत्व में) बहुमत के करीब पहुंच सकती है और सरकार बनाने के लिए दावेदारी कर सकती है। केंद्र की यूपीए सरकार ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश के हक में फैसला लिया और इसकी कापी फैक्स के ज़रिए मॉस्को दौरे पर गए हुए राष्ट्रपति कलाम को भेज दी। कलाम ने फैक्स से ही राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश को अपनी मंजूरी दे दी। 23 मई 2005 को बिहार विधानसभा भंग करने की अधिसूचना जारी कर दी गई।

लेकिन बाद मे सुप्रीम कोर्ट ने बिहार विधानसभा को भंग करने के फैसले को अवैध ठहराया। राष्ट्रपति कलाम शायद सीधेपन में एक असांविधानिक अधिसूचना पर दस्तखत करने में जल्दबाज़ी से काम नहीं लेते तो शायद सुप्रीम कोर्ट के दखल देने की नौबत नहीं आती। जानकारों के मुताबिक मॉस्को से ही मंजूरी देने की बजाय कलाम को इस मुद्दे पर संविधान और कानूनविदों से सलाह लेने के बाद ही इस मुद्दे पर फैसला लेना था। ये घटना अपने आप में ही साबित करती है कि राष्ट्रपति की भूमिका निश्चित तौर पर महज़ एक रबर स्टांप तक ही सीमित नहीं होती।

मौजूदा राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने से पहले महाराष्ट्र से सांसद और राजस्थान की राज्यपाल रह चुकी हैं। प्रतिभा पाटिल से पहले राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए शिवराज पाटिल कांग्रेस की पहली पसंद थे। लेकिन उनके नाम पर लेफ्ट ने वीटो कर दिया था। फिर सोनिया गांधी की पसंद प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार बनाया गया। प्रतिभा पाटिल ने राष्ट्रपति चुनाव में कदावर नेता और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत को शिकस्त दी थी। 2007 में देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनने के बाद से प्रतिभा पाटिल के सामने ऐसा कोई मौका नहीं आया, जब बड़ी सांविधानिक संकट जैसी स्थिति आई हो और फैसला राष्ट्रपति के विवेक पर आ टिका हो।

हां ये ज़रूर हुआ कि पी जे थॉमस को जिस दिन सीवीसी की शपथ राष्ट्रपति ने दिलाई, उससे पहले लोकसभा में अपोज़िशन की नेता सुषमा स्वराज ने महामहिम से मुलाकात के लिए राष्ट्रपति भवन से वक्त मांगा था...लेकिन थॉमस के शपथ लेने तक सुषमा को मुलाकात के लिए वक्त नहीं मिल पाया...इसके लिए राष्ट्रपति भवन के वाज़िब कारण हो सकते हैं...दरअसल सुषमा उस तीन कमेटी की सदस्य थीं जिसे सीवीसी के नाम पर मुहर लगानी थी...दूसरे सदस्य प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री चिदंबरम थे...थॉमस के पामोलीन आयात घोटाले में फंसे होने की वजह से सुषमा के ऐतराज़ जताने के बावजूद प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने थॉमस के नाम की सिफारिश ही राष्ट्रपति को भेजी...सुषमा इसी पर अपना विरोध राष्ट्रपति से जताना चाहती थीं...कर्नाटक में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और राज्यपाल हंसराज भारद्वाज के बीच जो नाटक चल रहा है, बीजेपी उस पर अपना विरोध राष्ट्रपति भवन तक ले जाना चाहती है...कर्नाटक में येदियुरप्पा सरकार संकट में आती है तो राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को अपने कार्यकाल में पहली बार कोई बड़ा फैसला लेने की स्थिति बन सकती है...
इतिश्री
अब आपको वादे के मुताबिक वो 3 तस्वीरें दिखाता हूं जो देश ने लोकतंत्र के उत्सव से ठीक पहले देखीं...

मलमाड (महाराष्ट्र)
एडिशनल कलेक्टर को ज़िंदा जलाया

महाराष्ट्र के नासिक ज़िले के मलमाड में एडीशनल कलेक्टर यशवंत सोनवणे का कसूर इतना ही ता कि वो देश का नमक खाने की वजह से देश की दौलत लूटते नहीं देख सकते थे...पानेवाड़ी ऑयल डिपो में तेल में मिलावट के खेल की जानकारी सोनवणे तक पहुंची तो उन्होंने छापा मारने की हिम्मत दिखा डाली...एक अफसर की ये जांबाज़ी भला तेल माफ़िया को कैसे बर्दाश्त होती...सोनवणे को उनकी गाड़ी में ही मौके पर ज़िंदा जला दिया गया...ये सब महाराष्ट् में हुआ जहां कांग्रेस की एनसीपी के साथ सरकार है...वही कांग्रेस जिसकी अगुवाई वाली केंद्र सरकार व्हिस्लब्लोअर्स की हिफ़ाज़त के लिए कानून लाने की बात करती है...लेकिन सोनवणे शायद भूल गए थे कि देश में व्हिस्लब्लोअर्स का हाल वही होता है जो 19 नवंबर 2005 को यूपी के लखीमपुर खीरी में इंडियन ऑयल कारपोशेन के मार्केटिंग मैनेजर एस मंजूनाथ का हुआ था...मंजूनाथ ने पेट्रोल पंप पर मिलावट पकड़ने पर कार्रवाई की हिम्मत दिखाई थी...बदले में मंजूनाथ को हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया गया...अब मंजूनाथ के साथ सोनवणे का नाम भी जुड़ गया...

गाज़ियाबाद
भरे अदालत परिसर में गड़ासे से हमला

गाज़ियाबाद कोर्ट परिसर में आरुषि के पिता राजेश तलवार पर हमला करने वाला ये नौजवान कोई हार्डकोर अपराधी नहीं है...लेकिन ये दूसरा मौका है जब फाइन आर्ट्स में गोल्ड मेडलिस्ट और अहमदाबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन से फिल्म एनीमेशन में पोस्ट ग्रेजुएट उत्सव शर्मा ने भरी कचहरी में किसी पर जानलेवा हमला किया...वाराणसी के रहने वाले उत्सव ने पिछले साल आठ फरवरी को पंचकूला कोर्ट परिसर के बाहर रूचिका गेहरोत्रा केस में आरोपी और हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर पर भी धारदार हथियार से हमला किया था...उत्सव के माता-पिता दोनों ही बीएचयू में प्रोफेसर हैं...उत्सव इस बार भी इंटरनेशनल इंडिया आर्ट समिट में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली आया था...लेकिन उसने बस से गाज़ियाबाद पहुंच कर राजेश तलवार पर हमले को अंजाम दे दिया...सवाल हमले से बड़ा ये है कि जो युवक देश में आने वाले कल की उम्मीद है, वो खुद ही कानून हाथ में लेकर अपने आज पर कुल्हाड़ी मारने पर क्यों तुल जाता है...क्या इसके लिए सिर्फ उत्सव की सनक ज़िम्मेदार है या रसूख और पैसे वालों को कानून से बच निकलने का रास्ता देने वाला सिस्टम और इनसाफ़ में होने वाली देरी भी गुनहगार है...

मेरठ
दिनदहाड़े घर पर हमला बोलकर लड़की अगवा


शहर की पॉश वैशाली कॉलोनी में 24 जनवरी को दिन निकलते ही समाजवादी छात्र सभा का पूर्व मुखिया प्रसन्नजीत गौतम 15 गुंडों के साथ एक घर पर दावा बोल देता है...ठीक फिल्मी अंदाज़ में दो गाडि़यों और पांच-छह मोटर साइकिलों पर सवार होकर...लड़की का भाई विरोध करता है तो उसे गोली मार कर बुरी तरह घायल कर दिया जाता है...लड़की को घर से बेखौफ उठाया जाता है और दनदनाते हुए हमलावर निकल जाते हैं...ये हालत तब है जब कि प्रसन्नजीत दिसंबर के पहले हफ्ते में भी लड़की के घर में घुसकर उस पर हमला कर चुका था...वारदात के दो दिन बाद भी पुलिस प्रसन्नजीत या लड़की का कोई सुराग नहीं लगा सकी है...ये सब उसी उत्तर प्रदेश में हो रहा है जहां की मुख्यमंत्री मायावती क़ानून के राज की दुहाई देते नहीं थकतीं...

स्लॉग ओवर
प्रियंका चोपड़ा के घर और दफ्तर पर आयकर विभाग ने छापे मारे हैं...अंदेशा बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी का है...

पिछले साल यही प्रियंका चोपड़ा आयकर विभाग की एक डाक्यूमेंट्री में ब्रैंड अंबेसडर थी...उस डाक्यूमेंट्री में इन्हें लोगों से ईमानदारी से इनकम टैक्स देने की अपील करते देखा जा सकता है...प्रियंका ये भी कहती दिखती हैं कि टैक्स के पैसे से विकास के क्या क्या काम कराए जा सकते हैं..
(यकीन नहीं आता तो इस वीडियो के  काउंटर 7.32 से 7.48  पर जाकर प्रियंका की अपील को आप भी देख सकते हैं...)

अब आप ही बताइए, इसके बाद भी कुछ कहने को रह जाता है क्या...

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

26 जनवरी विशेष...मंडल-कमंडल के दौर में राष्ट्रपति...खुशदीप

1987 से 1997 के दौर में ही देश ने मंडल-कमंडल की राजनीति को पूरे उफ़ान पर देखा..
16 जुलाई 1987 को पूर्व वित्त मंत्री आर वेंकटरमन देश के अगले राष्ट्रपति बने। वेंकटरमन के कार्यकाल के दौरान 1989 में आम चुनाव के बाद किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। सबसे बड़े दल के रूप में कांग्रेस उभरी। लेकिन बहुमत से काफ़ी दूर थी। वेंकटरमन के सामने मुश्किल थी कि सरकार बनाने के लिए किसे न्योता दें। ऐन वक्त पर राजीव गांधी ने खुद ही ऐलान कर दिया कि कांग्रेस विपक्ष में बैठेगी।

वेंकटरमन ने फिर राष्ट्रीय मोर्चा के नेता वीपी सिंह को न्योता दिया। हालांकि उस वक्त भी सरकार की स्थिरता को लेकर राष्ट्रपति निश्चित नहीं थे। बीजेपी और लेफ्ट जैसे दो परस्पर विरोधी धुर वीपी सिंह को बाहर से समर्थन दे रहे थे लेकिन सरकार में शामिल होने को तैयार नहीं थे। वहीं हुआ जिसका अंदेशा था। डेढ़ साल बाद ही बीजेपी ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। लेकिन वीपी सिंह ने अल्पमत में आने के बावजूद इस्तीफ़ा नहीं दिया। यहां राष्ट्रपति वेंकटरमन के लिए बड़ी नाज़ुक परिस्थिति थी।


वेंकटरमन ने वीपी सिंह को सदन में बहुमत साबित करने के लिए कहा। विश्वास मत में वीपी सिंह सरकार हार गई और वी पी सिंह को इस्तीफ़ा देना पड़ा। जनता दल एस के नेता चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री बनने के लिए कांग्रेस ने बाहर से समर्थन देना स्वीकार किया। लेकिन मार्च 1991 में ही चंद्रशेखर सरकार ने बजट पेश करने से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया। इससे अभूतपूर्व सांविधानिक संकट खड़ा हो गया। बजट या लेखानुदान (vote of account) के बिना सरकार का चलना संभव ही नहीं हो सकता। इस्तीफा देने की वजह से चंद्रशेखर सरकार को लेखानुदान पारित कराने का अधिकार ही नहीं था। उस वक्त ये सुझाव भी सामने आया था कि अगर लोकसभा लेखानुदान पारित कराने में नाकाम रहती है तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 123  के तहत खुद अध्यादेश के ज़रिए ऐसा कर सकते हैं। लेकिन संविधानविदों की राय के अनुसार संविधान इसकी इजाज़त नहीं देता। ऐसे में राष्ट्रपति वेंकटरमन ने फैसला किया कि लेखानुदान पारित हो जाने के बाद ही लोकसभा को भंग किया जाएगा।

16 जुलाई 1992 को डॉ शंकर दयाल शर्मा देश के नवें राष्ट्रपति बने। मई 1996 में ग्यारहवें आम चुनाव के बाद राष्ट्रपति शर्मा की ओर से बीजेपी को सरकार बनाने के लिए न्योता दिए जाने के फैसले पर काफ़ी सवाल उठाए गए थे। तेरह दिन में ही अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई थी। लेकिन संविधान के अनुसार राष्ट्रपति शर्मा ने सबसे बड़ी पार्टी को न्योता देकर सही निर्णय लिया था। संविधान के अनुच्छेद 75 (1) में साफ है कि राष्ट्रपति का अधिकार और दायित्व है कि वो सबसे ज्यादा जनादेश की नुमाइंदगी करने वाली पार्टी के नेता को प्रधानमंत्री बनने के लिए न्यौता दे। अब ये उस नेता पर निर्भर करता है कि वो लोकसभा में अपना बहुमत साबित कर पाता है या नहीं। वाजपेयी ने 1996 में सदन में बहुमत साबित करने की मियाद खत्म होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था।

शर्मा से ही जुड़ा एक मज़ेदार किस्सा है कि सांविधानिक सुधारों को लेकर एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने आया। प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य ने शर्मा से कहा कि वो सुधारों की पहली प्रति उन्हें इसलिए सौंप रहे हैं क्योंकि राष्ट्रपति भगवान गणेश की तरह है जिनकी सबसे पहले स्तुति की जाती है और कामना की जाती है कि वो सारे विघ्नों को दूर करेंगे। इस पर चुटकी लेते हुए शर्मा ने कहा था कि वो तो सिर्फ 'गोबर गणेश' हैं।

क्रमश:

सोमवार, 24 जनवरी 2011

26 जनवरी विशेष...जैल सिंह-राजीव गांधी के बीच तल्ख़ी...खुशदीप


11 फरवरी 1977 को फ़खरूद्दीन अली अहमद के आकस्मिक निधन के बाद नीलम संजीवा रेड्डी जनता पार्टी के राज में राजनीतिक सर्वसहमति से देश के राष्ट्रपति बने। ऐसा पहली बार हुआ कि देश में बिना चुनाव लड़े ही कोई राष्ट्रपति बना। 1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हुई। नीलम संजीवा रेड्डी का कार्यकाल खत्म होने के बाद 15 जुलाई 1982 को पूर्व गृह मंत्री ज़ैल सिंह देश के राष्ट्रपति बने। 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री के लिए उनका उत्तराधिकारी चुनने पर संकट जैसी स्थिति आ गई। इंदिरा गांधी की जिस दिन हत्या हुई उस दिन राजीव गांधी कोलकाता में थे। राजीव को जो फ्लाइट कोलकाता से लेकर दिल्ली आई उसी में उन्हें प्रधानमंत्री बनाने का फैसला लिया गया। विदेश दौरे पर गए ज़ैल सिंह भी उसी दिन शाम को दिल्ली लौटे। ज़ैल सिंह भी राजीव गांधी को पीएम नियुक्त किए जाने के लिए तैयार हो गए। राजीव न तो उस वक्त कांग्रेस सरकार में मंत्री थे और न ही कैबिनेट ने राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए कोई बैठक की थी।

परंपरा के अनुसार इस तरह की असाधारण स्थिति में कैबिनेट के वरिष्ठतम मंत्री को अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ दिलाई जाती है। राजीव की नियुक्ति से ये साबित हुआ कि राष्ट्रपति को असाधारण स्थिति में अपने विवेक के मुताबिक किसी को भी प्रधानमंत्री चुने जाने का असीमित अधिकार हैं। लेकिन बाद में उस नियुक्ति को लोकसभा से अनुमोदन मिलना आवश्यक है।

ज़ैल सिंह के कार्यकाल में उनके आचरण से जुड़े मुद्दों को लोकसभा में उठाने की कोशिश की गई थी। ये वही वक्त था जब पंजाब में अलगाववाद को हवा दी जा रही थी। यद्यपि स्पीकर ने राष्ट्रपति को लेकर किसी मुद्दे को सदन में उठाने की इजाज़त नहीं दी। ज़ैल सिंह ने अपने कार्यकाल में पोस्टल बिल को मंज़ूरी न देकर इतिहास भी रचा। दोनों सदनों के पारित किए जाने के बावजूद पोस्टल बिल क़ानून नहीं बन सका। 1986-87 आते-आते ज़ैल सिंह और राजीव गांधी के बीच रिश्ते इतने तल्ख हो गए थे कि यहां तक कहा जाने लगा, ज़ैल सिंह राजीव गांधी सरकार को बर्खास्त करने के बाद देश में राष्ट्रीय सरकार बनवा सकते हैं।



1987 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ऐसी भी रिपोर्ट आई थीं कि तीसरे उम्मीदवार के ज़रिए पूरे राष्ट्रपति चुनाव को अवैध ठहराने की कोशिश की जा सकती है। जिससे ज़ैल सिंह ही राष्ट्रपति बने रह सकें और राजीव सरकार को बर्खास्त कर दें। राष्ट्रपति पद के तीसरे उम्मीदवार के नामांकन को रद्द करने की काफी कोशिश भी हुईं, लेकिन सब नाकाम रहीं। चुनाव बिना किसी रुकावट हुए।

क्रमश:

रविवार, 23 जनवरी 2011

26 जनवरी विशेष...राधाकृष्णन से लेकर इमरजेंसी तक...खुशदीप


दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन नेहरू की तरह राजनेता नहीं थे। नेहरू से उलट राधाकृष्णन धार्मिक प्रवृत्ति के थे। नेहरू राधाकृष्णन की काबलियत का सम्मान करते थे, लेकिन कई मौकों पर दोनों के बीच अलग राय भी दिखी। नेहरू ने 1963 में राधाकृष्णन के पटना जाकर पहले राष्ट्रपति डॉ प्रसाद के अंतिम संस्कार में हिस्सा लेने का विरोध किया था। नेहरू का कहना था कि राधाकृष्णन को अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक राजस्थान जाकर नेशनल रिलीफ फंड के लिए चंदा एकत्र करने को प्राथमिकता देनी चाहिए। इस पर राधाकृष्णन ने जवाब दिया था कि नेहरू को अपने निर्धारित कार्यक्रम को छोड़कर उनके साथ पटना में प्रसाद के अंतिम संस्कार के लिए चलना चाहिए।

राष्ट्रपति भवन के पूर्व सिक्योरिटी ऑफिसर मेजर सी एल दत्ता के मुताबिक नेहरू और राधाकृष्णन के रिश्तों में खटास आने की वजह नेहरू की चीन नीति थी। चीन के आक्रमण के बाद राधाकृष्णन और कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के कामराज ने नेहरू के रिटायरमेंट के लिए एक फॉर्मूला भी तैयार कर लिया था। दत्ता के अनुसार पीएम आवास पर कांग्रेस वर्किंग कमेटी कामराज प्लान पर विचार करने के लिए रात भर बैठी। उधर राष्ट्रपति भवन में राधाकृष्णन बेसब्री से कमेटी में लिए जाने वाले नतीजे का इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन नेहरू पहले ही सब भांप गए थे। बैठक में कामराज प्लान औंधे मुंह गिरा। ये राधाकृष्णन के लिए भी झटका था। 27 मई 1964 को नेहरू का निधन हुआ।




राधाकृष्णन के बाद अगले राष्ट्रपति गांधीवादी और स्कॉलर डॉ ज़ाकिर हुसैन बने। उपराष्ट्रपति के रूप में डॉ ज़ाकिर हुसैन पहले ही गरिमामयी छाप छोड़ चुके थे। लेकिन डॉ ज़ाकिर हुसैन का अपने कार्यकाल के बीच ही 3 मई 1969 को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।





1969 में राष्ट्रपति का चुनाव कांग्रेस की आपसी खींचतान के बीच हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार नीलम संजीवा रेड्डी थे। लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने निर्दलीय उम्मीदवार वी वी गिरी का समर्थन किया। गिरी ही राष्ट्रपति चुनाव जीते।


गिरी के कार्यकाल में ही इंदिरा गांधी ने 1971 में लोकसभा को भंग करने की सिफारिश की। इस पर गिरी ने इंदिरा गांधी से पूछा था कि क्या मंत्रिपरिषद ने इस मुद्दे पर विचार किया है। संविधान में साफ़ है कि मंत्रिपरिषद की सलाह को ही राष्ट्रपति को मान देना होता है। इस पर इंदिरा गांधी ने कैबिनेट की बैठक बुलाई और उसकी सिफारिश राष्ट्रपति गिरी के पास भेजी।

जब गजटीय अधिसूचना जारी हुई तो उसमें साफ तौर पर उल्लेखित था कि सिफारिश मंत्रिपरिषद की तरफ से की गई और उस पर सावधानी से विचार किया गया। ये राष्ट्रपति की ओर से अपनी शक्ति दिखाने का स्पष्ट संकेत था।

17 अगस्त 1974 को फखरूद्दीन अली अहमद देश के अगले राष्ट्रपति बने। अहमद पहले कैबिनेट में सिंचाई, ऊर्जा, कृषि जैसे कई मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी संभाल चुके थे। 26 जून 1975 को राष्ट्रपति अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत इमरजेंसी लगाने की अधिघोषणा जारी की। राष्ट्रपति अहमद की इस बात के लिए आलोचना की जाती रही कि उन्होंने आपातकाल लगाने की इंदिरा गांधी की सिफारिश को सीधे ही मान लिया और पहले कैबिनेट की सिफारिश लेने की बाध्यता पर ज़ोर नहीं दिया।

क्रमश:

शनिवार, 22 जनवरी 2011

26 जनवरी विशेष...डॉ राजेंद्र प्रसाद-नेहरू की खींचतान...खुशदीप

कल की कड़ी में आपने पढ़ा था कि किस तरह गणतंत्र के तौर पर भारत में सरकार चलाने की व्यवस्था का चुनाव किया गया था...आज की किस्त में पढ़िए पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद और पहले प्रधानमंत्री नेहरू के बीच कैसे रिश्ते थे...




संविधान में राष्ट्र प्रमुख के तौर पर राष्ट्रपति और शासन प्रमुख के तौर पर प्रधानमंत्री के अधिकार और दायित्व स्पष्ट होने के बावजूद पिछले छह दशक में ऐसे कई मौके आए जब राष्ट्रपति और सरकार के बीच मतभेद उभरे। कभी इन मतभेदों ने तल्खी का भी रुख अख्तियार किया। पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद से लेकर मौजूदा राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल तक कुल बारह हस्तियों ने राष्ट्रपति के पद को सुशोभित किया। डॉ प्रसाद अकेले शख्स हैं जिन्हें दो कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति चुना गया। लेकिन इतिहास गवाह है कि दोनों बार ही देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू डॉ प्रसाद को राष्ट्रपति बनाए जाने के हक में नहीं थे। ये माना जाता है कि नेहरू सी राजगोपालाचारी को देश का पहला राष्ट्रपति बनाना चाहते थे। लेकिन सरदार पटेल और कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं की राय डॉ राजेंद्र प्रसाद के हक में थी। आखिर नेहरू को कांग्रेस की बात माननी पड़ी और राष्ट्रपति के तौर पर प्रसाद को ही अपना समर्थन देना पड़ा।

नेहरू और प्रसाद में वैचारिक और व्यावहारिक मतभेद थे। ये मतभेद 1950 से 1962 तक प्रसाद के राष्ट्रपति रहने के दौरान लगातार बने रहे। हिंदू परंपरावादी प्रसाद के राष्ट्रपति बनने से पहले भी आधुनिक और पश्चिमी सोच वाले नेहरू से उनकी पटरी नहीं बैठती थी। अगस्त 1947 में गायों के वध पर रोक लगाने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन को प्रसाद के समर्थन से नेहरू नाखुश थे। 7 अगस्त 1947 को नेहरू ने प्रसाद को चिट्ठी में लिखा..."जहां तक मैं समझता हूं कि बापू भी गायों की हिफ़ाज़त के प्रबल समर्थक हैं लेकिन गायों के वध पर ज़बरदस्ती रोक लगाए जाने के वो भी खिलाफ हैं। मेरी राय के मुताबिक इसकी वजह ये है कि बापू चाहते हैं कि हमें हिंदू राज्य की तरह नहीं बल्कि ऐसे समग्र राज्य की तरह काम करना चाहिए जिसमें हिंदू अगुवाई करें।"

संविधान सभा में भी प्रसाद चाहते थे कि इंडिया का नाम बदल कर भारत कर दिया जाए। लेकिन नेहरू इंडिया के ही हक में थे। बाद में बीच का रास्ता निकाला गया और संविधान में लिखा गया- "इंडिया, दैट इज़ भारत।" प्रसाद देश के संविधान को लागू करने के लिए 26 जनवरी 1950 की तारीख चुने जाने के खिलाफ थे। प्रसाद को उनके ज्योतिषियों ने राय दी थी कि 26 जनवरी 1950 का दिन गणतंत्र दिवस के लिए शुभ नहीं है। लेकिन नेहरू इसी तारीख पर अड़ गए। नेहरू ने 22 सितंबर 1951 को एन जी आयंगर को लिखे पत्र में कहा भी था-"मुझे खेद है, राष्ट्रपति कुछ मुद्दों पर कैबिनेट की सिफारिश की जगह ज्योतिषियों की राय को अहमियत दे रहे हैं। लेकिन मेरा ज्योतिष जैसी बातों पर कोई विश्वास नहीं है।" नेहरू ने प्रसाद की बनारस यात्रा में ब्राह्मणों के पैर छूने का भी विरोध किया था।

प्रसाद हिंदू कोड बिल में महिलाओं को ज़्यादा अधिकार दिए जाने के हक में नहीं थे। उन्होंने नेहरू से कहा कि जब हिंदू कोड बिल पर संसद में बहस होगी तो वो प्रेसीडेंट बॉक्स में मौजूद रहेंगे। जिससे सांसदों पर प्रभाव पड़ेगा। लेकिन नेहरू का कहना था कि प्रेसीडेंट बॉक्स का इस्तेमाल राष्ट्रपति संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करने के लिए ही कर सकते हैं। अन्यथा इसका इस्तेमाल विदेश से आने वाले सम्मानित मेहमानों के लिए ही किया जाना चाहिए। उस वक्त ऐसी भी अफवाहें थीं कि प्रसाद आरएसएस, जनसंघ और बिल के विरोधी कुछ कांग्रेस सांसदों के साथ मिलकर तख्तापलट कर सकते हैं। नेहरू ने ये धमकी तक दे दी थी कि अगर प्रसाद ने अपना रुख नहीं छोड़ा तो वो इस्तीफ़ा दे देंगे। प्रसाद ने संयम दिखाया और अपनी बात पर ज़ोर नहीं दिया।

ये सच है कि नेहरू की मौजूदगी में प्रसाद खुल कर अपनी बात नहीं कह पाते थे। लेकिन नेहरू से लिखित संवाद में साफ तौर पर अपनी राय जताते थे। प्रसाद ने नेहरू को चेतावनी दी थी कि भ्रष्टाचार कांग्रेस के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा। प्रसाद ने सीधे राष्ट्रपति के तहत लोकायुक्त बनाए जाने की सिफारिश का समर्थन किया था जिससे कि मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के सभी आरोपों की स्वतंत्र रूप से जांच की जा सके। नेहरू ने इस सिफ़ारिश को प्रसाद की किसी रणनीति के तहत देखते हुए नहीं माना। प्रसाद नेहरू की चीन-तिब्बत नीति को लेकर भी नाखुश थे। 1962 में प्रसाद की जगह राधाकृष्णन राष्ट्रपति बने तो नेहरू ने राहत की सांस ली।

क्रमश:

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

इस साल 26 जनवरी कौन सी तारीख को पड़ेगी...खुशदीप


ये सवाल वाकई मुझसे किसी ने पूछा था...उस सज्जन के लिए 26 जनवरी का महत्व शायद एक छुट्टी तक ही सीमित था...और त्योहारों की छुट्टी की तरह वो 26 जनवरी, 15 अगस्त और 2 अक्टूबर को भी मान बैठे थे...तभी ऐसा सवाल पूछने की गलती कर बैठे..इस साल 26 जनवरी को हमारा गणतंत्र 61 साल का होने जा रहा है...26 जनवरी का हमारे गणतंत्र के लिए क्या महत्व है...राष्ट्रपति का पद देश के लिए क्यों ज़रूरी है...लोकतांत्रिक गणतंत्र के तौर पर भारत के लिए सरकार की व्यवस्था चुनने के लिए हमारे संविधान निर्माताओं के पास क्या-क्या विकल्प थे...क्या राष्ट्रपति की अहमियत हमारे देश में वाकई महज रबड़ स्टांप सरीखी है...कब-कब आज़ाद भारत में ऐसे मौके आए जब राष्ट्रपति ने अपनी ताकत दिखाई...कब किस राष्ट्रपति का किस प्रधानमंत्री के साथ टकराव हुआ..इन सब सवालों का जवाब ढूंढती एक लंबी पड़ताल आपको किस्तों में पहुंचाउंगा...ये पड़ताल शुक्रवार पत्रिका में पत्नीश्री विम्मी सहगल के नाम से पिछले साल स्वतंत्रता दिवस विशेषांक में छप चुकी है...उम्मीद करता हूं, इस विमर्श में आपके पास भी जो जानकारी हैं, उसे बांटने की कृपया करें...इस प्रयास से ये सीरीज महत्वपूर्ण दस्तावेज़ की शक्ल ले सकती है...पेश है पहली किस्त...

राष्ट्रपति रबड़ स्टांप नहीं...


डॉ अंबेडकर ने कहा था- "राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रतीक है।" लेकिन देश की राजनीति में जिस तरह मूल्यों का पतन हुआ है उसमें राजभवन तो राजनीति के अखाड़े बनते ही जा रहे हैं, स्वार्थ की पट्टी आंखों पर बांध कर चलने वाली पार्टियों की नज़र से राष्ट्रपति भवन भी अछूता नहीं रहा है। जिस देश में सर्वपल्ली राधाकृष्णन और डॉ ज़ाकिर हुसैन जैसी विभूतियों ने राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया, उसी पद पर शिवराज पाटिल जैसे नेता को लाने की भी कोशिश की गई थी। वो शिवराज पाटिल जिन्हें गृहमंत्री पद पर नाकामी की वजह से इस्तीफा देना पड़ा था। अगर शिवराज पाटिल के नाम को लेफ्ट ने मंजूरी दे दी होती तो शायद प्रतिभा पाटिल की जगह वो ही देश के राष्ट्रपति होते। दुर्भाग्य से यूपीए और लेफ्ट ने तब ये भी तय किया कि देश में राष्ट्रपति पद के लिए उसी शख्स को उम्मीदवार बनाया जाना चाहिए जिसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि रही हो। यानि भविष्य में डॉ एपीजे अब्दुल कलाम जैसे राजनीति से इतर कोई व्यक्ति राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनना चाहता है तो उसकी राह नामुमकिन नहीं तो मुश्किल बहुत होगी।

आखिर राष्ट्रपति पद के देश के लिए मायने क्या है ? संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रपति में आखिर क्या शक्तियां निहित की थीं। संविधान सभा के पास लोकतांत्रिक गणतंत्र के तौर पर भारत के लिए सरकार की व्यवस्था चुनने के लिए तीन विकल्प थे। पहला- अमेरिकी राष्ट्रपतीय व्यवस्था, दूसरा-ब्रिटिश संसदीय लोकतंत्र का वेस्टमिंस्टर मॉडल, तीसरा- निर्वाचित कार्यपालिका का स्विस मॉडल।

काफी विचार विमर्श के बाद संविधान सभा ने भारतीय हालात के लिए ब्रिटिश वेस्टमिंस्टर मॉडल को सबसे उपयुक्त माना। 4 नवंबर 1948 को डॉ अंबेडकर ने विस्तृत बयान में साफ़ किया-"अमेरिकी और स्विस सिस्टम स्थिरता ज़्यादा देते हैं लेकिन जवाबदेही कम सुनिश्चित करते हैं। जबकि ब्रिटिश मॉडल जवाबदेही ज़्यादा देता है लेकिन स्थिरता कम देता है।"

सरकार का ब्रिटिश मॉडल तो चुना गया लेकिन साथ ही लोकतांत्रिक गणतंत्र के लिए राष्ट्रपति की भी व्यवस्था की गई जिसकी भूमिका कमोवेश इंग्लैंड के नरेश जैसी रखी गई। इस पर जस्टिस कृष्णा अय्यर ने अपने खास चुटीले अंदाज में सवाल भी किया था- "क्या राष्ट्रपति भवन भारतीय बकिंघम पैलेस है या ये इसके (बकिंघम पैलेस) और अमेरिका के व्हाइट हाउस के बीच रास्ते में बना कोई हाउस है?"

इस सवाल का जवाब डॉ अंबेडकर के भाषण से मिलता है जिसमें उन्होंने कहा था कि राष्ट्रपति की पदवी का ये अर्थ नहीं है कि उसे अमेरिका के राष्ट्रपति जैसी कोई शक्ति मिली हुई है। सिर्फ नाम के सिवा अमेरिकी और भारतीय राष्ट्रपति के बीच और कुछ भी नहीं मिलता। भारत के राष्ट्रपति की स्थिति अंग्रेजी संविधान के मुताबिक इंग्लैंड के नरेश जैसी है। वो राष्ट्र का प्रमुख है लेकिन देश को शासित नहीं करता। साथ ही राष्ट्रपति सिर्फ दिखावे का ही प्रमुख नहीं है। राष्ट्रपति के लिए कई अहम सांविधानिक दायित्व निर्धारित हैं। सामान्यतया राष्ट्रपति स्वतंत्र रूप से कदम नहीं उठाता। उसे कैबिनेट की सलाह और मदद से ही अपने दायित्वों को निभाना होता है। संसद के दोनों सदनों से कोई बिल पारित होकर आता है तो राष्ट्रपति को उसे मंज़ूरी देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता। हां, राष्ट्रपति चाहे तो उस बिल को पुनर्विचार के लिए ज़रूर लौटा सकता है। लेकिन दोबारा बिल उसी स्वरूप में राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है तो राष्ट्रपति को उस पर दस्तखत करने ही होंगे।

गठबंधन राजनीति के इस दौर में राष्ट्रपति से बहुत सतर्क भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है। नेताओं के स्वार्थी अवसरवाद और सिद्धांतहीन तौर-तरीकों ने राष्ट्रपति भवन को और अहम बना दिया है। जस्टिस कृष्णा अय्यर के मुताबिक राष्ट्रपति तीन अहम मौकों पर अपनी स्वतंत्र ताकत का इस्तेमाल कर सकता है-

1. प्रधानमंत्री की नियुक्ति- लेकिन राष्ट्रपति का ये अधिकार इससे बंधा है कि प्रधानमंत्री बनने वाला व्यक्ति लोकसभा में बहुमत रखता हो।


2. सदन में अल्पमत में आने के बावजूद कोई सरकार इस्तीफ़ा देने से इनकार करे तो राष्ट्रपति के पास उसे तत्काल बर्खास्त करने का अधिकार है।


3. सदन को भंग करना। लेकिन ये प्रधानमंत्री की सिफारिश से ही किया जा सकता है।

राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 217 (3) के तहत सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की आयुसीमा तय करने का भी विशेषाधिकार है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को नियुक्त किए जाने में भी राष्ट्रपति की भूमिका अहम होती है। संघ लोक सेवा आयोग के कामकाज में भी राष्ट्रपति का निश्चित रोल है।

क्रमश:


(कल की कड़ी में पढ़िएगा कि किस तरह पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद 26 जनवरी 1950 को शुभ न मानते हुए गणतंत्र लागू करने के हक़ में नहीं थे...लेकिन नेहरू इसी तारीख पर अड़ गए थे...आखिर चली नेहरू की ही)





गुरुवार, 20 जनवरी 2011

कलाम, सचिन, रहमान में क्या कॉमन...खुशदीप

एपीजे अब्दुल कलाम, सचिन तेंदुलकर, ए आर रहमान...इन तीनों में क्या समानता है...तीनों अपने-अपने फील्ड में बेजोड़...फिर भी तीनों डाउन टू अर्थ...हमेशा अच्छा परफॉर्म करने की ललक...विवादों से कोसों दूर...

डॉ कलाम का हमेशा युवा पीढ़ी से कहना रहा है, कुछ बनना है तो बड़े सपने देखो...और फिर दिन-रात उन्हें पूरा करने में जुट जाओ...सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के हिमालय हैं...अपने रिकार्ड खुद ही तोड़ने में लगे हैं...उन्हें पकड़ने वाला कोई दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता...क्रिकेट के भगवान का दर्ज़ा किसी को भी आसमान में उड़ने का दंभ दे सकता है...लेकिन सचिन ने पैर हमेशा ज़मीन पर रखना सीखा है...यूथ आइकन के नाते सचिन अपनी ज़िम्मेदारियों को अच्छी तरह समझते हैं...इसलिए शराब का एड ठुकराने में उन्होंने एक सेंकंड की भी देर नहीं लगाई...भले ही इसके एंडोर्समेंट के लिए बहुत मोटी रकम ऑफर की जा रही थी...लेकिन सचिन के लिए युवाओं पर पड़ने वाला नेगेटिव इफेक्ट ज़्यादा अहम था...मुझे लगता है, इस तरह की हस्तियां किसी भी काम से पहले अपने से ही सवाल करती हैं...उनके अपने नैतिकता के मानदंडों के हिसाब से वो काम करना सही है या नहीं...फिर दिल से उन्हें जो आवाज़ मिलती है, उसी को अमल में लाते हैं...सचिन के बारे में ऐसा कुछ ही बचा हो जिसके बारे में आप नहीं जानते हों...

वैसे मैंने आज ये पोस्ट ए आर रहमान पर केंद्रित रखनी थी...लेकिन मैंने डॉ कलाम और सचिन के साथ ए आर रहमान को जोड़कर देखा तो तीनों की महानता में विनम्रता और सादगी सबसे बड़ा कॉमन फैक्टर नज़र आया...

हां, मैं रहमान के बारे में जो आपको बताना चाह रहा था, उसमें पहली बात तो ये कि मैं उनके फ़न का बहुत बड़ा मुरीद हूं...स्लमडॉग मिलियनेयर्स के लिए दो-दो ऑस्कर जीतने के बाद ऐसा कोई बड़ा इंटरनेशनल अवार्ड समारोह नहीं बच रहा जहां रहमान या तो अवार्ड विजेता या फिर खास मेहमान की हैसियत से हिस्सा न ले रहे हों...15 जनवरी को लास एंजिल्स में रहमान को 16वें क्रिटिक्स च्वायस मूवी अवार्ड में बेस्ट ओरिजनल सॉन्ग के लिए ट्राफी से सम्मानित किया गया...रहमान को फिल्म 127 Hours के  IF I RISE गीत के लिए ये सम्मान मिला... 127 Hours  का निर्देशन भी स्लमडॉग फेम डेनी बॉयल ने किया है...

लेकिन इस अवार्ड समारोह से पहले रहमान के साथ लास एंजिल्स में जो हुआ उसे वो ताउम्र नहीं भूलेंगे...रहमान ने अवार्ड समारोह में सूट के साथ जो कमीज़ पहननी थी, वो उनके होटल से गायब हो गई...अब रहमान को कोट के नीचे टी-शर्ट पहनकर ही जाना पड़ा...रेड कारपेट पर चलते या ट्राफी लेते रहमान को जिसने भी कोर्ट के साथ टी-शर्ट में देखा, ताज्जुब ज़रूर किया...रहमान चाहते तो होटल वालों को जमकर हड़का सकते थे...लेकिन रहमान ने ऐसा कुछ नहीं किया...बस किसी तरह अपना काम निकाला...बताता चलूं कि दुनिया के कई नामी-गिरामी फैशन डिज़ाइनर रहमान के इंटरनेशनल सेलेब्रिटी स्टेटस को देखते हुए फ्री में ही ड़्रेसेज़ और दूसरी एसेसरीज़ देने के लिए तैयार रहते हैं...लेकिन आज तक रहमान ने किसी फैशन हाउस या डिज़ाइनर से मुफ्त में कुछ भी लेना कबूल नहीं किया है...वो जो ड्रेस भी अपने लिए चुनते हैं, उसकी पाई-पाई चुकाना पसंद करते हैं...रहमान ने लास एंजिल्स मे भी शालीनता से काम लेकर अमेरिका को आईना दिखाया...अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश भारत की हर बात पर महंगाई, भ्रष्टाचार, बेइमानी, गंदगी का ढोल पीटते हुए निशाना साधते रहते हैं...लेकिन रहमान के साथ जो हुआ, उस पर हायतौबा क्यों नहीं मची...अब यही कांड हॉलीवुड के किसी स्टार के साथ भारत के किसी होटल में हुआ होता तो क्या वो भी वैसा ही करता जैसा रहमान ने किया...वो चोरी की घटना पर पूरे भारत को गलत बताते हुए आसमान सिर पर नहीं उठा लेते...यही तो फर्क है हमारा और उनका...इसी वजह से हम हम हैं, और वो वो...

सुनिए रहमान का कम्पोज़ किया मेरी पसंद का एक गीत...

बुधवार, 19 जनवरी 2011

बुढ़ापे की रईसी...खुशदीप

सिर्फ पैसा ही आपको अमीर नहीं बनाता...




उम्र का बढ़ना भी आपको अमीर बनाता रहता है...















अब आप कहेंगे, वो कैसे भला...उम्र के साथ तो डॉक्टर का खर्च बढ़ता जाता है...ये तो ज़ेब हल्की करता है, फिर अमीर कैसे हो सकते हैं...

अब देखिए मैं आपको बताता हूं ये कैसे होता है...

उम्र बढ़ती है तो सिर के बालों पर चांदी छाने लगती है...
दांतों में भी चांदी-सोना लग जाता है...
ख़ून में शुगर का लेवल बढ़ जाता है...
किडनी में कीमती स्टोन इकट्ठे होने लगते है...
साथ ही आपको मिलने लगती है कभी न खत्म होने वाली गैस की सप्लाई...



स्लॉग चिंतन

बिना लिबास आए थे हम सब इस जहां में,
बस इक कफ़न की ख़ातिर इतना सफ़र करना पड़ा...

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

जीने के फंडे विजय माल्या स्टाइल...खुशदीप


पोस्ट पढ़ने से पहले दो बातें...

पहली वैधानिक चेतावनी...अल्कोहल का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है...


दूसरा मेडिकली टेस्टेड फॉर्मूला...हंसना स्वास्थ्य के लिए अति लाभदायक है...

अब इन दोनों बातों को ध्यान में रखते हुए आगे जो लिखा है, उसे पढ़ें...



गिलास में आधा पानी डला हो तो...


नकारात्मक सोच वाला कहता है-गिलास आधा खाली है...


सकारात्मक सोच वाला कहता है-गिलास आधा भरा है...


लेकिन विजय माल्या जैसी प्रैक्टीकल सोच वाला आदमी कहता है...


...

...

...


इस गिलास में 60 एमएल व्हिस्की मिलाओ और बोलो...चीयर्स...

---------

रम + पानी....लिवर प्रॉब्लम


व्हिस्की + पानी...किडनी प्रॉब्लम


वाइन + पानी...हॉर्ट प्रॉब्लम


देसी +पानी...कैंसर प्रॉब्लम


मक्खन ढक्कन से...


ये साला पानी ही ख़राब है....

--------------

स्लॉग ओवर


ढक्कन ने मक्खन से पूछा...तेरी पत्नी का नाम क्या है...

मक्खन...गूगल कौर

ढक्कन...ये भला कैसा नाम हुआ...

मक्खन...मैं दोस्त के ठिकाने पर हूं या किसी ठेके पर या कहीं ओर, ये मुझे हमेशा ढूंढ ही लेती है...

सोमवार, 17 जनवरी 2011

क्या-क्या हो सकता है काले-धन से...खुशदीप

कल की पोस्ट में जो ज़िक्र किया था, उस पर आने से पहले छोटा सा एक किस्सा....

एक अखबार ने जाने-माने नेता को चोर बता दिया...
अखबार पर मानहानि का मुकदमा हो गया...
अखबार के संपादक को नोटिस मिला, उसे पढ़कर वो कुर्सी से गिर गया...
मानहानि का नोटिस चोर के वकील ने भेजा था...



विदेशी बैंकों में भारत का कितना काला धन है, इस पर सटीक तौर पर कुछ कहना मुश्किल है...लेकिन अकेले स्विस बैंकों में ही भारत से 1500 अरब डॉलर यानि करीब 70 लाख करोड़ रुपये का काला धन जमा है...ये धन आज़ादी के बाद 63 साल में भारत से बाहर ले जाकर जमा कराया गया...
इस लिस्ट में दूसरा नंबर रूस का है जिसका काला धन भारत की तुलना में एक चौथाई ही बैठता है...यानि 470 अरब डॉलर...

घपलेबाज़ नेता, भ्रष्ट नौकरशाह, बेइमान उद्योगपति यानि सभी रसूखदारों ने कोई कसर नहीं छोड़ी विदेश में अपनी तिजोरियां भरने में...ये काला धन देश पर कुल कर्ज़ का 13 गुना बैठता है और देश के जीडीपी का 40 फीसदी है...

औसतन हर साल सवा लाख करोड़ रुपया बाहर भेजा जा रहा है...इस काले धन में 11.5 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हो रही है...

अब देखिए इस काले धन को वापस लाया जाए तो देश में क्या क्या हो सकता है...

24 घंटे में देश का सारा कर्ज़ चुकता हो जाएगा...और जो पैसा बचेगा, उस पर मिलने वाले ब्याज का पैसा ही देश के कुल बजट से ज़्यादा होगा...ऐसी स्थिति में देश में सारे टैक्स हटा भी लिए जाएं तो भी सरकार मज़े में बिना किसी आर्थिक दिक्कत के चलाई जा सकती है...


देश के 45 करोड़ गरीबों (बीपीएल) में से हर एक को एक-एक लाख रुपया मिल सकता है...


ग्रामीण रोज़गार के कार्यक्रम मनरेगा पर 40,100 करोड़ रुपया खर्चती है...काला धन देश में लाने से 50 साल के लिए मनरेगा का खर्च निकल आएगा...


सरकार ने किसानों का कर्ज़ माफ़ करने पर 72,000 करोड़ रुपये खर्च किए...काले धन को देश में लाने से 28 बार किसानों का इतना ही कर्ज माफ किया जा सकता है...


किसी देश के विकास के लिए बहुत ज़रूरी होता है, उसके संपर्क मार्ग कैसे हैं...काले धन की वापसी से देश में 2,80,000 किलोमीटर हाईवे बनाया जा सकता है...एक किलोमीटर हाईवे बनाने में करीब 7 करोड़ का खर्च आता है...


बिजली के संकट से देश के सभी बड़े राज्यों को झूझना पड़ता है...काले धन को देश में लाने से 1500 मेगावॉट के 280 पावर प्लांट लगाए जा सकते हैं...


इस पैसे को सेना पर खर्च किया जाए तो डिफेंस बजट 14 गुना हो सकता है...

चलिए सुन लिया न सब, खुश हो गए ना, अब ये हसीन ख्वाब यही छोड़िए, काला धन न देश में कभी वापस आया है और न ही आगे कभी आएगा...


आप और हम बस ये गाना गाकर दिल बहलाएं...


कोई लौटा दे हमारा लूटा हुआ धन...

रविवार, 16 जनवरी 2011

आपकी-हमारी गाढ़ी कमाई पर डाका (किस्त-1)...खुशदीप


पहले इन दो सुर्खियों पर नज़र डाल लीजिए...
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सीधा सवाल किया है कि उसे विदेशी बैंकों में खाता रखने वाले भारतीयों के बारे में जानकारी देने में दिक्कत क्या है...
(ज़ाहिर है विदेशी टैक्स हैवन्स में अमूमन काले धन को रखने के लिए ही खाते खोले जाते हैं...)


चुनाव आयोग का कहना है कि देश में 1200 राजनीतिक पार्टियां पंजीकृत हैं...इनमें से सिर्फ 16 फ़ीसदी ही यानि 200 पार्टियां ही राजनीतिक गतिविधियों में लगी हैं...बाकी ज्यादातर पार्टियां राजनीतिक चंदे के नाम पर काली कमाई को धो कर व्हाईट करने में लगी हैं...


ये दोनों ही ख़बरें 14 जनवरी को निकल कर आईं...दोनों में सीधा कनेक्शन कोई नहीं...लेकिन गौर से देखें तो इन दो ख़बरों में ऐसा कनेक्शन जुड़ा है जिसने हमारे देश के पैरों में बेड़ियां डाल रखी हैं...

चलिए पहले सुप्रीम कोर्ट वाली ख़बर की बात करें...दरअसल सरकार को जर्मनी सरकार से एक फेहरिस्त मिली है...इस फेहरिस्त में जर्मनी के लिचटेनस्टिन बैंक में खाता रखने वाले भारतीयों के बारे में जानकारी है...प्रसिद्ध अधिवक्ता राम जेठमलानी, के पी एस गिल, जूलियस रिबेरो जैसी कुछ हस्तियों ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दे रखी है कि विदेशी बैंकों में जमा भारतीय नागरिकों के काले धन को देश में वापस लाने के लिए प्रयास तेज़ करने को सरकार को निर्देश दिए जाएं...

इसी याचिका के तहत सुनवाई के दौरान जर्मनी सरकार से जानकारी मिलने का मुद्दा उठा...सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम ने अदालत को बताया कि सरकार के पास जानकारी है लेकिन उसका खुलासा नहीं किया जा सकता...इस पर कोर्ट ने कहा कि सरकार किस विशेषाधिकार के तहत जानकारी का खुलासा नहीं करना चाहती...सालिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि वो सरकार से राय लेने के बाद ही स्थिति साफ करेंगे...कोर्ट ने इसे गंभीर मामला बताते हुए सरकार से लिखित में जवाब मांगा है...सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही अगली सुनवाई 19 जनवरी को तय की...

लेकिन सवाल सिर्फ जर्मनी पर ही खत्म नहीं हो जाता...दुनिया के तमाम टैक्स हैवन्स में भारतीयों का जितना काला धन जमा है, उसका महज़ 13 फीसदी ही देश में वापस ले आया जाए तो देश का तमाम कर्ज़ चुकता हो जाएगा...आपको कल की पोस्ट में बताऊंगा कि आपकी और हमारी गाढ़ी कमाई पर डाका डालकर कितना काला धन विदेशी बैंकों में जमा है और अगर उसे वापस ले आया जाए तो देश में क्या-क्या किया जा सकता है...कैसे देश की तस्वीर बदली जा सकती है...


ये तो थी विदेशों में जमा भारतीयों के काले धन की बात...लेकिन देश में भी काला धन  सफेद कैसे होता है इसकी एक बानगी चुनाव आयोग ने दिखाई है...

चुनाव आयोग का कहना है कि देश में 16 फीसदी पार्टियों को छोड़ दिया जाए तो बाकी तथाकथित राजनीतिक पार्टियों का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं हैं...इन्होंने राजनीतिक चोला सिर्फ इसलिए ओढ़ा हुआ है कि राजनीतिक चंदे के नाम अकूत काली कमाई को सफेद धंधों में लगाया जा सके...इस तरह के पैसे से जेवरात तक खरीदे जाते हैं...स्टॉक बाज़ार में भी ये पैसा लगाया जाता है...यानि राजनीति के नाम पर धंधा किया जा रहा है...

लेकिन जो पार्टियां वाकई राजनीतिक गतिविधियों में लगी हैं, उनके नेताओं से कौन सवाल करने वाला है कि उनकी संपत्ति में दिन दूना, रात चौगुना इज़ाफ़ा कैसे हो रहा है...कैसे जन्मदिन के तमाशे के नाम पर एक दिन में ही 100 करोड़ खर्च दिया जाता है...सवाल पूछा जाए तो जवाब मिलता है कि हमारे कार्यकर्ता ही हमें दस-दस रुपये जो़ड़कर चंदा देते हैं...वाकई ये जवाब आयकर अधिकारियों को भी निरूत्तर करने वाला है...

धंधे के नाम पर राजनीति...या राजनीति के नाम पर धंधा...


गंदा है पर धंधा है ये...

शनिवार, 15 जनवरी 2011

लो, पप्पू सीख गया राजनीति...खुशदीप

पप्पू का अगले दिन राजनीति शास्त्र का पेपर था...अपने पापा से बोला, मुझे राजनीति सिखाओ...

अब पूरे साल पप्पू पढ़ा नहीं...पापा परेशान...ऐन टाइम पर इसे कैसे सिखाऊं...तब भी पापा ने कोशिश की...सोचा घर के सदस्यों के ज़रिए ही इसे राजनीति समझाई जाए...

बताना शुरू किया...

पप्पू, किसी देश की पहचान उसकी अर्थव्यवस्था से होती है...ये समझ लो मैं कमा कर लाता हूं तो मैं इस घर की अर्थव्यवस्था हूं...अब किसी देश को चलाने के लिए अर्थव्यवस्था से मिला पैसा सरकार संभालती है...ठीक वैसे ही जैसे मैं जो पैसा लाता हूं वो मम्मी संभालती है...तो मम्मी कौन हुई...

पप्पू झट से बोला...सरकार....

पापा...शाबाश...अब घर की जो मेड (नौकरानी) है उसे हम मम्मी के हाथों तनख्वाह देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे सरकार अपने किसी कर्मचारी को देती है...इसलिए मेड कर्मचारी हुई...

पप्पू को इस तरह राजनीति सीखते मज़ा आने लगा...सवाल पूछा...फिर मेरा छोटा भाई क्या हुआ...

पापा बोले....हूं...समझ लो, वो देश का भविष्य है...

अब तक घर में रहने वाले सभी सदस्यों के बारे में पापा बता चुके थे, सिवाय पप्पू के...

पप्पू ने फिर पूछा...पापा, मैं रह गया, मैं कौन हुआ...

पापा ने जवाब दिया...तुम सब कुछ देख रहे हो इसलिए तुम जनता हुए...

पापा से ये पाठ पढ़कर पप्पू बड़ा खुश हुआ...सोचने लगा चलो अब सो जाता हूं...पप्पू का छोटा भाई भी उसके साथ ही कमरे में सो रहा था...कुछ घंटे बाद पप्पू की अचानक नींद खुली तो उसने देखा लाइट नहीं आ रही थी...अंधेरे में छोटा भाई साथ ही सोते दिखा...पप्पू टार्च लेने के लिए पापा-मम्मी के कमरे में गया...वहां, मम्मी तो गहरी नींद सो रही थी लेकिन पापा का कहीं अता-पता नहीं था...पप्पू टार्च लेकर अपने कमरे की ओर लौटने लगा तो उसे किचन के साथ मेड के रूम से खुसर-पुसर की आवाज़ सुनाई दी...पप्पू ने ध्यान लगाकर सुना तो अंदर से मेड के साथ पापा की भी आवाज़ आ रही थी...थोड़ी देर पप्पू वहीं खड़ा रहा और फिर अपने कमरे में आकर सो गया...

पप्पू सुबह उठा तो देखा पापा-मम्मी डाइनिंग टेबल पर बैठे चाय पी रहे थे...पप्पू पापा को देखकर बोला...पापा, अब मैं राजनीति अच्छी तरह सीख गया हूं...

पापा हैरान...पूरा साल नहीं पढ़ा और पांच मिनट बताने से ही ये सब सीख गया...फिर भी पप्पू को टेस्ट करने के लिए पूछा...अच्छा बताओ, क्या सीखा...


पप्पू का जवाब था...

देश का भविष्य अंधकार में था...अर्थव्यवस्था कर्मचारी का शोषण करती रही...सरकार कुंभकर्ण की नींद सोई रही...और जनता चुपचाप खड़ी सब देखती रही, वो बेचारी और कर भी क्या सकती थी...



(प्रताप सिंह फौजदार के किस्से पर आधारित)

...

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

पाकिस्तान को प्रमोट करने के लिए टैगलाइन...खुशदीप

क्रिएटिविटी कहीं भी हो चुंबक की तरह अपनी ओर खींच ही लेती है...क्रिएटिविटी का चुटकियों में लोहा मनवाना हो तो एडवरटाइज़िंग की दुनिया से बेहतर और कुछ नहीं...ये कॉपीराइटिंग या विज़ुअल्स का ही कमाल होता है कि आप एकदम से किसी नए प्रोडक्ट, सर्विस या ब्रैंड की तरफ़ आकर्षित हो जाते हैं...मेरी अपनी राय में अगर किसी एड में कॉपीराइटिंग के नाम पर एक शब्द भी न लिखा जाए, तो उससे बड़ी क्रिएटिविटी और कोई नहीं हो सकती...केवल फोटो या विजुअल्स के दम पर ही अपना संदेश टारगेट आडियंस तक पहुंचा दिया जाए...जैसा कि हम फेविकोल कैम्पेन या वोडाफोन के कुत्ते वाले कैम्पेन में देख चुके हैं...अगर क्रिएटिव एड को भाषा की बाध्यता से मुक्त कर दिया जाए तो उसकी यूनिवर्सल अपील हो जाती है...दूसरे शब्दों में दुनिया में कहीं भी कोई भी भाषा बोली जाए लेकिन उस एड के संदेश को समझ लिया जाएगा...




आजकल देश में आपने एक नया प्रचलन और देखा होगा...कि अब राज्य भी खुद को ब्रैंड के तौर पर पेश करने लगे हैं...वाइब्रेंट गुजरात की कामयाबी के दम पर ही आज नरेंद्र मोदी एक ही दिन में लाखों करोड़ का निवेश जुटा लेते हैं...गुजरात में टूरिज्म को प्रमोट करने के लिए अमिताभ बच्चन को मोदी ब्रैंड अंबेसडर बनाते हैं...यानि कोशिश यही है कि राज्य के लिए ज्यादा से ज्यादा निवेशक और पर्यटक जुटें...लेकिन मैं बात कर रहा था कैम्पेन में क्रिएटिविटी की...मुझे इस मामले में मध्य प्रदेश टूरिज़्म के एड बहुत पसंद हैं...इनके पीछे जो भी दिमाग है, वाकई गज़ब है...

देखिए दो बानगी....

हिन्दुस्तान का दिल देखो...

एमपी अजब है, सबसे गज़ब है...

किसी एड के क्लिक करने में टैगलाइन का भी बड़ा महत्व होता है....जैसे कि ठंडा मतलब कोकाकोला, डोमिनोज़- खुशियों की होम डिलीवरी, वोडाफोन- हैप्पी टू हेल्प यू...मुझे याद है कि अस्सी के दशक में जनसत्ता की एक टैगलाइन ने उसे जन-जन का अखबार बना दिया था...टैगलाइन थी- सबकी खबर ले, सबको खबर दे...

देखिए कुछ देशों की टूरिज़्म को प्रमोट करने के लिए टैगलाइन...

थाईलैंड... AMAZING THAILAND


मलयेशिया...TRULY ASIA


भारत...INCREDIBLE INDIA



अब आप सोचिए अगर पाकिस्तान खुद को प्रमोट करे तो अपनी टैगलाइन क्या रखेगा...

नहीं सोच पा रहे चलिए मैं अपनी ओर से पाकिस्तान सरकार को फ्री में ही टैगलाइन सुझा देता हूं...
 
...
 
...
 
...


पाकिस्तान...HAVE A BLAST TILL YOU LAST

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

हमारा पारा हाई क्यों रहने लगा है...खुशदीप

दिल्ली के पॉश इलाके खान मार्केट में कारों की मामूली भिड़ंत के चक्कर में मंगलवार को एक होटल के युवा मैनेजर की जान चली गई...कारों को मामूली खरोच जैसा ही नुकसान हुआ था...लेकिन कड़ाके की सर्दी में भी पारा ऐसा हाई हुआ कि एक कीमती जान जाने के बाद ही उसका अंत हुआ...होटल मैनेजर उतर कर दूसरी कार वाले से तू-तू, मैं-मैं करने लगा...दूसरा कार वाला वहां से तेज़ी से जाने लगा तो होटल मैनेजर कार के पिछले पहिए के नीचे आ गया...ये घटना इसलिए भी ताज़्जुब करने वाली है कि दोनों कार मालिक खासे पढ़े लिखे और अच्छी नौकरियां कर रहे थे...मरने वाला होटल मैनेजर था तो दूसरा एक निजी एयरलाइंस का पायलट...क्या हमारे अंदर इतना भी संयम नहीं रह गया कि ज़रा से उकसावे पर ही आपा खो बैठें...



अगर साइकाइट्रिस्टों की राय जानें तो ये सच है कि हमारे अंदर बर्दाश्त का माद्दा कम होता जा रहा है...हमारा रहन-सहन और सामाजिक परिवेश इतनी तेज़ी से बदल रहा है कि उसके साथ गति बनाना हमारे लिए मानसिक तनाव की वजह बनता जा रहा है...आक्रोश में आ कर हम न चाहते हुए भी ऐसा कदम उठा बैठते हैं कि जिससे नुकसान हो जाता है...फिर हमें जीवन भर पछताना पड़ता है...सड़कों पर आए दिन इस तरह की घटनाएं बढ़ने की वजह एक और भी है कि हर कोई अपने को तुर्रमखान समझता है...कुछ कुछ वैसे ही अंदाज़ में...जानता नहीं कि मेरा बाप कौन है...या जानता नहीं कि मेरी पहुंच कहां तक है...एक और वजह है कि मध्यम वर्ग की आय बढ़ी है तो वो भी ये समझने लगा है कि पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है...क़ानून भी पैसे वालों का कुछ नहीं बिगाड़ सकता...पुलिस का भ्रष्ट चेहरा हमारी आंखों पर ऐसा छाया हुआ है कि हम ये समझने लगे है कि चंद हरे नोट पुलिसवाले की मुट्ठी में पकड़ाओ और किसी भी मुसीबत से बच जाओ...अब क़ानून के डंडे का डर ही नहीं होगा तो फिर क़ानून हाथ में लेने की दुस्साहसिक घटनाएं बढ़ेंगी ही...

ऐसा नहीं कि आदमी गुस्से में आकर दूसरों से मरने-मारने पर ही उतारू हो जाता है...दबाव में आकर खुद जान देने की घटनाएं भी देश में खूब हो रही हैं...युवा पीढ़ी में सहनशक्ति कम होने की वजह से देश में खुदकुशी की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं...यहां तक कि विवाहितों में भी बर्दाश्त का स्तर अब बहुत कम होता जा रहा है...अब वो ज़माना नहीं रहा कि एक दूसरे की विपरीत आदतों के चलते भी एडजस्ट करने की कोशिश की जाए...

शायद यही वजह है कि साल 2009 में खुदकुशी करने वाले लोगों में कुंवारे-कुंवारियों की तुलना में शादीशुदा लोगों की तादाद कहीं ज़्यादा थी...ये मैं नहीं कह रहा, नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट कह रही है...रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं की तुलना में पुरुषों ने ये दुस्साहसिक कदम ज़्यादा उठाया...पिछले साल देश में 1,27,151 लोगों ने खुदकुशी की जिनमें से 70.4 फीसदी शादीशुदा, 21.9 फीसदी कुंवारे, 4.3 फीसदी विधवा-विधुर और 3.4 फीसदी तलाकशुदा या अकेले रह रहे शादीशुदा लोग थे...

रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल 58,192 शादीशुदा पुरुषों और 31,300 शादीशुदा महिलाओं ने खुदकुशी की...इसी साल 17,738 कुंवारों और 10,063 कुंवारियों ने खुद ही मौत को गले लगाया...पुरुष और महिलाओं के हिसाब से देखा जाए तो खुदकुशी करने वालों में 64 फीसदी पुरुष और 36 फीसदी महिलाएं थीं...खुदकुशी का सबसे बड़ा कारण घरेलू परेशानियां निकला...इसके चलते 23.7 फीसदी लोगों ने जान दी...दूसरी सबसे बड़ी वजह बीमारी रहा...बीमारी से परेशान 21.7 फीसदी लोगों ने खुद ही मौत को गले लगाया...

फिर किया क्या जाए...खुद पर कंट्रोल कैसे किया जाए...या तो आमिर ख़ान का थ्री इडियट्स वाला फंडा अपनाइए...होठों को करके गोल, सीटी बजा के बोल...के भईया आल इज़ वैल...

या फिर वो एड याद कीजिए...जिसमें गाड़ियों की टक्कर होने के बाद भी दोनों के मालिक बाहर आकर लड़ने की बजाय गाना गाने लगते हैं...न तेरा कसूर, न मेरा कसूर, दोनों जवानी की मस्ती में चूर, न तूने सिगनल देखा, न मैंने सिगनल देखा...ओ एक्सीडेंट हो गया, रब्बा-रब्बा...


चलिए छोड़िए ये गुस्से की बातें...लोहड़ी और मकर संक्रांति का त्यौहार है, कुछ मीठा-शीठा हो जाए...वैसे लोहड़ी पर दूल्हे भट्टी और सुंदर-मुंदरिए गीत के बारे में जानना चाहते हैं तो पिछले साल की मेरी इस पोस्ट पर नज़र मार सकते हैं...

बुधवार, 12 जनवरी 2011

इसे पढ़कर शायद ही आप भूल पाएं...खुशदीप

आपका छोटा सा भी जज़्बा दूसरों के लिए क्या कर सकता है...एक टैक्सी ड्राइवर की आपबीती से जानिए...

द कैब ड्राईवर...

मैं बताए हुए पते पर पहुंचा...एक बार टैक्सी का हॉर्न बजाया...कुछ मिनट तक कोई हलचल नहीं हुई तो मैं कार से उतर कर घर के दरवाज़े पर पहुंचा...धीरे से नॉक किया...

अंदर से किसी बुज़ुर्ग महिला की कंपकंपाती आवाज़ आई...बस, एक मिनट...ऐसे लगा जैसे कोई घिसट घिसट कर आ रहा है...

कुछ मिनटों के इंतज़ार के बाद दरवाज़ा खुला...

नब्बे के ऊपर की एक महिला दीवार का सहारा लिए खड़ी थी...प्रिंटेड गाउन और सिर पर हैट, जिसमें मुंह की तरफ जाली लगी हुई थी...चालीस के दशक की हॉलीवुड की फिल्मों की हीरोइन की तरह...

महिला के एक तरफ छोटा नायलन का सूटकेस था...अपार्टमेंट के अंदर झांकने से लगा कि जैसे सालों-साल से कोई वहां नहीं आया...सारा फर्नीचर चादरों से ढका हुआ...एक कोने में कार्डबोर्ड...फ्रेम में जड़ी पुरानी तस्वीरों और शीशे के बर्तनों से सजा हुआ...

क्या आप मेरा बैग कार तक ले चलेंगे...महिला की आवाज़ से मेरी तंद्रा टूटी...

मैंने पहले महिला का सूटकेस कार तक पहुंचाया और फिर वापस आया...महिला ने मेरी बांह का सहारा लिया...फिर हम धीरे धीरे कार की ओर बढ़ चले...इस दौरान महिला मुझे ब्लैसिंग देती रही...मैंने जवाब दिया...इट्स नथिंग...मैं अपने पैसेंजर्स का वैसे ही ख्याल रखता हूं जैसे कि अपनी मां का...

महिला बोली...तुम बहुत संस्कारी और अच्छे हो...

कार में बैठने के बाद महिला ने मुझे पते वाला एक विज़िटिंग कार्ड पकड़ाया...साथ ही बोली...क्या हम डाउनटाउन की तरफ़ से वहां चल सकते हैं...ये सुनकर मेरे मुंह से अपने आप ही निकला....ये तो काफ़ी लंबा रास्ता पड़ेगा...


महिला बोली...कोई बात नहीं...मुझे लास्ट होम पहुंचने की कोई जल्दी नहीं है...

(लास्ट होम, ऐसा हॉस्पिटल जहां निराश्रित अपने जीवन की आखिरी स्टेज में पहुंचते हैं, ये जानते हुए कि वहां से कभी वापस नहीं आना, बस खुदा के घर ही जाना है)

मैंने रियर व्यू में देखा...महिला के चेहरे की झुर्रियों में जैसे एक पूरे युग का फ़लसफ़ा दौड़ रहा था...फिर महिला के शब्द सुनाई दिए...मेरा इस दुनिया में कोई नहीं..डॉक्टर कहते हैं कि अब मेरे गिनती के ही दिन बाकी हैं...

मैं ये सुन ही रहा था कि अचानक मेरे हाथ कैब के मीटर की ओर बढ़े और उसे बंद कर दिया...साथ ही पूछा कि आप मुझे कौन से रूट से ले जाना चाहती हैं...

इसके बाद अगले दो घंटे तक शहर की सड़कों को नापती हुई कैब चलती रही....महिला ने मुझे वो इमारत भी दिखाई, जहां उसने कभी एलिवेटर आपरेटर की नौकरी की थी...महिला ने वो घर भी दिखाया जहां वो नई नई शादी के बाद पति के साथ पहली बार रहने के लिए आईं थीं...एक फर्नीचर हाउस के बाहर भी महिला ने कार रुकवाई...वहां कभी बालरूम रह चुका था...जब वो कालेज में पढ़ती थीं तो वहां डांस करने आया करती थीं... कभी किसी बिल्डिंग के सामने कैब की स्पीड धीरे करने के लिए कहतीं...ऐसे लगता कि वो शून्य में निहारते निहारते यादों के सफ़र में कहीं खो सी गईं हों...

सूर्यास्त का आभास हुआ तो महिला ने कहा... मैं थक गई हूं...चलो अब मुझे मेरे आखिरी ठिकाने तक पहुंचा दो...

अब हम दोनों चुप थे और कैब लास्ट होम की ओर बढ़ चली थी...

लास्ट होम के पोर्टिको में पहुंचते ही दो वॉर्ड बाय व्हील चेयर लेकर कैब के पास आ गए...जैसे उन्हें पहले से ही महिला का इंतज़ार था...

मैंने महिला का सूटकेस डिक्की से निकाला...मुड़ा तो देखा महिला तब तक व्हील चेयर पर बैठ चुकी थीं...महिला ने पर्स खोलते हुए पूछा...मीटर में कितने पैसे बने...

कुछ भी नहीं...मेरे मुंह से निकला...

तुम्हें जीने के लिए कुछ कमाना भी है...

उसके लिए और बहुत सवारी हैं...मेरा जवाब था...

ये कहते हुए मेरा सिर खुद-ब-खुद सम्मान में महिला की गोद में चला गया...फिर मेरी बांहों का घेरा महिला के चारों ओर था...तब तक महिला की ममता ने मुझे कसकर जकड़ लिया...

महिला के आंसू बिना कुछ कहे ही बोल रहे थे कि उन्हें कितना सुकून मिला...

मैंने महिला का हाथ दोनों हाथ में लेकर चूमा और वापस कैब की ओर चल पड़ा...पीछे से लास्ट होम का दरवाज़ा बंद होने जैसी आवाज़ भी आई...जब तक कैब में बैठा, सूरज पूरी तरह डूब चुका था...

उसके बाद कुछ देर मैं निरुद्देश्य ही सड़कों पर कैब को दौड़ाता रहा...उस शिफ्ट में मैंने और कोई सवारी नहीं ली...बस यही सोच रहा था कि उस महिला को कोई ऐसा कैब-ड्राइवर मिल जाता जिसे शिफ्ट खत्म कर घर जाने की जल्दी होती, तो....या फिर मैं ही महिला के कहे अनुसार लंबा रास्ता पकड़ने से मना कर देता...

थोड़ी देर सोचता रहा तो पाया कि जो मैंने आज किया, उससे ज़्यादा अहम ज़िंदगी में कभी और कुछ नहीं किया...

लोग शायद ये ठीक से याद न रखें कि आपने क्या किया या क्या कहा, लेकिन वो ये हमेशा याद रखेंगे कि आपने उन्हें कैसा महसूस कराया...


(ई मेल से अनुवाद)





मंगलवार, 11 जनवरी 2011

ब्लॉगिंग का रजनीकांत...खुशदीप

ऐसा ब्लॉगर कौन हो सकता है...छह महीने-साल में एक पोस्ट लिखे...और पूरा साल चर्चा का विषय बना रहे...यहां तो हमेशा डर लगा रहता है कि भइया रोज़ कुछ नया न दिया तो न जाने कब शटर गिराना पड़ जाए...इसलिए रोज़ ही कुआं खोदना पड़ता है...तब जाकर बामुश्किल पंद्रह-बीस टिप्पणी का जुगाड़ हो पाता है...दूसरी तरफ ये जनाब कुंभकर्ण की नींद से जब भी जगकर पोस्ट लिख मारते हैं तो टिप्पणियों की सेंचुरी का आंकड़ा तो कहीं नहीं गया...



ज़रूर भईया इस ब्लॉगर के अंदर रजनीकांत छुपा बैठा है...अब ये फिर रजनीकांत वाली ज़ुबान में न बोले तो और क्या करे...चलिए अब और नहीं घुमाता, मैं महफूज़ प्यारे की बात कर रहा हूं...जनाब गोली की गर्दन तोड़ने के बाद लंबा विश्राम कर रहे हैं...कभी-कभार आसमान में कड़कने वाली बिजली की तरह किसी ब्लॉग पर आकर चमक जाते हैं...इतने दिन के ब्रेक के बाद इन्होंने अपना नया Resume टाइप किया है, जो मैंने खोज़ी पत्रकारिता के दम पर हासिल कर लिया है...आप भी इस पर गौर फरमाइए...



RESUME OF MAHFOOZ ALI

नाम...महफूज़ अली


शौक...शेर के दांत इकट्ठे करना, चली हुई गोलियों को नंगे हाथ से पकड़ना...


रिकार्ड...हाथी से लड़ा और उसकी गर्दन तोड़ दी...


सबसे बड़ी उपलब्धि...ज्वालामुखी से निकलने वाले लावे पर स्केटिंग...


सबसे बड़ी मूर्खता...सुनामी में स्विमिंग...


सबसे ज़्यादा शर्मिंदा कब हुआ...सौ भालुओं पर मुक्का चलाया...सिर्फ 99 मरे और एक बच गया...


सबसे ज़्यादा गर्व कब हुआ...किंग कोबरा ने मुझे काटा और तत्काल मर गया...


कमज़ोरी...मैं शो-ऑफ में यकीन नहीं करता...




स्लॉग ओवर...

महफूज़ अली ने नया ई-मेल आईडी बनाया...

gmail@MAHFOOZ.com


इसे देखने के बाद...

Google shockz
Computer blocks
User jumps
Hacker dies
virus criez
&
MAHFOOZ ROCKZ

रविवार, 9 जनवरी 2011

वत्स, प्याज़ से इतना मोह मत कर...खुशदीप

मेरा सहयोगी और अज़ीज़ है...रोहित...बोले तो बिंदास...बड़ा परेशान है आजकल...वजह वही है जिसका रोना आज मेरे, आपके, सभी के, घरों में हो रहा है...प्याज़ अस्सी रुपये किलो..जिसे देखो आज सब कुछ भूलकर प्याज़ के पीछे दौ़ड़ रहा है...प्याज़ ने भी जैसे कसम खा ली है, सड़ जाऊंगा लेकिन इनके मुंह नहीं लगूंगा...



प्याज़ की तरह टमाटर ने आंखें लाल करना शुरू किया तो उसका तोड़ तो गृहणियों ने ढूंढ लिया...झट से बाज़ार से टोमेटो प्यूरी (या पूरी) मंगाई...15 रुपये में ही काम हो जाता है...पैकेट खोला, टमाटर को लिक्विड के रूप में निकाला और खुद को मास्टर शेफ़ पंकज भदौरिया (स्टार प्लस के हालिया शो की विजेता) साबित कर लिया...टमाटर का तोड़ तो ढूंढ लिया, मगर
निगोड़े प्याज़ का क्या करें...इस मौके पर हमारे ब्लॉग जगत की ओर से क्रांतिकारी पहल की जा सकती है...साइंस ब्लॉगर्स एसोसिएशन की ओर से श्रद्धेय अरविंद मिश्र जी, ज़ाकिर अली रजनीश भाई,अन्य सम्मानित सदस्य और बेलफास्ट में बैठे मेरे अनुज दीपक मशाल जैसे साइंटिस्ट अगर अनियन प्यूरी (प्याज़ प्यूरी) की खोज में जुट जाएं तो पूरी मानवता का भला हो जाएगा...



चलिए अब फिर लौटता हूं रोहित रुंदन (रोना) की ओर...प्याज़-प्याज़ चिल्लाते इसने खुद को हलकान कर लिया है लेकिन प्याज़ महाराज टस से मस होने का नाम नहीं ले रहे...मज़ाल है कि इसकी हालत पर दो आंसू बहा दे...आंसू क्यों बहाएंगे, इन्होंने दूसरों के आंसू बहाने का ठेका जो ले रखा है...मिल जाएं तो खुद कटने पर, न मिलें तो दूसरों के कटने पर...

रोहित प्याज़ के लिए ज़मीन पर हाथ पटक पटक कर और लोट लगा-लगा कर रो ही रहा था कि प्रभु को इतने प्यारे बालक को इस हालत में देखकर तरस आ गया...उसे चुप कराने के लिए आकाशवाणी हुई...

वत्स,


जो मैं कह रहा हूं, उसे गौर से सुन...


प्याज़ से इतना मोह मत कर...ऐसी वस्तुएं खा-खा कर ही तेरी मति भ्रष्ट हो गई...अब मैं तेरा जीवन संवारना चाहता हूं...तुझे तामसिक भोजन से सात्विक भोजन की ओर ले जाना चाहता हूं...ये सब किल्लत मेरी ही लीला (प्रभु-लीला) है...थोड़े दिन शोर मचाएगा, फिर तुझे मूली खाने की आदत हो जाएगी...तेरे सारे विकार वायु के रास्ते बाहर निकल जाएंगे...ये तेरा प्राकृतिक पद्मासन होगा...योगा के लिए तुझे लाख बाबा रामदेव सलाह देते रहते हैं, लेकिन तू उनके हाथ नहीं आता...इस तरह योग का तू खुद ही साधक बन जाएगा...बिना प्याज़ की लौकी खाएगा तो तेरा तन-मन सब शुद्ध हो जाएगा...तेरे चेहरे पर अलग ही तेज चमकने लगेगा...फिर तू सभी का प्यारा हो जाएगा...अब बालहठ छोड़, माताश्री प्यार से भोजन में जो भी कंद-मूल दे रही है, उसे मेरा प्रसाद समझ कर ग्रहण कर...
उठ, प्याज़ विहीन विश्व के निर्माण के ज़रिए मानवता के उत्थान में अभी से लग जा...

शुभाशीष...