शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

नीरा ओ नीरा, तू कब फोन मुझे करेगी... खुशदीप

मम्मी ओ मम्मी, तू कब सास बनेगी...


किसी टाइम पर किशोर कुमार का ये गाना बड़ा हिट हुआ था...1978 में फिल्म खट्टा मीठा में देवेन वर्मा पर फिल्माया गया था...आप कहेंगे मैं आज ये गाना क्यों याद कर रहा हूं...वो भी तब जब मेरी मम्मी ने मेरी ये इच्छा 17 साल पहले ही पूरी कर दी थी...आज इस गाने को तब्दील करके गाने का मन कर रहा है...

नीरा ओ नीरा, तू कब फोन मुझे करेगी...

नीरा कौन नीरा...अरे भाई क्या राडिया साथ लगाने के बाद ही समझते हो कौन नीरा...

अब भईया नीरा फोन करेगी तो पत्रकारिता में अपना भी भाव बढ़ेगा न...अब चाहे नीरा जी एक बार गलती से ही मुझे रॉन्ग नंबर ही मिला दो...उस महीने का बिल लैमिनेट करा कर हर वक्त छाती से लगाए घूमूंगा...देखो नीरा जी का नंबर...मुझ नाचीज़ को भी वो याद करती हैं...अपने इस पूरे करियर में कुछ भी तो ऐसा नहीं रहा जो मन में रूआब की फीलिंग ला सके...हम भी कलफ़ की तरह खुद को अकड़ा कर चल सकें...बस हर कोई हमें चिरकुट ही समझता रहा...अरे इससे काम क्या कहना ये तो खुद अपने काम के लिए सरकारी दफ्तरों में जाकर चपरासी को भी सर कहता है...



नीरा जी आप सर्वगुणसंपन्न हो...बेल्लारी के रेड्डी ब्रदर्स खानों से इतना लोहा नहीं निकालते जितना कि आप अपने दिमाग का लोहा मनवा चुकी हैं...पॉलिटिक्स हो या ब्यूरोक्रेसी, कॉरपोरेट हो या मीडिया...बीजेपी हो या कांग्रेस, हर किसी को शीशे में कैसे उतारा जाता है, ये गूढ़ रहस्य नीरा जी आप ही जानती हैं...ये किसी यूनिवर्सिटी में पीएचडी की थीसिस के लिए अच्छा विषय हो सकता है...मनमोहन सिंह जी जैसे रब दे बंदे का भी बाजा कैसे बजाया जा सकता है, ये आप राजा को मंत्री बनवा कर साबित कर ही चुकी हैं...बेवकूफ़ हैं सीबीआई, ईडी, सीएजी वाले...अरे उन्हें तो आपके बेशकीमती दिमाग़ पर शोध के लिए बाहर की यूनिवर्सिटियों को बुलाना चाहिए...

नीरा जी आपकी लीला अपरमपार है...इतना मक्खन कोई प्रभु को भी लगाता तो वो भी पिघल जाता...बस उठाइए सेल और लगाइए...9873819075 ...

न अपने सेल की रिंग टोन ये बना दूं तो फिर कहिएगा...

पल भर के लिए ही नीरा जी हमें फोन कर लें, अरे झूठा ही सही...




स्लॉग ओवर


एक बेबे (बुज़ुर्ग महिला) मर गई...दिखाने के लिए औरतों ने बेबे का स्यापा (रोना-धोना) शुरू किया...

बेबे कित्थे टुर गईं (बेबे कहां चली गई)


जित्थे धूप ते न छांव (जहां न धूप और न ही छांव)


न रोटी ते न सब्ज़ी (न रोटी और न सब्ज़ी)


न पैसा ते न दमड़ी (न पैसा और न दमड़ी)


न बिजली ते न पानी (न बिजली और न पानी)


इतना सुनते ही वहां बैठा गुल्ली पिता मक्खन से बोला...डैडी जी, डैडी जी, वेखिए किधरे ए वाली बेबे साडे घार ते नहीं आ गई...( डैडी जी, डैडी जी, देखें, कहीं ये बेबे हमारे घर तो नहीं आ गई)

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

श्री ब्लॉगरम् रहस्यम्...खुशदीप

आज एक शादी से आ रहा हूं...इसलिए बस माइक्रोपोस्ट से ही काम चलाइए...ये पोस्ट वही कहावत वाली है-देखन में छोटन लगे, मगर घाव करे गंभीर...



तीन लोग मरने के बाद स्वर्ग के द्वार पर पहुंचे...

पहला देवलोक के स्वामी से बोला...प्रभु मैं पुजारी हूं...जीवन भर आपकी सेवा के सिवा कुछ नहीं किया...मुझे अंदर आने दीजिए...


भगवान बोले...अगला...

दूसरा बोला...भगवन, मैं डॉक्टर हूं...ज़िंदगी भर लोगों की सेवा करता रहा, इसलिए अब अपने चरणों में रहने के लिए स्वर्ग में जगह दीजिए...


भगवान बोले...अगला...


तीसरा बोला...परमपिता...मैं ब्लॉगर हूं...मैंने...

प्रभु फौरन बोले...बस...बस...पगले...अब क्या मुझे भी रुलाएगा...चल अंदर आ...

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

'सरदारों' में असरदार कौन...खुशदीप

मेरठ रहता था तो फिल्में खूब देखा करता था...खास तौर पर धर्मेंद्र-अमिताभ बच्चन की फिल्में...लेकिन नोएडा आकर सब छूट गया है...पिछले सात-आठ साल में नोएडा में सिर्फ एक ही फिल्म मल्टीप्लेक्स पर जाकर देखी है- जोधा अकबर...वो भी किसी ने आग्रह के साथ कॉम्पलीमेंट्री टिकट पकड़ा दिए थे...अब तो डीवीडी पर भी फिल्में देखने का मन नहीं करता...हां किसी फिल्म की बहुत ज़्यादा तारीफ़ सुनूं तो डीवीडी पर देख लेता हूं...पत्रकार हूं इसलिए हर फील्ड की तरह फिल्मों के बारे में जानकारी ज़रूर रखनी पड़ती है...


अभी एक नई फिल्म के बारे में सुना है...पटियाला हाउस...


टी सीरिज़ वाले भूषण कुमार इस फिल्म का निर्माण कर रहे हैं...निखिल आडवाणी के निर्देशन में बन रही इस फिल्म में अक्षय कुमार क्रिकेटर की भूमिका निभा रहे हैं...ये रोल इंग्लैंड के पहले सरदार क्रिकेटर मोंटी पनेसर की कहानी से प्रेरित है...अक्षय  कुमार को बॉलर के रोल में ढालने के लिए पूर्व भारतीय क्रिकेटर्स पारस महाम्ब्रे और बलविंदर सिंह संधू ने क़ाफ़ी मदद की है...फिल्म में  अक्षय कुमार के पिता की भूमिका में ऋषि कपूर हैं...वो अपने देश भारत को जी-जान से चाहने वाले सरदार हैं...वो नहीं चाहते कि उनका बेटा इंग्लैंड की टीम से खेले...और एक दिन ऐसा भी आए कि उसे भारत के ख़िलाफ़ ही खेलना पड़े...मुझे ये प्लॉट दिलचस्प लग रहा है...वैसे भी इंग्लैंड या दूसरे देशों में जो भारतीय रहते हैं, उनके सामने अक्सर ये सवाल आता है कि वो क्रिकेट या हॉकी या अन्य किसी खेल में भारत की टीम का समर्थन करें या उस देश का जहां के अब वो नागरिक हैं और जहां से उन्हें रोज़ी-रोटी मिलती है...पटियाला हाउस में अक्षय कुमार के साथ अनुष्का लीड रोल में हैं...अक्षय की मां की भूमिका उनकी रियल लाइफ़ में सास डिंपल कपाड़िया निभा रही है...ऋषि कपूर और डिंपल अरसे बाद फिर इस फिल्म में साथ दिखेंगे...


 
निखिल आडवाणी की अक्षय कुमार के साथ बनाई पिछली फिल्म चांदनी चौक टू चाइना सुपरफ्लॉप रही थी...मेरे ख्याल से वो हिंदी सिनेमा की निकृष्टतम फिल्मों में से एक थी...अब देखना है कि पटियाला हाउस में ये जोड़ी कुछ चमत्कार कर पाती है या नहीं...वैसे भी अक्षय कुमार का सितारा पिछले काफ़ी वक्त से साथ नहीं दे रहा है...अक्षय कुमार की लास्ट हिट फिल्म सिंह इज़ किंग थी...फराह ख़ान की फिल्म तीसमारखां अभी रिलीज हुई है...उसकी रिव्यू रिपोर्ट अच्छी नहीं आई हैं...हां शीला की जवानी गाने ने ज़रूर फिल्म को धुआंधार प्रचार दिला दिया है...


सिंह इज किंग में अक्षय कुमार सरदार बने थे...वैसे ये देखा ये गया है कि जिस फिल्म में भी हीरो सरदार बनता है वो अक्सर हिट हो जाती है...जैसे धर्मेंद्र की जीवन मृत्यु, उनके बेटे सनी देओल की बॉर्डर और गद्दर, सैफ़ अली ख़ान की लव आज कल, सलमान ख़ान की हीरोज़...हां अमिताभ बच्चन अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों और रणबीर कपूर रॉकेट सिंह में भी सरदार बने थे, लेकिन दोनों फिल्में ही पिटी थीं...लेकिन रॉकेट सिंह फिल्म बहुत अच्छी थी...हर मां-बाप को अपने बच्चों को ये फिल्म ज़रूर दिखानी चाहिए...वैसे आप ये सारी फोटो देखकर बताएं कि सरदार के गेटअप में सबसे ज़्यादा कौन फब रहा है...




मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

'कल' डायरी से मिटाइए, 'आज' ऐसे जी कर देखिए...खुशदीप













आज मैं अपनी डायरी से दो दिनों को मिटाऊंगा
बीता हुआ कल और आने वाला कल...


बीता हुआ कल सीखने के लिए था,
आने वाला कल नतीजा होगा उसका,
जो मैं आज कर सकता हूं...


आज मैं ज़िंदगी का सामना करूंगा,
ये मानकर कि ये दिन फिर कभी,
दोबारा नहीं लौटने वाला...


आज आखिरी मौका है,
मैं शिद्दत के साथ जी लूं,
कोई नहीं मुझे आश्वस्त कर सकता कि,
मैं कल का सूरज देखूंगा या नहीं...


आज मैं इतनी हिम्मत दिखाऊंगा,
किसी मौके को हाथ से जाने नहीं दूंगा,
एक ही विकल्प है मेरे पास,
सिर्फ और सिर्फ कामयाबी...


आज मैं निवेश करूंगा,
अपने सबसे मूल्यवान संसाधन,
यानि अपने वक्त का,
सबसे श्रेष्ठ काम में,
यानि अपनी ज़िंदगी में...


आज मैं अपने हर मिनट को,
इस तरह बिताऊंगा,
कि मेरी ज़िंदगी का आज,
सबसे अलग और खास दिन बन जाए...


आज मेरे रास्ते में जो बाधा आएगी,
उससे पार पाऊंगा,
इस विश्वास के साथ कि,
जीत मेरी ही होगी...


आज मैं निराशा छोड़ कर उठूंगा,
दुनिया को जीतूंगा मुस्कान के साथ,
अपनी सारी सकारात्मक ऊर्जा के साथ,
बस इसी उम्मीद से कि,
सब कुछ अच्छा होगा...


आज मैं हर सादे काम को भी
खास अंदाज़ से ख़ास बनाऊंगा
आज मैं ज़मीन पर ही रखूंगा,
अपने कदमों को,
हक़ीक़त समझते हुए...

और सितारे टकटकी लगाकर देखेंगे,
मेरा भविष्य किस तरह गढ़ा जाता है...




आपकी मुस्कान है आपकी सबसे अच्छी दोस्त...इसे किसी और की दोस्त भी बनाइए..


खुश रहिए...ये भी बुद्धिमान होने का एक रास्ता है...
 
(ई-मेल से अनुवाद)

रविवार, 26 दिसंबर 2010

राहुल बाबा की शादी क्यों नहीं हो रही...खुशदीप

राहुल गांधी 41वें साल में प्रवेश कर चुके हैं...लेकिन शादी नहीं हो रही...क्यों नहीं हो रही...क्या आपको इसकी वजह पता है...राहुल के शादी न होने की वजह हैं सोनिया गांधी...जी हां सोनिया गांधी...राहुल गांधी की माताश्री...आप कहेंगे वो कैसे भई...कौन मां नहीं चाहेगी कि उसके लाल के सिर पर सेहरा बंधे...लेकिन अब आप ही बताइए...हर चुनाव से पहले सोनिया की यही अपील होती है....

...

...

...

बहुमत दो...बहुमत दो...यानि बहु मत दो...


चलिए बहुत मुस्कुरा लिए...अब एक पहेली का जवाब भी दे दीजिए...

अंग्रेज़ी का एक शब्द (word) है...शब्द नौ वर्णों ( letters) से मिलकर बना है...अब इस शब्द से एक-एक वर्ण (letter) हटाते जाइए...जो बचेगा वो अपने आप में ही एक मुकम्मल शब्द (word) रहेगा...जिसका कुछ अर्थ रहेगा...थोड़ा दिमाग़ लगाएं...



...



...



...



नहीं पकड़ में आया तो ये वीडियो देखिए...


video

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

टिप्पणी का टेंटुआ और मॉडरेशन महाराज...खुशदीप

कल की मेरी पोस्ट दो नंबरियों पर थी...लेकिन लाल परी उस पर भारी पड़ी...उम्मीद करता हूं कि शरारती बच्चों के कान ऐंठे जाने से जो लाल हो गए थे, वो अब अपनी रंगत में आ गए होंगे...आइन्दा कोई नटखट ब्लॉग पर ब्राउन जूस के साथ भी कभी फोटो नहीं छपवाएगा, जिससे कोई भ्रम हो और देश के ख़ज़ाने में एक्साइज़ रेवेन्यू बढ़ने के लिए प्रचार-प्रसार हो...

अजित गुप्ता जी ने एक सामान्य सी बात कही थी कि शराब पीने या उसके महिमामंडन का सार्वजनिक तौर पर प्रचार-प्रसार नहीं किया जाना चाहिए...ब्लॉग भी ऐसा ही सार्वजनिक मंच है...अजित जी ने एक दिन पहले ज़ाकिर अली रजनीश भाई की पोस्ट पर इस संबंध में टिप्पणी की थी...वो टिप्पणी मॉडरेशन की भेंट चढ़ गई...अगर वो टिप्पणी छप जाती तो अजित जी मेरी पोस्ट पर भूले से भी ऐसा कोई ज़िक्र नहीं करतीं...मेहनत से की गई टिप्पणी की घिच्ची घुप जाने पर कैसा दर्द होता है, ये भुक्तभोगी ही जानते हैं...



आप देश में लोकतंत्र की वकालत करते हैं...इंदिरा गांधी ने 1975 में इमरजेंसी लगाई तो उस दौर को देश के इतिहास में लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए काले अध्याय के तौर पर आज तक याद किया जाता है...ये कहां तक सही है कि हर कोई आपकी पोस्ट में बस हां में हां ही मिलाए...ज़रा सी किसी ने विरोध की लाइन पकड़ी नहीं कि झट से उस टिप्पणी का टेंटुआ पकड़ कर दबा दिया जाए...विरोध का भी सम्मान किया जाना चाहिए...मैंने बुज़ुर्गों की दशा पर बनी फिल्म रूई का बोझ पर तीन पोस्ट लिखीं...मैंने इस फिल्म के बारे में पहले कभी नहीं सुना था...लेकिन 19 दिसंबर को दिल्ली के छत्तीसगढ़ भवन में ब्लॉगर मीट के दौरान बुज़ुर्गों की दशा पर चर्चा के दौरान सुरेश यादव जी ने इस फिल्म का ज़िक्र किया...मुझे सुरेश जी का ये अंदाज़े-बयां बहुत पसंद आया...मैंने घर आकर रूई का बोझ के बारे में और जानने के लिए गूगल पर सर्च किया...फिल्म की समरी के साथ अंग्रेज़ी में लिखा मैटीरियल भी सामने आया...Passionforcinema.com पर एक लेख में फिल्म की कहानी विस्तार से दी हुई थी...ये फिल्म चंद्र किशोर जैसवाल जी के उपन्यास रूई का बोझ पर ही आधारित थी...अब उस कहानी का ही मैंने अनुवाद कर, बुज़ुर्गों को जीवन की संध्या में क्या क्या सावधानी बरतनी चाहिए, अपने इस विषय के साथ जोड़ कर पोस्ट की शक्ल दे दी...अंग्रेज़ी के लेख में लेखक का नाम दिया होता तो चंद्र किशोर जैसवाल जी के नाम की तरह ही मैं उनका भी उल्लेख ज़रूर करता...यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि न तो मैंने उपन्यास पहले पढ़ा था और न ही फिल्म पहले देखी थी...अगर ऐसा किया होता तो मैं गूगल पर फिर सर्च ही क्यों करता...अब इसी बात पर विक्रम-बेताल की कथा के विक्रम की तरह एक बेनामी महोदय ( CinemaisCinema) ने मेरी पोस्ट पर आकर खरी-खोटी सुनाते हुए जमकर मेरा मान-मर्दन किया...एक बार नहीं बल्कि पांच-छह टिप्पणियां ठोक डाली...मेरी पिछली पोस्ट को भी नहीं बख्शा...लेकिन ऐसा करते हुए ये सज्जन एक बात का ध्यान रख रहे थे कि भाषा की मर्यादा न टूटे...मैंने भी उनकी सभी टिप्पणियों को जस का तस छापा...उन्होंने मुझे Plagiarism तक का दोषी करार दे डाला...वो अपनी जगह ठीक थे, मैं अपनी जगह ठीक था...अब किसी फिल्म की कहानी को पचास लेखों में लिखो, कहानी तो वही रहेगी, कहानी तो नहीं बदलेगी...ये बात वो सज्जन समझ लेते तो शायद वो मेरे ऊपर इतना बड़ा आरोप न टिकाते...हां ऐसा करते वक्त उन्होंने जो मेरा मुख्य मुद्दा था- बुज़ुर्गों की दशा, उसे ज़रूर थोड़ी देर के लिए पटरी से उतार दिया था...

मेरा यहां ये सब बताने का तात्पर्य यही है कि कहीं विरोध के स्वर सुनाई दें तो उनसे विचलित नहीं होना चाहिए...आप आउटराइट विरोध को खारिज कर देंगे तो ये कहीं न कहीं आपके रचनात्मक विकास को ही बाधित करेगा...मुझे यहां ऐसा भी अनुभव हुआ है कि किसी एक पोस्ट पर मॉडरेशन खुला होगा, दूसरी पोस्ट पर मॉडरेशन लगा होगा...यहां भी अपनी सुविधानुसार नियम तय कर लिया जाता है...या तो हमेशा मॉडरेशन लगाए रखिए या उसे पूरी तरह हटा दीजिए...ये बीच की पॉलिसी क्यों...हां, कभी-कभार अश्लील या बेहूदी भाषा का इस्तेमाल करने वाले बेनामियों की टिप्पणी हटाने के लिए कुछ देर के लिए मॉ़डरेशन ऑन करना पड़े तो वो बात तो समझ में आती है...खैर, जिसकी जैसी मर्जी, वैसे चले...दूसरा इसमें दखल देने वाला कौन होता है...लेकिन ब्लॉग को लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ बनाना है तो विरोध के स्वर सुनना तो हमें सीखना ही होगा...किसी कमेंट को किल करने का आधार सिर्फ भाषा की मर्यादा होना चाहिए...सम्मान का नाम देकर कमेंट्स की हत्या नहीं की जानी चाहिए...ये बस मेरा अपना विचार है...सब अपना रास्ता खुद चुनने के लिए स्वतंत्र हैं...

चलिए अब स्लॉग ओवर के ज़रिए विषय परिवर्तन करता हूं...ये स्लॉग ओवर मैंने 19 दिसंबर को शाहनवाज सिद्दीकी के साथ ऑटो पर छत्तीसगढ़ भवन जाते हुए ऑटो-ड्राईवर को सुनाया था...मैंने तब वादा भी किया था कि फिर किसी दिन आपको ये स्लॉग ओवर ज़रूर सुनाऊंगा...लेकिन ऐसा करने से पहले ही अजित गुप्ता जी से माफ़ी मांग लेता हूं, क्योंकि कमबख्त दारू इसमें भी अपनी टांग अड़ाए हुए है...और सबसे भी मेरा अनुरोध है कि इस स्लॉगओवर को हास्य के नज़रिए से ही लें, और कोई निहितार्थ न ढूंढे...


स्लॉग ओवर

एक बार एक महिला जानेमाने डॉक्टर के पास पहुंची...अपनी परेशानी बताई कि पति महाराज रोज़ रात को नशे में लड़खड़ाते हुए घर पहुंचते हैं और झगड़ा करना शुरू कर देते हैं...हाथापाई तक की नौबत आ जाती है...इस पर डॉक्टर ने कुछ देर सोचा और पत्नी को बाज़ार से लिस्ट्रीन की शीशी खरीदने की सलाह दी...साथ ही बताया कि जैसे ही पति रात को पी कर घर पर आए वो लिस्ट्रीन से गारगल (गरारे, कुल्ला) करना शुरू कर दे...एक हफ्ते बाद वही महिला डॉक्टर के पास पहुंची...आते ही बोली...डॉक्टर साहब आपके इस नुस्खे ने तो चमत्कार कर दिया...पूरे हफ्ते पति ने चूं तक नहीं की...अब घर आता है (नशे में ही), चुपचाप टेबल पर पड़ा खाना खाता है...फिर सोने चला जाता है...इस बीच मैं गरारे करती रहती हूं...लेकिन डॉक्टर साहब मुझे समझ नहीं आया कि गरारों का इस समस्या से क्या कनेक्शन है...इस पर डॉक्टर मुस्कुराते हुए बोला...
....

....

....

इसके अलावा मेरे पास आपको चुप रखने का कोई और साधन नहीं था...



आपको हैरान करेगा ये '2 नंबरी' सच...खुशदीप

2 कामराज लेन, दिल्ली...


2 ए मोतीलाल नेहरू मार्ग, दिल्ली...


2 रेसकोर्स रोड, बैंगलुरू...

इन तीनों पतों में आपको कॉमन क्या लगा...जी ठीक पहचाना 2 नंबर...यानि 2 नंबरी...




अब देखिए इन पतों पर कौन कौन रहता है...



2 कामराज लेन, दिल्ली... ये घर अपने सुरेश कलमाड़ी जी का है...

(पूरे देश में एक ही तो सुरेश कलमाड़ी हैं, कॉमनवेल्थ वाले)


2 ए मोतीलाल नेहरू मार्ग, दिल्ली...ये घर अपने ए राजा जी का है...

(राजा जी ने तो जलवा भी 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले मे ही दिखाया)


2 रेसकोर्स रोड, बैंगलुरू...ये घर अपने येदियुरप्पा जी का है...

(कर्नाटक के नाटक से बीजेपी की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की हवा निकालने वाले सीएम येदियुरप्पा जी)


कहत कबीर सुनो भई साधो, बात कहें हम खरी,

ये दुनिया इक नंबरी तो हम 2 नंबरी....




स्लॉग ओवर

स्लॉग ओवर में आज डॉक्टर अमर कुमार के जज़्बे को सलाम...ज़िंदादिली क्या होती है, ये हम सबको डॉक्टर साहब से सीखना चाहिए...डॉक्टर साहब अब पहले से बहुत बेहतर हैं...अभी बोलना मना है...इसलिए मेरी फोन पर डॉक्टर साहब के बेटे जी से ही बात हुई...लेकिन मुझे उस वक्त बहुत ही सुखद आश्चर्य हुआ जब डॉक्टर साहब का मेरे पास एसएमएस आया...इसमें उन्होंने स्लॉगओवरिया ही शुरुआत की...क्या लिखा, गौर फ़रमाइए...



बीयर के मग में एक मच्छर गिर गया...

ब्रिटिश जैंटलमैन ये देखकर क्या करता...
ब्रिटिश जैंटलमैन ने मग देखा तो मुंह बनाता हुआ वहां से फौरन चला गया...


अमेरिकन क्या करता...
अमेरिकन ने मच्छर निकाल कर फेंक दिया और मज़े से बीयर पी गया...


चाइनीज़ क्या करता...
चाइनीज़ ने बीयर में निचुड़ा मच्छर खाया, इस नई नेचुरल डिश के स्वाद की जी खोल कर तारीफ़ की...


भारतीय क्या करता...

...

...

...


बीयर अमेरिकन को बेचता...निचुड़ा मच्छर चाइनीज को बेचता...जो पैसे मिलते उनसे नई बीयर खरीदता और कुछ पैसे बचा भी लेता...


डॉक्टर साहब ने आगे लिखा है...

Thus the life goes on my dear Khushdeepe (खुशदीपे), I am happy that you have called me in touching way. I am saved and OK by 60%.



Doctor Sahib, just salute to you...

yours
Khushdeepa

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

संध्या का सवेरा...रूई का बोझ...तीसरी किस्त...खुशदीप

कल मैं थोड़ा विचलित हुआ...लेकिन फिर संभला...मैं अहम नहीं हूं...मुद्दा अहम है...इसलिए सीधे मुद्दे पर ही आ रहा हूं...मुद्दा ये है कि हर इनसान को वृद्ध होना है...ज़माना जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, समाज की मान्यताएं और नियम जिस तरह टूट रहे हैं, उसमें आने वाला वक्त और भी चुनौती भरा है...


मेरठ में हमारे परिवार के एक परिचित एलआईसी के बड़े अधिकारी थे...अच्छी सेलरी थी...कमीशन भी अच्छा खासा बन जाता था...घर में चार बेटे थे...लेकिन उन जनाब ने कभी अपना मकान बनाने की कोशिश नहीं की...हमेशा किराए के मकान में ही गु़ज़ारा किया...हां चारों बेटों की पढ़ाई पर पूरा ध्यान दिया...एक वक्त ऐसा आया कि चारों बेटों को अच्छे जॉब मिले...चारों ने ही अपने अपने मकान बना लिए...पिता फिर भी किराए के मकान पर ही रहते रहे...हां उन्होंने खुद नौकरी करते वक्त इतना ध्यान ज़रूर रखा कि वृद्धावस्था के लिए अच्छा निवेश होता रहे...आर्थिक रूप से वो रिटायर होने के बाद भी किसी बेटे पर आश्रित नहीं हुए...इस सब का असर ये हुआ कि चारों बेटे ही लालायित रहते थे कि माता-पिता उनके पास कुछ दिन आकर रहें...सब सेवा भी पूरी करते थे...लेकिन उन्होंने अपने अलग घर में रहना नहीं छोड़ा...एक दिन मेरे पापा से उन्होंने बातचीत के दौरान बताया था कि अगर मैं अपना मकान बना लेता तो शायद आज मेरे चारों बेटों के अपने मकान नहीं होते...हो सकता था कि वो चारों उसी में हिस्से के लिए आपस में भिड़ते रहते...बचपन से ही वो निश्चिंत हो जाते कि रहने के लिए अपना मकान तो है ही... वो अंकल मज़ाक में ये भी कहते थे कि बेवकूफ़ मकान बनाते हैं और समझदार उसमें रहते हैं...वाकई उन्होंने रिटायर होने के बाद भी अपना वक्त बड़ी शान से गुज़ारा...जब जी आता था, कहीं भी चले जाते थे...उनके घर में जब सारा परिवार इकट्ठा होता था तो रौनक देखते ही बनती थी...अंकल की इस कहानी पर वो कहावत पूरी सटीक बैठती थी- पूत सपूत तो का धन संचय, पूत कपूत तो का धन संचय...


खैर इस सच्चे किस्से के बाद अपने मूल विषय पर आता हूं...बुजुर्गों की बात कर रहा हूं तो ऐसा नहीं है कि सारी संतान गलत ही होती हैं...अब भी ऐसे कई बेटे-बेटियां मिल जाएंगे जो जीवन की इस रफ्तार में भी वक्त निकाल कर माता-पिता का पूरा ध्यान रखते हैं...लेकिन हमारे महानगरों में सामाजिक दृश्य तेज़ी से बदल रहा है...यहां चाह कर भी लोग अपने बुज़ुर्गों के लिए वक्त नहीं निकाल पा रहे हैं...दिल्ली में ऐेसे कई बूढ़े मां-बाप मिल जाएंगे जिनके बच्चों ने अच्छे करियर की तलाश में सात समंदर पार जाकर आशियाने बना लिए हैं...अब उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है...ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं जहां ऐसे बुज़ुर्ग दंपत्तियों को आसान टारगेट मानकर अपराधियों ने अपना शिकार बना लिया...

इसके अलावा भी आजकल हर कोई अपना जीवन अपने हिसाब से जीना चाहता है...रोक-टोक किसी को आज बर्दाश्त नहीं है...इसलिए घरों में तनातनी बढ़ रही है...ये भी नहीं कि हर जगह संतान ही गलत हो...कई जगह बुज़ुर्ग भी नई परिस्थितियों में खुद को ढाल नहीं पाते...वो समझ नहीं पाते कि उनकी संतान को कितनी आपाधापी और गलाकाट माहौल में अच्छे जीवन के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है...उन्हें खुद अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ रही है...कई जगह बुज़ुर्ग ये नहीं समझ पाते कि जैसे उन्होंने अपनी औलाद के लिए सब कुछ सहा, वैसे ही अब वो भी तीसरी पीढ़ी के लिए मशक्कत कर रहे हैं...दूसरी तरफ़, संतान भी पूरे दिन में पांच मिनट भी बूढ़े मां-बाप के लिए नहीं निकाल सकती...उनके पास शांति से बैठकर हंस-बोल नहीं सकती...

घर में झगड़े न भी हों, फिर स्वावलंबन में कोई बुराई नहीं है...बुज़ुर्गों को सब कुछ आंखें मूंद कर औलाद को सौंपने से पहले ऊपर बताई सब परिस्थितियों का भी ध्यान रख लेना चाहिए...जो मैं लिख रहा हूं, उसी संदर्भ में मैं आपको नोएडा में वृद्धों के लिए चलाए जा रहे एक आश्रम का हवाला देता हूं...



आनंद निकेतन नाम से चल रहा ये आश्रम मेरी नज़र में वृद्धों की समस्या का श्रेष्ठ उपलब्ध समाधान है...इस आश्रम में सौ से ज़्यादा बुज़ुर्ग रह रहे हैं...कुछ जोड़े भी हैं जिन्हें अलग रूम दिए गए हैं.कुछ को यहां घर में तनाव के चलते आना पड़ा तो कुछ राजी खुशी ही यहां आकर रह रहे हैं...आनंद निकेतन शांतिप्रिय लोकेशन और पॉश सेक्टर के बीच बना हुआ है....बिल्डिंग के दोनों तरफ विशाल लॉन हैं...यहां प्रति बुज़ुर्ग चार से पांच हज़ार रुपये महीना चार्ज किया जाता है...लेकिन जो सुविधाएं दी जाती हैं उसकी तुलना में ये रकम कुछ भी नहीं है...समय से नाश्ता, दोनों टाइम का भोजन...भजन-कीर्तन, योगा से लेकर हर चीज़ का टाइम फिक्स है...आश्रम के खुद के डॉक्टर होने के साथ यहां हर वक्त एंबुलेंस की भी व्यवस्था रहती है...थोड़े-थोड़े वक्त बाद हर बुजुर्ग का चेकअप होता रहता है....इन सभी बुज़ुर्गो ने यहां रिश्तों की एक अलग दुनिया ही बना ली है...अपनों से अलग होने का दर्द तो है लेकिन मलाल नहीं है...इन सबका आपस में बहुत अच्छा वक्त पास हो रहा है...यहां कई ऐसे बुजुर्ग भी है जिनके बच्चे विदेश चले गए हैं...अब वो आश्रम में अपनी मर्जी से रह रहे हैं...अकेले किसी कॉलोनी में रहते तो हमेशा सिक्योरिटी का डर सताता रहता...ऐेसे बुज़ुर्ग भी दिखे, जो तमाम दुश्वारियां सहने के बाद भी अपने बच्चों को दुआ ही देते हैं...एक महिला ऐसी भी दिखी जिनका पुत्र उन्हें यहां इसलिए छोड़ गया है क्योंकि उसकी पत्नी धमकाती रहती थी कि अगर ये घर में रही तो वो खुदकुशी कर लेगी...एक बुज़ुर्ग ऐसे भी थे जिनके बेटे के पास एक बेडरूम का ही मकान था...इसलिए घर में पर्याप्त जगह न होने की वजह से बुज़ुर्ग खुद ही अपनी इच्छा से आश्रम में आ गए....


मेरा ये सब बताने का मतलब यही है कि ऐसे आश्रम में भी रहना है तो आपको आर्थिक रूप से थोड़ा मज़बूत तो होना ही पड़ेगा...इसलिए सीनियर सिटीजन बनने से पहले ही ऐसी अवस्था के लिए थोड़ा धन बचाते रहने में कोई बुराई नहीं है...अगर संतान आपकी सम्मान करने वाली है तो इससे अच्छी तो कोई बात ही नहीं हो सकती...एक-दूसरे की ज़रूरतों का ध्यान रखते हुए साथ रहना सबसे आदर्श स्थिति है...लेकिन दुर्भाग्यवश ये स्थिति न हो तो आपको एक-दो विकल्प हमेशा हाथ में ज़रूर रखने चाहिए...किसी पर आश्रित होने की जगह अपने हाथ जगन्नाथ पर ही सबसे ज़्यादा भरोसा करने में समझदारी है...

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

घर घर की कहानी...रूई का बोझ...दूसरी किस्त...खुशदीप

रूई का बोझ...कल तक बताई कहानी से आगे...दो बड़े बेटों के राजी न होने पर बूढ़े पिता को छोटे बेटे-बहू के साथ रहना पड़ता है...थोड़े दिन तो सब ठीक रहता है...लेकिन फिर...



सबसे छोटी बहू भी पिता के साथ रहने को लेकर कुढ़ने लगती है...दो टाइम रुखी-सूखी रोटी देकर ही अपनी ज़िम्मेदारी की इतिश्री समझ लेती...इसके अलावा पिता की किसी बात पर कान नहीं धरती...पति के कान भी भरने लगी कि बाबूजी दिन भर खाली बैठे रहते हैं, आप दिन भर खटते रहते हो, इन्हें भी कोई काम वगैरहा करना चाहिए...छोटी बहू की ये खीझ धीरे धीरे अपमान का रूप लेने लगी...पिता का पुराना दोस्त कभी-कभार मिलने आता तो पिता बहू से चाय के लिए कहते...जवाब मिलता, घर में दूध खत्म है, चाय नहीं बन सकती...पिता बेचारे मन मसोस कर ही रह जाते...लेकिन दोस्त सब समझता था...वो समझाने की कोशिश करता कि दिल पर मत लगाया करो...वही दोस्त ढाढस बंधाने के लिए कहता है...


बूढ़ा पिता रूई के बंडल की तरह होता है,
शुरू में उसका बोझ महसूस नहीं होता,
लेकिन जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है, ये भारी होता जाता है,
बूढ़ा पिता फिर रूई के गीले बंडल की तरह हो जाता है,
भारी, भारी और भारी,
फिर हर बेटा इस बोझ से पीछा छुड़ाना चाहता है...


एक दिन ऐसा भी आता है कि पिता हर चीज़ के लिए बेटे पर निर्भर हो जाता है...उसके पास अपना कोई पैसा भी नहीं बचता...सब कुछ तो वो बेटों को दे चुका होता है...


इसी दौरान सबसे बड़े बेटे की बड़ी बेटी की शादी तय हो जाती है...बड़ा बेटा सोचता है कि पिता छोटे भाई के साथ रह रहे हैं, इसलिए शादी पर पिता के लिए नया जोड़ा वही बनवाएगा...पिता के साथ रहने वाला बेटा सोचता है कि शादी बड़े भाई के घर में है, इसलिए पिता को जोड़ा भी वही खरीद कर देगा...पिता अपनी पोटली में से पुराना सिल्क का कुर्ता निकालता है...बरसों पहले किसी बेटे की शादी के दौरान ही सिलवाया था...लेकिन अब उसमें जगह जगह छेद हो गए थे...पिता बेटे को कुर्ता दिखा कर कहता है कि मेहमानों के सामने इसे पहनने से परिवार की इज्जत खराब होगी...लेकिन बेटा पिता की बात एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देता है...बहू एक कदम और आगे निकल कर जान कर इतनी ऊंची आवाज़ में टोंट मारती है कि पिता सुन ले...पैर कब्र में हैं और अब भी इन्हें स्टाइल मारना है...


पिता दिल पर पत्थर रखकर बेटा-बहू को तो कुछ नहीं कहते...लेकिन अकेले कमरे में गुस्सा निकालते हुए खुद ही बड़बड़ाते हैं- मैं बूढ़ा हूं, इसलिए सही खा-पी नहीं सकता, सही कपड़े नहीं पहन सकता...क्या इस दुनिया में मैं अकेला हूं जो बूढ़ा हुआ...क्या तुम सब कभी बूढ़े नहीं होगे...बूढ़े व्यक्ति के लिए सबसे मुश्किल घड़ी तब आती है जब उससे सब बात करने से भी कतराने लगते हैं...खाली बैठे एक-एक लम्हा बिताना मुश्किल हो जाता है...उनमें ये हताशा घर करने लगती है कि उनकी किसी को अब ज़रूरत नहीं, वो बस धरती पर बोझ बन कर रह गए हैं...


एक दिन पोता अलग अलग मौसमों के महत्व के बारे में ज़ोर-ज़ोर से पढ़ रहा होता है...बूढ़े पिता से ये सुनकर रहा नहीं जाता और उनकी भड़ास बाहर आ जाती है...बूढ़ों के लिए कोई मौसम अच्छा नहीं होता...सारे मौसम बूढ़ों के दुश्मन होते हैं...इस तरह के माहौल में रहते-रहते पिता चिड़चिड़े होने के साथ कभी-कभी बच्चों की तरह जिद भी करने लगते हैं...एक दिन वो मक्के की रोटी खाने के लिए अड़ जाते हैं...लेकिन छोटी बहू मना कर देती है...तर्क देती है कि मक्के की रोटी पचेगी नहीं और वो बीमार पड़ गए तो सब उसे ही दोष देंगे कि उसने ख्याल नहीं रखा...छोटी बहू दूसरा खाना पिता के कमरे में रखने के साथ कहती है जब भूख सताएगी तो खा लेना...लेकिन पिता पर भी जैसे सनक सवार हो गई थी...कसम खा ली कि खाऊंगा तो मक्के की रोटी ही खाऊंगा नहीं तो कुछ नहीं खाऊंगा...लेकिन उस रात पिता सो नहीं पाते...यही डर सताता रहता है कि कहीं कोई कुत्ता या बिल्ली खाना खा गया तो बहू यही समझेगी कि रात को उसने ही खाना खा लिया....


जब घर के सदस्यों में ठीक से संवाद होना बंद हो जाता है तो इस तरह की तनातनी बढ़ती ही जाती है...फिल्म में भी पिता और छोटे बेटे के बीच मतभेद बढ़ते जाते हैं...हद तब हो जाती है जब छोटी बहू पति पर ज़ोर देकर कहती है कि पिता को सामने के कमरे से निकाल कर पीछे कोठरीनुमा कमरा रहने के लिए दे दिया जाए...बेटा पिता से पीछे कमरे में जाने के लिए कहता है...पिता मना करते हैं तो दोनों में ज़ुबानी जंग के बाद धक्का-मुक्की शुरू हो जाती है...बेटे का धक्का लगने से पिता ज़मीन पर गिर जाते हैं...


गांव वाले भी ये नज़ारा देख रहे होते हैं...पिता ये देखकर समझते हैं कि उनके परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल गई...इस घटना के बाद पिता को हर रिश्ता बेमानी नज़र आने लगता है...वो अपने एक जानने वाले से कहते हैं कि अब उन्हें इस घर में एक मिनट भी नहीं रहना है, इसलिए वो उन्हें किसी आश्रम में छोड़ आए...पिता का ये रूप देखकर छोटे बेटे और बहू को भी डर लगता है कि अगर ये इस तरह चले गए तो पूरे गांव बिरादरी में उनकी थू-थू हो जाएगी...वो बेटे (पोते) को पिता को मनाने के लिए भेजते हैं...लेकिन पोते की बात से भी पिता का दिल नहीं पसीजता...

लेकिन हमेशा गृहस्थी में रहते आए व्यक्ति के लिए एक झटके में सारे नाते तोड़ लेना आसान भी नहीं होता...जब भी घर में झगड़ा-क्लेश होता है वो सोचता यही है कि कहीं अलग जाकर रहना शुरू कर दे लेकिन कुछ ऐसा उसके अंदर चलता रहता है जो उसे ये कदम उठाने से रोकता रहता है...


जैसे ही पिता गांव से बाहर आते हैं वो जानने वाले से पूछते हैं कि आश्रम कितना दूर है...फिर कहते हैं कि थोड़े दिन आश्रम में रह कर घर लौट आएंगे सिर्फ पोते की खातिर...क्योंकि वो बार-बार कह रहा था कि बाबा जल्दी ही आप लौट आना...अब घरवालों से अलग रहने का विचार पिता को परेशान करना शुरू कर देता है...फिर कहते हैं कि वो आश्रम के मंदिर में माथा टेक कर शाम को ही घर लौट आएंगे...थोड़ी देर बात पिता कहते हैं...आश्रम जाने की भी क्या ज़रूरत है वो प्रार्थना तो घर पर भी कर सकते हैं...वो जानने वाले पर ज़ोर देकर बैलगाड़ी को वापस घर के लिए मुड़वा लेते है...


यहीं फिल्म का अंत हो जाता है...ये तो थी कहानी...लेकिन इससे निष्कर्ष क्या निकला...

हम जिस माहौल में आज रह रहे हैं, आने वाला कल इससे भी मुश्किल होगा...ऐसे में जीवन के सांध्यकाल को संवारने के लिए आज हम क्या-क्या कर सकते हैं, इस पर मैं भी एक दिन सोचता हूं...आप भी सोचिए...फिर एक दूसरे से अपने विचार बांटते हैं...



(जारी है, कल पढ़िएगा निष्कर्ष)

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

रूई का बोझ...पहली किस्त...खुशदीप

जीवनकाल को बांटने के लिए ब्रह्मचर्य, ग्रहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास के खांचों के बारे में आप सब जानते ही हैं...लेकिन ये अवस्थाएं संयुक्त परिवार के लिए बनी थी...आज के दौर में सभी मान्यताएं टूट रही हैं तो इन खांचों का मतलब भी बेमानी सा होता जा रहा है...न्यूक्लियर परिवारों के इस दौर में बुज़ुर्गों को बोझ समझने वालों की कमी नहीं है...कुछ संतान बुज़ुर्गों की सच्चे मन से सेवा करने वाली भी हैं, लेकिन इनका प्रतिशत बहुत कम है..पिता की संपत्ति पर तो सब हक़ जताते हैं लेकिन एक बार ये मकसद हल हो जाता है तो फिर पिता ही बोझ नज़र आने लगता है...ये सब भुला दिया जाता है कि बचपन में कितनी मुसीबतें सहते हुए उन्होंने बच्चों को बढ़ा किया, पढ़ाया-लिखाया...

चंद्र किशोर जैसवाल ने ऐसे ही एक परिवार में अंर्तद्वंद्व से गुज़र रहे बूढ़े बाप पर बड़ा सशक्त उपन्यास लिखा था- रूई का बोझ...इस पर सुभाष अग्रवाल ने रूई का बोझ नाम से ही 1997 में फिल्म बनाई...नेशनल फिल्म डवलपमेंट कारपोरेशन के सहयोग से बनी इस फिल्म के मुख्य पात्र थे- पकंज कपूर, रीमा लागू, रघुवीर यादव....




इसी फिल्म के कथासार को आप तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं...

परिवार में भाई प्यार के साथ रहते हैं...अक्सर बड़े भाई छोटों के लिए खूब बलिदान करते हैं...छोटे भाई भी बड़े भाई का पिता तुल्य सम्मान करते हैं...लेकिन जैसे जैसे परिवार में भाइयों की शादियां होती जाती हैं, तस्वीर बदलती जाती है...पत्नियां आने पर रिश्तों की वो गरमी महसूस नहीं हो पाती जो लहू के रिश्तों में होती है...


जब तक छोटे भाइयों की शादी नहीं होती वो बड़ी भाभी का मां जैसे सम्मान करते हैं...बड़े भाई के बच्चों पर भी खूब लाड उड़ेलते हैं...लेकिन शादी होने के बाद रिश्तों से ये अपनापन कम होने लगता है...देवरानी-जेठानी को वैसे रिश्ते कायम करने में वक्त लगता है जैसे कि दो भाइयों के बीच शादी से पहले होते हैं...रिश्तों की असली पहचान इसी स्टेज से शुरू होती है...खुदगर्जी के चक्कर में यहां भाइयों में भी दीवार खिंचनी शुरू हो जाती है...चतुर सुजान की तरह छुप कर शह-मात का खेल शुरू हो जाता है...बड़े भाई की पत्नी सोचने लगती है कि उसके पति ने छोटे भाइयों के लिए इतना कुछ किया लेकिन अब वो उन दोनों का वैसा सम्मान नहीं करते जैसा कि उन्हें करना चाहिए...


छोटे भाई की पत्नी महसूस करने लगती है कि उसके पति पर छोटा होने की वजह से घर में सब हुक्म चलाते रहते हैं और उसका कोई सम्मान नहीं है...ऐसे में वो सोचने लगती है कि बड़े भाइयों की पत्नियों के आदेश को वो क्यों हर वक्त माने...अब जब रोज़ घर में ऐसी खिचखिच शुरू हो जाती है तो घर के सबसे बड़े सदस्य यानि पिता सोचते हैं कि अब वक्त आ गया है वो अपनी संपत्ति का बेटों में बंटवारा कर दें...सब अलग-अलग रहें और एक-दूसरे की ज़िंदगी में किसी का दखल न हो...इससे कम से कम सब शांति के साथ तो रह सकेंगे...


पिता संपत्ति का बंटवारा कर देते हैं...लेकिन साथ ही ये सवाल उठता है कि पिता अब कौन से बेटे के साथ रहें...बड़ा भाई अपनी पत्नी से सलाह करता है...बड़े भाई की पत्नी समझाती है कि वो पिता को कैसे साथ रख सकते हैं, उनकी अपनी पांच बेटियां हैं...वो ये भी कहती है कि बाबूजी के सिर्फ हाथ-पैर ही नहीं है, पेट भी है...


मझले बेटे की पत्नी भी उसे राय देती है कि जिंदगी भर के लिए गले में ढोल बांधने से अच्छा है कि एक बार बुराई मोल ले ली जाए...आज बाबूजी चल फिर सकते हैं...कल खटिया भी पकड़ लेंगे...न बाबा न मैं ये सब चक्कर नहीं झेल सकती...


पिता ये सब देखते रहते हैं लेकिन कुछ कहते नहीं...बस अपने बचपन के दोस्त से कहते हैं कि घर में बूढ़ा पिता ही एक ऐसी संपत्ति है जिसे सारे बेटे खुशी-खुशी एक दूसरे को दे देना चाहते हैं...


अगले दिन पिता बेटों से पूछता है कि उन्होंने उसके बारे में क्या फैसला किया...इस पर बड़ा और मझला बेटा जवाब देते हैं कि सबसे छोटे भाई को पिता के मार्गनिर्देशन की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, इसलिए वो उसके साथ ही रहें...पिता सबसे छोटे बेटे के साथ ही रहने लगते हैं...ज़मीन का एक छोटा टुकड़ा अपने पास रखने के अलावा सारी संपत्ति तीनों बेटों में बांट देते हैं...सबसे छोटे बेटे की पत्नी सोचती है ...पूरी बिरादरी में मेरी प्रशंसा होगी कि सबसे छोटी बहू ने ही पिता को साथ रखने के लिए हामी भरी...


छोटे बेटे के साथ रहते हुए शुरू के कुछ दिन तो सब ठीक चलता है...लेकिन फिर...


(जारी है- कल पढ़िएगा दूसरी किस्त)





मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

बुज़ुर्ग बोझ नहीं, अनमोल धरोहर...खुशदीप

आपसे वादा किया था कि आज सुरेश यादव जी का सुनाया प्रेरक प्रसंग आपसे शेयर करूंगा...लीजिए वही प्रसंग...


सुरेश जी के मुताबिक ये जापान की लोककथा है...

जापान के एक राज्य में किसी वक्त क़ानून था कि बुजुर्गों को एक निश्चित उम्र में पहुंचने के बाद जंगल में छोड़ आया जाए...जो इसका पालन नहीं करता था, उसे संतान समेत फांसी की सज़ा दी जाती थी...उसी राज्य में पिता-पुत्र की एक जोड़ी रहती थी...दोनों में आपस मे बहुत प्यार था...उस पिता को भी एक दिन जंगल में छोड़ने का वक्त आ गया...पुत्र का पिता से अलग होने का बिल्कुल मन नहीं था...लेकिन क्या करता...क़ानून तो क़ानून था...न मानों तो फांसी की तलवार पिता-पुत्र दोनों के सिर पर लटकी हुई थी... पुत्र पिता को कंधे पर लादकर जंगल की ओर चल दिया...जंगल के बीच पहुंचने के बाद पुत्र ऐसी जगह रूका जहां पेड़ों पर काफी फल लगे हुए थे और पानी का एक चश्मा भी था...पुत्र ने सोचा कि पिता की भूख-प्यास का तो यहां इतंज़ाम है...रहने के लिए एक झोंपड़ी और बना देता हूं... दो दिन तक वो वहीं लकड़ियां काट कर झोंपड़ी बनाने में लगा रहा...पिता के विश्राम के लिए एक तख्त भी बना दिया...पिता ने फिर खुद ही पुत्र से कहा...अब तुम्हे लौट जाना चाहिए...भरे मन से पुत्र ने पिता से विदाई ली तो पिता ने उसे एक खास किस्म के पत्तों की पोटली पकड़ा दी...


पुत्र ने पूछा कि ये क्या दे रहे हैं..तो पिता ने बताया...बेटा जब हम आ रहे थे तो मैं रास्ते भर इन पत्तों को गिराता आया था...इसलिए कि कहीं तुम लौटते वक्त रास्ता न भूल जाओ...ये सुना तो पुत्र ज़ोर ज़ोर से रोने लगा...अब पुत्र ने कहा कि चाहे जो कुछ भी हो जाए वो पिता को जंगल में अकेले नहीं छोड़ेगा...ये सुनकर पिता ने समझाया...बेटा ये मुमकिन नहीं है...राजा को पता चल गया तो दोनों की खाल खींचने के बाद फांसी पर चढ़ा देगा...पुत्र बोला...अब चाहे जो भी हो, मैं आपको वापस लेकर ही जाऊंगा...पुत्र की जिद देखकर पिता को उसके साथ लौटना ही पड़ा...दोनों रात के अंधेरे में घर लौटे...पुत्र ने घर में ही तहखाने में पिता के रहने का इंतज़ाम कर दिया...जिससे कि और कोई पिता को न देख सके...


पिता को सब खाने-पीने का सामान वो वही तहखाने में पहुंचा देता...ऐसे ही दिन बीतने लगे...एक दिन अचानक राजा ने राज्य भर में मुनादी करा दी कि जो भी राख़ की रस्सी लाकर देगा, उसे मालामाल कर दिया जाएगा...अब भला राख़ की रस्सी कैसे बन सकती है...उस पुत्र तक भी ये बात पहुंची...उसने पिता से भी इसका ज़िक्र किया...पिता ने ये सुनकर कहा कि इसमें कौन सी बड़ी बात है...एक तसले पर रस्सी को रखकर जला दो...पूरी जल जाने के बाद रस्सी की शक्ल बरकरार रहेगी...यही राख़ की रस्सी है, जिसे राजा को ले जाकर दिखा दो..(कहावत भी है रस्सी जल गई पर बल नहीं गए...)...बेटे ने वैसा ही किया जैसा पिता ने कहा था...राजा ने राख़ की रस्सी देखी तो खुश हो गया...वादे के मुताबिक पुत्र को अशर्फियों से लाद दिया गया...


थोड़े दिन बात राजा की फिर सनक जागी...इस बार उसने शर्त रखी कि ऐसा ढोल लाया जाए जिसे कोई आदमी बजाए भी नहीं लेकिन ढोल में से थाप की आवाज़ लगातार सुनाई देती रहे...अब भला ये कैसे संभव था...गले में ढोल लटका हो, उसे कोई हाथ से बजाए भी नहीं और उसमें से थाप सुनाई देती रहे...कोई ढोल वाला ये करने को तैयार नहीं हुआ...ये बात भी उसी पुत्र ने पिता को बताई...पिता ने झट से कहा कि इसमें भी कौन सी बड़ी बात है...पिता ने पुत्र को समझाया कि ढोल को दोनों तरफ से खोल कर उसमें मधुमक्खियां भर दो...फिर दोनों तरफ़ से ढोल को बंद कर दो...अब मधुमक्खियां इधर से उधर टकराएंगी और ढोल से लगातार थाप की आवाज़ आती रहेगी...पुत्र ने जैसा पिता ने बताया, वैसा ही किया और ढोल गले में लटका कर राजा के पास पहुंच गया...ढोल से बिना बजाए लगातार आवाज़ आते देख राजा खुश हो गया...फिर उसे मालामाल किया...लेकिन इस बार राजा का माथा भी ठनका...उसने लड़के से कहा कि तुझे इनाम तो मिल ही गया लेकिन एक बात समझ नहीं आ रही कि क्या पूरे राज्य में अकेला तू ही समझदार है...कुछ राज़ तो है...राज़ बता तो तुझे दुगना इनाम मिलेगा...इस पर लड़के ने कहा कि ये राज़ वो किसी कीमत पर नहीं बता सकता...राजा के बहुत ज़ोर देने पर लड़के ने कहा कि पहले उसे वचन दिया जाए कि उसकी एक मांग को पूरा किया जाएगा...राजा के वचन देने पर लड़के ने सच्चाई बता दी...साथ ही मांग बताई कि उसी दिन से बुज़ुर्गों को जंगल में छोड़कर आने वाले क़ानून को खत्म कर दिया जाए और जो बुज़ुर्ग ऐसे हालत में जंगल में रह भी रहे हैं उन्हें सम्मान के साथ वापस लाया जाए...राजा ने वचन के अनुरूप फौरन ही लड़के की मांग मानते हुए उस क़ानून को निरस्त कर दिया...साथ ही जंगल से सब बुज़ुर्गों को वापस लाने का आदेश दिया...





स्लॉग चिंतन

बुजुर्गों के पास तज़ुर्बे का ख़ज़ाना होता है...हमें उनसे बस सीखना आना चाहिए...ये नहीं कि सीनियर सिटीजन बनते ही बुजुर्गों को हर काम से रिटायर कर दिया जाए...ये कह कर कि आपको नए ज़माने का नहीं पता तो चुप बैठे रहा करो न...बस भगवान में ध्यान लगाया करो....

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

ब्लॉगिंग, सामाजिक सरोकार, छत्तीसगढ़ भवन बैठक...खुशदीप

तारीख- 19 दिसंबर 2010


जगह- दिल्ली के चाणक्यपुरी में छत्तीसगढ़ भवन

वक्त- शाम छह बजे से नौ बजे रात


छत्तीसगढ़ भवन नाम ही काफ़ी है...देश में सबसे बड़ा ब्लॉगगढ़ अगर कहीं है तो वो छत्तीसगढ़ में ही है...इसलिए ललित शर्मा भाई ने दो दिन पहले जब फोन पर बताया कि छत्तीसगढ़ से ब्लॉगिंग के दो योद्धा- अशोक बजाज और बी एस पाबला दिल्ली में हैं और दिल्ली-आसपास के ब्लॉगरों से मिलना चाहते हैं, तो मैं उनसे मिलने के लोभ से खुद को बचा नहीं पाया...रविवार की छुट्टी ने मेरी मुश्किल और आसान कर दी...पाबला जी से तो पहले भी मिलने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका था...अशोक बजाज जी से पहली बार रू-ब-रू होने जा रहा था...पाबला जी से लोकेशन पूछी तो उन्होंने बताया कि चाणक्यपुरी में अमेरिकी दूतावास के पास है छत्तीसगढ़ भवन...

प्रोग्राम का पता चलने के बाद आदत के मुताबिक सीधे सतीश सक्सेना भाई जी को फुनवा घुमाया...पूछा कि चलेंगे जनाब...दरअसल सतीश भाई हामी भर लेते हैं तो मेरा स्वार्थ भी पूरा हो जाता है...एक तो सतीश भाई की गाड़ी पर लिफ्ट मिल जाती है और दूसरा रास्ते में सत्संग भी हो जाता है...लेकिन इस बार सतीश भाई पारिवारिक व्यस्तता और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम की वजह से छत्तीसगढ़ भवन पहुंचने की रज़ामंदी नहीं दे सके...खैर जो भी है मुझे तो पहुंचना ही था...शाहनवाज़ सिद्दीकी के साथ फोन पर तय हुआ कि मेट्रो से चलते हैं...शाहनवाज़ मेरे घर आ गए और दोनों ने वेन्यू के सबसे निकटतम मेट्रो स्टेशन रेसकोर्स के लिेए प्रस्थान किया...

रेसकोर्स स्टेशन से आगे का रास्ता तय करने के लिए ऑटो पकड़ा...दिल्ली का सबसे पॉश इलाका...ऑटो भी बड़ी देर से आ रहे थे...एक आया तो पांच छह सवारी सीधे लपकीं...एक रईसजादा सबसे पहले कूद कर बैठ गया...ऑटो चलाने वाले कोई सिंह साहब थे...मैंने उनसे पूछ ही लिया कि छत्तीसगढ़ भवन कितनी दूर पड़ेगा...उसने कहा, बै जाओ शाह जी छड देना वां...ये देखकर जो सवारी ऑटो में बैठ चुकी थी, वो बिदक गई...उसे शायद डर था कि मैं और शाहनवाज़ कोई लुटेरे हैं और ऑटो वाला भी हमसे मिला हुआ है...और रास्ते में ही उसे लूट लेंगे...वो तो भला हो सिंह ड्राइवर का...उसने सवारी से कहा...साहब जी कम पैसे दे देना...इन्हें भी बैठने दो...तो जनाब उस सवारी को बड़ी मुश्किल से हम पर दया आई और साथ बैठाने के लिए तैयार हुई...ऑटो वाले ने छत्तीसगढ़ भवन तक पहुंचा दिया और बड़े मुनासिब पैसे लिए...ऑटो ड्राइवर बड़ा हंसमुख इनसान था...कहने लगा कि 7 रेसकोर्स रोड पर देश के प्रधानमंत्री रहते हैं और उनकी नाक के नीचे ही रेसकोर्स में दिल्ली के सभी जुआरी (रेस खेलने वाले) इकट्ठे होते हैं...एक स्लॉग ओवर मैंने भी ऑटो ड्राइवर को ऐसा सुनाया कि उसकी तबीयत प्रसन्न हो गई...क्या था वो स्लॉग ओवर, वो फिर कभी...

हां तो जनाब कड़ाके की ठंड में सवा छह बजे के आसपास हम छत्तीसगढ़ भवन पहुंचे...शीशे की दीवार से मुझे दूर से ही पीली पगड़ी में सजे पाबला जी नज़र आ गए...अंदर पहुंचे तो पाबला जी, कुमार राधारमण, रेवा राम यादव जी के साथ बातों में मशगूल थे...पाबला जी ने बताया कि अशोक बजाज जी भी थोड़ी देर में आने वाले हैं...धीरे-धीरे एक दर्जन ब्लॉगर जुट गए...पहले परिचय का दौर चला...फिर पेस्ट्री, पैटीज़, गजक, बर्फी, बिस्किट, चाय...

ब्लॉगिंग के विषय में बात छिड़ी...एग्रीगेटर की दिक्कत से शुरू हुआ बातों का क्रम इस पर पहुंचा कि ब्लॉगर जहां भी रहते हैं वो सामाजिक सरोकार से जुड़ी भी कोई न कोई पहल शुरू करे...क्योंकि ब्लॉगिंग को मौजूदा लेवल से अब ऊपर उठाने की आवश्यकता है...व्यक्तिगत ब्लॉगिंग अपनी संतुष्टि के लिए सही है लेकिन ब्लॉगिंग को आने वाले दिनों में लोकतंत्र का सशक्त माध्यम बनाना है तो सामाजिक पहलुओं को लेकर भी अपनी ज़िम्मेदारी समझी जाए...मैंने वृद्ध कल्याण की मिसाल दी...सबसे पहला काम हम ये कर सकते हैं कि घर के आसपास कोई ओल्ड एज होम या वृद्धाश्रम है तो छुट्टी वाले दिन वहां जाकर एक-दो घंटे बुजुर्गों से बात करें, उनके चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करें...इस मौके पर सुरेश कुमार यादव जी ( अच्छे कवि, दिल्ली नगर निगम में अतिरिक्त उपायुक्त, लेकिन उससे भी पहले बढ़िया इनसान) ने एक प्रेरक प्रसंग सुनाया...वो आपको कल पोस्ट में सुनाऊंगा...फिलहाल बैठक की ही चर्चा...अशोक बजाज जी ने ब्लॉगजगत की ओर से शुरू की जाने वाली सामाजिक सरोकार की किसी भी पहल में बढ़-चढ़ कर योगदान का वादा किया...जनोक्ति के जयराम विप्लव ने समाज के वंचित वर्गों की भलाई के लिए ब्लॉग जगत से आगे आने का आह्वान किया...एक और शख्स से मैं बहुत प्रभावित हुआ...उनका नाम है- कुमार राधारमण...स्वास्थ्य सबके लिए नाम से ब्लॉग चलाते हैं...टिप्पणी वगैरहा की परवाह किए बिना राधारमण जी स्वास्थ्य से जुड़े सभी पहलुओं को पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं...उनके पास गूगल सर्च के ज़रिए बड़ी संख्या में रोज़ पाठक पहुंचते हैं...पदमसिंह जी ने गाज़ियाबाद में भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने वाले एक आज़ाद पुलिसवाले का दिलचस्प वाक्या सुनाया...अविनाश वाचस्पति जी को इस मौके पर हाल में भारत सरकार की ओर से मिले राजभाषा सम्मान के लिए सभी ने बधाई दी...ललित जी फोन के ज़रिए लगातार बैठक से जुड़े रहे...संगीता पुरी जी और अरविंद मिश्र जी के फोन भी आए...दोनों का ही आज जन्मदिन था...इसलिए सभी ने उन्हें बारी-बारी से बधाई दी...बैठक में और कौन-कौन मौजूद था, इस फोटो में देखिए...


संजू तनेजा, राजीव कुमार तनेजा, सुरेश कुमार यादव, पदम सिंह, शाहनवाज़ सिद्दीकी, अविनाश वाचस्पति, कनिष्क कश्यप, अशोक बजाज, खुशदीप सहगल, बीएस पाबला, कुमार राधारमण और जयराम विप्लव


हम सबके अलावा बैठक में एक और सज्जन भी मौजूद थे- रेवा राम यादव...सीपीडब्लूडी में इंजीनियर... वो अशोक बजाज जी के सहपाठी रह चुके हैं...करीब 38 साल बाद दोनों की मुलाकात हुई...रेवा राम जी भी जल्दी ब्लॉगिंग शुरू करने का इरादा रखते हैं...उन्होंने ब्लॉगर्स को अपनी ओर से संदेश दिया...बी पाज़िटिव, बी हैप्पी...आज बस इतना ही, बाकी कल...

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

मुर्गे को गुस्सा क्यों आता है...खुशदीप

क्या मुर्गे को भी गुस्सा आता है...क्यों जनाब मुर्गे को गुस्सा नहीं आ सकता क्या...लीजिए फिर अपनी आंखों से ही देखिए...



मां के हाथों की झुर्रियां और छाले...खुशदीप

पढ़ाई पूरी करने के बाद टॉपर छात्र बड़ी कंपनी में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा....
छात्र ने पहला इंटरव्यू पास कर लिया...फाइनल इंटरव्यू डायरेक्टर को लेना था...डायरेक्टर को ही तय करना था नौकरी पर रखा जाए या नहीं...

डायरेक्टर ने छात्र के सीवी से देख लिया कि पढ़ाई के साथ छात्र एक्स्ट्रा-करिकलर्स में भी हमेशा अव्वल रहा...

डायरेक्टर...क्या तुम्हे पढ़ाई के दौरान कभी स्कॉलरशिप मिली...

छात्र...जी नहीं...

डायरेक्टर...इसका मतलब स्कूल की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे..

छात्र...श्रीमान नहीं, मैं जब एक साल का था, पिता का साया मेरे सिर से उठ गया था...मेरी मां ने ही हमेशा मेरे स्कूल की फीस चुकाई...

डायरेक्टर...तुम्हारी मां काम क्या करती है...

छात्र...जी वो लोगों के कपड़े धोती है...

ये सुनकर डायरेक्टर ने कहा...ज़रा अपने हाथ दिखाना...

छात्र के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे...

डायरेक्टर...क्या तुमने कभी मां की कपड़े धोने में मदद की...

छात्र...जी नहीं, मेरी मां हमेशा यही चाहती रही है कि मैं स्टडी करूं और ज़्यादा से ज़्यादा किताबें पढ़ूं...हां एक बात और, मेरी मां मुझसे कहीं ज़्यादा स्पीड से कपड़े धोती है...

डायरेक्टर...क्या मैं तुमसे एक काम कह सकता हूं...

छात्र...जी, आदेश कीजिए...

डायरेक्टर...आज घर वापस जाने के बाद अपनी मां के हाथ धोना...फिर कल सुबह मुझसे आकर मिलना...

छात्र ये सुनकर प्रसन्न हो गया...उसे लगा कि जॉब मिलना पक्का है, तभी डायरेक्टर ने कल फिर बुलाया है...

छात्र ने घर आकर खुशी-खुशी मां को ये बात बताई और अपने हाथ दिखाने को कहा...

मां को थोड़ी हैरानी हुई...लेकिन फिर भी उसने बेटे की इच्छा का मान करते हुए अपने दोनों हाथ उसके हाथों में दे दिए...छात्र ने मां के हाथ धीरे-धीरे धोना शुरू किया...साथ ही उसकी आंखों से आंसू भी झर-झर बहने लगे...मां के हाथ रेगमार की तरह सख्त और जगह-जगह से कटे हुए थे...यहां तक कि कटे के निशानों पर जब भी पानी डलता, चुभन का अहसास मां के चेहरे पर साफ़ झलक जाता था...



छात्र को ज़िंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि ये वही हाथ है जो रोज़ लोगों के कपड़े धो-धोकर उसके लिए अच्छे खाने, कपड़ों और स्कूल की फीस का इंतज़ाम करते थे...मां के हाथ का हर छाला सबूत था उसके एकेडमिक करियर की एक-एक कामयाबी का...मां के हाथ धोने के बाद छात्र को पता ही नहीं चला कि उसने साथ ही मां के उस दिन के बचे हुए सारे कपड़े भी एक-एक कर धो डाले...

मां रोकती ही रह गई, लेकिन छात्र अपनी धुन में कपड़े धोता चला गया...

उस रात मां-बेटा ने काफ़ी देर तक बात की...

अगली सुबह छात्र फिर जॉब के लिए डायरेक्टर के ऑफिस में था...डायरेक्टर का सामना करते हुए छात्र की आंखें गीली थीं...

डायरेक्टर...हूं तो फिर कैसा रहा कल घर पर...क्या तुम अपना अनुभव मेरे साथ शेयर करना पसंद करोगे....

छात्र...
नंबर एक... मैंने सीखा कि सराहना क्या होती है...मेरी मां न होती तो मैं पढ़ाई में इतनी आगे नहीं आ सकता था...

नंबर दो... मां की मदद करने से मुझे पता चला कि किसी काम को करना कितना सख्त और मुश्किल होता है...

नंबर तीन...मैंने रिश्ते की अहमियत पहली बार इतनी शिद्धत के साथ महसूस की...

डायरेक्टर...यही सब है जो मैं अपने मैनेजर में देखना चाहता हूं...मैं उसे जॉब देना चाहता हूं जो दूसरों की मदद की कद्र करे, ऐसा व्यक्ति जो काम किए जाने के दौरान दूसरों की तकलीफ भी महसूस करे. ऐसा शख्स जिसने सिर्फ पैसे को ही जीवन का ध्येय न बना रखा हो...मुबारक हो, तुम इस जॉब के पूरे हक़दार हो...

डायरेक्टर का फैसला बिल्कुल सही था...छात्र ने जॉब मिलने के बाद खून-पसीना एक कर दिया...हर एक की मदद के लिए सबसे आगे रहने वाले युवा मैनेजर ने पूरे स्टॉफ को अपना मुरीद बना लिया...हर कोई उसका सम्मान करने लगा और टीमवर्क में अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करने लगा...नतीजा कंपनी ने पहले के मुकाबले और दुगनी रफ्तार से तरक्की करना शुरू कर दिया...


स्लॉग चिंतन
एक बच्चा जिसे पूरा लाड प्यार मिलता है...जो भी चीज़ मांगता है उसे मिल जाती है...यही उसमें खुदगर्ज़ी लाना शुरू कर देता है...हर चीज़ में वो अपनी इच्छा को ही सबसे पहले रखना शुरू कर देता है...बिना ये समझे कि उसके माता-पिता उसे बढ़ा करने के लिए कैसे दिन-रात एक करते रहते हैं...जब वो बच्चा बड़ा होकर खुद काम करना शुरू करता है तो चाहता है कि हर कोई उसकी सुने...जब वो मैनेजर बन जाता है तो अपने मातहतों की तकलीफ की कभी नहीं सोचता बल्कि उनको हर वक्त दोष देता रहता है...ऐसे शख्स बेशक पढ़ाई में कितने भी अव्वल क्यों न रहे हों, कितने भी ऊंचे ओहदे पर क्यों न हो, लेकिन उन्हें कुछ पाने का अहसास कभी नहीं हो सकता...वो बस द्वेष और शक में ही जलते हुए जीवन में और...और...और के पीछे भागते रहते हैं....अगर हम बच्चों को इस हाल में ले आने वाले माता-पिता हैं तो हमारा ये व्यवहार उनके लिए अमृत है या विष...ये हमें ही सोचना है...


आप अपने बच्चों को बड़ा मकान दें, बढ़िया खाना दें, बड़ा टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब कुछ दें...लेकिन साथ ही घास काटते हुए बच्चों को उसका भी अपने हाथों से फील होने दें...खाने के बाद कभी बर्तनों को धोने का अनुभव भी अपने साथ घर के सब बच्चों को मिलकर करने दें...ऐसा इसलिए नहीं कि आप मेड पर पैसा खर्च नहीं कर सकते, बल्कि इसलिए कि आप अपने बच्चों से सही प्यार करते हैं...आप उन्हें समझाते हैं कि मां-बाप कितने भी अमीर क्यों न हो, एक दिन उनके बाल सफेद होने ही हैं...सबसे अहम हैं आप के बच्चे किसी काम को करने की कोशिश की कद्र करना सीखें...एक दूसरे का हाथ बंटाते हुए काम करने का जज्ब़ा अपने अंदर लाएं...यही है सबसे बड़ी सीख...

(चीनी कथा का अनुवाद)

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

गधा काम का, कुत्ता बस नाम का...खुशदीप

कभी किसी गधे को ध्यान से देखिएगा...वाकई उसके जैसा भोला, शरीफ़ और दीनहीन आपको और कोई प्राणी नहीं दिखेगा...गधे पर पिछले साल 20 दिसंबर को एक पोस्ट लिखी थी...आज फिर किसी ने गधे की व्यथा सुनाई तो इस भोले प्राणी का शिद्दत से ध्यान आ गया...लीजिए आप भी सुनिए गधे की दिल को हिला देने वाली ये गाथा-



एक फॉर्महाउस के मालिक ने गधा और कुत्ता पाल रखा था...गधा पूरे दिन फॉर्महाउस में काम पर गधे की तरह जुटा रहता...कुत्ता खाता-पीता और इधर-उधर मौज मस्ती करता रहता...बस इसी तरह दिन बीत जाता...रात को घर पर आते तो कुत्ता लंबी तान कर सो जाता...गधा तो बेचारा दिन भर पिस कर आता ही था, जल्दी ही उसे भी नींद आ जाती...

एक दिन रात को सोते हुए गधे ने घर के बाहर खटपट सुनी तो उसकी नींद खुल गई...गधे ने देखा, साथ ही कुत्ता ज़ोर से खर्राटे मार रहा था...गधे ने कुत्ते को जगाने की कोशिश की और कहा...लगता है बाहर चोर आए हुए हैं...तेरा काम चौकीदारी का है और तू भौंकने की जगह मज़े से सो रहा है...कु्त्ते ने आंख बंद किए हुए ही गधे से कहा....गधे के बच्चे, चुपचाप सोजा...मेरी नींद खराब मत कर...कुछ नहीं होगा...अब गधा तो ठहरा बेचारा मालिक का वफ़ादार...गधे ने ढेंचू-ढेंचू करना शुरू कर दिया...घर का मालिक थोड़ी देर ढेंचू-ढेंचू बर्दाश्त करता रहा, फिर आकर गधे के ज़ोर की लात मारी और बोला...तू रहा गधे का गधा ही, बिना बात रात को शोर मचा रहा है...

अगले दिन मालिक जगा तो उसे पता चला कि कॉलोनी में एक उसके घर को छोड़कर बाकी सभी घरों में चोरी हो गई थी...मालिक को एहसास हुआ कि गधे के शोर मचाने से ही उसका घर चोरों से बचा रहा...वो फौरन गधे के पास आकर बोला...शाबाश...आज तूने मेरे नमक का कर्ज़ अदा कर दिया...तू तो चौकीदारी का काम भी बड़ी अच्छी तरह कर लेता है...आज से तू दिन मे फॉर्महाउस पर काम करने के साथ रात को घर की चौकीदारी भी करेगा...ये कुत्ता तो किसी काम का नहीं है, इस पर मैं कोई भरोसे वाला काम नहीं छोड़ सकता....




स्लॉग ओवर

ऊंट और आदमी का फ़र्क...

ऊंट हफ्ते भर बिना पानी पिए काम करता रह सकता है...

आदमी हफ्ते भर बिना काम किए पीता रह सकता है...

(बस पानी सोमरस में मिला हुआ हो)

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

नीरा राडिया के बारे में जो आप नहीं जानते...खुशदीप

पप्पू, मुन्नी, शीला के गानों ने हक़ीक़त में जितने पप्पू, मुन्नी, शीला है, बिना बात उनकी नाक में दम कर दिया...कई बार असल ज़िंदगी में भी कुछ लोग इतने बड़े खलनायक या खलनायिका हो जाते हैं कि उनके ऊपर बच्चों का नाम ही रखना बंद हो जाता है...ये एक स्वाभाविक प्रक्रिया है...आपने गौर किया होगा कि देश में हाल में उजागर हुए दो बड़े घोटालों में महिलाओं का नाम आया...नीरा राडिया और नीरा यादव...कॉरपोरेट लॉबिंग की क्वीन नीरा राडिया ने टू जी स्पेक्ट्रम में ऐसा जलवा दिखाया कि पावरफुल से पावरफुल हस्तियां भी उनके सामने घुटनों के बल रेंगती नज़र आईं...क्या कॉरपोरेट, क्या सियासत और क्या मीडिया...हर जगह नीरा राडिया ने अपने पपलू फिट किए हुए थे...

दूसरी महिला यूपी की पूर्व नौकरशाह नीरा यादव हैं...नीरा यादव ने नोएडा की सर्वेसर्वा रहते सोना उगलने वाली ज़मीन अपने चहेतों और उद्योगपतियों को कौड़ियों के दाम ऐसे बांटी कि सारे नियम-कायदे ताक पर धरे रह गए...नीरा राडिया के ठिकानों पर सीबीआई छापेमारी कर रही है...नीरा यादव को सीबीआई की विशेष अदालत ने चार साल की सज़ा सुनाकर जेल भेज दिया...लेकिन नीरा यादव को चार दिन में ही हाईकोर्ट से ज़मानत मिल गई...

आज की पोस्ट के शीर्षक के मुताबिक अब मैं आपको नीरा राडिया के बारे में बताता हूं...



पचास साल से ऊपर की नीरा राडिया की कहानी भारत से बहुत दूर केन्या में जन्म लेने से शुरू होती है...सत्तर के दशक में नीरा राडिया केन्या से लंदन पहुंची...उत्तरी लंदन के फाइव स्टार स्कूल हेबरडैशर से नीरा ने स्कूली पढ़ाई पूरी की...फिर वारविक यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया...इंग्लैंड के गुजराती मूल के कारोबारी जनक राडिया से नीरा ने शादी की..ये रिश्ता लंबा नहीं चला और नीरा राडिया नब्बे के दशक के मध्य में भारत आ गईं...यहां नीरा ने सहारा की लायज़न आफिसर के तौर पर करियर की शुरुआत की...इसके बाद नीरा सिंगापुर एयरलाइंस, केएलएम और यूके इंटरनेशनल जैसी एयरलाइंस के लिए भारत में प्रतिनिधि के तौर पर काम करने लगीं...ये वही दौर था जब एविएशन सेक्टर को निजी एयरलाइंस के लिए खोलने की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी....मोबाइल ने भी भारत में तेजी से पैर पसारने शुरू कर दिए थे...

यहीं से नीरा राडिया को आगे बढ़ने की राह दिखने लगी...कई इंटरनेशनल एयरलाइंस की प्रतिनिधि होने की वजह से नीरा राडिया ने सिविल एविएशन मंत्रालय में अपने काम के मोहरे ढूंढने शुरू किए...इन्हीं तार को पकड़ते-पकड़ते नीरा की सत्ता के गलियारों में पैठ होने लगी...नब्बे के दशक का आखिर आते-आते एनडीए की केंद्र की सत्ता पर मज़बूत पकड़ हो गई थी...ऐसी रिपोर्ट भी मीडिया में आ चुकी हैं कि नीरा ने उस दौर में आगे बढ़ने के लिए बीजेपी नेता अनंत कुमार और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दत्तक दामाद रंजन भटटाचार्य का सहारा लिया...कहा तो ये भी जाता है कि नीरा राडिया का सन 2000 में हौसला इतना बढ़ चुका था कि वो क्राउन एयर के नाम से अपनी एयरलाइंस बनाने के लिए ही हाथ-पैर मारने लगी थीं....वो सपना बेशक पूरा नहीं हुआ लेकिन नीरा राडिया ने इक्कीसवीं सदी की शुरुआत के साथ ही कॉरपोरेट लायज़निंग में वो हुनर दिखाना शुरू किया कि बड़े से बड़े कॉरपोरेट घराने नीरा की कंपनी की सेवाएं लेने लगे...





नीरा ने 2001 में वैष्णवी कॉरपोरेट कम्युनिकेशन्स के नाम से अपनी कंपनी की शुरुआत की...फिर इसमें नोएसिस, विटकॉम और न्यूकॉम कंसल्टिंग जैसी कंपनियां भी जुड़ती गईं...सत्ता के गलियारों से तार जोड़ने का कमाल ही था कि 2001 में नीरा राडिया को टाटा ग्रुप की नब्बे कंपनियों के एकाउंट्स मिल गए...2008 आते-आते कॉरपोरेट के एक और महारथी मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंड्रस्ट्रीज़ लिमिटेड भी नीरा राडिया के क्लाइंट्स की फेहरिस्त से जुड़ गई...


नीरा राडिया ने अपने क्लाइंट्स के लिए सत्ता के गलियारों मे ऐसी बढि़या लायज़निंग दिखाई कि कॉरपोरेट सेक्टर में इन क्लाइंट्स के प्रतिद्वंद्वियों को अपने लिए खतरा महसूस होने लगा...ऐसे ही किसी प्रतिद्वंद्वी की ओर से नीरा राडिया की नौ साल में जमा की गई अकूत दौलत का ब्यौरा चिट्ठी के तौर पर वित्त मंत्रालय तक पहुंचा...उस वक्त वित्त मंत्री पी चिदंबरम थे...खैर नीरा राडिया के फोन टैप किए जाने लगे....आज वही टेप बम बनकर एक से बड़े एक धमाके कर रहे हैं...कभी मीडिया के सम्मानित माने जाने वाले चेहरों का असली सच दुनिया के सामने आ रहा है...तो कभी ये हकीकत सामने आ रही है कि कैबिनेट में मंत्री बनाने का विशेषाधिकार बेशक प्रधानमंत्री का बताया जाता हो लेकिन ए राजा को तमाम विरोध के बावजूद कॉरपोरेट-मीडिया-राजनीति का शक्तिशाली गठजोड़ दूरसंचार मंत्री बनाने की ठान ले तो वो मंत्री बन कर ही रहते हैं...मंत्री ही नहीं बनते बल्कि खुल कर अपनी मनमानी भी करते हैं..यहां तक कि प्रधानमंत्री की सलाह भी उनके लिए कोई मायने नहीं रह जाती है...यानि नीरा राडिया का सिस्टम प्रधानमंत्री के सरकारी और सोनिया गांधी के राजनीतिक सिस्टम से भी ऊपर हो जाता है...शायद यही वजह है कि अपनी साख बचाने के लिए प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी को नीरा राडिया, राजा और उनके करीबियों के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापे डलवाने पड़ रहे हैं...लेकिन ये साख तभी बचेगी जब जनता के लूटे गए करीब दो लाख करोड़ रुपये को सूद समेत गुनहगारों से वसूल किया जाए...साथ ही सत्ता के दलालों को ऐसी सख्त सज़ा दी जाए कि दोबारा कोई नीरा राडिया, राजा, प्रदीप बैजल, बरखा दत्त, प्रभु चावला, वीर सांघवी बनने की ज़ुर्रत न कर सके...और अगर ऐसा नहीं होता तो फिर छापों की इस पूरी कवायद को हाथी निकल जाने के बाद लकीर पीटने की कवायद ही माना जाएगा....

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

मंदिर में लड़कियों-महिलाओं के प्रवेश पर रोक क्यों...खुशदीप

मैं नहीं जानता कि हिंदी ब्लॉग पर पहले ये मुद्दा कभी उठा है या नहीं...लेकिन मुझे इसमें व्यापक विमर्श की संभावना दिख रही है...ये मुद्दा एक मंदिर में भगवान की मूर्ति को एक महिला के छूने के दावे से मचे विवाद को लेकर है...बात यहां केरल के मशहूर सबरीमाला मंदिर की हो रही है...इस मंदिर के नियमों के अनुसार यहां 10 साल से लेकर 50 साल की लड़कियों और महिलाओं के प्रवेश पर मनाही है...

सबरीमाला मंदिर

लेकिन जून 2006 में मशहूर कन्नड अभिनेत्री जयमाला के एक दावे से सबरीमाला मंदिर प्रशासन समेत पूरे केरल में बवाल मच गया था...जयमाला  के मुताबिक उन्होंने युवावस्था में 1986 में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश कर भगवान अयप्पा की मूर्ति को छुआ था...यानि तीर्थस्थल के नियमों का सरासर उल्लंघन किया था और जिसके लिए वो प्रायश्चित करना चाहती हैं...


जयमाला


आज यानि 14 दिसंबर 2010 को पठानीमिट्ठा ज़िले के रन्नी में फर्स्ट क्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की कोर्ट में केरल पुलिस ने जयमाला के खिलाफ़ चार्जशीट दाखिल की...पुलिस ने जयमाला पर जानबूझकर तीर्थस्‍थल के नियमों का उल्‍लंघन करते हुए लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया...50 साल की जयमाला इस मामले में तीसरे नंबर की आरोपी हैं...जयमाला के अलावा एक ज्‍योतिषी पी उन्‍नीकृष्‍णन और उसके सहयोगी रघुपति के भी चार्जशीट में नाम हैं...तीनों के खिलाफ़ आईपीसी की धारा 295 के तहत मुकदमा दायर किया गया है...जयमाला के खिलाफ आरोप साबित हो जाते हैं तो उन्हें तीन साल तक की कैद हो सकती है...

जयमाला  ने मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर भगवान अयप्पा की मूर्ति को छूने का दावा फैक्स के ज़रिए उसी वक्त किया था जब ज्योतिषी उन्नीकृष्णन जून 2006 में इस बात पर ज़ोर दे रहा था कि मंदिर में पूजा और धार्मिक अनुष्ठान विधि विधान से नहीं कराए जा रहे हैं...साथ ही पुजारियों की ओर से मंदिर की गरिमा का सही ढंग से पालन नहीं किया जा रहा है...उन्नीकृष्णन का दावा था कि उसे 'देवप्रसन्‍नम’ (मंदिर मामलों की दैवीय शक्ति से जांच) से पता चला है कि एक युवा महिला भगवान अयप्पा की मूर्ति छू चुकी है...अंत मंदिर के व्यापक शुद्धीकरण की जरूरत है....

जयमाला के बयान पर बवाल मचने के बाद केरल सरकार ने मामले की जांच क्राइम ब्रांच से कराए जाने के आदेश दिए... जांच के दौरान पुलिस ने जयमाला से पूछताछ भी की... जांच अधिकारियों के मुताबिक जयललिता ने ज्योतिषी और उसके सहयोगी के साथ मिलकर साज़िश के तहत भगवान अयप्पा की मूर्ति को छूने का दावा किया था...इनका उद्देश्य मंदिर प्रबंधन की छवि को बिगाड़ कर उन्नीकृष्णन के ज्योतिष को चमकाना था...दरअसल 2000 में जयमाला अपने घर पर एक धार्मिक अनुष्ठान के दौरान उन्नीकृष्णन की सेवाएं ले चुकी थीं...और तभी से उसके प्रभाव में थीं...

बीते जमाने की अभिनेत्री जयमाला कन्नड़ के साथ तमिल, तेलुगु और हिंदी की कुछ फिल्मों में काम कर चुकी हैं, 2008 में कर्नाटक फिल्‍म चैम्‍बर ऑफ कॉमर्स की पहली महिला प्रेसिडेंट होने का गौरव हासिल करने वाली जयमाला भारतीय फिल्‍म इंडस्‍ट्री की एकमात्र ऐसी हीरोइन हैं जिन्‍हें किसी विषय पर थीसिस लिखने के लिए डॉक्‍टरेट की उपाधि से सम्‍मानित किया गया...जयमाला को यह उपाधि बेंगलूर यूनिवर्सिटी की ओर से तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति डॉ. ए पी जे कलाम के हाथों मिली थी...

आपने ये पूरा मामला जान लिया...जयमाला, ज्योतिषी उन्नीकृष्णन और उनका सहयोगी रघुपति आरोप सिद्ध हो जाने पर अपने किए की सज़ा भी भुगतेंगे...लेकिन यहां मेरा प्रश्न दूसरा है...

हम इक्कीसवीं सदी मे जी रहे हैं और हमारे देश में अब भी ऐसे मंदिर हैं जहां लड़कियों और महिलाओं को सिर्फ उनकी उम्र की वजह से प्रवेश के लिए मनाही है...हिंदू मान्यताओं की ये बात मान भी ली जाए कि महीने के कुछ खास दिनों में महिलाएं मंदिर नहीं जा सकती या पूजा अर्चना नहीं कर सकती...पर हमेशा के लिए 10 से 50 साल की लड़कियों और महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर रोक...क्या परंपरा के नाम पर ऐसे नियम उचित है...क्या ऐसी प्रथाएं बदलने की आवश्यकता नहीं है...उम्मीद है कि इस मुद्दे पर आप सभी खुल कर अपनी राय व्यक्त करेंगे...





मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

बेचारा मर्द...खुशदीप

आज आपको इस माइक्रोपोस्ट से यक़ीन हो जाएगा कि मर्द बेचारे कितने बेचारे होते हैं...



मसलन...

अगर औरत पर हाथ उठाये तो : ज़ालिम

औरत से पिट जाये तो  : बुज़दिल

चुप रहे तो :  बेगैरत

घर से बाहर रहे तो : आवारा

घर में रहे तो : नकारा

बच्चों को डाटें तो : बेरहम

न डाटें तो : लापरवाह

पत्नी को नौकरी से रोके तो : शक्की-मिज़ाज

न रोके तो : पत्नी की कमाई खानेवाला

मां की माने तो : मां दा लाडला

पत्नी की सुने तो : जोरू का गुलाम

न जाने कब आएगा : Happy Mens Day ?

मुझे लगता है कि यहां तक पढ़ने के बाद मर्द डिप्रैशन में आना शुरू हो गए होंगे...

अब उनके डिप्रैशन को दूर करने के लिए परम श्रद्धेय बाबा खुशवंत सिंह जी के कॉलम से आभार लिया स्लॉग ओवर सुनाता हूं...


स्लॉग ओवर

जितने भी वफ़ादार पति होते हैं, मरने के बाद सीधे स्वर्ग में जाते हैं...

और जो पति वफ़ादार नहीं होते यानी नॉटी होते हैं वो...

...



...



...



जीते जी ही स्वर्ग धरती पर ले आते हैं...

(वैधानिक चेतावनी...मर्द अपने जोखिम पर इस स्लॉग ओवर के पालन की सोचें...वैसे बचेंगे तब सोचेंगे न..)

(विशुद्ध हास्य)

रविवार, 12 दिसंबर 2010

मेरे जीवन के दो सबसे अनमोल घंटे...खुशदीप

हमने देखी है, उन आंखों की महकती खुशबू,


हाथ से छूके इसे, रिश्तों का इल्जाम ना दो,


सिर्फ एहसास है ये, रूह से इसे महसूस करो...


आज गाने की  ये पंक्तियां सतीश सक्सेना भाई की पोस्ट पर एक कमेंट के तौर पर की थी...लेकिन आज इन पंक्तियों को मैंने जिया भी...कैसे भला...वो ऐसे...


तारीख- 12 दिसंबर 2010

वक्त- दोपहर पौने 12 से पौने 2 बजे तक

जगह- नई दिल्ली रेलवे स्टेशन

पात्र- गुरुदेव समीर लाल समीर और मैं

गवाह-साधना भाभी, बेटा अनुपम और लाल परिवार के सम्मानित सदस्य

घटना-गुरुदेव से साक्षात मिलने की शिष्य की इच्छा पूरी होना



गुरुदेव समीर जी के साथ मुझे करीब दो घंटे बिताने का सौभाग्य मिला...समीर जी परिवार के साथ देहरादून में विवाह अटैंड करके जबलपुर लौट रहे थे...नई दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन बदलने के लिए उनका दो घंटे का हाल्ट था...अब उनके सानिध्य में मैंने कैसा महसूस किया, इसे शब्दों में उतार पाने की न तो मेरी सामर्थ्य है और न ही हिम्मत...मेरे जीवन के इन दो सबसे अनमोल घंटों का एहसास बस रूह से ही महसूस किया जा सकता है...आशा है मैं इस एहसास को इतने कम शब्दों के साथ ही आप सब तक पहुंचा सका हूंगा...

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

'मूर्ख' को भारत सरकार सम्मानित करेगी...खुशदीप

अब जितने भी तथाकथित बुद्धिजीवी है, उन्हें इस शीर्षक ने ज़रूर कचोटा होगा...शायद लबों से ये गीत भी निकल गया होगा...हाय राम, मूर्खों का है ज़माना...अब जिन 'मूर्ख जी' का यहां उल्लेख किया है, उन्होंने स्वयंभू की तरह खुद को 'मूर्ख' घोषित किया है...बिना किसी रिजर्वेशन मूर्खों के अतिविशिष्ट समुदाय में एंन्ट्री के विरोध में देश भर में आंदोलन होने लगे तो कोई बड़ी बात नहीं...जेपीसी की तरह संसद में भी ये मुद्दा उछल सकता है...एक चतुर सुजान का मूर्खों के हक पर डाका डालना, वाकई घोर कलयुग है...ऊपर से तुर्रा ये कि महाशय इधर अपने मूर्ख होने का डंका बजाएं और लगे हाथ भारत सरकार इन्हें सम्मानित करने की घोषणा भी कर दे...

अब तो ये सब जानकर मेरा खुद ही संघर्ष के दिलीप कुमार की तरह गाना गाने का मन कर रहा है...

कोई मुझको भी मूर्ख बना दे तो फिर मेरी चाल देख ले...

आप भी सोच रहे होंगे, एक अप्रैल तो अभी काफी दूर है, फिर मैं क्यों ये मूर्ख-मूर्ख की रट लगाने लगा...चलिए अब सस्पेंस को ताक पर राख कर आपको हक़ीक़त बता ही देता हूं...




भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 29 नवंबर 2010 को अपने पत्र के ज़रिए ऐसी सूचना दी है जिसे जानकार पूरा ब्लॉग जगत खुद को गौरान्वित समझेगा...हिंदी के उत्थान में विशिष्ट योगदान के लिए अविनाश वाचस्पति भाई को वर्ष 2008-09 के हिंदी साहित्य सम्मान के लिए चुना गया है...अविनाश भाई ये पुरस्कार 15 दिसंबर 2010 को अपराह्न साढ़े तीन बजे सूचना और प्रसारण सचिव के हाथों ग्रहण करेंगे...पुरस्कार समारोह दिल्ली में शास्त्री भवन के प्रथम तल पर स्थित सूचना कार्यालय के सम्मेलन हॉल में होगा...राजभाषा विभाग की निदेशक प्रियम्वदा ने अविनाश जी को सम्मान दिए जाने की सूचना दी है...

नाम में क्या रखा है, ज़रा इन दो बहनों से पूछिए...खुशदीप

नाम में क्या रखा है...मरहूम शेक्सपीयर चचा आज ज़िंदा होते, फिर ये बात कह कर देखते...नाम में क्या रखा है, ये जानना है तो ठाणे की दो सगी बहनों से पूछो...ये दोनों गिरी बहनें आजकल घर से पैर भी बाहर नहीं निकालती...क्यों नहीं निकालती...एक का नाम मुन्नी है तो दूसरी का नाम शीला...जहां जाती हैं, वहां इन्हें देखकर बस...मुन्नी बदनाम हुई.... और...शीला की जवानी...का बैंड बजने लग जाता है...दोनों इतनी परेशान है कि दोनों को अपने नाम से ही नफ़रत हो गई है...मुन्नी गिरी 35 साल की है और शीला 27 साल की...दोनों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि नाम को लेकर ऐसी मुसीबत का सामना करना पड़ेगा...

                          
                                                                 मुन्नी और शीला

छेड़ने वालों ने इस कद्र नाक में दम कर दिया कि दोनों कल सरकारी गज़ेट आफिसर के पास नाम बदलवाने के लिए पहुंच गईं...मुन्नी अब सीमा बनना चाहती है तो शीला ने अपने लिए शीतल नाम चुना है...दोनों बहनें शादीशुदा हैं...मुन्नी ठाणे ईस्ट के कोपरी में और शीला ठाणे वेस्ट के नौपाडा में रहती है...

शीला को अब तक अपनी बहन मुन्नी से ही सुनने को मिलता था कि एक गाने ने उसे किस मुसीबत में डाल रखा है...शीला को अब खुद उसी हालात से गुजरना पड़ रहा है...शीला का कहना है कि औरों के लिए ये मज़ाक हो सकता है लेकिन इन गानों ने दोनों बहनों का जीवन नर्क बना दिया है...

शीला अब अपने बेटे को पहले की तरह स्कूल छोड़ने भी नहीं जा पाती...वहां बच्चे देखते ही गाना शुरू कर देते हैं...शीला और बेटे दोनो के लिए ये बड़ा शर्मसार कर देने वाला होता है...मुन्नी और शीला दोनों को शिकायत है कि उन्हें बिना कोई कसूर किए ये किस बात की सज़ा मिल रही है...दोनों बहनों को मीडिया पर मुन्नी और शीला की तुलना किए जाने पर भी बेहद गुस्सा है...कई जगह तो बाकायदा वोटिंग कराई जा रही है कि कौन ज़्यादा पापुलर है मुन्नी या शीला...

दोनों बहनों को जानने वालो से एसएमएस और ई-मेल पर मुन्नी और शीला के चुटकुले भी खूब मिल रहे हैं...मुन्नी का कहना है कि पता नहीं लोग क्या सोच कर उन्हें ये एसएमएस भेजते हैं, लेकिन उन्हें इनमें सेंस ऑफ ह्यूमर की जगह मानसिक दीवालियापन ज़्यादा नज़र आता है...मुन्नी की 10 साल की बेटी का इसी बात को लेकर स्कूल-कॉलोनी के बच्चों से कई बार झगड़ा भी हो चुका है...मुन्नी के पति निर्मल गिरी पत्नी के सम्मान से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ अदालत जाने का मन बना रहे हैं...निर्मल गिरी के मुताबिक गानों ने मुन्नी और शीला नाम को इतना चीप बना दिया है कि अब भविष्य में कोई भी मां-बाप बच्चों का ये नाम रखने से कतराएंगे...

वाकई मुन्नी और शीला की शिकायत वाजिब है...बॉलीवुड वाले तो इन नामों पर गानों को सुपरहिट बना कर चांदी कूट रहे हैं...लेकिन मुन्नी और शीला के कानों पर ये गाने जो हथौड़े सी चोट कर रहे हैं, उसकी फिक्र कौन करेगा...क्या सेंसर बोर्ड या सरकार को नहीं चाहिए कि गानों में जिंदा व्यक्तियों के प्रचलित नामों के इस्तेमाल की हर्गिज इजाजत न दी जाए...फिर कोई मुन्नी या शीला दिक्कत में न पड़े...हमारे कहने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा...फर्क पडे़गा अगर इस मुद्दे पर कोई अदालत का दरवाज़ा जाकर खटखटाए...दिनेशराय द्विवेदी सर से जानना चाहूंगा कि इस मुद्दे पर क्या पहल की जा सकती है....

आज के फिल्मकारों को इस मामले में बीते हुए कल से सीख लेनी चाहिए...गाने का पाज़िटिवली भी इस्तेमाल किया सकता है...यकीन नहीं आता तो राज कपूर साहब का ये गीत सुनिए...

मेरा नाम राजू, घराना अनाम...

है न राजू शब्द का सटीक चुनाव....थ्री चियर्स फॉर राज कपूर साहब...

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

प्रेग्नेंसी में मोबाइल से दूर ही रहना अच्छा...खुशदीप

भारत में मोबाइल धारकों की संख्या 30 सितंबर 2010 को 68 करोड़ 77 लाख थी...ये आंकड़ा तेज़ी से बढ़ता ही जा रहा है...2001 में हमारे देश में पचास लाख से भी कम मोबाइल सब्सक्राइबर्स थे...अगले पांच साल में देश के हर दस लोगों में से 7 के पास मोबाइल होगा...अब मोबाइल होगा तो बात भी होगी...ज़रूरी बात हो या गपशप मोबाइल साथ देगा ही...और अगर प्रेग्नेंसी में 'would be mothers' को आराम की सलाह दी गई हो तो टाइम पास करने के लिए मोबाइल पर बतियाना और भी बढ़ जाता है...ऐसा करने वाली महिलाएं सावधान...प्रेग्नेंसी में मोबाइल का जितना कम इस्तेमाल होगा, दुनिया में आने वाले बच्चे पर उतना ही बड़ा एहसान रहेगा...

ये मैं नहीं कह रहा, अमेरिका में हुए एक शोध के नतीजे बता रहे हैं...



कैलिफोर्निया और साउथ कैलिफोर्निया की यूनिवर्सिटीज़ की ओर से कराए गए शोध के मुताबिक अगर कोई महिला प्रेगनेंसी के वक्त मोबाइल पर ज़्यादा बात करती है...और जो बच्चा जन्म लेता है वो खुद भी सात साल की उम्र के आते-आते मोबाइल का इस्तेमाल शुरू कर देता है, तो उस बच्चे में स्वभावगत खामियां (behavioural problems) आने का खतरा कहीं ज़्यादा बढ़ जाता है...पहले 13,000 और फिर 29,000 किशोरों पर कराए गए सर्वे के आधार पर शोध के नतीजे निकाले गए हैं...

'Journal of Epidemiology and Community Health' में छपे शोध के मुताबिक जिन बच्चो का गर्भ के दौरान मोबाइल से एक्सपोज़्रर रहता है, साथ ही जन्म लेने वाला बच्चा अगर जल्दी ही मोबाइल का इस्तेमाल शुरू कर देता है...तो ऐसे बच्चों में से 50 फीसदी में एबनार्मेल्टी या स्वभाव से जुड़ी समस्याएं होने का खतरा रहता है...और जो बच्चे सिर्फ गर्भ में ही मां के ज़रिए मोबाइल के दुष्प्रभाव में आते हैं लेकिन खुद छोटी उम्र में मोबाइल का इस्तेमाल शुरू नहीं करते, ऐसे बच्चों में 30 फीसदी बिहेवियरल फाल्ट का ज्यादा खतरा रहता है...और जो बच्चे गर्भ मे तो मोबाइल के संपर्क में नहीं आते लेकिन खुद छोटी उम्र में ही मोबाइल पर बतियाना शुरू कर देते हैं, उनमें 20 फीसदी एब्नार्मेल्टी का ज़्यादा खतरा रहता है...

द टेलीग्राफ अखबार में छपी रिपोर्ट के अनुसार दोनों स्टडीज़ को मिला कर देखा गया तो पता चला कि सर्वे के कुल बच्चों में से 10 फीसदी ऐसे थे जिनकी मां ने प्रेग्नेंसी के दौरान रोज़ कम से कम चार बार मोबाइल पर बात करी थीं...शोध से जुडी़ टीम का मानना है कि इन नतीजों पर मुहर के लिए क्लीनिकल टेस्ट होना जरूरी है लेकिन ये तथ्य काटा नहीं जा सकता कि छोटी उम्र में मोबाइल के एक्सपोज़र से बच्चों में खामियां आने का खतरा बढ़ जाता है...पब्लिक हेल्थ से जुड़े अधिकारी इस बारे में लोगों को आगाह तो कर ही सकते हैं...

हालांकि कई जानकार इस शोध के नतीजों को अतिश्योक्ति करार दे रहे हैं...कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड स्पीजलहाल्टर का कहना है कि ये कैसे कहा जा सकता है कि बच्चों में डिसआर्डर के लिए सिर्फ मोबाइल का एक्सपोजर ही जिम्मेदार है...ये वैसे ही जैसे फुटबाल वर्ल्ड कप के दौरान पॉल बाबा (आक्टोपस) की भविष्यवाणी करने संबंधी मानसिक शक्ति को साइंस मान्यता दे दे...और अगर ऐसा होता है तो मोलस्क्स को लेकर अब तक जो भी स्टडी थी, उसमें क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएगा...

यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स की प्रोफेसर पेट्रेशिया मैक्केनी भी शोध के नतीजों से ज़्यादा प्रभावित नहीं है...उनका कहना है कि गर्भवती महिलाओं के मोबाइल पर बात करने से उनके गर्भ में शिशु के एक्सपोज़र में आने का कोई साइंटिफिक आधार नहीं है...मोबाइल से जो रेडियोफ्रीक्वेंसी रेडिएशन निकलता भी है वो सिर्फ कान के उसी हिस्से के पास रहता है जो मोबाइल के नज़दीक रहता है...

बहरहाल नज़रिया अपना-अपना है...लेकिन प्रेग्नेंसी के महीनों में थोड़ी सावधानी बरत ली जाए तो हर्ज़ ही क्या है....

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

कौन अमीर, कौन गरीब...खुशदीप

एक बार एक पिता अपने बेटे को देश में इसलिए घुमाने ले गया कि उसे अपनी आंखों से दिखा सके कि गरीब लोग कैसे जीते है...

दोनों एक बेहद गरीब किसान के खेत पर पहुंचे...दोनों ने दो दिन 48 के 48 घंटे किसान के परिवार के साथ गुज़ारे...

किसान के खेत से लौटने के बाद पिता ने बेटे से पूछा....कैसा रहा ट्रिप...

बेटे ने जवाब दिया...बहुत बढ़िया...

पिता...फिर बताओ कि इस ट्रिप से तुम्हें क्या सीखने को मिला...क्या फर्क देखा...


बेटा...मैंने देखा कि हमारे पास पट्टे वाला एक कुत्ता है, उनके पास बिना पट्टे वाले चार थे...


हमारा स्विमिंग पूल बाग के बीच जाकर खत्म हो जाता है...उनका जोहड़ खत्म होने का नाम ही नहीं लेता...


हमारे बाग में इम्पोर्टेड लैम्पपोस्ट लगे हैं...उनका रात भर सितारे साथ देते हैं...


हमारे पास रहने के लिए ज़मीन का छोटा सा टुकड़ा है...उनके पास रहने के लिए खेत हैं, जो जहां तक नज़र जाती है, वहीं तक फैले नज़र आते हैं...


हमारे पास नौकर-चाकर हैं जो हमारी सेवा करते रहते हैं...लेकिन वो खुद दूसरो की सेवा करते हैं...


बेटे की बात सुनकर पिता निशब्द था...

बेटा आगे बोला...शुक्रिया, डैड दिखाने के लिए कि हम कितने गरीब हैं...


अब आप सोचिए कि आपका जीवन कितना सरल और आनंद से भरा हो सकता है...

अगर हम अपने पास मौजूद सारी चीज़ों के लिए ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करें...बजाए इसके कि हर वक्त उन चीज़ो के लिए हमेशा अंदर ही अंदर घुलते रहें, जो हमारे पास नहीं हैं...


आपके पास जो भी है, उसके लिए खुशी जताओ...खास तौर पर उन सारे दोस्तों के लिए जो तुम्हें इसी दुनिया ने दिए हैं....
 

याद रखिए...ज़िंदगी बहुत छोटी है और दोस्त बहुत कम है...



(ई-मेल से अनुवाद)

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

लाफ्टर का चौक्का...खुशदीप


पति ने पत्नी से कहा-
देखो एक महान लेखक ने क्या शानदार लिखा है- पति को भी घर के मामले में बोलने का हक़ होना चाहिए...

पत्नी-
वो भी बेचारा देखो लिख ही पाया, बोल नहीं सका...


-------------------

एक बार रजनीकांत ने चेक काटा...


अगले दिन बैंक बाउंस हो गया....

-------------------

अल्कोहलिक फिल्में...

बंटी और बाटली


रम दे बसंती


सोडा अकबर


जब वी टुन्न


सब ने पिला दी थोड़ी

----------------

एक बार मक्खन और ढक्कन टुन्न होने के बाद किसी को टक्कर मार कर भाग गए...जिसे टक्कर लगी उसने पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी...पुलिस ने टक्कर लगने वाले से दोनों का हुलिया पूछा...जिस तरह का हुलिया बताया गया, पुलिस ने उसी के आधार पर आठ-दस लोगों को पकड़ कर शिनाख्त परेड के लिए बुला लिया...इनमें मक्खन और ढक्कन भी शामिल थे...शिनाख्त मजिस्ट्रेट के सामने हो रही थी...टक्कर जिसे लगी थी उसके सामने जब सब खड़े हो गए तो मजिस्ट्रेट ने कहा...पहचानो कौन था...ये सुनते ही मक्खन-ढक्कन जिसे टक्कर लगी थी उसकी तरफ़ इशारा करते हुए बोले- यही था...

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

भारत में आज 'बकासुर' ही 'बकासुर', 'भीम' एक भी नहीं...खुशदीप

आपने महाभारत पढ़ी हो या देखी हो (अरे टीवी सीरियल भाई) तो बकासुर का नाम ज़रूर सुना होगा...आज आपको उसी राक्षस बकासुर की कहानी सुनाने का मन कर रहा है...क्यों कर रहा है...ये पोस्ट के आखिर में...पहले कहानी...

एकाचक्र शहर के पास बकासुर नाम का असुर रहता था...बकासुर से बड़े और किसी भुख्खड़ का ज़िक्र हिन्दू पौराणिक कथाओं में नहीं मिलता...बकासुर का इतना आतंक था कि एकाचक्र का राजा भी उससे बड़ा खौफ खाता था...राजा बिना नागा टनों के हिसाब से चावल और दो भैंसे बकासुर के पास भिजवाता था...बकासुर ये तो खाता ही खाता था, राजा की ओर से जो भी आदमी सारा सामान लेकर जाता था, उस आदमी को भी चट कर जाता था...कहते हैं कि प्राचीनकाल में जिस शहर को एकाचक्र बुलाया जाता था वो आज महाराष्ट्र के जलगांव ज़िले का इरानडोल है...हिन्दू मान्यता के अनुसार वनवास के दौरान पांचों पांडव माता कुंती के साथ एकाचक्र में ही रहे थे...एक बार एक जवान लड़के की मां ने कुंती के पास जाकर गुहार लगाई कि उसके इकलौते बेटे को बकासुर का खाना लेकर जाना है...यानि साफ़ था कि उसे भी बकासुर का ग्रास बनना था...कुंती ने उस मां को आश्वासन दिया और उसके लड़के की जगह भीम को खाने का सामान लेकर बकासुर के पास जाने का आदेश दिया...भीम ने आदेश का पालन किया...लेकिन जब भीम बकासुर के पते पर पहुंचे तो उस वक्त बकासुर वहां मौजूद नहीं था...भीम ने खाली वक्त में बकासुर के चावल ही खाने शुरू कर दिए...बकासुर ने वापस आने पर ये नज़ारा देखा तो गुस्से से थर्र थर्र कांपने लगा...इसके बाद बकासुर और भीम में भीषण युद्द हुआ...दोनों ज़मीन से पेड़ उखाड़ कर ही एक दूसरे पर वार करने लगे...अंतत: भीम ने बकासुर को दोनों टांगों से पकड़ कर चीर डाला...मरते हुए बकासुर ने भीम से पानी मांगा...भीम ने शक्तिशाली भुजा से एक चट्टान पर चोट कर बकासुर के लिए पानी निकाला...इरानडोल शहर के बाहर आज भी सैलानी चावल के गिरे होने की जगह और पानी का तालाब देख सकते हैं...ये तो रही महाभारत के बकासुर की कहानी...



लेकिन हम महाभारत के युग में नहीं वर्तमान के भारत में जी रहे हैं...फिर आज बकासुर की कहानी सुनाने का मतलब...अब यहां ठहर कर थोड़ा सोचिए...क्या आज हमारे देश में बकासुर एक नई शक्ल लेकर नहीं खड़ा...भ्रष्टाचार का बकासुर...बकासुर की खुराक का फिर भी अंदाज़ लगाया जा सकता था...लेकिन आज के इस बकासुर की भूख की कोई थाह नहीं...कितना माल रोज़ ये अपने अंदर ठूंस कर डकार भी नहीं लेता...

आज तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि ने अपने चहेते और पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री ए राजा के बचाव की खातिर बयान दिया कि क्या राजा बकासुर है जो टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले में एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ रुपये हज़म कर जाए और किसी को दिखे भी न कि ये पैसा कहां गया...करुणानिधि राजनीति में आने से पहले तमिल फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखने में माहिर थे...उनका ये हुनर आज भी बरकरार है...इस वक्त करुणानिधि की पहली फिक्र अपने लंबे चौड़े परिवार के लिए राजनीतिक उत्तराधिकार की स्क्रिप्ट लिखने की है...सब जानते हैं कि बेटे एम के स्टालिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के तौर पर करुणानिधि की पहली पसंद हैं...लेकिन करुणानिधि के बड़े बेटे अझागिरी और बेटी कनीमोझी ही इसके सख्त खिलाफ हैं...पूर्व टेलीकॉम मंत्री ए राजा की हैसियत भी करूणानिधि के परिवार के किसी सदस्य की तरह ही है...दलित समुदाय से आने वाले राजा राजनीति में आने से पहले कविताएं लिखा करते थे...इसी कविता के माध्यम से राजा ने करुणानिधि के पास पहुंचने में कामयाबी पाई...राजा को केंद्र में मंत्री करुणानिधि के दबाव के चलते ही बनाया गया था...लेकिन टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले के उजागर होने के बाद हर तरफ से राजा पर इस्तीफे के लिए दबाव पड़ने लगा...आखिर करुणानिधि को बड़ी मायूसी से राजा को इस्तीफे के लिए कहना पड़ा...

खैर राजा के नाम के आगे तो एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ घोटाले का ही आरोप लगा है...अब कॉमनवेल्थ घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाला, होम लोन घोटाला, यूपी का खाद्यान्न घोटाला आदि आदि इन सब को याद कीजिए...ऐसे ही न जाने कितने छोटे-बड़े घोटाले रोज देश में होते हैं...आप और हम जैसों की ओर से टैक्स के लिए दी जाने वाली रकम घोटालेबाज़ों के पेट तक पहुंचती सो पहुंचती है, ये गरीबों के अनाज तक को चट करने में भी माथे पर शिकन नहीं लाते......मेरा सवाल यही है कि आधुनिक युग के भ्रष्टाचार रूपी इस बकासुर को चीरने के लिए कौन सा भीम भारत की धरती पर जन्म लेगा...और जिन हाथों में हमने देश और अपनी तकदीर छोड़ रखी है, वो खुद ही जाने-अनजाने कभी कॉमनवेल्थ गेम्स तो कभी टू जी स्पेक्ट्रम के ज़रिए इस बकासुर के पेट में तगड़ी खुराक पहुंचाते रहते हैं...जिस देश में हर कोई रातोंरात अमीर बनने के सपने देखता हो, वहां सभी बकासुर की राह पकड़ते नज़र आएं  तो ताज्जुब किस बात का...

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

'शीला की जवानी' और श्लाका पुरुष विशाल डडलानी...खुशदीप


इस चेहरे को ज़रा गौर से देखिए...ये हैं विशाल डडलानी...

शेखर के साथ जोड़ी बनाकर जनाब ओम शांति ओम और दोस्ताना जैसी कई सुपरहिट फिल्मों का म्युज़िक कम्पोज़ कर चुके हैं...लेकिन अब विशाल जी ने जो कारनामा कर दिखाया है, इसके लिए उनका नाम गीत-कविता के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज किया जाना चाहिए...विशाल जी ने ऐसी रचना रची है कि देश का बड़े से बड़ा गीतकार उनकी विलक्षण प्रतिभा पर रश्क कर रहा है...गुलज़ार और प्रसून जोशी को भी ताज्जुब हो रहा है कि ऐसा अनमोल हीरा अभी तक कहां छुपा हुआ था...अब तक आप भी बेचैन हो गए होंगे कि विशाल ने ऐसा क्या रच दिया जो मैं उनकी शान में कसीदे पढ़ता जा रहा हूं...तो लीजिए जनाब दिल थाम कर पढ़िए और सुनिए उनकी कालजयी कृति...

शीला की जवानी

आई नो यू वांट इट
बट यू नेवर गॉना गेट इट
तेरे हाथ कभी ना आनी
माने ना माने कोई,
दुनिया ये सारी,
मेरे इश्क की है दीवानी,


हे हे,
आई नो यू वांट इट बट यू नेवर गॉना गेट इट
तेरे हाथ कभी ना आनी
माने ना माने कोई,
दुनिया ये सारी
मेरे इश्क की है दीवानी
अब दिल करता है हौले हौले से
मै तो खुद को गले लगाऊं
किसी और की मुझे ज़रूरत क्या,
मैं तो खुद से प्यार जताऊं


व्हाटस माई नेम
व्हाटस माई नेम
व्हाटस माई नेम
माई नेम इज़ शीला
शीला की जवानी
आई एम जस्ट सेक्सी फॉर यू
मैं तेरे हाथ ना आनी
ना ना ना शीला,
आई एम  जस्ट सेक्सी फॉर यू
मैं तेरे हाथ ना आनी
ना ना ना शीला,
शीला की जवानी,
आई एम जस्ट सेक्सी फॉर यू
मैं तेरे हाथ ना आनी


टेक इट ऑन
टेक इट ऑन
टेक इट ऑन
टेक इट ऑन


सिली सिली सिली सिली बॉयस
ओ ओ ओ यू ऑर सो सिली
मुझे बोलो बोलो करते हैं
ओ ओ ओ
हां जब उनकी तरफ़ देखूं,
बाते हौले हौले करते हैं,
है मगर, बे्असर मुझ पर हर पैंतरा
हाय रे ऐेसे तरसे हमको
हो गए सोबर से रे,
सूखे दिल पे मेघापन के तेरी नज़रिया बरसे रे,
आई नो यू वांट इट बट यू नेवर गॉना गेट इट


तेरे हाथ कभी ना आनी
शीला
शीला की जवानी
आई एम जस्ट सेक्सी फॉर यू
मैं तेरे हाथ ना आनी
ना ना ना शीला
शीला की जवानी
आई एम जस्ट सेक्सी फॉर यू
मैं तेरे हाथ ना आनी

पैसा गाड़ी महंगा घर
आनी ना मैनू कि गिम्मे यूअर दैट
जेबें खाली बढ़ती चल
नो नो आई डोंट लाइक दैट
चल यहां से निकल तुझे सब ला दूंगा
कदमों में तेरे लाके जग रख दूंगा
ख्वाब मैं कर दूंगा पूरे,
ना रहेंगे अधूरे,
यू नो आई एम गोइंग टू लव यू लाइक दैट, व्हाटएवर
हाय रे ऐसे तरसे हमको
हो गए सोबर से रे
सूखे दिल पे भीगापन के तेरी नज़रिया बरसे रे
आई नो यू वांट इट बट यू नेवर गॉना गेट इट
यू नेवर गॉना गेट माई बॉडी
आई नो यू वांट इट बट यू नेवर गॉना गेट इट


तेरे हाथ कभी ना आनी
माने ना माने कोई,
दुनिया ये सारी,
तेरे इश्क की मैं दीवानी,
अब दिल करता है हौले हौले से
मै तो खुद को गले लगाऊं
किसी और की मुझे ज़रूरत क्या,
मैं तो खुद से प्यार जताऊं


व्हाटस माई नेम
व्हाटस माई नेम
व्हाटस माई नेम


माई नेम इज़ शीला
शीला की जवानी
आई एम जस्ट सेक्सी फॉर यू
मैं तेरे हाथ ना आनी
ना ना ना शीला,
आई एस जस्ट सेक्सी फॉर यू
मैं तेरे हाथ ना आनी
ना ना ना शीला,
शीला की जवानी,


आई एम जस्ट सेक्सी फॉर यू
मैं तेरे हाथ ना आनी
ओह नो नो शीला
शीला की जवानी
आई एम जस्ट सेक्सी फॉरयू
मैं तेरे हाथ ना आनी
शीला,
शीला की जवानी
आई एम जस्ट सेक्सी फॉर यू
मैं तेरे हाथ ना आनी
नोबाडी गॉट बॉडी लाइक शीला
एवरीबॉडी वान्ट बॉडी लाइक शीला
ड्राइव मी क्रेज़ी, कॉज (बिकॉज) माई नेम इज़ शीला
ऐन्ट नोबॉडी गॉट बॉडी लाइक शीला
एवरीबॉडी वान्ट बॉडी लाइक शीला
ड्राइव मी क्रेज़ी, कॉज (बिकॉज) माई नेम इज़ शीला
ऐन्ट नोबॉडी गॉट बॉडी लाइक शीला
(फिल्म-तीसमारखां, संगीत- विशाल-शेखर और श्रीश कुंदर, प्लेबैक- सुनिधि चौहान, विशाल डडलानी, गीतकार-विशाल डडलानी)



यहां तक पढ़ते पढते मुझे यकीन है कि आप ज़रूर चकरा गए होंगे...मार्डन युग की कालजयी रचना ऐसे ही होती हैं...विशाल जी के सिर से सारे बाल ऐसे ही नहीं उड़ गए हैं...बेचारों ने कितनी रात जाग जाग कर ऐसी अप्रतिम कृति देश को समर्पित की है...धन्य हो विशाल जी, अपने नाम की तरह ही आपका कैनवास बड़ा विशाल है... मेरा तो प्रस्ताव है कि विशाल डडलानी को इस रचना के लिए विश्वकवि घोषित कर दिया जाना चाहिए...


स्कूल के पाठ्यक्रम में रामधारी सिंह दिनकर, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, धर्मवीर भारती, हरिवंशराय बच्चन, दुष्यंत कुमार, गोपालदास नीरज को पढ़ता था...हसरत जयपुरी, साहिर लुधियानवी, कवि प्रदीप के फिल्मी गीत सुनता था...अब सोचता हूं पुराने ज़माने के लोगों ने सच में क्या मिस किया...आधुनिक कविता के श्लाका पुरुष विशाल डडलानी आप इस दुनिया में पहले क्यों नहीं आए...

आज विशाल का ज़िक्र करते-करते मुझे कुंदन लाल सहगल भी याद आ गए...भारतीय संगीत ने सहगल साहब के साथ शुरुआत की थी और बाबा सहगल तक आ पहुंचा...