मंगलवार, 30 नवंबर 2010

बेटियों को अंतिम संस्कार का अधिकार क्यों नहीं...खुशदीप

जुड़वा बच्चों में बड़ा कौन...इस सवाल पर पंडित राधेश्याम शर्मा का मत बताने से पहले कुछ और अहम बात...मेरी कल की पोस्ट पर आई टिप्पणियों से एक बात साफ़ हुई कि माता-पिता के अंतिम संस्कार का अधिकार उसी संतान को होना चाहिए, जिसने उनका सबसे ज़्यादा ध्यान रखा हो...इसमें बेटे या बेटी जैसा भी कोई भेद नहीं होना चाहिए...

लेकिन ये कैसे तय होगा कि दुनिया से जाने वाले की सेवा सबसे ज़्यादा किस संतान ने की...क्योंकि जाने वाला तो चला गया, वो ये बताने तो आएगा नहीं...इसका सबसे अच्छा इलाज है कि अपने जीवन-काल में ही वसीयतनामे की तरह वो ये भी बता दे कि कौन बेटा या बेटी चिता को अग्नि दे...

मैं खास तौर पर धीरू भाई को बधाई दूंगा कि जिन्होंने अपने कमेंट में कहा कि उनकी बेटी को ही ये अधिकार होगा...ये ताज़्जुब वाली बात ही है कि अगर किसी की संतान सिर्फ लड़की होती है तो भी उसके अंतिम संस्कार का अधिकार भाई, भतीजे या पंडित को दे दिया जाता है लेकिन लड़की को नहीं...क्यों भई, ऐसा क्यों...बेटी को ये अधिकार क्यों नहीं...

दुनिया तेज़ी से बदल रही है...और जो कौमें बदलते वक्त के साथ कदमताल नहीं करतीं वो पिछड़ती जाती हैं...बरसों से चली आ रही रूढ़ियों में अगर कुछ गलत और भेदभावकारी है तो उसे क्यों नहीं बदलने के लिए हम कदम उठाते...मुझे ये देखकर ताज़्जुब होता है कि कई जगह महिलाओं को शमशान घाट जाने की इजाज़त नहीं होती...क्यों भई, क्या जाने वाले के लिए महिलाओं का दुख पुरुषों से कम होता है क्या...फिर वो क्यों नहीं अपने किसी बिछुड़े का अंतिम संस्कार देख सकतीं...

चलिए अब आता हूं जुड़वा बच्चों में कौन बड़ा के सवाल पर...पंडित राधेश्याम शर्मा जी के मुताबिक जुड़वा बच्चों में जो बाद में दुनिया में आएगा, वही बड़ा माना जाएगा...पंडित जी ने इसके लिए फलित ज्योतिष का हवाला भी दिया, जो मुझे ज़्यादा समझ नहीं आया...हां जब उन्होने सीधी भाषा में मिसाल देकर बात समझाई तब मुझे उसमें लॉजिक नज़र आया...पंडित जी का कहना था कि एक ऐसी शीशी लीजिए, जिसमें दो कांच की गोलियां ही आ सकती हों...अब उनमें वो गोलियां एक-एक कर डालिए...गोलियों को बाहर निकालेंगे तो पहले वाली गोली बाद में और दूसरी वाली गोली पहले निकलेगी...कुल मिलाकर उनका कहने का तात्पर्य यही था कि गर्भ में जो पहले आया, वही बड़ा माना जाएगा...इस तर्क पर पिछली पोस्ट में पहले ही कुछ टिप्पणियों में सवाल उठाया जा चुका है...अब पंडित जी का मत सही है या नहीं, ये तो फलित ज्योतिष के जानकार ही बता सकते हैं....

खैर छोड़िए अब इस गंभीर मसले को...चलिए स्लॉग ओवर से कुछ लाइट हो जाइए...

स्लॉग ओवर

एक बच्चा...दुनिया के अमीर से अमीर आदमी भी मेरे पिता के आगे कटोरा लेकर खड़े रहते हैं...

दूसरा बच्चा...क्यों तेरे पिता क्या राजा है या वर्ल्ड बैंक के चेयरमैन हैं...

पहला बच्चा....नहीं तो...

दूसरा बच्चा...फिर क्यों ढींग मार रहा है...आखिर तेरे पिता का नाम क्या है....

पहला बच्चे ने जवाब दिया...

...



...



...



बिट्टू गोलगप्पे वाला...

रविवार, 28 नवंबर 2010

जुड़वा भाइयों में कौन बड़ा...खुशदीप

एक अजब सा सवाल पूछ रहा हूं...पापा के दुनिया को अलविदा कहने के बाद पारिवारिक पंडित राधेश्याम शर्मा जी ने सारे कर्मकांड कराए...वो रोज़ घर पर गरूड़ कथा का पाठ भी करने आए...राधेश्याम जी वैसे पारिवारिक मित्र भी हैं...इसलिए उनसे कभी-कभी हंसी मज़ाक भी हो जाता है...राधेश्याम जी घर में मांगलिक कार्य भी पूरे विधि-विधान से संपन्न कराते हैं...हमारे लिए सुख-दुख के मौकों पर उनका ही कहा, पत्थर की लकीर होता है...

पंडित जी से पापा की अंत्येष्टि वाले दिन ही बात हो रही थी कि पिता को मुखाग्नि देने का पहला अधिकार सबसे बड़े बेटे का होता है...अगर बड़ा बेटा तबीयत खराब होने या अन्य किसी वजह से ये धर्म निभाने की स्थिति में न हो तो सबसे छोटे बेटे को अंतिम संस्कार कराना चाहिए...

ये बात चल ही रही थी कि पंडित जी ने बड़ा विचित्र सवाल पूछा...अगर मरने वाले के जुड़वा बेटे हों, उनमें से बड़ा वाला छोटे से मानो पांच मिनट पहले दुनिया में आया हो तो बड़ा बेटा होने के नाते किसका पिता को मुखाग्नि देने के लिए पहला हक होगा...


पंडित जी ने सवाल का जवाब भी बताया...उसे मैं आपको बताऊं, इससे पहले चलिए आप भी अपनी राय बताइए...संगीता पुरी जी और पंडित डी के शर्मा वत्स जी के जवाब का खास तौर पर इंतज़ार रहेगा...

पत्नीश्री, मैं और ट्रेड फेयर का डिप्लोमेटिक टूर...खुशदीप

पोस्ट पर कुछ लिखूं...उससे पहले पिछली पोस्ट पर आई निर्मला कपिला जी की ये टिप्पणी...

अच्छा तो अब डिप्लोमेसी भी सीख गये हो? लेकिन बता दूँ मेरी बहू से डिप्लोमेसी नही करना। ये उसी की बदौलत ब्लॉगिंग हो रही है। बहुत अच्छी लगी ये आत्मियता कि सुबह सवेरे राम से मिलने गये। आशीर्वाद।

आप ब्लॉगर हैं तो आप घर वालों से ज़रूर कहीं न कहीं अन्याय करते हैं...छुट्टी वाले दिन भी डेस्कटॉप या लैपटॉप का पियानो बड़े मग्न होकर बजाते रहते हैं...घरवाले कितने भी कोऑपरेटिव हों लेकिन आपका ब्लॉगराना कभी न कभी तो उन्हें इरिटेट (कृपया सही हिंदी शब्द बताएं) करता ही होगा...लेकिन हम ब्लॉगरों की हालत उस बिल्ली से कम कोई होती है जो सरे आम दूध पीते पकड़े जाने पर भी आंख बंद कर लेती है...इस मुगालते में कि उसे कोई देख नहीं रहा...

जैसा कि कल आप को पोस्ट में बताया था कि आज का दिन पत्नीश्री के नाम था...उन्हें कुछ ज़रूरी सामान ट्रेड फेयर से खरीदना (बारगेन शॉपिंग)  था...मैं टालता आ रहा था...लेकिन आज ट्रेड फेयर का आखिरी दिन था तो आगे टाला भी नहीं जा सकता था...दोनों बच्चों का आज स्कूल था...इसलिए पत्नीश्री और मैं ही सुबह दस बजे मेट्रो से ट्रेड फेयर के लिए प्रगति मैदान रवाना हुए...मुझे याद नहीं पड़ता कि पिछले चार-पांच साल में हम पति-पत्नी बच्चों के बिना ट्रेड फेयर या घूमने वाली दूसरी किसी जगह पर गए हों...अरे-अरे घबराइए मत मैं ये लिखकर आपको बोर नहीं करूंगा कि ट्रेड फेयर में क्या-क्या देखा...बस वहां हुए एक-दो मज़ेदार किस्से आपसे शेयर करने जा रहा हूं...

आजकल मेट्रो वालों ने एक बहुत अच्छा काम किया है...पहला डब्बा महिलाओं के लिए रिज़र्व कर दिया है...मेट्रो स्टेशन पर भी वो जगह मार्क कर दी गई है जहां मेट्रो का पहला डब्बा आकर लगता है...उस जगह पर स्टेशन पर भी सिर्फ महिलाएं खड़ी हो सकती हैं...सिक्योरिटी वाले वहां गलती से भी आ जाने वाले पुरुषों को टोकते रहते हैं...ज़ाहिर है इस सुविधा से अकेले चलने वाली महिलाओं को बहुत फायदा हुआ है...लेकिन इस व्यवस्था में कभी पति-पत्नी या घर के और महिला-पुरुष के साथ चलने पर असहज स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है...मान लीजिए किसी बुजुर्ग महिला के साथ उनका बेटा भी है तो उसे महिला को अकेले लेडीज़ डब्बे में छोड़ना होगा या फिर भीड़-भाड़ वाले अनरिज़र्वड डब्बों में ही साथ सफ़र करना होगा...लेकिन व्यवस्था को सही तरीके चलाना है तो छोटा-मोटा समझौता करना ही पड़ेगा...अब हर मेट्रो स्टेशन पर ऐसा नज़ारा लगता है कि महिलाओं और पुरुषों के बीच जैसे सरहद खींच दी गई हो...ये नज़ारा देखकर न जाने मुझे क्यों वहां अचानक बचपन में खेला जाने वाला एक खेल याद आ गया...जिसमें गाते थे- हम तुम्हारी ऊंच पर रोटियां पकाएंगे...सोचा एक बार सरहद के पार जाकर ये गाना गाकर फिर लौटकर जल्दी से वापस अपने पाले में आ जाऊं...फिर खुद ही इस शरारत को सोचकर हंसी आ गई...अब दिल तो बच्चा है जी कुछ भी सोच सकता है जी...

खैर राम-राम करते मेट्रो आ गई...ट्रेड फेयर की वजह से मेट्रो पर भीड़ भी बहुत थी तो पत्नीश्री को लेडीज़ डब्बे में चढ़ना पड़ा...मैं बिल्कुल साथ वाले डब्बे पर चढ़ गया...अब इन दो डब्बों को जोड़ने वाली जगह का नज़ारा भी बहुत अद्भुत होता है...एक तरफ सारी महिलाएं....और दूसरी तरफ पुरूष...सीट पत्नीश्री को भी नहीं मिली...मुझे तो क्या ही मिलनी थी...ठूस ठूस कर भरे डब्बे में किसी तरह लद गया था यही बहुत था...अब लेडीज़ डब्बे में एक पिल्लर को पकड़े पत्नीश्री...और इधर बकरों की तरह भरे गए डब्बे में मैं...पत्नीश्री का कद भी लंबा है तो हम दोनों एक दूसरे को देख सकते थे...पत्नीश्री को यूं देखा तो एस डी बर्मन का गाना याद आ गया...है मेरे साजन उस पार, मैं इस पार...

लो जी प्रगति मैदान भी आ गया...अब ट्रेड फेयर में हर राज्य के पैवेलियन में भटकते हुए टांगें जो टूटनी थी सो टूटी...ऊपर से भीड़ में एक महिला ने मेरे शू पर इतनी ज़ोर से पांव रखा कि पीछे से सोल ही उखड़ गया...अब शूज़ में सोल सिले नहीं जाते चिपकाए जाते हैं, ये दिव्यदृष्टि आज ही मिली....अब वहां मोची भी कहां मिलना था...इसलिए अब नई-नवेली दुल्हन की तरह बड़ा ध्यान देते हुए मुझे चलना पड़ा कि कहीं सोल पूरी तरह ही उखड़ कर बाहर न आ जाए...शापिंग में जेब का पूरी तरह जब कूंडा हो गया तो हम वापसी के लिए निकले...


दिल्ली ट्रेड फेयर में उड़ीसा का पैवेलियन

वापसी में प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन पर बड़ा मज़ेदार वाक्या हुआ...मेट्रो के हर स्टेशन पर बैग्स की चैंकिंग के लिए मशीन लगी हुई हैं...वही वाली जिसमें बैग एक तरफ से डाला जाता है और वो स्कैन होकर दूसरी तरफ से निकल आता है...उसी मशीन के पास मेरे आगे एक बुज़ुर्ग सरदार जी खड़े थे...उन्होंने अपना बैग मशीन में डाला...सरदार साहब के हाथ में पानी की एक बोतल भी थी...उन्होंने सिक्योरिटी वाले से पूछा कि क्या ये बोतल भी डाल दूं...सिक्योरिटी वाले ने मुस्कुरा कर मना किया...ये देखकर मेरा चुटकी लेने का मन हुआ...मैंने कहा...पा देयो, पा देयो सर, दूजी तरफों ए बोतल पैग बनकर निकलेगी...(डाल दो, डाल दो सर, दूसरी तरफ़ से ये बोतल पैग बनकर निकलेगी...), ये सुनकर सरदार साहब ने ठहाका लगाया और कहा...ओ काके, अगर ऐंज हो जाए ते पूरा दिन ई एत्थे ही खलोता रवां...(अगर ऐसा हो जाए तो मैं सारा दिन ही यहां खड़ा रहूंगा)...


चलिए आपके चेहरे पर आई इसी मुस्कान के साथ पोस्ट खत्म करता हूं...

शनिवार, 27 नवंबर 2010

भारत लौटे राम, 'बदमाश' ब्लॉगर नहीं पहुंचे...खुशदीप

टाइटल पढ़कर चकराइए मत...सब बताता हूं...ज़रा सब्र तो रखिए...प्रवासी परिंदें इसी मौसम में सबसे ज़्यादा भारत का रुख करते हैं...वो जहां डेरा डालते हैं, वहां की बहार देखते ही बनती है...आबोदाना इनसान को बेशक सात समंदर पार ले जाए, लेकिन वतन की सौंधी मिट्टी की खुशबू कभी उसके दिलो-दिमाग से दूर नहीं होती...स्वदेश की कसक उन्हीं से पूछो जो इससे दूर आशियाना बनाने के लिए मजबूर हों...खैर छोडिए ये फ़लसफ़ा...

दो दिन पहले भाई राम त्यागी का ई-मेल मिला था कि वो 26  नवंबर को भारत पहुंच रहे हैं...राम के पास मेरा मोबाइल नंबर नहीं था...किसी तरह मेरा नंबर जुटा कर राम ने फोन किया...लेकिन उस वक्त मैं प्रोफेशनल दायित्व निभाने के पीक टाइम पर था...इसलिए एकाध मिनट से ज़्यादा बात नहीं कर सका...लेकिन अगले दिन मेरे पास ललित शर्मा भाई जी का फोन आया...ललित जी ने मुझे बताया कि राम की फ्लाइट तड़के पांच बजे दिल्ली लैंड करेगी...इसके बाद उन्हें 8.40 पर निज़ामुद्दीन स्टेशन से गृहनगर ग्वालियर के लिए समता एक्सप्रेस पकड़नी है...

मेरी दिक्कत ये है कि मैं रात को दो-ढाई बजे से पहले सो नहीं पाता...ऐसे में अल सुबह निज़ामुद्दीन स्टेशन पहुंच पाना मुझे बूते से बाहर लगा...फौरन संकटमोचक सतीश सक्सेना भाई को फोन मिलाया...थोड़ा मस्का लगाया...फिर पूछा कि सुबह उनकी दिनचर्या क्या रहती है...टैम्पो बांधने के बाद काम की बात पर आया और निज़ामुद्दीन चलने का न्योता दिया...देखिए मेरी खुदगर्जी...सोचा कि सतीश भाई की शानदार गाड़ी की सवारी का मौका फिर मिल जाएगा...क्या करूं तिलयार की खुमारी अभी तक उतरी जो नहीं...लेकिन हाय री किस्मत...सतीश भाई पारिवारिक कमिटमेंट के चलते चाह कर भी मेरा साथ देने के लिए तैयार नहीं हो सके...वैसे सतीश भाई अपनी कल की पोस्ट में खुद को 'बदमाश' ब्लॉगर घोषित कर चुके हैं...वो भी सिर्फ एक पैग चढ़ाने के इल्जाम में...इसीलिए मुझे टाइटल में कहना पड़ा है कि 'बदमाश' ब्लॉगर नहीं पहुंचे...


अब मैं तो कमिटमेंट कर चुका था कि किसी भी हाल में राम से मिलने जाना है...सलमान खान की तर्ज पर कहूं तो डायलाग झाड़ता हूं...एक बार मैं कमिटमेंट कर लूं तो फिर खुद भी अपने को नहीं रोक सकता...पत्नीश्री से कहा कि सुबह जल्दी उठा देना...निज़ामुद्दीन स्टेशन जाना है...पत्नीश्री हैरान-परेशान...ये अचानक शहर से बाहर जाने का कहां प्रोग्राम बना लिया...अब क्या जवाब देता...फिर बताना ही पड़ा...साथ ही पत्नीश्री से वादा भी करना पड़ा कि शनिवार को ट्रेड फेयर घुमाने ले जाऊंगा...(समझा करो यार, ब्लॉगिंग करनी है तो थोड़ी बहुत डिप्लोमेसी तो आनी ही चाहिए न)... खैर सुबह जल्दी जागा और तैयार होने के बाद ऑटो से निजामुद्दीन स्टेशन का रास्ता पकड़ा...वैसे पत्नीश्री रोज़ हमें सेहत का हवाला देते हुए सुबह उठ कर मॉर्निंग वॉक पर जाने के लिए लाख ज़ोर देती रहें लेकिन मजाल है कि कभी हम उठ जाएं...

तमाम कोशिश करने के बावजूद मैं आठ बजे ही निज़ामुद्दीन पहुंच सका...अब दिक्कत ये कि इतने भीड़-भाड़ वाले स्टेशन पर राम को ढूंढूगा कैसे...फिर भी ब्लॉग पर देखी हुई राम की चिन्नी सी फोटो को ही जेहन में री-कॉल किया और एक कोने से प्लेटफॉर्म के दूसरे कोने की ओर चलना शुरू किया...हर मुसाफिर को घूरते हुए...राम का मेरे पास कोई फोन तो था नहीं...जो मिला लेता...सोचा शायद ललित भाई के पास होगा...ललित भाई को फोन मिलाया...लेकिन यहां मेरे लिए और भी बड़ा सरप्राइज़ इतंज़ार कर रहा था....ललित भाई ने बताया कि वो खुद भी निज़ामुद्दीन स्टेशन पर ही हैं...वो देशाटन के लिए निकले हुए हैं लेकिन नानी के स्वर्गवास की वजह से उन्हें अपना सारा प्रोग्राम तब्दील करना पड़ा...ललित भाई को ढूंढना कम से कम मेरे लिए मुश्किल साबित नहीं हुआ...हम दोनों ही छह फुटिए हैं...इसलिए भीड़ के बावजूद दोनों ने एक दूसरे को देख लिया...ललित भाई तो मिल गए लेकिन मेहमान-ए-खास राम तक पहुंचना अब भी टेढ़ी खीर साबित हो रहा था...अब हमने एक-एक कोच खंगालते हुए बढ़ना शुरू किया...एक टोपीधारी युवक पर मुझे राम होने का शक हुआ...मैंने ललित भाई से पूछा कि कहीं यही तो नहीं अपना राम...

ललित भाई ठहरे तजुर्बेकार...फौरन जवाब दिया कि इसके बैग देसी है, ये राम नहीं हो सकता...आगे बढ़े तो एस-नाइन कोच के बाहर देखा कि दो छोटे बच्चों के साथ एक सभ्रांत महिला कई सारे बैग्स के साथ खड़ी हैं...विलायती लुक्स वाले ये बैग्स खुद ही गवाही दे रहे थे कि वो ताजा ताजा हिंदुस्तान की सरज़मीं पर लैंड किए हैं...लेकिन राम कहीं नज़र नहीं आ रहे थे...हिम्मत कर मैंने महिला से पूछ ही लिया...आर यू मिसेज़ राम त्यागी...जवाब में स्माइल मिली...तब तक राम जी भी डब्बे से निकलते दिखाई दिए...वो अंदर सामान ही एडजस्ट कर रहे थे...राम तो गर्मजोशी से मिले ही, साथ ही उनके दो नन्हे शहजादों निकुंज और अमेय से भी शेकहैंड का मौका मिला...राम ने भाभीश्री अनु का भी परिचय कराया..

राम के परिवार के फोटो लेने के लिए मैं बेटे का मोबाइल भी साथ ले गया था...ये उन्नत कैमरे वाला मोबाइल है...वरना अपना तो देसी मोबाइल से ही काम चल जाता है...बस कॉल सुननी-सुनानी ही तो पड़ती है...बेटे का मोबाइल ले तो लिया लैकिन अब इसे हैंडल कैसे करूं...फोटोग्राफी का वैसे भी कोई खास शौक नहीं है...लेकिन लगता है अब ये हुनर भी सतीश भाई  से सीखना ही पड़ेगा...ललित भाई से अनुरोध किया कि वो मेरे मोबाइल से राम के साथ मेरी फोटो खींचे...फिर निकुंज और अमेय का भी फोटो सैशन हुआ...लेकिन देखिए गलती से मुझसे कोई बटन दबा और वो सारे फोटो डिलीट हो गए...इस मौके की तस्वीरें आपको अब ललित भाई या राम की खुद की पोस्ट पर ही देखने को मिलेंगी....मैं राम की पोस्ट पर दी हुई तस्वीर को चोरी कर यहां लगा देता हूं...


बड़े रामजी और छोटे राम जी सपनों की दुनिया में खोए

मैं, राम और ललित भाई ब्लॉगिंग और दूसरी बातों में ऐसे मस्त हुए कि ट्रेन के चलने का भी पता नहीं चला...राम राम करके राम जी बामुश्किल ट्रेन पर चढ़े...इस वादे के साथ कि दिसंबर में जल्द ही दिल्ली का दोबारा रुख करेंगे...अब देखना है कि गुरुदेव समीर लाल समीर जी भी कब दिल्ली आने का प्रोग्राम बनाते हैं...दिसंबर में दीपक मशाल का भी भारत लौटना पक्का है...लगता है इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस का जुगाड़ पक्का हो रहा है....क्यों सुन रहें हैं न अविनाश वाचस्पति जी, अजय कुमार झा और राजीव कुमार तनेजा भाई...राम की ट्रेन के जाने के बाद ललित जी ने भी गुड़गांव जाने के लिए विदा ली...मैंने वापस नोएडा का रुख किया...ये सोचते हुए कि सुबह एक घंटे की मशक्कत ने थोड़ी देर के लिए ही सही मगर कितने खुशगवार लम्हों को जीने का मौका दिया...राम और उनके परिवार से मिल कर ऐसा लगा ही नहीं कि जैसे पहली बार उनसे मिल रहा हूं...यही है ब्लॉगिंग का सबसे बड़ा प्लसपाइंट...





शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

ये है दिल्ली मेरी जान...खुशदीप

ए दिल मुश्किल है जीना यहां,  ज़रा बच के, ज़रा हट के...ये है दिल्ली मेरी जान...

गाने में बेशक मुंबई था लेकिन आज देश की राजधानी में लड़कियों या महिलाओं को यही गीत गाना पड़ रहा है...दिल्ली में घटे कुछ दृश्य देखिए...

संसद

संसद पिछले दस दिन से ठप पड़ी है...क्यों भला...सरकार और विरोधी दल आपस में भिड़े हुए हैं...विरोधी दल टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर संयुक्त संसदीय समिति की मांग कर रहे हैं...सत्ताधारी सांसद कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा का हवाला देकर बीजेपी की हवा निकालने में लगे हैं...दोनों अपने रुख से टस से मस नहीं हो रहे...संसद के एक मिनट की कार्यवाही पर चालीस हज़ार रुपये से ज़्यादा का खर्च होता है...अब दस दिन में कार्यवाही के साठ घंटे बर्बाद होने पर कितने करोड़ टैक्सपेयर्स की जेब से चले गए, ज़रा हिसाब लगाईए...मुझे तो सड़क पर दिखने वाला वो नज़ारा याद आ रहा है, जब दो हट्टेकट्टे सांड सींग में सींग फंसा कर भिड़े होते हैं....बस खड़े रहते हैं, दोनों अपनी जगह से एक इंच भी इधर-उधर नहीं होते...

दिल्ली विधानसभा

कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले की जांच को लेकर विरोधी दल बीजेपी ने दिल्ली विधानसभा चलने नहीं दी...विधानसभा के बाहर सड़क पर भी खूब गहमा-गहमी रही...बीजेपी ने लाल किले से विधानसभा तक मार्च निकाला...मज़े की बात ये रही कि इस प्रदर्शन की अगुआई करने वालों में विजय कुमार मल्होत्रा भी शामिल थे...मल्होत्रा दिल्ली विधानसभा में नेता विरोधी दल होने के साथ इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट हैं...मल्होत्रा पिछले तीन दशक से भारतीय तीरंदाज़ी संघ के मुखिया पद को भी सुशोभित करते आ रहे हैं...कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान उनकी एक तस्वीर भी सामने आई थी जिसमें वो सुरेश कलमाड़ी के साथ राष्ट्रपति से मिलने के लिए पहुंचे थे...

धौला कुआं-सत्या निकेतन

मंगलवार की रात करीब साढ़े बारह बजे बीपीओ (कॉल सेंटर) में काम करने वाली दो लड़कियों को उनके आफिस की कैब रिंग रोड पर उतार देती है...वहां से उनकी कॉलोनी का गेट पचास मीटर की दूरी पर ही है...कैब के जाने के बाद एक मिनी टैंपो पर सवार चार दरिंदे वहां आते हैं...दोनों लड़कियों को टैंपो पर खींचने की कोशिश करते हैं...एक लड़की तो बामुश्किल बच निकलती है...नार्थ ईस्ट से ताल्लुक रखने वाली एक लड़की को जबरदस्ती टैंपो में डाल लिया जाता है...चलते टैंपो में गैंगरेप के बाद लड़की को चालीस किलोमीटर दूर ले जाकर मंगोलपुरी में पटक दिया जाता है...इस दौरान कहीं कोई पुलिसवाला या पीसीआर नहीं दिखाई देते जो टैंपो को रुकवा कर लड़की को बचा लेते...वारदात को दो दिन बीत जाते हैं और पुलिस को कोई सुराग हाथ नहीं लगता....



ये सब उसी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की नाक के नीचे हुआ जिन्होंने दो साल पहले महिला पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की ऐसी ही परिस्थितियों में मौत के बाद कहा था कि लड़कियां रात को सड़क पर निकलती ही क्यों है...शीला जी ने आज भी बयान दिया....बयान क्या दिया दिल्ली की कानून व्यवस्था को लेफ्टिनेंट गवर्नर और केंद्रीय गृह मंत्रालय की ज़िम्मेदारी बता कर पल्ला ही झाड़ लिया...यानि जिन हु्क्मरानों से जनता को हिफ़ाज़त की आस होती है वो खुद ही चैन की बांसुरी बजा रहे हैं...वैसे उन्हें फुर्सत भी कहा हैं...संसद और विधानसभा में रस्साकशी से वक्त मिले तब वो जनता की सोचे ना....

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

रूल्स जो भारतीय फॉलो करते हैं...खुशदीप


मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं...मेरी मर्ज़ी...क्या हम भारतीयों के अंदर कोई आइडेंटिकल और टिपीकल जींस पाए जाते हैं...पृथ्वी सूरज का चक्कर काटना छोड़ सकती है लेकिन मज़ाल है कि राइट टू मिसरूल के हमारे जींस अपने कर्मपथ से कभी विचलित हों...अब दिल थाम कर इसे पढ़िए और दिल से ही बताइए कि क्या आप इन रूल्स (मिसरुल्स) का पालन नहीं करते...

रूल नंबर 1
अगर मेरी साइड पर ट्रैफिक जैम है तो मैं बिना एक मिनट गंवाए साथ वाली रॉन्ग साइड पकड़ लूंगा...मानो सामने से आने वाली सभी गाड़ियों को बाइपास की तरफ़ डाइवर्ट कर दिया जाएगा...

रूल नंबर 2
अगर कहीं कोई कतार लगी है तो तब तक कोई भी मेरे चुपके से आगे कतार में लगने को नोटिस नहीं करेगा, जब तक कि मैं अनजान बन कर कहीं और न देख रहा हूं...


रूल नंबर  3
अगर ट्रैफिक सिगनल पर रेड लाइट नहीं काम कर रही है तो चार गाड़ियां पूरी स्पीड के साथ चार अलग-अलग दिशाओं से आने के बावजूद आराम से एक दूसरे को पास कर सकती हैं...


रूल नंबर 4
अगर मैंने किसी मोड़ पर मुड़ने का इंडीकेटर से इशारा दे दिया तो ये कॉन्फिडेंशियल इन्फॉर्मेशन लीक माना जाएगा...

रूल नंबर 5
जितना ज़्यादा मैं कार के शीशे से मुंह बाहर निकाल कर और जितनी ज़ोर से थूकूंगा, हमारी सड़कें उतनी ही मजबूत बनेंगी...


रूल नंबर 6
सिनेमा हॉल में अगर मेरे मोबाइल पर कॉल आती है तो स्क्रीन पर चल रही फिल्म खुद-ब-खुद पॉज़ मोड में चली जाती है...


रूल नंबर 7
ये बहुत ज़रूरी है कि मेरी कार के पीछे आने वाली गाड़ी के ड्राइवर को मेरे बच्चों के निक-नेम अच्छी तरह याद हो जाएं...

रूल नंबर  8
अगर मैं कार इस तरह से पार्क करता हूं कि वहां पहले से खड़ी कार का रास्ता ब्लॉक हो जाए तो इसमें नाराज़गी वाली कोई बात नहीं...दरअसल मैं उस कार के मालिक को इस आपाधापी वाली ज़िंदगी में कुछ आराम के लम्हे देना चाहता हूं...जिसमें वो और कुछ न करे सिवाय मुझे कोसने के...


रूल नंबर 9
अगर मैं सड़क पर किसी बारात में...मेरे यार की शादी...गाने पर ठुमके लगा रहा हूं तो उस दिन और सब गाड़ी वालों को ये मान लेना चाहिए कि ये मेरे बाप-दादा की सड़क है और उन्हें इस पर धीरे-धीरे सरकने का मौका देकर उन पर एहसान किया जा रहा है...

रूल नंबर 10
वेरी वेरी वेरी इंपॉर्टेंट...शहर में सिर्फ तीन ही लोग इंपॉर्टेंट हैं...ME, I, MYSELF...

बुधवार, 24 नवंबर 2010

घर के मुखिया का सिर्फ ईमानदार होना काफ़ी नहीं...खुशदीप

कहीं ब्लॉग पर ही पढ़ा था...गौरमिन्ट (गवर्मेंट का देशज) वो होती है जो मिनट-मिनट पर गौर करे...प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठा सकता...उनके राजनीतिक विरोधी भी नहीं...लेकिन घर के मुखिया का बस यही फ़र्ज होता है कि वो खुद ईमानदार रहे...घर के और सदस्य क्या कर रहे हैं, किसके साथ उठ-बैठ रहे हैं, क्या उन पर नज़र रखना मुखिया का काम नहीं...और मुखिया यही नहीं देख पाता कि उसकी नाक के नीचे क्या हो रहा है तो फिर काहे का उसका तजुर्बा और काहे की योग्यता...और अगर मुखिया घरवालों की गलत-सलत हरकतों को देख कर भी अनजान बना रहता है तो उसे भी पाप का उतना ही भागीदार माना जाना चाहिए जितना कि खुद पाप करने वाला...



कम से कम तीन मामले तो ऐसे आ ही गए हैं जहां लगता है गौरमिन्ट ने मिनट-मिनट पर गौर नहीं किया...

कॉमनवेल्थ गेम्स
आप अपने घर में बच्चा जितना चाहे पैसा मांगता रहे, क्या आप उसे वो देते रहते हैं...क्या आप बच्चे से कभी हिसाब नहीं पूछते...फिर क्यों कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन के लिए जितना पैसा मांगा जाता रहा, उतना पैसा आंख-मूंद कर दिया जाता रहा...घर में भी हम देखते रहते हैं कि बच्चा गलत सोहबत में बिगड़ तो नहीं रहा...प्रधानमंत्री की ओर से कॉमनवेल्थ में मोटी लूट के आरोपों पर वक्त रहते क्यों ध्यान नहीं दिया गया..


टू जी स्पेक्ट्रम
प्रधानमंत्री मंगलवार को मुरासोली मारन के स्मृति समारोह में गए तो वहां उनकी नज़र पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा पर पड़ी....प्रधानमंत्री ने राजा के कंधे पर हाथ रखने से पहले पूछा- हाऊ आर यू...राजा का जवाब था-नाइस...राजा वही शख्स हैं, जो टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सरकार को एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ का चूना लगाने के लिए आरोपों के कटघरे में खड़े हैं... यूपीए के पिछले कार्यकाल में भी राजा के दामन पर भ्रष्टाचार के कीचड़ के छींटें आए...फिर क्यों पिछले साल भी लोकसभा चुनाव के बाद यूपीए- टू की कैबिनेट टीम में राजा को जगह दी गई...आखिर किस दबाव में लिया गया ये फैसला...पीएम अगर राजा को साफ तौर पर मंत्री बनाने से इनकार कर देते तो करुणानिधि को भी थक-हार कर दूरसंचार मंत्री के लिए दूसरे का नाम आगे करना पड़ता...


सीवीसी की साख
देश में विजिलेंस के लिए सबसे ऊंचा ओहदा चीफ विजिलेंस कमिश्नर यानि सीवीसी का होता है...लेकिन जब सीवीसी खुद ही भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर निशाने पर हो तो इंसाफ़ की उम्मीद कैसे की जा सकती है...यही सवाल सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी पी जे थॉमस को लेकर सरकार से किया...थॉमस केरल कॉडर से हैं और 1991-92 के पामोलिन आयात घोटाले की चार्जशीट में उनका नाम है...उस वक्त थॉमस केरल के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति सचिव हुआ करते थे...ये घोटाला सिर्फ दो करोड़ चालीस लाख का था...ये रकम टू जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ गेम्स, आईपीएल, आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाले में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े करोड़ों-करोड़ के आगे नगण्य नज़र आती है...थॉमस सीवीसी बनने से पहले दूरसंचार विभाग में ही सचिव के पद पर तैनात थे..सीवीसी बनाने का फैसला पीएम, गृह मंत्री पी चिदंबरम और लोकसभा में नेता विरोधी दल की कमेटी करते हैं...यहां नेता विरोधी दल सुषमा स्वराज के फाउल-फाउल चिल्लाने के बावजूद पीएम और गृह मंत्री ने थॉमस के नाम पर ही मुहर लगाई...

ऊपर जो तीनों मामले गिनाए हैं उनमें गौरमिन्ट ने क्या वाकई मिनट-मिनट पर गौर किया....अगर नहीं तो प्रधानमंत्री जी कैबिनेट के मुखिया होने के नाते आपको भी कसूरवार ठहराया जाएगा...



स्लॉग ओवर

ओबामा ने भारत दौरे पर कहा कि वो मौजूदा जिस गद्दी पर हैं, वो सिर्फ गांधी की बदौलत है...



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी जवाब दिया....मैं जहां तक पहुंचा हूं, उसके पीछे भी एक 'गांधी' ही है....

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

आज बस भ्रष्टाचार के फंडे की दो फुलझड़ियां...खुशदीप

मैथ्स के टीचर ने छात्र से सवाल पूछा- अगर एक दीवार को बनवाने में दस हज़ार रुपये का खर्च आता है तो दो दीवार बनवाने में कितना खर्च आएगा...

छात्र...दस करोड़ रुपये

टीचर...नालायक, ये कौन सा गणित सीखा है तूने...क्या नाम है तेरे बाप का...

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छात्र...सुरेश कलमाड़ी



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टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर प्रधानमंत्री जी  ने आखिर अपनी चुप्पी तोड़ी...कहा...

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सिर्फ दो जी जो मैं जानता हूं, वो हैं सोनिया जी और राहुल जी...

सोमवार, 22 नवंबर 2010

तस्वीरें बताती है कल क्या था आलम...रोहतक रिपोर्टिंग...खुशदीप

अजय कुमार झा, मैं और शाहनवाज़ सिद्दीकी, मौज के साथ रिपोर्टिंग की ज़िम्मेदारी का भी एहसास

निर्मला कपिला जी और संगीता पुरी जी का खिलखिलाना यानि महफिल पर बहार का आना

मां-बेटे की बड़े दिनों से मिलने की हसरत पूरी हुई

धोखा मत खाइए...राजीव कुमार तनेजा भाई यहां ब्रेकडांस कर सब का दिल नहीं बहला रहे हैं

ललित शर्मा जी को शूट एट साइट के आर्डर

योगेंद्र मौदगिल भाई जहां हो वहां स्माइल नॉन स्टॉप रहती हैं

अब आप ही तय कीजिए ये छैलछबीले झा जी ब्लॉगवुड के सलमान ख़ान या ऋतिक रोशन

सबसे बाएं खड़े है कल के प्रोग्राम के अनसंग हीरो सतीश सक्सेना जी, ऊपर के सारे फोटो सतीश भाई के कंधे पर टंगे कैमरे का ही कमाल हैं, साथ खड़े हैं-पृथ्वीराज कपूर जी, केवलराम, राज भाटिया जी, ललित शर्मा, संजय भास्कर, मैं, राजीव कुमार तनेजा, बैठे हैं-डॉ अरुणा कपूर, निर्मला कपिला जी, संजू तनेजा, संगीता पुरी जी और कविवर योगेंद्र मौदगिल
ओ किना बिल हो गया भाई...कल के होस्ट राज भाटिया जी

रविवार, 21 नवंबर 2010

तिलयार चिल यार...रोहतक लाइव रिपोर्टिंग कंटीन्यू...खुशदीप

ललित शर्मा जी की बात को ध्यान से सुनतीं संजू तनेजा (चेहरा नहीं दिख रहा),
संगीता पुरी जी, निर्मला कपिला जी, डॉ अरुणा कपूर जी,
श्रीमती अंजू सोहेल (अंतर सोहेल की धर्मपत्नी) और श्रीमती सिंगला
दिल से दिल की बातें शुरू हो चुकी हैं...मैं तो लाइव रिपोर्टिंग में लगा हूं...लेकिन साथ ही नोट करता जा रहा हूं कि कौन क्या कह रहा है...मैंने जैसा कि पहले अपनी पोस्ट पर लिखा था कि वैसा ही यहां प्रस्ताव किया कि सब अपनी कमज़ोरियां बताएं...सबसे पहले मैंने ही शुरुआत की...मैं भावुक हूं...सब कहते हैं टिप्पणियों से फर्क नहीं पड़ता, लेकिन मुझे पड़ता है...मेरे लिखे पर कोई अच्छा या बुरा कमेंट न करें तो मैं विचलित हो जाता हूं...

फिर राज भाटिया जी ने बताया कि कोई अगर उलट-सुलट कमेंट लिखता है तो वो आपे पर मुश्किल से ही नियंत्रण पा पाते हैं...ऐसा ही कुछ ललित भाई ने भी बताया...ललित भाई के अनुसार अगर कोई गलत बात कहता है तो शुक्र है कि वो सामने नहीं होता...जानते हैं ललित भाई आप नेशनल लेवल के शूटर हैं...ललित भाई भी फुल टाइम ब्लॉगिंग एडिक्ट हैं...उन्होंने कमजोरी बताई कि उन्हें शुगर होने के बावजूद वो दो दो साल तक शुगर चेक नहीं करा पाते...ललित भाई ने ब्लॉग के ज़रिए किसी की पहली शादी होने की जानकारी भी दी...ललित भाई ने ब्लॉग के ज़रिए ब्लॉगर्स को कमाई की एक योजना और जनवरी में कार्यक्रम होने की जानकारी दी...इस मामले में जी के अवधिया जी पूरे ब्लॉगवु़ड की अगुआई कर सकते हैं....

फिर बारी आई संजू तनेजा जी की...उन्होंने कहा कि कमज़ोरियां ब्लॉगिंग से ही नहीं जुड़ी होतीं...संजू जी का दर्द हम समझ सकते हैं...क्योंकि सबको पता है कि राजीव कुमार तनेजा भाई का नेट कनेक्शन दिन के 24 घंटे ऑन रहता है...संजू भाभी ने कहा कि वो किचन में काम भी कर रही होती हैं तो भी राजीव भाई यही कहते हैं पहले नेट पर आकर उनकी पोस्ट को पढ़े...वाकई तनेजा दंपत्ति का ब्लॉगिंग के लिए समर्पण गजब का है...संगीता पुरी जी ने बताया कि वो ब्लॉगिंग में ज्योतिष को लेकर गलत धारणाओं और अंधविश्वास को दूर करने के उद्देश्य से आई हैं...

निर्मला कपिला जी ने कमजोरी के बारे में बताया कि उन्हें कंप्यूटर की ज़्यादा जानकारी न होने की वजह से दिक्कतों का सामना करना पड़ता है....निर्मला जी के मुताबिक एक बार उनसे किसी से ब्लॉग पर वोटिंग करने के लिए कहा, लेकिन वो तमाम कोशिश करने के बाद भी वोटिंग नहीं कर सकीं...डॉ अरुणा कपूर जी ने भी कंप्यूटर की ज़्यादा जानकारी न होने को अपनी कमज़ोरी बताया...फतेहाबाद, हिसार से आए युवा ब्लॉगर संजय भास्कर ने कहा कि उन्हें हिंदुस्तान अखबार में कॉपीराइटर मित्र मलखान सिंह ने ब्लॉगिंग में आने की प्रेरणा दी....संजय भास्कर ने कॉपी में ज़्यादा गलतियों को अपनी कमजोरी बताया...हरदीप राणा ने अपना परिचय दिया लेकिन कमजोरी नहीं बताई...योगेंद्र मौदगिल भाई के बोलने से पहले सतीश सक्सेना भाई ने उनका परिचय उनकी इन पंक्तियों से कराया...

मस्जिद की मीनारें बोलीं, मंदिर के कंगूरों से
संभव हो तो देश बचा लो मज़हब के लंगूरों से...


मज़हब के नाम पर नफ़रत फैलाने वाले चाहे ब्लॉग पर हों या कहीं ओर, इन पक्तियों को ज़रा कान में तेल डालकर सुन लें...योगेंद्र मौदगिल ने राजीव तनेजा को खुशकिस्मत बताया कि उनकी पत्नी (संजू भाभी) उनकी रचनाएं पढ़ती हैं...योगेंद्र भाई  का दर्द था कि उनकी पत्नी कविताओं पर कान तक नहीं धरती...अब बारी आई, सतीश सक्सेना जी की...सतीश भाई ने साफगोई से कहा कि अपनी बुराइयां  दिखती नहीं...लेकिन अपनी तारीफ सुनना किसे अच्छा नहीं लगता...ये मानवीय कमजोरी है...सतीश भाई ने ये भी कहा कि ग्रुपिज्म से सभी को बचना चाहिए....

फिर डॉ़ प्रवीण चोपड़ा की बारी आई...डॉक्टर साहब ने कहा कि ब्लॉगर मीट जैसे आयोजनों से सामुदायिक बंधुत्व की भावना बढ़ रही है...उन्होंने ये भी कहा कि वो मार्केटिंग फोर्स से प्रभावित नहीं होते...डॉक्टर साहब ने कमजोरी के बारे में बताया कि नौकरी की वजह से सब कुछ साफ नहीं लिख पाता...इस वजह से पंद्रह-बीस फीसदी सच छुपा लेता हूं...

डॉक्टर साहब और निर्मला कपिला जी ने ये भी कहा कि ब्लॉगवाणी के बंद होने से अब ये पता नहीं चल पाता कि कौन सी नई पोस्ट आई...इस पर अजय कुमार झा जी ने वादा किया कि वो जल्दी ही इस समस्या पर एक पोस्ट लिखेंगे...डॉक्टर साहब ने कहा कि ब्लॉग मीट एक सत्संग की तरह है...इस पर योगेंद्र मौदगिल भाई ने चुटकी ली कि सत्संग के बाद सब हाथ झाड़ कर खड़े हो जाते हैं...तेरा तुझको अर्पण....

राजीव कुमार तनेजा भाई ने बात शुरू की कि उनका छोटा सा ब्लॉग है...इस पर सब एकसुर में बोले...ब्लॉग छोटा और पोस्ट बड़ी से बड़ी ...इसी में राजीव भाई की खूबी भी आ गई और कमज़ोरी भी ...फिर हिमाचल से ब्लॉग पर पीएचडी कर रहे केवलराम जी ने बताया कि उनका पूरा वक्त ब्लॉग को समर्पित है....ब्लॉग की खूबी ये है कि आज डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेशनल्स भी हिंदी में लिख रहे हैं...वो अपना काम सारा चाहे इंग्लिश में करते हैं लेकिन ब्लॉगिंग हिंदी में ही करते हैं...अंतर सोहेल (अमित गुप्ता) ने बताया कि उन्हें ब्लॉगिंग का एक वक्त में इतना नशा हो गया था कि उन्हें सपनों में भी ताऊ रामपुरिया दिखाई देते थे...जिनकी फोटो तक ब्लॉगर्स ने नहीं देखी....अंतर सोहेल ने एक मज़ेदार बात बताई कि उन्हें अंतर सोहेल नाम आचार्य रजनीश के दूत आनंद सम्भाव जी ने दिया था...जिसका मतलब है कि सुंदर अंतर्मन...फिर आए प्रेमरस ब्लॉग के शाहनवाज़ सिद्दीकी...शाहनवाज़ ने अपनी कमज़ोरी बताई कि कोई कविता या गज़ल उनके दिल को छूती है तो वो ये तय नहीं कर पाते कि क्या टिप्पणी दूं..शाहनवाज़ भाई ने ये भी कहा कि वो ये भी सोचते रहते हैं कि ब्लॉगिंग से कमाई कैसे शुरू हो...राज भाटिया जी ने कहा कि ब्लॉग से वास्ता सिर्फ इस ज़रूरत से वजह हुआ कि वो जर्मनी में रहने की वजह से हिंदी भूलते जा रहे थे...फिर गीता के श्लोक ब्लॉग पर लिखने वाले आर सी शर्मा जी ने ब्लॉग बनाने की सलाह दी...राज जी ने बताया कि फिर मैं खुद से जुड़ी छोटी छोटी बातें, संस्मरण डालने लगा...लोगों को पसंद आने लगा...टिप्पणियां आने लगी...और कारवां बनता गया...नीरज जाट ने इस मौके पर बताया कि उनके यात्रा वृतांतों को सबसे पाठक ब्लॉगिंग से नहीं गूगल जैसे सर्च इंजनों से मिलते हैं...इस अवसर पर डॉ अनिल सवेरा और नरेश सिंह राठौड़ ने भी अपने ओजस्वी विचारों से सबको सराबोर किया...

अजय कुमार झा भाई ने बताया कि वो रोज़ तेरह हिंदी के अखबार पढ़ते हैं..अजय जी ने कमजोरी बताई कि उनकी पत्नीश्री ने कभी लैपटॉप गिफ्ट दिया था...लेकिन अब पत्नीश्री को ये लैपटॉप ही सबसे बड़ा नासूर दिखाई देता है...वजह है अजय भाई का ब्लॉगिंग के लिए समर्पण...अजय भाई ने एग्रीगेटर की समस्या का भी जिक्र किया...अजय भाई  के मुताबिक कुछ लोग चिट्ठाजगत पर भी उंगली उठा रहे हैं...ब्लॉगवाणी पहले ही बंद हो चुका है...उसका सशक्त विकल्प अब तक नहीं आ पाया है...ऐसे में चिट्ठाजगत की टांगखिचाई की जगह उसकी सराहना की जानी चाहिए...सबके विचार व्यक्त करने के बाद योगेंद्र मौदगिल ने मज़ेदार छंद और हरियाणवी किस्से सुनाकर समां बांध दिया छंदों के शीर्षक इस प्रकार है...

मोलर गया एक बार घूमने गया चीन देश....


मल्लिका शेरावत जूसर में चोली लहंगे को धो रही है...


नेताजी की पत्नी को डॉक्टर ने चेक किया...


जमाईराजा को रात को सूर्पनखा का सपना आया...


कालेज का प्रिसिंपल बोला, गर्ल्स होस्टल में कोई छोरा नहीं जाएगा


योगेंद्र मौदगिल जी के कविता पाठ में खोए सभी ब्लॉगरगण
 हमारे नोएडा लौटने से ठीक पहले अलबेला खत्री जी भी आ पहुंचे...लेकिन वो पहले नहा-धो कर ही सबके बीच आने को तैयार हुए...

लेट एडीशन- आयोजन के दौरान ही गुरुदेव समीर लाल समीर जी, अविनाश वाचस्पति और शिवम मिश्रा ने फोन पर कई ब्लॉगर्स से बात की और कार्यक्रम की कामयाबी के लिए शुभकामनाएं दी...एक बात और गुरुदेव के लिए खास तौर पर...लंच में पापड़ सलाद, चपाती, मिसी रोटी, नान, शाही पनीर, दाल मक्खनी, मटर-गोभी-आलू, चावल, रायता, छोले और आइसक्रीम का इंतज़ाम था...मेरे, सतीश सक्सेना भाई, अजय कुमार झा, और शाहनवाज़ सिद्दीकी के रवाना होने से पहले राज जी ने चाय और मिठाई के लिए बहुत ज़ोर दिया...लेकिन हमें गुड़गांव पहुंचने की जल्दी थी...आज ही डॉ टी एस दराल जी के पिताजी सीनियर दराल सर की अंत्येष्टि थी...हम वहां टाइम पर पहुंच तो नहीं सकते थे लेकिन ये तय किया कि डॉक्टर साहब से मिलने ज़रूर जाएंगे...

इससे दो घंटे पहले की रिपोर्ट-

तिलयार में ब्लॉगरों की बहार...रोहतक लाइव रिपोर्टिंग...खुशदीप


पॉलिटिकली करेक्ट दिखने की मजबूरी...खुशदीप

कल माहौल हल्का करने के लिए महफूज़ पर पोस्ट लिखी...सब ने उसे अपने-अपने नज़रिए से लिया...किसी ने फिज़ूल पोस्ट माना...किसी ने महफूज़ का महिमामंडन...डांट भी मिली कि मैं महफूज़ की बेज़ा हरकतों पर लताड़ने की जगह उसे पैम्पर कर (...बिगाड़)  रहा हूं...एक तरह से ये बातें सही भी हैं...

मुझसे इस पोस्ट का उद्देश्य भी पूछा गया...उद्देश्य तो मैंने एक कमेंट के ज़रिए साफ़ भी कर दिया कि ब्लॉगवुड पर निराशा के बादलों को मुस्कान की फुहार से कुछ छांटना चाहता था...किसी शायर ने खूब कहा भी है कि मंदिर-मस्जिद जाने से बेहतर है किसी रोते को हंसाया जाए...वही मैंने भी कोशिश की...वैसे भी ब्लॉगिंग से मेरा ये मतलब कभी नहीं रहा कि पत्रकार हूं तो यहां भी हर वक्त समाचार या समाचार विश्लेषण ही करता रहूं...यहां जो मैं हूं, उसे ही आप तक पहुंचाने की कोशिश करता हूं...

आज की पोस्ट का जो शीर्षक है, उस पर बाद में आता हूं...पहले कल जो आपसे वादा किया था...उसे पूरा कर दूं...महफूज़ के रजनीकंतिया स्टाइल के कुछ बचे रूल्स देने से पहले साफ कर दूं कि जिस तरह रजनीकांत पब्लिक फिगर है, और हम उनके किस्से सुनाते रहते हैं, इसलिए महफूज़ भी ब्लॉगिंग के नज़रिए से अब पब्लिक फिगर है...हम उसके बारे में भी चटकारे ले सकते हैं...इसे ये न माना जाए कि हम एक दूसरे ब्लॉगरों पर ही लिख रहे हैं...यहां बहाना महफूज़ है लेकिन निशाना दूर तक है...

महफूज़ के रजनीकंतिया स्टाइल के बचे रूल्स

इन्टेल की नई टैगलाइन है- महफूज़ इनसाइड...


एक बार डायनासॉर्स ने महफूज़ से रकम उधार ली और चुकाने से मना कर दिया...वो दिन आखिरी था जिस दिन डायनासॉर्स धरती पर दिखे थे...


महफूज़ ने अपनी बॉयोग्राफी लिखी...उसे अब गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स के नाम से जाना जाता है...


एक बार एक इंटरनेशनल बास्केटबॉल प्लेयर ने महफूज़ से कहा कि वो दो घंटे तक बास्केटबॉल को उंगली पर नचा सकता है...महफूज़ का जवाब था...तुम क्या समझते हो ये धरती ऐसे ही घूम रही है...


इस तरह के सुपरमैनी कारनामों का ज़िक्र करना मेरा महफूज़ को समझाने का तरीका है...ये लार्जर दैन लाइफ़ दुनिया रील लाइफ़ में ही अच्छी लगती है...रियल लाइफ में कोई इस तरह के दावे करे तो वो वैसे ही किस्से बन जाते हैं जैसे रजनीकांत को लेकर बने हैं...

अब एक सवाल पूरे ब्लॉगवुड से...हम खुद को हर वक्त पॉलिटिकली करेक्ट क्यों दिखाना चाहते हैं...क्या हम हमेशा शत प्रतिशत सही ही होते हैं...क्या हमारे अंदर कमज़ोरियां नहीं हैं...मैं पहले भी ये बात कई बार कह चुका हूं, फिर कह रहा हूं कि मैं अनिल पुसदकर जी और महफूज़ के लेखन का इसलिए ही सम्मान करता हूं क्योंकि वो अपनी कमज़ोरियों, खामियों का भी धड़ल्ले से अपनी पोस्ट में ज़िक्र कर सकते हैं...खुद अपने पर चटकारें ले सकते हैं....ये हिम्मत विरले ही रखते हैं...

आखिर में एक बात ओर...कल राज भाटिया जी ने रोहतक के तिलयार पिकनिक स्पॉट पर सभी ब्लॉगर्स को दिल से बुलाया है...मेरा भी सतीश सक्सेना जी के साथ जाने का प्रोग्राम है...लेकिन पहले भी ऐसे मिलन समारोह हुए तो सभी उम्मीद रखने लगते हैं कि यहां ब्लॉगिंग के विकास के लिए गहन चिंतन-मनन होगा...ब्लॉगिंग की दिशा और दशा बदलने के लिए विचार रखे जाएंगे...ज़ाहिर है ऐसे कार्यक्रमों में एक तो वक्त की सीमा होती है...ऐसे में यहां बहुत ज़्यादा कुछ हो पाना संभव भी नहीं...लेकिन कल मैं एक प्रस्ताव रखूंगा कि वहां जो भी आए, अपनी दो सबसे बड़ी कमज़ोरियों का ज़िक्र ज़रूर करें...अगर हम पहले खुद को बदलें तो बाकी सब अपने आप ही बदल जाएगा...

रोहतक का तिलयार पिकनिक स्पाट

इस लिंक पर जाकर आप तिलयार के और नज़ारे देख सकते हैं...

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

महफूज़ के अंदर भी है रजनीकांत...खुशदीप

कभी सुख, कभी दुख,
यही ज़िंदगी है,
ये पतझड़ का मौसम,
घड़ी दो घड़ी है,
नए फूल कल फिर,
डगर में खिलेंगे,
उदासी भरे ये दिन,
कभी तो हटेंगे...


कभी धूप तो कभी छांव...कभी खुशी तो कभी गम...इसी का नाम ज़िंदगी है...रात के बाद दिन...अंधेरे के बाद उजाला, यही जीवन की रीत है...जाने वालों का हमेशा शोक मनाने से कहीं अच्छा है कि हम उनके आदर्शों को आत्मसात करते हुए उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दें...मेरे पापा स्वस्थ थे तो सब को खूब हंसाते थे, हर वक्त खुशियां बांटते थे...अब उनके जाने के बाद मैं सोच रहा हूं कि उन्होंने क्या सोच कर मेरा नाम खुशदीप रखा...तो लीजिए अब उन्ही को याद करते हुए मैं भी दोबारा स्लॉग ओवरिया फॉर्म में लौट रहा हूं...

शुरुआत करता हूं अपने महफूज़ मियां से...जनाब ने लखनऊ के संजय गांधी पीजी मेडिकल कालेज के अस्पताल में भी अपना जलवा बिखेर रखा है...डॉक्टर्स को भी अपना मुरीद बना रखा है...एक युवा डॉक्टरनी साहिबा को तो खास तौर पर...खैर ये कहानी तो महफूज़ अपने आप ही सुनाएगा...आज मैं बात करूंगा महफूज़ के अंदर छिपे रजनीकांत की...अगर न्यूटन जिंदा होते और जिस तरह रजनीकांत को फिजीक्स के सारे रूल्स तोड़ते देख खुदकुशी कर लेते, कुछ ऐसा ही आलम महफूज़ मियां का है...



महफूज़ के कुछ सुपरमैनी गोल्डन रूल्स-

गोली महफूज़ को लगती है तो महफूज़ का कुछ नहीं बिगड़ता, अंतिम संस्कार गोली का होता है...


महफूज़ घड़ी नहीं पहनता...बल्कि खुद डिसाइड करता है कि टाइम कितना होना चाहिए...


महफूज़ की बिल्डिंग के बेसमेंट में भी टेरेस होता है...


एक बार महफूज़ ने फुटबॉल को आसमान में किक किया था...वो फुटबॉल प्लूटो के तौर पर सूरज का चक्कर काट रही है...


महफूज़ अपने चार्जर को मोबाइल से चार्ज कर सकता है...


महफूज़ को जब विदेश जाना होता है तो वो सबसे ऊंची बिल्डिंग से छलांग लगाता है और फिर इंतज़ार करता है कि पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने का...


महफूज़ के रजनीकंतिया रूल्स कल की पोस्ट में भी जारी रहेंगे...

ब्लॉगवुड को बुरी नज़र...खुशदीप

आज महफूज़ मियां पर मज़ेदार पोस्ट लिखने का मूड था...मकसद यही था कि गेयर बदल कर फिर स्लॉग ओवरिया माहौल बनाऊं...लेकिन इसे आज टाल दिया...दरअसल पिछले दो महीने से मैं एक चीज़ महसूस कर रहा हूं...शायद आपको भी हुई हो...लगता है ब्लॉगवुड किसी बुरी नज़र के साये में है...हो सकता है ये महज़ मेरा वहम हो...

इस बुरे दौर की शुरुआत महाराष्ट्र के दौरे पर पाबला जी की मारूति वैन के जल कर ख़ाक होने से हुई...फिर महफूज़ पर गोली चली...ये इत्तेफ़ाक है या कुछ और, लेकिन पाबला जी को इन दोनों घटनाओं का पहले ही आभास हो गया था...इसी दौरान मिथिलेश दुबे के डेंगू से ग्रस्त रहने की खबर भी अरविंद मिश्रा जी ने अपनी एक पोस्ट के माध्यम से दी...ऊपर वाले का शुक्र है कि महफूज़ और मिथिलेश दोनों तेज़ी से स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं और जल्दी ही चंगे होकर पोस्ट लिखेंगे...

इन दो महीनों में अगर सबसे ज़्यादा किसी को भुगतना पड़ा है तो वो पाबला जी ही हैं...महाराष्ट्र के हादसे से अभी उभरे भी नहीं थे कि बेटे का भिलाई में बाइक से एक्सीडेंट हो गया...बेटा हॉस्पिटल में है कि पाबला जी की माता जी को ब्रेन हैमरेज हो गया...ये पोस्ट लिखी ही थी कि दिनेश राय द्विवेदी सर की पोस्ट से पता चला कि पाबला जी की माता जी हरभजन कौर जी का १८ नवंबर की अपराह्नन स्वर्गवास हो गया...ईश्वर उन्हें अपने चरणों में स्थान दे... पाबला जी बड़े जीवट के साथ इस मुश्किल स्थिति का सामना कर रहे हैं...ईश्वर से प्रार्थना है कि बेटे  को शीघ्र स्वस्थ करे...पाबला जी से जब भी फोन पर बात करता हूं, गजब का धैर्य उनमें दिखाई देता है...वाहे गुरू ऐसा ही हौसला बनाए रखने की आगे भी पाबला जी को शक्ति देता रहे...

इधर दिल्ली में राजीव कुमार तनेजा भाई की माताजी का हॉस्पिटल में इलाज़ चल रहा है...राजीव भाई और संजू भाभी पूरे जी-जान से माताजी की सेवा में जुटे हुए हैं...ऐसे बेटे-बहू हर मां-बाप को मिलें...इसके अलावा पिछले दिनों ही अलबेला खत्री जी को भी गुड़गांव आकर अपने भ्राताश्री के हार्ट की सर्जरी करानी पड़ी...आशा है अलबेला जी के भाई अब पूरी तरह स्वस्थ होंगे...उधर, कनाडा में अदा जी के बाबा जी को भी अचानक तबीयत खराब होने के चलते आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा...ऊपर वाले से यही दुआ है कि बाबा जी को शीघ्र स्वस्थ करे और अदा जी के परिवार को इस कठिन वक्त में संबल दे...

कल दीपक मशाल ने गज़ल के शहंशाह महावीर शर्मा जी के लंदन में देहावसान की ख़बर दी...महावीर जी जैसे मनीषी को पूरे ब्लॉगवुड की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि...मेरे सिर से पापा का साया ठीक दीवाली वाले दिन उठ गया...नौ दिन बाद 14 नवंबर को डॉ टी एस दराल को इसी स्थिति का सामना करना पड़ा और दुनिया को खुशियां बांटने वाले सीनियर दराल सर ने दुनिया से विदाई ली...

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

मिलिए मेरे भतीजे करन सहगल से...खुशदीप

आज की माइक्रोपोस्ट मैं एक निजी प्रायोजन से लिख रहा हूं...दरअसल मैं आप सबसे अपने भतीजे करन सहगल के लिए एक छोटी सी मदद चाहता हूं...करन को दो साल पहले ब्रिटिश काउंसिल ने विश्वस्तरीय प्रतियोगिता के बाद इंटरनेशनल क्लाइमेट चैंपियन चुना था...इसके बाद वो ब्रिटिश काउंसिल के ज़रिए लंदन और कोबे (जापान) में इंटरनेशनल क्लाइमेट मीट्स में भारत का प्रतिनिधित्व भी कर चुका है...


फोटो में करन मध्य में है

करन इस वक्त दिल्ली यूनिवर्सिटी के शहीद सुखदेव कालेज ऑफ बिज़नेस स्टडीज में बीबीएस का स्टूडेंट है...उसे अपने एक प्रोजेक्ट के लिए सौ लोगों का सर्वे करना है...आप सबको इस सर्वे को पूरा करने में दो मिनट का वक्त लगेगा...अगर आप इस लिंक पर जाकर सर्वे को पूरा कर सकें तो मैं व्यक्तिगत तौर पर आपका शुक्रगुज़ार रहूंगा...

बुधवार, 17 नवंबर 2010

मेरे सिर पर पापा की पगड़ी...खुशदीप

पिछले दस-ग्यारह दिन में जो देखा, जिया, महसूस किया, सहा, शब्दों में उतार पाना बड़ा मुश्किल है...लेकिन एक अल्पविराम के बाद जीवन के रंगमंच पर नाचने के लिए आपको फिर उतरना ही पड़ता है...मुझे भी यही करना पड़ा है...पांच नवंबर को दीवाली वाले दिन सुबह ब्रह्ममुहुर्त (पौने पांच बजे) पर पापा के जाने से मेरी दुनिया बदल गई...बीमारी की वजह से पापा का शरीर अशक्त था...लेकिन मस्तिष्क पूरा सजग था...घर में छोटे होने की वजह से मुझे उनका सबसे ज़्यादा प्यार मिला...लेकिन मुझे ये नहीं पता था कि छोटा होने के बावजूद पापा के अंतिम संस्कार की सभी रस्में मेरे हाथों से ही संपन्न होंगी...सबसे बड़े भाई की तबीयत ठीक नहीं थी...इसलिए पंडितजी के कहे के मुताबिक अंतिम संस्कार या सबसे बड़ा पुत्र करता है या सबसे छोटा, मुझे ही सारे संस्कार निभाने पड़े...शायद यहां भी पापा मेरे लिए अपना ज़्यादा प्यार छोड़ गए थे...

मेरठ का सूरजकुंड शमशान घाट हो या हरिद्वार का कनखल...कुशा घाट हो या हर की पैड़ी...मुखाग्नि से लेकर अस्थि विसर्जन, पिंडदान, पीपल का चालीस बाल्टियों से गंगा स्नान, पैतृक पुरोहित के पास बैठकर सदियों से चले आ रहे खानदानी रजिस्टर में आमद दर्ज कराना...हर अनुभव मुझे बड़ा करता गया...लेकिन अभी कुछ और भी होना बाकी था... तेरहवीं वाले दिन पिता के नाम की पगड़ी सिर पर बांधी गई तो एक नई ज़िम्मेदारी का अहसास मेरे अंदर तक घर कर गया, जिसे मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था...पापा का जो हाथ स्नेह से कभी मेरे सिर के बालों को दुलारता था, ठीक वही स्पर्श मैंने पगड़ी के रूप में सिर पर पाया...

पापा पार्टिशन के वक्त भारत में मेरठ आकर बसे तो महज सत्रह-अट्ठारह साल के थे...बेहतरीन स्टूडेंट...लेकिन सब कुछ पाकिस्तान में लुटा-पिटा कर आने के बाद परिवार को सहारा देना था तो छोटी उम्र में ही काम की तलाश में निकलना पड़ा...ये सिर्फ मेरे पापा के साथ ही नहीं हुआ...उस वक्त जो परिवार भी रिफ्यूज़ी बनकर भारत आए, सभी को ऐसे ही हालात से दो-चार होना पड़ा था...लेकिन दिन-रात की मेहनत रंग लाई...खुद स्टैंड हुए, परिवार को भी स्टैंड किया...ईमानदारी और ज़िंदादिली के बूते व्यापार में अच्छी साख बनाई...शादी के बाद मदद के लिए मां का हाथ मिला तो पापा के बिजनेस की तरक्की की रफ्तार और बढ़ गई...पहले पापा ने मुल्क का बंटवारा देखा था...अब घर में बंटवारा देखा...एक बार फिर पापा ने राजीखुशी सभी कुछ अपने हाथ से निकल जाने देना मंजूर किया...और नए सिरे से बिज़नेस में ज़ीरो से शुरुआत की...कई कष्ट झेले लेकिन मां के चट्टान की तरह साथ डटे रहने से हर बाधा को पार किया और फिर कामयाबी की नई इमारत खड़ी की...

पापा अपनी जन्मभूमि शेखुपुरा को याद करते थे लेकिन अपनी कर्मभूमि मेरठ से भी उन्हें उतना ही प्यार था...कभी मेरे पास नोएडा आते भी थे तो ज़्यादा दिन नहीं टिक पाते थे...उनका मन मेरठ में ही बसा रहता था...मेरठ में ऐसा कोई शख्स नहीं बचा होगा जो उनसे कभी मिला हो और तेरहवीं पर न पहुंचा हो...मेरठ में मैंने महसूस किया कि छोटे शहरों में रिश्तों को अब भी कैसे मान दिया जाता है...बड़े शहरों की कोरे स्वार्थ की मानसिकता और औपचारिक रस्म अदायगी से दूर किस तरह के मीठे अपनेपन का अहसास होता है...यही अपनापन मुझे ब्लॉगजगत में भी शिद्दत के साथ देखने को मिला...दूरियों की वजह से बेशक हम मिल न पाएं लेकिन विचारों से हम हमेशा एक-दूसरे के आसपास रहते हैं...पिता के जाने का दुख सहन करना आसान नहीं है लेकिन जिस तरह ब्लॉगजगत में हर किसी ने मेरे दुख को बांटा, उसे मेरे लिए शब्दों में व्यक्त कर पाना मुमकिन नहीं...सतीश सक्सेना जी और राजीव तनेजा भाई ने तो तमाम मसरूफियत के बावजूद 15 नवंबर को मेरठ पहुंच कर मुझे जिस तरह ढाढस बंधाया, उसे मैं ताउम्र नहीं भुला पाऊंगा...

पापा से जुड़ी यादों को इस गीत के ज़रिए ही सबसे अच्छी तरह व्यक्त कर सकता हूं...

तुझे सूरज कहूं या चंदा, तुझे दीप कहूं या तारा.
मेरा नाम करेगा रौशन, जग में मेरा राजदुलारा...

रविवार, 7 नवंबर 2010

मेरे राम चले गए...खुशदीप

राम जी वनवास के बाद दीवाली वाले दिन ही घर लौटे थे...लेकिन मेरे राम दीवाली वाले दिन ही हमें हमेशा के लिए छोड़ कर चले गए...मेरे पापा का नाम श्री राम अवतार ही था...लेकिन जो आया है, उसे एक दिन जाना ही है...यही सृष्टि का विधान है...पापा को कितनी भी तकलीफ क्यों न रही, लेकिन मुंह से उन्होंने कभी हल्की सी भी उफ़ नहीं की...बस हमेशा यही कहा करते थे- मेरा ओंकार मेरे साथ है...ये उनका ही दिखाया रास्ता है कि अगर दुनिया को कुछ बांटना है तो बस खुशियां और मुस्कान ही बांटों...पापा ये भी कहा करते थे कि बिल्डिंग, प्रॉपर्टी, धन-दौलत से ज़्यादा ये अहम है कि इनसान इस दुनिया में अपने दोस्त कितने बनाता है...

दुख की इस घड़ी में आप सबने जो संबल बढ़ाया, उसके लिए मैं और मेरा परिवार हमेशा ऋणी रहेगा...

एक बात अपने छोटे भाई शिवम मिश्रा से...उसने कहा कि मैंने उसे अपना नहीं समझा, इसलिए पापा के देहावसान की खबर नहीं दी....शिवम यकीन मानना, मैं दीवाली वाले दिन किसी को भी ये ख़बर नहीं देना चाहता था...लेकिन चार और पांच नवंबर को बाइचांस ही पाबला जी और अविनाश भाई का मेरे पास फोन आया...और मुझे उन्हें बताना पड़ा कि मैं किस कठिन परिस्थिति से गुज़र रहा हूं...साथ ही ये आग्रह भी किया कि पांच नवंबर को ये खबर किसी को नहीं दीजिएगा...शिवम मेरे पापा भरा-पूरा परिवार छोड़कर गए हैं...वो खुद भी यही चाहते कि उनकी वजह से त्यौहार की खुशियों में खलल न पड़े...बस यही सोचकर मैंने भी दीवाली वाले दिन किसी को ये बुरी खबर नहीं दी...आशा है, अब शिवम की नाराज़गी दूर हो गई होगी...वैसे ये शिवम का प्यार ही है, और मैं उसकी भावनाओं को अच्छी तरह समझ सकता हूं,..



रस्म पगड़ी की सूचना

दिनांक 15 नवंबर, सोमवार
दोपहर  2 से 3 बजे


स्थान- आर्य समाज मंदिर
दयानंद मार्ग, आबू लेन,
मेरठ कैंट (उत्तर प्रदेश)
mobile- 09873819075



अंत में सभी माता-पिता को समर्पित ये गीत...

ये तो सच है कि भगवान है...

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

ये पोस्ट हरकीरत हीर को समर्पित...खुशदीप

कल मेरी पोस्ट पर हरकीरत हीर जी ने प्यारी सी शिकायत की...

"आजकल आप अधिक व्यस्त हो गए लगते हैं ....
वो हंसी मजाक भी छूट गया लगता है ....??"

हीर जी, न तो मैं ओबामा हुआ हूं कि खुद भी व्यस्त रहूं और दुनिया को भी खाली-पीली व्यस्त रखूं...और न ही मेरे मक्खन-ढक्कन घर छोड़ कर भाग गए हैं जो मेरा हंसी मज़ाक का स्टॉक चूक गया हो...हां, मैंने ब्लॉगिंग में अब कुछ सतर्कता बरतना ज़रूर शुरू कर दिया है...न जाने निर्मल हास्य के तहत ही कही गई कोई बात किसी को चुभ जाए...इसलिए ललिता जी ठीक कहती हैं के सर्फ स्टाइल में सावधानी में ही समझदारी है...लेकिन आज यहां सिर्फ हंसने-हंसाने की बात ही करूंगा...

बॉस एक ही रहेगा

शादीशुदा आदमी कितने भी जॉब बदल ले, लेकिन उसका अल्टीमेट बॉस हमेशा एक ही रहेगा...



ग्रेट मैनेजमैंट



मैनेजमैंट के स्टूडेंट ने अपनी क्लासमेट को किस कर लिया...


लड़की...ये क्या था...


लड़का....डायरेक्ट मार्केटिंग...


लड़की ने कस कर लड़के को थप्पड़ जड़ दिया...


लड़का...ये क्या था...


लड़की...कस्टमर फीड-बैक...




दूल्हे का मलाल

शादी सिर्फ अकेला दिन होता है जिस दिन दूल्हा मंच पर खड़ा होकर सजी-धजी दूसरी खूबसूरत लड़कियों को देखता है और सोचता है...ये सब आज से पहले क्यों नहीं दिखीं...



स्लॉग ओवर (पंजाबी गिनती दा तड़का मार के)


Dil V 13;


80 V tere;


Hor 10;


Ki haal A 13;


Yaran dostan nu ainj nayi 27 da;


OK G; Ijazat 2;


32 Bujhao, te 100 jao.


अब पंजाबी न समझने वालों के लिए रिपीट करता हूं कि ऊपर क्या लिखा है-


दिल भी तेरा...


हम भी तेरे...


और बता...


तेरा क्या हाल है...


यार-दोस्तों को ऐसे नहीं सताते...


ओके जी, इज़ाज़त दो...


लाइट बुझाओ और सो जाओ....


(स्लॉग ओवर...साभार गुरुदेव समीर लाल समीर जी)

बुधवार, 3 नवंबर 2010

गांधी के देश में ओबामा...खुशदीप

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा गांधी के अहसास को शिद्दत के साथ महसूस करने के लिए भारत आ रहे हैं...उसी गांधी के अहसास को जो ओबामा के रोल मॉडल मार्टिन लूथर किंग जूनियर के भी प्रेरणा-स्रोत रहे...लूथर किंग ने पांच दशक पहले गांधी के अहिंसा के हथियार के ज़रिए ही अमेरिकी सड़कों पर भेदभाव के खिलाफ़ कामयाब लड़ाई लड़ी थी...लूथर किंग ने अमेरिका में बदलाव के लिए I HAVE A DREAM का नारा दिया...बदलाव के इसी सपने पर सवार होकर ओबामा ने दुनिया के सबसे ताकतवर ओहदे तक पहुंचने का सफ़र तय किया...



ओबामा 8 नवंबर को राजघाट पर बापू को श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे होंगे तो उनके लिए ऐसा करना सिर्फ मेहमान राष्ट्राध्यक्ष के लिए महज़ रस्म अदायगी भर ही नहीं होगा...ये ओबामा के लिए गांधी की आत्मा को नज़दीक से जानने सरीखा होगा...ओबामा 6 नवंबर को भारत के दौरे का आगाज़ करेंगे तो सबसे पहले मुंबई के मणिभवन जाकर गांधी के दर्शन से दो-चार होंगे...





मुंबई के गामदेव इलाके की लाबमुम रोड पर मणिभवन की दो मंज़िली इमारत गवाह रही है मोहनदास करमचंद गांधी के महात्मा गांधी में तब्दील होने की...गांधी ने 1917 से 1934 तक मणिभवन को ही कर्मस्थली बनाकर नागरिक अवज्ञा सत्याग्रह, स्वदेशी, खादी, खिलाफ़त जैसे कई आंदोलनों की अगुआई की...यहीं से दुनिया को गांधी का संदेश गया था कि संघर्ष के लिए सत्याग्रह से ज्यादा कारगर हथियार और कोई नहीं हो सकता...गांधी की अहिंसा के ज़रिए बदलाव की इसी लाइन को पचास के दशक में मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने पकड़ा...

लूथर किंग के दुनिया को अलविदा कहने के चार दशक बाद ओबामा ने पहले अफ्रो-अमेरिकन शख्स के तौर पर अमेरिका का राष्ट्रपति बनने की मुहिम छेड़ी तो नारा यही दिया...CHANGE WE CAN BELIEVE IN...अमेरिका के लोगों ने भी ओबामा के इस नारे में भरोसा जताया...लेकिन बाइस महीने के कार्यकाल के बाद ओबामा इस भरोसे पर कितना खरा उतरे, यही सवाल आज अमेरिकी अवाम के साथ पूरी दुनिया पूछ रही है...ओबामा ने जॉर्ज बुश से राष्ट्रपति पद संभाला था...वही बुश जिनकी WAR ON TERROR की सनक ने अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी सैनिकों को झोंक दिया...अमेरिका को सौ खरब डॉलर और हज़ारों जाने गंवाने के बाद भी ठोस कुछ हाथ नहीं लगा....इराक में अमेरिकी मिशन खत्म होने का ऐलान बेशक हो चुका हो लेकिन वहां अब भी रह-रह कर हिंसा की चिंगारियां सुलगती रहती हैं...अफगानिस्तान तो नौ साल से अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के बावजूद आग का गोला बना हुआ...जिसमें अमेरिका को सिवाय अपने हाथ जलाने के और कुछ नहीं मिल रहा...ऐसे हालात में ओबामा अपने कार्यकाल की कौन सी बड़ी उपलब्धि दुनिया को गिना सकते हैं...ये बात दूसरी है कि ओबामा को बिना कुछ किए ही अपने कार्यकाल के पहले साल में ही शांति का नोबेल पुरस्कार मिल गया...वहीं ओबामा की प्रेरणा लूथर किंग के प्रेरणास्रोत गांधी को मरने के 62 साल बाद भी शांति के नोबेल के योग्य नहीं माना गया....अब ओबामा को खुद तय करना है कि गांधी और लूथर किंग के मुकाबले कहां खड़े हैं...ओबामा की कथनी और करनी का यही फर्क ही उनके नारे...CHANGE WE CAN BELIEVE IN...को...CHANGE WE CAN NOT BELIEVE IN....में बदल देता है...यही आज ओबामा का सबसे बड़ा सच है... और यही सच ओबामा से भारत यात्रा के दौरान गांधी के इस भजन का सही मायने में अर्थ समझने की उम्मीद रखता है...


वैष्णव जन ते तेने कहिए, पीर पराई जाने जे...

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

वाकई मेरा भारत महान...खुशदीप

कुछ दिन पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी...हमलावरों ने हाथ काटा, कॉलेज ने नौकरी से बर्खास्त किया...केरल के थोडुपुझा के न्यूमैन कालेज में प्रोफेसर टी जे जोसेफ मलयालम पढ़ाते थे...इसी साल चार जुलाई को जोसेफ़ का दाहिना हाथ पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया से जु़ड़े कट्टरपंथियों ने काट दिया था...कट्टरपंथी जोसेफ़ से कथित तौर पर इसलिए नाराज़ थे क्योंकि उन्होंने इस साल मार्च में कॉलेज के बी कॉम के आंतरिक इम्तिहान में ऐसा पेपर सेट किया था जिसमें पैगम्बर मोहम्मद का ज़िक्र किया गया था...जोसेफ ने पेपर में जो सवाल सेट किया था वो यूनिवर्सिटी की अधिकृत किताब से लिया गया था और उन्हें सफाई का मौका भी नहीं दिया गया... जोसेफ के मुताबिक उन्होंने किताब के मूल लेखक पी टी कुंजु मोहम्मद को मोहम्मद कह कर उद्धृत किया था जिसे गलतफहमी में कुछ और ही रंग दे दिया गया...खैर कट्टरपंथियों ने जो किया सो किया कालेज ने प्रोफेसर जोसेफ को बर्खास्त कर दिया...ये प्रोफेसर जोसेफ के लिए हाथ कटने से भी बड़ा सदमा था..कालेज में जोसेफ के साथी प्रोफेसरों ने उनके हक में आवाज बुलंद की तो उन्हें कितना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा, वही आज आपको बताने जा रहा हूं...पहले देखिए ये तस्वीर...

                                                              मेल टुडे से साभार

आटो चलाने वाले ये शख्स प्रोफेसर स्टीफन हैं...स्टीफन उसी न्यूमैन कालेज में बॉटनी पढ़ाते थे जिसमें प्रोफेसर जोसेफ बर्खास्त होने से पहले मलयालम पढ़ाते थे...जोसेफ को बर्खास्त किया गया तो प्रोफेसर स्टीफन ने इसके खिलाफ आवाज़ बुलंद की...लेकिन कालेज प्रबंधन ने एक नहीं सुनी...उलटे चर्च की ओर से संचालित इस कालेज ने स्टीफन को चुप रहने की हिदायत दी थी...साथ ही धमकी भी दी गई थी कि अगर स्टीफन ने ऐसा नहीं किया तो उन्हें भी नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा...प्रोफेसर स्टीफन अपने स्टैंड पर डटे रहे...कालेज ने उन्हें भी बर्खास्त कर दिया...

प्रोफेसर स्टीफन का कहना है- आप किसी आदमी को तबाह कर सकते हैं लेकिन हरा नहीं सकते...मैं नाइंसाफ़ी के खिलाफ़ आवाज़ उठाना नहीं छोड़ूंगा...मेरा मानना है कि कोई भी क़ानून से ऊपर नहीं है...कालेज का प्रबंधन करने वाला चर्च भी नहीं...मुझे ज़रा भी परवाह नहीं कि चर्च मेरे ख़िलाफ़ क्या कदम उठाता है...

दरअसल कालेज में हुए एक सेमिनार में प्रोफेसर स्टीफन ने कहा था कि उनकी नज़र में प्रोफेसर जोसेफ़ को बर्खास्त किए जाना अन्यायपूर्ण और हताश करने वाला था...उल्लेखनीय है कि कालेज कोट्टायम की जिस महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आता है, उसके अपीलेट ट्रिब्यूनल ने भी प्रोफेसर जोसेफ़ की बर्खास्तगी को रद्द करने के लिए कालेज से कहा था...लेकिन कालेज ने ट्रिब्यूनल की भी एक नहीं सुनी और प्रोफेसर जोसेफ़ की बर्खास्तगी को वापस लेने से साफ मना कर दिया...और प्रोफेसर स्टीफन ने प्रोफेसर जोसेफ़ का साथ देना चाहा तो उनके साथ भी वही सलूक किया...