रविवार, 31 अक्तूबर 2010

कुत्ते की औलाद, मुझे समझ क्या रखा है बे...खुशदीप

कल गिरिजेश राव जी ने पोस्ट लिखी थी...एक ठो कुत्ता रहा...

लघुकथा गिरिजेश जी की विशिष्ट शैली में जबरदस्त थी...इस पोस्ट को पढ़ने के बाद अचानक ही कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव का सुनाया एक किस्सा याद आ गया...

एक स्मार्ट सी बिच (हिंदी में जो शब्द है उसे लिखने में असहज महसूस कर रहा हूं, इसलिए नहीं लिख रहा), कैटवॉक सरीखी चाल में इतराती हुई सड़क पर चली जा रही थी..बाल-वाल शैंपू किए हुए, बिल्कुल टिपटॉप....अब उससे दोस्ती करने की चाह में शोहदे टाइप के कई सारे कुत्ते भी पीछे-पीछे चले जा रहे थे...कि शायद कभी उन पर भी नज़रे-इनायत हो जाए...वैसे ऐसे मनचले हर शहर में आपको देखने को मिल जाएंगे...

इन कुत्तों की पलटन के सबसे पीछे एक लंगड़ा कुत्ता भी था...



बाकी तो स्पीड से चल रहे थे, लंगड़ा कुत्ता बेचारा अपनी चाल से मुश्किल से खिसकते हुए चला जा रहा था...ये देखकर लवगुरु टाइप ताऊ को तरस आ गया...ताऊ ने रामपुरिया लठ्ठ निकाल कर स्पीड से चल रहे सभी कुत्तों पर बरसा दिया...सब कूं-कूं करते भाग गए...बस बिच और लंगड़ा कुत्ता ही रह गए...ताऊ ने लंगड़े कुत्ते से कहा...जा, कर ले दोस्ती...तू भी क्या याद करेगा कि किस रईस से पाला पड़ा था...लंगड़ा कुत्ता भला ताऊ का एहसान कैसे भूल सकता था...खैर वो दिन तो गुज़र गया...

अगले दिन फिर वही नज़ारा...आगे-आगे बिच...पीछे पीछे कुत्तों की पलटन...सबसे पीछे लंगड़ाते हुए वही कल वाला हीरो...अब ताऊ के सामने से ये कारवां गुज़रा तो, लंगड़ा कुत्ता फिर हसरत भरी नज़रों से ताऊ को देखने लगा...साथ ही जीभ निकाल-निकाल कर और सिर से बार-बार ताऊ की ओर इशारे करने लगा...मानो हाथ जोड़कर कह रहा हो कि इन आगे वाले कुत्तों की कल की तरह ही फिर ख़बर लो...जिससे उसे मैदान साफ़ होने पर दोस्ती आगे बढ़ाने का मौका मिल सके...

ये देखकर ताऊ ने फिर अपना रामपुरिया लठ्ठ निकाला...लंगड़ा कुत्ता खुश...अब आएगा मज़ा, फिर भागेंगे ये अगले वाले सारे कु्त्ते...


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लेकिन ये क्या...ताऊ ने आकर पूरी ताकत से लठ्ठ लंगड़े कुत्ते के ही दे मारा...साथ ही बोला...साले, कुत्ते की औलाद, मुझे समझ क्या रखा है बे...

शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

दुनिया का सबसे अच्छा संदेश...खुशदीप

आपको कोई संदेश देना है...जागरूकता लानी है...तो सबसे अच्छा तरीका क्या होता है...यही न, कि कोई प्यारा सा स्लोगन ढूंढा जाए...ग्लोबल वार्मिंग, धरती बचाओ, पेड़ लगाओ, गो ग्रीन जैसे कितने भी स्लोगन दे दिए जाएं लेकिन पर्यावरण की अनदेखी बंद नहीं हो रही...यही हाल रहा तो हमारे नदी, जंगल, वन्यजीवन, ग्लेशियर सब खत्म हो जाएंगे...लेकिन ये सारे स्लोगन एक तरफ और मैंने आज जो स्लोगन देखा, वो फिर भी इन सब पर भारी पड़ता है...युवा-युवतियों के बेहद पसंदीदा सार्वजनिक पार्क के बाहर बोर्ड पर लिखा था-

पेड़ों के साथ उतना ही प्यार करो, जितना प्यार पेड़ों के पीछे करते हो...






स्लॉग ओवर

मक्खन...कल मैंने पत्नी के घुटने ज़मीन पर टिकवा दिए...

ढक्कन...वाह तू तो बड़ा दिलेर निकला...आखिर लड़ाई खत्म कैसे हुई...

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मक्खन...अरे होना क्या था...पत्नी ने ही कहा...अब पलंग के नीचे से बाहर निकल आओ, कुछ नहीं कहूंगी...

नोस्टेलजिया का सफ़र- रेडियो, ट्रांजिस्टर, रिकॉर्ड प्लेयर...खुशदीप

दो दिन पहले खबर आई थी कि वॉकमैन अब अतीत की बात हो जाएंगे...वॉकमैन बनाने वाली कंपनी सोनी ने घटते उत्पादन की वजह से इनका उत्पादन बंद करने का फैसला किया...आई-पॉड के ज़माने में वॉकमैन की भला अब क्या पूछ...



ज़ाहिर है चढ़ते सूरज को ही सलाम किया जाता है...वॉकमैन के सहारे बीते कल को टटोलना शुरू किया तो ऐसी कई चीज़ें और इनसान याद आ गए जो कभी दिलो-दिमाग पर छाए हुए थे...आज बात सिर्फ चीज़ों की करूंगा...जैसे कि बचपन में घर के ड्राइंगरूम में रखा बड़ा सा रेडियो...क्या-क्या नहीं सुनाता था वो मरफी के घुंघराले बालों वाले बच्चे की तस्वीर लगा रेडियो...समाचार, क्रिकेट-हॉकी की कमेंट्री, नाटक, फिल्मी गीतों के कार्यक्रम, स्पान्सर्ड प्रोग्राम...




लेकिन रेडियो के साथ दिक्कत ये थी कि उसे पास बैठ कर ही सुनना पड़ता था...फिर ट्रांजिस्टर आए...उनसे ये सुख हो गया कि लाइट हो या न हो आपका पसंदीदा प्रोग्राम मिस नहीं होता था...ट्राजिस्टर का सबसे बड़ा फायदा था, उसे कहीं भी ले जा सकते थे...घर में चुपके से गाने सुनने हो तो रजाई के बीच में ट्राजिस्टर के जरिए लता, रफ़ी, किशोर और मुकेश को जो सुनने का मज़ा आता था बस पूछो नहीं...



जिन दिनों क्रिकेट मैच हो रहे होते थे तो स्कूल में भी बस यही जानने की धुन सवार रहती थी कि स्कोर कितना हो गया होगा...अब स्कूल से बाहर तो जा नहीं सकते थे...आज की तरह मोबाइल का भी ज़माना नहीं था कि झट से एसएमएस किया और स्कोर जान लिया...ऐसे में पॉकेट ट्रांजिस्टर आए तो बड़ा सकून मिला...रोज़ कोई न कोई साथी स्कूल में जेब में छुपा कर पाकेट ट्रांजिस्टर ले ही आता था...फिर स्कूल के गॉर्डन में किसी पेड़ के नीचे जो क्रिकेट कमेंट्री सुनने का मज़ा आता था कि कि दिल गार्डन-गार्डन हो जाता था...



रेडियो-ट्रांजिस्टर के साथ दिक्कत ये थी कि उन दिनों हर वक्त तो आज के एफएम की तरह प्रोग्राम आते नहीं थे...हर प्रोग्राम का एक टाइम निर्धारित होता था...फिल्मी गानों का भी...बेवक्त फिल्मी गाने सुनने होते थे तो वो शौक ज़रा महंगा था...आप एचएमवी या पॉलिडोर के रिकॉर्ड लाकर रिकॉर्ड-प्लेयर पर गाने सुन सकते थे...



तब हर फिल्म के रिकॉर्ड रिलीज़ होते थे...इन रिकॉर्डों की जैकट बड़ी मनमोहक होती थीं...फिल्म के हीरो-हीरोइन की फोटो और गीत-संगीत से जुड़े हर कलाकार का नाम क्रेडिट में...



मेरे ताऊजी के घर पर ऐसा रिकॉर्ड प्लेयर भी था जो बिजली से नहीं बल्कि हाथ से चाभी भरने के बाद चलता था...



रिकॉर्ड प्लेयर की अगली जेनेरेशन के रूप में कैसेट प्लेयर मार्केट में आए...रिकॉर्ड़्स की जगह कैसेट्स ने ले ली...



कंप्यूटर युग शुरू हुआ तो कैसेट्स की जगह सीडी पर गीत-संगीत का आनंद लिया जाने लगा...वक्त के साथ चीज़ों का भी अंदाज़ बदलता जाने लगा...


नये ज़माने में भी कभी पुराने ज़माने का रेडियो या रिकॉर्ड प्लेयर देखने को मिल जाता है तो खुद-ब-खुद बीता सुनहरा दौर याद आ जाता है...नोस्टेलजिया के इस सफ़र में और भी बहुत चीज़ें हैं याद करने को...लेकिन आज की कड़ी में बस इतना ही...अब आप क्या सोचने लगे...जाइए फ्लैश बैक में...और करिए शेयर यहां मेरे साथ अपने गोल्डन लम्हे...

क्रमश:

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

पाबला जी जानते थे कि महफूज़ के साथ अनहोनी होगी...खुशदीप

कभी कभी जीवन में ऐसा कुछ भी घटता है, जिस पर दिमाग न भी चाहे तो भी यकीन करना पड़ता है...साइंस का छात्र रहा हूं, इसलिए दैवीय शक्तियों आदि पर यकीन नहीं रखता...लेकिन इस महीने ऐसा कुछ हुआ कि मुझे भी दांतों तले उंगली दबानी पड़ रही है...दस अक्टूबर को गोरखपुर में महफूज़ के साथ जो कुछ हुआ, उसे पाबला जी ने कई दिन पहले ही देख लिया था...और मैं इस बात का सीधा गवाह हूं...

दस अक्टूबर से शायद दस-पंद्रह दिन पहले मुझे पाबला जी का फोन आया था कि उन्होंने महफूज़ के बारे में गलत सपना देखा है...महफूज एक कमरे में बैठा है...साथ में एक खाली दीवार है...पीछे एक खिड़की है...और अचानक जैसे आसमान में बिजली कड़कती है, वैसा ही कुछ पाबला जी ने देखा...पाबला जी ने महफूज़ को भी आगाह कर दिया...इसके बाद महफूज़ का मेरे पास फोन आया था...महफूज़ ने मुझे बताया कि पाबला जी ने जिस तरह के कमरे का बयान किया वो उन दिनों कानपुर में ठीक वैसे ही कमरे में रह रहा था...लेकिन महफूज़ यहीं सारी स्थिति नहीं समझ सका...वहां तो पूरा सतर्क रहा लेकिन गोरखपुर में अपनी हिफ़ाज़त को लेकर चूक कर गया...वहां भी जब उसको निशाना बनाते हुए फायर किया गया तो वो कचहरी में एक चाय वाले के यहां ऐसे ही कमरे में बैठा हुआ था...जिसके पीछे खिड़की थी और साथ में खाली दीवार थी...

पाबला जी ने ये सब पहले कैसे देख लिया...आपको शायद एक बात और भी पता नहीं होगी...पाबला जी जब महाराष्ट्र के दौरे पर थे तो उनकी मारूति वैन जल कर पूरी तरह ख़ाक हो गई थी...उस हादसे से थोड़ी देर पहले ही पाबला जी ने सड़क किनारे एक मैकेनिक शॉप से वैन ठीक कराई थी....पाबला जी को वैन में गड़बड़ी होने का भी पहले से ही आभास था...उन्होंने सपने में वैन को जलते हुए तो नहीं देखा था, लेकिन उस मैकेनिक की शॉप और आसपास की दुकानों को वो दौरे से कई दिन पहले सपने में देख चुके थे...अब आप इसे क्या कहेंगे इत्तेफाक या इन्ट्यूशन या कुछ और...

खैर ये तो रही पाबला जी की बात...लेकिन अभी इससे भी ज़्यादा मेरे लिए चौंकाने वाली एक और बात भी हुई...जिस दिन महफूज़ गोरखपुर में फायरिंग का शिकार हुआ, उससे आधा घंटा पहले मैंने फोन पर महफूज़ से बात की...न जाने क्यों, मैंने उस दिन दोपहर को ही महफूज़ को फोन मिलाया...उससे पहले और बाद में मेरी जब भी कभी महफूज़ से बात हुई वो रात को ग्यारह बजे के बाद ही हुई...उस दिन मैंने फोन पर महफूज़ से ये भी कहा था कि जितनी जल्दी हो सके, गोरखपुर से बाहर निकलो....मैं किसी और संदर्भ में महफूज़ से ये सब कह रहा था...यही कहना चाह रहा था कि जो भी विवाद चल रहे हैं, उन्हें सुलझा कर किसी शांतिप्रिय जगह पर अपनी सारी ऊर्जा क्रिएटिव राइटिंग में लगाओ...मैंने बुरे से बुरे सपने में भी नहीं सोचा था कि महफूज़ को उसी दिन ऐसी स्थिति से दो-चार होना होगा...उसी दिन मैं आफिस जाने के लिए दोपहर दो बजे घर से निकला तो रास्ते में ही फोन पर पाबला जी से महफूज़ पर गोली चलने की बात पता चली...मैं सुनकर सन्न रह गया...मुझे वही सब याद आ गया जो कुछ दिन पहले पाबला जी ने मुझे फोन पर बताया था...


महफूज़ का इस बारे में कुछ और भी कहना है....महफूज़ के मुताबिक उसका जैंगो ( पैट जिसे महफूज़ अपना बेटा कहता था) जिंदा होता तो ये हादसा उसके साथ कतई पेश नहीं आता...वो किसी न किसी तरीके से महफूज़ को उस दिन मौका-ए-वारदात पर जाने से पहले ही रोक लेता...


महफूज़ के साथ जैंगो



ऊपर वाले का लाख-लाख शुक्रिया कि हमारे दबंग महाराज से बला छू कर निकल गई...आखिर जिसके साथ इतने चाहने वालों की दुआ हो, उसका बला बिगाड़ भी क्या सकती थी...यहां ये भी ताज्जुब करने वाली बात है कि जैंगो ने महफूज़ पर फायरिंग से कुछ दिन पहले ही दम क्यों तोड़ा....क्या वो अपने साथ महफूज़ के सिर आई बला को ले गया...कुत्ते दरवेश होते हैं, सुना था, क्या जैंगो भी ऐसा ही दरवेश था...ये जो कुछ भी लिखा है वो मेरा दिमाग बेशक नहीं मानता लेकिन दिल उस पर कुछ सोचने के लिए ज़रूर मजबूर है...महफूज़ के जन्मदिन पर बस यही दुआ...तू जिए हज़ारों साल, और साल के दिन हो पचास हज़ार...

गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

मुंबई एक, चेहरे दो...खुशदीप

ई है मुंबई नगरिया तू देख बबुआ...

पिछले हफ्ते मायानगरी से एक साथ दो खबरें आईं...मुझे इनमें गज़ब का कंट्रास्ट दिखा...आप भी देखिए...

एंटिला

भारत के सबसे ज़्यादा और दुनिया के चौथे नंबर के अमीर शख्स मुकेश अंबानी ने पिछले हफ्ते मुंबई में अपने नए घर एंटिला में रहना शुरू कर दिया...



बेबीलोन के हैंगिंग गार्डन्स से प्रेरित होकर मुंबई के अल्टामाउंट रोड पर बनाया गया 27 मंजिला ये घर दुनिया का सबसे कीमती घर है...कुल 43 अरब डॉलर संपत्ति के मालिक मुकेश अंबानी के इस घर पर दो अरब डॉलर यानि नब्बे अरब रूपये से ज़्यादा का खर्च आया है...570 फुट ऊंची इस इमारत में तीन हेलीपैड, नौ लिफ्ट, एक सिनेमा हॉल, एक हेल्थ क्लब, 168 कारों की पार्किंग के लिए जगह है...पूरे घर में चार लाख वर्ग फुट स्पेस है...घर में मुकेश अंबानी, उनकी पत्नी नीता, मां कोकिला बेन और तीन बच्चे यानि कुल छह सदस्य रहेंगे...इन छह सदस्यों के लिए 600 लोगों का स्टॉफ भी घर में मौजूद रहेगा...इस घर को बनने में सात साल लगे...कीमत के मामले में दुनिया में और कोई भी घर एंटिला के सामने दूर-दूर तक कहीं नहीं टिकता...सबसे नज़दीकी की बात करें तो वो न्यूयॉर्क के पियरे होटल में 70 करोड़ डॉलर का ट्रिप्लेक्स पैंटहाउस है...


धारावी

पिछले हफ्ते ही मुंबई से एक और ख़बर आई कि महानगर की 1.43 करोड़ आबादी में से 90 लाख लोग यानि 62 फीसदी मलीन बस्तियों (स्लम्स) में रह रहे हैं...पिछले एक दशक में ही मुंबई के स्लम में रहने वाले लोगों की तादाद 60 लाख से 90 लाख पहुंच गई है...यानि 50 फीसदी का इज़ाफ़ा...दुनिया के सबसे बड़े स्लम्स में एक धारावी भी इसी मुंबई में है...



यहां एक वर्ग किलोमीटर के इलाके में ही 60 से 80 लाख लोग रहते हैं...यानि 225 वर्ग फुट में ही 15-15 लोगों को रहना पड़ता है... यहां औसतन 1440 लोगों के लिए एक शौचालय है...

स्लॉग ओवर

मक्खन तबीयत सही महसूस नहीं कर रहा था...डॉक्टर के पास पहुंच गया...डॉक्टर के सामने बैठा तो डाक्टर ने पूछा कि आपका पैट (पालतू पशु) कहां हैं...

मक्खन...पैट का नहीं अपना ही इलाज कराने आया हूं...

डॉक्टर...अरे भाई, फिर आप गलत जगह आ गए हो...मैं इनसानों का नहीं पशुओं का डॉक्टर यानि वेटेनरी स्पेशलिस्ट हूं...

मक्खन...मैं सुबह उठने के बाद घोड़े की तरह दौड़ना शुरू करता हूं...दिन भर गधे की तरह काम में जुटा रहता हूं...गैराज में अपने स्टॉफ पर कुत्ते की तरह भौंकता रहता हूं...घर आता हूं तो बच्चों के सामने बंदर की तरह नाचता हूं...किचन से शेरनी की दहाड़ सुनता रहता हूं...क्या आप ये सुनने के बाद भी यही कहेंगे कि मैं गलत जगह आया हूं...

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

लीक से हट कर सोचने का कमाल...खुशदीप

ये किस्सा अरसा पहले एक भारतीय गांव का है...एक गरीब किसान को मजबूरी में गांव के साहूकार से कर्ज़ लेना पड़ा...साहूकार अधेड़ और बदसूरत होने के बावजूद किसान की खूबसूरत जवान लड़की पर बुरी नज़र रखता था...



साहूकार जानता था कि किसान कभी उसका कर्ज़ नहीं चुका पाएगा...साहूकार ने अपना नापाक मंसूबा पूरा करने के लिए चाल खेली...उसने किसान से पेशकश की कि अगर वो बेटी की शादी उसके साथ कर देगा तो वो सारा कर्ज़ माफ़ कर देगा...ये सुनकर किसान और बेटी दोनों के चेहरे फ़क़ पड़ गए...

साहूकार ने दोनों की हालत भांपते हुए कहा कि चलो ये मंज़ूर नहीं तो एक और प्रस्ताव देता हूं...मैं पैसे के एक खाली थैले में दो पत्थर डालता हूं...एक काला और एक सफे़द...फिर किसान की बेटी थैले में से कोई पत्थर निकाले...अगर काला पत्थर निकला तो लड़की को उससे शादी करनी पड़ेगी और वो किसान का सारा कर्ज़ माफ़ कर देगा...और अगर सफेद पत्थर निकला तो लड़की को उससे शादी करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी...इस सूरत में भी किसान का सारा कर्ज़ माफ़ हो जाएगा...लेकिन लड़की ने कोई भी पत्थर निकालने से मना किया तो उसके पिता को जेल भेज दिया जाएगा...

तीनों किसान के खेत पर ही पत्थरों से अटी पगडंडी पर ही खड़े थे...किसान मरता क्या न करता...उसने दो पत्थरों में से एक पत्थर चुनने वाला विकल्प चुना और बेटी को भी नसीब का हवाला देकर राज़ी कर लिया...अब साहूकार ने झट से पथरीले रास्ते से दो पत्थर चुनकर पैसे के खाली थैले में डाल लिए... लड़की की नज़रे बहुत तेज़ थी...उसने देख लिया था कि साहूकार ने दोनों काले पत्थर ही उठाकर थैले में डाले हैं...


साहूकार ने लड़की से थैले में से एक पत्थर निकालने को कहा...अब वो लड़की क्या करेगी...या आप उस लड़की की जगह होते तो क्या करते...ध्यान से लड़की के सामने मौजूद सभी विकल्पों के बारे में सोचिए...यहां तीन संभावनाएं हो सकती हैं...

1. लड़की पत्थर चुनने से मना कर दे...


2. लड़की थैले में से दोनों काले पत्थर निकाल कर साहूकार की बदनीयती की असलियत खोल दे...


3. लड़की काला पत्थर चुनकर खुद का बलिदान कर दे और पिता को कर्ज या जेल जाने की सूरत से बचा दे...

आखिर लड़की ने कौन सा फैसला किया...लड़की जिस दुविधा में थी, उसे सोचने के पारंपरिक तरीके से दूर नहीं किया जा सकता था...फिर लड़की ने लीक से हट कर कौन सा फैसला किया...सोचिए...सोचिए....और सोचिए...

नहीं सोच पा रहे है तो स्क्रॉल करके नीचे जाइए...



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लड़की ने थैले में से एक पत्थर निकाला....और हड़बड़ी का अभिनय करते हुए झट से पत्थर को पगडंडी पर फेंक दिया...लड़की का निकाला पत्थर पगडंडी पर फैले काले और सफेद पत्थरों में मिल गया...ये तय करना मुश्किल था कि लड़की ने सफेद पत्थर निकाला था या काला...लड़की ने फिर साहूकार से ही कहा कि थैले में से आप दूसरे पत्थर को निकाल कर देख लें...वो जिस रंग का भी होगा, स्वाभाविक है कि मेरे से गिरा पत्थर फिर उससे उलट रंग का ही होगा...थैले से काला पत्थर निकला...यानि लड़की का पत्थर सफेद था...लड़की को साहूकार से शादी भी नहीं करनी पड़ी और उसके पिता का सारा कर्ज़ भी माफ हो गया...अब साहूकार ये कहता कि लड़की का चुना पत्थर भी काला था तो साहूकार की चोरी पकड़ी जाती और वो खुद ही धोखेबाज़ साबित हो जाता...इस तरह लड़की ने नामुमकिन स्थिति से भी दिमाग के दम पर ऐसा रास्ता निकाला कि सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी...



स्लॉग चिंतन



मुश्किल से मुश्किल समस्या का भी समाधान होता है...लेकिन दिक्कत ये है कि हम ईमानदारी और सच्चे मन से कोशिश ही नहीं करते...


(ई-मेल से अनुवाद)

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

हो गया मैं भी लखपति...खुशदीप

ठन-ठन गोपाल बेशक हूं लेकिन कल मैं भी लखपति हो गया...कल की मेरी पोस्ट पर पाठक संख्या का आंकड़ा एक लाख पार कर गया...सवा साल ही हुआ है ब्लॉगिंग करते...लेकिन ऐसा लगता है कि आप सबको न जाने कब से जानता हूं...मेरे लिए यही सबसे बड़ी पूंजी है...इससे जो संतोष, जो खुशी मिलती है, वो कितनी भी दौलत कोई पा ले, नहीं मिल सकती...आप ने जो प्यार और आशीर्वाद बेशुमार मुझे दिया, उस भरोसे को हमेशा बनाए रखूं, बस यही ऊपर वाले से दुआ करता हूं...





पूंजी की बात चली तो आपको रियल सुपरस्टार रजनीकांत का एक सच्चा किस्सा सुनाता हूं...रजनीकांत एक बार फिल्म की शूटिंग में मंदिर की सीढ़ियों पर भिखारी बनकर बैठे हुए थे...ऐसा दया भाव चेहरे पर लाकर अभिनय कर रहे थे कि एक बुज़ुर्ग भिखारिन से रहा नहीं गया...उसने रजनीकांत की हथेली पर दस का एक नोट रख दिया...रजनीकांत ने उस दस के नोट को देखा तो उनकी आंखों में आंसू आ गए...वो दस का नोट आज भी रजनीकांत ने संभाल कर अपने पास रखा हुआ है...एशिया में जैकी चैन के बाद दूसरे सबसे महंगे स्टार रजनीकांत एक ही फिल्म के लिए पच्चीस से तीस करोड़ रुपये मेहनताना बेशक लेते हों लेकिन उस दस के नोट को ही आज भी अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं...


स्लॉग गीत

करवा चौथ का त्योहार है आज...उसी से जुड़ा एक गीत...

मैया ओ गंगा मैया...




स्लॉग ओवर


एक बार करन जौहर अपनी फिल्म पिटने के बाद बार में पैग पर पैग चढ़ाए जा रहा था...

किसी ने टोका...इतनी क्यों पिए जा रहे हो...

करन जौहर...तुम्हें मतलब...मैं मर्द हूं...मर्द...जितनी चाहूं, उतनी पी सकता हूं...

टोकने वाला...लगता है अब वाकई चढ़ गई है इसे...

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

कोठे की खूंटी पर टंगी पैंट...खुशदीप

कल निर्मला कपिला जी की पोस्ट पर कमेंट किया था-

वो जो दावा करते थे खुद के अंगद होने का,
हमने एक घूंट में ही उन्हें लड़खड़ाते देखा है...

इस कमेंट के बाद अचानक ही दिमाग में कुछ कुलबुलाया...जिसे नोटपैड पर उतार दिया...उसी को आपके साथ शेयर करना चाहता हूं...गीत-गज़ल-कविता मेरा डोमेन नहीं है...बस कभी-कभार बैठे-ठाले कुछ तुकबंदी हो जाती है...उसी का है ये एक नमूना...लीजिए पेश है एक नमूने का नमूना...



वो जो दावा करते थे खुद के अंगद होने का,
हमने एक घूंट में ही उन्हें लड़खड़ाते देखा है...


वो जो दावा करते थे देश की तकदीर बदलने का,
हमने गिरगिट की तरह उन्हें रंग बदलते देखा है...


वो जो दावा करते थे बड़े-बड़े फ्लाईओवर बनाने का,
हमने सीमेंट की बोरी पर उन्हें ईमान बेचते देखा है...


वो जो दावा करते थे आज का 'द्रोणाचार्य' होने का,
हमने 'एकलव्य' की अस्मत से उन्हें खेलते देखा है...


वो जो दावा करते थे देश के लिए मर-मिटने का,
हमने हज़ार रुपये पर उन्हें नो-बॉल करते देखा है...


वो जो दावा करते थे कलम से समाज में क्रांति लाने का,
हमने सौ रुपये के गिफ्ट हैंपर पर उन्हें भिड़ते देखा है...


वो जो दावा करते थे डॉक्टरी के नोबल पेशे का,
हमने बिल के लिए लाश पर उन्हें झगड़ते देखा है...


वो जो दावा करते थे श्रवण कुमार होने का,
हमने बूढ़ी मां को घर से उन्हें निकालते देखा है...


वो जो दावा करते थे हमेशा साथ जीने-मरने का,
हमने गैर की बाइक पर नकाब लगाए उन्हें देखा है...


वो जो दावा करते थे बदनाम गली के उद्धार का,
हमने कोठे की खूंटी पर पैंट टांगते उन्हें देखा है...

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

आओ, थोड़े बुरे हो जाएं...खुशदीप

ये मैं नहीं कह रहा...अमेरिका के नेब्रास्का यूनिवर्सिटी और लिंकन्स कालेज ऑफ बिज़नेस एडमिनिस्ट्रेशन की ताज़ा स्टडी कह रही है...आपको बेशक लीडर वही पसंद हो जो ईमानदार हो, व्यावहारिक हो और शांत दिमाग से काम करता हो...लेकिन उपरोक्त स्टडी कह रही है कि अगर नेतृत्व का सवाल आता है तो पर्सनेल्टी के कुछ नेगेटिव पहलू भी कारगर साबित हो सकते हैं...मसलन अहंकारी, आत्ममुग्ध या अति नाटकीय होना (सीधे शब्दों में ड्रामेबाज़ होना)...




द लीडरशिप क्वाटर्ली जनरल के ताजा अंक में प्रकाशित ये स्टडी वेस्ट पाइंट की यूएस मिलिट्री एकेडमी के दूसरे, तीसरे, और चौथे साल के 900 ऑफिसर कैडेट पर की गई...ये निष्कर्ष हफ्ते दो हफ्ते की मेहनत से नहीं पूरे तीन साल की स्टडी के बाद निकला है कि पर्सनेल्टी के स्याह पक्ष (डार्क साइड) का भी अपना महत्व होता है...स्टडी के चीफ कोआर्डिनेटर और यूएनएल में मैनेजमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर पीटर हार्म्स ने इस संबंध में प्रसिद्ध अमेरिकी एक्ट्रेस माइ वेस्ट के चर्चित कथन को खास तौर पर उद्धृत किया...जब मैं अच्छी होती हूं, अच्छा काम करती हूं, लेकिन जब मैं बुरी होती हूं तो और भी अच्छा परफॉर्म करती हूं...

पहले जितने भी स्टडी या सर्वे हुए थे, उनमें यही उभर कर आया था कि कि बहिर्मुखी व्यक्तिव, भावुकता के स्तर पर स्थिर होना और सजगता, ऐसे गुण हैं जो लीडर के विकास और प्रदर्शन, दोनों पर ही बहुत अच्छा प्रभाव डालते हैं...लेकिन इन स्टडी या सर्वे में पर्सनेल्टी के नेगेटिव ट्रेट्स (स्याह पक्ष) पर बहुत कम गौर किया गया कि क्या वो वाकई लीडर के विकास में बड़े बाधक होते हैं...क्या वो कभी फायदेमंद भी हो सकते हैं...ताजा स्टडी का जवाब है, हां...नेगेटिव ट्रेट्स भी किन्ही खास परिस्थितियों में मददगार हो सकते हैं...मसलन हर कोई मानता है कि ज़रूरत से ज़्यादा शक्की मिज़ाज का होना विकास और परफार्मेंस दोनों के लिहाज़ से बुरा होता है...लेकिन ताजा स्टडी में पाया गया कि अति सतर्क होना और अनिश्चितता की स्थिति में रहना भी नेतृत्व कौशल को बढ़ाने में सहायक साबित हुए...

स्टडी में हॉगन डवलपमेंट सर्वे का इस्तेमाल किया गया...इसमें एकेडमी के कैडेट्स के लीडरशिप प्रदर्शन के बदलाव में सबक्लिनिकल ट्रेट्स (छुपे हुए कारक) पर बारीकी से नज़र रखी गई...स्टडी में पाया गया कि कुछ डार्क साइड माने जाने वाले कारक जैसे कि आत्ममुग्ध होना, अति नाटकीय होना, दूसरों का आलोचक होना, नियमों को लेकर हद से ज़्यादा अड़ियल होना...आदि हक़ीक़त में लीडरशिप क्वालिटी के विकास में अच्छा प्रभाव छोड़ते देखे गए...चीफ कोऑर्डिनेटर हार्म्स के मुताबिक इन कारकों को अकेले-अकेले देखा जाए तो उनका असर बेहद कम था...लेकिन जब इन सबको जोड़ कर देखा गया तो ये जानने में बड़ी मदद मिली कि किस कै़डेट ने कितनी लीडरशिप क्वालिटी अपने अंदर विकसित की...व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो किसी खास तरह के जॉब या रोल में ये नेगेटिव गुण (या दुर्गुण) बड़े कारगर साबित होते दिखे...हार्म्स ने ये भी साफ किया कि ये न समझा जाए कि इन सभी डार्क ट्रेट्स की ओवरडोज़ किसी को बढ़िया लीडर बना सकती है...ये सब परिस्थितियों या माहौल की डिमांड पर निर्भर करता है...इस स्टडी के निष्कर्षों को अमेरिका के कई बड़े कॉरपोरेट हाउस अपने एक्जेकेटिव ट्रेनिंग प्रोग्राम में इस्तेमाल कर रहे हैं...

अब मेरा निष्कर्ष...

अमेरिकी यूनिवर्सिटी में स्टडी करने वालों ने खामख्वाह पैसा और तीन साल बर्बाद किए, एक बार हमारे देश में आकर लीडरों पर एक-दो दिन ही स्टडी कर लेते...जिसमें जितने ज़्यादा नेगेटिव ट्रेट्स वो उतना ही बड़ा लीडर...

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

ब्लॉगिंग की भुट्टा-कथा...खुशदीप

एक किसान बड़ा मेहनती था...उसके उगाए भुट्टे बहुत ही बढ़िया क्वालिटी के मीठे दाने वाले होते थे...



हर साल उसे कृषि मेले में भुट्टो की शानदार पैदावार के लिए किसानश्री का पुरस्कार मिलता...हर साल यही कहानी दोहराए जाने पर मीडिया वालों को उसमें दिलचस्पी हुई...एक रिपोर्टर ने किसान का इंटरव्यू लिया तो एक बात उसे बड़ी विचित्र लगी...रिपोर्टर को पता चला कि किसान अपने भुट्टे के बढ़िया क्वालिटी के बीज अपने सभी पड़ोसी किसानों में भी बांटता था...जिससे वो सारे किसान फसल लगाने के वक्त एक साथ उन बीजों को अपने-अपने खेतों में डालते...

ये जानकर रिपोर्टर को आश्चर्य हुआ...उसने किसान से पूछा कि आप ऐसा करने से अपने लिए प्रतिद्वन्द्वी खड़े नहीं करते...ये गलाकाट प्रतिस्पर्धा का ज़माना है...लोग एक दूसरे से आगे बढ़ने के लिए क्या-क्या नहीं करते...और आप अपने बढ़िया क्वालिटी के बीज उन्हें मुफ्त देकर खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं...और आपके पड़ोसी किसान इस कंपीटिशन में आकर आपका मुकाबला भी करते हैं...

रिपोर्टर की बात सुनकर किसान मुस्कुराया...बोला...

आप खेती को समझते तो शायद ये सवाल न पूछते...जब भुट्टे पकते हैं तो उनके परागकण हवा के साथ इधर-उधर फैलते हैं...जिसे क्रॉस-पॉलिनेशन भी कहते हैं...अगर मेरे पड़ोसी किसानों के बीज घटिया क्वालिटी के होंगे तो उनके भुट्टो से फैलने वाले परागकण भी घटिया क्वालिटी के होंगे...वही परागकण हवा के साथ उड़ कर मेरे खेत में भी आएंगे...नतीजा क्या होगा...मेरे खेत के भुट्टो पर भी असर पड़ेगा...इसलिए मैं पड़ोसियों को अच्छे बीज देकर उनसे ज़्यादा अपनी मदद करता हूं...आशा है, आप मेरी बात समझ गए होंगे...


किसान की इस कथा को अब मानव-जीवन से जोड़ कर देखिए...जो आप बांटेंगे, वही सूद समेत एक दिन आपके पास लौट कर आएगा...नॉलेज जितनी बांटेंगे, आपका अपना नॉलेज-बेस उतना बढ़ेगा...आपकी अपनी क्वालिटी तब और भी निखरेगी, जब आपके साथ वालों की भी क्वालिटी बढ़े...जो खुद अच्छा जीवन जीना चाहते हैं, वो दूसरों का जीवन अच्छा करने में भी मदद करते हैं...एकांत में आपको सफलता मिले तो फिर उस सफलता के मायने क्या हैं...सफलता का आनंद सबके साथ बांटने में है...

एक सवाल आप सबसे, क्या किसान की ये भुट्टा-कथा ब्लॉगिंग को भी कुछ नया आयाम दे सकती है...आमीन...



पिता की खाली कुर्सी...खुशदीप

एक बेटी ने एक संत से आग्रह किया कि वो घर आकर उसके बीमार पिता से मिलें, प्रार्थना करें...बेटी ने ये भी बताया कि उसके बुजुर्ग पिता पलंग से उठ भी नहीं सकते...

जब संत घर आए तो पिता पलंग पर दो तकियों पर सिर रखकर लेटे हुए थे...

एक खाली कुर्सी पलंग के साथ पड़ी थी...संत ने सोचा कि शायद मेरे आने की वजह से ये कुर्सी यहां पहले से ही रख दी गई...

संत...मुझे लगता है कि आप मेरी ही उम्मीद कर रहे थे...

पिता...नहीं, आप कौन हैं...

संत ने अपना परिचय दिया...और फिर कहा...मुझे ये खाली कुर्सी देखकर लगा कि आप को मेरे आने का आभास था...

पिता...ओह ये बात...खाली कुर्सी...आप...आपको अगर बुरा न लगे तो कृपया कमरे का दरवाज़ा बंद करेंगे...


संत को ये सुनकर थोड़ी हैरत हुई, फिर भी दरवाज़ा बंद कर दिया...

पिता...दरअसल इस खाली कुर्सी का राज़ मैंने किसी को नहीं बताया...अपनी बेटी को भी नहीं...पूरी ज़िंदगी, मैं ये जान नहीं सका कि प्रार्थना कैसे की जाती है...मंदिर जाता था, पुजारी के श्लोक सुनता...वो सिर के ऊपर से गुज़र जाते....कुछ पल्ले नहीं पड़ता था...मैंने फिर प्रार्थना की कोशिश करना छोड़ दिया...लेकिन चार साल पहले मेरा एक दोस्त मिला...उसने मुझे बताया कि प्रार्थना कुछ नहीं भगवान से सीधे संवाद का माध्यम होती है....उसी ने सलाह दी कि एक खाली कुर्सी अपने सामने रखो...फिर विश्वास करो कि वहां भगवान खुद ही विराजमान हैं...अब भगवान से ठीक वैसे ही बात करना शुरू करो, जैसे कि अभी तुम मुझसे कर रहे हो...मैंने ऐसा करके देखा...मुझे बहुत अच्छा लगा...फिर तो मैं रोज़ दो-दो घंटे ऐसा करके देखने लगा...लेकिन ये ध्यान रखता कि मेरी बेटी कभी मुझे ऐसा करते न देख ले...अगर वो देख लेती तो उसका ही नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता या वो फिर मुझे साइकाइट्रिस्ट के पास ले जाती...

ये सब सुनकर संत ने बुजुर्ग के लिए प्रार्थना की...सिर पर हाथ रखा और भगवान से बात करने के क्रम को जारी रखने के लिए कहा...संत को उसी दिन दो दिन के लिए शहर से बाहर जाना था...इसलिए विदा लेकर चले गए..

दो दिन बाद बेटी का संत को फोन आया कि उसके पिता की उसी दिन कुछ घंटे बाद मृत्यु हो गई थी, जिस दिन वो आप से मिले थे...

संत ने पूछा कि उन्हें प्राण छोड़ते वक्त कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई...

बेटी ने जवाब दिया...नहीं, मैं जब घर से काम पर जा रही थी तो उन्होंने मुझे बुलाया...मेरा माथा प्यार से चूमा...ये सब करते हुए उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी...जब मैं वापस आई तो वो हमेशा के लिए आंखें मूंद चुके थे...लेकिन मैंने एक अजीब सी चीज़ भी देखी...वो ऐसी मुद्रा में थे जैसे कि खाली कुर्सी पर किसी की गोद में अपना सिर झुकाया हो...संत जी, वो क्या था...


ये सुनकर संत की आंखों से आंसू बह निकले...बड़ी मुश्किल से बोल पाए...काश, मैं भी जब दुनिया से जाऊं तो ऐसे ही जाऊं...






स्लॉग चिंतन

मैंने ऊपर वाले से पानी मांगा, उसने सागर दिया...
मैंने एक फूल मांगा, उसने बागीचा दिया
मैंने एक दोस्त मांगा, उसने आप सबको मुझे दिया...


भगवान की इच्छा आपको वहां कभी नहीं ले जाएगी, जहां उसका आशीर्वाद आपका बचाव न कर सकता हो...

(ई-मेल से अनुवाद)

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

अपने पे भरोसा है तो...खुशदीप

वक्त इनसान पे ऐसा भी कभी आता है,
राह में छोड़कर साया भी चला जाता है...

कहते हैं कि अच्छे-बुरे, अपने-पराए की बढ़िया पहचान मुश्किल वक्त में ही होती है...कामयाबी के सौ माई-बाप होते हैं लेकिन जब आप डाउन होते हैं तो आपके पास वही टाइम निकाल कर आता है, जो सच में अपने दिल में आपके लिए जगह रखता है...जिसके कंधे पर जितने ज़्यादा हाथ हौसला देने के लिए आएं, वो उतना ही बड़ा अमीर है...

वैसे दुनिया जितनी मैट्रीरियलिस्ट (भौतिकतावादी) होती जा रही है, इनसान खुद को अपने में ही समेटता जा रहा है...खुद, पत्नी और बच्चे...बस यहीं सारा संसार सिमट रहा है...और रिश्ते भी बेमानी लगने लगते हैं...अपने बच्चे बड़े होते हैं, फिर वो अपनी दुनिया बसाते हैं...उनके लिए भी जीवन-साथी और बच्चे सबसे अहम हो जाते हैं...यानि 360 डिग्री का एंगल पूरा होता है...हर कोई इसे जीवन का सच मान ले तो उसे हालात के अनुरूप खुद को ढालने में दिक्कत नहीं होगी...


खुद पर भरोसा


अब यहां ये सवाल उठ सकता है, आदमी भरोसा करे तो करे किस पर...मेरा जवाब है खुद पर...क्योंकि जितना बस आपका अपने आप पर है, और किसी पर नहीं हो सकता...इसे आत्मविश्वास कहिए या कुछ और, आदमी का इससे बड़ा मददगार और कोई नहीं हो सकता...बस ये ध्यान अवश्य रखना होगा कि आत्मविश्वास अहंकार में न तब्दील हो जाए...याद रखिए, अहंकार तो रावण जैसे महाबलि और परमविद्वान का भी नहीं रहा था...


खुद पर भरोसे की यहां दो मिसालें देना चाहूंगा...एक नेगेटिव और दूसरी पॉजिटिव...पहले नेगेटिव...क्योंकि आदमी नेगेटिव बात मिनटों में सीख जाता है और पॉजिटिव को सीखने में बरसों लग जाते हैं...

नेगेटिव आत्मविश्वास
यहां से पचास-पचास कोस दूर गांव में जब बच्चा रोता है तो मां ये कह कर सुलाती है...सोजा नहीं तो गब्बर आ जाएगा...याद रखो, गांव वालों, तुम्हें गब्बर के ताप से सिर्फ़ एक ही आदमी बचा सकता है, और वो है खुद गब्बर...


प़ॉजिटिव आत्मविश्वास
एक प्राइमरी का बच्चा कॉपी में कुछ टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें उकेर रहा था...
टीचर ने ये देखा तो पास आकर प्यार से बोली...ये आप क्या कर रहे हैं...
बच्चा...मैडम, मैं भगवान की तस्वीर बना रहा हूं...
ये सुनकर टीचर मुस्कुरा कर बोली...लेकिन भगवान को तो किसी ने देखा नहीं, फिर आप कैसे उनकी तस्वीर बना रहे हैं...
बच्चे ने तस्वीर बनाते-बनाते ही सिर उठा कर टीचर की ओर देखा और फिर धीरे से बोला...थोड़ी देर रुकिए, आज से सब जान जाएंगे कि भगवान कैसे दिखते हैं....





बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

एल्लो जी, फिर आ गया मैं...खुशदीप

लो जी आ गया फिर मैं...ब्लॉगिंग से दस दिन की फोर्स्ड लीव से...इन दस दिन में सिर्फ बाल नोचने के अलावा कर क्या सकता था...सेक्टर का टेलीफोन एक्सचेंज जल कर राख हो गया...बारह दिन से न लैंडलाइन फोन और न ही ब्रॉडबैंड काम कर रहा था...ऐसे में मैं क्या कर सकता था...बस तारक मेहता का उलटा चश्मा के पोपट लाल पत्रकार की तरह...दुनिया हिला दूंगा... की धमकी बीएसएनएल वालों को देता रहा...वो भी रोज़ धमकी सुन लेते और कलमाडी की तरह चिकना घड़ा स्टाइल में शाम तक फोन ठीक होने की गोली देते...बारह दिन तक यही क्रम बदस्तूर चला...

राम राम करते लैंडलाइन फोन शुरू हुआ...लेकिन अब मॉ़डम जी ने बदला उतारा...भई रात-रात भर मॉ़डम जी को ड्यूटी पर लगाए रखोगे, ज़रा सा आराम न करने दोगे...तो दिमाग तो उनका फिरना ही था...लाख पैर पटके लेकिन मॉ़डम जी को कोई तरस नहीं आया...उन्होंने जैसे कसम खा ली थी कि सिवाए एक लाल बत्ती के और कोई बत्ती जला कर ही नहीं दूंगा...मरता क्या न करता...मॉडम जी को भी बीएसएनएल क्लिनिक ले गया...उन्होने खींसे नपोरते हुए कहा कि ये तो कॉमा में चले गए हैं...कब दम तोड़ दें , कोई ठिकाना नहीं...बेहतर होगा कि नया मॉडम ही ले लें...लीजिए जनाब दो हज़ार रुपये का का फटका और लगा...तब बीएसएनएल वालों ने नए नकोर मॉ़डम जी उपलब्ध कराए...कोई विघ्न न आए, धूप-बत्ती जलाकर मॉ़डम और लैंडलाइन की आरती उतारी...बड़ी मुश्किल से नेटवर्क कनेक्ट हुआ...और मैं आपसे मुखातिब होने लायक हो सका...

दस दिन में ब्लॉग में बहुत कुछ हुआ होगा...अभी सिंहावलोकन करने में मुझे वक्त लगेगा...लेकिन विजयादशमी के दिन मुझे गुरुदेव समीर लाल जी, टी एस दराल सर, बीएस पाबला जी, सतीश सक्सेना जी, शिवम मिश्रा, दीपक मशाल, शाहनवाज़ सिद्दीकी और ललित शर्मा भाई के एक के बाद एक फोन आने शुरू हुए और वेडिंग एनीवर्सरी की बधाई मिलने लगीं तो मुझे पता चला कि पाबला जी ने बधाई की पोस्ट लगाई है...आज जाकर वो पोस्ट देखी और सबका प्यार देखकर मन पुलकित और आंखें नम हो गईं...

रुपचंद्र शास्त्री जी, सूर्यकांत गुप्ता, दिनेश राय द्विवेदी सर, ललित शर्मा, जय कुमार झा, अजय कुमार झा, समीर लाल समीर जी, परमजीत सिंह बाली, राज भाटिय़ा, बीएस पाबला, अरविंद मिश्रा, डॉ टी एस दराल, गिरीश बिल्लौरे, प्रवीण त्रिवेदी, अदा जी, दीपक मशाल, संजय भास्कर, रतन सिंह शेखावत जी, राम त्यागी, एस एम मौसम, वंदना, हेमंत कुमार, फिरदौस खान, तारकेश्वर गिरी, सुलभ सतरंगी, अंशुमाला, सूर्य गोयल, अनिता कुमार जी, अर्चना जी, अशोक बजाज जी की बधाई से शादी की सालगिरह की खुशी दुगनी हो गई...मेरे ब्लॉग पर भी सतीश सक्सेना भाई, ज़ाकिर अली रजनीश, राजेंद्र स्वर्णकार, संजय कुमार चौरसिया, अशोक बजाज जी ने आकर बधाई दी...आप सबका प्यार और आशीर्वाद ही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है...

अरे हां, सबसे ज़रूरी बात, आप सब की बधाई पत्नीश्री तक भी पहुंचा दी...वो मेरे से भी खुश थीं कि इस बार तो बड़े टाइम से वैडिंग एनीवर्सरी याद आ गई...अब उन्हें क्या बताऊं कि ये सब ब्लॉगिंग का प्रताप है...न पाबला जी पोस्ट लगाते, न मुझे बधाई के फोन आते...तो वही होता जो मेरे साथ अक्सर होता रहा है...काम के चक्कर में एनीवर्सरी ही भूल जाता...लेकिन इस बार तो दशहरा भी साथ ही था और संडे की छुट्टी भी थी...इसलिए प्रॉपर टाइम पर प्रॉपर तरीके से पत्नीश्री को विश कर दिया...हां ये बात दूसरी थी कि वेडिंग एनीवर्सरी वाले दिन भी दोपहर को मुझे मेरठ जाना पड़ा और अगले दिन ही वापस आ सका...

चलिए पोस्ट में दशहरे की बात उठी तो दशानन स्टाइल में ही स्लॉग ओवर भी सुन लीजिए...(मुझे एसएमएस से मिला है)

स्लॉग ओवर

रावण के दस सिर थे...यानि बीस आंखें...उसने एक पराई स्त्री पर नज़र डालने की गुस्ताखी की और अंजाम जान देकर भुगतना पड़ा...और वाह रे आज का मर्द, सिर्फ दो आंखों से ही हर जगह नज़र रखता है, फिर भी उसका कुछ नहीं बिगड़ता...


रविवार, 10 अक्तूबर 2010

ये सेंस ऑफ ह्यूमर नहीं है...खुशदीप


ये तस्वीर इस साल 18 सितंबर की है...शबाना आज़मी का 60वां जन्मदिन था...उनके पति ने ये केक खास तौर पर बनवाया...जिस पर लिखा था शबाना नगर, गली नंबर 60.केक स्लम की शक्ल में था...जिस पर च़ॉकलेट की बजबजाती हुई नालियां-नाले बने हुए थे...सब जानते हैं कि शबाना ने मुंबई के स्लम्स की बेहतरी के लिए बहुत काम किया है...जावेद अख्तर बेहद संवेदनशील लेखक और शायर हैं...उन्होंने अपने सेंस ऑफ ह्यूमर का इस्तेमाल करते हुए शबाना के लिए ये केक बनवाया...कलाकार और शायर के नाते में शबाना और जावेद दोनों का बहुत सम्मान करता हूं...उनसे भी ज़्यादा शबाना आज़मी के वालिद कैफ़ी आज़मी और अम्मी शौकत आज़मी का करता हूं...जावेद साहब के पिता जां निसार अख्तर भी उर्दू अदब के बहुत बड़े नाम रहे हैं....


लेकिन जावेद अख्तर जिसे यहां सेंस ऑफ ह्यूमर बता रहे हैं, वो मेरी नज़र में बेहद घटिया हरकत थी...उस बर्थडे पार्टी में इस केक को काटते हुए खूब हंसी-मजा़क हुआ..इस पार्टी में अरसे बाद अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा और विनोद खन्ना जैसे दिग्गज एक टेबल पर घंटों तक पुराने दिनों की याद ताजा करते रहे....शबाना समेत कुछ आमंत्रित मेहमानों ने मुन्नी बदनाम हुई पर ठुमके भी लगाए...मेरी नज़र में शबाना ने स्लम्स के लिए जो भी किया, उस पर इस केक ने एक झटके में पानी फेर दिया...

इनसान महलों में रहे या स्लम्स में. हर एक का अपना मान सम्मान होता है...मैं इस विषय पर ज़्यादा कुछ न कहते हुए आप पर ही छोड़ता हूं कि बर्थडे पार्टी में स्लम की शक्ल का केक बनवाना सही था या गलत...

शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

ये पढ़कर ब्लॉगर नाम पर शर्म आ रही है...खुशदीप


क्या हम इसी ब्लॉगिंग का हिस्सा है...आज इस पोस्ट को पढ़ कर शर्म से सिर झुक गया...किसी धर्म विशेष के लोगों का कार्टून के साथ मज़ाक बनाने की चेष्टा पोस्ट लेखक की सोच को खुद ही जाहिर कर देती है, आखिर ये जनाब कहना क्या चाहते हैं...इन्होंने पहले भी हास्य का नाम लेते हुए एक और धर्म को निशाना बनाया था...तुर्रा ये कि बाद में बाकायदा वोटिंग कराके अपनी करनी को जायज़ भी ठहराया था...ये महाशय ताल ठोक कर कहते हैं कि ये मेरा ब्लॉग है...जिसे पसंद है, पढ़ने आए...जिसे पसंद नहीं है, न आए...बिल्कुल सही कह रहे हैं जनाब...लेकिन ये मत भूलिए कि आपकी पोस्ट एग्रीगेटर पर भी है...जो कि एक सार्वजनिक मंच है...सार्वजनिक मंच पर इस तरह की हरकत का क़ानूनी अंजाम या तो आप जानते नहीं या जानना ही नहीं चाहते...अगर आप इसे ही हास्य मानते हैं तो मुझे यही प्रार्थना करनी होगी...आपको भगवान, वाहेगुरु, अल्लाह, जीसस सन्मति दें...

मैंने इस पोस्ट को लिखने से पहले सौ बार सोचा कि कहीं मैं इनकी पोस्ट का लिंक देकर अनजाने में पाप का भागी तो नहीं बन रहा...लेकिन फिर सोचा कि तटस्थ बने रहने से भी ऐसी बेजा हरकतों को बढ़ावा मिलता है...इनकी जमकर भर्तस्ना की जानी चाहिए, इसलिए मैं अपने ब्लॉग को माध्यम बना रहा हूं...अन्यथा ऐसे ही असंवेदनशील (खुद को ब्लॉगर कहने वाले) लोगों के साथ एग्रीगेटर को शेयर करना है तो ब्लॉगिंग को हमेशा के लिए राम-राम कह देना ही ज़्यादा बेहतर होगा...इनके लिंक को आप तक पहुंचाने का थोड़ा-बहुत पाप मेरे माथे पर भी आता है, उसके लिए मैं आप सबसे एडवांस में ही माफ़ी मांग लेता हूं...

एक प्रार्थना चिट्ठाजगत के संचालकों से भी, क्या किसी धर्म विशेष के लोगों को हास्य के नाम पर निशाना बनाने वाली पोस्ट को एग्रीगेटर पर स्थान दिया जाना चाहिए, आशा है आप इस सवाल पर गंभीरता से विचार करेंगे...

समीर जी क्यों मेरे गुरुदेव हैं...खुशदीप

चाटुकारिता, प्रशंसा या दिल से किया गया सम्मान...ये सब हैं तो एक जैसे ही लेकिन इनमें फ़र्क ज़मीन-आसमान का है...फिर महीन लकीर कैसे खिंची जाए...कोई अपने फायदे के लिए चाटुकारिता कर रहा है तो दूसरा कोई ये समझ सकता है कि वाकई ये दिल से बोल रहा है...और अगर कोई वाकई दिल से किसी का सम्मान कर रहा है तो ये समझा जा सकता है कि अपना उल्लू सीधा कर रहा है....चाटुकारिता रूतबे या पैसे में अपने से बड़े की ही की जा सकती है...लेकिन दिल से सम्मान किसी का भी किया जा सकता है...ये उम्र, पैसा, रुतबा नहीं देखता...

अब आता हूं प्रशंसा पर...किसी की प्रशंसा में इतने मीठे बोल भी न बोले जाए कि दूसरे को डायबिटीज़ ही हो जाए...वैसे सच्चा दोस्त वही होता है जो मर्ज़ ठीक करने के लिए सिर्फ मीठी गोलियां ही नहीं देता रहता बल्कि कुनैन की गोली का भी इस्तेमाल कर लेता है...अब तो वैसे ही क्रैकजैक या फिफ्टी-फिफ्टी का ज़माना है...यानि पता ही न चले कि मीठा है या नमकीन...कोरी प्रशंसा आपको ताड़ के पेड़ पर चढ़ा सकती है...इसका नशा इतना मदमस्त कर देने वाला होता है कि आदमी ये मानने लगता है कि उससे बड़ा तुर्रमखान कोई नहीं है...और यहीं से उसका पतन शुरू हो जाता है...इसलिए शॉक एब्जॉर्बर के तौर पर झटके भी ज़रूरी होते हैं...शॉक लगा, शॉक लगा हम गाते हैं तो हमारे ख़ून का दौरा ठीक रहता है...

अब आता हूं दिल से किए जाने वाले सम्मान पर...कभी किसी से मिलकर या उसका लिखा हुआ पढ़कर खुद ही सम्मान में आपका सिर क्यों झुक जाता है...मैंने जब ब्लॉगिंग शुरू की तो एक शख्स को पहली बार पढ़कर ही लगा कि यहीं तो है वो वेवलैंथ जिस पर मैं हमेशा के लिए ट्यून होना चाहता हूं...वो शख्स और कोई नहीं समीर लाल समीर जी यानि मेरे गुरुदेव ही हैं...मैंने उन्हें पहली बार पढ़ने पर ही गुरुदेव मान लिया...कभी सोचता हूं कि मैं इतना गुरुदेव, गुरुदेव करता हूं, कहीं मुझे भी चाटुकार तो नहीं मान लिया जाता...या खुद गुरुदेव ही मेरे इस व्यवहार से इरिटेट (हिंदी का उपयुक्त शब्द नहीं ढूंढ पाया) तो नहीं हो जाते...लेकिन ये तरंगें ही तो हैं जो हज़ारों किलोमीटर की दूरी के बावजूद मुझे छूकर कुछ न कुछ लिखते रहने को प्रेरित करती रहती हैं...अब ये टैलीपैथी है या कुछ और, मैं नहीं जानता...मेरा लिखा कूड़ा करकट है या कुछ और, लेकिन इसने मुझे जीने का नया मकसद दिया है...मुझमें पहले से कहीं ज़्यादा आत्मविश्वास भरा है...इसके लिए गुरुदेव से बस इतना ही कहूंगा....क्या कहूंगा...शब्द ही कहां हैं मेरे पास कुछ कहने के लिए...बस गुरुदेव, खुद ही समझ जाएंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूं...




वैसे मैं गुरुदेव के साथ अपनी ट्यूनिंग कैसी मानता हूं, इसके लिए आपको आनंद फिल्म का ये छोटा सा वीडियो देखना पड़ेगा...मुझे वीडियो लोड करना या एडिट करना नहीं आता, नहीं तो आपको सीधे वही हिस्सा दिखाता जो आपको दिखाना चाहता हूं...
 
आप इस वीडियो का काउंटर 6.54 पर ले जाकर आखिर तक देखिए...

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

पत्नियों की बातें, पतियों की बातें...खुशदीप

ऑफिस में दो युवतियां बात कर रही थीं-



पहली- कल मेरी शाम शानदार गुज़री...तुम अपनी बताओ...

दूसरी- महाबकवास, मेरे पति ऑफिस से आए, तीन मिनट में डिनर निपटाया...अगले दो मिनट में खर्राटे मारने लगे...तुम्हारे साथ क्या हुआ...

पहली- अद्भुत, मेरे पति ऑफिस से आए...और मुझे रोमांटिक डिनर पर ले गए...डिनर के बाद एक घंटा सड़क पर टहलते रहे...जब घर वापस आए तो पति महोदय ने घर भर में मोमबत्तियां जलाईं...फिर हम एक घंटे तक बात करते रहे...ये सब किसी परिकथा से कम नहीं था...


जब ये दो युवतियां बात कर रही थीं, ठीक उसी वक्त दूसरे ऑफिस में दोनों के पति भी एक-दूसरे का हालचाल ले रहे थे...



पहला पति...कहो शाम कैसी रही...

दूसरा...ग्रेट, मैं घर आया तो खाना टेबल पर लगा था...फटाफट खाया...उसके बाद जल्दी ही बड़ी मस्त नींद आ गई...तुम्हारा क्या हाल रहा...

पहला...बेहद खराब...घर आया तो खाना नहीं बना था, दरअसल घर की बिजली कट गई थी क्योंकि मैंने टाइम से बिल नहीं जमा कराया...पत्नी को होटल में डिनर के लिए ले गया...बिल बड़ा मोटा आया...जेब में टैक्सी के भी पैसे नहीं बचे...घर पैदल मार्च करते ही आना पड़ा...इसी में एक घंटा लग गया...उसके बाद घर में बिजली कटी होने की वजह से मोमबत्तियां जलाईं...तब तक मैं पूरी तरह भुन्ना चुका था...नींद कहां से आती...ऊपर से एक घंटे तक पत्नी की चपर-चपर और सुननी पड़ गई....

अपना-अपना नज़रिया है साहब...



ई-मेल से अनुवाद

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

ब्लॉगिंग का लोकतंत्र...खुशदीप

आज जोकर के पिटारे में बहुत कुछ है...थोड़ा विचार...थोड़ी खबर...थोड़ा गाना-बजाना, थोड़ा हंसना-हंसाना...यानि चांद पर मक्खन और ढक्कन ने कॉकटेल का पूरा इंतज़ाम कर लिया है...

तो सबसे पहले थोड़ा विचार...देश की आज़ादी का और कुछ लाभ हो न हो, हमने बढ़-चढ़ कर बोलना ज़रूर सीख लिया है...आज़ादी के 63 सालों में बस 1975 में इमरजेंसी के नाम पर थोड़े वक्त के लिए काला दौर आया, जब बोलने की आज़ादी छीन ली गई थी...तब हुक्मरान को जो पसंद था, वही आप बोल सकते थे...कोई ज़रा इधर से उधर बोला नहीं कि जेल में ठूंस दिया गया...शुक्र है वो दौर लंबा नहीं चला...उस वक्त के हुक्मरान को नसीहत के साथ समझ भी मिल गई कि लोकतंत्र को कुचलने का क्या अंजाम हो सकता है...



मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है...ब्लॉगिंग पांचवां स्तंभ बनने की दिशा में है...हम सभी चाहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बना रहे...हमारी आवाज़ का कोई गला न घोंटे...फिर ब्लॉगिंग में यही सिद्धांत हम क्यों नहीं मानते...मैं तुझे पंत कहूं, तू मुझे निराला वाली परिपाटी रचनाकर्म का कितना भला कर सकती है...ये ठीक है कि ब्लागिंग को बेनामियों की बेजा हरकतों से बचने के लिए मॉडरेशन का कवच मिला हुआ है...लेकिन इस कवच का इस्तेमाल अगर मीठा-मीठा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू-थू की तर्ज़ पर किया जाए तो ये ब्लॉगिंग का कौन सा विकास कर सकता है...अगर कोई अश्लील टिप्पणी, गाली-गुफ्तार, देशद्रोह, संविधान विरोधी, किसी दूसरे ब्लॉगर को निशाना बनाने, दूसरे के धर्म को नीचा दिखाने, वैमनस्य फैलाने वाली बातें लिखता है तो आपको पूरा हक़ बनता है कि कमेंट मॉडरेट करते वक्त बेरहमी से उस टिप्पणी का कत्ल कर दें...लेकिन यही काम सिर्फ इसलिए किया जाए कि दूसरा आपकी लाइन से कुछ अलग विचार व्यक्त कर रहा है...उसे मतभेद की जगह मनभेद मान लिया जाए तो मामला गड़बड़ है...और हद तो तब है कि आप मॉडरेशन से ग्रीन सिगनल देकर किसी टिप्पणी को प्रकाशित कर दें...और फिर वो टिप्पणी आपकी पोस्ट पर किरकिरी की तरह आंख में चुभने लगे तो कुछ देर बाद उसे हलाल कर दिया जाए...पहली नज़र में ही ये काम क्यों नहीं किया जाता... कोई दूसरा टिप्पणी में अपनी योग्यता अनुसार विचार व्यक्त करता है, मेहनत करता है, वक्त खपाता है और फिर कोई गले में न पचने वाला तर्क देकर उस मेहनत पर पानी फेर दिया जाए, निश्चित रूप से आहत करने वाला है...

जहां तक मेरा सवाल है मैं कभी भी मॉडरेशन के हक़ में नहीं रहा...मेरा ब्लॉग हमेशा खुली किताब रहा है...कोई भी जब चाहे, जैसे चाहे दस्तखत कर सकता है...हां, मर्यादित भाषा का इस्तेमाल न होने पर ज़रूर उस टिप्पणी को हटा देता हूं...रहा आलोचना का सवाल तो फूलों की बरसात का आनंद लेता हूं तो साथ ही पत्थर खाने का हौसला भी रखता हूं...मेरी खामियां ढूंढिए, बुरा-भला कहिए, मुझे कोई परहेज़ नहीं, बल्कि मुझे तो जहां अपने से अलग कोई दूसरी राय टिप्पणी के तौर पर दिखती है तो मैं ब्लॉगिंग के उद्देश्य को सफल मानता हूं...ज़ाहिर है हर इनसान की अपनी सोच है, अपना नज़रिया है...उसका सम्मान किया जाना चाहिए...

अरे बाबा ये विचार तो द्रौपदी की साड़ी की तरह खिंचता ही चला जा रहा है...चलिए इस पर यहीं विराम लगाइए...अब आता हूं खबर पर....

ख़बर हरियाणा के यमुनानगर से है...देश में करोड़ों लोग रोज आधे पेट सोने को मजबूर होते हैं...अनाज की महंगाई ने गरीब तो गरीब मध्यम वर्ग की भी कमर तोड़ रखी है...अब उसी अनाज का हमारे सरकारी अधिकारी क्या हश्र करते है, इसकी नायाब मिसाल यमुनानगर में मिली...वहां जिला आयुक्त ने एक सरकारी गोदाम पर छापे के दौरान जो नज़ारा देखा, आंखें खुली की खुली रह गईं...गोदाम में खाद्य आपूर्ति विभाग के ही दो इंस्पेक्टरों ने शराब की महफिल सजा रखी थी...साथ ही गेहूं की बोरियों पर बड़े पाइपों से पानी डाला जा रहा था...मकसद यही था कि गेहूं का गीला होने से वजन बढ़ जाए और फिर क्विंटलों के हिसाब से स्टॉक में हेराफेरी की जा सके...अब ये हुनर न दिखाया जाए तो शराब और अय्याशी की महफिलें कैसे सजें...दोनों इंस्पेक्टरों को निलंबित कर दिया गया है...कुछ गारंटी नहीं कि उन्हें सख्त सज़ा मिलती भी है या नहीं, या फिर चांदी के जूते के बल पर जल्दी ही दोनों छुट्टे घूमने लगे और फिर पुराने ढर्रे पर लौट आएं...वाकई मेरे भारत महान के महान अधिकारी हैं ये दोनों...

ये फोटो यमुनानगर की नहीं, गूगल से साभार कहीं ओर की ली हुई है


अब गाना बजाना...ये गाना भी हमेशा मेरे दिल के बहुत करीब रहा है...

क्या मिलिए ऐसे लोगों से, जिनकी फितरत छिपी रहे
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छिपी रहे....

आखिर में हंसना-हंसाना

स्लॉग ओवर

मक्खन-ढक्कन टाइप के एक बंदे का ऊपर का टिकट कट गया...सीधे नर्क में एंट्री मिली...नर्क में जनाब को अपनी पत्नी की याद आई...यमराज से गुहार लगाई...क्या मैं घर फोन कर सकता हूं और इसके लिए मुझे कितना भुगतान करना होगा...यमराज ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और फिर फोन की अनुमति दे दी...साथ ही कहा...

एक नर्क से दूसरे नर्क में आउटगोइंग कॉल फ्री है...

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

माफ़ कीजिए, मैं खुद को बदल नहीं सकता....खुशदीप

जैसे हो, तमाम उम्र वैसे ही बने रहना...बदलना नहीं...ये मेरे गुरुदेव समीर लाल समीर जी ने मुझसे एक बार कहा था...मैं चाहूं तो भी खुद को नहीं बदल सकता....आज दिन भर बड़ी उलझन में रहा कि रात में क्या करूंगा...रूटीन से फुर्सत मिलने के बाद अब लैपटॉप पर बैठा हूं...कशमकश हद से गुज़र रही थी...ऐसे में मदर टेरेसा की तरह निर्मला कपिला जी ने अपनी टिप्पणी से राह दिखाई...

"खुशदीप का काम है खुश रहना और दूसरों को खुश रखना दूसरों को खुश रखने के लिये आँसू तो पीने ही पड़ते है

वो बस हंसाना जानता है,
सब को लुभाना जानता है।
जल्दी से कशमकश से निकलो। आशीर्वाद।"

लीजिए निर्मला जी आपके आशीर्वाद से निकल आया कशमकश से...साथ ही आपने याद दिला दिए मेरा नाम जोकर के राज कपूर...जोकर सिर्फ हंसाना जानता है...दिल में दर्द कितना भी हो लेकिन दुनिया को बस खुशियां और प्यार बांटना चाहिए...बस इतना कहूंगा कि घर में सब भाई-बहन में मैं सबसे छोटा हूं...कभी बड़े भाई के आगे पलट कर नहीं बोला...इस वजह से बहुत कुछ सहा भी...आज ब्लॉगिंग में भी ऐसा ही कुछ हुआ...ठेस लगी लेकिन फिर खुद को संभाला...दिल ने यही आवाज़ दी कि मुझे नहीं बदलना...



बस अब आप सब से एक सवाल की अपेक्षा ज़रूर रखता हूं कि क्या 14 महीने की ब्लॉगिंग के दौरान मेरे लेखन से  आपको ऐसा लगा कि मैं किसी खास राजनीतिक विचारधारा से बंधा हूं...क्या टिप्पणी करते वक्त मैं ध्यान नहीं रख सकता कि क्या लिखना सही है और क्या गलत...अगर आप खुल कर मेरी खामियों के बारे में बताएं तो शायद मैं आगे से उम्मीदों पर खरा उतर सकूं...

आखिर में मेरा नाम जोकर का ही गाना सुनिए-देखिए...

कहता है जोकर सारा ज़माना
आधी हक़ीक़त, आधा फ़साना

चलिए इस भारी माहौल को यहीं टाटा-बाय-बाय कहिए और मज़ा लीजिए स्लॉग ओवर का...

स्लॉग ओवर

मक्खन- यार ये अमेरिकियों ने बड़ी तरक्की कर ली है...चांद पर पानी और बर्फ ढूंढ ली है...

ढक्कन...तो फिर, हमें क्या करना है...

मक्खन...करना क्या है, बस अब दारू और भुजिया ही साथ लेकर जानी है...

मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010

ब्लॉगजगत, बताइए, मैं कुछ कहूं या चुप रहूं...खुशदीप

बेवक्त ये गाना मैं आपको सुना रहा हूं...ब्लॉगिंग के 14 महीने में आज एक ऐसी घटना मेरे साथ हुई जो पहले कभी नहीं हुई...इसलिए कभी सोचता हूं कि मैं कुछ कहूं...कभी सोचता हूं कि मैं चुप रहूं...अब रात को ही किसी नतीजे पर पहुंच पाऊंगा...तब तक इस गीत के ज़रिए ही अपने अंदर की कशमकश दिखाता हूं...

या दिल की सुनो दुनियावालों,
या मुझको अभी चुप रहन दो,


मैं गम को खुशी कैसे कह दूं,
जो कहते हैं, उनको कहने दो,


ये फूल चमन में कैसे खिला,
माली की नज़र में प्यार नहीं,


हंसते हुए क्या क्या देख लिया,
अब बहते हैं आंसू बहने दो,


ये ख्वाब खुशी का देखा नहीं
देखा जो कभी तो भूल गए,


मांगा हुआ तुम कुछ दे ना सके,
जो तुमने दिया वो सहने दो,


क्या दर्द किसी का लेगा कोई,
इतना तो किसी में दर्द नहीं,


बहते हुए आंसू और बहे,
अब ऐसी तसल्ली रहने दो,

या दिल की सुनो दुनियावालों,
या मुझको अभी चुप रहने दो...

पतियों की साइकोलॉजी...खुशदीप

साइकोलॉजी की क्लास चल रही थी...विदेश से आए प्रोफेसर छात्रों को ऑफ द बीट पढ़ाने में यकीन रखते थे...

प्रोफेसर ने एक बार प्रेक्टीकल के दौरान एक चूहे के सामने एक तरफ रोटी और एक तरफ चूहे की पत्नी (चुहिया ) को रख दिया...चूहा झट से रोटी के टुकड़े की और लपका और कुतर-कुतर खाने लगा...



प्रोफेसर ने दोबारा यही क्रम दोहराया...बस ये बदलाव किया कि इस बार रोटी की जगह ब्रेड रख दी...

चूहे ने फिर ब्रेड की ओर रेस लगाई और मजे से ब्रेड खाने लगा...

तीसरी बार प्रोफेसर ने केक रखा, चूहे मियां फिर सरपट केक की ओर...मूछों पर ताव देते हुए केक की दावत उड़ाने लगे...

इस प्रयोग के बाद प्रोफेसर छात्रों से मुखातिब होते हुए बोले...चूहे के इस व्यवहार से आप क्या समझे...

क्लास में ख़ामोशी छाई रही...

प्रोफेसर...इससे ये साबित होता है कि भूख में बड़ी ताकत होती है...रिश्ते भी पीछे रह जाते हैं...

तभी क्लास में छात्रों की सबसे पिछली कतार से एक बारीक सी आवाज आई...



...



...



...



सर, एक बार चुहिया को भी बदल कर देख लेते...

रविवार, 3 अक्तूबर 2010

हमलावरों ने हाथ काटा, कॉलेज ने नौकरी से बर्खास्त किया...खुशदीप

प्रोफेसर टी जे जोसेफ पूरी तरह हताश हैं...जोसेफ ने खुद को इतना टूटा हुआ तब भी नहीं पाया था जब इस्लामी कट्टरपंथियों ने उनका दाहिना हाथ काट दिया था...केरल के इडुक्की ज़िले में थोडुपुझा के न्यूमैन कॉलेज में मलयालम पढ़ाने वाले जोसेफ़ को उनके कॉलेज प्रबंधन ने बर्खास्त कर दिया है...उन पर एक समुदाय विशेष की भावनाओं को आहत करने का आरोप है...4 जुलाई 2010 को कोट्टायम ज़िले के मुवाट्टुपुझा में जोसेफ़ का दाहिना हाथ पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) से जुड़े कट्टरपंथियों ने काट दिया था...दक्षिण भारत में सक्रिय इस्लामी संगठनों के परिसंघ पीएफआई की कथित कोर्ट के निर्देश पर ये कार्रवाई की गई थी...कट्टरपंथी जोसेफ़ से कथित तौर पर इसलिए नाराज़ थे क्योंकि उन्होंने इस साल मार्च में कॉलेज के बी कॉम के आंतरिक इम्तिहान में ऐसा पेपर सेट किया था जिसमें पैगम्बर मोहम्मद का ज़िक्र किया गया था...इसी पेपर को लेकर जमात-ए-इस्लामी हिंद ने अपने स्थानीय हिंदी अखबार में रिपोर्ट छापी...कुछ मुस्लिम संगठनों ने जोसेफ के सेट किए गए सवाल को पैगम्बर मोहम्मद की अवमानना माना...

कोट्टायम की महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी से जुड़े न्यूमैन कॉलेज में पॉपुलर फ्रंट के स्टूडेंट विंग कैम्पस फ्रंट ने प्रोफेसर जोसेफ़ के खिलाफ जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया...इस प्रदर्शन में युवा कांग्रेस और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के छात्र संगठनों ने भी पूरा साथ दिया...इसे देखकर स्थानीय प्रशासन भी हरकत में आया...जिलाधिकारी ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर जोसेफ़ के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया...केरल पुलिस ने आईपीसी की धारा 295 के तहत जोसेफ के खिलाफ केस दर्ज किया... एक हफ्ते की तलाश के बाद प्रोफेसर को गिरफ्तार किया गया...अप्रैल में जोसेफ को ज़मानत पर रिहाई मिल गई...न्यूमैन कॉलेज प्रशासन ने जोसेफ़ को निलंबित कर दिया और मुस्लिम संगठनों से माफ़ी मांगी...

4 जुलाई 2010 को जोसेफ अपनी बहन और 85 वर्षीय मां के साथ कार पर चर्च से घर वापस आ रहे थे...मुवाट्टुपुझा में घर के पास ही उनका रास्ता मारूति वैन में आए आठ लोगों ने रोका...चाकू, तलवार और कुल्हाड़ी से जोसेफ पर हमला किया गया... जोसेफ़ का दाहिना हाथ काट कर कई मीटर दूर एक घर के कंपाउंड में फेंक दिया गया... हमले में जोसेफ की बहन और मां को भी चोटें आईं.. हमले के बाद जोसेफ के एक पड़ोसी ने उन्हें पास के निर्मला अस्पताल पहुंचाया... जोसेफ का कटा हाथ भी बर्फ में डालकर अस्पताल लाया गया... इसके बाद जोसेफ को कोची के स्पेशलिस्ट हॉस्पिटल ले जाया गया... वहां सर्जनों की टीम ने 16 घंटे के ऑपरेशन के बाद जोसेफ के हाथ को जोड़ने में कामयाबी पाई...



जोसेफ ने अस्पताल से ही मीडिया को दिए इंटरव्यू में बताया कि उन्होंने पेपर में जो सवाल सेट किया था वो यूनिवर्सिटी की अधिकृत किताब से लिया गया था और उन्हें सफाई का मौका भी नहीं दिया गया... जोसेफ के मुताबिक उन्होंने किताब के मूल लेखक पी टी कुंजु मोहम्मद को मोहम्मद कह कर उद्धृत किया था जिसे गलतफहमी में कुछ और ही रंग दे दिया गया.. जोसेफ के परिवार ने एक बयान में हमलावरों को क्षमा करने का भी ऐलान किया... 24 जुलाई 2010 को महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी ने न्यूमैन कालेज की ओर से किए गए जोसेफ के निलंबन को रद्द कर दिया...यूनिवर्सिटी के मुताबिक इस मुद्दे को गैर इरादतन भूल के तौर पर लिया जाना चाहिए... यूनिवर्सिटी ने जोसेफ पर हमले और उनकी माली हालत पर गौर करते हुए ये फैसला किया...लेकिन अब 4 सितंबर को न्यूमैन कॉलेज प्रबंधन ने जोसेफ को सेवा से बर्खास्त कर दिया... कालेज के मुताबिक ये फैसला 1 सितंबर से लागू माना जाएगा... कालेज प्रबंधन के मुताबिक जोसेफ को पैगंबर मोहम्मद पर की गई कथित अपमानजनक टिप्पणी को हर्गिज प्रश्नपत्र में शामिल नहीं करना चाहिए था...

कालेज के मैनेजर फादर थॉमस मेलेक्कुडी ने एक बयान में कहा है कि कॉलेज और चर्च दोनों ही सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने को बहुत अहमियत देते हैं लेकिन जोसेफ का कथित आचरण इस भावना के विपरीत रहा... ये मुद्दा ऐसा नहीं कि जो जोसेफ के माफी मांग लेने से ही खत्म हो जाए... जोसेफ को माफ नहीं किया जा सकता... हालांकि कालेज जिस कोठामंगलम रोमन कैथोलिक डॉयोसीज़ से जु़ड़ा है, उसके प्रवक्ता ने कहा है कि जोसेफ को अगर मुस्लिम संगठनों के नेता माफ कर देते हैं तो उनकी बर्खास्तगी के आदेश को वापस लिया जा सकता है...

प्रोफेसर जोसेफ का कहना है कि इलाज में भारी खर्च की वजह से उन्हें आर्थिक दुश्वारियों का सामना करना पड़ रहा है... अब कॉलेज की ओर से 1 सितंबर से बर्खास्तगी का आदेश दिए जाने से वो नहीं जानते कि घर का खर्च कैसे चलेगा... लेकिन साथ ही जोसेफ ने कॉलेज प्रबंधन को इस फैसले के लिए अपनी ओर से क्षमा करने की बात कही... ठीक वैसे ही जैसे कि उन्होंने अपने हमलावरों को किया था...मुसीबत की इस घड़ी में कॉलेज में जोसेफ के सहकर्मी प्रोफेसर उनके साथ डटे हैं और कॉलेज से बर्खास्तगी का फैसला वापस लेने की मांग कर रहे हैं...

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

पाकिस्तान से बढ़ कर कौन...खुशदीप

पोस्ट का शीर्षक पढ़ कर आपको झटका ज़रूर लगा होगा...इससे पहले कि आप को चक्कर आने लगें और इस पोस्ट को यही इसके हाल पर छो़ड़कर दूसरी गली पकड़ लें...आपको बताता हूं कि माज़रा क्या है...पाकिस्तान की असली ताकत से आपको रू-ब-रू कराता हूं...पाकिस्तान है अब दुनिया की महाशक्ति...

अमेरिका और चीन ने डिफेंस टेक्नोलॉजी की फील्ड में बेशक बड़े तीर मार लिए हों, लेकिन पाकिस्तान की उपलब्धि के आगे दूर-दूर तक कहीं नहीं टिकते...पाकिस्तान ने ऐसा पपलू फिट कर लिया है कि उसे कल क्या होने वाला है, वो आज ही साफ़ साफ़ दिखाई देने लगता है...अरे नहीं बाबा नहीं, पाकिस्तान ने फिल्म मिस्टर इंडिया के इनविज़ीबल अनिल कपूर जैसा कोई तोड़ नहीं ढूंढा है, बल्कि बरसों के तज़ुर्बे से इस जुगाड़ का इंतज़ाम किया...चलिए अब आपको ज़्यादा घुमाता नहीं, नहीं तो आप समझने लगेंगे कि आज वाकई मेरा दिमाग घूम गया है...

आखिर पाकिस्तान को आने वाले कल की घटनाएं आज कैसे दिख सकती हैं...यक़ीन नहीं आ रहा न...ठहरिए, पाकिस्तान ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन (पहले रेडियो पाकिस्तान) का प्रसारण सुनिए...



ख्वातीन और हज़रात, आपका पाकिस्तान ब्रॉडकॉस्टिंग कारपोरेशन की इस मजलिस में हम तहे दिल से इस्तेकबाल करते हैं...सबसे पहले ख़बरें...


ख़बरों की शुरुआत हम कल होने वाले वनडे क्रिकेट मैच के नतीजे के साथ कर रहे हैं...

अब बताइए पाकिस्तान को छो़ड़ दुनिया में और कौन माई का लाल मैच का हू-ब-हू नतीजा मैच से एक दिन पहले बता सकता है...

पतियों का दर्द न जाने कोए...खुशदीप


नई नई शादी होने पर पति ने कार के पिछले शीशे पर लिखवाया-

"NEWLY MARRIED, DO NOT DISTURB"

कुछ साल बाद उसी शीशे पर लिखा था-

"DO NOT DISTURB, ALLREADY DISTURBED"

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कुछ शाश्वत सत्य...

1...
पहला बच्चा आपको पेरेंट बनाता है...


दूसरा बच्चा आने पर आप रेफ्री बन जाते हैं...


2...
शादी वो रिश्ता है जिसमें एक हमेशा सही होता है और दूसरा हमेशा पति होता है...

3...
पति-पत्नी की हर तकरार का एक ही नतीजा निकलता है...समझौता...पति कबूल करता है कि वो गलत था और पत्नी इस बात पर पति से पूरी तरह सहमत होती है....

4...
आप जिस भाषा को बोलते हुए बचपन से बड़े होते हैं, उसे मातृ-भाषा क्यों कहा जाता है...पिता को बोलने का मौका मिला हो तो इस सवाल पर सोचा जाएगा न...


स्लॉग ओवर
पत्नी के साथ रहना होता है...A PART OF LIVING

पत्नी के साथ रहते हुए भी गर्लफ्रैंड को मैनेज करना...
 
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THE ART OF LIVING

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

ये जो देस है मेरा...खुशदीप

...न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि बहुत कुछ अच्छा होने वाला है...हिंदुओं को वो मिल जाएगा जो वो चाहते हैं...मुसलमानों का मकाम भी बहुत ऊंचा हो जाएगा...भाईचारे की देश में एक नई इबारत लिखी जा सकती है...ये शायद मेरी गट फीलिंग है...

ये पंक्तियां मैंने फैसला आने से करीब  14  घंटे पहले लिखी थीं...क्यों लिखी...मेरे अंदर से किसने ये लिखवाया, मुझे खुद पता नहीं...लेकिन मैं आज बहुत खुश हूं...इसलिए नहीं कि हाईकोर्ट के फैसले से हिंदुओं को वो मिलने का मार्ग कुछ हद तक प्रशस्त हुआ, जो कि वो चाहते हैं...मैं खुश इसलिए हूं कि पूरे देश ने बेमिसाल परिपक्वता का परिचय दिया...60 साल से जिस फैसले का इंतज़ार था, उसे बड़े धैर्य, शालीनता और संयम से सुना...मुस्लिम भाइयों की मैं खास तौर पर तारीफ़ करना चाहूंगा कि उन्होंने न्यायपालिका के फैसले का मान रखा और न्याय की प्रक्रिया के अनुरूप सुप्रीम कोर्ट में जाने का इरादा जताया...मैं सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ इस मुकदमे से जुड़े सबसे बुज़ुर्ग किरदार हाशिम अंसारी से...90 साल के हाशिम साहब ने पहले ही कहा था कि हाईकोर्ट जो भी फैसला देगा, वो मेरे सर माथे होगा...हाशिम साहब ने ये भी साफ कर दिया था कि वो सुप्रीम कोर्ट भी नहीं जाएंगे...उनकी बस यही ख्वाहिश थी कि मरने से पहले वो अदालत का फैसला सुन लें...हाशिम साहब मैं आपके इस जज़्बे को सैल्यूट करता हूं...

मुझे गर्व है कि चाहे आज हिंदू संगठनों के नेता हो या मुस्लिम संगठनों के...किसी भी पार्टी के राजनेता हो...केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, मीडिया, सभी ने बड़ी समझदारी का परिचय दिया...सभी ने लोगों से शांति और अमन बनाए रखने और किसी के भड़कावे में न आने की अपील की...सरकार ने एहतियातन सिक्योरिटी के लिए जो कदम उठाए, उनका असर पूरे देश में दिखा...मैं सबसे ज़्यादा खुश हूं अपने देश के भविष्य युवा वर्ग की सोच देखकर...उनके लिए भारतीयता सबसे पहले है...विकास सबसे पहले हैं...मेरा विश्वास है कि जिस देश के पास ऐसी युवाशक्ति हो उसे दुनिया में महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता...

मैं ये भी चाहूंगा कि अब दोनो साइड के ज़िम्मेदार लोग बातचीत की टेबल पर बैठे...सुप्रीम कोर्ट के पास अपील जाती हैं तो वो अपना काम करेगा...लेकिन साथ में अगर बातचीत से सौहार्द का कोई रास्ता निकलता है, तो ये अभूतपूर्व पहल देश को ही नहीं पूरी दुनिया को शांति और भाईचारे का संदेश देगी...अतीत को भुला कर भविष्य को सुनहरा बनाएं...हिंदू जिस आस्था के मंदिर का निर्माण करें, उसमें मुस्लिम भाई हाथ बटाएं...मुस्लिम भाई जिस मुकद्दस इमारत की तामीर करें, उसमें हिंदू दिल से पूरा सहयोग दें...अगर हम ऐसा करते हैं तो हमारी आने वाली पीढ़ियां हमेशा हम पर फख्र करेंगी...क़ानून और संविधान को अपना काम करने दे...लेकिन भाईचारे को मज़बूत करने के लिए जो कुछ भी हमसे बन सके, वो ज़रूर करें...



अब सुनिए वो गीत जिसे मैं जब भी सुनता हूं, रूहानी तौर पर बड़ा सुकून मिलता है...

इतनी शक्ति देना हमको दाता,
मन का विश्वास कमज़ोर हो न,
हम चले नेक रस्ते पर,
भूल कर भी कोई भूल हो न...