मंगलवार, 31 अगस्त 2010

गु्ल्ली, मम्मी और पड़ोस वाले अंकल...खुशदीप



साइकोलॉजी टीचर ने नए तरीके से छात्रों को पढ़ाने का फैसला किया...आते ही क्लास में छात्रों से कहा कि क्लास में जो भी स्टूपिड है, खड़ा हो जाए...

ये सुनकर गुल्ली खड़ा हो गया...

टीचर ने ये देखकर कहा कि क्या तुम स्टूपिड हो...

गुल्ली ने कहा...नहीं सर, आप को अकेले क्लास में खड़ा देखकर मुझसे रहा नहीं गया...


-------------------------


मैथ्स टीचर ने गुल्ली को बुलाया...फिर पूछा...बताओ 2 और 4 क्या होते हैं...28 और 44 क्या होते हैं...



गुल्ली ने तपाक से जवाब दिया...M TV, फैशन टीवी, V TV, WWF लेडी फाइटिंग...



--------------------------

गुल्ली पिता मक्खन के साथ घोड़ों की नीलामी पर गया...
 
वहां मक्खन एक-एक घोड़े की टांग, पीठ, मुंह पर अच्छी तरह हाथ फेर कर देख रहा था...
 
थोड़ी देर तक गुल्ली ये सब देखता रहा...
 
फिर पूछ ही बैठा...आप ऐसा क्यों कर रहे हैं...
 
मक्खन ने जवाब दिया कि मैं घोड़े को खरीदने से पहले देखना चाह रहा हूं कि वो पूरी तरह स्वस्थ और अच्छी शेप में है या नहीं...
 
गुल्ली...ओह तो अब समझ आया कि मम्मी के साथ  पड़ोस वाले अंकल  ऐसा क्यों कर रहे थे...

रविवार, 29 अगस्त 2010

हम रहेंगे न हम, तुम रहोगे न तुम...खुशदीप

63 साल पहले हमें आज़ादी मिली...आज़ाद भारत में तराने गूंजने लगे...


तूफ़ान से हम लाए है कश्ती निकाल के,


मेरे बच्चो रखना इसे संभाल के...



इंसाफ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के,


ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्ही हो कल के...


क्या खूब चल के दिखाया है हमने इंसाफ़ की डगर पे, क्या खूब संभाल कर रखा है हमने तूफ़ान से निकाल कर लाई कश्ती को...देश के तौर पर तो हमें आज़ादी मिल गई...क्या भूख से हमें आज़ादी मिली, क्या जात-पांत से हमें आज़ादी मिली...हमने एक देश में ही दो देश बना दिए...तूफ़ान से निकाल कर लाई कश्ती के दो टुकड़े हो गए...एक आलीशान क्रूज़ में बदल गया जिस पर चढ़े चंद लोगों को ऐशो-आराम की हर सुविधा मिल गई...दूसरा हिस्सा ऐसी नाव में बदल गया जिसमें छेद दिन-ब-दिन बड़ा होता जा रहा है...इस नाव पर चढ़े लोगों के लिए अपना वजूद बचाए रखना ही सबसे बड़ी जंग है...हमारा देश ऐसी गाड़ी बन गया जिसमें एक पहिया जंबो जेट का लगा है...और दूसरा पहिया बैलगाड़ी का है, वो भी जगह-जगह से चरमरा रहा है...फिर ये गाड़ी भागे तो भागे कैसे...जंबो जेट वाले तो स्पीड पकड़कर दुनिया पर छा रहे हैं...और बैलगाड़ी वाले आगे बढ़ना तो दूर, अपने पहिए को ही टुकड़े-टुकड़े होने से बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं...



दुनिया भर में मंदी की मार पड़ी हो लेकिन भारत में पिछले साल अरबपतियों की तादाद दुगने से ज़्यादा हो गई...पहले 24 थे अब 49 हो गए हैं....वहीं ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ताजा सर्वे के मुताबिक भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या 64 करोड़ 50 लाख है...ये देश की आबादी का कुल 55 फीसदी है...देश में ज़्यादातर जो नए लोग वो अरबपतियों की फेहरिस्त से जुड़े हैं, उनका धंधा ज़मीन, रियल एस्टेट, प्राकृतिक संसाधन से जुड़ा है...ये दौलत की बरसात ऐसे ही धंधों में हुई है जिनमें सरकारी लाइसेंस की ज़रूरत होती है...यानि सरकारी सिस्टम को अगर दोहने की आपमें कूव्वत है तो आप दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर सकते हैं...ब्यूरोक्रेट्स सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद ऐसे ही धंधों के सलाहकार बन जाते हैं...सरकारी सिस्टम के लूपहोल्स का फायदा उठा कर फिर ये धंधेबाज़ जमकर चांदी कूटते हैं...अगर ऐसा न होता तो सरकार जहां फायदे की संभावना होती है वो सारे धंधे प्राइवेट हाथों में न सौंपती...और जहां नुकसान होता है, उन उपक्रमों को सरकार सफेद हाथी की तरह खुद पालती नहीं रहती...चोट सरकारी ख़जा़ने को ही लगती है...वो ख़ज़ाना जिसमें आप और हम जैसे टैक्स देने वालों का ही पैसा पहुंचता है...

टैक्स वेलफेयर स्टेट के नाम पर लिया जाता है...लेकिन वेलफेयर किसका...गरीबों का....कॉमनमैन का या उन दो फीसदी अमीरों का जो पूरे देश को हांकने की ताकत रखते हैं...कहा जाता है कि गांवों में प्राथमिक स्कूलों या हेल्थ सेंटरों को केंद्र से पैसा भेजा जा रहा है...जताया ये जाता है कि सरकार बहुत बड़ी चैरिटी कर रही है...लेकिन ये भी देखा जाता है कि पैसा सही जगह पहुंच भी रहा है या पहले ही बंदरबांट हो जाती है...अगर ऐसा न होता तो क्यों गांवों के प्राथमिक स्कूल और हेल्थ सेंटर बदहाल होते...वहां पढ़ने वाले बच्चे क्या किसी प्रतियोगिता में टिक सकते हैं...इन हेल्थ सेंटरों में इलाज़ कितना कारगर होता है, क्या इस पर कुछ कहना ज़रूरी है...क्यों नहीं अल्टीमेटम दिया जाता कि जहां सरकारी पैसा दिया जा रहा है वो स्कूल या हेल्थ सेंटर एक साल में परफॉर्म करके दिखाएं नहीं तो ताला लटकाने के लिए तैयार रहें...

अगर हमें वाकई एक देश में दो देश का फर्क पाटना है तो पहले चार चीज़ों का ध्यान देना बहुत ज़रूरी है...पहला- गांवों को शहरों से जोड़ने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर, दूसरा- गांव-शहर के गरीबों के लिए शिक्षा, तीसरा-स्वास्थ्य और चौथा- अर्थव्यवस्था के लाभ में समूचे देश की हिस्सेदारी...अगर इसे दुरूस्त कर आगे बढ़ते हैं तो सही मायने में देश विकसित बन पाएगा...और अगर इंडिया और भारत के बीच की खाई यूहीं चौड़ी होती रही तो एक दिन अराजकता का ऐसा विस्फोट होगा कि न फिर गरीब बचेंगे और न ही अमीर...

फिर तो वो गाना ही याद आएगा...


वक्त ने किया क्या हसीं सितम,


हम रहें न हम, तुम रहे न तुम...



(मेरा ये लेख रवींद्र प्रभात जी आज़ादी की लेखमाला में शामिल कर चुके हैं)

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

इस दिल ने धड़कना छोड़ दिया...खुशदीप

जिस दिन से जुदा वो  हमसे हुए,


इस दिल ने धड़कना छोड़ दिया,


ए चांद का मुंह उतरा-उतरा,


तारों ने चमकना छोड़ दिया...



इस गीत में वो जहां आ रहा है उसे ब्लॉगिंग मान कर सुनें...

शनिवार, 21 अगस्त 2010

बॉयज़ आर आलवेज़ बॉयज़...खुशदीप


लड़कों से ज़्यादा इस दुनिया में और कोई बिज़ी नहीं होता...

वो कैसे भला...

वो ऐसे...

एक हाथ स्टेयरिंग पर...


एक हाथ गियर पर...


एक टांग ब्रेक पर...


एक टांग एक्सलेटर पर...


एक कान म्यूज़िक पर...


एक कान मोबाइल पर...


एक आंख सड़क पर...


एक आंख लड़कियों पर...


नाक सांस लेने पर...


मुंह सिगरेट के कश लेने पर...



और फिर भी कहा जाता है लड़कों के पास निठल्ले बैठे रहने के अलावा और कोई काम नहीं...



स्लॉग ओवर

मैथ्स टीचर दिमाग में गोल गुल्ली को समझाते हुए...

तुम्हारे पास 12 चॉकलेट्स हैं...5 तुमने लवलीना को दे दीं...3 टीना को...और 4 हिना को...अब तुम्हारे हिस्से में क्या आया...


गुल्ली कुछ देर सोचने के बाद...



...



...



...



तीन नई गर्ल फ्रैंड्स हसीना...

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

मल्लू अंकल के साथ मल्लू आंटी भी...खुशदीप

मल्लू अंकल के पुराण का शेष हिस्सा सुनाने से पहले आपको बता दूं कि आज मल्लू आंटी से भी मिलवाऊंगा...मिलवा क्या देता हूं, अपनी एक पुरानी पोस्ट की याद ताज़ा कराऊंगा...

मल्लू अंकल की आगे की गाथा...

11) ब्रूस ली का सबसे अच्छा दोस्त कौन है ?

जवाब... मलया-ली और कौन...

12) मल्लू अंकल प्रार्थना कहां करते हैं ?

जवाब...In a Temble, Charch and a Maask...

13) केरल में औद्योगिक उत्पादकता इतनी कम क्यों हैं ?

जवाब...क्योंकि काम की शिफ्ट का 86% हिस्सा लुंगी को उठाने, फोल्ड करने और दोबारा बांधने में बीत जाता है...

14) मल्लू अंकल को हॉकी और फुटबॉल की टीम में क्यों नहीं शामिल किया जाता ?

जवाब...जब भी कार्नर मिलता है, वहीं टी शॉप खोल लेते हैं...

15) इस पोस्ट को पांच मल्लू आंटी के पास भेजने पर kokanet oil के पांच फ्री सेम्पल और पांच मल्लू अंकल को भेजने पर Benana Chibbs का एक फ्री पैक इनाम में मिलेगा...



अब मिलिए मल्लू आंटी से...

मल्लू आंटी ने सेक्रेटरी की पोस्ट के वॉक-इन इंटरव्यू का एड देखा तो आवेदन के साथ इंटरव्यू देने के लिए पहुंच गई...इंटरव्यू लेने वाला मैनेजर मल्लू आंटी की पर्सनेल्टी देखकर डर गया...लेकिन अब इंटरव्यू् तो लेना ही था, उसने टालने के लिहाज़ से ऐसा सवाल पूछा कि मल्लू आंटी जवाब न दे पाए और उसे रिजेक्ट करने का बहाना मिल जाए...मैनेजर ने कहा कि ये जॉब आपको मिल सकता है, बशर्ते कि आप इन शब्दों का मीनिंगफुल वाक्य बना दो..शब्द थे, ग्रीन, पिंक, येलो, ब्लू, व्हाइट, पर्पल और ब्लैक...

मल्लू आंटी ने कुछ सेकेंड के लिए सोचा और फिर ठंडी सांस लेकर कहा...
आई हियर द फोन रिंग ग्रीन, ग्रीन, ग्रीन...दैन आई गो पिंक अप द फोन... आई से येलो...
ब्लूस दैट...व्हाइट डिड यू से...ऑय रॉन्ग नंबर...डोन्ट सिम्पबली पर्पलली डिस्टरब पीपुल एंड डोंट कॉल ब्लैक...ओके...थैंक यू...

तब तक मैनेजर गश खाकर ज़मीन पर गिर चुका था...




(निर्मल हास्य)

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

मक्खन को छोड़िए, मल्लू अंकल से मिलिए...खुशदीप

मक्खन का स्वाद ऐसा तो नहीं कि छोड़ा जा सके...लेकिन कभी-कभी टेस्ट बदलना भी ज़रूरी होता है...आज मिलवाता हूं मल्लू अंकल से...वहीं मल्लू अंकल जो केरल से नोट कमाने खाड़ी के देशों में जाते हैं...मल्लू अंकल की मेहनत और ईमानदारी पर पर किसी को शक नहीं हा सकता...उनकी सबसे लाजवाब बात होती है, उनकी इंग्लिश...गौर फरमाइए...




1) मल्लू अंकल की आमदनी पर कौन सा टैक्स लगता है ?


जवाब...IngumDax...


2) मल्लू अंकल ने कहां से एजुकेशन हासिल की ?



जवाब...In the ko-liage...


3) मल्लू अंकल आजकल कम दिखाई देते हैं ?



जवाब...He is very bissi...



4) मल्लू अंकल एयर-टिकट क्यों लेते हैं ?



जवाब...To go to Thuubai zimbly to meet his ungle in Gelff ...


(दुबई जाते हैं सिम्पली, गल्फ में अंकल से मिलने के लिए)



5) मल्लू अंकल गल्फ क्यों जाते हैं ?



जवाब...To yearn meney ...


6) प्लेन में आग लग जाए तो मल्लू अंकल क्या करेंगे ?



जवाब...He zimbly jembd out of the vindow...


7) मल्लू अंकल MOON को कैसे स्पेल करेंगे ?



जवाब...MOON - Yem Woh yet another Woh and Yen


8) मल्लू अंकल का मैनेजमेंट ग्रेजुएट बेटा क्या कहलाएगा ?



जवाब...Yem Bee Yae...


9) मल्लू अंकल अमेरिका जाने पर पहला काम क्या करते हैं ?

जवाब...अपना नाम Karunakaran से Kevin Curren कर लेते हैं...



10) मल्लू अंकल रोज़ आफ़िस जाने के लिए क्या इस्तेमाल करते हैं ?

जवाब...An Oto (ऑटो)...



कल भी जारी रहेगा मल्लू अंकल का पुराण...

बुधवार, 18 अगस्त 2010

बोलो, बोलो, कौन है वो...खुशदीप

अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को किसी ने बता दिया कि लीडरशिप का हुनर सीखना है तो भारत से बढ़िया जगह और कोई नहीं...और मक्खन का तो इस मामले में जवाब ही नहीं...मक्खन से मिलने के लिए ओबामा सीक्रेट मिशन के तहत तत्काल भारत आए...अमेरिकी दूतावास से मक्खन के लिए बुलावा आ गया...मक्खन पहुंच गया जी दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास...



मक्खन की खातिरदारी करने के बाद ओबामा ने पूछा कि लीडरशिप का सबसे अहम फंडा कौन सा होता है...

मक्खन ने तपाक से कहा...आप हर वक्त बुद्धिमान लोगों से घिरे रहने चाहिए...

ओबामा...कैसे पता चलेगा कि जो लोग पास हैं, वो बुद्धिमान हैं या नहीं...

ये सुनकर मक्खन ने कहा कि इसमें कौन सी बड़ी बात है...अभी साबित कर देता हूं..ये कहने के बाद मक्खन ने परम सखा ढक्कन को आवाज़ दी...पूछा...आपकी मां का एक बच्चा है, आपके पिता का भी एक बच्चा है...वो बच्चा न तो आपका भाई है और न ही बहन है...बताओ वो कौन है...

ढक्कन बिना वक्त गंवाए बोला...वो मैं हूं...


मक्खन...बिल्कुल ठीक ढक्कन, अब तुम जा सकते हो...


ये सुनकर ओबामा मक्खन से बेहद प्रभावित होकर बोले...आपका बहुत बहुत शुक्रिया, मैं इस पहेली को अच्छी तरह समझ गया हूं....

ओबामा ने वाशिंगटन वापस पहुंचने के बाद परखना चाहा कि उनकी टीम के सदस्य कितने इंटेलीजेंट है...पहले उन्होंने डिफेंस सेक्रेट्री राबर्ट गेट्स को बुलावा भेजा...ओबामा ने गेट्स से कहा...क्या आप एक सवाल का जवाब ढूंढने में मेरी मदद कर सकते हैं...

गेट्स...ऑफ कोर्स मिस्टर प्रेसीडेंट...आप सवाल बताएं...

ओबामा...आपकी मां का एक बच्चा है, आपके पिता का भी एक बच्चा है...न वो आपका भाई है और न ही बहन...बताइए वो कौन है...

गेट्स थोड़ी देर माथापच्ची करने के बाद...सॉरी मिस्टर प्रेसीडेंट...मैं तत्काल जवाब नहीं दे सकता...लेकिन अभी थोड़ी देर में जवाब के साथ आता हूं...

गेट्स ने सारे सीनियर सीनेटर्स के साथ बैठक बुलाई...घंटों की मशक्कत के बाद भी वो इस सवाल का जवाब नहीं ढूंढ सके...आखिर थक हार कर गेट्स ने फॉरेन सेक्रेट्री हिलेरी क्लिंटन से मदद लेनी चाही...गेट्स ने वही सवाल दोहराया...आपकी मां का एक बच्चा है, आपके पिता का भी एक बच्चा है...न वो आपका भाई है और न ही बहन...बताइए वो कौन है...

हिलेरी क्लिंटन ने जवाब दिया...ऑफकोर्स वो मैं हूं...

ये सुनकर गेट्स के माथे से बोझ हट गया...वो ओबामा के पास जाकर खुशी खुशी बोले...मिस्टर प्रेसीडेंट आपके सवाल का जवाब मिल गया है...

ओबामा...वंडरफुल, क्या जवाब है...

गेट्स...वो शख्स है हमारी फॉरेन सेक्रेट्री हिलेरी क्लिंटन...

इस पर ओबामा ने मुंह बिचकाते हुए कहा...गलत जवाब...

गेट्स डरते डरते बोले... फिर सही जवाब क्या है मिस्टर प्रेसीडेंट

ओबामा...वो शख्स है...



....



....



ढक्कन...

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

ब्लॉगिंग के मेरे हमसफ़र (2)...खुशदीप

कल सफ़र को जहां छोड़ा था, आज वहीं से आगे बढ़ाता हूं...चार-पांच महीने पहले सतीश सक्सेना जी से मेरी पहली मुलाकात अविनाश वाचस्पति जी के घर पर हुई...ऐसी ट्यूनिंग जमी कि बस मज़ा आ गया...लेकिन आप को एक राज़ की बात बताऊं...नोएडा में मेरा और सतीश भाई का सेक्टर बिल्कुल साथ-साथ हैं...लेकिन आज तक दोनों में से कोई भी एक-दूसरे के घर नहीं गया...बस ब्लॉग से ही अटूट रिश्ता जुड़ा हुआ है...



अब बात करता हूं राज भाटिया जी की...अगर विदेश में भारत का झंडा ऊंचा है तो राज जी जैसे राजदूतों की ही बदौलत है...न गलत किसी के साथ करते हैं और न ही गलत बर्दाश्त करते हैं...

डॉ कविता वाचक्नवी...भारतीयता को सही मायने में प्रतिबिम्बित कर रही हैं डॉक्टर साहिबा...मैं एक बार की मुलाकात में ही कविता जी के व्यक्तित्व से अभिभूत हूं...

ज्ञानदत्त पाण्डेय- ज्ञान की गंगा में पूरे ब्लॉगवुड को डुबकी लगवाते रहते हैं...कामना करता हूं कि पूर्ण स्वस्थ होने के बाद अब फिर अपनी पुरानी फॉर्म दिखाएं...

डॉ रूपचंद्र शास्त्री मयंक...शास्त्री जी चर्चा हो या कोई अन्य पोस्ट, हर बार अपना सौ फीसदी देते हैं...

सुमन...नाइस शब्द कितना भी विवादों में रहे लेकिन है बड़ा नाइस...

रवि रतलामी- ब्लॉगिंग के पुरोधा और सबसे सम्मानित नाम, तकनीक के मास्टर...

नीरज गोस्वामी- अफसोस करता हूं अपनी कमअक्ली पर कि नीरज जी के लिखे को पढ़ने से मैं अब तक वंचित क्यों रहा...

सुरेश चिपलूनकर- स्पष्ट और तर्कपूर्ण ढंग से अपने प्रखर विचारों को प्रस्तुत करने में सुरेश जी का कोई सानी नहीं...

अरविंद मिश्रा...सच की साइंस हो या जिंदगी की साइंस, हर एक को साधने में माहिर...लेकिन दोस्त-दुश्मन की पहचान में थोड़े कमज़ोर...

महेंद्र मिश्र- नौकरी से संन्यास के बाद ब्लॉगिंग में जमकर धूनी जमा रखी है...समयचक्र बस ऐसे ही हमेशा घूमता रहे...

एम वर्मा- कविता के साथ मानव-स्वभाव को पढ़ने में भी माहिर...

लावण्या जी- पंडित नरेंद्र शर्मा जी के ज्योति कलश की चमक को बखूबी पूरी दुनिया में बिखेरा है...

गिरीश चंद्र बिल्लौरे मुकुल- बस मेरा ही पॉडकॉस्ट रह गया...

बवाल- ऐसे बवाल जिनके नाम के साथ एक भी बवाल कभी नहीं जुड़ा...

रतनसिंह शेखावत- नांगलोई जाट में शेखावत जी से हुई मुलाकात का एक-एक लम्हा अब भी अच्छी तरह याद है...

डॉ.अनुराग- एक शहर, एक ही स्कूल में पढ़े होने के बावजूद अब तक मुलाकात नहीं हुई है...

सतीश पंचम- चीज़ों को आब्ज़र्व करने के बाद लेखन में उतारने में सतीश जी का कोई सानी नहीं...

घुघूती बासूती...जैसा अद्भुत नाम वैसे ही चमत्कृत कर देने वाली लेखन की शैली...

गोदियाल जी...आजकल आपका कम लिखना अखर रहा है...जल्दी अपने रंग में लौटिए...

मनोज कुमार- नये ब्लॉगरों को समीर जी की तरह ही मनोज जी भी प्रोत्साहन देने में सबसे आगे रहते हैं...

गिरिजेश राव- सच पूछो तो गिरिजेश भाई से डर लगता है...इसलिए वर्तनी का खास ध्यान रखना पड़ता है...

हरि शर्मा- बैंकर होने के साथ ब्लॉगिंग भी बखूबी की जा सकती है...

पंडित डी के शर्मा वत्स- अफसोस रहा कि नांगलोई जाट में पंडित जी से ज़्यादा बात नहीं हो सकी थी..जब भी लुधियाना जाऊंगा, ज़रूर मिल कर आऊंगा...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी...प्रयाग की पावन विचारधारा को अब वर्धा में बहा रहे हैं...

गौतम राजरिषी- गज़ल हो या गोली, मेजर साहब के इशारे पर नाचती हैं...

सरवत जमाल...सतीश सक्सेना भाई के इतना मनाने के बावजूद अभी तक पूरे रंग में नहीं लौटे हैं...

अल्पना वर्मा...आवाज़ का जादू जगाना हो या पहेली का आयोजन, अल्पना जी की अलग ही छाप होती है...

पीडी...जब भी लिखते हैं, दिल की गहराई से लिखते हैं...साफ़गोई का खास तौर पर कायल हूं...

आशा जोगलेकर....वृतांत के ज़रिए आशा जी के साथ दुनिया की सैर करने का अलग ही मज़ा है...

प्रवीण शाह...तीखे हैं पर खरे हैं...मुझे इनकी बेबाक राय का हमेशा इंतज़ार रहता है...

ज़ाकिर अली रजनीश...मुस्कुराइए कि ज़ाकिर भाई लखनऊ में हैं...

रचना...अपने उसूलों, उद्देश्य और मकसद पर चट्टान की तरह अडिग...

योगेंद्र मौदगिल...कविता में देश का अग्रणी नाम...किसी दिन इत्मीनान से बैठकर योगेंद्र भाई को सुनने की तमन्ना है...

अनीता कुमार...आप से शिकायत, इतना कम क्यों लिखती हैं आप, चलिए जल्दी से शिकायत दूर कीजिए...

सीएम प्रशाद...हुज़ूर बड़े दिनों बाद लौटे हैं लेकिन तेवरों में कहीं कोई कमी नहीं...चश्मेबद्दूर...

मसिजीवी...डीयू के साथ ब्लॉगिंग की भी शान...लेकिन आजकल ब्लॉग पर कम ही लिखते हैं...

सुरेश चंदन...ट्रेनों के साथ गोष्ठियों के संचालन में भी बेजोड़, कविता इनके मुख से सुनने का अलग ही आनंद...

इरफ़ान- ब्लॉग जगत की मुस्कान...

शाहनवाज़ सिद्दीकी- विनम्रता के दूसरे नाम, प्रेमरस ब्लॉग का नाम है...अब इसके आगे भी कुछ कहने की ज़रूरत है...

दिव्या (ज़ील)- ब्लॉग जगत की श्रेष्ठ टिप्पणीकार...

मुक्ति- लेखन की आराधना हो तो ऐसी हो...

अर्चना- समालोचना में अर्चना जी से बढ़ कर कोई नहीं...

मिथिलेश दुबे...ब्लॉगिंग का युवा तुर्क...

शहरोज...इक रोज़ ऐसा भी आएगा जब हर बला शहरोज़ भाई से मात खाएगी...

दिगंबर नासवा...खाड़ी में भारत के गौरव


वंदना अवस्थी दूबे...सारगर्भित लेखन के साथ टिप्पणी कला में भी सिद्धहस्त

प्रमोद ताम्बट...साहित्य हो या ब्लॉग, प्रमोद जी हमेशा प्रमोदित करते हैं...

परमजीत सिंह बाली...बाली जी की हर टिप्पणी निराली होती है...

तारकेश्वर गिरी...साहिबाबाद के साहिब, तर्कशास्त्र में माहिर

भावेश...नाम बेशक भावेश हो लेकिन लेखन में भावेश में नहीं आते...

संजय भास्कर...ब्लॉगिंग के भास्कर

प्रवीण पांडेय...लेखन, टिप्पणी हर कला में प्रवीण

अरुणेश मिश्र...अभी अरुणेश जी से ज्यादा मुलाकात नहीं हुई लेकिन लेखन से प्रभावित हूं

अंशुमाला...लेखन में मोतियों की माला गूंथने में जवाब नहीं

मुकेश कुमार सिन्हा...जब भी इनकी टिप्पणी आती है आनंदित करती है...
 
विनीत कुमार...हम मीडिया वालों को आइना दिखाने का काम विनीत से बेहतर और कोई नहीं कर सकता...

सलीम- विवाद हो निर्विवाद, रहेंगे हमेशा ब्लॉगिंग के प्रिंस सलीम...

हिमांशु- गंगा से है हिमांशु का नाता कोई (मुझे समीर जी से पता चला था)...

मो सम कौन (संजय अनेजा) : आजकल कहीं छुप कर कह रहे हैं, मुझे पहचानो, मैं हूं कौन...

विवेक रस्तोगी- खाने-पीने में टेस्ट मेरे जैसा ही है...प्रतिबंध ये भी नहीं मानते, मैं भी नहीं मानता...

रानी विशाल- शुरुआत में ब्लॉगिंग मे जो बिजलियां रानी जी ने चमकाई थीं, उन्हीं जबरदस्त पोस्ट का फिर से इंतज़ार...

कुलदीप हैप्पी- ओए पापे, आजकल कित्थे हो बादशाहो, पटियाले जाकर भूल ही गए हो सारेया नूं...

श्रद्धा जैन- बहुत कम लिखती हैं, लेकिन जब भी लिखती हैं, टिप्पणियों का अंबार लगा देती हैं...

बबली- ऑस्ट्रेलिया में भारत की आन...

विवेक रंजन श्रीवास्तव- अभी विवेक जी को और पढ़कर समझना बाकी है...

प्रवीण त्रिवेदी- मास्टर जी इतनी लंबी छुट्टी तो सरकारी स्कूलों में भी नहीं मिलती...

अलबेला खत्री- मैं तो हूं अलबेला, हज़ारों मे अकेला, सदा तुमने ऐब देखा, हुनर को न देखा...

बेचैन आत्मा...इनकी टिप्पणी पढ़कर ही चैन आता है...

बोले तो बिंदास (रोहित)...बिंदास छोकरा, लेकिन लिखने में कमाल...

स्मार्ट इंडियन....भारत के स्मार्ट अंबेसडर...

पदम सिंह...एक ब्लॉग मीट में झलक दिखाने के बाद कहां छुप गए हो जनाब...

शिवम मिश्रा...शिव के साथ सत्य भी और सुंदर भी...हमेशा अपने साथ पाता हूं...

जय कुमार झा...कमर कस कर रखिए जय जी, भ्रष्टाचारियों के नट-बोल्ट कसने का टाइम आ रहा है...

संजीव कुमार तिवारी...पता नहीं क्यों अक्सर संजीव भाई और संजीत त्रिपाठी में कनफ्यूज़ कर जाता हूं...

संजीत त्रिपाठी...आपको अब से आवारा बंजारा नाम से याद रखूंगा...

सूर्यकांत गुप्ता...वर्दीधारी भी बढ़िया ब्लॉगरी कर सकते हैं, सूर्यकांत जी जीती-जागती मिसाल हैं...

राजकुमार ग्वालिनी...स्पोर्ट्सपर्सन होने की वजह से ही गज़ब का स्टैमिना है...

राज कुमार सोनी... ब्लॉगजगत के बाहुबली से बिगुल सुनने का अलग ही मज़ा है...

सागर- बोल्ड ज़माने की बोल्ड पहचान...

यशवंत मेहता- यार तुम सन्नी हो, फ़कीरा हो, क्या क्या हो भाई, ये किसी दिन मुझे साफ़ कर दो...

अंतर सोहेल- साफ़-सुथरे हैं जनाब लेकिन एक दिन नॉनवेज डिश पता नहीं कहां से ले आए थे...

मयंक सक्सेना- नई नौकरी में बिजी होने की वजह से शायद ब्लॉगिंग से दूर है...

अमरेंद्र त्रिपाठी- विचारों की प्रखरता में जेएनयू की विशिष्ट छाप झलकती है...

प्रवीण पथिक...ये पथिक भाई ब्लॉगिंग का पथ भूल गए लगते हैं...

कनिष्क कश्यप...ब्लॉगिंग का प्रहरी, हर एक का मददगार...

पकंज मिश्रा...दमन से ग्वालियर आने के बाद इतनी ख़ामोशी क्यों है भाई...

राम त्यागी... है प्रीत जहां की रीत सदा है, मैं गीत वहां के गाता हूं, भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं...

देव कुमार झा...शादी के बाद देव बाबा ज़्यादा ही मसरूफ़ हो गए लगते हैं...

विनोद कुमार पांडेय...चेहरे पर सदाबहार मुस्कान...विनोद भाई का नाम लेते ही प्रेम जनमेयजेय जी और फरीदाबाद याद आ जाता है...

सुलभ सतरंगी...जनाब आप ब्लॉगजगत में आसानी से सुलभ कब होंगे...

शहरयार...फिल्मों में एक गीतकार शहरयार को तो सुना था...कहीं आप वही तो नहीं...

कुश...गलतफहमियां एक तरफ़, कुश भाई के लेखन का मैं कायल हूं...

नीरज जाट...ब्लॉग जगत का घुमक्कड़ी बाबा...


काजल कुमार...कार्टून की कोठरी मे रोज़ चोखा काजल...

यहां तक आते-आते मेरी टैं बोल गई है...अब कोई नाम न याद आ पाया हो तो मुझे भुलक्कड़ समझ कर जाने दीजिएगा...हो सके तो कमेंट के ज़रिए मुझे याद दिला दीजिएगा...

सोमवार, 16 अगस्त 2010

ब्लॉगिंग का एक साल और आपका साथ (1)...खुशदीप


ब्लॉगिंग का मेरा एक साल पूरा होने पर आप सब के साथ यादों का एक झरोखा...लेकिन सबसे पहले बात 'ब्लॉगिंग के सरदार' बी एस पाबला जी की...कल पाबला जी का ये कमेंट मिला...

इस ब्लॉग जगत में आपके ब्लॉग को एक वर्ष पूर्ण होने पर बधाई, शुभकामनाएं...
यूं हूँ खुश रहे, खुश रखें...
जय-हिंद...

ब्लॉगिंग में मेरा एक साल पूरा हो गया...लेकिन ऐसा लगता है कि आप सब को न जाने कब से जानता हूं...दिलों से दिल की राह मिली हुई है...पाबला जी का यकायक आकर मुझे ब्लॉगिंग का एक साल पूरा होने की बधाई देना न सिर्फ चौंकाता है बल्कि ये भी बताता है कि दूसरों को खुशी देने के लिए कोई कर्मयोगी कितनी अथक, निस्वार्थ साधना कर सकता है...मैं ही नहीं, हर ब्लॉगर की खुशी-गम में पाबला जी न खुद सबसे आगे खड़े होते हैं, बल्कि पूरे ब्लॉग जगत को भी सूचना देकर शरीक कराते हैं...मुझे तो खास तौर पर हर मोड़ पर पाबला जी ने बड़े भाई का स्नेह दिया है...इसलिए उनका आभार कह कर उनके प्यार को छोटा नहीं करूंगा...बस जादू की एक झप्पी...

हां तो आता हूं, अपने ब्लॉगिंग के एक साल के सफ़र पर...पिछले साल 15 अगस्त को पहली पोस्ट लिखी- कलाम से सीखो शाहरुख...ब्लॉग पर इसे पोस्ट किया 16 अगस्त को...लेकिन टाइम सही तरह से सेट न होने की वजह से ब्लॉग पर पोस्ट होने का टाइम दिखा...17 अगस्त, तड़के 2.14...पहली टिप्पणी मिली फौज़िया रियाज़ की...जिसे मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा..

इसके बाद 18 अगस्त को दूसरी पोस्ट पर शब्द-सम्राट और पत्रकारिता में मेरे आदर्श अजित वडनेरकर जी ने मेरा हौसला बढ़ाया...और 22 अगस्त को तीसरी पोस्ट पर कनाडा से सर्र से उड़न तश्तरी पर आए मेरे गुरुदेव समीर लाल जी...जैसे कोई बच्चा ऊंगली पकड़कर चलना सीखता है, वैसे ही मैंने गुरुदेव को पढ़-पढ़ कर ब्लॉगिंग की एबीसी सीखी...

ब्लॉगिंग में जितने प्यार की मैं उम्मीद के साथ आया था, उससे दुगना क्या, कहीं ज़्यादा गुना मुझे मिला...अब एक एक कर सबके साथ ब्लॉगिंग के सफ़र को बांटने की कोशिश करता हूं...

अदा... मेरे से एक-दो महीने पहले ही ब्लॉगिंग शुरू करने वाली अदा जी से विचारों की कैसी ट्यूनिंग जमी, इसका सबूत है कि एक बेनामी भाई ने इस जुगलबंदी को खुशदीप एंड अदा ड्रामा कंपनी तक का नाम दे दिया...

दिनेशराय द्विवेदी...द्विवेदी सर ने मेरे ब्लॉगिंग के सफ़र की शुरुआत से ही मेरा हौसला बढ़ाया, जितने अच्छे वकील हैं, उससे कहीं बढ़कर शानदार शख्सीयत...

डॉ टी एस दराल...मार्गदर्शक, बड़े भाई जिनसे मैं अपनी कोई भी परेशानी खुल कर कह सकता हूं...

निर्मला कपिला...ब्लॉगिंग की मदर टेरेसा कहूं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं...उनकी ममता के खज़ाने से मुझे जी भर कर आशीर्वाद के मोती मिले...

डॉ अमर कुमार...मेरे टॉप आइकन... उसूलों, विद्वतता और सेंस ऑफ ह्यूमर के लिए जिनका मैं सबसे ज़्यादा सम्मान करता हूं...

अनूप शुक्ल...मेरे महागुरुदेव, जब अपनी फुरसतिया रौ में लिखते हैं तो उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई जैसा आनंद आता है...

अनिल पुसदकर...एक ऐसे इनसान जो उनके मन में है वही लेखन में भी...कहीं कोई लाग-लपेट नहीं, सबके काम आने वाले...

महफूज़ अली...मैं घर में सबसे छोटा हूं, इसलिए छोटा भाई न होने की कसक हमेशा रही, लेकिन महफूज़ ने उस कमी को पूरा कर दिया...

ललित शर्मा... ब्लॉगवुड के शेर सिंह, यारों के यार

रवींद्र प्रभात...ईमानदारी में बेमिसाल, ब्लॉगिंग की लाइफ़-लाइन

ताऊ रामपुरिया...भतीजे का दिमाग जब उलट जावै सै ते ताऊ का लठ्ठ ही उसे लाइन पर लावे..

दीपक मशाल...रिसर्च स्कॉलर जो दूसरों को अपना बनाने के हुनर में भी माहिर, मेरे घर का सदस्य

अजय कुमार झा...किसी का दिल जीतने के लिए इनकी एक मुस्कान ही काफ़ी है..., कोर्ट कचहरी का काम करते हैं, ब्लॉगिंग को जीते हैं

राजीव कुमार तनेजा...व्यंग्य के कारोबारी

संजू तनेजा... राजीव कुमार तनेजा की प्रभारी

अविनाश वाचस्पति...ब्लॉगिंग के लोकायुक्त, देश भर के ब्लॉगरों को नज़दीक लाने के सूत्रधार...

जी के अवधिया...हिंदी ब्लॉगिंग को शिखर पर देखने के लिए दिन-रात प्रयासरत

शरद कोकास...कवि, साहित्य मनीषी, पुरातत्वविद्...लेकिन इन सबसे पहले बढ़िया इनसान

संगीता पुरी...गरिमामयी व्यक्तित्व, लेखन में गज़ब की धार, ज्योतिष को समर्पित

डॉ अजित गुप्ता...गंगा की निर्मल धारा जैसे प्रवाह वाला लेखन, ज्वलंत मुद्दों पर जबरदस्त पकड़

शिखा वार्ष्णेय...विलायत में भारत की खुशबू

रश्मि रवीजा...कहानी, उपन्यास, व्यंग्य कोई भी विधा हो, हमारी बहना का जवाब नहीं

वाणी गीत...लेखनी के गीत का वो कमाल जो हर पढ़ने वाले को मंत्रमुग्ध कर देता है...मुझसे ठीक एक महीना पहले ही ब्लॉगिंग में एक साल पूरा किया है

संगीता स्वरूप...जितनी सुंदर कविताएं लिखती हैं उतना ही सुंदर मन

शोभना...देश की हर लड़की ऐसी होनी चाहिए...पढ़ाई में असाधारण, विचारों में प्रखर, जीवन में निडर

शेफाली पांडेय...मास्टरनी बहना की लेखनी को नमन, जब भी लिखती है देवभूमि जैसी सच्चाई का अहसास

सोनल रस्तोगी...मेरे पड़ोस फरीदाबाद की हैं, सेंस ऑफ ह्यूमर मेरी वेवलैंथ का है...

पारुल...जितनी खुद सुंदर लेखनी भी उतनी ही कमाल...

वंदना...निर्मल हास्य में इन्हें छुपी-रूस्तम मानता हूं...

धीरू सिंह...मेरे ससुराल के हैं भाई, जितना विराट व्यक्तित्व, उतना ही दिल भी बड़ा...

हरकीरत हीर...दर्द खुद ही मसीहा दोस्तों...लेकिन इनकी लेखनी से धोखा मत खाइए...मौका मिले तो सेंस ऑफ ह्यूमर में अच्छों-अच्छों की छुट्टी कर सकती हैं...

अभी कई साथियों के नाम बाकी है...उनके साथ ब्लॉगिंग के सफ़र की यादों को कल बाटूंगा...

अंत में अपने अज़ीज़ सतिंदर जी का ज़िक्र करूंगा...वो ब्लॉगर नहीं हैं लेकिन उनके पास मेरे ब्लॉग पर मिली टिप्पणियों की संख्या का पूरा रिकॉर्ड है...उनका तहे दिल से शुक्रिया....

मेरा ब्लॉगिंग का सफ़र


देशनामा ब्लॉग बनाया...फरवरी 2009


पहली पोस्ट डाली...16 अगस्त 2009


ब्लॉगिंग के दिन...365


पोस्ट लिखीं...333


पाठक संख्या...84,635 (15 अगस्त 2010, रात 12 बजे )



टिप्पणियां... 8,813 (15 अगस्त 2010, रात 12 बजे)


क्रमश:

रविवार, 15 अगस्त 2010

क्या हम आज एक-दूसरे को बधाई देने के हक़दार है...खुशदीप

हम आज़ाद हैं...63 साल से हम यही तो कहते आ रहे हैं...लेकिन क्या हम मुकअम्मल आज़ाद हो पा्ए...क्या आज़ादी के दिन हम एक दूसरे को वाकई बधाई देने के हक़दार हैं...देश के सत्ता के गलियारों में बैठे भाग्यविधाता नेताओं या देश के संसाधनों पर कब्ज़ा जमाए बैठे रंगे सियारों को छोड़ दें तो कहां है आज़ादी...देश को अब असल आज़ादी की ज़रूरत है...आज़ादी के मतवालों ने यही सोचा होगा कि भारत गुलामी की बेड़ियों को तोड़कर खुली हवा में सांस लेगा तो देश में सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव होगा...लेकिन ऐसा नहीं हुआ...हमने उन तमाम अवमूल्यों को मान्यता दे दी जिनसे हम आज़ादी से पहले जूझ रहे थे...अगर ऐसा नहीं होता तो आज एक ही देश में दो देश बंटे नज़र नहीं आते...एक तरफ बीस करोड़ लोग जिन्होंने तमाम संसाधनों पर कब्ज़ा कर रखा है...शेष हिस्से में बाकी आबादी...कहीं कोई संतुलन नहीं और न ही इंडिया और भारत के बीच खाई को पाटने की कोशिश...बल्कि ये विषमता दिन-ब-दिन और बढ़ती जा रही है...

हिंदू पौराणिक कथा के मुताबिक सूर्य देवता के रथ को सात घोड़े खींचते हैं...इनमें छह घोड़े हट्टे-कट्टे हैं...लेकिन सातवां घोड़ा कमज़ोर और नौसिखिया है...वो हमेशा सबसे पीछे रहता है...लेकिन पूरे रथ के आगे बढ़ने की गति इस सातवें घोड़े की चाल पर ही निर्भर करती है...एक दिन ऐसा भी आता है कि जब बाकी के छह घोड़े उम्र ढलने की वजह से अशक्त हो जाते हैं...तब सूर्य देवता के रथ को आगे ले जाने का सारा दारोमदार इस सातवें घोड़े पर ही आ टिकता है...तो भारत के रथ को दुनिया में आगे बढ़ाने के लिए उसके सातवें घोड़े को ताकत कैसे मिले, क्या ये सवाल हमें आंदोलित कर सकता है...

जब तक देश में आखिरी पायदान पर खड़ा व्यक्ति भूखा है...जिसके सिर पर छत नहीं है...तन पर पूरे कपड़े नहीं है...हम महानगरों में बड़े बड़े म़ॉल्स, फ्लाईओवर्स, आर्ट ऑफ द स्टेट एयरपोर्टस देखकर बेशक कितने ही खुश हो लें लेकिन देश सही मायने में तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक इस देश में आखिरी पायदान पर खड़े शख्स के पैरों में भूख, बेरोज़गारी और बीमारी की बेड़ियां हैं...

आज़ादी को लेकर कुछ महीने पहले मैंने लघु कथा पिंजरा लिखी थी, स्वतंत्रता दिवस पर इसका मुझे बहुत महत्व लगा, इसलिए दोबारा यहां पेश कर रहा हूं...


पिंजरा...




मल्लिका और बादशाह बाग़-ए-बहारा में टहल रहे थे...मौसम भी बड़ा दिलकश था...टहलते-टहलते मल्लिका की नज़र एक पेड़ की शाख पर बैठे बेहद खूबसूरत तोते पर पड़ी...इंद्रधनुषी रंगों से सज़ा ये तोता बड़ी मीठी बोली बोल रहा था...तोते पर मल्लिका का दिल आ गया...यहां तक कि मल्लिका बादशाह से बात करना भी भूल गई...तोते को एक टक देख रही मल्लिका के दिल की बात बादशाह समझ गए...बादशाह ने फौरन सिपहसालारों को हुक्म दिया- शाम तक ये तोता बेगम की आरामगाह के बाहर लगे झूले के पास होना चाहिए...और इस तोते के लिए बड़ा सा सोने का पिंजरा बनवाने का फौरन इंतज़ाम किया जाए...


एक बहेलिये की मदद से सिपहसालारों ने थोड़ी देर में ही तोते पर कब्ज़ा पा लिया...तोते को महल ला कर बेगम की आरामगाह में पहुंचा दिया गया...शाम तक सोने का पिंजरा भी लग गया...तीन-चार कारिंदों को ये देखने का हुक्म दिया गया, तोते को खाने में जो जो चीज़ें पसंद होती है, थोड़ी थोड़ी देर बाद उसके पिंजरे में पहुंचाई जाती रहें...तोते को पास देखकर मल्लिका की खुशी का तो ठिकाना नहीं रह गया...लेकिन तोते के दिल पर क्या गुज़र रही थी, इसकी सुध लेने की भला किसे फुरसत...कहां खुले आसमान में परवाज़, एक शाख से दूसरी शाख पर फुदकना...मीठी तान छेड़ना...और अब हर वक्त की कैद...आखिर इस मल्लिका और बादशाह का क्या बिगाड़ा था, जो ये आज़ादी के दुश्मन बन बैठे...मानता हूं, खाने के लिए सब कुछ है...लेकिन ऐसे खाने का क्या फायदा...मनचाही ज़िंदगी जीने की आज़ादी ही नहीं रही तो क्या मरना और क्या जीना...


तोते का गुस्सा बढ़ जाता तो पिंजरे की सलाखों से टक्करें मारना शुरू कर देता...शायद कोई सलाख टूट जाए और उसे वही आज़ादी मिल जाए. जिसके आगे दुनिया की कोई भी नेमत उसके लिए अच्छी नहीं...सलाखें तो क्या ही टूटने थीं, तोते के पर ज़रूर टूटने लगे थे...दिन बीतते गए तोता उदास-दर-उदास होता चला गया...तोते पर किसी को तरस नहीं आया...दिन-महीने-साल बीत गए...लेकिन तोते का पिंजरे से बाहर निकालने के लिए टक्करें मारना बंद नहीं हुआ...


एक बार मल्लिका बीमार पड़ गई...बादशाह आरामगाह में ही मल्लिका को देखने आए...मल्लिका को निहारते-निहारते ही बादशाह की नज़र अचानक तोते पर पड़ी...तोते को गुमसुम उदास देख बादशाह को अच्छा नहीं लगा...लेकिन उसने मल्लिका से कुछ कहा नहीं...मल्लिका को एक सयाने को दिखाया गया तो उसने बादशाह को सलाह दी कि किसी बेज़ुबान परिंदे को सताने की सज़ा मल्लिका को मिल रही है...इसलिए बादशाह हुज़ूर अच्छा यही है कि पिंजरे में कैद इस तोते को आज़ाद कर दिया जाए...


मल्लिका से जान से भी ज़्यादा मुहब्बत करने वाले बादशाह ने हुक्म दिया कि तोते को फौरन आज़ाद कर दिया जाए...हुक्म पर तामील हुई...तोते के पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया गया...ये देख तोते को आंखों पर भरोसा ही नहीं हुआ...भरोसा हुआ तो तोते ने पूरी ताकत लगाकर पिंजरे से बाहर उड़ान भरी...लेकिन ये क्या तोता फड़फड़ा कर थोड़ी दूर पर ही गिर गया...या तो वो उड़ना ही भूल गया था या फिर टूट टूट कर उसके परों में इतनी ताकत ही नहीं रही थी कि लंबी उड़ान भर सकें...

तोते की ये हालत देख उसे फिर पिंजरे में पहुंचा दिया गया...अब तोता शान्त था...फिर किसी ने उसे पिंज़रे से बाहर आने के लिए ज़ोर लगाते नहीं देखा...शायद इसी ज़िंदगी को तोते ने भी अपना मुस्तकबिल (नियति) मान लिया...





शनिवार, 14 अगस्त 2010

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

आज के ज़माने में एक रुपये में इतना कुछ...खुशदीप

महंगाई के दौर में एक रुपये में भरपेट बढ़िया खाना...सबक लें महंगाई के नाम पर संसद में हंगामा मचाने वाले नेता...सबक ले लाखों टन अनाज गोदामों में सड़ा देने वाली सरकार...लुधियाना का एक रुपये वाला होटल...एनआरई कर रहे हैं सच्ची देशसेवा...14 साल से निस्वार्थ चल रहा है होटल...

महंगाई के नाम पर सांसद शोर मचाते रहे और देश की जनता तमाशा देखती रही। वो बेचारी और कर भी क्या सकती है। सांसद खाए-पिए-अघाए हैं। सिर्फ नारों में ही दम लगा सकते हैं। यही दम वो वाकई आम आदमी की परेशानियां दूर करने में लगाएं तो देश की तस्वीर ही न पलट जाए। ऐसी कौन सी सुविधा नहीं है जो हमारे माननीय सांसदों को नहीं मिलती । मुफ्त हवाई यात्राएं, ट्रेन के एसी फर्स्ट क्लास में जितना चाहे मुफ्त सफर। संसद चलने पर हाजिरी के रजिस्टर पर दस्तखत कर देने से ही रोज़ का एक हज़ार का भत्ता पक्का। नारे लगाते थक गए और रिलेक्स करने का मूड आ गया तो संसद की हाउस कैंटीन है ही। यहां बढ़िया और लज़ीज़ खाना इतना सस्ता मिलता है कि सस्ते से सस्ता ढाबा भी मात खा जाए। महंगाई के दौर में सांसदों के लिए खाना इतना सस्ता कैसे। अरे भई, हर साल करोड़ों की सब्सिडी जो मिलती है। ये सब्सिडी भी सांसदों के खाते से नहीं, हम और आप टैक्स देने वालों की जेब से ही जाती है। अब महंगाई डायन देश के लोगों को खाय जा रही है तो सांसद महोदयों की भला से।

कॉमनवेल्थ गेम्स पर सरकार 35,000 करोड़ खर्च कर सकती है लेकिन देश में रोज़ भूखे पेट सोने वाले करोड़ों लोगों को राहत देने के लिए कुछ नहीं कर सकती। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित गाजेबाजे के साथ 15 रुपये की थाली में लोगों को बढ़िया खाना देने का वादा करती हैं, लेकिन योजना का एक दिन में ही दम निकल जाता है।

लेकिन सरकार सारा तामझाम होने के बावजूद जो नहीं कर सकती, वो लुधियाना में बिना किसी शोर-शराबे के कुछ लोग करके दिखा रहे हैं। लुधियाना में किसी से पूछो, आपको एक रुपये वाले होटल के नाम से मशहूर ब्रह्म भोग का पता बता देगा।



महंगाई के इस दौर में भी यहां लोगों को एक रुपये में बढ़िया क्वालिटी का खाना भरपेट खिलाया जाता है। रोटी, चावल, दाल, सब्ज़ी, सलाद सब कुछ एक रुपये में। एक रुपया भी सिर्फ इसलिए लिया जाता है कोई ये महसूस न करे कि वो मुफ्त में खाना खा रहा है। इसीलिए माहौल भी पूरा होटल का ही रखा जाता है। पहली बार में सुनने पर आपको भी यक़ीन नहीं आ रहा होगा। लेकिन ये सोलह आने सच है। दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक ये साधना पिछले 14 साल से बिना किसी रुकावट के चलते आ रही है।



महंगाई कहां की कहां पहुंच गई। लेकिन इस होटल की थाली में न तो खाने की चीज़ कम हुईं और न ही क्वालिटी से कोई समझौता किया गया। और सबसे बड़ी बात किसी को ये भी नहीं पता कि समाज की ऐसी सच्ची सेवा कौन कर रहा है। बरसों से यहां खाना खाने वाले लोगों को भी नहीं पता कि अन्नपूर्णा के नाम को जीवंत करने वाले कौन लोग है। बस इतना ही पता चलता है कि कुछ एनआरआई ड्रीम एंड ब्यूटी चैरिटेबल ट्रस्ट के ज़रिए लुधियाना के कुछ लोगों का ही सहयोग लेकर इस होटल को चला रहे हैं।



कृष्णा लुधियाना की एक फैक्ट्री में नाइट शिफ्ट में काम करता है। कृष्णा के मुताबिक सबसे बड़ी बात है कि यहां पूरी इज्ज़त और आदर भाव के साथ लोगों को खाना खिलाया जाता है। लोगों के लिए बस एक शर्त है कि वो खाना खाने आएं तो उनके नाखून कटे हों और हाथ साफ कर ही वो खाने की टेबल पर बैठें। बर्तनों को साफ़ करने का भी यहां बड़ा हाइजिनिक और आधुनिक इंतज़ाम है।



देश के सांसदों को भी इस होटल में लाकर एक बार सामूहिक भोजन कराया जाना चाहिए...शायद तभी उनकी कुछ गैरत जागे...सांसद इस होटल का प्रबंधन देखकर सोचने को मजबूर हों कि जब ये निस्वार्थ भाव से 14 साल से समाज की सच्ची सेवा कर रहे हैं तो देश की सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती...देश में क्यों ऐसा सिस्टम है कि लाखों टन अनाज गोदामों में सड़ रहा है और देश के करोड़ों लोगों को रोज़ भूखे पेट सोना पड़ता है...वाकई सांसद महान हैं...मेरा भारत महान है...

बुधवार, 11 अगस्त 2010

मेरे पास कोठी है, कार है, बंगला है...खुशदीप

आज सुबह से तबीयत ढीली है...बुखार के साथ शरीर में हरारत है...इसलिए आज ज़्यादा लिखने की हिम्मत नहीं है...बस एक माइक्रोपोस्ट...

मक्खन को अपने भाई टिल्लू का बरसों बाद पता चल गया...मक्खन ने टिल्लू से कहा आकर मुंबई के बांद्रा-वर्ली सी-लिंक ब्रिज पर मिले...बड़े भाई का संदेश पाकर टिल्लू का भी लहू जोश मारने लगा...आखिर लहू ने लहू को जो पुकारा था...मक्खन के बताए टाइम पर टिल्लू सी-लिंक पहुंच गया...




अब मक्खन ने छोटे भाई को देखने के बाद शेखी बधारने के लिए कहा...देखो, मेरी तरफ़, देखो...मेरे पास कोठी है, बंगला है, कार है, बैंक बैलेंस है...तुम्हारे पास क्या है...क्या है तुम्हारे पास...

टिल्लू कुछ सोचने के बाद...मेरे पास भी कोठी है, बंगला है, कार है, बैंक बैलेंस है...

मक्खन...कंजर दे पुतर, फेर मां किदे कोल वे....(कंजर के बेटे, फिर मां किसके पास है...)




स्लॉग गीत

मेरी पसंद का ये गीत सुनिए...फिल्म स्वामी (1977) के लिए किशोर कुमार ने राजेश रोशन के संगीत निर्देशन में इसे गाया था...

यादों में वो, सपनों में है...

हाथों की कलाकारी...खुशदीप

क्रिएटिवटी कहीं भी मिल सकती है...लेकिन एडवरटाइज़िंग का तो पेशा ही क्रिएटिविटी का होता है...ये बेहतरीन कॉपीराइटिंग या विजुअल्स का ही नतीजा होता है कि हम किसी अनजान ब्रैंड को भी घर की शोभा बना लेते हैं...यही वजह है कि हर कन्ज्युमर ब्रैंड के बजट का निश्चित हिस्सा एडवरटाइज़िंग पर खर्च होता है...नीचे एक मोबाइल नेटवर्क के एड-कैम्पेन की कुछ झलकियां हैं...आप फोन नहीं बस हाथों से की गई कलाकारी को देखिए...















स्लॉग ओवर

मक्खन गुल्ली से...तुम्हारा रिज़ल्ट क्या रहा...

गुल्ली...पांच सबजेक्ट में फेल हो गया...

मक्खन...आज से मुझे अपना डैड मत कहना...

गुल्ली...कम ऑन डैड, मैंने अपना स्कूल रिज़ल्ट बताया है, डीएनए टेस्ट का रिज़ल्ट नहीं...

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

आज़ादी से पहले, आज़ादी के बाद...खुशदीप

देश आजाद हुए 63 साल होने को आए...क्या कुछ बदला और क्या कुछ नहीं बदला...



9 अगस्त 1925
चलिए पहले ले चलता हूं आज से 85 साल पहले के काल में...देश के आज़ाद होने से भी 22 साल पहले...9 अगस्त 1925 की तारीख...लखनऊ के पास छोटा सा कस्बा काकोरी...शाहजहांपुर से लखनऊ जा रही ट्रेन लूट ली गई...किसी यात्री को बिना नुकसान पहुंचाए ब्रिटिश हुकूमत की ट्रेज़री का पैसा लूट लिया गया...लूट का मकसद था आज़ादी की जंग को धार देने के लिए हथियार खरीदना...ट्रेन लूट की योजना और अमल में लाने का काम किया अशफ़ाकउल्ला खान, राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद समेत  वतन के दस मतवालों ने...आज़ाद को छोड़ बाकी सब बाद में ब्रिटिश हुकूमत की पकड़ में आ गए...अशफ़ाकउल्ला खान भी पकड़ में नहीं आते लेकिन उनके एक पठान दोस्त ने अंग्रेज़ों के इनाम के चक्कर में गद्दारी की और भारत मां के सपूत को मुखबिरी कर अंग्रेज़ों के हाथों गिरफ्तार करा दिया...


9 अगस्त 2010
अब आइए बीती रात बिहार में हुई एक ट्रेन डकैती पर...बिहार के जमुई ज़िले के समालतुला स्टेशन के पास अमृतसर हावड़ा एक्सप्रेस के यात्रियों को 25 हथियारबंद डकैतों के गिरोह ने लूट लिया...तलवार की नोंक पर महिलाओं के गहने उतरवा लिए गए...मुसाफिरों को बेरहमी से मारा पीटा गया..दो दिन पहले भी जमुई के ही क्यूल स्टेशन पर लालकिला एक्सप्रेस को इसी तरह लूट का शिकार बनाया गया था...यहां लूटने वाले भी भारतीय थे और लुटने वाले भी...लूटने वाले बेखौफ़ थे...लुटने वाले ख़ौफ़जदा...


9 अगस्त 1942
मुंबई में गांधी टोपी लगाए लोगों का सैलाब...लोगों को बेरहमी से दौड़ाते घोड़ों पर चढ़े अंग्रेज़ी हुकूमत के सिपाही...भारत को लूटने वाली अंग्रेज़ी हुकूमत को अल्टीमेटम देते मोहनदास करमचंद गांधी...अंग्रेज़ों भारत छोड़ो...पूर्ण स्वराज के नारे के साथ लोगों को करो या मरो का आह्वान...पांच साल बाद अंग्रेज़ों को भारत छोड़कर जाना पड़ा..


9 अगस्त 2010
संसद में अंग्रेज़ों भारत छोड़ो की 68वीं जयंती पर स्वतंत्रता सेनानियों का नमन...मुंबई में भी अगस्त क्रांति मैदान में समारोह का आयोजन... लेकिन वो तो अंग्रेज़ थे...सोने की चिड़िया (भारत) को दोनों हाथों से लूटना ही उनका मकसद था...लेकिन आज़ादी के 63 साल बाद भी भारत को कौन लूट रहा है...कभी आईपीएल के नाम पर तो कभी कॉमनवेल्थ गेम्स के नाम पर...कभी 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले के नाम पर...देश के गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ रहा है....वहीं देश के करोड़ों लोग भूखे पेट सोने को मजबूर है...आज तो हुक्मरान कोई विदेशी नहीं...अपने ही बीच के लोग दिल्ली या सूबे की राजधानियों की गद्दियों पर बैठे हैं...आज हम किसे कहें गद्दी छोड़ो...और हम कहते भी हैं तो सुनता कौन है...अब्राहम लिंकन ने सही कहा था...government of the people, by the people, for the people...

चलिए 1943 में आई फिल्म किस्मत का ये गाना ही सुन लीजिए...

दूर हटो, दूर हटो, ए दुनिया वालो...

रविवार, 8 अगस्त 2010

मक्खन और मुथैया मुत्थुस्वामी...खुशदीप



मक्खन और ढक्कन काम के साथ-साथ बातें भी कर रहे थे...


मक्खन...मैं पिछले पांच महीने से नाइट स्कूल जा रहा हूं...अगले हफ्ते मेरा इम्तिहान है...

ढक्कन...अच्छा...

मक्खन शान बधारते हुए...वैसे, तू जानता है, ग्राहम बेल कौन थे...

ढक्कन...नहीं...

मक्खन विजयी मुस्कान के साथ...ग्राहम बेल ने 1876 में टेलीफोन का अविष्कार किया था...नाइट स्कूल जाता तो तुझे ये पता रहता...


अगले दिन फिर काम के दौरान दोनों के बीच बातचीत...

मक्खन...तू जानता है अलेक्ज़ेंडर डुमास कौन है...

ढक्कन...नहीं तो...

मक्खन...डुमास ने 'थ्री मस्केटियर्स' किताब लिखी है....ये होता है नाइट स्कूल जाने का फायदा...

शेखी बधारने के लिए अगले दिन फिर मक्खन का अगला सवाल...

मक्खन...तू जानता है जीन जैक्स रोस्यू कौन हैं...

ढक्कन...नहीं बाबा मैं नहीं जानता...

मक्खन...जीन जैक्स रोस्यू ने 'कन्फेशन्स' किताब लिखी है...नाइट स्कूल में ये सब जानने को मिलता है...

अब तक ढक्कन पूरी तरह हत्थे से उखड़ चुका था...अब ढक्कन ने ही सवाल दागा...

ढक्कन...जानता है मुथैया मुत्थुस्वामी कौन है...

मक्खन दिमाग़ (?) पर ज़ोर डालते हुए...नहीं यार, ये नाम तो पहली बार सुन रहा हूं...

ढक्कन...सुनेगा भी कैसे...हर रात भाभी को घर अकेला छोड़कर नाइट स्कूल जो जाता है...

शनिवार, 7 अगस्त 2010

सम्मान पर रवींद्र प्रभात जी से क्षमायाचना सहित...खुशदीप

और किसी का सम्मान हो गया,

क्या आदमी वाकई इनसान हो गया...

ये मेरी उस कविता की पहली दो पंक्तियां हैं जो मैंने सम्मान के ऊपर लिखी थी...कल रवींद्र प्रभात जी ने ब्लॉगोत्सव 2010 में परिकल्पना सम्मान की ओर से मेरा नाम वर्ष के चर्चित उदीयमान ब्लॉगर के तौर पर घोषित किया ...सम्मान के प्रति विमोह का भाव रखते हुए भी मेरे लिए रवींद्र जी के स्नेहपूर्वक आग्रह की अवहेलना करना मुमकिन नहीं था...लेकिन मैंने रवींद्र भाई से एक आग्रह किया जो उन्होंने स्वीकार कर मुझे धर्मसंकट से बचा लिया...पहले दो ऐसे मौके आए थे जब ज़ाकिर अली रजनीश भाई ने सम्मान देने और अलबेला खत्री जी ने नामित करने के लिए मेरे नाम का प्रस्ताव किया था, लेकिन मैंने दोनों बार ही विनम्रतापूर्वक अपना नाम हटाने का आग्रह किया था...





लेकिन अब मुझे लगता है कि अगर आज मैंने वो कारण स्पष्ट नहीं किया कि मैंने ये सम्मान क्यों स्वीकार कर लिया और पहले दो बार दिए गए सम्मान और नामांकन, क्यों नहीं स्वीकार किए तो वो ज़ाकिर अली रजनीश भाई और अलबेला खत्री जी के साथ नाइंसाफ़ी होगी...इसलिए रवींद्र भाई से माफ़ी मांगते हुए मैं उनके साथ ई-मेल के आदान-प्रदान को यहां सार्वजनिक कर रहा हूं...


23 जून को मुझे रवींद्र जी का ये पहला मेल मिला...

ब्लोगोत्सव-2010 को आधार मानते हुए इस बार आपको "वर्ष के श्रेष्ठ ब्लोगर" का खिताब दिए जाने हेतु ब्लोगोत्सव की टीम ने प्रस्ताव रखा है...इस दिशा में आगे की कार्यवाही हेतु मुझे निम्नलिखित जानकारियों ( व्यक्तिगत विवरण )की आवश्यकता है-
(यहां मेरे व्यक्तिगत विवरण को लेकर 21 प्रश्न थे)
उपरोक्त प्रश्नों में से जो प्रश्न आपके लिए असहज हों उसे हटा देवें या फिर इसमें शामिल कोई ऐसा प्रश्न है जो छूट गया हो उसे शामिल करते हुए एक सप्ताह के भीतर उपलब्ध कराने का कष्ट करें......
यह प्रस्ताव अभी प्रक्रिया में है अत: अंतिम सूचि तैयार होने से पूर्व कृपया सार्वजनिक न करें...
सहयोग हेतु धन्यवाद !
आपका -
रवीन्द्र प्रभात

रवींद्र भाई के इस मेल का जवाब मैंने 24 जून को दिया...

रवींद्र प्रभात जी,
सादर प्रणाम,
आपका ई-मेल पाकर कितनी खुशी हुई शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता...लगा ब्लॉगिंग में करीब एक साल जो मेहनत की वो सार्थक हो गई...आप जैसे विद्वान और निस्वार्थ भाव से ब्लॉगिंग की सेवा करने वाले मनीषी ने मुझे इस योग्य समझा, सोच कर ही मन पुलकित हो उठता है...रवींद्र जी, सच बात कहूं, आपके इस प्रस्ताव ने मुझे धर्मसंकट में भी डाल दिया है...आपको विदित होगा कि पहले मुझे अलबेला खत्री जी और ज़ाकिर अली रजनीश भाई ने सम्मान के लिए क्रमश नामित और चुना था, लेकिन मैंने दोनों बार विनम्रता से अपना नाम हटाने की गुहार लगाई थी...इस बात पर मुझे कई ब्लॉगर भाइयों ने प्यार से काफ़ी कुछ सुनाया भी था...आदरणीय और बड़े भ्राता डॉ अरविंद मिश्र जी ने तो यहां तक कहा था कि जो सम्मान नहीं लेते उनके लिए खुशदीप सम्मान शुरू कर देना चाहिए...


सच बताऊं रवींद्र जी, मेरी सोच यही है कि कोई इनसान दूसरे इनसान से श्रेष्ठ हो ही नहीं सकता...हां ये ज़रूर है कि वो सौभाग्यशाली हो और उसे अवसर, शिक्षा , माहौल ऐसा मिल जाए कि उसकी प्रतिभा दूसरों से अलग और निखरी हुई नज़र आने लगती है...हो सकता है कि सरस्वती देवी की मेरे ऊपर विशेष अनुकंपा रही और ज़्यादातर ने मेरे लिखे को पसंद किया...लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि दूसरे ब्लॉगरों से मैं श्रेष्ठ हो गया...वैसे पिछली बार मुझे कई वरिष्ठ ब्लागर्स ने समझाया भी था कि अगर कोई प्यार से मान देता है तो उसकी भावनाओं को भी समझना चाहिए...रवींद्र जी, आपको याद होगा, मेरी ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों में ही आपने एक परिचर्चा में मुझे शायद श्रेष्ठ नवोदित ब्लॉगर कह कर अनुगृहीत किया था...मैंने आपके श्रमसाध्य और स्नेहिल आशीर्वाद को देखते हुए उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया था...इस बार भी आपके प्यार को मैं कैसे इनकार कर सकता हूं...लेकिन पिछली बार डॉ अरविंद मिश्र जी ने ही मुझे आगाह किया था कि अगर कोई बड़ा सम्मान या पुरस्कार मिले तो अपने विचारों से डिग मत जाना...अब मैं आप से ही सलाह मांगता हूं कि ऐसी परिस्थिति में मुझे क्या करना चाहिए...हां, आपसे एक अनुरोध ज़रूर है कि 45 के करीब होने की वजह से न तो मैं युवा हूं और न ही अपने को श्रेष्ठ मानता हूं...इसलिए आप सम्मान का नाम वर्ष का सबसे सक्रिय ब्लॉगर कर दें तो मेरी समस्या का हल भी हो जाएगा और मैं आपके प्यार का मान भी रख सकूंगा...वैसे आपने जो जानकारी मांगी है, वो इस प्रकार है...
(यहां मैंने व्यक्तिगत विवरण को लेकर रवींद्र भाई ने जो 21 प्रश्न किए थे, उनके जवाब दिए थे...)
आपका
खुशदीप सहगल


24 जून को ही रवींद भाई का फिर मुझे ये मेल मिला...

खुशदीप भाई ,
मैं आपकी बातों से इत्तेफाक नहीं रखता कि 45 वर्ष का व्यक्ति युवा नहीं हो सकता, लेकिन आपने जो सुझाव दिए हैं वह विचार योग्य है...आपको विश्वास दिलाता हूँ कि अंतिम निर्णय लेते समय आपके सुझाव को सर्वोपरि रखा जाएगा क्योंकि आपके तर्क अत्यंत ही तथ्यपरक है...
रवीन्द्र प्रभात

3 जुलाई को रवींद भाई का फिर मुझे ये मेल मिला...

भाई खुशदीप जी,
आपके सुझाव को दृष्टिगत रखते हुए ब्लोगोत्सव-2010की टीम के द्वारा आपके लिए दो विकल्प सुझाए गए हैं, जो निम्नलिखित है-
विकल्प(1)... वर्ष के श्रेष्ठ उदीयमान ब्लोगर
विकल्प(2)... वर्ष के चर्चित उदीयमान ब्लोगर
कृपया उपरोक्त के सन्दर्भ में मुझे बताने का कष्ट करें कि कौन सा विकल्प आपके लिए योग्य है , यह मेरा व्यक्तिगत आग्रह है आपसे ...!
रवीन्द्र प्रभात


रवींद्र भाई के इस मेल का जवाब मैंने 3 जुलाई को ही दिया...

आदरणीय रवींद्र जी,
आपको आग्रह नहीं आदेश देने का अधिकार है...आपकी बात सिर माथे पर...श्रेष्ठ की जगह चर्चित उदीयमान ब्लॉगर रखें तो श्रेष्ठ शब्द के प्रति मेरी हिचक का निवारण भी हो जाएगा...
आभार...
आपका
खुशदीप

आशा है अब सम्मान को लेकर अपने नज़रिए को मैं स्पष्ट कर पाया हूंगा...

आप सब के प्यार को समर्पित है ये गीत...


मुझे खुशी मिली इतनी कि मन में न समाए,
पलक बंद कर लूं कहीं छलक ही न जाए...

भारतीय तो भारतीय होते हैं...खुशदीप

एक प्रवासी भारतीय (एनआरआई) न्यूयॉर्क सिटी में बैंक पहुंचा...वहा उसने लोन अधिकारी से संपर्क किया...साथ ही कहा कि वो बिज़नेस टूर पर दो हफ्ते के लिए भारत जा रहा है, इसलिए बैंक से पांच हज़ार डॉलर का लोन लेना चाहता है...

लोन अधिकारी ने समझाया कि बैंक लोन तभी दे सकता है जब आप श्योरिटी (गारंटी) के लिए कोई चीज़ या संपत्ति बैंक में गिरवी रखें...

ये सुनकर प्रवासी भारतीय ने अपनी नई फेरारी कार की चाबियां और कागज़ात बैंक को दे दिए...कार बैंक के बाहर ही खड़ी थी...टाइटल वगैरहा सब क्लियर और कागज़ात ठीकठाक देखने के बाद बैंक भारतीय को लोन देने के लिए तैयार हो गया...






भारतीय के जाने के बाद बैंक के बड़े अधिकारी और स्टॉफ ये सोचकर हंसने लगे कि कोई पांच हज़ार के लोन के लिए ढाई लाख डॉलर की फेरारी भी गारंटी के तौर पर गिरवी रख सकता है...बैंक के ड्राइवर ने फेरारी ले जाकर बैंक की ही अंडरग्राउंड पार्किंग में पार्क कर दी... साथ ही उस पर अच्छी तरह कवर भी चढ़ा दिया...

भारतीय दो हफ्ते बाद वापस आया और बैंक आकर पांच हज़ार डॉलर का लोन चुका दिया...साथ ही बैंक इंट्रेस्ट के तौर पर 16 डॉलर की रकम का भी भुगतान किया...पेपर वर्क पूरा होने के बाद बैंक के डीलिंग अफसर ने भारतीय से कहा... सर, हमें आपके साथ बिज़नेस करने में बहुत खुशी हुई...लेकिन हमें थोड़ी हैरत भी है...आशा है आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे...आपके पीछे हमने चेक कराया तो पता चला कि आप अरबपति आदमी है...फिर आपको सिर्फ पांच हज़ार डॉलर
लोन पर लेने की क्या वजह थी...

ये सुनकर भारतीय मुस्कुराया और बोला...

न्यूयॉर्क सिटी में ऐसी कौन सी जगह या पार्किंग है जो 15 दिन तक मेरी फेरारी को पार्क करने और अच्छी तरह ख्याल रखने के लिए सिर्फ सोलह डॉलर की फीस लेती...

(ई-मेल पर आधारित)

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

क्या आप सेलफोन सही पकड़ते हैं...खुशदीप

इससे पहले कि आप इस सवाल पर मेरी क्लास लेना शुरू कर दें, आपको पहले ही बता दूं कि आपको सावधान करने की ये तीसरी और आखिरी कड़ी है...दवाओं की बात हो गई...इयर-बड्स की बात हो गई...आज कुछ और एहतियात...पहले बात करते हैं...सेलफोन की...यानि मोबाइल...महंगे सेल ज़रूर स्टेट्स सिंबल हो सकते हैं लेकिन हक़ीक़त ये है कि सेल आज हर एक की ज़रूरत बन गया है...



आपने कभी गौर किया कि जब आप सेल से बात करते हैं तो बाएं कान पर रखकर सुनते हैं या दाएं कान पर...अभी तक जो करते आए हैं सो ठीक...लेकिन आगे से कोशिश कीजिएगा कि सेल को बाएं कान से ही सुनें...सेल को दाएं कान से सुनने से आपका मस्तिष्क प्रभावित हो सकता है...एक बात और ध्यान रखें, जब आप सेल पर किसी दूसरे को कॉल मिलाएं, तो डॉयल करने के बाद एकदम सेल को कान से नहीं सटा लें...जब आप निश्चित हो जाएं कि दूसरी तरफ़ से किसी ने बात शुरू कर दी है, तभी सेल को कान के नज़दीक लाएं...डॉयलिंग के बाद सेल अधिकतम सिगनल पावर ( 2 watts=33dbi) का इस्तेमाल करता है...ये मैं नहीं कह रहा, अपोलो की रिसर्च टीम का निकाला हुआ निष्कर्ष है...

सेलफोन हो गया...अब बात कुछ खाने-पीने की...


अगर आपको खाने के लिए कोई कुरकुरे पेश करे तो विनम्रता से मना करने की कोशिश कीजिए...कुरकुरे में प्लास्टिक मौजूद होता है...यकीन नहीं आता तो कुरकुरे को जला कर देखिए...आपको खुद ही सच का पता चल जाएगा...ये मैं नहीं कह रहा टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट का निष्कर्ष है....

एप्पी फिज़ (Appy Fizz) पीने के शौकीन हैं तो इसे तत्काल छोड़ दीजिए...इसमें कैंसर को बढ़ावा देने वाले केमिकल एजेंट होते हैं...

कभी भी कोक या पेप्सी के पीने से पहले या बाद में मेंटोस (MENTOS) न खाएं...ये कंबीनेशन साइनाइड में बदल जाता है...और साइनाइड का मतलब आप जानते ही हैं कि जान के लिए कितना ख़तरनाक होता है...ज़्यादा से ज़्यादा अपने जानने वालों को इन बातों पर जागरूक करें...

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

कान खोल कर इस पोस्ट को पढ़ें...खुशदीप

कल आप को घरों में इस्तेमाल की जाने वाली बिना मेडिकल प्रेसक्रिप्शन दवाओं के ख़तरे के बारे में बताया था...जहां तक संभव हो सके ऐलोपैथिक दवाएं डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं लेनी चाहिए...खास तौर पर बच्चों के मामले में...दरअसल हमारे देश में दवाओं को लेकर पश्चिम की तरह सख्त कायदे-कानून नहीं है...इसी का फायदा मुनाफ़ाखोर उठाते हैं...ज़्यादा से ज़्यादा पैसा कमाने के चक्कर में लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने से भी गुरेज़ नहीं करते..

आज आपको एक और ख़तरे से वाकिफ़ कराता हूं...कभी दिल्ली या नोएडा आएं तो आप अक्सर देखेंगे कि ट्रैफिक सिगनल्स पर सामान बेचने वाले कई लोग मिल जाते हैं...आपकी गाड़ी के शीशे पर टकटकाते हुए आप से अपना सामान लेने की गुहार लगाएंगे...कभी यहां तक भी कहेंगे कि आज सुबह से बोनी तक नहीं हुई...इसलिए आप सस्ता ही ये सामान खरीद लो...आप लालच में आकर या तरस खाकर वो सामान शायद खरीद भी लें...

लेकिन आइंदा ऐसा करने से पहले सोच लीजिएगा...आजकल ऐसे ही ट्रैफिक सिगनल्स पर कान साफ़ करने वाली बड्स बेचने वाले भी मिल जाते हैं...खूबसूरत पैकिंग में ये इयर-बड्स किसी को भी आकर्षित कर सकती हैं...दाम भी मेडिकल स्टोर से कहीं कम दिखते हैं...लेकिन आप ये इयर-बड्स खरीद भी लें तो कभी गलती से भी कान में डालने की भूल मत कर लीजिएगा...क्यों...तो कलेजा थाम कर सुनिए इनकी सच्चाई...




ये इयर-बड्स जिस रूई (कॉटन) से बनी होती हैं वो अस्पतालों में पहले से इस्तेमाल की गई होती हैं...अस्पतालों से खून, पस से भरी कॉटन को लाकर इकट्ठा किया जाता है और फिर उन्हें ब्लीच कर साफ़-सफ़ेद कर दिया जाता है...इसी कॉटन का इस्तेमाल फिर बड़े पैमाने पर इयर बड्स बनाने में किया जाता है...ऐसी बड्स का इस्तेमाल करने से Herpes Zoster Oticus जैसी खतरनाक बीमारी को मोल लिया जा सकता है...इस बीमारी में कान के आंतरिक, मध्य और बाह्य, सभी हिस्सों में संक्रमण हो जाता है...आशा है आइंदा आप सावधान रहेंगे...और अपने ज़्यादा से ज़्यादा जानने वालों को सतर्क करेंगे...



(एम्स के डॉक्टर की ई-मेल पर आधारित)

बुधवार, 4 अगस्त 2010

आप बच्चों को ज़हर तो नहीं दे रहे...खुशदीप

डॉ टी एस दराल ने हाल में खाने-पीने के मामले में साफ़-सफ़ाई पर बड़ी सार्थक पोस्ट लिखी थी...उसी पोस्ट में मैंने अपनी टिप्पणी में साफ़-सफ़ाई पर हद से ज़्यादा तवज्जो देने वाली एक परिचित मीनिएक महिला का भी ज़िक्र किया था...साथ ही ये सवाल भी उठाया था कि क्या हद से ज़्यादा ध्यान देने की वजह से हम अपने बच्चों का अहित तो नहीं कर रहे...गांव-खलिहानों में बच्चे मिट्टी में लोट-लोट कर ही लोह-लट्ठ बन जाते हैं...वहीं शहर के बच्चों को हम खुद ही इतना नाज़ुक बना देते हैं कि उनकी खुद की प्रतिरोधक ताकत विकसित ही नहीं हो पाती...

बच्चे को छींक भी नहीं आती कि उसे धड़ाधड़ दवाइयों की डोज़ देना शुरू हो जाते हैं...अब संयुक्त परिवार तो बचे नहीं जो दादी के नुस्खों पर चलते हुए प्राकृतिक चीज़ों से ही बच्चों की छोटी-मोटी बीमारियों को दूर कर दिया जाए...और अगर बुज़ुर्ग कोई सलाह देते भी हैं तो उसे आउटडेटेड कह कर खारिज कर दिया जाता है...




हां, अपनी डॉक्टरी झाड़ते हुए बच्चों को एंटीबायटिक्स देने से भी परहेज नहीं किया जाता...आज मैं ऐसी ही कुछ दवाओं के बारे में बताने जा रहा हूं जिनका हम घरों में खूब इस्तेमाल करते हैं...और एक बार भी नहीं सोचते कि इनके साइड-इफैक्ट्स कितने खतरनाक हो सकते हैं...वैसे इन दवाओं पर डॉ दराल, डॉ अमर कुमार और मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े लोग ही अधिकृत रूप से वस्तुस्थिति से अवगत करा सकते हैं...इन दवाओं के नाम हैं-

डी- कोल्ड


विक्स एक्शन- 500

एक्टीफाइड


कोल्डारिन


नाइस


निमुलिड

सेट्रीज़ेट-डी

ये दवाएं इतनी कॉमन हैं कि आपने भी इनमें से किसी न किसी एक दवा का ज़रूर इस्तेमाल किया होगा...मुझे एक ई-मेल से पता चला है कि इन सभी दवाओं में फिनाइल-प्रोपेनॉल-एमाइड (पीपीए) होता है...इनसे स्ट्रोक्स हो सकते हैं, इसलिए अमेरिका में इन सभी दवाओं पर प्रतिबंध लगा हुआ है...

अब डॉक्टर साहेबान ही बता सकते हैं कि इन दवाओं का प्रयोग करना चाहिए या नहीं...अगर नहीं तो भारत में इस तरह की दवाएं क्यों बिक रही हैं...सरकार पर इन दवाओं पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने के लिए क्या दबाव नहीं बढ़ाना चाहिए....

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

मर्द का दर्द न जाने कोए...खुशदीप

कौन कहता है मर्द को दर्द नहीं होता...होता है जनाब मर्द को भी दर्द होता है...कहो तो साबित कर सकता हूं...तो सुनिए फिर मर्दों के दिल से ही निकला दर्द...



दर्द नंबर एक

मर्द पैदा होता है, बधाई और फूल मां को मिलते हैं...

शादी होती है, तोहफ़े और लाइमलाइट दुल्हन को मिलती है...

मरता है, बीमे की रकम पत्नी को मिलती है...

फिर भी नारियां पुरुषों के वर्चस्व से मुक्त होने की बात करती हैं...



दर्द नंबर दो

औसतन एक मर्द की ज़िंदगी बंटी होती है-

20 साल मां के ये पूछने पर- कहां जा रहे हो...

इसी सवाल को फिर 40 साल पत्नी पूछती है...

और अंत आने के बाद शोक जताने वाले हैरत जताते हैं- जाने कहां चला गया...



दर्द नंबर तीन

शादी के बाद विदाई का वक्त आया...दुल्हन को उसके पिता गाड़ी तक छोड़ने आए...तभी दुल्हन ने पिता के हाथ में कुछ थमा कर मुट्ठी बंद कर दी...सब जानने को उत्सुक कि आखिर दुल्हन ने पिता को क्या दिया है...सबकी नज़रें देखकर पिता ने ऐलान किया...लेडीज़ एंड जेंटलमैन...आज का दिन मेरे लिए बड़ा सौभाग्यशाली है...आखिरकार मेरी बेटी ने मुझे मेरा क्रेडिट कार्ड वापस कर ही दिया...ये सुनकर वहां एक शख्स को छोड़कर बाकी सब खिलखिला कर हंसने लगे...और  वो शख्स  था- दूल्हे राजा...



दर्द नंबर चार

एक आदमी सड़क पर जा रहा था कि पीछे से आवाज़ आई...एक भी कदम और आगे बढ़ाया तो ईंट तुम्हारे सिर पर गिरेगी और तुम्हारा काम तमाम हो जाएगा...आदमी वहीं रुक गया...तभी उसके सामने बड़ी सी ईंट आकर गिरी...आदमी हैरान-परेशान..थोड़ी देर रुकने के बाद वो सड़क क्रॉस करने के लिए आगे बढ़ा तो फिर वही आवाज आई...ठहरो...जहां हो वहीं खड़े रहो...वरना तेज़ रफ्तार कार तुम्हे यहीं कुचल देगी...आदमी वहीं जड़ हो गया...तभी वाकई एक  तेज़ रफ्तार कार उसे छूते-छूते ज़ूम से आगे निकल गई...आदमी ने आवाज़ देने वाले से पूछा...आखिर तुम हो कौन...आवाज़ आई...मैं तुम्हारा रखवाला फरिश्ता हूं...इस पर वो आदमी थोड़ी देर सोचने के बाद तमतमाते हुए  बोला....फिर उस वक्त कहां सोए पड़े थे, जब मेरी शादी हो रही थी....


(निर्मलतम हास्य)

सोमवार, 2 अगस्त 2010

मक्खन का इंटरव्यू...खुशदीप



एक युवक मल्टीनेशन कंपनी का इंटरव्यू देने गया...बोर्ड में उससे पूछा गया...भारत को आजादी कब मिली...


युवक...प्रयास तो बहुत पहले शुरू हो गए थे लेकिन सफलता 1947 में मिली...

बोर्ड...आज़ादी दिलाने में किन्होंने अहम भूमिका निभाई...

युवक...इसमें कई लोगों का योगदान रहा...किसका नाम बताऊं...किसी एक का नाम लूंगा तो अन्याय होगा...

बोर्ड...क्या भ्रष्टाचार देश का सबसे बड़ा दुश्मन है...

युवक...इस बारे में शोध चल रहा है...सही उत्तर मैं रिपोर्ट देख लेने के बाद ही दे पाऊंगा...

इंटरव्यू बोर्ड युवक के उत्तरों से काफ़ी प्रभावित हुआ...साथ ही युवक को हिदायत दी गई कि बाहर इंटरव्यू की बारी का इंतज़ार कर रहे किसी भी प्रतिभागी को इन सवालों के बारे में न बताए...

जब युवक बाहर आया तो कई उम्मीदवारों ने उससे पूछा कि क्या क्या सवाल पूछ रहे हैं...युवक ने सवाल बताने से इनकार कर दिया...उम्मीदवारों में मक्खन भी था...मक्खन ठहरा मक्खन...वो युवक के पीछे हो लिया...युवक बाहर आया तो मक्खन ने फिर उससे सवाल बताने के लिए कहा...युवक ने कहा कि वो अंदर कसम देकर आया है कि किसी को सवाल नहीं बताएगा...

मक्खन ने दिमाग (?) से काम लिया...बोला...सवाल न बताने की कसम खाई है न, जवाब बताने की तो नहीं...मुझे जवाब ही बता दो...मक्खन के ज़ोर देने पर युवक ने उसे सवालों के जवाब बता दिए...

मक्खन अपनी बारी आने पर पूरे कॉन्फिडेंस के साथ इंटरव्यू बोर्ड रूम में दाखिल हुआ...मक्खन ने जवाब तो रट लिए ही थे...

मक्खन से अंग्रेज़ी में पहला सवाल पूछा गया...आपकी जन्मतिथि क्या है...

मक्खन ने सवाल तो ढंग से सुना नहीं, जल्दी में रटा-रटाया जवाब दिया...प्रयास तो बहुत पहले शुरू हो गए थे लेकिन सफलता 1947 में मिली...

इंटरव्यू बोर्ड के सदस्य थोड़े हैरान-परेशान...अगला सवाल दाग़ा...आपके पिता का क्या नाम है....

मक्खन...इसमें कई लोगों का योगदान रहा...किसका नाम बताऊं...किसी एक का नाम लूंगा तो अन्याय होगा...

बोर्ड वाले हक्के-बक्के...एक सदस्य बोला...क्या तुम्हारा दिमाग़ तो नहीं फिरा हुआ...

मक्खन...इस बारे में शोध चल रहा है...सही उत्तर मैं रिपोर्ट देख लेने के बाद ही दे पाऊंगा...



रविवार, 1 अगस्त 2010

एक अंधेरा, लाख सितारे...खुशदीप



ये समस्याएँ नहीं हैं जो आपको परेशान करती हैं... बल्कि ये समस्याओं से आपका निपटने का तरीका है जो आपको परेशान करता है...


समस्याओं को अपने ऊपर हावी मत होने दीजिए...उनसे सकारात्मक रुख़ और ठंडे दिमाग़ के साथ निपटिए...


ज़िंदगी की मुश्किलें आपकी मदद नहीं चाहतीं...वो अपने आप में ही काफ़ी कठिन हैं...आप उन्हें अपना योगदान देकर और जटिल मत बनाइए...


इसलिए समस्याओं की हक़ीक़त को समझिए... यथाशक्ति प्रभावी तरीके से उनसे निपटिए...लेकिन उन्हें खुद पर हावी होकर अपना मनोबल गिराने का मौका नहीं दीजिए...


आप जैसा महसूस करने का रास्ता चुनेंगे, वैसा ही खुद को महसूस करेंगे... इसलिए खुद को अंदर से मज़बूत समझिए...खुद को पूरी तरह अपने काबू में समझिए...उद्देश्यपूर्ण, ऊर्जावान और उल्लासित रहने का विकल्प चुनिए...क्योंकि आप दिल से ऐसे ही हैं...


यक़ीन मानिए आपके अंदर की ज़िंदादिली के आगे बड़ी से बड़ी समस्या भी हमेशा मात खाएगी...हमेशा इसे याद रखिए.. इसके सच को अनुभव कीजिए...जीवन का आनंद लीजिए...क्योंकि ज़िंदगी लंबी होने से ज़िंदगी बड़ी होना कई ज़्यादा मायने रखता है...


ज़िंदगी में उम्मीद का उजाला दिखाता मेरी पसंद का ये गीत भी सुन लीजिए...


एक अंधेरा, लाख सितारे...