शनिवार, 31 जुलाई 2010

छोटा बच्चा समझ के मुझको न समझाना रे....खुशदीप

कल अपनी पोस्ट में अमेरिका जाकर लौटने वाले भारतीयों के हाव-भाव में बदलाव के बारे में बताया था...आज किसी भारतीय की नहीं बल्कि खालिस अमेरिका की बात करता हूं...खालिस अमेरिका के खालिस बच्चे की...ओबामा पहले ही अमेरिका के बच्चों को चेता चुके हैं कि मैथ्स और साइंस की पढ़ाई पर ज़्यादा ध्यान दो, वरना भारत के बच्चे बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं...चलिए अब असली बात पर आता हूं...


अमेरिका की एक बड़ी सॉफ्टवेयर फर्म का बॉस परेशान था...दरअसल उसका सबसे भरोसे का जूनियर काम पर नहीं आया था...उस जूनियर ने कोई वजह भी नहीं बताई थी छुट्टी की...मोबाइल नेटवर्क और डाउन...ऊपर से एक क्लाइंट की ऐसी प्रॉब्लम जिसे वही जूनियर सुलझा सकता था...आखिर बॉस से रहा नहीं गया और उसने जूनियर के घर फोन मिला दिया...दूसरी तरफ से बच्चे की महीन सी आवाज़ आई...हैलो...

बॉस...क्या तुम्हारे डैडी घर पर हैं...

बच्चा बुदबुदाते हुए...हां हैं...

बॉस...क्या मैं उनसे बात कर सकता हूं...

बच्चा...नहीं...

ये सुनकर बॉस को हैरानी हुई...वो किसी बड़े से ही बात करना चाहता था...पूछा...क्या वहां तुम्हारी मॉम हैं...

बच्चा...हां, हैं...

बॉस...क्या उनसे मेरी बात हो सकती है...

बच्चा...नहीं...

बॉस...क्या घर पर और कोई बड़ा है, दरअसल मुझे एक बहुत ज़रूरी मैसेज देना है...

बच्चा...हां है न, पुलिस अंकल...

बॉस और परेशान...मेरे जूनियर के घर पुलिस क्या कर रही है...बोला...क्या मैं पुलिस अफसर से बात कर सकता हूं...

बच्चा...नहीं, वो व्यस्त हैं....

बॉस...व्यस्त हैं, क्या कर रहे हैं...

बच्चा...वो डैड, मॉम और फॉयरमैन से बात कर रहे हैं...

अब बॉस की चिंता और बढ़ गई...बॉस को फोन पर तेज गड़गड़ाहट की आवाज़ भी सुनाई दी...पूछा...ये तेज़ गड़गड़ाहट किसकी है...

बच्चा...एक हेलीकॉप्टर है...

बॉस...तुम मुझे बताओगे, आख़िर वहां ये सब क्या हो रहा है...

बच्चा...सर्च टीम के हेलीकॉप्टर ने अभी यहां लैंड किया है...

चिंतित और हताश बॉस अब तक बिल्कुल चकरा चुका था...बोला...आखिर वो क्या तलाश रहे हैं...

बच्चा अब भी बुदबुदाते हुए और दबी हंसी के साथ जवाब देता है...

...



...



...



मुझे, और किसे...


शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

अमेरिका से लौट भारतीय क्या क्या करता है...खुशदीप

बाइस खास बातें जो कोई भारतीय अमेरिका से लौटने के बाद करता है...यहां मैं उलटे क्रम से लिखूंगा...यानि बाइसवीं सबसे पहले और पहली सबसे बाद में...



22.
NO (नहीं) के लिए NOPE और YES (हां) के लिए YOPE कहना शुरू कर देता है...


21.
सड़क किनारे होटल में भी पेमेंट क्रेडिट कार्ड के ज़रिए करना चाहता है...


20.
पीने के लिए हमेशा मिनरल वाटर की बोतल साथ रखता है और हर वक्त सेहत का ध्यान रखने की बातें करता है...


19.
डिओ इस तरह शरीर पर स्प्रे करता है कि नहाने की ज़रूरत ही न रह जाए...


18.
छींक या हल्की खांसी आने पर भी 'EXCUSE ME' कहना नहीं भूलता...


17.
हाय को हे, दही को योगहर्ट, टैक्सी को कैब, चॉकलेट को कैंडी, बिस्किट को कुकी, हाईवे को फ्री-वे और ज़ीरो को ओह कहना शुरू कर देता है...जैसे 704 को सेवन ओह फोर...


16.
घर से बाहर निकलते ही हर बार वायु प्रदूषण ज़्यादा होने का दुखड़ा ज़रूर गाता है...


15.
दूरी किलोमीटर की जगह माइल्स और गिनती लाख की जगह मिलियन में करना शुरू कर देता है...


14.
सभी चीज़ों की कीमत डॉलर में जानने की कोशिश करता है...


13.
दूध के पैकेट पर ये लिखा ढ़ूंढने की कोशिश करता है कि उसमें कितने फीसदी वसा (फैट) है...


12.
Z (Zed) को हमेशा Zee कहता है...जब दूसरा नहीं समझता तो भी ज़ेड नहीं कहता बल्कि XY Zee गिन कर समझाता है...


11.
तारीख लिखते वक्त पहले महीना, फिर तारीख और आखिर में साल लिखता है...जैसे कि जुलाई 30, 2010 (07/30/2010)...अगर 30 जुलाई 2010 (30/07/2010) लिखा देखे तो कहना नहीं भूलता...ओह, ब्रिटिश स्टाइल...


10.
भारतीय मानक समय (इंडियन स्टैंडर्ड टाइम) और भारतीय सड़कों की दशा का ज़रूर मखौल उड़ाता है...


9.
लौटने के दो महीने बाद भी जेट लैग की शिकायत करता है...".


8.
ज़्यादा तीखा और तला खाने से बचता है...


7.
नार्मल कोक या पेप्पी की जगह डॉयट कोक या डॉयट पेप्सी पीना चाहता है...


6..
भारत में किसी भी चीज़ की ऐसे शिकायत करता है जैसे कि उसे पहली बार ये अनुभव हुआ हो...


5.
शेड्यूल को स्केजूल और मोड्यूल को मोजूल कहना शुरू कर देता है...


4.
होटल और ढाबे के खाने को शक की नज़र से देखता है...






अब तीन सबसे अहम बात...


3.
लगेज बैग से एयरलाइंस के स्टिकर्स भारत पहुंचने के चार महीने बाद तक नहीं उतारता...


2.
भारत में शार्ट विज़िट के लिए भी केबिन लगेज बैग ले जाता है और सड़क पर ही उन्हें रोल करने की कोशिश करता है...


1.
कोई भी बातचीत शुरू करने से पहले, 'IN US' या 'WHEN I WAS IN US' का इस्तेमाल करना नहीं भूलता....


(ई-मेल से अनुवाद)

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

स्वर्ग पसंद हैं या नर्क...खुशदीप

आज एक दोस्त ने बेहद मज़ेदार ई-मेल भेजा है...अनुवाद करके आपके साथ शेयर कर रहा हूं...उम्मीद करता हूं आपको भी उतना ही आनंद आएगा जितना इसे पढ़ कर मुझे आया...





एक मल्टीनेशनल कंपनी (एमएनसी) ने भर्ती की निगरानी करने के लिए बड़ी खूबसूरत रिक्रूटमेंट मैनेजर (इलीट भाषा में कहें तो ह्यूमन रिसोर्सेज़ मैनेजर) रखी हुई थी...एक दिन वो मैनेजर बाज़ार में पैदल ही जा रही थी कि किसी तेज़ रफ्तार कार ने टक्कर मार कर उसकी जीवनलीला खत्म कर दी...

वो स्वर्ग पहुंची तो प्रभारी देवता खुद उससे मिलने के लिए आए...साथ ही बोले...हमारा प्रशासन आपके यहां आने से दुविधा में हैं...दरअसल हमारे पास कभी कोई ह्यूमन रिसोर्सेज़ मैनेजर पहले नहीं आया...इसलिए हम समझ नहीं पा रहे हैं कि आपके साथ क्या किया जाए...

मैनेजर ने कहा...कोई समस्या नहीं, मुझे बस आने दीजिए...फिर भविष्य में आपको ऐसी दिक्कत कभी नहीं आएगी..

प्रभारी देवता बोला...काश मैं ऐसा कर सकता...लेकिन हमें चीफ देवता की तरफ से आदेश हैं, हमें उनका पालन करना ही होगा...आपके लिए हमें निर्देश हैं कि एक दिन आप नर्क में रहें और एक दिन स्वर्ग में...फिर आप खुद ही फैसला करें कि आपको हमेशा के लिए कहां रहना है...

मैनेजर...ऐसी बात हैं तो मैंने फैसला कर लिया है कि मैं स्वर्ग में ही रहूंगी...

प्रभारी देवता...नहीं मैडम रूल इज़ रूल...आपको उसके मुताबिक चलना होगा...

ये कह कर मैनेजर को एक लिफ्ट में चढ़ा दिया गया...लिफ्ट जैसे पाताल में जा रही हो, बहुत नीचे जाने के बाद रूकी...लिफ्ट का डोर खुला तो बाहर बहुत खूबसूरत सा गोल्फ कोर्स था...पास ही एक कंट्री क्लब था...जिसके गेट पर मैनेजर के बहुत सारे दोस्त खड़े थे...वो सब इवनिंग ड्रैस में बड़ी तफ़री के मूड में थे...सब दौड़ कर आ कर मैनेजर से बड़ी गर्मजोशी से मिले...पहले गोल्फ खेला गया...फिर कंट्री क्लब में शानदार डाइन एंड ड्रिंक्स हुआ...वो नर्क के प्रभारी मिस्टर शैतान से भी मिली...बेहतरीन सूट मे बात बात में हंसी मज़ाक करने वाला शख्स निकला मिस्टर शैतान...बड़ी अच्छी तरह टाइम पास हो रहा था कि मैनेजर का लिफ्ट में वापस जाने का वक्त हो गया...सबने खुशी खुशी हाथ मिलाकर मैनेजर को लिफ्ट तक छोड़ा...

अब लिफ्ट स्वर्ग में आ गई...प्रभारी देवता ने मैनेजर को पुष्पक विमान में बिठा कर स्वर्ग की सैर के लिए भेज दिया...बादलों के ऊपर सैर करते हुए बड़ा अलौकिक अनुभव था...माहौल में धीमा किंतु मुग्ध कर देने वाला मंत्रोच्चार हो रहा था...इन्हीं मनोरम दृश्यों के बीच मैनेजर का स्वर्ग में भी एक दिन पूरा हो गया...अब प्रभारी देवता ने मैनेजर से पूछा...आपने स्वर्ग-नर्क दोनों का अनुभव ले लिया है...अब बताएं, आप कहां रहना चाहेंगी....

मैनेजर ने ठंडी सांस ली और फिर कहा... मैंने नहीं सोचा था कि मुझे ये कहना पड़ेगा...स्वर्ग वाकई बहुत सुंदर है, लेकिन मुझे लगता है कि मेरे लिए नर्क ही ज़्यादा सूट करेगा...

प्रभारी देवता ने ये सुनकर मैनेजर को फिर लिफ्ट पर चढ़ा दिया...एक बार लिफ्ट फिर तेज़ी से नर्क की ओर बढ़ चली...लिफ्ट का दरवाज़ा खुला...लेकिन ये क्या...जबरदस्त बदबू ने मैनेजर का स्वागत किया...जैसे किसी गटर में उतार दिया गया हो...चारों तरफ़ गंदगी और कूड़े का ढेर...कल जो दोस्त इवनिंग ड्रैस में महक रहे थे, आज फटे पुराने लत्तों में बोरे लेकर कूड़ा बीनने का काम कर रहे थे...

तभी मिस्टर शैतान मवाली जैसे वेश में मैनेजर के पास आया...मैनेजर को हैरान-परेशान देखकर मिस्टर शैतान बोला...क्या परेशानी है...

मैनेजर बड़ी हिम्मत जुटा कर बोली...कल तो यहां गोल्फ कोर्स, कंट्री क्लब, खूबसूरत लोग, हंसी मज़ाक का खुशनुमा माहौल दिख रहा था...आज अचानक ये सब कैसे उलट गया...

ये सुनकर मिस्टर शैतान के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ गई...बोला...

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कल हम तुम्हे रिक्रूट (भर्ती) कर रहे थे...आज तुम हमारी कर्मचारी हो...चलो वक्त मत जाया करो...फौरन काम पर लग जाओ...



बुधवार, 28 जुलाई 2010

आप हवा में तुक्के तो नहीं लगाते, इसे पढ़िए...खुशदीप

प्राइमरी स्कूल के सत्र का समापन था...एक साल तक किंडरगार्टन (केजी) के जिन बच्चों को टीचर ने मेहनत से पढ़ाया, वो विदाई से पहले तोहफ़े ले कर मिलने के लिए आ रहे थे...

फ्लोरिस्ट शॉप (फूल विक्रेता) के मालिक के बेटे ने टीचर को अपना प्रेज़ेंट दिया...टीचर ने गिफ्ट पैक को हिलाया और फिर कहा...मैं शर्त लगा कर बता सकती हूं, इसके अंदर क्या है...सुंदर से फूल...

बच्चे ने हैरानी जताते हुए कहा... टीचर आपको कैसे पता चला...

टीचर ने कहा...इनट्यूशन बेटा, इनट्यूशन...

फिर स्वीट शॉप के मालिक की बेटी ने अपना पैक टीचर को दिया...टीचर ने पैक को कान के पास ले जाकर हिलाया और कहा...शर्तिया इसमें ताजा मिठाइयां हैं...

बच्ची ने कहा...बिल्कुल ठीक मैम...आप कैसे पता लगा लेती हैं...

टीचर ने फिर जवाब दिया...इनट्यूशन माई डॉल, इनट्यूशन...

अगली बारी वाइनशॉप के मालिक के बेटे की थी...बच्चे ने रैपर में पैक एक सुंदर सी टोकरी टीचर को भेंट की...टीचर टोकरी को उठा कर सिर के पास ले गई...लेकिन टोकरी से कुछ लीक हो रहा था...टीचर ने उंगली से लीक वाली जगह को छुआ और जीभ पर लगा कर बोली...क्या ये वाइन है...

नहीं मैम, बच्चे ने जवाब दिया...

टीचर ने फिर वही प्रक्रिया दोहराई...इस बार लीकेज से कई सारी बूंदें हाथ में लेकर चखीं...क्या ये शैम्पेन है...

बच्चे ने आकुलता दिखाते हुए कहा...नहीं, मैम नहीं...

अब टीचर ने लीकेज से बड़ा सा घूंट लेकर पिया और फिर बोली...ओके, आई क्विट...अब तुम ही बताओ टोकरी में है क्या...

बच्चे ने मासूमियत से जवाब दिया...



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पप्पी मैम...कुछ  दिन पहले ही हमारी प्यारी डॉगी ने इसे दिया है...


स्लॉग फोटो


                                          आ देखे ज़रा किसमें कितना है दम...



नोट- इन साधु महाराजों को ब्लॉगर समझने की भूल मत कीजिएगा...

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

पैसा क्या वाकई खुदा है...खुशदीप

पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं...

ये अनमोल वचन जिस महापुरुष के मुखारबिंदु से निकले थे उनका नाम है दिलीप सिंह जूदेव...एनडीए सरकार में पर्यावरण और वन राज्य मंत्री रह चुके हैं...छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब मन में बरसों से संजो रखा है..


दिलीप सिंह जूदेव

२००३ में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तहलका के स्टिंग ऑपरेशन में कैमरे पर रिश्वत लेते हुए धरे गए थे...रिश्वत देने वाले से वादा कर रहे थे नकद नारायण के बदले एक ऑस्ट्रेलियाई खनन कंपनी को फायदा पहुंचाने का...

क्या वाकई पैसा खुदा से कम नहीं है...आज अनूप शुक्ल जी की फुरसतिया पोस्ट पढ़ते हुए अचानक ही इस प्रकरण का ध्यान आ गया...अनूप जी ने लिखा है-

"पत्नी और बच्चा बिग बाजार में पैसे बरबाद करने गये हैं। मैं बाहर इंतजार कर रहा हूं। आते-जाते लोगों को देखता हूं। मॉल में लोग कितने खुश-खुश से लगते हैं। खुबसूरत, चहकते,महकते, बेपरवाह, बिन्दास। कभी-कभी लगता है कि अपना सारा देश एक बहुत बड़ा मॉल होता। सबको यहां बुलाकर शामिल कर लिया जाता। सारी गरीबी,दुख, कष्ट दूर हो जाते। देश क्या दुनिया के बारे में भी ऐसा ही लगता है। लेकिन इत्ता बड़ा मॉल बनने में बहुत समय लगेगा। न जाने कित्ते साल। न जाने कित्ते दशक। न कित्ती शताब्दियां। कभी-कभी हिसाब लगाता हूं कि आज के ही दिन दुनिया की सारी सम्पत्ति सब लोगों में बराबर-बराबर बांट दी जाये तो कित्ता पड़ेगा हरेक के हिस्से में। हमारी कित्ती कम हो जायेगी। यह खाम ख्याली है। लेकिन सोचते हैं अक्सर। सोचना ससुर अपने आप में खाम ख्याली है। ख्याल जब आते हैं मन में तो उनकी जामा तलासी नहीं होती। मन मॉल बनने से बचा हुआ है।"

पैसे को लेकर खालिस भारतीयों के खालिस ख्यालों की बात छोड़िए...बात करते हैं दुनिया के दो सबसे अमीर आदमियों की....पहले दूसरे नंबर को लेकर इन्हीं दोनों में उलटा-पलटी होती रहती है...वारेन बफ़ेट और बिल गेट्स...



बिल गेट्स और वारेन बफ़ेट



पहले बात वारेन बफ़ेट की...वारेन का फ़लसफ़ा रहा है कि

"आदमी ने पैसे को बनाया है, पैसे ने आदमी को नहीं...जैसे आप सादा हैं, वैसे ही अपना जीवन सादा रखें...जो दूसरे आप से कहते हैं, वो ज़रूरी नहीं कि आप करें...दूसरों की सुनिए...करिए वही जो आपको अच्छा लगता है...सबसे खुश लोग वो नहीं हैं जिनके पास ऐशो-आराम की सारी चीज़ें मौजूद हैं, खुश वो हैं जो अपने पास हैं, उसी का शुक्रिया करते हुए जीवन का आनंद लेते हैं..."

अब बिल गेट्स का दर्शन भी समझ लीजिए...माइक्रोसॉफ्ट...के संस्थापक महोदय खुद तो इतना पैसा देख चुके हैं कि अब उसके इस्तेमाल की उपयोगिता ही भूल चुके हैं...अपनी फाउंडेशन के ज़रिए भारत समेत दुनिया भर में चैरिटी के कामों में करोड़ों डॉलर खपा रहे हैं...लेकिन पैसे के बारे में उनकी सोच कितनी प्रैक्टीकल है ये उनके इस कथन से ही साफ हो जाता है...

"हमेशा याद रखिए...पैसा ही जीवन में सब कुछ नहीं है...लेकिन पहले ये सुनिश्चित कर लीजिए कि आपने पर्याप्त पैसा कमा लिया है...उसके बाद ही ये नानसेंस (बेतुकी बात) सोचिए..."



स्लॉग चिंतन

पहली सूरत...

आप अपने बारे में क्या सोचते हैं, जब आपके पास कुछ भी नहीं होता...

दूसरी सूरत...

आप दूसरों के बारे में क्या सोचते हैं, जब आपके पास सब कुछ होता है...

रविवार, 25 जुलाई 2010

कीप इट अप हमारी वाणी, कुछ सुझाव...खुशदीप

आज हमारी वाणी पर क्लिक किया तो सुखद आश्चर्य हुआ...पेज खुल भी तेज़ी से रहा था और फीचर भी सादे किंतु उपयोगी लग रहे थे...कई ब्लॉगर भाइयों के सुझाव के अनुरूप हमारी वाणी ने नापसंद का बटन हटा दिया, इसके लिए साधुवाद...हमारी वाणी सच में ब्लॉगवुड की हमारी वाणी बने और विवादों का साया इस पर न पड़े, इसके लिए मैं अपनी और से कुछ सुझाव देना चाहता हूं, आशा है टीम हमारी वाणी इन पर ध्यान देगी....



सुझाव नंबर एक

वैसे तो दिन में लिखी जाने वाली सभी पोस्ट रैंडमली एक के बाद हमारी वाणी के होम पेज पर दिखती रहें तो सबसे आदर्श स्थिति होगी...इससे नए-पुराने सभी ब्लॉगर्स की पोस्ट को थोड़ी-थोड़ी देर बाद ऊपर आने का मौका मिलता रहेगा...और अगर ऐसा संभव नहीं है तो हॉट लिस्ट में सबसे ज़्यादा पढ़ी गईं पोस्टों को ही वरीयता देने का आधार बनाया जाए...ये भी ध्यान रखा जाए कि ज़्यादा पढ़ी गई पोस्ट में एक आईपी अड्रैस से एक क्लिक काउंट किया जाए...अगर उसी आईपी अड्रैस से एक से ज़्यादा बार क्लिक होता है तो उन्हें काउंट नहीं किया जाए...


सुझाव नंबर दो

एग्रीगेटर सुचारू और निर्विवाद रुप से चले ये हम सब ब्लॉगर्स के हित में हैं...इसलिए भाई गिरीश बिल्लौरे ने एक बड़ा अच्छा सुझाव दिया था कि अगर ब्लॉगर्स के लिए कोई मासिक या सालाना आर्थिक अंशदान रखा जाता है तो अच्छी बात होगी...इससे एग्रीगेटर टीम क्वालिटी पर निगरानी रखने के लिए स्टॉफ का प्रबंध भी कर सकेगी और उस पर आर्थिक तौर पर ज़्यादा बोझ भी नहीं पड़ेगा...इस तरह ये कोऑपरेटिव के सिद्धांत पर चलेगा और मालिक या जनसेवा करने जैसा पेंच ही खत्म हो जाएगा...


सुझाव नंबर तीन

हमारी वाणी को विवादों से इतर रखने के लिए ये देखा जाए कि व्यक्तिगत विद्धेष, साम्प्रदायिक वैमनस्य, अश्लील, देशविरोधी, अभद्र, नारी विरोधी या अन्य आपत्तिजनक पोस्ट को टीम हमारी वाणी अपनी डेस्क पर ही फिल्टर कर दे...ऐसी पोस्ट को ब्लॉक कर दिया जाए, साथ ही उन्हें लिखने वाले ब्लॉगर विशेष को चेतावनी दी जाए...अगर वो फिर दोबारा वैसी ही पोस्ट डाल देते हैं तो उनके ब्लॉग को ब्लैक लिस्ट कर हटा दिया जाए...


सुझाव नंबर चार

टीम हमारी वाणी ब्लॉगवुड के निर्विवादित ब्लॉगरजनों से सात या ग्यारह सदस्यीय सलाहकार मंडल बनाए...इनमें से एक मुख्य सलाहकार हों...विवाद की स्थिति में सलाहकार मंडल में बहुमत की राय से फैसला किया जाए...मुख्य सलाहकार को अपना वोट देने का अधिकार तभी हो जब सलाहकार मंडल की राय टाई हो जाए...यानि सात सदस्यीय मंडल में अगर किसी मुद्दे पर हक़-विरोध में तीन-तीन और ग्यारह सदस्यीय मंडल में पांच-पांच वोट आते हैं तो मुख्य सलाहकार अपनी राय दें...

सुझाव नंबर पांच

ब्लॉगवुड के लिए एड का जुगाड़ करने के लिए नए-नए एवैन्यू तलाशे जाएं...हमारी वाणी का मकसद एड के ज़रिए ब्लॉगर्स को आर्थिक लाभ पहुंचाना भी रहे...

इसके अलावा मैं एक बात और कहना चाहता हूं....नापसंद का चक्कर खत्म होने के बाद एक और चक्कर शुरू हो गया है...ये है बेतुकी टिप्पणियों के ज़रिए किसी पोस्ट को ऊपर पहुंचाने की कोशिश करना...बेनामी टिप्पणियों की तो पहले भी समस्या रही है...लेकिन ये बार-बार एक ही बेतुकी टिप्पणी करने का खेल और भी खतरनाक है...इससे पोस्ट में जो मुद्दा उठाया गया है उससे पाठकों का तारतम्य टूटता है और सही ढंग से टिप्पणी करने वालों का भी अहित होता है...इस तरह बेतुकी टिप्पणियां ही उस पोस्ट के मूल की हत्या कर देती है...ऐसी टिप्पणियों को रोकने का इलाज एग्रीगेटर के पास नहीं हो सकता और न ही होना चाहिए...अगर ऐसी टिप्पणियां आती हैं तो पोस्ट लेखक का ही कर्तव्य बन जाता है कि वो व्यक्ति विशेष से खुन्नस या अन्य किसी स्वार्थ के चलते आने वाली टिप्पणियों को खुद ही डिलीट कर ले...अन्यथा मॉडरेशन का इस्तेमाल करे...

अभी इतने सुझाव ही ज़ेहन में आ रहे हैं...और आएंगे तो उन्हें भी हमारी वाणी टीम के विचारार्थ भेजता रहूंगा...

ये सिर्फ भारत में ही मिलेगा...खुशदीप

जहां पांव में पायल और माथे पे बिंदिया...इट्स हैप्पन्ड ओनली इन इंडिया...वाकई कुछ चीज़ें सिर्फ भारत में ही हो सकती हैं...जो यहां हो सकता है, वो और कहीं नहीं हो सकता...विश्वास नहीं होता तो देख लीजिए अपनी आंखों से...


घोड़े बेच कर सोना...






कूड़ा तो यहीं डलेगा...







ये आराम पाएगा कहां...








आनंदम् मैक्सिमम्...








सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं...


भारत की बात की है तो 24 जुलाई की वजह से हरिकिशन गिरी गोस्वामी याद आ गए...आप कहेंगे ये कौन से पंडित जी है...ये वही पंडित जी है जिनके लिए एक फिल्म में गाना गाया गया था...पंडित जी मेरे मरने के बाद बस इतना कष्ट उठा लेना, मेरे मुंह में गंगाजल की जगह थोड़ी सी मदिरा टपका देना...मैं बात कर रहा हूं भारत कुमार की...यानि एक्टर मनोज कुमार की...24 जुलाई को वो 73 साल के हो गए...फिल्मों में देशभक्ति का ज़िक्र जब भी आएगा, मनोज कुमार का नाम खुद-ब-खुद ज़ुबां पर आ जाएगा...मनोज कुमार अपनी फिल्मों में डॉयलाग्स, गीत-संगीत से लोगों में ऐसा जोश भर देते थे कि हर कोई नाच उठता था...पहले पूरब और पश्चिम का ये गीत देखिए और फिर खुद ही महसूस कीजिए देशभक्ति का जज़्बा...

दुल्हन चली, ओ पहन चली,  तीन रंग की चोली...


मनोज कुमार

शनिवार, 24 जुलाई 2010

भगवान खुद ऐसा करके देखे...खुशदीप

वो यारों की महफ़िल,


वो मुस्कुराते पल,


दिल से जुदा है,


अपना बीता हुआ कल,


कभी ज़िंदगी गुज़रती थी,


हंसने-हंसाने में,


आज वक्त गुज़रता है,


'कागज़ के टुकड़े' कमाने में...






स्लॉग ओवर

एक चर्च के बाहर बोर्ड पर लिखा था-

'GOD NEVER FAILS'

एक बालक ने आकर बोर्ड पर लिख दिया...

जरा गॉड से IIT, PMT, CAT, CS और CA FINAL के EXAMS दिलवा कर देखो, फिर बताना...

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

भारत को आखिर ठीक कौन करेगा...खुशदीप

अजित गुप्ता जी ने अपनी पोस्ट पर बड़ा ज्वलंत मुद्दा उठाया- पता नहीं हम अपने देश भारत से नफरत क्‍यों करते हैं? ...बड़ी सार्थक बहस हुई...एक से बढ़ कर एक विचार कमेंट्स के ज़रिए सामने आए...अजित जी ने भारत की तुलना ऐसे राजकुमार से की जो अनेक रोगों से ग्रसित हो गया और राजकुमारी (ब्रिटेन) जितना लूट सकती थी, उसे लूट कर भाग गई...अब बड़ा सवाल ये है कि इस लुटे-पिटे राजकुमार की सेहत को फिर से कैसे दुरूस्त किया जाए...मेरा मानना है सिर्फ उपदेश की शैली में भाषण झाड़ने से बात नहीं बनेगी...

अजित जी और उनकी पोस्ट पर आए विचारों को पढ़कर मेरा ये विश्वास मज़बूत हुआ है कि हिंदी ब्लॉगिंग ने सार्थक दिशा की ओर बढ़ना शुरू कर दिया है...मेरा मानना है कि अजित जी के इस प्रयास को अंजाम तक पहुंचाने के लिए हम बाकी सब ब्लॉगर्स भी अपनी भूमिका निभाएं...मेरे विचार से एक-एक कर हम सब अपनी पोस्ट पर देश के मुंहबाए खड़े किसी मुद्दे को उठाए और विचार मंथन करे कि उसके निदान के लिए क्या-क्या किया जा सकता है...इस दिशा में आज मैं अपनी ओर से वो मुद्दा उठा रहा हूं जिसे मैं भारत की हर समस्या (गरीबी, भूख, भ्रष्टाचार, आतंकवाद) का मूल मानता हूं...ये मुद्दा है शिक्षा का....मेरी समझ से अगर इस मुद्दे पर आज ठीक से ध्यान दिया जाए तो उसका फल बीस-पच्चीस साल बाद मिलना शुरू होगा...लेकिन कभी न कभी तो पहल करनी ही होगी...

देश में शिक्षा पर सबसे ज़्यादा निवेश किया जाना चाहिए...इस निवेश का फायदा आज नहीं तो कल ज़रूर मिलेगा...देश के हर बच्चे को शिक्षा दिलाने की ज़िम्मेदारी सरकार ले...इसके लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाए....किसी हकीम ने थोड़े ही कहा है कि हर बच्चा ग्रेजुएट बनने के बाद ही सम्मान का हकदार हो सकता है...देश में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं अपनाई जाती जिसमें बिना जाति, मजहब, देखे छोटी उम्र में ही बच्चों की स्क्रीनिंग कर ली जाती...ये क्यों नहीं तय कर लिया जाता कि आखिर बच्चे में कितनी प्रतिभा है और वो किस फील्ड में ज़्यादा बेहतर कर सकता है...मान लीजिए ये तय हो गया कि किसी बच्चे में एथलीट बनने के लिए अच्छा पोटेंशियल है...तो फिर उसे क्यों नहीं दिन रात उसके खेल की विधा की प्रैक्टिस कराई जाती...किताबी शिक्षा उसे उतनी ही दी जाए जितने में वो अपना रोज़मर्रा का काम चला सके...उसका मुख्य ध्येय अपने खेल में ही अव्वल बनने का होना चाहिए...विदेश की तरह ही छोटे बच्चों को शिक्षा से पहले पंचर, फ्यूज़ लगाना, नल ठीक करना जैसे व्यावहारिक कार्य सिखाए जाएं...

कपिल सिब्बल देश की शिक्षा पद्धति में क्रांतिकारी सुधार लाना चाहते हैं...पूरे देश में एक सिलेबस कर देना चाहते हैं...मेडिकल, आईआईटी में दाखिले के इम्तिहानों का फॉर्मेट बदल देना चाहते हैं...लेकिन सिब्बल साहब के साथ दिक्कत ये है कि देश के बहुत बड़े वकील होने की वजह से इन्हें अभिजात्य वर्ग से माना जाता है...एक सिलेबस क्या इस देश में मौजूदा हालात में संभव है...बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांव का बच्चा भले ही दिमाग से कितना तेज़ हो लेकिन क्या अंग्रेज़ी बोलने में दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों के पांचसितारा स्कूलों के बच्चों के सामने टिक सकता है...मेरी राय से सिब्बल साहब को देश के दूरदराज के गांवों में जाकर पहले ज़मीनी हक़ीक़त से रू-ब-रू होना चाहिए...फिर शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों के साथ बैठकें कर देश की शिक्षा का विज़न तैयार करना चाहिए...हड़बड़ी में कदम उठाने की जगह ठोकबजा कर आगे बढ़ना ही बुद्धिमत्ता होगी...वरना वही हाल न हो जाए चौबे जी छ्ब्बे जी बनने चले और दूबे जी रह गए....

अब मैं ब्लॉगजगत के सामने एक सवाल रखता हूं...क्या देश में हर बच्चे को ग्रेजुएट बनाना ज़रूरी है...हमारे देश के ज़्यादातर विश्वविद्यालयों से जिस तरह के ग्रेजुएट निकल कर आ रहे हैं, उससे देश का क्या भला होने जा रहा है...हमारे देश में कितनी नौकरियां हैं जो ग्रेजुएशन करते ही हमारे नौजवानों को मिल जाएं... पहले ही देश में विश्वविद्यालयों की कम भरमार थी जो अब सरकार विदेशी विश्वविद्यालयों को भी देश में पैर जमाने के लिए न्यौता देना चाहती है...




मैं आपको मेरठ का अनुभव बताता हूं...आसपास कृषि प्रधान भूमि होने की वजह से गांव-कस्बों से बच्चे बड़ी संख्या में मेरठ कालेज या दूसरे कालेजों में पढ़ने आते हैं...मुझे अच्छी तरह याद है कि कुछ लड़के उस भले वक्त में किसान पिता से कहते थे कि ब्लॉटिंग पेपर की ज़रूरत है, इसलिए पांच सौ रुपये भेज दो...अब बेचारा किसान पिता किसी तरह भी पेट काटकर बेटे को पैसे का इंतज़़ाम कर भेजता...गांव से एक बार बच्चा शहर की हवा में पढ़ने आ जाए तो फिर वो गांव लौटकर किसानी या फार्मिंग करने की नहीं सोचता...उसे ग्रेजुएट या पोस्टग्रेजुएट होने के बाद शहर में ही कोई बढ़िया नौकरी चाहिए...बेशक इम्तिहान किसी भी तरीके से पास किया गया हो...ऐसी डिग्रियों की नौकरी की रेस में कोई वैल्यू नहीं होती...देश में नौकरियां आखिर होती ही कितनी हैं, जो ढंग की नौकरियां हैं वो ढंग के विश्वविद्यालयों से ढंग की पढ़ाई करने वाले छात्र ही पाते हैं...फिर थोक के भाव से निकलने वाले निम्न स्तर के विश्वविद्यालयों से निकले छात्र कहां जाए...शहर आकर बाइक, मोबाइल, जींस और पैरों में स्पोर्ट्स शू जैसे चस्के भी लग जाते हैं...आखिर पिता भी कब तक पैसे की फरमाइश पूरी करते रहें...रोज़गार मिलने से रहा...ऐसे में एक सी सोच के कुछ बेरोज़गार लेकिन बेहद एंबिशियस दिमाग मिलते हैं तो रातों रात कामयाब बनने के लिए अपराध के रास्ते में भी कोई बुराई नज़र नहीं आने लगती...ऐसी रिपोर्ट आती रहती हैं कि पढ़े लिखे जवान ही गैंग ऑपरेट करने लगते हैं...ऐसा हो रहा है तो ये सरकार, सिस्टम के साथ हम सब की भी हार है....हम इस सिस्टम से अलग नहीं है, इस सिस्टम में खामियां हैं तो उन्हे दूर भी हमें ही करना है...कोई बाहर वाला नहीं आएगा हमें इस अंधे कुएं से निकालने के लिए...कृपया सभी सुधी ब्लॉगर जन खुलकर इस मुद्दे पर अपनी राय रखें, साथ ही अपनी-अपनी पोस्ट में बहस के लिए इसी तरह के मुद्दे उठाएं, जिससे ब्लॉगजगत का एक अलग ही चेहरा देश को देखने को मिले..

याद रखिए...

न अमीरों से बदलेगा, न वज़ीरों से,
ये ज़माना बदलेगा तो बस हम फ़कीरों से...

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

ऐसी होती है सच्ची पत्नी...खुशदीप

देखन में छोटन लगे लेकिन घाव करे गंभीर...आज इसी को ज़ेहन में रख कर माइक्रोपोस्ट लिख रहा हूं...आपस में बेहद प्यार  करने वाले पति-पत्नी रोमांटिक मूड में बात कर रहे थे...

तभी पति ये देखने के लिए कि पत्नी उससे कितना प्यार करती है, पूछ बैठा...हनी, अगर मैं मर गया तो क्या तुम दोबारा शादी करोगी...

पत्नी...हम्ममममम...शायद हां, हब्बी तुम जानते हो मुझे अकेलेपन से कितना डर लगता है...

पति...क्या तुम उसे मेरी कार भी चलाने दोगी...

पत्नी...वेल, इस बारे में सोचना पड़ेगा...वैसे चलाने ही दूंगी...

पति...क्या तुम उसे मेरी फेवरिट चेयर पर भी बैठने दोगी...

पत्नी...शायद हां...

पति...क्या तुम उसे मेरी गोल्डन घड़ी भी पहनने दोगी..

पत्नी...शायद...

पति...क्या तुम उसे मेरे पसंदीदा सूट भी पहनने दोगी...

पत्नी...नहीं, वो तुमसे कद में छोटा है...(उउउउउउप्पपपपपसससस....)


बुधवार, 21 जुलाई 2010

ये कौन सी जगह है दोस्तों...खुशदीप

गौर से देखिए यहां दी गई तस्वीरों को...फिर गेस लगाइए कि ये खूबसूरत जगह कौन सी है और यहां रहने वाले खुशकिस्मत लोग कौन हैं...जवाब मैं आपको इसी पोस्ट के बीच में दूंगा...




















ये सारी तस्वीरें ब्रिटेन में बनी एक नई जेल की हैं...



खुदा न करे लेकिन अगर किसी को जेल जाना पड़ जाए तो उसके साथ क्या क्या होगा...


जेल में आप ज़्यादातर वक्त 10x10 की सेल में बिताते हैं...


जेल में आपको तीन वक्त का मुफ्त खाना मिलता है...

अच्छे बर्ताव पर आपको खुला रहने के लिए ज़्यादा वक्त मिल जाता है...


गार्ड ही आपके लिए सारे दरवाज़े खोलता और बंद करता है...


आप टीवी देख सकते हैं, कोई गेम खेल सकते हैं...


आपका अपना अलग टॉयलेट होता है...


आपके दोस्त और घर वाले आपसे मिलने आ सकते हैं...


जेल में आपके ऊपर होने वाला सारा खर्च टैक्स देने वाले उठाते हैं...

अब आप जेल की इन परिस्थितियों की उन हालात से तुलना कीजिए जो रोज़ आपको आजीविका कमाने के लिए घर से बाहर सहने पड़ते हैं..

(नोट- जेल के ये हालात भारत से जोड़ कर मत देखिएगा...ये पश्चिमी देशों की जेलों के हालात हैं...)




मंगलवार, 20 जुलाई 2010

प्यार-प्यार का फ़र्क...खुशदीप

एक आदमी की प्रार्थना से ईश्वर प्रसन्न हो गए...
बोले...वत्स अपनी कोई इच्छा हो तो बता...
आदमी बोला...भगवन् मेरी इच्छा तो कोई नहीं लेकिन आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं...
ईश्वर...पूछ बालक...
आदमी...हे परमेश्वर, प्यार हम भी करते हैं, प्यार आप भी करते हैं, लेकिन इन दोनों में फ़र्क क्या होता है...
ईश्वर...मेरा प्यार आसमान में उड़ान भरता परिंदा है और तुम्हारा प्यार पिंजड़े में कैद परिंदा है...





स्लॉग ओवर

देश का एक महाभ्रष्ट नेता इस्राइल के दौरे पर गया...यरूशलम में उसे दिल का दौरा पड़ा और हमेशा के लिए दुनिया को विदा कह गया...नेता जी के साथ जो लोग गए हुए थे, उनसे यरूशलम के स्थानीय प्रशासन ने कहा कि अगर आप नेता को यरूशलम की पवित्र ज़मीन में दफ़न करना चाहेंगे तो सौ डॉलर का खर्च आएगा और अगर आप इसे अपने देश में ही ले जाना चाहें तो पांच लाख डॉलर का खर्च आएगा...ये सुनकर नेता के साथ गए लोग एक कोने में मंत्रणा करने के लिए गए और वापस आकर बोले कि वो नेता के शव को भारत ही ले जाना चाहेंगे और इसके लिए पांच लाख डॉलर खर्चने के लिए तैयार हैं...यरूशलम के स्थानीय प्रशासन के अधिकारी ये सुनकर हैरान हुए...बोले कि पांच लाख डॉलर से आप गरीबों की भलाई के कई काम कर सकते हैं...मरीजों के लिए दवाईयां खरीद सकते हैं...गरीब बच्चों को पढ़ा सकते हैं...आप क्यों इतने पैसे खर्चना चाहते हैं...ये सुनकर नेता के साथ गई टीम का एक आदमी बोला...सदियों पहले जीसस (यीशु मसीह) को भी यरूशलम की पवित्र ज़मीन में दफ़नाया गया था...लेकिन तीन दिन बाद ही वो दुनिया की भलाई के लिए फिर जीवित हो गए थे...हम अपने नेता के साथ ऐसा जोख़िम हर्गिज़ नहीं लेना चाहते...यीशु तो दुनिया का परोपकार चाहते थे लेकिन नेता दुनिया का ही भ्रष्टाचार से बंटाधार कर देगा...

रविवार, 18 जुलाई 2010

कहां ले जाऊंगा मैं इतना प्यार...खुशदीप

क्या कहूं...क्या न कहूं...आप सबके प्यार ने निशब्द कर दिया है...इतनी बधाई मेरे सारे जन्मदिनों को मिलाकर नहीं मिली जितनी अकेले इस 18 जुलाई पर मिल गई...




कल रात 18 जुलाई होने में दो मिनट ही थे कि मोबाइल की रिंग हुई दूसरी तरफ़ पाबला जी की कड़क लेकिन बड़े भाई के प्यार वाली आवाज़ थी...पता नहीं कहां से पता लगा लेते हैं सब ब्लॉगर्स के जन्मदिन, सालगिरह का...ब्लॉग पर तो पोस्ट लगाते ही हैं, फोन पर बधाई देना भी नही भूलते...सच में पाबला जी इस गाने को पूरी तरह चरित्रार्थ कर रहे हैं- अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ए दिल ज़माने के लिए...यहां ये बता चलूं कि पाबला जी अभी महाराष्ट्र के टूर पर थे...लेकिन इस टूर के आखिरी चरण में एक बड़े हादसे में बाल-बाल बचे...पाबला जी की वैन इस हादसे में पूरी तरह जल कर राख हो गई...शुक्र है ऊपर वाले का पाबला जी और परिवार के किसी सदस्य को कोई गंभीर चोट नहीं आई...लेकिन इस हादसे के बावजूद पाबला जी की ज़िंदादिली पर कोई असर नहीं पड़ा...इसका सबूत है कल पूरी गर्मजोशी से मुझे जन्मदिन की बधाई देना...


पाबला जी की पोस्ट पर गुरुदेव समीर लाल जी की बधाई सबसे पहले आई...सब ब्लॉगर्स के लिए खुशखबरी है कि दिसंबर में समीर जी का भारत आना फिक्स हो गया है...समीर जी ने ई-मेल भेज कर इस बात की पुष्टि की है...

उसके बाद फोन, एसएमएस, ई-मेल और कमेंट के ज़रिेए बधाई आने का सिलसिला जो शुरू हुआ, अभी तक बदस्तूर जारी है...पाबला जी के फोन के कुछ ही सेंकड बाद पैम्पर्ड बॉय महफूज़ का लखनऊ से फोन आया...मुझे ताज़्जुब हुआ, क्योंकि तब तक पाबला जी की पोस्ट ब्लॉग पर नहीं आई थी...मैंने महफूज़ से पूछा कि कहां से पता चल गया...जवाब मिला बड़े भाई का बर्थडे मुझे मालूम नहीं होगा तो किसे मालूम होगा...जिस वक्त महफूज़ फोन कर रहा था, उस वक्त भी फोन पर दूसरी कॉल आ रही थीं...मैंने महफूज़ से अगले दिन बात का वादा कर विदा ली...फिर ललित शर्मा जी, शिवम मिश्रा, अजय कुमार झा, दीपक मशाल, राजीव तनेजा भाई,  अदा जी, डॉ टी एस दराल का एसएमएस (बाद में सेल देखा, उनकी मिस कॉल भी आई हुई थी), शाहनवाज़ सिद्दीकी, इरफ़ान भाई (कार्टूनिस्ट), बोले तो बिंदास रोहित, अरुण भंडारी, अतुल सिन्हा जी, रोहित सरदाना ने मोबाइल के ज़रिए शुभकामनाएं भेजी...प्रवीण त्रिवेदी ने मेल और अविनाश वाचस्पति जी ने चैट के ज़रिए बधाई की चाट खिलाई...

अब बात पाबला जी की पोस्ट की...समीर जी के बाद क्रम के हिसाब से एम वर्मा जी, मो सम कौन, रतन सिंह शेखावत जी, अलबेला खत्री जी, गिरिजेश राव जी, अजित गुप्ता जी, तारकेश्वर गिरी जी, संगीता पुरी जी, ललित शर्मा भाई, महेंद्र मिश्र जी, प्रकाश गोविंद जी, शिवम मिश्रा, संगीता स्वरूप जी, भाई गिरीश बिल्लौरे, वंदना जी, सोनल रस्तोगी, शिखा वार्ष्णेय, अदा जी, राज भाटिया जी, गगन शर्मा जी, ऑनेस्टी प्रोजेक्ट डेमोक्रेसी वाले जय कुमार झा जी, अजय कुमार झा, अरविंद मिश्रा जी, डॉ रुपचंद्र शास्त्री जी मयंक और भाई धीरू सिंह (बाद में उनकी मिसकॉल भी देखी) की शुभकामनाओं के फूलों का गुलदस्ता मिला...

मेरी अपनी पोस्ट पर भी बोले तो बिंदास रोहित, राज भाटिया जी, समीर जी, डॉ टी एस दराल (कमेंट करने तक डॉ साहब पसोपेश में थे कि आखिर जन्मदिन किसका है), ललित शर्मा भाई, संगीता पुरी जी, सुरेश चिपलूनकर जी, शिवम मिश्रा, अर्चना जी, अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी, अरगनिकभाग्योदय, तारकेश्वर गिरी जी, वंदना जी, राजभाषा हिंदी, दीपक मशाल, धीरू भाई और सतीश सक्सेना भाई जी ने स्नेह की खुशबू के गुलाब भेजे...

हां, एक बात और बता चलूं, शाम को अदा जी का फोन आया तो उनसे मैंने अपना बर्थडे का गिफ्ट मांग लिया...वो गिफ्ट था कि अदा जी अपनी पोस्ट पर कमेंट बॉक्स को जल्दी दोबारा शुरू करें...

इसके अलावा भी मैं जानता हूं कि डॉ अमर कुमार जी, दिनेशराय द्विवेदी सर, ताऊ रामपुरिया जी, अनिल पुसदकर भाई, निर्मला कपिला जी, जी के अवधिया जी, अनूप शुक्ल जी, रवींद्र प्रभात जी, शरद कोकास जी, अजित वडनेरकर जी, योगेंद्र मुदगल जी, वाणी गीत जी, कनिष्क कश्यप, पारुल, हरकीरत हीर जी, रश्मि रवीजा बहन, शोभना, सागर, फौजिया, ज़ाकिर अली रजनीश भाई, शेफ़ाली बहना, कविता वाचक्नवी जी, प्रवीण शाह भाई, राजकुमार सोनी, सूर्यकांत गुप्ता, राजकुमार ग्वालानी भाई, एच पी शर्मा जी, सुमन जी, कड़वा सच वाले उदय जी, पंडित वत्स जी. देव बाबा, मिथिलेश दुबे, राम त्यागी और भी सब मेरे सम्मानित बड़ों और छोटे अज़ीज़ों का आशीर्वाद और प्यार मेरे साथ है...किसी वजह से वो ये पोस्ट नहीं देख पाए होंगे लेकिन उनके दिल की बात मेरे तक पहुंच गई है... आज स्लॉग ओवर में आपको मक्खन का नहीं अपने खुद का बचपन का मज़ेदार किस्सा सुनाता हूं...


स्लॉग ओवर

तब मैं हूंगा कोई सात-आठ साल का...मेरठ के बेगम ब्रिज की न्यू मॉर्केट कॉलोनी में हमारा घर था...दिमाग बचपन से ही खुराफाती था...इसलिए फर्स्ट अप्रैल को मेरी सोच के घोड़े दौड़ने लगे...कॉलोनी में जिस घर में भी कोई बच्चा था या बच्चे थे, सभी के घर गया और भोली सी सूरत बना कर सारी ऑन्टी जी से कह आया मेरा बर्थडे है, इसलिए सब बच्चों को भेज दीजिएगा...इतनी सावधानी बरती कि अपनी मम्मी को अपने इस कारनामे की हवा तक नहीं लगने दी...अब फर्स्ट अप्रैल आ गई तो अपनी हवा शंट होने लगी...एक दोस्त बड़ा करू था...वो सुबह ही देखने आ गया कि बर्थडे की क्या तैयारी हो रही है...मैंने उसे टरकाया कि खाने-पीने का सामान शाम को सब रेस्तरां से बना-बनाया आएगा...अब वो टाइम भी आ गया, शाम पांच बजे...बच्चे एक एक कर गिफ्ट लेकर घर पर आने लगे...ये देखकर मैं खुद तो छत पर जाकर छुप गया...अब वो सारे बच्चे कहें कि आज खोशी (मेरा निक नेम) का बर्थडे है...मम्मी कहें, ये 18 जुलाई इतनी जल्दी कैसे आ गई...उन्होंने कहा कि नहीं आंटी वो हम सब को खुद घर पर कह कर आया है...तब तक कुछ बच्चे अपनी मम्मियों को भी बुला लाए थे...किसी तरह मुझे छत से ढूंढ कर निकाला गया...अब वो सारे मुझे गिफ्ट देने पर आमादा...मम्मी ने मना किया कि जब बर्थडे ही नहीं तो गिफ्ट कैसी...फिर मम्मी को वाकई सारा सामान रेडीमेड बाज़ार से मंगाना पड़ा...गिफ्ट तो एक नहीं लिया सब बच्चों को मम्मी को पार्टी और करानी पड़ गई...उसके बाद सब बच्चों ने हैप्पी बर्थडे कहने की जगह मेरे घर के बाहर खड़े होकर एक सुर में गाया- अप्रैल फूल बनाया, तुमको गुस्सा आया, हमारा क्या कसूर, ज़माने का कसूर...वो झूठ का जन्मदिन आज भी मुझे साफ़-साफ़ याद है...

उम्र का बढ़ना भी एक त्यौहार हुआ...खुशदीप

आज आपको अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता सुनाता हूं...क्यों सुना रहा हूं ये आज आपको पाबला जी की पोस्ट से शायद पता चल जाए...अटल जी जिस राजनीतिक धारा से जुड़े रहे, उससे मेरा कोई लेना-देना नहीं लेकिन एक कवि, एक वक्ता और एक व्यक्ति के नाते मैं उनका बड़ा सम्मान करता हूं...जबसे वो सक्रिय राजनीति से हटे हैं, उनके छायावादी भाषणों की कमी भारतीय राजनीति को बहुत खल रही है...यही कामना करता हूं कि वो अति शीघ्र स्वस्थ हों...लीजिए उनकी कविता का आनंद लीजिए...




नए मील का पत्थर

नए मील का पत्थर पार हुआ,
कितने पत्थऱ शेष न कोई जानता,


अंतिम कौन पड़ाव नहीं पहचानता,
अक्षय सूरज, अखंड धरती,
केवल काया जीती-मरती,
इसलिए उम्र का बढ़ना भी एक त्यौहार हुआ,
नए मील का पत्थर पार हुआ...


बचपन याद बहुत आता है,
यौवन रसघट भर लाता है
बदला मौसम, ढलती छाया,
रिसती गागर, लुटती माया,


सब कुछ दांव लगाकर घाटे का व्यापार हुआ
नए मील का पत्थर पार हुआ...

-अटल बिहारी वाजपेयी

शनिवार, 17 जुलाई 2010

मनी फोल्डर का कूड़े के ट्रक में आशियाना...खुशदीप

कल जहां पोस्ट छोड़ी थी, आज वहीं से शुरू करता हूं...कल की पोस्ट में जापान की पेपर फोल्डि़ंग कला ओरिगेमी का ज़िक्र किया था... साथ ही वादा किया था कि मनी फोल्डर के नाम से मशहूर वोन पार्क का आशियाना दिखाने का..

आशियाना जो कूड़े को ठिकाने लगाने के काम आने वाले ट्रक में बना हुआ है...




अब इस ट्रक के अंदर वोन पार्क जैसा क्रिएटिव आदमी कैसे रहता होगा, ये जानने को आप उत्सुक होंगे...वो भी दिखाता हूं, थोड़ा सब्र कीजिए...पहले वोन पार्क की उस कला की छोटी सी झलक फिर देख लीजिए जिसमें उन्होंने एक डॉलर के नोट को फोल्ड कर कर के मास्टरी हासिल कर रखी है...कल अर्चना जी ने सवाल उठाया था कि मैंने फोल्ड कर बनाए गए ऑब्जेक्टस का नाम क्यों लिखा तो आज वो भूल नहीं दोहरा रहा...आज अर्चना जी के साथ आप सब भी मशक्कत कीजिए...वोन पार्क जनाब ने आखिर बना क्या क्या रखा है...














चलिए अब वोन पार्क जनाब के ट्रक मे बने आशियाने के दीदार भी कर लीजिए....

































स्लॉग ओवर

चार साल के गुल्ली को किसी शरारत पर उसकी मां मक्खनी ने जमकर कूटा...

गुल्ली मुंह फुला कर पिता मक्खन के पास जाकर बोला...

डैडी जी, डैडी जी, बस बहुत हो गया...

अब मैं आपकी वाइफ़ के साथ और ए़डजस्ट नहीं कर सकता...


मुझे आज ही मेरी पर्सनल वाइफ़ चाहिए...

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

एक नोट से क्या-क्या कमाल...खुशदीप

आज एक ई-मेल मिला...उसमें जापान की एक बेहद खूबसूरत कला से परिचय कराया गया है...आप अपनी आंखों से देखेंगे तो खुद वाह कर उठेंगे...इस कला का नाम है ओरिगेमी...जापान की पेपर फोल्डिंग की अद्भुत कला...इसमें कागज़ के अकेले टुकड़े से फोल्डिंग के ज़रिए तरह-तरह के मॉडल बनाए जाते हैं...न किसी गोंद का इस्तेमाल और न ही कागज़ को कहीं से काटा जाता है...


इस पोस्ट में आपको ओरिगेमी के मास्टर वोन पार्क की बेजोड़ प्रतिभा से रू-ब-रू करवाता हूं...मनी-फोल्डर के नाम से मशहूर इन महाशय का कैनवास अमेरिका का एक डॉलर का नोट है...इस एक नोट को फोल्ड दे दे कर ये महाशय क्या-क्या बना सकते हैं, आप खुद ही देखिए...हां एक बात और बताता चलूं कि इन जनाब ने अपना घर एक ऐसे ट्रक को बनाया हुआ है जो कूड़ा उठाने के काम आता है...वोन पार्क के आशियाने की सैर कल की पोस्ट में कराउंगा, आज बस उनके हाथ का हुनर देखिए...

मछली






तितली





                                    कैमरा  
 
 



   
  
ड्रैगन






 केकड़ा 





 जैकेट




 टॉयलेट सीट




पेंगुइन







बैटल टैंक





जेट




स्लॉग ओवर


शराबी टुन होकर अपनी किस्मत को कोस रहा था....

पहली खाली बोतल गुस्से में दे ज़मीन पर मारी...साथ ही बोला...तेरी वजह से मेरी नौकरी गई...

दूसरी खाली बोतल भी दे मारी...बोला...तेरी वजह से बीवी मुझे छोड़ कर चली गई...

तीसरी भरी हुई बोतल हाथ आ गई...उसे ज़मीन पर मारते-मारते रुक गया...फिर गले से लगाकर बोला...एक तू ही तो है जो मेरा हर दुख में साथ देती है... 

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

ब्लॉगिंग को देखा तो ये ख्याल आया...खुशदीप

ब्लॉगिंग को देखा तो ये ख्याल आया,

जिंदगी धूप, ब्लॉगिंग घना साया,
ब्लॉगिंग को देखा....



न कुछ लिखें, आज फिर दिल ने ये तमन्ना की है,
आज फिर दिल को हमने समझाया,
जिंदगी धूप, ब्लॉगिंग घना साया...




ब्लॉगवाणी चली गई तो सोचा,
हमने क्या खोया, हमने क्या पाया,
जिंदगी धूप, ब्लॉगिंग घना साया...




हम जिससे दामन चुरा नहीं सकते,
वक्त ने हमको नेट से क्यों मिलाया,
जिंदगी धूप, ब्लॉगिंग घना साया...


 
ब्लॉगिंग को देखा तो ये ख्याल आया....
 
 
चलते चलते जगजीत सिंह साहब और चित्रा जी का ओरिजनल गीत भी सुन लीजिए...

तुमको देखा तो ये ख्याल आया...


बुधवार, 14 जुलाई 2010

बच्चे हैं या बाप रे बाप...खुशदीप

स्पाइडरमैन...




सारे घर के बदल डालूंगा...




 चॉकलेट की बच्ची तू छिपी है कहां...



                                                                  

छलकाए जाम, आइए आपकी आंखों के नाम...



प्रेम की धारा बहाते चलो...