सोमवार, 31 मई 2010

आदिवासियों को जीने का हक़ थोड़े ही है...खुशदीप

कल मैंने एक सवाल पूछा था...आदिवासियों का नेता कौन...कोई साफ़ जवाब नहीं आया...ले दे कर एक नाम गिनाया गया शिबू सोरेन...तो जनाब शिबू सोरेन के नाम में ही सब कुछ छुपा है...क्या ये अपने आप में ही भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा प्रहसन नहीं है कि शिबू सोरेन को आदिवासियों का रहनुमा माना जाता है...ये वही शिबू सोरेन है जिन पर नब्बे के दशक के शुरू में नरसिंह राव की सरकार बचाने के लिए जेएमएम के सांसदों की करोड़ों में बोली लगाने का आरोप लगा था...ये वही शिबू सोरेन हैं जो सत्ता में बने रहने के लिए कभी बीजेपी तो कभी कांग्रेस से हाथ मिलाते हैं...झारखंड छोड़ना भी चाहते हैं तो सिर्फ इसी शर्त पर कि केंद्र में खुद कैबिनेट मंत्री बन जाएं और झारखंड में सीएम की गद्दी बेटे हेमंत सोरेन को मिल जाए...पॉलिटिकल सर्कस में उनकी इन कलाबाज़ियों से बेचारे आदिवासियों का कितना भला होता है, आप खुद ही अंदाज़ लगा सकते हैं...


और शिबू सोरेन को अकेले ही क्यों दोष दें, आज़ादी के बाद ऐसी कौन सी पार्टी है जिसने आदिवासियों के हक पर डाका नहीं डाला...इसमें सबसे पहला नंबर तो कांग्रेस का ही आता है...आदिवासी का देश में क्या मायने होता है, इसके लिए हमें सबसे पहले संविधान के पांचवी समवर्ती सूची (फिफ्थ शेड्यूल्ड एरिया) को समझना होगा....संविधान निर्माताओं को पहले से ही अंदेशा था कि आदिवासियों को उनका वाजिब हक देने में राज्य सरकारें आनाकानी करेंगी, इसलिए उन्होंने साफ कर दिया था कि फिफ्थ शेड्यूल्ड एरिया के प्रशासन के लिए राज्य सरकारों को निर्देश देने का केंद्र सरकार को अधिकार है...यानि संविधान निर्माता मानते थे कि आदिवासियों के हितों के खिलाफ़ काम होगा और सरकारों का रवैया उनके प्रति असंवेदनशील रहेगा...देश में छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड वो राज्य हैं जिनमें फिफ्थ शेड्यूल्ड यानि आदिवासी इलाके आते हैं...एक नज़़र इस पर डालिए कि यहां किन-किन पार्टी की सरकारें हैं...कांग्रेस, बीजेपी, एनसीपी, जेडीयू, बीजेडी, वाम मोर्चा, जेएमएम...यानि राजनीति की कोई ऐसी धारा नहीं बचती जो इन राज्यों में कहीं न कहीं सरकार न चला रही हो...लेकिन इन सभी राज्यों में एक कॉमन फैक्टर है कि आदिवासी हर जगह बदहाल हैं...यानि और किसी मुद्दे पर हो न हो आदिवासियों को बदहाल रखने पर देश में अघोषित तौर पर राजनीतिक सहमति है...



करीब डेढ़ दशक पहले केंद्र सरकार ने पंचायत (एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरिया) एक्ट यानि पेसा एक्ट के तहत पूरे देश में आदिवासी इलाकों के प्रशासन को एकसूत्र में बांधने की कवायद की...इस एक्ट को अपनी-अपनी विधानसभाओं में राज्य सरकारों ने मंज़ूरी भी दी...लेकिन ये सब कागज़ी खानापूर्ति के लिए ही हुआ...जब आदिवासियों को हक देने का सवाल उठा तो सभी राज्य सरकारे कन्नी काट गईं...और केंद्र भी कानों में तेल डालकर सोता रहा...ये हक़ीक़त है कि माओवादियों का जहां जहा भी असर है वो सभी फिफ्थ शेड्यूल्ड वाले यानि आदिवासी इलाके ही हैं...आदिवासियों पर मार दुधारी है...एक तरफ सरकार ने उन्हें विकास से वंचित रखा...दूसरी तरफ माओवादी अपने हितों के लिए उन्हें ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं...अगर ऐसा न होता और माओवादी सच में ही आदिवासियों के खैरख्वाह होते तो नक्सली हिंसा में आम आदमी या सीआरपीएफ के आधे-अधूरे ट्रेंड जवान ही निशाना क्यों बनते...माओवाद से प्रभावित छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में राजनेता, उद्योगपति, खनन मालिकों का धंधा बेरोकटोक क्यों चलता रहता है...आरोप ये लगते रहे हैं कि इन इलाकों में कोई भी चुनाव बिना माओवादियों की मदद लिए जीता नहीं जा सकता...ज़ाहिर है इसके लिए पर्दे के पीछे कोई सौदेबाज़ी होती होगी...नोटों का मोटा खेल होता होगा...छत्तीसगढ़ के बस्तर से ही एक सांसद के पुत्र को माओवादियों ने अपनी गोली का निशाना बनाया...उसके पीछे भी राज़ यही बताया जाता है कि कहीं सांसद की ओर से माओवादियों से चुनाव के वक्त किए गए समझौते का उल्लंघन हुआ था...

अब बताता हूं कि पेसा एक्ट के तहत आदिवासियों के लिए क्या प्रावधान किया गया है...इसके तहत भारत निर्माण, मनरेगा (महात्मा गांधी नेशनल रोज़गार गांरटी योजना), गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, पंचायत कार्यक्रम आदि के लिए जो भी केंद्र सरकार से पैसा मिलता है उसका एक तिहाई हिस्सा फिफ्थ शेड्यूल्ड यानि आदिवासी इलाकों को मिलना चाहिए...आज की तारीख़ में ये रकम जोड़ी जाए तो पूरी पचास हज़ार करोड़ रुपये बैठती है...यानि आदिवासी इलाकों की बदहाली दूर करने के लिए केंद्र सरकार आज की तारीख़ में एक भी पाई अलग से न दे, बस फिफ्थ शेड्यूल्ड एरिया के हक का पैसा ही उन्हें दे दिया जाए तो समूचे देश के आदिवासी इलाकों की तस्वीर बदल सकती है...इस पैसे के ज़रिए होने वाला विकास ही माओवादियों के मुंह पर सबसे करारा तमाचा होगा...आदिवासियों की एक बड़ी शिकायत है कि अंग्रेज़ों के ज़माने के इंडियन फारेस्ट एक्ट 1927 से लेकर आधुनिक भूमि सुधार कानून भी उनके खिलाफ है जबकि सारे कानून खनिज संसाधनों को बटोरने में लगी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हक में है..आदिवासियों को लेकर जब संविधान की अनदेखी की जा रही है तो फिर किस मुंह से सरकार खुद को आदिवासियों की रहनुमा बताती है और अपनी सारी कार्रवाई माओवादियों के खिलाफ़ होने का दावा करती है...

कल आपको बताऊंगा आदिवासियों के जंगलमहल का सच...

शनिवार, 29 मई 2010

एक सवाल का जवाब दीजिए...खुशदीप

देश में भारी बहस छिड़ी है...आतंकवाद को पीछे छोड़ते हुए माओवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है...लेकिन हमारी सरकार तय ही नहीं कर पा रही है कि माओवाद से निपटना कैसे है...ये सिर्फ कानून और व्यवस्था का मामला है...या इससे सामाजिक और आर्थिक विकास जैसे पहलू भी जुड़े हुए हैं...पश्चिम बंगाल के झारग्राम में हावड़ा से मुंबई जा रही ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस में 131 यात्री रात को सोते-सोते ही काल के मुंह में चले जाते हैं...सैकड़ों घायल हो जाते हैं...लेकिन सरकार तय ही नहीं कर पाती कि ये माओवादियों की जघन्य करतूत थी या महज़ एक रेल हादसा...



ममता बनर्जी पहले विस्फोट की बात कहते हुए पश्चिम बंगाल सरकार को कटघरे में खड़ा करती हैं...कानून और व्यवस्था को राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी बताती हैं...तभी वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का बयान आता है कि गड़बड़ी या विस्फोटक जैसी कोई बात सामने नहीं आई है, इसलिए ये सिर्फ एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसा है...एक थ्योरी फिश प्लेट उखाड़े जाने की भी है...

वाकई स्थिति विस्फोटक हो चली है और नेता अपने हितों के हिसाब से बयान दे रहे हैं...ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल के कई ज़िलों में 30 मई को होने वाले स्थानीय निकाय के चुनाव अहम नज़र आ रहे हैं...कांग्रेस से उनका गठबंधन हुआ नहीं...ये किसी से छुपा नहीं कि ममता बनर्जी हर हाल में 2011 के विधानसभा चुनाव में कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग से लेफ्ट का लाल परचम उतार कर तृणमूल की हरी पत्तियों का कब्जा कराना चाहती हैं...उनके लिए केंद्र में रेल मंत्री की गद्दी पश्चिम बंगाल के सीएम की कुर्सी तक पहुंचने के लिए महज़ एक जरिया है...इसलिए कोई बड़ी बात नहीं कि वो आने वाले दिनों में रेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देकर खुद को पश्चिम बंगाल के लोगों के सामने शहीद की तरह पेश करें...

ये साफ है कि देश में जाति, भाषावाद, प्रांतवाद, धर्म की राजनीति करने वाले नेता बहुत हैं...मसलन

मराठी- बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे तो साफ तौर पर मराठी कार्ड खेलते हैं, लेकिन मुंह से कुछ भी बोलें शरद पवार, अशोक चव्हाण, विलास राव देशमुख, आर आर पाटिल जैसे नेता भी वोट बैंक के चलते मराठियों की नाराज़गी मोल नहीं ले सकते...

गुजराती- नरेंद्र मोदी किसी भी मंच से गुजराती अस्मिता का हवाला देना नहीं भूलते...

तमिलनाडु- करुणानिधि की राजनीति कट्टर तमिल समर्थक की है, वहीं जयललिता की राजनीति करुणानिधि विरोध की बेशक हो लेकिन तमिल कार्ड वो भी जमकर खेलती हैं..

कर्नाटक- एच डी देवेगौड़ा कन्नड का सवाल गाहे-बगाहे उठाते रहते हैं

आंध्र- तेलंगाना को लेकर के चंद्रशेखर राव ने झंडा उठा रखा है...अब उसी तेलंगाना के विरोध में शेष आंध्र का रहनुमा बनने की कोशिश वाईएसआर के बेटे जगन मोहन रेड्डी कर रहे हैं...

पंजाब- पा की तर्ज पर प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर बादल की जोड़ी अकाली राजनीति की अलम्बरदार है

जम्मू-कश्मीर- एक तरफ अब्दुल्ला परिवार, दूसरी तरफ मुफ्ती सईद और महबूबा मुफ्ती की बाप-बेटी की जोड़ी कश्मीरियों के सबसे बड़े खैरख्वाह होने का दम भरते हैं

ओबीसी- मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, शरद यादव, छगन भुजबल, गोपीनाथ मुंडे

दलित- मायावती, राम विलास पासवान, उदित राज

ठाकुर- अमर सिंह, राजनाथ सिंह, राजा भैया

गुर्जर- कर्नल के एस बैंसला

मीणा- किरोड़ी लाल मीणा

किसान- महेंद्र सिंह टिकैत, शरद जोशी

आम आदमी की दुहाई देने में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और बीजेपी के सारे राष्ट्रीय नेता कहीं पीछे नहीं है...

लेकिन मुझे आपसे सिर्फ एक सवाल पूछना है कि देश में आदिवासियों की बदहाली की बात करने वाला कौन सा नेता है या आज़ादी के बाद 63 साल में आदिवासियों का कौन सा मज़बूत नेतृत्व देश में सामने आया...

इस सवाल के जवाब के बाद देश की सबसे ज्वलंत समस्या पर बहस के लिए आगे बढ़ेंगे...

ग्लोबेलाइजेशन विद ड्यू रिस्पेक्ट टू प्रिंसेज़ डायना...खुशदीप

ग्लोबेलाइज़ेशन या वैश्वीकरण क्या है...

पिछले दो दशक से हम ग्लोबेलाइज़ेशन की हवा देश में बहते देखते आ रहे हैं...लेकिन मुझे इसकी सही परिभाषा अब जाकर समझ आई है...वो भी ब्रिटेन की मरहूम प्रिंसेज डायना के ज़रिए...प्रिंसेज डायना की मौत में ही छुपी है ग्लोबेलाइजेशन की सही परिभाषा...आप कहेंगे वो कैसे...तो जनाब मैं कहूंगा वो ऐसे...


1 जुलाई 1961 – 31 अगस्त 1997

एक अंग्रेज़ प्रिंसेज अपने इजिप्शियन बॉय फ्रैंड डोडी फयाद के साथ फ्रैंच टनल में हुए हादसे में मारी गईं...हादसे के वक्त वो जर्मन कार पर सवार थीं जिसका इंजन डच था...इस कार को चलाने वाला बेल्जियन ड्राइवर था जो स्कॉटिश विह्स्की के नशे में टुन्न था...कार को अंधाधुंध दौड़ाने की वजह से हादसा हुआ, क्योंकि उसके पीछे जापानी मोटरसाइकलों पर इटालियन पैपारैज़ी (ज़बरदस्ती के फोटोग्राफर) लगे हुए थे...हादसे के बाद गंभीर रूप से घायलों का अमेरिकन डॉक्टर ने ब्राजीली दवाओं से इलाज किया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और किसी को बचाया नहीं जा सका...

ये संदेश आप तक बिल गेट्स की टैक्नोलॉजी के ज़रिए पहुंच रहा है...आप जिस कंप्यूटर पर इसे पढ़ रहे हैं उसमें चाइनीज़ चिप्स हैं और कोरियन मॉनीटर है, जिसे किसी बांग्लादेशी ने सिंगापुर के प्लांट में असेंबल किया है...इसका ट्रासंपोर्टेशन पाकिस्तानी लॉरी ड्राइवरों ने किया...फिर इंडोनेशियाईयों ने इसे हाईजैक कर लिया और सिसिली के नाविकों ने तट पर उतारा...वहां से मैक्सिको के अवैध रूट से इसे आगे पहुंचाया गया...


आप इसे हिंदी में पढ़ने में समर्थ हैं यानि हो गया न इंडियन कनेक्शन...

शुक्रवार, 28 मई 2010

घिसे हुए ब्लॉगर्स कौन...खुशदीप

डॉ अमर कुमार जी का आदेश हुआ है कि मैं घिसे हुये ब्लॉगर को परिभाषित करने वाली एक मौज़दार पोस्ट लिखूं...आदेश सर माथे पर...

इस तरह एट रैंडम टॉपिक पर लिखना बड़ा मुश्किल होता है, फिर भी कोशिश करता हूं...वैसे ये क्लियर कर देता हूं कि मैंने पिछली पोस्ट पर ज़िक्र किया था कि घिसे हुए ब्लॉगर्स (मैं भी शामिल) की जगह सिर्फ जवां ख़ून ब्लॉगर्स की बात करूंगा कि उन्होंने नांगलोई ब्लॉगर्स मीट में क्या क्या कहा था...अब डॉ अमर कुमार जी से ज़्यादा घिसा हुआ ब्लॉगर कौन होगा (पुरातत्व विभाग चाहे तो रिसर्च करा सकता है)... झट से मेरी बात पकड़ ली और ठोक दिया आदेश...मरता क्या न करता, अब लिखना तो पड़ेगा ही...लिखना भी ऐसे पड़ेगा कि ब्लॉगर्स की घिसाई भी समझा दूं और किसी की रूसवाई भी मोल न लूं...

पहले एक किस्से के ज़रिए घिसे हुए माल और फ्रेश माल का फर्क समझाने की कोशिश करता हूं...

मैंने सबसे पहले एक बड़े अखबार में ट्रेनी के तौर पर काम शुरू किया...नया नया मुल्ला था, इसलिए अल्लाह अल्लाह तो ज़्यादा करना ही था...तनख्वाह जीरे जितनी मिलती थी और काम ऊंट जितना लिया जाता था...ये भी देखता था कि जो घिसे हुए पत्रकार थे, बस कुर्सी पर टांग पे टांग चढ़ा कर हम जैसे रंगरूटों पर बस ऑर्डर झाड़ने का काम किया करते थे...जब दो घिसे हुए आपस में बात करते थे तो बस वेतन आयोग, बोनस, इन्सेंटिव, इन्क्रीमेंट की ही बात करते थे...काम के लिए तो हम जैसे बेगार के पठ्ठे मौजूद थे ही...मैं देख रहा था कि संस्थान में हम जैसे जवां पठ्ठे बढ़ते ही जा रहे थे...और ऊपर से आदेश झाड़ने वाले घिसे हुए महानुभाव कम होते जा रहे थे...वो कहते हैं न सेर के ऊपर भी सवा सेर होता है...अखबार के स्थानीय संपादक मालिकों के परिवार में से ही एक सदस्य थे...वो एक दिन संस्थान के एचआर इंचार्ज से कह रहे थे...बैल जैसे जैसे बूढ़ा होता जाता है, चारा ज़्यादा मांगता है, काम करने के लिए कहो तो ना में नाड़ हिला देता है...इसलिए संस्थान में घिसे हुए बैल बस ज़रूरत जितने ही रखो बाकी उनके ज़रिए सारा काम नए बैलों से निकलवाओ...उस वक्त तो मैं ये बात नहीं समझा था लेकिन तज़ुर्बा बढ़ने के साथ बात की गहराई समझता गया...



वैसे घिसे हुओं का एक और शौक भी होता है, जब ये घिस घिस कर घीस की तरह ही घुपले घुपले हो जाते हैं तो खुद तो इनमें भिड़ने का स्टैमिना रहता नहीं, लेकिन दिमाग और तलवार की धार की तरह तेज़ हो गया होता है...फिर इन्हें नए बैलों को आपस में भिड़ा कर या अपने जैसे ही दूसरे घीसों के खेमों में चोंच मरवाने में मज़ा आने लगता है...साथ ही वैसा शोर करते हैं जैसे कि दो मुर्गों की लड़ाई के वक्त उनके मालिक मचाते हैं..

स्लॉग शेर

रंग लाती है हिना पत्थर पर पिस जाने के बाद,


सुर्ख रूह होता है इनसान, ठोकरें खाने के बाद..

गुरुवार, 27 मई 2010

GNIBM...अब तो आएंगे स्टार ब्लॉगर...खुशदीप

मैंने अपनी पोस्ट पर स्टार ब्लॉगर को न्योता देने का ज़िक्र तो किया था...लेकिन नाम नहीं खोला था...नाम किशोर अजवाणी भाई ने खुद ही पहले मेरी पोस्ट पर कमेंट के ज़रिए और फिर अपनी पोस्ट पर खोला...जी हां, वो स्टार ब्लॉगर किशोर अजवाणी ही थे...इनका अपना एक बिंदास स्टाइल है...जो ठान लिया सो ठान लिया...जो नहीं पसंद सो नहीं पसंद...नांगलोई नहीं जाना था तो नहीं आए...लेकिन ये मत मान बैठिएगा कि खुदा हुस्न देता है तो नज़ाकत आ ही जाती है...किशोर अजवाणी दिल के बिल्कुल खरे हैं...लाग लपेट से कोसो दूर...जो अच्छा लगता है उसे दिल खोल सराहते हैं...जो बुरा लगते हैं उसे सपाट मुंह पर कहते हैं...एक बात और काम के लिए इतना समर्पित इनसान मैंने तो अपनी ज़िंदगी में और कोई नहीं देखा...देखने वालों को बेशक स्टार एंकर्स की लाइफ़ फिल्म स्टार्स की तरह ग्लैमरस दिखे लेकिन पर्दे के पीछे इस मकाम तक पहुंचने के लिए कितनी जी-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है, वो मैं अच्छी तरह जानता हूं...

हां तो किशोर भाई नांगलोई और नांगलराय का तो आपने अच्छा पोस्टमार्टम कर दिया...अगली ब्लॉगर्स मीट दिल्ली में गंदा नाला पर रखने का सुझाव अविनाश वाचस्पति भाई को देता हूं...ये जगह देखी तो मैंने भी नहीं लेकिन उसके बारे में सुना ज़रूर है...क्या ख्याल है किशोर भाई आपका...गंदा नाला इंटरनेशनल ब्लॉगर्स मीट यानि GNIBM...

चलो आप इस बारे में सोचो, मैं अब बात करता हूं 23 मई को नांगलोई में हुई आईडीबीएम को जोशोखरोश से भरने वाले जवां ख़ून ब्लॉगर्स की...घिसे हुए ब्लॉगर्स से आज माफी मांगता हूं...आज वन लाइनर्स मे बात सिर्फ ब्लॉगिंग के जोशीले ब्लॉगर्स की...और उन्होंने मीट में क्या कहा था...


योगेश गुलाटी- मीडि़या का सशक्त विकल्प बने ब्लॉग


जय कुमार झा- ब्लॉग लोकसंघर्ष जैसी मुहिमों की आवाज़ बने

उमाशंकर मिश्र- आंदोलन खड़ा करने का माध्यम बने ब्लॉग

सुधीर- पहले उद्देश्य तय हो फिर ब्लॉगर्स का संगठन खड़ा किया जाए

आशुतोष- मुद्दे विशेष पर ब्लॉगर्स अपनी अपनी पोस्ट पर विचार रखें

डॉ प्रवीण चोपड़ा- आरटीआई.ओआरजी.कॉम की तरह इंडियाब्लॉग.ओआरजी.कॉम बनाया जाए

मयंक सक्सेना- जहां जहां भाषा के लिए चिंता है वहां रंगमंच, साहित्य भी मज़बूत है, हिंदी इससे वंचित क्यों है

राजीव रंजन- हिंदी ब्लॉगिंग में परिपक्वता की कमी है

शाहनवाज़ सिद्दीकी- बिना उद्देश्य ब्लॉगिंग ऐसे ही जैसे मछली की आंख की चिंता छोड़ निशाना लगाया जाए

सुलभ सतरंगी- सामाजिक सरोकार की चिंता हर ब्लॉगर को होनी चाहिए...

वेद व्यथित- प्रतिबद्धता और सहृदयता ब्लॉगर की पहचान बनें

आईडीबीएम में अविनाश वाचस्पति के प्रस्तावना संबोधन के बाद एम वर्मा जी, रतन सिंह शेखावत जी, अजय कुमार झा भाई, इरफ़ान भाई, मैं, प्रतिभा कुशवाहा, चीफ गेस्ट संगीता पुरी जी और ललित शर्मा ने भी अपने विचार रखे...लेकिन हम सब अब घिसे हुए ब्लॉगर्स में आते हैं, इसलिए आज बात सिर्फ जोशीले नए ख़ून की...इसके अलावा नीरज जाट, विनोद कुमार पांडे, अमर ज्योति, चंडीदत्त शुक्ल, अंतर सोहिल, एस त्रिपाठी, राहुल राय, अजय यादव, अभिषेक सागर, प्रवीण कुमार शुक्ला ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति से मीट की शोभा बढ़ाई...लेकिन इस मीट में सबको अपना मुरीद बनाने वाला रहा तनेजा परिवार यानि राजीव कुमार तनेजा, संजू तनेजा भाभी और अपने पापा का पॉकेट एडीशन सबका प्यारा माणिक तनेजा...


स्लॉग ओवर

एक बस में काफी भीड़ थी...कंडक्टर जो स्टेशन आ रहा था, उसका नाम लेकर यात्रियों को आगाह कर रहा था...एक स्टेशन से पहले उसने आवाज़ लगाई...चलो, गंदे नाले वाले उतरो...तभी एक बुज़ुर्ग महिला के मुंह से निकला...हाय रब्बा, ऐस मोए नू किवें पता चल्या के मैं सलवार विच गंदा नाला पाया होया वे...( हे भगवान, इस मरे को कैसे पता चला कि मैंने सलवार में गंदा नाला (नाड़ा) डाला हुआ है)....

बुधवार, 26 मई 2010

IDBM के बाद शेरसिंह के मैंने पसीने छुड़ाए...खुशदीप

कल बात की थी इंटरनेशनल दिल्ली ब्लॉगर्स मीट तक पहुंचने की...बैठक की बेटवींस द लाइंस की...हां इस मीट में पुराने अजीज तो मिले ही मिले, कई नए दोस्तों से भी पहली बार रू-ब-रू हुआ...इन सभी दोस्तों का कल अपनी पोस्ट में यथा स्मरण शक्ति ज़रूर ज़िक्र करने की कोशिश करूंगा...आज बात सिर्फ शेर सिंह की...यानि ललित शर्मा की...

कल मैंने आपसे वादा किया था कि आज की पोस्ट में बतलाऊंगा कि शेर सिंह से मैंने किस तरह बदला लिया...हां तो जनाब ब्लॉगर्स मीट खत्म हो गई...सब जाट धर्मशाला के बाहर एक दूसरे से विदा लेने लगे...इस विदा की बेला में ही शेर सिंह जी ने बड़ी मासूमियत से मुझसे कहा...आस पास कोई होटल बता दो, जहां रहने का इंतज़ाम हो सके...मेरे मुंह से निकला, अजी क्या होटल-वोटल, चलिए न मेरे साथ ही नोएडा...मेरे घर पर ही ठहरिए...शेर सिंह जी तैयार हो गए...लेकिन अब मैं सोचने लगा कि शेर सिंह जी को तैयार तो कर लिया, लेकिन घर पर तो किसी को कहा ही नहीं...अरे एक तो मेरा एक हज़ार फुट का घर, ऊपर से मेरे लिए बनने वाला स्पेशल घासफूस वाला खाना (जिसे आप हरी सब्ज़ियां कहते हैं)...अब शेर सिंह जी साथ है तो घर इन्फॉर्म कर कुछ तो फॉर्मेल्टी पूरी करनी ही थी न...मैंने पत्नीश्री को बताया...साथ ही कहा कि मैं और शेर सिंह जी मॉल में खाना खाने के बाद ही घर पहुंचेंगे...लेकिन पत्नीश्री ने भरोसा दिलाया कि चिंता की कोई बात नहीं, खाना घर आकर ही खाना...तो चलिए एक तरफ से बेफिक्र हुआ...

अब एक और फिक्र थी...मुझे अच्छी तरह याद था कि मैं और इरफ़ान भाई नोएडा से किस तरह चार-चार मेट्रो बदल कर नागंलोई पहुंचे थे...तो क्या अब वापसी में शेर सिंह जी को साथ लेकर नोएडा पहुंचने के लिए वही क्रम दोहराना होगा...ऊपर से रात भी होने को आ रही थी...वो तो भला हो शेर सिंह जी के एक दोस्त पंकज (अगर मेरी याद्दाश्त सही है तो) ने अपनी नई नकोर गाड़ी से हमें कीर्ति नगर स्टेशन तक छोड़ दिया...वहां से हम तीनों (मैं, इरफ़ान भाई, शेर सिंह) ने मेट्रो पकड़ ली...ये भी नहीं देखा कि वो मेट्रो नोएडा जा रही है या आनंद विहार...बस तीनों देश के मसलों को चुटकियों में सुलझाते जा रहे थे कि बातों में कोई सुध ही नहीं रही...ये तो यमुना बैंक स्टेशन जाकर इरफ़ान भाई को इल्म हुआ, अरे ये मेट्रो नोएडा नहीं आनंद विहार जा रही है...कूदते-फांदते किसी तरह मेट्रो के डब्बे से बाहर निकले...इरफ़ान भाई सही वक्त पर न चेताते तो तीनों आनंद विहार पहुंच जाते...

अब यमुना बैंक से नोएडा के लिए मेट्रो पकड़ी...इरफ़ान भाई का घर रास्ते में मयूर विहार में आता है तो वो मयूर विहार स्टेशन पर उतर गए...मैं और शेर सिंह जी नोएडा के सेक्टर 18 स्टेशन पर उतरे...मैंने दिमाग चलाया कि पत्नीश्री ने खाने में सब कुछ बना ही लिया होगा, मैं शाही पनीर और लेता चलूं...सेक्टर 18 स्टेशन के नीचे ही एक सरदार जी का गुलाटीस के नाम से माडर्न ढाबा है...वहीं से शाही पनीर पैक कराया...मैंने अपना चेतक (राणा प्रताप वाला घोड़ा नहीं बजाज का स्कूटर) सेक्टर 18 में ही पार्क किया हुआ था...हम स्कूटर की ओर बढ़ रहे थे कि रास्ते में लोअर और शार्टस (नेकर) वगैरहा बिक रहे थे...अचानक शेर सिंह के दिमाग की बत्ती जली...बोले अरे मैं अपना लोअर तो पिछली रात गुड़गांव में जहां ठहरा था वहीं भूल आया हूं...शेर सिंह जी ने वहीं लोअर खरीदने की इच्छा जताई...मैंने सलाह दी, यहां क्वालिटी सही नहीं मिलेगी और दाम भी ज़्यादा देने पड़ जाएंगे...अभी घर पर सामान रखकर ग्रेट इंडिया प्लेस मॉल चलते हैं, वहीं बिग बाज़ार से लोअर भी खरीद लेंगे...

खैर घर पहुंचकर सामान रखा...पत्नीश्री से कहा...खाना तैयार रखो...हम अभी आते हैं...पत्नीश्री और बच्चों के संडे को पूरी तरह कुर्बान कर अब भी बाहर जाने की बात कर रहा था...खैर फ्रेश होकर मैं और शेरसिंह जी मॉल पहुंचे...वहां आधुनिकता की बयार देखकर शेरसिंह जी की हैरत को दूर करते हुए मैंने कहा कि अब पहनावे के मामले में पश्चिमी देशों में और नोएडा जैसे आधुनिक शहरों में कोई फर्क नहीं रहा...शेर सिंह जी को लेकर सबसे पहले बिग बाज़ार ही गया...वहां XXL लोअर ढूंढने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी...पूरा मॉल नापने के बाद दोनों ने आइसक्रीम के कोन लिए और वही बेंच पर बैठकर चट करने लगे...तभी शेर सिंह जी ने इस पल को कैद करने के लिए कैमरा निकाला...मैं तो खैर आइसक्रीम के चटखारे लेने में पूरी तरह व्यस्त था...शेर सिंह जी खुद ही कैमरे से फोटो लेने की कोशिश करने लगे...कभी फोटो में हमारी मुंडी कट जाती तो कभी आइसक्रीम...कभी दोनों के आधे-आधे चेहरे ही आ पाते...बड़ी मशक्कत के बाद शेरसिंह जी को ये मनमुआफिक फोटो मिल सकी...



मॉल से घर लौटने के बाद खाना खाया...मेरे से भी ज़्यादा जल्दी लैपटॉप तक पहुंचने की शेर सिंह जी को थी...तब तक ब्लॉगर्स मीट की कुछ फोटो वाली पोस्ट आ चुकी थीं...मैंने शेर सिंह जी से अपनी आदत के मुताबिक कहा, चलिए नीचे टहल कर आते हैं...नीचे टहलने आए तो वाडीलाल से जलजीरा वाली जूसी लेकर फिर चटखारे लेने लगे...लेकिन गर्मी ज़्यादा होने की वजह से शेर सिंह जी की जूसी जल्दी ही बीच से दो टुकड़े हो गई...बड़ी मुश्किल से उन्होंने उसे खत्म किया...

अब घर लौटने लगे तो ये क्या पूरे सेक्टर की बत्ती गुल...मैं समझ गया कि अब ये बत्ती कम से कम एक घंटे से पहले नहीं आने वाली...तब तक बारह बज गए थे...घर के इनवर्टर की बैटरी में इतनी ही जान बची थी कि मुश्किल से आधे घंटे तक ही एक पंखे का ही लोड खींच सके...मैंने कॉलोनी के पार्क के बाहर बेंच पर ही शेर सिंह जी से बैठने का आग्रह किया...मैंने सोचा किसी तरह घंटा यही बिताकर लाइट आने पर ही घर वापस चला जाए...दोनों बातें करना शुरू हुए...ललित भाई ने कुछ तकनीकी बातें बतानी शुरू की...मेरे थके हुए दिमाग के ऊपर से वो बातें ऐसे जा रही थीं जैसे रितिक रोशन की काइट्स...

एक घंटा बीता, डेढ़ घंटा बीता, दो घंटे बीते लेकिन बत्ती आने के कहीं कोई चांस नहीं...मैंने शेर सिंह जी से कहा...कब तक यहां बैठे मच्छरों को फ्री में अपना रक्तदान करते रहेंगे, चलिए घर ही चलते हैं...वहीं बॉलकनी में बैठेंगे...अब बेंच से उठकर घर की बॉलकनी की कुर्सियो पर आ गए...यहां भी एक घंटा बिता दिया...लेकिन निगोड़ी बत्ती फिर भी रूठी रही...रात के ढाई बजने को आ गए...मैंने कहा चलिए शेर सिंह भाई सोने की कोशिश कीजिए, ये बत्ती तो आज आने से रही...अब जनाब सोने के लिए चले गए...हमारे सब्र का पूरी तरह इम्तिहान लेने के बाद बत्ती रानी को भी दया आ ही गई...मैंने चैन की सांस ली...लेकिन तब तक शेर सिंह जी के अच्छी तरह पसीने छूट चुके थे...तो ये था मेरा बदला, जिसके लिए मैंने अपनी तरफ से कोई कोशिश नहीं की सब काम बत्ती रानी ने ही कर दिया...अगले दिन मैंने आठ हज़ार रुपये शहीद कर सबसे पहला काम इन्वर्टर की बैट्री बदलने का किया...वही काम जिसे पत्नी कई दिनों से कहती आ रही थी और मैं आदत के मुताबिक आज-कल, आज-कल करता आ रहा था...

एक बात और शेर सिंह जी के साथ मैं जितनी देर रहा, उनके बारे में यही अंदाज़ लगा सका कि ब्लॉगिंग में उनके प्राण बसे हैं...इंटरनेट के बिना उनकी हालत वैसे ही है जैसे मछली को पानी से बाहर निकाल दिया जाए...

मंगलवार, 25 मई 2010

IDBM : अंदर की बातें...खुशदीप

आप कह रहे होंगे ये  IBM तो सुनी है, ये मैं कौन सी नई कंपनी ले आया...IDBM... तो ये है जनाब- इंटरनेशनल दिल्ली ब्लॉगर्स मीट...अब तक आप सोच रहे होंगे कोई ऐसी बात नहीं रह गई जो इस मीट में शिरकत करने वाले ब्लॉगर्स ने आप तक न पहुंचा दी हो, वो भी फोटू समेत...फिर मैं कौन सा कद्दू में तीर मारने बैठा हूं...

दो-तीन से तबीयत ढीली है, इसलिए कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था...भाई कुमार जलजला के साथ शब्दों की जुगाली करते वैसे ही मेरा स्टैमिना बोल गया था...ऊपर से भीषण गर्मी...और मीट भी दिल्ली के सुदूर कोने नांगलोई में...मन भी भारी था और सोच-सोच कर हिम्मत भी जवाब दे रही थी...लगता है मीट से पहले जैसे तनाव में मैं था, कुछ वैसे ही तनाव से भाई अजय कुमार झा भी गुज़र रहे थे...ब्लॉगिंग में जो चल रहा है वो मेरे कदमों को नांगलोई की ओर बढ़ने से रोक रहा था...लेकिन अविनाश वाचस्पति जी का बड़े भाई वाला स्नेह युक्त आदेश और राजीव कुमार तनेजा की छोटे भाई सी हठ मेरी हिचक पर भारी पड़ी...ऊपर से गुरुदेव समीर लाल समीर जी और राज भाटिया जी का सात समंदर पार से ही मार्गदर्शन...मैंने तबीयत की चिंता छोड़ी और जाने का पक्का इरादा कर लिया...ऐसे में विदेश घूमने गए सतीश सक्सेना भाई बड़े याद आए...वो होते तो उन्हीं की गाड़ी पर लद लेता...खैर, ऐसे मौके पर काम आए दुनिया को अपने कार्टून्स से गुदगुदाने वाले इरफ़ान भाई... 

इरफ़ान भाई को रविवार को बड़ा ज़रूरी काम था...लेकिन मेरे आग्रह को वो टाल नहीं सके...हां, मज़े की बात एक और है, मैंने एक और स्टार ब्लॉगर को भी फोन किया था...रविवार को उनकी भी छुट्टी रहती है...उन्होंने पूछा, चलना कहां है...मैंने कहां...नांगलोई जाट धर्मशाला...उन्होंने ये नाम सुनते ही जय राम जी कर लेना ही बेहतर समझा...मैं भी सोचने लगा कि अगर सीपी, जीके, साउथ एक्स या डेफकॉल (डिफेंस कॉलोनी), केनाग (कमला नगर) की तरह मैं भी नांगलोई जाट को एनजे बताता तो शायद वो स्टार ब्लॉगर मीट में चलने को तैयार हो जाते....तो जनाब, इरफान भाई से तय टाइम के मुताबिक मेट्रो में भेंट हुई...अब हम पहले नोएडा से राजीव चौक...वहां से मेट्रो बदल कर कश्मीरी गेट...वहां से मेट्रो बदल कर इंद्रलोक और वहां से आखिरी मेट्रो बदलकर नांगलोई रेलवे स्टेशन...हमारी तुलना में शायद संगीता पुरी जी के लिए बोकारो और ललित शर्मा भाई के लिए रायपुर से नांगलोई आना भी आसान रहा होगा...नांगलोई रेलवे स्टेशन पर उतरते ही राजीव तनेजा भाई अपनी फटफटिया पर हमारी अगवानी के लिए खड़े थे...लाल टी शर्ट में सजे...

अब आगे राजीव भाई, बीच में इरफ़ान भाई और सबसे पीछे मैं फटफटिया पर लद-फद कर मीटिंग स्थल पहुंचे...आप खुद ही सोचिए हम तीनों का एक ही फटफटिया पर  सवारी गांठना, क्या ऐतिहासिक नज़ारा रहा होगा...लो जी पहुंच गए ब्लॉगर्स मीट...अब ब्लॉगर्स मीट में कौन-कौन था, क्या क्या फैसले हुए, क्या क्या प्रस्ताव हुए...इन सब के बारे में तो आप अब तक अविनाश भाई, अजय कुमार झा जी समेत मीट में मौजूद सभी ब्लॉगर्स की रिपोर्ट में जान ही चुके होंगे...मैं सिर्फ बिटवीन द लाइंस इस पोस्ट में बताने जा रहा हूं...अंदर पहुंचते ही जूनियर तनेजा जी (माणिक) ने कोल्ड ड्रिंक मेरे हवाले की...एक ही सांस में गटक गया...(बिना शुगर लेवल बढ़ने की परवाह किए)...

मीट जवां हो रही थी...विचारों का प्रवाह पूरी रवानगी पर आ रहा था...तभी एक-एक खाने का विशालकाय पैकेट सभी ब्लॉगर्स की कुर्सियों पर आ चुका था...गुलाब जामुन, कलाकंद, कराची हलवा टाइप एक और मिष्ठान, समोसा, ब्रेड पकोड़ा और चटनी ..टेबल पर बिस्किट की प्लेट, गर्मागर्म चाय, और ठंडा यानि कोकाकोला लगातार सर्व हो रहा था...मैंने नज़रे बचा कर मीठे पर सबसे पहले हाथ साफ किया...घर पर मीठे की शाही मौज पर बैन जो है...लेकिन मुझे नहीं पता था कि फड़कती मूछों वाले शेरसिंह (ललित शर्मा) की नज़रें मेरे पर ही थीं...उन्होंने अपना मीठा तो मेरठ का ही नाम रौशन करने वाले नीरज जाट के हवाले कर दिया था...लेकिन वो लगातार यही देख रहे थे कि मैं अपने मीठे का क्या करता हूं...मैं तो मीठा गप कर ही चुका था....फिर ठंडे से गला तर करने के लिए राजीव तनेजा भाई ने बर्फ का जमा कोकाकोला मेरे हवाले किया तो ललित भाई से रहा नहीं गया...मुझे टोक ही दिया...लिए जाओ, लिए जाओ जितनी मौज ली जा सकती है...मैं सुनकर सकपकाया...लेकिन अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत...लेकिन मैंने भी ठान लिया शेरसिंह जी से बदला ज़रूर लूंगा...और वो मैंने ले लिया...कैसे ये कल की पोस्ट में बताऊंगा...हां, एक बात बताना भूल गया राजीव तनेजा भाई सिर्फ लाल टीशर्ट ही में नहीं थे, काली कार भी लाए हुए थे...(याद कीजिए किसने कहा था कि लाल टीशर्ट और काली कार में आउंगा)....वो तो बाद में संजू तनेजा भाभी ने साफ किया कि कार में तो मैं और माणिक बेटा आए हैं...राजीव भाई तो फटफटिया पर ही आए हैं...एक बात और, कुछ लोगों का कहना है कि इस मीट के साथ इंटरनेशनल क्यों जोड़ा गया...तो भईया तीन इंटरनेशनल कॉल्स तो मेरे मोबाइल पर ही आईं...गुरुदेव समीर लाल समीर जी, दीपक मशाल और अदा जी की कॉल्स...कॉल तो ताऊ जी और शोभना बहना की भी आई थी...तो क्या देश, क्या विदेश, सब जगह के ब्लॉगर्स ने मीट में शिरकत की...तो हो गई न सही में इंटरनेशनल मीट...

फिलहाल ब्लॉगवुड की हालत को बयां करता मीट में मेरा सुनाया एक स्लॉग ओवर...

स्लॉग ओवर
मक्खन और ढक्कन पार्क की बेंच पर खाली बैठकर वक्त से बदला ले रहे थे...तभी मक्खन ज़ोर ज़ोर से तालियां बजाने लगा...ढक्कन ने पूछा...ये क्या कर रहा है भई...

मक्खन...तालियां बजाने से भूत पास नहीं आते...

ढ़क्कन...लेकिन यहां तो कोई भूत नहीं है...

मक्खन...देखा, मेरी तालियों का असर...

रविवार, 23 मई 2010

दिल्ली ब्लॉगर्स मीट से पहले मन भारी है...खुशदीप

आज भारी मन के साथ ये पोस्ट लिखनी पड़ रही है...दिल्ली में पहले भी ब्लॉगर्स मीट हुई हैं...अजय कुमार झा और अविनाश वाचस्पति जी के अथक प्रयासों से हर बार जमकर दिलों की महफ़िल जमीं...औरों की कह नहीं सकता, मैंने तो इन महफ़िलों का जमकर मज़ा लिया...राजीव कुमार तनेजा भाई और संजू भाभी जी ने अलबेला खत्री जी के दिल्ली आने पर घर पर ही लंच पर दिल्ली के तमाम ब्लॉगर्स का जिस प्यार के साथ सत्कार किया, वो मैं कभी भुला नहीं सकता...


संगीता पुरी जी, मेरे शेर सिंह (आप सबके ललित शर्मा) और शायद महफूज़ मास्टर भी कल नांगलोई में बुलाई गई इंटरनेशनल ब्लॉगर मीट में दिल्ली और आसपास के तमाम ब्लॉगर्स के साथ मौजूद रहेंगे...संगीता जी, ललित भाई और महफूज़ प्यारे से पहली बार रू-ब-रू होने के लिए बेताब हूं...लेकिन अविनाश भाई से माफ़ी मांगते हुए कहूंगा कि इस बार मीट से पहले ही जिस तरह कुमार जलजला, ढपोर शंख या पोल खोल की टिप्पणियां सभी के ब्लॉग्स पर आ रही हैं, उसने माहौल को कुछ भारी कर दिया है...

कुमार जलजला और ढपोर शंख ढंके की चोट पर कह रहे हैं कि हम कल मीट में मौजूद रहेंगे लेकिन कोई हमें पहचान नहीं पाएगा...राज कुमार सोनी जी ने भी अपनी पोस्ट पर बिगुल बजाया है कि अविनाश जी के आयोजन को नाकाम करने के लिए राजनीति का खेल भी शुरू हो गया है...हो सकता है कि एक समानांतर मीट का आयोजन किया जाए...उदय जी ने भी अपनी पोस्ट पर कुमार जलजला की जमकर क्लास ली है...

मेरा अंदेशा ये है कि अगर ब्लॉगवुड इस तरह के ओछे हथकंडों में फंस गया तो फिर राजनीति और इसमें कोई फर्क नहीं रह जाएगा...कुछ भी सार्थक नहीं हो पाएगा...अविनाश जी के घर पर ही पिछली बार एक छोटी सी ब्लॉगर महफिल में मेरे मुंह से निकला था कि हम जहां भी रहते हैं वहां बुज़ुर्गों को खुश करने के लिए कोई छोटा सा ही प्रयास करना चाहिए...मुझे खुशी है कि सतीश सक्सेना भाई इस काम को शुरू करने के लिए जी-जान से जुटे हुए हैं...उनके विदेश से आने के बाद इस योजना पर तेज़ी से काम किया जाएगा...ऐसा कोई भी छोटी सी कोशिश जिससे समाज में छोटा सा भी बदलाव हो, वो ब्लॉगिंग का उद्देश्य होना चाहिए...न कि लेगपुलिंग, सम्मान-सम्मान, गुटबाज़ी इस तरह के नकारात्मक भावों को हम ब्लॉगवुड में पनपने दें...

कल की ब्लॉगर्स मीट को लेकर मैंने इससे संबंधित जितनी भी पोस्ट थीं, उन पर टिप्पणी के ज़रिए ये चिंता जाहिर की है...उसे फिर रिपीट कर दे रहा हूं...

@कुमार जलजला


यार तुम्हारी हरकतों से तो उस ब्लॉगर की याद आ गई जो आईपीएल के पहले एडीशन में कोलकाता नाइटराइडर्स की अंदर की बातें ब्लॉग पर लिखता था...सब सोचते रहे वो ब्लॉगर कौन सा खिलाड़ी है, लेकिन उसकी पहचान आखिर तक नहीं खुल पाई...इसी तरह अब तुम कह रहे हो कि कल तुम ब्लॉगर्स मीट में मौजूद रहोगे...लेकिन तुम्हे कोई पहचान नहीं पाएगा...ये बात कह कर तुमने मेरे सामने एक धर्मसंकट पैदा कर दिया है...इस तरह तो ब्लॉगर्स मीट में जो जो ब्लॉगर्स भी पहुंचेंगे, उन सब पर ही शक किया जाने लगेगा कि उनमें से ही कोई एक कुमार जलजला है...मान लीजिए पच्चीस-तीस ब्लॉगर्स पहुंचते हैं...वैसे ब्लॉगवुड में इस वक्त पंद्रह से बीस हज़ार ब्ल़ॉगर्स बताए जाते हैं...यानि इन पंद्रह से बीस हज़ार से घटकर कुमार जलजला होने की शक की सुई सिर्फ पच्चीस-तीस ब्लॉगर्स पर आ जाएगी...तो क्या तुम इस तरह कल की मीटिंग में मौजूद रहने वाले दूसरे ब्लॉगर्स के साथ अन्याय नहीं करोगे...अविनाश वाचस्पति भाई से भी कहूंगा कि इस विरोधाभास को दूर किया जाए, अन्यथा पूरे ब्लॉगवुड में गलत संदेश जाएगा...


जय हिंद..

मैंने जो शंका ज़ाहिर की है उसका निवारण होना ज़रूरी है...नहीं तो मुझे एक बार फिर भारी मन से अविनाश जी, संगीता पुरी जी, ललित शर्मा भाई, महफूज़ मास्टर और दिल्ली के तमाम ब्लॉगर्स भाइयों से माफ़ी मांगनी पड़ेगी कि मैं चाह कर भी कल की मीट में उपस्थित नहीं हो पाऊंगा...

शनिवार, 22 मई 2010

मेरे लाल से तो सारा जग झिलमिलाए...खुशदीप

एक यात्री उड़ान भरने के लिए बोइंग 747 में अपनी सीट पर जाकर बैठ गया...उसके साथ वाली सीट एक युवती की थी...युवती की गोद में नवजात शिशु भी था...युवती अपने शिशु पर बड़ा लाड बरसा रही थी...युवती ने सहयात्री को अपना शिशु दिखाते हुए पूछा...है न बहुत सुंदर...


यात्री कोई राजा हरिश्चंद्र का वंशज था...झूठ बोल नहीं सकता था...उसने कहा, माफ़ करना मैडम...मैं झूठ नहीं बोलता...मैंने इस जैसा बदसूरत बच्चा पहले कभी नहीं देखा...

युवती ने हैरत का भाव जताते हुए कहा...एक्सक्यूज़ मी...आपने क्या कहा...

यात्री ने जवाब दिया...मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता था, लेकिन जो सच है वो सच है...वाकई इस बच्चे को थोड़ी देर तक देखना भी बर्दाश्त से बाहर है...

यह सुनना ही था कि युवती का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया...

युवती ने चीख चीख कर सारे प्लेन को इकट्ठा कर लिया...इस आदमी की ये मज़ाल...मेरी इन्सल्ट करे...मैं इसके साथ इस एयरलाइंस, इसके पूरे स्टॉफ पर केस दर्ज़ कर दूंगी...ऐसे यात्रियों को प्लेन पर चढ़ने ही कैसे देते हैं जिन्हें बात करने की तमीज़ न हो...

तभी युवती के पास क्रू की एक सीनियर मैंबर आई...उसने युवती को शांत करने की नीयत से कहा...मैम, प्लीज़ काम डाउन...आप ऐसा कीजिए मैं आपके लिए बिज़नेस क्लास में और भी कम्फर्टेबल सीट दे देती हूं...वहां आप गर्म काफ़ी का मज़ा लीजिए...आपको टेक लगाने के लिए पिलो भी मिल जाएगा...और हां...

...

...

...


आपके प्यारे मंकी के लिए मैं बनाना भी ला देती हूं...




निष्कर्ष...बच्चा कैसा भी हो, मां के लिए वो दुनिया में सबसे खूबसूरत ही होता है...

स्लॉग गीत


यशोदा का नंदलाला, बृज का उजाला है,
मेरे लाल से तो सारा जग झिलमिलाए...

शुक्रवार, 21 मई 2010

टिप्पणियां हुईं बटरफ्लाई...खुशदीप


तू कहां गई थी, तेरा मर जाए सावरिया...

आज सुबह ये गाना रह रह कर याद आ रहा था...जब भी अपनी पोस्ट पर आता, टिप्पणियों वाले बॉक्स को देखकर यही गाना याद आ जाता...पोस्ट पर दिखती 17 टिप्पणियां और कमेंट बॉक्स को खोलो तो दिखतीं सिर्फ 10...दो तीन बार तसल्ली के लिए यही क्रम दोहराया लेकिन कोई फायदा नहीं...अब सवाल ये टिप्पणियां गईं तो गईं कहां थीं ?...

फिर सोचा...टिप्पणी जिनके सम्मान में स्तुतियां गाईं जाती हैं, पूरा ब्लॉगवुड इतना मान देता है, उन्हीं टिप्पणियों को कहीं नए ज़माने की हवा तो नहीं लग गई...आप बड़े मनोयोग से इन टिप्पणियों को मंज़िल के लिए रवाना करते हैं...लेकिन ये निगोड़ी बीच रास्ते में न जाने कौन से बॉयफ्रेंड के साथ चंपत हो जाती है...तीन-चार घंटे मस्ती काटी, फिर चुपचाप आकर चिपक जाती हैं, अपने परमानेंट स्मारक पर...ऐसी शरीफ़ बनी रहती हैं जैसे दीन-दुनिया के बारे में कुछ जानती ही नहीं...कौन न मर जाए ऐसे भोलेपन पर...

ठीक वैसे ही जैसे आजकल फाइव स्टार स्कूलों में कुछ अल्ट्रामॉड छोरे-छोरियां निकलते तो है घर से पढ़ने के लिए...पूरी स्कूल यूनिफॉर्म में...लेकिन घर से निकलते ही किसी मॉल में...यूनिफॉर्म बैग के अंदर और बैग से कोई चटकती मटकती ड्रैस बाहर...मॉल के कूल कूल माहौल में बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड के साथ टाइम पास किया...घर जाने के टाइम पर फिर चटकती ड्रैस बैग के अंदर और यूनिफॉर्म बाहर...घर वापस पहुंचेंगे ऐसे मुंह लटका कर जैसे स्कूल में पढ़-पढ़ कर पता नहीं कितने थक गए हों...तो क्या टिप्पणियां भी इसी राह पर चल निकली हैं...

मैंने सुबह सोचा चलो इस टिप्पणी-रहस्यम को ब्लॉगर बिरादरी के ज़रिए सुलझाता हूं...मैंने टिप्पणी के ज़रिए ही शंका ज़ाहिर की...

ये टिप्पणियां आज बीच में कहां चाय-पानी के लिए अटक रही हैं...क्या औरों के साथ भी ये समस्या आ रही है...

पहला जवाब मिला सतीश पंचम जी से...

टिप्पणियां  मेरे यहां भी प्रकट, नेपथ्य में आ जा रही है...लगता है ब्लॉगर में कोई सुधार आदि की कवायद चल रही है...

फिर अपने स्टाइल में अविनाश वाचस्पति भाई ने मेरी शंका का निवारण करने की कोशिश की...

ब्‍लॉगस्‍पाट की मरम्‍मत के कारण टिप्‍पणियां कभी कभी बीच में खड्ढे में गिर जाती हैं फिर किसी तरह बाहर निकल आती हैं क्‍योंकि कुंए का मेंढक नहीं बनना चाहती हैं...पर एक दिन ब्‍लॉगस्‍पाट कुंए का मेंढक बन सकता है इसलिए अपनी सुरक्षा स्‍वयं करें...माह में दो बार अपने ब्‍लॉग का बैकअप अवश्‍य लिया करें...

लेकिन मुझे अब भी इन शोख चंचला टिप्पणियों पर विश्वास नहीं हो रहा...आखिर तीन-चार घंटे के लिए ये गायब हुईं तो हुईं कहा...मेरे शक्की होने की वजह भी है...क्योंकि मैंने कहीं पढ़ा था...



आप हाउसफ्लाई को तो बटरफ्लाई बना सकते हैं लेकिन किसी बटरफ्लाई को आप कभी हाउसफ्लाई नहीं बना सकते...

गुरुवार, 20 मई 2010

ज़िंदगी की प्रार्थना...खुशदीप

प्रार्थना आपकी ज़िंदगी की गाड़ी की स्टेप्नी नहीं है कि संकट के वक्त ही बाहर निकाली जाए...ये आपकी गाड़ी का स्टेयरिंग-व्हील है जो हमेशा आपको सही रास्ता दिखाती है...



क्या आप जानते है कि आपकी कार का विंडशील्ड क्यों इतना बड़ा और रियरव्यू मिरर क्यों इतना छोटा होता है...क्योंकि आपका आने वाला कल ही अहम है, बीता हुआ कल नहीं...इसलिए आगे देखिए और बढ़ते रहिए...





स्लॉग ओवर

एक बार कालेज के तीन स्टूडेंट्स जॉय राइड पर निकले हुए थे...मस्ती में सौ की स्पीड में गाड़ी भगा रहे थे कि एक्सीडेंट हो गया...तीनों बिना टिकट यमराज के पास पहुंच गए...नरक में यमराज के दरबार में इंटरव्यू देने के बाद तीनों बाहर आए...उनमें से एक आंख मार कर बोला...

...


...


...

अबे, यमराज की लड़की देखी क्या ?...

...BOYS ARE ALWAYS BOYS

मंगलवार, 18 मई 2010

पत्रकार को अवमानना का नोटिस...खुशदीप

पत्रकार का पेशा भी गजब हो गया है...अगर आप पत्रकार हैं और किसी भ्रष्टाचारी नेता को चोर लिखते हैं तो पहले सौ बार ऊंच-नीच सोच लीजिए...कहीं लेने के देने न पड़ जाएं...ऐसी ही हिमाकत एक पत्रकार को बहुत भारी पड़ी...




अख़बार में अभी ख़बर छपे हुए एक दिन भी पूरा नहीं बीता था कि पत्रकार को वकील का नोटिस मिल गया...पत्रकार को काटो तो ख़ून नहीं...पता नहीं नेता अब क्या हाल करे...नौकरी भी रहेगी या नहीं...कोर्ट कचहरी के चक्कर...नेता तो बड़े से बड़ा वकील कर लेगा...लेकिन पत्रकार बेचारा कहां से करेगा बड़ा वकील...पत्रकार को अब जेल की चक्की साफ़ नज़र आने लगी...पत्रकार ने कांपते हाथों से नोटिस का लिफ़ाफ़ा खोला...उसकी आशंका सही निकली...वकील ने अवमानना का ही नोटिस भेजा था...पत्रकार ने राम का नाम लेकर नोटिस पढ़ना शुरू किया...नोटिस पढ़ने के बाद पत्रकार को 440 वोल्ट का झटका लगा...

क्यों...

...

...

...


अवमानना का नोटिस नेता ने नहीं चोर ने भेजा था...

टिंडे ले लो, टिंडे...खुशदीप

आपको एक पोस्ट में बंदर और अपने बालसखा आलोक का किस्सा सुनाया था...आज एक और बालसखा की बारी है...उस दोस्त का असली नाम तो नहीं बता रहा, लेकिन वो नाम बता देता हूं, जिस नाम से उसे हम सब बुलाते थे...वो नाम था टिंडा...उसका नाम टिंडा कैसे पड़ा, उसकी भी बड़ी मज़ेदार कहानी है...



हम सब एक पार्क में क्रिकेट खेला करते थे...एक बार हम ऐसे ही क्रिकेट का सारा टाम-टमीरा लेकर सुबह प्रैक्टिस के लिए जा रहे थे...रास्ते में एक ठेले पर सब्ज़ी वाला सब्ज़ी बेच रहा था...और उस ठेले पर कॉलोनी की एक सुंदर सी बाला अपनी माताजी (सॉरी मम्मा) के साथ सब्जी खरीद रही थी...अब चलते-चलते हमारे उस दोस्त (जिसका मैं इस पोस्ट में ज़िक्र कर रहा हूं) को न जाने क्या सूझा, ज़ोर से बोल पड़ा...टिंडे ले लो, टिंडे....इसे कहते आ बैल, मुझे मार (पाबला जी की शैली में बैठे बिठाए पंगा लेना)...उसके आगे जो हुआ वो बयां करना मुश्किल है...सुंदर सी बाला की मम्मा ने दोस्त महाराज की वो गत बनाई, वो गत बनाई कि पूछो मत...आ खिलाऊं तुझे टिंडे...अपनी मां से कह टिंडे बनाएगी टिंडे...बस हमें यही सुनाई दे रहा था...हम तो खैर फौरन ही वहां से फूट लिए...लेकिन वो दोस्त बड़ी देर बाद उस पानीपत के मैदान से निकल कर आ पाया...आते ही बोला...मरवा दिया यार आज तो टिंडों ने...बस उसी दिन से उसका नाम टिंडा पड़ गया...


इन्हीं टिंडे जी की एक और गाथा आपको सुनाता हूं...पच्चीस-तीस साल गुज़र जाने के बाद आज भी याद करता हूं तो लोटपोट होने लगता हूं...दरअसल हमारे स्कूल में लड़कों के लिए एनसीसी ज़रूरी थी...एक दो बार तो हमारी चांडाल चौकड़ी परेड में गई...दियासिलाई जैसी हमारी टांगों के ऊपर वो तंबू जैसी एनसीसी की नेकरें...आप खुद ही सोच सकते हैं कि हम कितने स्मार्ट लगते होंगे...खैर हम थे जुगाड़ू...एनसीसी के उस्ताद जी को दो-तीन मुलाकात में ही चाय-समोसे से सेट कर लिया...लो जी हमारी चंडाल चौकड़ी को परेड में जाने से छुट्टी मिल गई...पूरी क्लास धूप में पसीना बहा रही होती...और हम या तो कैंटीन में गपें लड़ा रहे होते या दूसरे मैदान में कपिल देव, गावस्कर बनने की प्रैक्टिस कर रहे होते...एनसीसी की तरफ से कुछ मेहनताना भी मिला करता था...अब सेशन के आखिर में वो पैसे मिलते तो हमारी चांडाल चौकड़ी के नाम सबसे ज़्यादा पैसे दर्ज होते...दरअसल उस्ताद जी हमसे इतने खुश थे कि हमारी बिना नागा रजिस्टर में अटैंडेंस लगा देते थे...वो तो बाद में राज़ खुला कि ऐसा करने से उस्ताद जी का अपना भी आर्थिक रूप से कुछ फायदा होता था...

एक दिन एनसीसी का कैंप हस्तिनापुर के पास नदी किनारे लगा...अब वैसे हमारी चांडाल चौकड़ी एनसीसी से कोसों दूर भागती हो लेकिन इस कैंप में हमें मौज-मस्ती का पूरा मौका नज़र आ रहा था...तो जनाब हम सबने भी कैंप के लिए अपने नाम दर्ज करा दिए...टिंडे महाराज भी पूरी मुस्तैदी के साथ इस कैंप के लिए नमूदार हुए...सुबह कैंप में नाश्ते में पराठे, ब्रेड के साथ बर्फ़ की कड़क जमी हुई मक्खन की टिक्कियां हमारे लिए पेश की गईं...एक टेबल पर इतना सारा मक्खन मैंने ज़िंदगी में पहले कभी नहीं देखा था...खैर हम सबने जमकर नाश्ता किया...टिंडे महाराज हम सबसे स्मार्ट निकले...जितनी मक्खन की टिक्कियां नाश्ते में उड़ाई जा सकती थीं, उड़ाईं...साथ ही टिंडे जी ने आठ दस मक्खन की टिक्कियां अपनी तंबूनुमा नेकर की दोनों ज़ेबों के हवाले भी कर लीं...

अब नाश्ते के बाद परेड का नंबर आया...उस्ताद जी ने सबको मैदान में बुला लिया...जैसे जैसे सूरज सिर पर चढ़ने लगा वैसे वैसे ही हमारी परेड में भी जोश आने लगा...उस्ताद जी की कड़कदार आवाज़ गूंज रही थी...एक-दो, एक...एक-दो एक...तभी उस्ताद जी को ब्रेक लगा और अचानक उन्होंने पूछा...ये क्या है बे...

अब सामने जो नज़ारा था वो ऐतिहासिक था...लाइन में सबसे आगे टिंडे जी परेड कर रहे थे...और कड़ी धूप की वजह से उनकी नेकर की दोनों जेबों से मक्खन गंगा-जमुना की तरह पिघलता हुआ टांगों पर बह रहा था...उस्ताद जी की आवाज सुनकर टिंडा मैं, मैं...वो..वो...मी...मी... करता ही रह गया...और हमारा जो हंस हंस कर बुरा हाल हुआ, उसे क्या मुझे यहां बयां करने की ज़रूरत है...आप खुद ही समझ लीजिए...

रविवार, 16 मई 2010

आज एक बदमाश पोस्ट...खुशदीप

पहले मैं अपनी इस पोस्ट का शीर्षक...आज एक नॉटी पोस्ट...लगाने वाला था...फिर सोचा नॉटी का सही मतलब क्या होता है...चंचल, शैतान, बदमाश, पंगेबाज़...देखने में इन सब शब्दों में बदमाश सबसे असंसदीय लगता है...लेकिन तभी सामने टीवी पर शाहिद कपूर की नई फिल्म बदमाश कंपनी का प्रोमो चलता नज़र आया...फिल्म यशराज चोपड़ा जैसे सम्मानित निर्माता के बैनर पर बनी है...यानि अब फिल्मों के हीरो-हीरोइन भी खुद को बदमाश कहलाने से परहेज़ नहीं कर रहे हैं...तो फिर मैं अपनी पोस्ट में बदमाश शब्द डालते हुए क्यों हिचकूं...चलिए शीर्षक की बात तो हो गई अब आता हूं पोस्ट के मूल विषय पर...

हम हिंदुस्तानियों में बहुत आग़ होती है...इसीलिए कहीं दूसरे के यहां आग़ लगी हुई दिखने का मौका मिलना चाहिए...फिर देखिए हम कैसे आग़ में घी या पेट्रोल डालते हैं...कोई पानी डालने आएगा तो उसके पीछे ऐसे हाथ धो कर पड़ेंगे कि बेचारा खुद ही पानी-पानी हो जाएगा...

अब यहां मुझे एक सवाल परेशान कर रहा है...अगर हम हिंदुस्तानियों के अंदर इतनी ही आग़ होती है तो हम खुद क्यों नहीं इसमें सिक कर तंदूरी चिकन हो जाते...कभी आपने इस बारे में सोचा...कभी सोचा कि हमारे अंदर की ये आग रोज़ बुझती कैसे है...प्रकृति कहिए या ऊपर वाला, उसने बहुत सोच समझकर इसका भी इंतज़ाम कर रखा है...कैसे भला...बताता हूं, बताता हूं...ऐसी भी क्या जल्दी है...चलिए इसका जवाब आप एक किस्से में ढूंढिए...किस्सा इस तरह है...

एक बार एक अंग्रेज़ हिन्दुस्तान घूमने आया...उसने इंडियन करी, स्पाइसी इंडियन फूड के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था...दिल्ली आते ही उसने अपने मेज़बान दोस्त से कहा कि सबसे पहले मेरी इच्छा यहां का स्पाइसी फूड खाने की है...जहां सबसे अच्छा मिलता हो वहां ले चलो...मेज़बान को पता था कि जामा मस्जिद के इलाके में करीम जैसे होटल बड़ा लज़ीज़ मुगलई खाना पेश करते हैं...वो अंग्रेज़ को वहीं ले गया...अब ज़ायके ज़ायके के चक्कर में अंग्रेज़ कबाब, मुर्ग मुस्सलम, रोगन जोश, हैदराबादी बिरयानी जो जो पेश किया गया सब चट करता गया...



अंग्रेज़ स्पाइसी फूड से तृप्त हो गया...पैग-वैग पहले से ही लगा रखे थे...अंग्रेज़ थका हुआ था, मेज़बान के घर लौटने के बाद जल्दी ही सो गया... सुबह अंग्रेज़ टॉयलेट गया...टॉयलेट की सीट पर ही अंग्रेज़ को वो दिव्य ज्ञान हुआ, जिसकी खोज आज तक बड़े बड़े स्कॉलर नहीं कर पाए थे...अंग्रेज को पता चल गया कि हिंदुस्तानी टॉयलेट में टिश्यूज़ (टॉयलेट पेपर) की जगह धोने के लिए पानी का ही इस्तेमाल क्यों करते हैं...





अरे जनाब टिश्यूज़ क्या आग़ नहीं पकड़ लेंगे...

गब्बर बताएगा, ब्लॉगवुड में कौन बड़ा...खुशदीप

चिट्ठा जगत में 15 मई रात 12 बजे के सक्रियता क्रम में पहला नंबर उड़न तश्तरी (समीर लाल जी), दूसरा नंबर ताऊ डॉट इन (ताऊ रामपुरिया जी), तीसरा नंबर मानसिक हलचल (ज्ञानदत्त पाण्डेय जी), चौथा नंबर फुरसतिया (अनूप शुक्ल जी) का दिख रहा है...अब तीसरे नंबर वाले ज्ञानदत्त जी ने चार-पांच दिन पहले पोस्ट लिखकर खुद की राय के मुताबिक नंबर एक समीर लाल जी और नंबर चार अनूप शुक्ल जी के प्लस-माइनस पाइंट्स बता डाले...ज्ञानदत्त जी की ऐसा करने के पीछे कोई भी मंशा रही हो लेकिन ब्लॉगवुड में सुनामी आ गई...

हालांकि ज्ञानदत्त जी ने ये कहीं नहीं कहा था कि ब्लॉगवुड में नंबर वन कौन है...लेकिन ये साफ था कि उन्होंने लेखन के हिसाब से अनूप जी का पलड़ा भारी बताया...ब्लॉगवुड में बाकी सभी ने अपने हिसाब से पोस्ट का मतलब निकाला और समीर जी और अनूप जी के बीच आर-पार की लड़ाई दिखा दी...इस प्रकरण के दौरान अनूप जी और समीर जी ने भी पोस्ट लिखकर अपने दिल की बात कही...नंबर दो ताऊ रामपुरिया जी ने इस विवाद पर जो कुछ भी हुआ उससे आहत होकर इसे ब्लॉगिंग का सूर्य ग्रहण बताते हुए विरोध में कुछ भी नहीं लिखा...इतना सब हुआ लेकिन तूफ़ान फिर भी शांत नहीं हुआ...

इस प्रकरण पर मैंने भी समीर जी और अनूप जी के बारे में दो पोस्ट लिखीं...और वही लिखा जो मैं ब्लॉगवुड के इन दो शिखर पुरुषों के बारे में सोचता हूं...एक बेनामी भाई कुमार ज़लज़ला ने ये भी आकर कह दिया कि मैंने अनूप जी के कहने पर आकर अनूप शुक्ल, द कैटेलिस्ट ऑफ ब्लॉगवुड वाली पोस्ट लिखी...ये भी कहा मैं बीच में न खड़ा हूं, आर या पार कहीं एक जगह जाकर खड़ा हो जाऊं...बेनामी भाई जो भी साबित करना चाहते थे, मुझे नहीं पता...लेकिन मुझे धर्मसंकट में डाल दिया...एक तरफ़ गुरुदेव, एक तरफ़ महागुरुदेव...क्या करूं...ऐसे में खोटा सिक्का ही काम आया...जी हां मेरा मक्खन...मक्खन ने मुझे राय दी कि गब्बर का दिमाग ऐसे मामलों में बड़ा चलता है...वो जो कह देगा, उसे ही मान लेना और इस विवाद को हमेशा हमेशा के लिए विसर्जित कर देना...

मक्खन के ज़रिए मैंने अपनी दुविधा गब्बर तक पहुंचाई...गब्बर शक्ल से लगे कितना भी देहाती, लेकिन है बड़ा साइंटिफिक आदमी...उसने कालिया को जासूसी करने के लिए भेजा कि पता लगा कर आए किस ब्लॉगर का ज़्यादा डंका बोलता है...अब कालिया जासूसी करके वापस आया तो गब्बर अफ़ीम का तगड़ा अंटा चढ़ा चुका था...अब सुनिए गब्बर और कालिया का ऐतिहासिक वार्तालाप...



गब्बर - हूं...कितने आदमी थे ?


कालिया - सरदार दो...


गब्बर - मुझे गिनती नहीं आती... 2 कितने होते हैं ?


कालिया - सरदार 2, 1 के बाद आता है...


गब्बर - और 2 के पहले ?


कालिया- 2 के पहले 1 आता है...


गब्बर - तो बीचे में कौन आता है ?


कालिया - बीच में कोई नहीं आता...


गब्बर - तो फिर दोनों एक साथ क्यों नहीं आते ?


कालिया - 1 के बाद 2 ही आ सकता है, क्योंकि 2, 1 से बड़ा है...


गब्बर- 2, 1 से कितना बड़ा है ?


कालिया - 2, 1 से 1 बड़ा है...


गब्बर - अगर 2, 1 से 1 बड़ा है तो 1, 1 से कितना बड़ा है ?


कालिया - सरदार मैंने आपका नमक खाया है... मुझे गोली मार दो ...!!!

अब मेरी सभी विद्वान ब्लॉगरगण से गुहार है कि कालिया के हाल से सबक लें और समीर लाल बनाम अनूप शुक्ल विवाद को हमेशा-हमेशा के लिए यहीं अलविदा कह दें...

शनिवार, 15 मई 2010

अनूप शुक्ल, द कैटेलिस्ट ऑफ ब्लॉगवुड...खुशदीप

कल मैंने समीर लाल जी को लेकर 'द साउंड ऑफ साइलेंस' सुनाई थी...

जिसे आप पसंद करते हैं उसके बारे में सार्वजनिक तौर पर अपने विचार प्रकट करना रस्से पर संतुलन बनाने के समान होता है...शिष्य या चाटुकार, कोई भी तमगा आपके माथे पर चस्पा हो सकता है...समीर लाल जी पर लिखना मुश्किल है तो अनूप शुक्ल जी पर लिखना और भी ज़्यादा मुश्किल है...वो भी मेरे जैसे अनाड़ी के लिए...

मैंने जब ब्लॉगिंग शुरू की थी तो अनूप जी और समीर जी के रिश्ते मेरे लिए किसी पहेली से कम नहीं थे...मैंने एक पोस्ट भी लिखी थी...ब्लॉगिंग की काला पत्थर... इसमें समीर जी ने एक टिप्पणी के माध्यम से विस्तार से अनूप जी के साथ अपने रिश्तों के बारे में बताया था...समीर जी ने अनूप जी को प्रोस (गद्य) में अपना गुरु बताया था...समीर जी को मैंने अपने ब्लांगिग के पहले दिन से ही गुरुदेव मान रखा है...अब समीर जी ने अनूप जी को अपना गुरु बताया तो अनूप जी मेरे लिए महागुरुदेव हो गए...उस पोस्ट के बाद दोनों के रिश्तों को लेकर मेरे मन में जो भी आशंकाएं थीं, समाप्त हो गईं...

लेकिन अब फिर एक बार दोनों को लेकर ब्लॉगवुड में महाभारत मचा हुआ है...ये सुनामी इलाहाबाद के संगम तट से आई है...कल मैंने समीर जी की प्रकृति पर वो लिखा था, जैसा कि मैं उनके बारे में सोचता हूं...आज महागुरुदेव अनूप शुक्ल की बारी है...मेरी नज़र में अनूप जी ब्लॉगवुड के कैटेलिस्ट (उत्प्रेरक) हैं...कैमिस्ट्री में मैंने पढ़ा था कि किसी भी रासायनिक क्रिया को तेज़ करने के लिए कैटेलिस्ट की आवश्यकता होती है...कैटेलिस्ट दो प्रकार के होते हैं पॉज़िटिव और नेगेटिव...पॉज़िटिव रासायनिक क्रिया को तेज़ करते हैं तो नेगेटिव धीमा...अनूप जी में ये दोनों ही गुण हैं...अब इसे मौज कहिए या कुछ और अनूप जी कभी ब्लॉगवुड को नीरस नहीं होने देते...


अनूप जी ने इस साल के शुरू में अचानक नोएडा मेरे घर आकर मुझे सुखद आश्चर्य दिया था

आप दाल बिना तड़के लगे खाए तो आपको कैसा स्वाद आएगा...ब्लॉगवुड में तड़के के लिए अनूप जी के पास मसालों का विशाल भंडार है...अब इन मसालों से लैस होकर अनूप जी जब भी अपने लेखन का कौशल दिखाते हैं, वो बस कमाल ही होता है...अब तड़के में किसी को तीखी मिर्च भी लग सकती है...इसमें अनूप जी का क्या कसूर...

समीर जी का अनूप जी के साथ पुराना साथ रहा है, इसलिए वो अनूप जी के लेखन की पाक-कला से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं...लेकिन मेरे जैसे नौसिखिए दो गुरुओं की जुगलबंदी के कुछ और ही निहितार्थ निकालने लगते हैं...बेहतर है हम दोनों के संबंधों की चिंता दोनों पर ही छोड़ दें...

वैसे अनूप जी को लेकर न जाने क्यों एक महात्मा जी से उनकी तुलना करने का मन कर रहा है...महात्मा जी का किस्सा आप भी पढ़िए...

एक बार महात्मा जी अपने एक शिष्य के साथ भ्रमण के लिए निकले...चलते-चलते शाम हो गई...उन्होंने सोचा, पास के गांव में ही रात को डेरा डाल लेते हैं...आगे की यात्रा पर सुबह निकलेगे...महात्मा ने जैसे ही गांव में प्रवेश किया, लोग उनके पांव छूने लगे...सब महात्मा जी के स्वागत सत्कार में लग गए...रात को बढ़िया खाना...आरामदायक बिस्तर की व्यवस्था...सुबह भी महात्मा जी के प्रस्थान करते वक्त सारा गांव इकट्ठा हो गया...महात्मा जी ने विदाई लेते हुए गांव वालों से कहा...तुम सब यहां से उजड़ जाओ...ये सुनकर महात्मा के शिष्य को बड़ा अजीब लगा...लेकिन वो बोला कुछ नहीं...चुपचाप साथ चलता रहा...फिर शाम हुई...फिर महात्मा ने पास के गांव में चलकर रात बिताने का फैसला किया....महात्मा गांव में घुसे तो देखा कि चौपाल पर जुआ चल रहा है...कोई अपनी पत्नी को पीट रहा है...कोई अपशब्द निकाल रहा है...महात्मा को देखकर भी वो कहने लगे...देखो आ गया ढोंगी बाबा...गांव में किसी ने महात्मा को खाना तो दूर पानी का गिलास तक नहीं पूछा...खैर किसी तरह महात्मा ने शिष्य के साथ उस गांव में रात काटी...सुबह चलने लगे तो एक भी गांव वाला उन्हें विदा करने के लिए नहीं आया...महात्मा ने फिर भी गांव की चौपाल पर जाकर सारे गांव वालों को आशीर्वाद दिया...खुश रहो, सब यहां आबाद रहो...महात्मा ने गांव छोड़ा तो शिष्य पूछ ही बैठा...गुरुदेव ये कहां का न्याय है...सज्जन गांव वालों को आपने उजड़ने की बददुआ दे दी और दुष्ट गांव वालों को आबाद होने की...ये सुनकर महात्मा मुस्कुराए और बोले...सज्जन उजड़ कर जहां भी पहुंचेंगे, उसी जगह को चमन बना देंगे और दुर्जन अपनी जगह छोड़कर चमन में भी पहुंच गए तो उसे नरक बना देंगे...





गुरुवार, 13 मई 2010

समीर लाल, द साउंड ऑफ साइलेंस...खुशदीप

खुशदीप सहगल यानि मैं...इनसान हूं...सुख में खुश और दुख में दुखी भी होता हूं...शांत रहने की कोशिश करता हूं लेकिन कभी-कभार गुस्सा भी आ जाता है...पंजाबी ख़ून का असर है या कुछ और...कह नहीं सकता...ब्लॉग पर भी कभी किसी की बात चुभती है तो प्रतिक्रिया दे देता हूं...



लेकिन फिर सोचता हूं कि मैं अपना गुरुदेव समीर लाल जी समीर को मानता हूं...उन्हें फॉलो करता हूं...फिर सागर जैसे उनके गहरे किंतु शांत स्वभाव से कोई सीख क्यों नहीं लेता...इसका मतलब मेरी शिष्यता में कोई खोट है...कोई नापसंद का चटका लगाता है तो मैं पोस्ट लिख मारता हूं...किसी दूसरे की पोस्ट पर कोई वर्तनी सुधार बताता है तो मैं पोस्ट के मूल उद्देश्य की दुहाई देने लगता हूं...समीर जी का शिष्य होते हुए भी क्यों करता हूं मैं ऐसा...

इस रहस्य को मैंने कल सुलझा लिया...

आपने देखा होगा कि अब एक रुपये के नीचे के सिक्के कहीं नहीं मिलते...अब एक, दो  या पांच रुपये के सिक्के ही दिखते हैं...वॉलेट हल्का रखने के लिए मुझे जो भी सिक्के मिलते हैं, उन्हें मैं घर में एक बॉक्स में डाल देता हूं...एक दिन सुबह दूध लेने मार्केट गया...स्टोर वाले के पास सौ का नोट तोड़ कर वापस देने के लिए छोटे नोट नहीं थे...स्टोर वाले ने मुझे बीस रुपये के सिक्के वापस कर दिए...मैंने ट्रैक सूट पहना हुआ था...वॉलेट भी पास नहीं था...इसलिए वो सिक्के मैंने ट्राउजर्स की जेब में ही रख लिए...अब घर वापस आ रहा था तो सुबह सुबह की शांति में जेब में खनक रहे सिक्कों की आवाज़ बहुत तेज़ लग रही थी...इस आवाज़ से ही मुझे वो जवाब मिल गया जो मैं समीर जी की प्रकृति को समझने के लिए शिद्दत से जानना चाह रहा था...क्या आप बता सकते हैं क्या था वो जवाब....चलिए मैं ही बता देता हूं...



सिक्कों का मूल्य कम होता है, इसलिए ज़्यादा बजते हैं...नोट का मूल्य ज़्यादा होता है, इसलिए उसमें आवाज़ नहीं होती...समीर जी भी अब उस मकाम तक पहुंच गए हैं, जिसे अनमोल कहा जा सकता है...अनंत का भी कोई मूल्य लगा सकता है क्या...वो बस शांत होता है...आप भी सुनिए...समीर लाल,  द साउंड ऑफ साइलेंस...

बुज़ुर्गो से भी गलतियां होती हैं...खुशदीप

क्या कसूर सिर्फ बेटे-बहुओं का ही होता है...माता-पिता या बुज़ुर्ग क्या कभी गलत नहीं होते...युवा पीढ़ी के इस सवाल में भी दम है...हम सिर्फ एक नज़रिए से ही देखेंगे तो न्याय नहीं होगा...रिश्तों की मर्यादा बेहद महीने धागे की तरह होती है...एक बार टूट जाए तो बड़ा मुश्किल होता है उसका दोबारा जुड़ना...जुड़ भी जाए तो गांठ पड़ ही जाती है...इस लेखमाला को विराम देने के लिए मैं सितंबर में लिखी एक पोस्ट के कुछ अंशों को दोबारा उद्धृत कर रहा हूं...

कहते हैं न...क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात...बच्चे गलतियां करते हैं, बड़ों का बड़प्पन इसी में है कि उन्हें क्षमा करें...बुज़ुर्ग अगर मन में बात रखेंगे तो उससे दिक्कतें बढ़ेंगी ही कम नहीं होंगी...बुज़ुर्ग भी नए ज़माने की दिक्कतों को समझें...जिस तरह के प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में आज जीना पड़ रहा है, पहले ऐसा नहीं था...ज़ाहिर है नौकरियों में पैसा बढ़ा है तो तनाव भी उतना ही बढ़ा है...अब पहले वाला ज़माना नहीं रहा कि दस से पांच की ड्यूटी बजा दी और काम खत्म...आज चौबीसों घंटे आपको अपने काम के बारे में सोचना पड़ता है...अन्यथा करियर में पिछड़ जाने की तलवार हमेशा सिर पर लटकी रहेगी...फिर बच्चों के लिए भी अब कॉम्पिटिशन बहुत मुश्किल हो गया है...इसलिए बीच की पीढ़ी को बच्चों को भी काफी वक्त देना पड़ता है...ठीक वैसे ही जैसे कि आप अपने वक्त में देते थे...

बुज़ुर्ग अपने लिए हर वक्त मान-सम्मान की उम्मीद करते हैं तो वो दूसरों  (चाहे वो कितने भी छोटे क्यों न हो) की भावनाओं का भी ध्यान रखे...बुज़ुर्ग अगर हमेशा ही...हमारे ज़माने में ऐसा होता था, वैसा होता था...करते रहेंगे तो इससे कोई भला नहीं होगा...मैंने देखा है बुज़ुर्ग सास-ससुर का बहू-बेटे के लिए सोचने का कुछ नज़रिया होता है...और बेटी-दामाद के लिए कुछ और...आपको ये समझना चाहिए कि अब बहू ही बेटी है...बिना बात हर वक्त टोका-टाकी न करे...अब दुनिया ऐसी होती जा रही है जहां चौबीसों घंटे काम होता है...जीने के अंदाज़ बदल गए हैं...इसलिए समय पर घर आओ, समय से घर से जाओ, जैसे नियम-कायदे अब हर वक्त नहीं चल सकते...दिन भर काम में खपने के बाद पति-पत्नी को प्राइवेसी के कुछ पल भी चाहिए होते हैं...इसलिए उन्हें ये लिबर्टी देनी ही चाहिए...सौ बातों की एक बात...बुज़ुर्ग हो या युवा, एडजेस्टमेंट बिठाने की कला सभी को आनी चाहिए...

युवा पीढ़ी को भी समझना चाहिए कि बच्चा और बूढ़ा एक समान होते हैं...जैसे आप बच्चों की ख्वाहिशें पूरी करने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं, ऐसे ही उनकी भावनाओं का भी ध्यान रखें जिन्होंने आपको हर मुश्किल सहते हुए अपने पैरों पर खड़ा किया...हर रिश्ते का मान कैसे रखना चाहिए, इसके लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है...



राम ने हर रिश्ते की मर्यादा को जान से भी ज़्यादा अहमियत दी...राम का यही पक्ष इतना मज़बूत है कि उन्हें पुरुष से उठा कर भगवान बना देता है...कहने वाले कह सकते हैं कि एक धोबी के कहने पर राम ने सीता के साथ अन्याय किया...लेकिन जो ऐसा कहते हैं वो राम के व्यक्तित्व की विराटता को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं समझते...राम ने सीता को कभी अपने अस्तित्व से अलग नहीं समझा...राम खुद हर दुख, हर कष्ट सह सकते थे लेकिन मर्यादा के पालन की राह में कोई आंच नहीं आते देख सकते थे...इसलिए सीता ने जब दुख सहा तो उससे कहीं ज़्यादा टीस राम ने सही...क्योंकि राम और सीता के शरीर भले दो थे लेकिन आत्मा एक ही थे...बस राम के इसी आदर्श को पकड़ कर हम चाहें तो अपने घर को स्वर्ग बना सकते हैं...अन्यथा घर को नरक बनाने के लिए हमारे अंदर रावण तो है ही...

विवेक राम के रूप में हमसे मर्यादा का पालन कराता है...लेकिन कभी-कभी हमारे अंदर का रावण विवेक को हर कर हमसे अमर्यादित आचरण करा देता है...अपने बड़े-बूढ़ों को ही हम कटु वचन सुना डालते हैं...अपने अंदर के राम को हम जगाए रखें तो ऐसी अप्रिय स्थिति से बचा जा सकता है...यहां ये राम-कथा सुनाने का तात्पर्य यही है कि बड़ों के आगे झुक जाने से हम छोटे नहीं हो जाते...यकीन मानिए हम तरक्की करते हैं तो हमसे भी ज़्यादा खुशी हमारे बुज़ुर्गों को होती है...जैसा हम आज बोएंगे, वैसा ही कल हमें सूद समेत हमारे बच्चे लौटाने वाले हैं...इसलिए हमें अपने आने वाले कल को सुधारना है तो आज थोड़ा बहुत कष्ट भी सहना पड़े तो खुशी-खुशी सह लेना चाहिए...

बुधवार, 12 मई 2010

बच्चों के साथ अपना बचपन भी लौटाइए...खुशदीप

संयुक्त परिवार को लेकर कल मेरी पोस्ट पर शिखा वार्ष्णेय जी ने बड़ा जायज़ सवाल उठाया था...बुज़ुर्ग हमेशा सही हों, ऐसा भी नहीं होता...न्यूक्लियर फैमिली का प्रचलन बढ़ रहा है तो इसके लिए दोष अकेली युवा पीढ़ी का नहीं है, ताली हमेशा दो हाथों से ही बजती है...इसीलिए मैंने अपनी पोस्ट पर एडजेस्टमेंट को लेकर बड़ा ज़ोर दिया था...बड़ों को भी क्या ध्यान रखना चाहिए, इस पर कल पोस्ट लिखूंगा...आज मेरा मन मासूम शिवम को लेकर बड़ा दुखी है...शिवम के ज़रिेए आज पेरेंटिग का एक ज़रूरी मुद्दा...

दिल्ली में द्वारका के हाईप्रोफाइल आईटीएल पब्लिक स्कूल में पांचवी में पढ़ने वाला नौ साल का शिवम अब इस दुनिया में नहीं है...मां-बाप का इकलौता चिराग शिवम स्कूल के साथ पिकनिक पर मसूरी गया था...वहां होटल की बॉलकनी से गिरने से संदिग्ध परिस्थितियों में शिवम की मौत हो गई...शिवम के माता-पिता स्कूल के स्टाफ पर लापरवाही बरतने का आरोप लगा रहे हैं...स्कूल इस आरोप को खारिज़ करते हुए कह रहा है कि कोई लापरवाही नहीं बरती गई...रात को शिवम अपने कमरे में सो गया था...आधी रात को हादसा हुआ, इसमें स्कूल का स्टाफ क्या कर सकता है...हादसा कहीं भी किसी के साथ भी हो सकता है...

अब इससे कुछ दिन पहले की बात सुनिए...शिवम की मां निर्मल वर्मा ने शिवम से पूछा था कि वो 30 अप्रैल को अपने बर्थडे की पार्टी मनाना पसंद करेगा या मसूरी के ट्रिप पर जाना...ज़ाहिर है शिवम के लिए मसूरी का ट्रिप ज़्यादा रोमांचक था...उसने वही चुना...काश उसने ऐसा नहीं किया होता तो आज उसके मां-बाप की दुनिया नहीं उजड़ी होती...

शिवम की आत्मा के लिए शांति की प्रार्थना के साथ ये दुआ भी करता हूं कि ऐसा हादसा फिर कभी किसी बच्चे के साथ न हो...लेकिन शिवम की कहानी मेरे ज़ेहन में कई सवाल भी छोड़ गई है...क्या इस हादसे में सारा दोष स्कूल का ही है...पिकनिक पर साथ गई टीचर्स का ही है...निश्चित रूप से कहीं न कहीं बच्चे की देखभाल में स्कूल के स्टाफ से कोई चूक हुई होगी जो हंसता-मुस्कुराता शिवम आज इस दुनिया में नहीं है...लेकिन शिवम को हमेशा के लिए खोने में क्या उसके मां-बाप का कोई कसूर नहीं है....

शिवम की दुखद घटना कई पहलुओं पर शिद्दत के साथ सोचने को मजबूर करती है...क्या नौ साल का मासूम अपनी देखभाल करने लायक होता है...कहा जा सकता है कि बच्चों को ऐसे एडवेंचर टूर पर भेजने से उनके व्यक्तित्व का विकास होता है...लेकिन ये एडवेंचर टूर क्या मां-बाप अपने साथ बच्चे को नहीं करा सकते...जहां उसकी हर हरकत पर मां-बाप की नज़र रहेगी...स्कूल लाख सावधानी बरत ले लेकिन मां-बाप बच्चे की जितनी केयर कर सकते हैं, उतनी और कोई नहीं कर सकता...लेकिन जनाब गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में मां-बाप के पास इतना वक्त ही कहां हैं जो बच्चे पर खर्च कर सकें...

जैसे हमने रिश्वत देकर हर जगह काम चलाना सीख लिया है...ऐसे ही हमने अपनी कमज़ोरियों को छुपाने के लिए बच्चों को रिश्वत देना सीख लिया है...सिर्फ इसलिए कि बच्चे हम पर उंगली न उठा सकें कि हम उन्हें प्रॉपर वक्त नहीं दे पा रहे हैं...बच्चों को पढ़ाने के लिए हमारे पास वक्त नहीं है, हम उनके लिेए झट महंगी से महंगी ट्यूशन और कोचिंग की व्यवस्था कर देते हैं...बच्चों को पार्क में ले जाने का वक्त नहीं है, घर पर ही कम्प्यूटर, वीडियो गेम और भी जाने क्या क्या गैजेट्स का इंतज़ाम हम कर देते हैं...बच्चा अब दिन भर बिना बाहर की फ्रेश हवा खाए नेट पर क्या क्या देखता है, हिंसा से भरे कौन कौन से गेम देखता है, हमारी बला से...कम से कम हमें तो तंग नहीं कर रहा...

बस बच्चा खुश रहना चाहिए...हम ये सोच सोच कर इतराते रहेंगे कि हम बच्चे के लिए क्या क्या नहीं कर रहे...कितना पैसा खर्च कर रहे हैं इन बच्चों पर...और करें भी क्यों न, इन बच्चों के लिए ही तो है सब कुछ...पिज्जा, बर्गर, फिंगर चिप्स, कोक खा-पीकर फलते-फू...लते जा रहे अपने बच्चे हमें नज़र नहीं आएंगे....बल्कि उलटे बच्चे की सलामती के लिए ही कोई टोटका कर डालेंगे कि हमारा लाल बुरी नज़र से बचा रहे...रिच डाइट का हम बखान तो बहुत करते हैं लेकिन क्या जंक फूड तक बच्चों की पहुंच रोकने के लिए गंभीरता से कुछ करते हैं...नहीं जनाब हम बच्चे को पॉकेट मनी और मोबाइल देकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं...क्यों...क्योंकि हमारे अंदर खुद चोर है...कहीं बच्चा हमसे सवाल न पूछ बैठे कि हम उनके साथ खेलने के लिए, पढ़ने के लिए, आउटिंग पर जाने के लिए वक्त क्यों नहीं निकालते...इसीलिए हम बच्चों को खुश रखने के बहाने ढूंढते हैं तो असल में हम खुद की खाल बचा रहे होते हैं...

बच्चों के साथ एक बार बच्चा बन कर देखिए...सच में आपका बचपन लौट आएगा...आज ही शाम को बच्चे को साथ लेकर पार्क जाइए...पकड़ा-पकड़ी खेलिए, प्लास्टिक की बॉल से एक दूसरे को मारिए...सच कहता हूं, अपने दुनिया जहां के तनाव भूल जाएंगे और अपने उसी बचपन में लौट जाएंगे, जो न जाने कब का हमसे रूठ चुका है...एक बार करके तो देखिए...गाना गाने लगेंगे...कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन...

सोमवार, 10 मई 2010

अपने तो अपने होते हैं...खुशदीप

कल बात की थी मां के दूध की...एक देश में दो देश होने की...भारत की, इंडिया की...आज बात हाईराइज़ बिल्डिंग्स के दड़बेनुमा वन बीएचके, टू बीएचके फ्लैटों में रहने वाले मॉडर्न कपल्स की...

कभी कभी ये जोड़े फिटनेस के प्रतीक लिबासों में सुबह या शाम हवा पानी बदलने के लिए आसमान से उतर कर ज़मीन पर आते हैं...पार्क के नाम वाली हरीभरी छोटी सी ज़मीन पर टहलते दिखाई देते हैं...मोबाइल का साथ वहां भी नहीं छूटता है...बच्चा साथ मुश्किल ही दिखाई देता है...बच्चा होगा भी तो या तो कमर से बंधे पाउच में कसमसा रहा होगा या प्रैम में टांगे इधर से उधर मारता हुआ आसमान ताक रहा होगा...यही सोचता, शायद अभी मां या पिता की गोद का स्पर्श मिलेगा...बच्चा ज़ोर से रोएगा तो अगले ही पल दूध की बॉटल या वो छल्ले वाला प्लास्टिक का निपल उसके मुंह में होगा...किसी तरह बस चुप रहे...



अब दो पल फुर्सत के निकाल कर टहलने आए हैं, उसमें भी बच्चा रो कर सारा मज़ा खराब कर दे...फिर तो मुंह से यही निकलेगा न...ओह यार...शिट...क्या मुसीबत है...दो घड़ी चैन भी नहीं लेने देता...घर पर कोई संभालने वाला होता तो वहीं छोड़ आते...घर पर संभालने वाला कोई आए भी तो आए कहां से...जाइंट फैमिली में हमें रहना गवारा नहीं...न्यूक्लियर फैमिली मॉडर्न ट्रेंड है...फिर ये ओल्ड माइंडेड दादा-दादी, नाना-नानी के पास रह कर फाइव स्टार मैनर्स कैसे सीखेगा...ये क्या, हम ही कौन से बुज़ुर्गों की टोकाटाकी के बीच एक पल भी रह सकते हैं...उन्हें साथ रखने का मतलब अपनी आज़ादी पर अंकुश लगाना...

हां, पैसे से बच्चे की देखभाल के लिए मेड (आया) रखी जा सकती है...ज़्यादा पैसा है तो गवर्नेस ( हाइली-पेड मेड) की भी सेवाएं ली जा सकती हैं...मेड या गवर्नेस अच्छी नहीं मिलती, कोई बात नहीं ये ड्रीमवर्ल्ड जैसे एयरकंडीशन्ड क्रेश, प्लेइंग स्कूल, डे केयर सेंटर, किस दिन काम आएंगे...अब तो इनकी एसी गाड़ियां ही बच्चों को घर लेने भी आ जाती हैं, जो टाइम बताएगें, उसी टाइम पर वापस घर छोड़ने भी आ जाती हैं...कोई टेंशन नहीं...अंटी में बस माल होना चाहिए...पैसा फेंक, तमाशा देख...

आपकी नज़रों के सामने तो मेड मां से भी बढ़कर बच्चे की देखभाल करती नज़र आएंगी...लेकिन एक बार आपके काम पर जाने की देर है...फिर देखिए मेड के आपके ही घर पर महारानी जैसे ठाठ...बच्चा रोए, जिए उसकी भला से...दूध और पानी की बॉटल पास रख दीं...पीना है तो पी नहीं तो मर...मेड टीवी पर पसंदीदा सीरियल्स कभी नहीं छोड़ेगी...मौका मिला तो बॉय फ्रेंड से फोन पर बात भी कर लेगी...एक बार टीवी पर स्टिंग आपरेशन में एक मेड की करतूत दिखाई जा चुकी है...किस तरह बेरहमी से छोटे से मासूम को पीट रही थी...बेचारा माता-पिता से कोई शिकायत भी नहीं कर सकता...ठीक है सारी मेड या हेल्पर इस तरह के नहीं होते...लेकिन किसी एक भी बच्चे के साथ ऐसा हुआ है तो ख़तरे की संभावना को तो नहीं नकारा जा सकता...

आपके काम पर रहने के दौरान बच्चों को संभालने का एक और तरीका भी निकल आया है...एसी, पूल्स, प्रोजेक्टर से लैस ये क्रेश या प्लेइंग स्कूल देखने पर एक बार तो हर किसी को भ्रम होगा, कि बच्चा यहां से ज़्यादा खुश और कहीं नहीं हो सकता..लेकिन अब आपको ऐसे ही एक क्रेश की हक़ीक़त बताने जा रहा हूं...जिसे सुनकर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे...इस क्रेश में मासूमों को आधे-एक घंटे खिलाने के बाद नींद की हल्की दवा देकर चार-पांच घंटे के लिए सुला दिया जाता था...न बच्चे का रोना-धोना...न संभालने का झंझट...शाम को घर छोड़ने से एक घंटा पहले उठाया और बच्चा मां-बाप के हवाले...यहां भी ये कहा जा सकता है हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं हो सकतीं...कुछ क्रेश अच्छे भी हो सकते हैं...लेकिन आपके पास क्या गारंटी है कि बच्चे के साथ सब अच्छा ही हो रहा होगा...

ऐसी सूरत में फिर करें क्या...किसी पर तो विश्वास करना ही होगा...करिए न विश्वास अपनों पर...वही अपने जिन्होंने आपको भी रात जाग-जाग कर बड़ा किया है...वो क्या आपके लाडलों का आपकी पीठ के पीछे जान से ज़्यादा ध्यान नहीं रखेंगे...मैं बात कर रहा हूं दादा-दादी, नाना-नानी की...लेकिन इसके लिए आपको बड़ा सब्र का प्याला पीना होगा...एडजेस्टमेंट का फंडा सीखना होगा...काश संयुक्त परिवारों का फ़ायदा हम समझ सकें...काश हर भारतीय घर में एक बार फिर ऐसा हो सके...



मेरा पसंदीदा गाना सुनिए...

अपने तो अपने होते हैं....

रविवार, 9 मई 2010

आप भारत के हैं या इंडिया के...खुशदीप

कल मेरी पोस्ट पर शेफ़ाली पांडे की टिप्पणी ने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया...न जाने ऐसी कितनी माताएं होंगी जिन्हें रोज़ शेफ़ाली बहना जैसे हालात से गुज़रना होता होगा...कलेजे के टुकड़े को घर छोड़कर काम पर जाना होता होगा...

ये है तस्वीर का एक रुख, भारत की असली तस्वीर का...अब मैं दिखाता हूं आपको इंडिया की एक तस्वीर...मेरे दूर के रिश्ते में एक जोड़ा है...वेल सैटल्ड...पति एमएनसी में वाइस प्रेज़ीडेंट है, पत्नी कॉल सेंटर में वरिष्ठ अधिकारी...सब कुछ है उनके पास...दोनों अपनी हेल्थ पर बड़ा ध्यान देते हैं...लेकिन मैं उनके घर एक बार गया तो उनके दस और छह साल के दोनों बच्चे अपने माता-पिता को फर्स्ट नेम से संबोधित कर रहे थे...न मम्मी, न पापा...और वो जोड़ा खिलखिला कर हंस रहा था...पता चला बच्चे किसी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ते हैं...यानि उन्हें इंटरनेशनल सिटीजन बनाने की तैयारी की जा रही है...विदेश में हर रिश्ते को अंकल-आंट पर ही समेट दिया जाता है...लेकिन ये नया ट्रेंड मां-बाप को भी नाम लेकर बुलाना, किस आधुनिकता का परिचायक है, मेरी समझ से बाहर है...इसी सिलसिले में मुझे ब्लैक फिल्म में बच्ची का रोल करने वाली कलाकार आयशा कपूर भी याद आ रही है...किसी फिल्म पुरस्कार समारोह में उसे अवार्ड मिला तो उसने स्टेज पर आकर अमिताभ बच्चन को अमिताभ और संजय लीला भंसाली को संजय कह कर संबोधित किया...मेरे लिए वो दृश्य भी चौंकाने वाला था...नौ-दस साल की लड़की आयशा और 65 साल के अमिताभ...




यहां ये सवाल उठाया जा सकता है कि ये कुछ ही घरों की बात हो सकती है...देश में अब भी हर घर में माता-पिता को आदर से ही बुलाया जाता है...ठीक बात है आप की...लेकिन कल की मेरी पोस्ट पर राज भाटिया जी की टिप्पणी पर एक बार गौर फरमा लीजिए...राज जी का कहना है कि जर्मनी में लोग (खास तौर पर पुरुष) शादी से बचते हैं...वो कहते हैं जब सब बिना शादी ही मिल जाता है तो फिर इस ज़िम्मेदारी को गले में क्यों बांधा जाए...अब आप कहेंगे कि जर्मनी के परिवेश से भारत का क्या मतलब...मतलब है जनाब...बहुत मतलब है...ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में दुनिया एक ग्लोबल विलेज हो गई है...अब सात समंदर पार सात समंदर पार नहीं रहा...जब हम अपने देश में इंटरनेशनल स्कूल बना सकते हैं, बाहर की यूनिवर्सिटीज़ को यहां न्योता दे सकते हैं, पेप्सी, कोक, केएफसी, मैक्डॉनल्ड जैसी एमएनसी को अपने देश के बाज़ार पर छाते देख सकते हैं तो क्या वहां की कल्चर देश में इम्पोर्ट नहीं होगी...क्या लिव इन रिलेशनशिप, गे-रिलेशन, लेस्बियन रिलेशन...इन सबका नाम भी सुना था किसी ने भारत में...अब नाम ही नहीं सुना जाता बल्कि इनके राइट्स पर खुल कर बहस होती है, परेड निकाली जाती हैं...


मेरा इस सीरीज़ को लिखने का मकसद सिर्फ इतना है कि हमारे एक देश में जो दो देश बनते जा रहे हैं, उसके विरोधाभासों को आप तक पहुंचाऊं...मेज़ोरिटी हमारे देश में भारत वाले घरों की ही है...इसलिए वहां संस्कार है...लेकिन पिछले बीस साल में ग्लोबलाइजेशन का सबसे ज़्यादा फायदा जिन एक प्रतिशत लोगों को मिला वही अब इंडिया की नुमाइंदगी कर रहे हैं...देश का सारा पैसा इन्हीं हाथों में सिमटता जा रहा है...इनका एक पैर देश में और दूसरा पैर बाहर होता है...इन्हें देश या भारत की भावनाओं से कोई सरोकार नहीं, इनका मकसद सिर्फ पैसा और स्टेट्स है...इसके लिए ये कुछ भी कर सकते हैं...और विदेश की जितनी भी संस्कार जनित बुराइयां हैं, यही लोग देश में ला रहे हैं...

आखिर में एक बात कल मेरी पोस्ट पर रश्मि रविजा बहन समेत मातृशक्ति की ओर से कहा गया कि मां के दूध को फिगर से जोड़ कर सारी नारियों को कटघरे में खड़ा करना अनुचित है...बिल्कुल ठीक बात है...लेकिन मेरी पोस्ट के निहितार्थ को अगर ठीक ढंग से पढ़ा गया होता तो शायद ये आरोप मेरे पर नहीं आता...अभी तक मेरा जितना भी ब्लॉगिंग का अनुभव रहा है, आप सबने देखा होगा कि मैं मातृशक्ति का कितना सम्मान करता हूं...मेरा आशय सिर्फ इतना है कि मां का दूध अमृत होता है...और इसका युवा पीढ़ी में जितना प्रचार किया जाए, उतना कम है...डॉक्टर टी एस दराल ने मेरी पोस्ट पर अपनी टिप्पणी से साफ भी किया कि छह महीने तक हर हाल में शिशु को सिर्फ मां का दूध ही मिलना चाहिए...छह महीने से दो साल तक मां के दूध के साथ ठोस आहार और दो साल के बाद भी जहां तक संभव हो बच्चे को मां का दूध पिलाना चाहिए...डब्बाबंद दूध बॉटल के ज़रिए बेहद ज़रूरी होने पर या मेडिकल कॉम्पलिकेशंस पर ही पिलाया जाना चाहिए...लेकिन तीन महीने बाद बच्चे का मां का दूध छूटता है, चाहे वजह नौकरी हो या कोई और, ये बच्चे के साथ तो अन्याय है ही...

आज बस इतना...कल बात करूंगा बच्चे के लिए गोद में उठाना कितना ज़रूरी है और नौकरी वाले न्यूक्लियर फैमली के मां-बाप को छोटे बच्चों को घर पर या क्रेच में छोड़ने के क्या-क्या ख़तरे हो सकते हैं...हां एक बात और, ये मेरे विचार हैं...ज़रूरी नहीं कि आप इन से सहमत हों...सब का अपना जीने का अंदाज़ होता है...और अपने बच्चों की बेहतरी खुद मां-बाप से ज़्यादा अच्छी तरह कौन सोच सकता है...

क्रमश:



स्लॉग कविता



मुझे मां की दुआओं का असर लगता है,


एक मुद्दत से मेरी मां नहीं सोई,


जब मैंने इक बार कहा था,


"मां मुझे डर लगता है"...




(शेफाली पांडे समेत पूरी मातृशक्ति को समर्पित)

शनिवार, 8 मई 2010

कौन कहेगा, मां का दूध पिया है...खुशदीप

मां का दूध पिया है तो सामने आ...


छठी का दूध याद न दिला दिया तो मेरा नाम नहीं...


दूध का कर्ज़ कैसे चुकाऊंगा...

ये सारे डॉयलॉग आपने कभी बोले नहीं तो सुने ज़रूर होंगे...आज मदर्स डे पर अमर उजाला में प्रमोद भारद्वाज जी का शानदार लेख पड़ते हुए ये डॉयलॉग खुद-ब-खुद याद आ गए...आज महानगरों का जैसा परिवेश हो चला है...पाश्चात्य आधुनिकता की सिल्वर कोटिंग में युवा पीढ़ी जिस तरह का जीवन जीने की अभ्यस्त होती जा रही है, उसे देखते हुए मुश्किल लगता है कि अब नवजातों को मां का दूध नसीब भी होता होगा...ये नौनिहाल बड़े होकर कैसे सीना ठोक कर कह सकेंगे...मां का दूध पिया है तो सामने आ...



DISC (Double Income Single Child) या DINC (Double Income No Child) कपल्स की ये पीढ़ी जीवन की आपाधापी में इतनी व्यस्त है या व्यस्त होने को मजबूर है कि बच्चों को पालना भी बड़ा बोझ नज़र आने लगा है...हफ्ते में पांच दिन ऑफिस की दौड़...जिम, लंच सब आधुनिक ठंडे ऑफिसों में ही उपलब्ध...बचे दो दिन तो उनमें हफ्ते की सारी थकान उतारने के लिए आउटिंग या जान-पहचान वालों के यहां दारू या टी-पार्टी...अब बच्चों के लिए टाइम लाए तो लाए कहां से...

लिव-इन-रिलेशनशिप का शायद यही सबसे बड़ा फायदा है...शादी नहीं करेंगे तो बच्चे के लिए कोई क्यों पूछेगा कि मुंह मीठा कब करा रहे हो...खैर अब युवा पीढ़ी में सभी ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट होते हैं...इसलिए महानगरों में अब ये फ़िक्र कोई नहीं करता कि लोग क्या कहेंगे...सवाल लोगों के कहने का नहीं सवाल अपनी सुविधा का है...और इस सुविधा में बच्चे को पालना-परोसना...No way, it's just not suit to us...

तर्क दिया जाएगा, काम पर आपको स्मार्ट दिखना भी ज़रूरी है भई...इसलिए प्रेगनेंसी या नवजात को दूध पिलाने से फिगर खराब हुई तो कहां से उसे ठीक किया जाएगा...वो मुंर्गी वाली बात यहीं बड़ी सटीक बैठती है...जो खुद ही स्टोर पर अंडे खरीदने पहुंच जाती है...सेल्समैन के पूछने पर कहती है कि वो मेरे मुर्गे जी ने कहा है क्या दस-बीस रुपये के पीछे अपनी फिगर खराब करनी, अंडे मार्केट से ही ले आ...(हाई क्लास सोसायटी में खुद को सोशली कॉन्शियस दिखाने के लिए अनाथ बच्चों को गोद लेने के पीछे यही वजह तो नहीं है, सॉरी सुष्मिता सेन)

क्रमश:

इस मुद्दे पर पूरी सीरिज़ लिखने जा रहा हूं...पता नहीं कितनी कड़ियों में खत्म हो...फिलहाल मदर्स डे पर ये प्यारा सा गीत सुनिए...फ़ौजिया रियाज़ ने इसे अपने ब्लॉग पर लगा रखा है...इस वीडियो का तीसरा गाना है, लिंक खुलने पर कृपया सीधे वहीं क्लिक करिएगा...

मां, सुनाओ...मुझे वो कहानी...

शुक्रवार, 7 मई 2010

कौन बड़ा ?...खुशदीप

एक शराबी टुन्न होकर घर लौट रहा था...रास्ते में मंदिर के बाहर एक पुजारी दिखाई दिए...




शराबी ठहरा शराबी, पुजारी से ही पंगा लेने को तैयार...पूछ बैठा...सबसे बड़ा कौन ?

पुजारी ने पीछा छुड़ाने के लिए कहा...मंदिर बड़ा...

शराबी...मंदिर बड़ा तो धरती पर कैसे खड़ा ?

पुजारी...धरती बड़ी...

शराबी...धरती बड़ी तो शेषनाग पर क्यों खड़ी ?

पुजारी...शेषनाग बड़ा...

शराबी...शेषनाग बड़ा तो शिव के गले में क्यों पड़ा ?

पुजारी...शिव बड़ा...

शराबी...शिव बड़ा तो पर्वत पर क्यों खड़ा ?

पुजारी...पर्वत बड़ा...

शराबी...पर्वत बड़ा तो हनुमान के हाथ पर क्यों पड़ा ?

पुजारी...हनुमान बड़ा...

शराबी...हनुमान बड़ा तो राम के चरणों में क्यों पड़ा ?

पुजारी...राम बड़ा...

शराबी...राम बड़ा तो रावण के पीछे क्यों पड़ा ?

पुजारी...अरे मेरे बाप तू ही बता, कौन बड़ा ?

शराबी...इस दुनिया में वो बड़ा, जो पूरी बाटली गटक कर अपनी टांगों पर खड़ा...

(एक दोस्त के भेजे एसएमएस पर आधारित)



स्लॉग ओवर

गुल्ली भागता हुआ घर आया...चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं..

पिता मक्खन ने पूछा...क्या हुआ ? ऐसे घबराया हुआ क्यों है ?


गुल्ली...डैडी जी, मेरे पीछे दो बकरियां पड़ गईं...उन्हीं से बच कर आ रहा हूं...

मक्खन...शेर का पुतर होकर बकरियों से डर गया...शर्म आनी चाहिए तुझे...

गुल्ली...ओ डैडी जी आपको नहीं पता...मेरे मास्टर जी कहते हैं, मेरे दिमाग़ में भूसा भरा हुआ है...अगर वो बकरियां...

बुधवार, 5 मई 2010

सांप जी, अपना धर्म निभाते रहिए...खुशदीप

कल मैंने काफ़ी के कप पेश किए थे...पता नहीं किसी सज्जन को काफ़ी का टेस्ट इतना कड़वा लगा कि उन्हें बदहजमी हो गई...शायद उस सज्जन ने ठान लिया था कि मुझे कॉफी पिलाने का मज़ा चखाना ही चखाना है...वो सज्जन मेरी टांग से ऐसे लिपटे, ऐसे लिपटे कि मुझे गिरा कर ही माने...अवधिया जी ने कल अपनी पोस्ट में लिखा था बंदर के हाथ में उस्तरा...और ये उस्तरा और किसी ने नहीं ब्लॉगवाणी ने ही अनजाने में नापसंदगी के चटके की शक्ल में मुहैया कराया है...
 
 
 
अब या तो वाकई ये कोई ब्लॉगवुड की भटकी हुई आत्मा है जो हॉट लिस्ट पर घूम-घूम कर नापसंदगी का प्रसाद बांटती रहती है या फिर ये कोई भेड़ की शक्ल में छिपा भेड़िया है...आज ये मैं पोस्ट उसी भटकती आत्मा या भेड़िए को समर्पित कर रहा हूं...जितने चाहे नापसंदगी के चटके लगाना चाहता है, लगा ले...मैं साथ ही इस शख्स की तहे दिल से तारीफ़ भी कर रहा हूं...क्योंकि ये शख्स पूरी शिद्दत के साथ अपने धर्म का पालन कर रहा है...जिस तरह संत का धर्म होता है दूसरों का भला सोचना, उसी तरह सांप का धर्म होता है डसना...अगर वो डसे नहीं तो इसका मतलब है कि वो अपने धर्म से विमुख हो रहा है...आज ये पोस्ट धर्म का पालन करने का पूरा मौका दे रही है...किसे ?...कहने की ज़रूरत है क्या ?

सोमवार, 3 मई 2010

कॉफी के कप...खुशदीप

एमबीए छात्रों का एक बैच पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने अपने करियर में अच्छी तरह सैटल हो गया...एमबीए कॉलेज में फंक्शन के दौरान उस बैच के सारे छात्रों को न्योता दिया गया...बैच के सुपरवाइज़िंग प्रोफेसर ने खास तौर पर बैच को अपने घर कॉफी पर इन्वाइट किया...


प्रोफेसर के साथ बात करते बैच के छात्रों ने बताना शुरू किया...पैसा, रूतबा, गाड़ी, फ्लैट सब कुछ है लेकिन काम के टारगेट पूरे करने का हर वक्त बहुत दबाव रहता है...इसका असर घरेलू ज़िंदगी पर भी पड़ता है...


ये सुनने के बाद प्रोफेसर कॉफी ऑफर करने के लिए किचन में गए...वापस आए तो बड़ा सा कॉफी का पॉट और कई सारे कप लेकर आए...इन कपों में कुछ बोन चाइना, कट ग्लासेज़ के बेशकीमती कप थे और कुछ साधारण कांच और प्लास्टिक के....प्रोफेसर ने सबसे सेल्फ हेल्प करते हुए गर्मागर्म कॉफी लेने का आग्रह किया...


जब सबने अपने अपने कॉफी के कप लेकर सिप करना शुरू किया तो प्रोफेसर ने कहा...तुमने देखा, जितने भी सुंदर और कीमती कप थे, सब ने अपने अपने लिए चुन लिए...बस जो साधारण और प्लास्टिक के कप थे, वही बचे रह गए...ये इनसान के लिए स्वाभाविक है कि वो अपने लिए बेस्ट चाहता है...बस यही तुम्हारी सारी समस्याओं और तनाव की जड़ है...असल में तुम्हारी सब की ज़रूरत कॉफी थी, कप नहीं...लेकिन तुम सब ने सोच समझकर अपने लिए सबसे अच्छे कप चुने, यहां तक कि दूसरों के हाथों में और अच्छे कप जाने का तुम्हे अफ़सोस भी हुआ...



अब अगर ज़िंदगी कॉफी है तो जॉब, पैसा और समाज में हैसियत कप की तरह है...ये कप बस औज़ार हैं ज़िंदगी को पकड़ने के लिए...इनसे ज़िंदगी की क्वालिटी नहीं बदलती...लेकिन कई बार हम सिर्फ कप पर ही ध्यान देने की वजह से उसके अंदर की कॉफी का आनंद लेना ही भूल जाते हैं...

कपों को खुद पर हावी मत होने दो, कॉफी का मज़ा लो...


 स्लॉग ओवर


मक्खन और ढक्कन सड़क पर टहल रहे थे...

तभी सामने से एक ट्रक को मोटे रस्से से दूसरा ट्रक खींचते हुआ दिखाई दिया...

मक्खन...लोग सही कहते हैं यार...ये ड्राइवरों का भी न दिमाग नहीं होता...


ढक्कन...वो कैसे मक्खन भाई...

....

....

....

....

मक्खन...देख इन पागलों को...एक रस्से को ले जाने के लिए दो-दो ट्रक लगा रखे हैं...

शनिवार, 1 मई 2010

अुशदीप रख लूं क्या अपना नाम...खुशदीप


मरहूम शेक्सपीयर चचा क्या खूब कह गए हैं...नाम में क्या रखा है...वाकई नाम में क्या रखा है...आइडिया का एक एड आता है जिसमें इनसानों को नाम से नहीं बस नंबर से याद किया जाता है...वाकई ऐसा होता तो कितना अच्छा होता...मैं तो कहता हूं दुनिया से आधे झगड़े फसाद ही खत्म हो जाते...दो इनसान मिलते....अपना अपना नंबर बोलते...न जात का पता चलता, न मज़हब का...इशारों में बात करते तो और भी अच्छा होता...बोली न होने से न भाषा का झगड़ा रहता, न प्रांतवाद का...बस एक रंग का चक्कर ज़रूर तब भी रह जाता...लेकिन भारतीय तो ज़्यादातर गेहूंए रंग के ही होते हैं...कम से कम देश के अंदर नस्लभेद या रंगभेद की दिक्कत नहीं आती...

अरे ये क्या मैं तो उपदेश की शैली में आ गया...बात शुरू की थी मरहूम शेक्सपीयर की अमर कृति रोमियो-जूलिएट के कालजयी कोट से- नाम में क्या रखा है...गुलाब का नाम अगर कुछ और होता तो क्या उसकी खूबसूरती या खुशबू कम हो जाती...



वैसे हमारे देश में बच्चे के जन्म लेने के साथ ही नाम चुनने पर बड़ा ज़ोर दिया जाता है...पंडित जी से वर्णमाला से कोई अक्षर निकाला जाता है और फिर शुरू हो जाती है नाम रखने की कवायद...पूरा ज़ोर होता है कि नाम सार्थक हो और बिल्कुल अनयूज़्युल...इस प्रचलन का एक तो फायदा हुआ कि अब बच्चों के शुद्ध हिंदी में एक से बढ़कर एक सुंदर नाम रखे जाने लगे हैं...चलो हिंदी की किसी मामले में तो प्रासंगिकता अब भी बनी हुई है...

अब आता हूं अपने नाम पर...खुशदीप...ओ राम जी, तेरे इस नाम ने बड़ा दुख दीना...दूसरों को बेशक ये नाम पसंद आता हो लेकिन इस नाम की वजह से मैं बचपन से ही विचित्र स्थितियों का सामना करता आ रहा हूं...बचपन में मम्मी-पापा से शिकायत करता था कि इस नाम का बच्चा मुझे और कोई क्यों नहीं मिलता...अब मम्मी-पापा क्या जवाब देते...एक और राज़ की बात बताऊं...बचपन में मेरे बाल मरफी बॉय की तरह लंबे हुआ करते थे...और मम्मी मुझे ऊनी लाल रंग का जम्पर सूट पहना देती थी तो सब मुझे खरगोश बुलाना शुरू कर देते थे...उस खरगोश से ही मेरा निक नेम निकला...खरगोशी...फिर खोशी....घरवाले और सारे करीबी इसी नाम से बुलाते और स्कूल में खुशदीप...

खोशी से तो मुझे कभी दिक्कत नहीं रही लेकिन खुशदीप...उफ तौबा...पहली बार में तो कोई मेरा नाम ठीक से समझता ही नहीं...छूटते ही कहता है कुलदीप....मैं समझाता हूं...नहीं जनाब, खुशदीप...फिर सुनने वाला ऐसा भाव देता है जैसा बोलने पर बड़ा ज़ोर पड़ रहा हो...अच्छा खुशदीप...स्कूल में कोई नई मैडम अटैंडेंस लेती तो रजिस्टर पर नाम पर सरसरी नज़र डालकर ही बुलाती...खुर्शीद....मैं बड़ा हिचकता, डरता उन्हें ठीक कराता...खुर्शीद नहीं खुशदीप...मुझे स्कूल ले जाने वाला रिक्शावाला तो और भी गज़ब ढहाता...सुबह घर आता और हॉर्न के साथ ही ज़ोर से पूरे मोहल्ले को सुनाता हुआ आवाज़ देता...खु...दीप....मैं छोटे से बड़ा हो गया लेकिन मज़ाल है कि उस रिक्शे वाले के मुंह से मेरे खुशदीप का श कभी निकला हो...

कॉलेज आते आते मेरा ये मिशन बन गया कि अपनी नामराशि का कम से कम एक बंदा तो ढ़ूंढ कर ही छोड़ूंगा...साल पर साल बीतते गए लेकिन कामयाबी नहीं मिली...एक दिन अखबार में मैं खुशदीप नाम देखकर उछल पड़ा...अरे नहीं जनाब मैंने कोई तीर नहीं मारा था और न ही मेरा नाम पुलिस की वांटेड लिस्ट में था जो अखबार में आता...मैंने सोचा आज तो मैंने अपने नाम का बंदा ढूंढ ही लिया...लेकिन ख़बर पढ़ी तो वो बंदा नहीं बंदी निकली...खुशदीप कौर...भारतीय हॉकी टीम की प्लेयर...चलो बंदा न सही बंदी ही सही...कोई तो खुशदीप मिला (या मिली)...

नब्बे के दशक के आखिर में इंटरनेट का चमत्कार हुआ तो मेरी कोशिश फिर वही थी कि सर्च पर डालकर देखूं कि दुनिया में और कितने खुशदीप हैं...वहां एक नाम मिला खुशदीप बंसल (कोई मशहूर आर्किटेक्ट हैं), एक डॉक्टर भी हैं...जानकर बड़ी तसल्ली हुई कि कम से कम कुछ और खुशदीप तो हैं जिन्हें नाम को लेकर वैसे ही हालात से गुज़रना पड़ा होगा जैसे कि मैं हमेशा गुज़रता आया हूं...

लेकिन अपने नाम को लेकर सबसे ज़्यादा मज़ा ब्लॉगिंग में आ रहा है...कुलवंत हैप्पी ने कुछ दिन पहले बताया था कि उनके एक पंजाबी उपन्यास के नायक का नाम खुशदीप है...अभी दो दिन पहले मेरी पोस्ट पर वंदना जी ने टिप्पणी भेजी थी, जिसका पहला शब्द था...hushdeep ji (हुशदीप जी)...बस शू.... और आगे जोड़ देतीं तो जीवन का आनंद आ जाता...ऐसे ही एक बार शिखा वार्ष्णेय जी ने मेरा नाम शखुदीप टाइप किया था...सुनने में ही कितना क्यूट लगता है, बिल्कुल मेल शूर्पनखा जैसा....ज़ाहिर है वंदना जी और शिखा जी दोनों ही मेरी वेलविशर्स हैं, टाइपिंग ने धोखा दिया...लेकिन क्या हसीन धोखा था...

अब आता हूं असली बात पर मैं देख रहा हूं ब्लॉगिंग में से शुरू होने वाले नाम के जितने भी ब्लॉगर्स हैं सभी बड़ा धाकड़ लिखते हैं...मसलन

डॉ अमर कुमार


अनूप शुक्ल


अनिल पुसदकर


अरविंद मिश्र


अजित व़डनेरकर


अविनाश वाचस्पति


अजित गुप्ता


अवधिया जी


अदा


अजय कुमार झा


अनीता कुमार


डॉ अनुराग

अमरेंद्र त्रिपाठी

आशा जोगलेकर


अर्चना

अमर सिंह


अलबेला खत्री


अपनत्व


अल्पना वर्मा


अन्तर सोहेल

अब मेरा लेखन भी ज़ोरदार हो जाए तो क्या मैं भी अपना नाम खुशदीप से अुशदीप रख लूं...

वैसे मेरे गुरुदेव समीर लाल समीर तो सरस्वतीपुत्र हैं लेकिन अगर उनके नाम पर भी अ वाला फंडा अपनाया जाए तो उनका नाम हो जाएगा अमीर लाल समीर...

लेकिन सबसे क्लासिक नाम चेंज होगा...हरदिलअज़ीज अपने ताऊ का...

आssssssऊ....यानि आऊ (क्या कहा, ये सुनकर किसका नाम याद आ गया, शक्ति कपूर का...आप भी न बस...ताऊ का रामपुरी लठ्ठ देखा है न...हां नहीं तो...)


स्लॉग ओवर

गुल्ली की स्कूल और मोहल्ले से शिकायतें आने का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा था...एक दिन पिता मक्खन ने गुल्ली को बुला कर प्यार से समझाया...देखो तुम्हारी जब भी शिकायत आती है मेरे सिर का एक बाल चिंता से सफ़ेद हो जाता है...

गुल्ली...आज समझ आया कि दादा जी के सारे बाल सफ़ेद क्यों हैं ?