शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

कामयाबी का श्योर शॉट फॉर्मूला...खुशदीप

कुछ लोग कामयाब होने के बस ख्वाब बुनते हैं...


कुछ नींद से जागते हैं और दिन रात एक कर देते हैं...


फिर एक दिन कामयाबी खुद उनके कदम चूमती है...
 


स्लॉग ओवर 

देवदास...पिताजी ने कहा, हवेली छोड़ दो,


मां ने कहा, पारो को छोड़ दो,

पारो ने कहा, दारू छोड़ दो,

और एक दिन आएगा जब...

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...

...

...

पारो के बच्चे कहेंगे, मामू हमें स्कूल छोड़ दो...

 




बुधवार, 28 अप्रैल 2010

सर, अड़सठ को इंग्लिश में क्या कहते हैं...खुशदीप

एक बटा दो, दो बटे चार,
छोटी छोटी बातों में बंट गया संसार...
नहीं नहीं, मैं बीमारी का झटका सह कर इतना भी मक्खन नहीं हुआ कि बाबाओं की तरह आपको उपदेश देने लगूं...इस काम के लिए तो पहले से ही बहुत सारे महानुभाव सक्रिय हैं...दरअसल,मुझे फिल्में भी हल्की-फुल्की ही पंसद आती हैं, जिन्हें देखकर दिमाग में कोई टेंशन न हो...इसी तरह की पोस्ट मैं लिखने और पढ़ने की कोशिश करता हूं...जिसे पढ़कर आपके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ जाए, मेरी नज़र में वही लेखन सबसे ज्यादा कामयाब है...इससे पहले कि मैं रौ में बहने लगूं और सारी कसर इसी पोस्ट में निकालने लगूं, सीधे मुद्दे की बात पर आता हूं...

मुझसे अक्सर आफ़िस में नए सहयोगी (अपनी पारी की शुरुआत करने वाले लड़के-लड़कियां) पूछते रहते हैं कि अड़सठ को इंग्लिश में क्या कहते हैं...सेवेंटी नाइन या एटी नाइन को हिंदी में क्या कहा जाएगा...फोर्टी नाइन हिंदी में कैसे लिखा जाएगा या उच्चारण कैसे किया जाएगा...ये समस्या सिर्फ आफिस की ही नहीं, मेरे घर की भी है...मेरा बेटा सृजन और बिटिया पूजन भी अक्सर ऐसे ही सवाल मुझसे करते रहते हैं...

ये बच्चे विदेश से पढ़ कर नहीं आ रहे हैं...ये हमारे भारत के स्कूलों से ही पढ़े हैं या पढ़ रहे हैं...अगर हमारे बच्चों को हिंदी की गिनती का ठीक से पता नहीं है तो कसूर किसका है...हमारे एजुकेशन सिस्टम का, स्कूलों का या फिर खुद हमारा...लेकिन आप खुद ही सोचिए आज आप हिंदी के अंक मसलन १,२,३,४,५,६,७,८,९ कितनी जगह लिखा देखते हैं...यहां तक कि हिंदी अख़बारों में भी रोमन अंक ही इस्तेमाल किए जाते हैं जैसे कि 1,2,3,4,5,6,7,8,9...जब हिंदी के अंक खुद ही प्रचलन से विलुप्त होते जा रहे हैं तो फिर हम अपने बच्चों को क्यों दोष दें...



यहां तक तो ठीक है, लेकिन मेरा सवाल दूसरा है...हिंदी लिखते हुए रोमन अंकों का इस्तेमाल कितना जायज़ है...इस विषय में एक ही तरह का मानदंड क्यों नहीं अपना लिया जाता...जिस तरह हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं, मुझे नहीं लगता कि भविष्य में हिंदी के अंकों का कोई महत्व रह जाएगा...आप इस बात को पसंद करें या न करें, हिंदी को बढ़ावा देने का कितना भी दम भरें, लेकिन मुझे तो यही लग रहा है कि हिंदी अंकों का कोई नामलेवा भी नहीं रह जाएगा...हिंदी के ये अंक बस संदर्भ ग्रंथों या संग्रहालयों की ही शोभा बन कर रह जाएंगे...जैसे कि आज गांधी जी के चरखे का हाल है...

आप सब ब्लॉगरजन इस विषय में क्या सोचते हैं...क्या हिंदी लिखते वक्त भी हिंदी अंकों की जगह अंग्रेज़ी के अंकों को अपना लिया जाना चाहिए...मुझे खुद ऐसा करने में ही सुविधा महसूस होती है...या फिर मैं गलत हूं...और हिंदी लिखते वक्त सिर्फ हिंदी के अंकों का ही इस्तेमाल करना चाहिए....



स्लॉग ओवर

मक्खन हिसाब किताब में खुद को बड़ा तेज़ समझता है...बाज़ार से सारी खरीददारी भी खुद ही करता है...मज़ाल है कि कोई दुकानदार मक्खन को बेवकूफ़ बना ले...(बने बनाए को कौन बना सकता है)...एक बार मैं घर के पास डिपार्टमेंटल स्टोर में खरीददारी करने गया तो देखा मक्खन आस्तीने चढ़ा कर बिलिंग काउंटर पर सेल्समैन से भिड़ा हुआ था...अबे तू देगा कैसे नहीं...हराम का माल समझ रखा है...खून पसीने की कमाई है...ऐसे कैसे छोड़ दूं फ्री की चीज़...
 
मेरी समझ में माज़रा नहीं आया...मैंने जाकर पूछा...क्या हुआ मक्खन भाई, कैसे पारा चढ़ा रखा है...मक्खन कहने लगा...देखो भाई साहब, मैंने स्टोर से जूस के दो बड़े पैक खरीदे हैं...और उन पर दो-दो चीज़ें फ्री लिखी हुई हैं और ये मुझे जूस के साथ वो दे नहीं रहा...मैंने कहा...दिखाओ मक्खन भाई, जूस के पैक के साथ क्या फ्री दे रहे हैं...मक्खन ने जूस के पैक मेरी तरफ बढ़ा दिए... उन पर लिखा था- शुगर फ्री, कोलेस्ट्रॉल फ्री...

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

भविष्य का लैपटॉप...खुशदीप

ये पोस्ट तो नहीं है, लेकिन जर्मनी का लैपटॉप का ऐसा कॉन्सेप्ट है कि आपको भी देख कर मज़ा आ जाएगा..इसलिए आपको दिखाने के लोभ से खुद को बचा नहीं पा रहा हूं...लीजिए आप खुद ही क्लिक करके देखिए...

रोलटॉप


स्लॉग ओवर


मक्खन को डिटेक्टिव की नौकरी के लिए इंटरव्यू कॉल आई...

इंटरव्यू में मक्खन से पूछा गया...गांधी जी को किसने मारा था ?

मक्खन...थैंक्स सर, आपने मुझे इस पोस्ट के लिए चुना...मैं आपको जल्दी ही पता लगा कर बता दूंगा कि गांधी जी को किसने मारा ?

रविवार, 25 अप्रैल 2010

संडे स्पेशल में बंदर और मक्खन...खुशदीप

ये उन दिनों की बात है जब हम मेरठ के गवर्मेंट इंटर कॉलेज के होनहार (?) छात्र हुआ करते थे...पढ़ा क्या करते थे, एक जैसी सोच वाले हम कुछ मस्तमौलाओं ने चांडाल चौकड़ी बना रखी थी...

हम सब में सबसे ज़्यादा मोटा आलोक हुआ करता था...वो लेदर की काली जैकट पहनकर स्कूल आया करता तो दूर से ही ऐसा लगता कि गेंडा अपनी मस्ती में चला आ रहा है...रोज़ उसकी सुबह स्कूल के गेट पर रिक्शे वाले से किचकिच के साथ होती थी...आलोक का घर स्कूल से मुश्किल से सात-आठ सौ मीटर की दूरी पर होगा...आलोक महाराज को सुबह घर से निकलते ही सिगरेट की तलब लगती थी...अब पैदल चलते तो किसी भी जानने वाले के देख लेने का डर होता था...तो ये क्या करते, एक रिक्शा करते और उस बेचारे रिक्शे वाले को न जाने कौन कौन सी पतली गलियों से घुमाते हुए स्कूल लाते, जिससे आराम से सुट्टे मारते सिगरेट खत्म की जा सके...

अब ज़ाहिर है इतना चलने के बाद रिक्शा वाला पैसे ज़्यादा तो मांगेगा ही...वो पांच रुपये मांगता (उस ज़माने में पांच रुपये भी बहुत होते थे) और आलोक महाराज उसकी हथेली पर एक या दो रुपये रखते...अब रिक्शा वाला लाख हाथ पैर पटकता लेकिन मजाल है कि आलोक जी टस से मस हो जाएं...ऊपर से तुर्रा ये कि चार पांच लोगों को और इकट्ठा कर लेते कि बताओ इतनी पास से आया (सात-आठ सौ मीटर) और पांच रुपये मांग रहा है...अब लोगों को क्या पता कि जनाब गरीब रिक्शे वाले को पूरा मेरठ घूमाकर ला रहे हैं...वो उस रिक्शेवाले को ही कोसते- क्यों बेचारे बच्चे को लूट रहा है...

वैसे ये आलोक जी बजरंग बली के परम भक्त थे...हर मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर गुलदाने का प्रशाद चढ़ाना नहीं भूलते थे...एक दिन रोज़ के रूटीन की तरह हमारी चांडाल चौकड़ी क्लास से बंक मार कर सड़क पर चाय वाले के यहां चाय-समोसे का आनंद ले रही थी...हम एक समोसा लेते थे, आलोक जी कम से कम तीन-चार समोसे और कुछ बिस्किट जब तक गप न कर लेते, उनके विशालकाय शरीर को तृप्ति नहीं मिलती थी...

ऐसे ही एक दिन चाय वाले के पास गप्पों का दौर चल रहा था कि सामने से बाउंड्री वाल पर आलोक जितना ही मोटा ताजा एक बंदर खरामा-खरामा (धीरे मस्त चाल) आता दिखाई दिया...हम सब सतर्क होना शुरू हो गए, सिवा आलोक महाराज के...आलोक ने कड़ी आवाज़ में हमें आगाह कर दिया...इस बंदर को कोई कुछ नहीं कहेगा...ये भगवान का भेजा दूत है और हमें इम्तिहानों के लिए आशीर्वाद देने आया है...अब वो बंदर बिल्कुल पास आ गया...हम तो अलग हो गए थे लेकिन आलोक जी अपने आसन पर जस के तस विराजमान थे और उस वक्त उनके हाथ में बिस्किट था...उन्होंने बड़े प्यार से बिस्किट बंदर जी की सेवा में पेश किया...बंदर न जाने किस मूड में था, शायद बंदरिया से लड़ कर आ रहा था, उसने आव देखा न ताव, बिस्किट का तो चूरा करके फेंक ही दिया, ऊपर से बत्तीसी दिखाता हुआ खीं खीं कर आलोक जी के कंधे पर चढ़ बैठा...लगा उनके मोटे मोटे गाल नोचने...नुकीले पंजों के वार सहते हुए आलोक जी को दिन में तारे नज़र आने लगे...वो तो भला हो चाय वाले का, उसने डंडा दिखाकर बंदर को आलोक से अलग किया...



अगला दृश्य

मैदान में बंदर आगे-आगे...और आलोक जी पूरी ईंट लेकर बंदर के पीछे पीछे हंड्रेड मीटर स्प्रिंट रेस लगा रहे थे...हम भी पीछे-पीछे हो लिए...आलोक जी साथ में चिल्लाते जा रहे थे....मार डालो साले को...ये बंदर है सिर्फ बंदर, और कुछ नहीं...आज मैं इसे निपटा कर ही दम लूंगा...

बंदर तो क्या ही हाथ आना था...आलोक जी का सांस थोड़ी देर में ही फूल गया...पसर गए मैदान में ही टांगे चौड़ी कर के...आलोक जी अब एक क्लिनिक में थे और उन्हें एटीएस के टीके लग रहे थे...


स्लॉग ओवर

मक्खन का दिमाग एक बार ज़्यादा ही हिल गया तो उसे Dr Chopra, psychotherapist को दिखाया गया...डॉक्टर पूरी तरह तो मक्खन को ठीक नहीं कर पाया लेकिन मक्खन खुद ज़रूर ये समझने लगा कि वो अब बिल्कुल ठीक है...मक्खन डॉक्टर को फीस तो पूरी देता ही रहा था लेकिन वो अब Dr Chopra को भगवान मानने लगा...डॉक्टर के पीछे ही पड़ गया कि मेरे लायक कोई काम हो तो बताओ...डॉक्टर ने पीछा छुड़ाने के लिए कह दिया कि उसके क्लीनिक के बाहर लगी नेमप्लेट पुरानी हो गई है, हो सके तो उसे नई बनवा कर ला दो...मक्खन ने कहा...बस इतना सा काम, कल ही लीजिए डॉक्टर साहब...अगले दिन मक्खन ने नई नेम प्लेट लाकर डॉक्टर के क्लीनिक के बाहर लगा दी...डॉक्टर ने आकर वो नेम प्लेट देखी तो उसे खुद अपनी ही फील्ड के बड़े एक्सपर्ट को दिखाने की ज़रूरत पड़ गई...नेमप्लेट पर लिखा था...

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"Dr Chorpa, Psycho The Rapist"



डिस्क्लेमर- पंजाबी में पा भाई को कहते हैं...Dr Chorpa यानि डॉ चोर भाई...

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों...खुशदीप

सबसे पहले तो मैं आभारी हूं आप सब का...

जी के अवधिया, एम वर्मा, विवेक रस्तोगी, ललित शर्मा, संगीता स्वरूप, सुरेश चिपलूनकर, काजल कुमार, सतीश सक्सेना, अविनाश वाचस्पति, अजित गुप्ता, मो सम कौन, संजीत त्रिपाठी, वंदना, सुमन, डॉ टी एस दराल, राज भाटिया, सामाजिकता के दंश, बी एस पाबला, पंडित डी के शर्मा वत्स, ताऊ रामपुरिया, अनूप शुक्ल, डॉ रूपचंद्र शास्त्री मयंक, राजभाषा हिंदी, अदा जी, सतीश पंचम, समीर लाल समीर, अजय कुमार झा, प्रतिभा, विनोद कुमार पांडेय, धीरू सिंह, हरकीरत हीर, दीपक मशाल, शोभना चौधरी, रोहित (बोले तो बिंदास), वीनस केसरी, राजीव तनेजा, वाणी गीत, महफूज़ अली, डॉ अमर कुमार, सागर, मुक्ति, सर्वत एम...



मुझे नहीं पता था कि मेरी ज़रा सी तकलीफ़ पर आप सब इतनी चिंता जताएंगे...वाकई आप सब का प्यार पाकर लगा कि ब्लॉगवुड कितना एक दूसरे की फिक्र करने वाला परिवार है...कौन कहता है हिंदी ब्लॉगिंग का कुछ नहीं हो सकता...कौन कहता है कि हम बस आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं...एक-दूसरे की टांग खिंचाई में ही हमें मज़ा आता है...अरे ऐसा कौन सा परिवार होता है जिसमें बर्तन खटकते नहीं...परिवार की पहचान संकट काल में होती है...जब परिवार का हर छोटा--बड़ा सदस्य चुनौती का सामना करने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर मैदान में डट जाता है...हिंदी ब्लॉगिंग भी ऐसा ही एक गुलदस्ता है...क्या हुआ अगर गुलदस्ते में फूलों के साथ कुछ कांटे भी आ जाते हैं...अरे अगर ये कांटे न हो तो फूलों की कोमलता-सुंदरता-शीतलता का एहसास ही किसे हो...

रही बात मेरे स्वास्थ्य की...छह फुट का हट्टा कट्टा शरीर है...ये थोड़े बहुत झटके तो लगते ही रहते हैं...लेकिन आप सबके स्नेहाशीष से मुझमें शारीरिक और मानसिक प्रतिरोधक ताकत भरपूर है...इसलिए कहीं कोई दिक्कत नहीं...वैसे भी मेरा प्रिय गीत है...गाओ मेरे मन, चाहे रे सूरज चमके न चमके, लगा हो ग्रहण, गाओ मेरे मन...

मेरी पिछली पोस्ट पर कुछ टिप्पणियां बड़ी मज़ेदार आईं, उन्हीं का अजय कुमार झा स्टाईल में टिप्पणी पर टिप्पा करता हूं...

एम वर्मा की टीप
टंकी पर चढने से परहेज क्यों अब तो हर टंकी पर लिफ्ट लगवाने की योजना पर अमल भी हो चुका है...
मेरा टिप्पा
वर्मा जी मैंने टंकी के रास्ते के बीचोबीच खूंटा गाड़ दिया है...वो इसलिए कि भविष्य में जिसे भी टंकी पर चढ़ना-उतरना हो, उसका ऑन द स्पॉट हेल्पिंग हैंड बन सकूं...


काजल कुमार की टीप
अब टाइम बचाने की सोच ही ली है तो कुछ समय नियमित योग भी कर लिया करो भाई, साथ ही आयुर्वेद की भी कुछ कमाई करवा दो...
मेरा टिप्पा
काजल भाई, क्यों बैठे-बिठाए डॉ दराल, डॉ अमर कुमार, डॉ अनुराग से मेरे मधुर रिश्तों पर पानी फेरना चाहते हो...योग, आयुर्वेद ने स्वस्थ कर दिया तो फिर डॉक्टर, नर्सिंग होम...

सतीश सक्सेना की टीप
हम बड़े दिन से एक मरीज ढून्ढ रहे हैं कुछ प्रयोग करने को ! 25-30 साल से होमिओपैथी समझने की कोशिश कर रहे हैं ! बिना मरीज न हम होमिओपैथी को समझ पा रहे हैं ना होमिओपैथी हमें समझ पा रही है ! बताओ कब मिलोगे ??
मेरा टिप्पा
बहुत अच्छे सतीश भाई, आज ही एक ख़बर पढ़ रहा था कि अमेरिका में मेडिकल रिसर्च वालों को प्रयोगों के लिए एक लाख रुपये में भी बंदर नहीं मिलता...जबकि भारत में 500 रुपये में ही इस काम के लिए बंदर मिल जाता है...बाहर वालों ने इस फायदे को भुनाने के लिए यहां प्रयोगशालाएं भी खोल ली हैं...और आप 500 रुपये भी खर्च किए बिना मुझ पर सारे प्रयोग आजमाना चाहते हैं...चलिए, आप भी क्या याद करेंगे, कितना ताबेदार छोटा भाई है...बनवाता हूं अपने शरीर को आपकी प्रयोगशाला...


अविनाश वाचस्पति की टीप
भाई खुशदीप सहगल के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए माननीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री को एक अपील जारी कर दी जाए...
मेरा टिप्पा
यानि सरकारी अस्पताल में इलाज का इंतज़ाम...ठहरो अविनाश भाई पहले अपना थोड़ा बीमा बढ़वा लूं...

सुमन की टीप
Nice
मेरा टिप्पा
सुमन जी एक बार में ही पूरी जान मांग लो न...ये बार बार नाइस का हथियार इस्तेमाल करना कहां तक ठीक है...


डॉ टी एस दराल की टीप
खुशदीप भाई , मैं तो शुरू की कुछ पंक्तियाँ पढ़कर ही जान गया था कि आप मिस्टर एक्स बन चुके हैं...
मेरा टिप्पा
तो लगे हाथ डॉक्टर साहब एक मिस्टर सिक इंडिया कॉन्टेस्ट भी करवा दीजिए न...टॉप फाइव में तो आ ही जाऊंगा...

राज भाटिया की टीप
अजी हमारे यहां टंकी पर चढने के लिये स्पेशल रियायतें दी जा रही है, एक ब्लागर के साथ दूसरा फ्री, एक महीना ऊपर रहे एक सप्ताह फ्री...
मेरा टिप्पा
अब राज़ समझ आया राज जी की ओर से टंकी बनवाने पर इतना पैसा खर्च करने का...ये बिल्ड एंड ट्रांसफर वाला मामला था...जैसे आजकल भारत में हाईवे बनाकर आने-जाने वालों से टॉल वसूला जाता है...मान गए राज जी आपके बिज़नेस सेंस को...

बी एस पाबला की टीप
आखिर ले ही लिया ना पंगा? ब्लॉगिंग ने इस हाल में पहुंचा दिया कि शक्ल से ही बेवड़ा लगने लगे! ये इश्क नहीं आसां, इक आग का दरिया है!!!
मेरा टिप्पा
ए पंगा लैणा वी वीर जी तुसा ही सिखाया वे...हुण सारेयां नू ए न दस देना बॉडी दे किस पार्ट विच...


ताऊ रामपुरिया की टीप
जब आपको इतनी तकलीफ़ थी तो सीधे डा. ताऊनाथ अस्पताल चले आना था, वहां रामप्यारी से कैट-स्केन करवाकर इलाज शुरु करवा लेते. समीरलाल जी भी रामप्यारी से कैट-स्केन करवाकर ही इलाज करवाते हैं...
मेरा टिप्पा
अरे ओ ताऊ...क्यों गुरु और शिष्य में झगड़े के बीज बोण पर तुला है...राम प्यारी को बीच में डालकर...अब राम प्यारी के सुंदर सुंदर हाथों से कैट स्कैन करवाने के लिए कौन न मर मिटे...

उड़न तश्तरी की टीप
स्वास्थ्य तो सर्वोपरि है भाई. हफ्ते में दो बार लिखना और बाकी जितना समय मिल पाये उतना पढ़ने से, आराम बहुत मिल जाता है...
मेरा टिप्पा
गुरुदेव इतना आराम भी ठीक नहीं कि वो आपके गार्डन में आने वाली दो बच्चियों को गलतफहमी हो जाए और साधना भाभीजी को खुश होने का मौका मिल जाए...

अजय कुमार झा की टीप
हू हा हा हा पोस्टों की सारी कसर पूरी करने के लिए हम हैं न...आज से ही ओवर टाईम शुरू कर देते हैं...
मेरा टिप्पा
अजय भाई सुना है भाभी जी पंजाबण हैं...और पंजाबणों का गुस्सा मैं अच्छी तरह जानता हूं...भलाई इसी में है, संभल जाओ वत्स...

'अदा' की टीप
अब का करें राम ई मक्खन बूढ़ा गया,
सब तो लिखे रोज़ रोज़ वो दो पोस्ट पर आ गया,
अब का करें राम ई मक्खन बूढ़ा गया...
मेरा टिप्पा
बेचारा मक्खन,
अब आजकल के नए ज़माने को क्या दोष दें कि बूढ़ों को फालतू का सामान समझते हैं...आप जैसी विद्वान भी...यू टू ब्रूट्स...

धीरू सिंह की टीप
हम जैसे ठलुये भी दिमाग नही लगा पाते रोज़ एक पोस्ट लिखने को जबकि आप तो जानते ही है अपन तो चिन्ताविमुख, ईश्वर की दया पर पलने वाले लाट साहब सरीखे है जो अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम के उत्कृष्ट उदाहरण हैं... .
मेरा टिप्पा
धीरू भाई, आज पता चला कि पोस्ट लिखने के लिए दिमाग की भी ज़रूरत पड़ती है...

हरकीरत ' हीर' की टीप
दस साल पहले .....???
मेरठ में ....???
कौन थी वो ....????
दुआ है आप जल्द तंदरुस्त हों .....!!
मेरा टिप्पा
हीर जी, ए हाल पे पूछेंदे हो या जान पे घडेंदे हो...
ऐ मेरा पिछला राज़ दस के मैणू पत्नीश्री नाल घार रहण देणा जे या नहीं...

डा० अमर कुमार की टीप
अपनी लगाम कुछ दिनों के लिये बीबी के हाथों पकड़ा दे, या मैं अपनी वाली भेज दूँ ? बस एक चिन्ता लग पड़ी है, तू लिखता था तो मैं आलसी और लिखाई-चोर हो गया था । अब मज़बूरन कुछ न कुछ मुझे ही लिखना पड़ेगा...
मेरा टिप्पा
डॉक्टर साहब स्त्री कोई भी हो करंट तो मारेगी ही...आप ताईजी को भी भेजकर क्यों मुझे डबल झटके दिलवाना चाहते हो...और हां कहते हैं न हर काम में कोई न कोई अच्छाई होती है...इसी बहाने आपको ज़्यादा पढ़ने का मौका तो मिलेगा...

मुक्ति की टीप
बाप रे खुशदीप भाई,
आप अपनी सेहत का ख़्याल रखिये...ये तो चिन्ता करने वाली बात है, जिसे आप यूँ हँसी-हँसी में कह गये...
मेरा टिप्पा
मुक्ति दीदी, अपना उसूल जो ठहरा...
गम पे धूल डालो, कहकहा लगा लो,
कांटों की नगरिया राजधानी है,
तुम जो मुस्कुरा दो जिंदगानी है,
हे यारों नीलाम करो सुस्ती,
हमसे उधार ले लो मस्ती,
मस्ती का नाम तंदरूस्ती...

सर्वत एम की टीप
यूरिक एसिड बढ़ गया, पेट तो मैं दिल्ली में बढ़ा हुआ देख ही चुका था, चेहरे से तो नहीं लेकिन ऊपर वाले ने जो नशीली आँखें बख्शी हैं, उससे डाक्टर क्या, राह चलता भी कोई पूछ ही लेगा कि भाई इस इलाके में कहाँ मिलती है, बता दो, आप तो जानते ही होगे...
मेरा टिप्पा
अरे सर्वत भाई,
एक हम ही तो है जो आंखों से मय पिलाते हैं,
कहने को तो इस शहर में मयखाने हज़ारों हैं,
इन आंखों की मस्ती के...

मेरे ये सारे टिप्पे निर्मल हास्य के तहत ही लिए जाएं...
अब आप सबके लिए एक गीत...

अहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों,
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों...


स्लॉग ओवर
मक्खन को किसी ने सलाह दे दी कि आजकल सबसे ज़्यादा कमाई स्कूल खोलने से होती है...मक्खन लगा ख्याली घोड़े दौड़ाने...परम सखा ढक्कन से परामर्श किया...ढक्कन ने मशविरा दिया कि आजकल नाम की बड़ी इम्पोर्टेंस होती है इसलिए सबसे पहले तो स्कूल का ऐसा नाम सोच जो सबसे अलग हो और पहले किसी ने भी रखा न हो...इससे तेरा स्कूल बिल्कुल अलग पहचान बना लेगा...

मक्खन महीनों सोचता रहा...फिर एक दिन उसके दिमाग की बत्ती जली...फौरन ढक्कन के पास दौड़ा चला आया और घर के बाहर से ही चिल्ला कर बोला...यूरेका....यूरेका...मैंने स्कूल का नाम तय कर लिया है...ढक्कन ने पूछा...आखिर क्या नाम रखा स्कूल का...

मक्खन का जवाब था...मक्खन सिंह गर्ल्स कॉलेज फॉर ब्वायस...

रविवार, 18 अप्रैल 2010

अलविदा तो नहीं कह रहा लेकिन...खुशदीप

नहीं, नहीं मैं कहीं टंकी-वंकी पर चढ़ने नहीं जा रहा...क्योंकि आप उतरने को कहोगे तो शोले के सांभा की तरह मेरे घुटने दर्द करेंगे...आखिर उम्र का भी तकाजा है...इसलिए अपने लिए बीच का रास्ता निकालने की सोच रहा हूं...सोच क्या रहा हूं, सोच लिया...बस आज से अमल शुरू कर दिया है...



हां तो जनाब, और भी गम है ज़माने में ब्लॉगिंग के सिवा...डॉक्टर टी एस दराल ने दो दिन पहले ब्लॉगिंग एडिक्ट्स के लिए आंखें खोल देने वाली पोस्ट लिखी...मैंने उस पोस्ट में कमेंट में लिखा था कि पान, बीड़ी, सिगरेट, न तंबाकू का नशा, हमको तो ब्लॉगिंग तेरी मुहब्बत का नशा...लेकिन नशा तब तक ही ठीक रहता है, जब तक वो आपके काबू में रहे, अगर नशा आप पर काबू पाने लगे तो गुरदास मान के स्टाइल में समझो...मामला गड़बड़ है...

अगर आपके पास ब्लॉगिंग के लिए एक्स्ट्रा टाइम है तो शौक से इस शौक को पूरा करिए...लेकिन दूसरे ज़रूरी कामों या सेहत की कीमत पर ब्लॉगिंग के लिए दीवानगी दिखाना एक दिन आपको ही दीवाना बना देगी...हां, जो ब्लॉगिंग में नए खिलाड़ी है, उनके लिए शुरू में पहचान बनाने को ब्लॉगिंग में अतिरिक्त मेहनत समझी जा सकती है...लेकिन एक बार पहचान बन जाने के बाद अपने ऊपर स्पीड गवर्नर लगा लेना ही समझदारी है...

आठ महीने हो गए आपको रोज़ एक पोस्ट से पकाते-पकाते...जब मैं खुद लिख लिख कर पका हुआ आम हो गया हूं तो आप क्यों नहीं पकेंगे भला...वो कहते हैं न...Excess of anything is bad...इससे पहले कि जो थोड़ी बची खुची जवानी चेहरे से झलकती है, वो भी अलविदा कह दे...अच्छा है संभल जाएं...

हुआ ये है कि जनाब ब्लॉगिंग के चक्कर में और तो कुछ नहीं बस निंदिया रानी का ज़़रूर मैं दुश्मन हो गया...रात को देर तक जागने ने कमाल ये दिखाया कि शुगर, यूरिक एसिड, कोलेस्ट्रोल (गुड तालिबान नहीं बैड तालिबान) सब कुछ बढ़ गया...डॉक्टर ने टेस्ट कराए तो जो रिपोर्ट आई, हर टेस्ट पर स्टार (खतरे के) बने हुए थे...मेडिकल रिपोर्ट ला कर अपनी बिटिया को बड़ी शान के साथ दिखाई...कहा- स्कूल के रिपोर्ट कार्ड में बिटिया जी हर सबजेक्ट में स्टार आप ही नहीं ला सकते, हम भी ला सकते हैं...

पत्नीश्री कब से कह रही थी, सेहत का ख्याल कर लो, ख्याल कर लो...लेकिन बुरी आदत थी न, पत्नीश्री की बात एक कान से सुनने और दूसरे कान से निकाल देने की...अब भी ऐसा ही कर रहा था...लेकिन एक दिन पांव ऐसा भारी हुआ (अरे,अरे कोई मेडिकली अनहोनी मत समझिए) कि ज़मीन पर रखना ही बंद हो गया...हमें तो किसी ने पाकीज़ा के राजकुमार की तरह ये भी नहीं कहा था कि पैर ज़मीन पर मत रखिएगा, मैले हो जाएंगे...वो तो दर्द ही इतना था कि नामुराद पैर ने खुद ही ज़मीन पर उतरने से मना कर दिया...सोचा मोच-वोच आ गई होगी...लेकिन कुछ महासयानों ने डराया कि हेयर लाइन फ्रैक्चर भी हो सकता है...

किसी तरह रिक्शे पर लद-फद कर अस्पताल पहुंचा...बकरा कटने के लिए आता देख अस्पताल के स्मार्ट स्टाफ ब्वायज़ ने सीधे एमरजेंसी ओपीडी में पहुंचा दिया...वहां डॉक्टर पर रौब झाडने के लिए जताना चाहा कि बारहवीं तक ज़ूलोजी पढ़ रखी है, डॉक्टर साहब कोई मसल या लिगामेंट तो टियर नहीं कर गया या फिर हेयरलाइन फ्रेक्चर हो गया लगता है...डॉक्टर ने ऐसा भाव दिखाया कि मैं उन्हें कोई मक्खन का चुटकुला सुना रहा था....डॉक्टर ने पैर का एक्सरे कराने के लिए दूसरे कमरे में रेफर कर दिया...एक्सरे करने वालों के शरीर में तभी हरकत आई जब उन्होंने चार सौ रुपये एडवांस जमा होने की पर्ची देख नहीं ली...एक्सरे कराने के बाद हाथों हाथ पैर का काला नक्शा हाथ में थमा दिया...वापस आया लंगड़ाते लंगड़ाते ओपीडी वाले डॉक्टर के पास...डॉक्टर ने काले परनामे को लाइट की तरफ कर देखा और ऐलान कर दिया...कोई फ्रैक्चर-व्रैक्चर नहीं हुआ...मन में तो आया, कह दूं कि फिर गरीब के चार सौ रुपये क्यों एक्सरे-मशीन को गपा दिए...खैर अब उस डॉक्टर की दिव्य दृष्टि जागी और उसने मुझे रियूमेटोलॉजी एक्सपर्ट को रेफर कर दिया...वहां भी मोटी फीस का नज़राना चढ़ाया...

डॉक्टर साहब ने चेक किया और कहा...दारू-वारू ज़्यादा ही पीते लगते हो...अब मैं सोचने लगा कि ब्लॉगिंग ने क्या इस हाल में पहुंचा दिया है कि शक्ल से ही बेवड़ा लगने लगा हूं...मुश्किल से ज़ुबान से शब्द निकले...डॉक्टर साहब लाल परी को तो आज तक चखा भी नहीं...डॉक्टर भी पूरे मूड में था...शायद बाहर वेट कर रहे मरीजों का आंकड़ा हाफ सेंचुरी पार होते देख बाग़-बाग़ था...डाक्टर ने चुटकी ली...मैं चखने की नहीं, सीधे गटकने की बात कर रहा हूं...बड़ी मुश्किल से डॉक्टर को विश्वास आया कि अल्कोहल से मैं कोसो दूर रहता हूं...डॉक्टर ने लिपिड प्रोफाइल, शुगर, फास्टिंग शुगर, यूरिक एसिड और भी न जाने कितने टेस्ट का पर्चा हाथ में थमा दिया...हिम्मत कर मैंने पूछ ही लिया...डॉक्टर साहब पैर में बीमारी क्या लगती है...डॉक्टर ने अहसान सा जताते कहा...गाउट...टेस्ट के नतीजे आ गए...डॉक्टर भी नतीजे देख अंदर ही अंदर प्रसन्नचित, लंबी रेस का बकरा जो फंसा था...(डॉक्टर दराल, डॉ अमर कुमार, डॉ अनुराग...सॉरी)...डॉक्टर ने हर हफ्ते दिखाने की ताकीद के साथ पर्चा भर कर दवाइयां रिकमेंड कर दी...(अब तक चार हज़ार का फटका लग चुका था)...अब इलाज चालू आहे...

खैर आप सोच रहे होंगे कि मैं अपना ये स्वास्थ्य-पुराण सुनाकर आपको क्यों बोर कर रहा हूं...ये इसलिए सुना रहा हूं कि शायद मेरी गाथा से ही उन्हें कोई संदेश मिल जाए, जिन्होंने ब्लॉगिंग के नशे में खुद को दीवाना बना रखा है...ये सब तो चल ही रहा था कि हमें अचानक इल्म हुआ कि अपने साहबजादे (सृजन) ग्यारहवीं में आ गए हैं...अब उसके लिए भी अगले दो साल पढ़ाई में सब कुछ झोंकने के है...अचानक पिता का कर्तव्य भी हिला हिला कर हमें झिंझोड़ने लगा...अब साहबजादे की पढ़ाई के लिए भी कुछ वक्त निकालना है...

ऐसी परिस्थितियों में क्या रास्ता बचता था हमारे लिए...ब्लॉगिंग को अलविदा बोलें और टंकी पर चढ़ जाएं...वो मुमकिन नहीं...वजह पहले ही बता चुका हूं, घुटनों का दर्द...फिर क्या करूं...रौशनी की किरण और कहीं से नहीं, हज़ारों किलोमीटर दूर गुरुदेव समीर लाल जी समीर के द्वारे से ही दिखी...यानि उन्हीं का फंडा अपनाया जाए...हफ्ते में सिर्फ दो पोस्ट...बाकी दिन खाली वक्त मिलने पर सिर्फ दूसरे ब्लॉग्स को पढ़ा जाए...वैसे भी चक्करघिन्नी बना होने की वजह से पिछले कुछ दिनों से दूसरे ब्लॉग्स पर कमेंट ही नहीं कर पा रहा था...तो जनाब, अब से पोस्ट के ज़रिए आप से रविवार और बुधवार को ही मुलाकात हो सकेगी...हां कमेंट के ज़रिए ज़रूर आपसे रोज़ मिलने की कोशिश करूंगा...आशा है आप इस मेकशिफ्ट अरेंजमेंट को भी अपना स्नेहाशीष देते रहेंगे...आप से अगली मुलाकात अब बुधवार को होगी...

स्लॉग ओवर

इम्तिहान के दौरान सात काम जो लड़कियां करती हैं-


1 लिखना
2 लिखना
3 लिखना
4 लिखना
5 लिखना
6 लिखना
7 लिखना


इम्तिहान के दौरान सात काम जो लड़के करते हैं-


1 चेक करना कि कमरे में लड़कियां कितनी हैं
2 अगर कोई युवा लेडी सुपरवाइज़र है तो उसकी उम्र का अंदाज़ लगाना
3 प्रश्नपत्र के पीछे पिकासो स्टाइल में चित्रकारी करना
4 याद करना कि नकल के लिए पिछली रात तैयार की गईं पर्चियां शरीर में कौन कौन सी जगह विराजमान हैं
5 जियोमेट्री बॉक्स की एक-एक चीज़ के ब्रैंड नेम से लेकर उनकी उत्पत्ति पर विचार करना (टाइम तो पास करना है न)
6 अपने को कोसना कि क्यों पिछली रात पढ़ाई के लिए बेकार में काली की
7 इम्तिहान से छूटते ही मूवी और बियर की रूपरेखा दिमाग में तैयार करना

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

पिंजरा...खुशदीप

ये आप सब का प्यार ही था जो मुझे पहली कहानी...न हिन्दू, न मुसलमान, वो बस इनसान...लिखने का हौसला मिला था...आज फिर उसी दिशा में एक और प्रयास कर रहा हूं...पिंजरा शीर्षक से कहानी लिख कर...पसंद आए या न आए, स्नेह बनाए रखिएगा...



पिंजरा...

मल्लिका और बादशाह बाग़-ए-बहारा में टहल रहे थे...मौसम भी बड़ा दिलकश था...टहलते-टहलते मल्लिका की नज़र एक पेड़ की शाख पर बैठे बेहद खूबसूरत तोते पर पड़ी...इंद्रधनुषी रंगों से सज़ा ये तोता बड़ी मीठी बोली बोल रहा था...तोते पर मल्लिका का दिल आ गया...यहां तक कि मल्लिका बादशाह से बात करना भी भूल गई...तोते को एक टक देख रही मल्लिका के दिल की बात बादशाह समझ गए...बादशाह ने फौरन सिपहसालारों को हुक्म दिया- शाम तक ये तोता बेगम की आरामगाह के बाहर लगे झूले के पास होना चाहिए...और इस तोते के लिए बड़ा सा सोने का पिंजरा बनवाने का फौरन इंतज़ाम किया जाए...

एक बहेलिये की मदद से सिपहसालारों ने थोड़ी देर में ही तोते पर कब्ज़ा पा लिया...तोते को महल ला कर बेगम की आरामगाह में पहुंचा दिया गया...शाम तक सोने का पिंजरा भी लग गया...तीन-चार कारिंदों को ये देखने का हुक्म दिया गया, तोते को खाने में जो जो चीज़ें पसंद होती है, थोड़ी थोड़ी देर बाद उसके पिंजरे में पहुंचाई जाती रहें...तोते को पास देखकर मल्लिका की खुशी का तो ठिकाना नहीं रह गया...लेकिन तोते के दिल पर क्या गुज़र रही थी, इसकी सुध लेने की भला किसे फुरसत...कहां खुले आसमान में परवाज़, एक शाख से दूसरी शाख पर फुदकना...मीठी तान छेड़ना...और अब हर वक्त की कैद...आखिर इस मल्लिका और बादशाह का क्या बिगाड़ा था, जो ये आज़ादी के दुश्मन बन बैठे...मानता हूं, खाने के लिए सब कुछ है...लेकिन ऐसे खाने का क्या फायदा...मनचाही ज़िंदगी जीने की आज़ादी ही नहीं रही तो क्या मरना और क्या जीना...

तोते का गुस्सा बढ़ जाता तो पिंजरे की सलाखों से टक्करें मारना शुरू कर देता...शायद कोई सलाख टूट जाए और उसे वही आज़ादी मिल जाए. जिसके आगे दुनिया की कोई भी नेमत उसके लिए अच्छी नहीं...सलाखें तो क्या ही टूटने थीं, तोते के पर ज़रूर टूटने लगे थे...दिन बीतते गए तोता उदास-दर-उदास होता चला गया...तोते पर किसी को तरस नहीं आया...दिन-महीने-साल बीत गए...लेकिन तोते का पिंजरे से बाहर निकालने के लिए टक्करें मारना बंद नहीं हुआ...

एक बार मल्लिका बीमार पड़ गई...बादशाह आरामगाह में ही मल्लिका को देखने आए...मल्लिका को निहारते-निहारते ही बादशाह की नज़र अचानक तोते पर पड़ी...तोते को गुमसुम उदास देख बादशाह को अच्छा नहीं लगा...लेकिन उसने मल्लिका से कुछ कहा नहीं...मल्लिका को एक सयाने को दिखाया गया तो उसने बादशाह को सलाह दी कि किसी बेज़ुबान परिंदे को सताने की सज़ा मल्लिका को मिल रही है...इसलिए बादशाह हुज़ूर अच्छा यही है कि पिंजरे में कैद इस तोते को आज़ाद कर दिया जाए...

मल्लिका से जान से भी ज़्यादा मुहब्बत करने वाले बादशाह ने हुक्म दिया कि तोते को फौरन आज़ाद कर दिया जाए...हुक्म पर तामील हुई...तोते के पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया गया...ये देख तोते को आंखों पर भरोसा ही नहीं हुआ...भरोसा हुआ तो तोते ने पूरी ताकत लगाकर पिंजरे से बाहर उड़ान भरी...लेकिन ये क्या तोता फड़फड़ा कर थोड़ी दूर पर ही गिर गया...या तो वो उड़ना ही भूल गया था या फिर टूट टूट कर उसके परों में इतनी ताकत ही नहीं रही थी कि लंबी उड़ान भर सकें...

तोते की ये हालत देख उसे फिर पिंजरे में पहुंचा दिया गया...अब तोता शान्त था...फिर किसी ने उसे पिंज़रे से बाहर आने के लिए ज़ोर लगाते नहीं देखा...शायद इसी ज़िंदगी को तोते ने भी अपना मुस्तकबिल (नियति) मान लिया...


स्लॉग चिंतन...

हमारे पूर्वजों ने जान की कुर्बानी देकर हमें ये दिन दिखाया कि हम आज़ाद हवा में सांस ले सकें...इस आज़ादी की कीमत समझें...इसे यूं ही व्यर्थ न गवाएं...अब शारीरिक गुलामी का नहीं ज़ेहनी गुलामी का ख़तरा है...तरक्की के नाम पर नेता देश को मल्टीनेशन कंपनियों के आगे बेच देना चाहते हैं...याद रखिए कि अब अकेली ईस्ट इंडिया कंपनी नहीं, कई विदेशी कंपनियों की भारत पर गिद्ध नज़र है...कब तक हम ये ख़तरे भूल कर आईपीएल की रंगीनियों में डूबे रहेंगे...मुनाफ़े का बाज़ार काम करेगा, तिजोरियां विदेश में भरेंगी...और हमारे हाथ फिर खाली के खाली ही रहेंगे...

चलते चलते ये गीत भी सुन लीजिए...

स्लॉग गीत

पिंजरे के पंछी रे, तेरा दर्द न जाने कोए

फिल्म- नागमणि (1957)

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

ये भी एक दौर है, वो भी एक दौर था...खुशदीप

ये भी एक दौर है, वो भी एक दौर था,
आज जहां है धोनी, वहां कल कोई और था...


पहले जब कभी जीतता था भारत,
देश रहता होली-दीवाली से सराबोर था...




आज क्रिकेट में जीतता है सिर्फ पैसा,
हर तरफ़ आईपीएल की रंगीनियों का शोर सा...





ये भी एक दौर है, वो भी एक दौर था...

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

सिर्फ एक ही निकला असली मर्द का बच्चा...खुशदीप

कयामत के बाद धरती पर कोई शादीशुदा व्यक्ति जीवित नहीं बचा...सब स्वर्ग में जाने की इच्छा लिए इंतज़ार करने लगे...तभी ईश्वर प्रकट हुए...उन्होंने आते ही कहा कि मैं चाहता हूं जितने भी पुरुष है, दो कतार बना ले...एक कतार में वो पुरुष खड़े हो जाएं जो सही तौर पर अपने घर के मुखिया थे, यानि घर में उन्हीं की चलती थी...और एक कतार में वो खड़े हो जाएं, जो सिर्फ पत्नियों के इशारे पर ही तमाम उम्र चलते रहे...


वहां जितनी भी महिलाएं मौजूद थीं, ईश्वर ने उन्हें सेंट पीटर को रिपोर्ट करने के लिए कहा...

जल्दी ही सारी महिलाएं वहां से चली गईं...इसके बाद पुरुषों ने कतार बनाना शुरू कर दिया...अपनी पत्नियों के कहने पर चलने वाले पुरुषों की मीलों मील लंबी कतार लग गई...अपने घर के सर्वेसर्वा पुरुषों वाली कतार में सिर्फ एक पुरुष खड़ा था...



ईश्वर ने ये देखकर लंबी कतार वाले पुरुषों को लताड़ना शुरू किया...तुम सबको अपने पर शर्मिंदा होना चाहिए...मैंने तुम सबको अपने-अपने घरों का मुखिया बनने के उद्देश्य से धरती पर भेजा था...लेकिन तुम सब नाफ़रमान निकले...तुम्हे प्रमुख बनाने का उद्देश्य ही यह था कि तुम अपने घरवालों के मस्तिष्क में आध्यात्मिक प्रकाश फैलाओ...तुमने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे मेरी सारी योजना धरी की धरी रह गई...लेकिन मुझे खुशी है कम से एक तो असली मर्द का बच्चा निकला...उसका नाम है हैरी नायडू...हां तो हैरी बेटा ज़रा इन सब नामाकूलों को बतायो कि तुम ने कैसे मेरी बात का मान रखा...किस तरह तुम अपनी कतार में खड़े होने वाले अकेले पुरुष बन सके...बताओ हैरी, इन सब को बताओ अपना अनुभव, जिनसे इनके दिमाग की खिड़कियां खुल सकें..सब कुछ बताओ इन्हें...
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.....


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कतार में अकेले खड़े हैरी नायडू ने कहा...मैं ये सब कुछ नहीं जानता...मुझे मेरी पत्नी कोगी ने इस कतार में खड़े रहने के लिए कहा था...

नोट..जहां तक पुरुषों का सवाल है, मुझे दोनों कतारो का मतलब अच्छी तरह समझ आ गया...लेकिन एक उत्सुकता शांत नहीं हो रही....ईश्वर ने जब सभी महिलाओं से सेंट पीटर्स को रिपोर्ट करने के लिए कहा तो वहां कौन सा नज़ारा उत्पन्न हुआ होगा...अगर महिलाओं ने भी कतार लगाई तो कौन सी महिला कौन सी कतार में खड़ी हुई होगी...अगर सुधि ब्लॉगरजन इस का हल करने की कोशिश करें तो मैं बहुत आभारी रहूंगा...

(ईृ-मेल से अनुवाद)

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

ईश्वर आपके लिए क्या करे ?...खुशदीप

ईश्वर आपके लिए क्या करे ?...यही था वो टॉपिक जिस पर बुज़ुर्गो के कल्याण के लिए काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ने शहर में रहने वाले बुज़ुर्गों से उनके विचार मांगे...कई बुज़ुर्गों ने अपने विचार भेजे...पांच श्रेष्ठ विचारों को छांट कर उनमें से सर्वोत्तम छांटने के लिए शहर की कुछ जानीमानी हस्तियों को बुलाया गया...उनमें शहर के एक बहुत बड़े कारोबारी भी थे...बड़ी मुश्किल से इस कार्यक्रम के लिए वो वक्त निकाल कर आए थे...टाइप की गई पांच कॉपियों में से आखिरकार सर्वश्रेष्ठ विचार ये चुना गया...

ईश्वर, आज मैं आपसे बहुत खास मांगने जा रहा हूं...हो सके तो मुझे टेलीविजन बना दीजिए...मैं उसकी जगह लेना चाहता हूं...उसी की तरह घर में जीना चाहता हूं...सबसे अहम स्थान पर मैं बैठा रहा हूं और सारा परिवार मेरे इर्द-गिर्द रहे...मैं जब बोलूं तो सब मुझे गंभीरता से सुनें...मैं ही सबके आकर्षण का केंद्र रहूं और बिना कोई रोक-टोक या किसी के सवाल किए अपनी बात कहता रहूं...जब मैं किसी वजह से काम करना बंद कर दूं तो मुझे वैसी ही देखभाल मिले जैसे कि टीवी के काम बंद कर देने पर उसे मिलती है...फौरन उसकी नब्ज़ देखने के लिए मैकेनिक (या डॉक्टर) बुलाया जाता है या उसे ही रिपेयर शॉप (नर्सिंग होम) भेज दिया जाता है...मेरा बेटा काम से थक-टूट कर आने के बाद भी जिस तरह टीवी को कंपनी देना नहीं भूलता, वैसे ही मुझे भी दे...मुझे टीवी की तरह ही लगे कि मेरा परिवार कभी कभी मेरे लिए अपने और सब ज़रूरी काम भी छोड़ सकता है...और सबसे बड़ी बात...मुझे लगे कि मैं अपनी बातो से अपनों को खुश रख सकता हूं, उनका दिल बहला सकता हूं...

आभार गूगल


 
 सर्वश्रेष्ठ विचार किस बुज़ुर्ग ने भेजा था, ये जानने के लिए आयोजकों ने लिस्ट से नंबर के अनुसार बुज़ुर्ग का नाम और पता पढ़ा...

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अब चौंकने की बारी शहर के बड़े कारोबारी की थी...नाम और पता, उसके पिता और खुद के घर का था...


मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

सभी टंकी प्रेमियों के लिए पढ़ना ज़रूरी...खुशदीप

सुप्रभात...

अगर लोग आपकी टांग खिंचाई करते हैं, आपको आहत करते हैं, या आप पर चिल्लाते हैं, परेशान मत होइए...

बस इतना याद रखिए...हर खेल में शोर दर्शक मचाते हैं, खिलाड़ी नहीं...



आपका दिन शुभ हो...

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

वक्त वक्त की बात है...खुशदीप

वक्त बदलते देर नहीं लगती...जो आज है वो कल नहीं था...जो आज है वो कल नहीं रहेगा...

अमेरिका...दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र...

भारत...दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र...

अमेरिका को विश्व में सबसे बड़ी शक्ति माना जाता है...भारत विकसित देश बनने की ओर तेज़ी से अग्रसर है...ये स्थिति उलट भी सकती है...कैसे भला...वो ऐसे...



अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स के मशहूर कॉलमनिस्ट थामस फ्रेडमैन ने एक स्पीच में कहा...



कल

जब हम बच्चे थे तो अमेरिका में हमें डिनर में सब्ज़ियां खाने की सलाह दी जाती थी...ये भी कहा जाता था कि खाने में जूठ न छोड़े...इसके लिए हमें भारत में भूख से मरने वाले बच्चों का हवाला दिया जाता था...


और आज


आज मैं अपने बच्चों से कहता हूं...अपने स्कूल का होमवर्क पूरा करो...ज़रा भारत के स्कूलों के तेज़तर्रार बच्चों का ध्यान करो...अगर तुम होमवर्क ढंग से नहीं करोगे तो भारत के यही बच्चे कल तुम्हे भूखा मरने के लिए मजबूर कर देंगे...

रविवार, 11 अप्रैल 2010

न हिंदू, न मुसलमान...वो बस इनसान...खुशदीप

दो-तीन दिन पहले सतीश सक्सेना भाई ने देश की गंगा जमुनी तहज़ीब का हवाला देते हुए पोस्ट लिखी थी...साथ ही कौमी सौहार्द की मुहिम में साथ देने की अपील भी की थी...बहुत सोचा, सतीश भाई का किस तरह साथ दूं...यही सोचते-सोचते एक कहानी ने मेरे दिमाग में जन्म लिया...ज़िंदगी में पहली बार कहानी लिखी है...कोई कमी-पेशी हो तो अनाड़ी समझ कर माफ़ कर दीजिएगा...और अगर मुझे कहीं दुरूस्त कराने की ज़रूरत हो तो ज़रूर कीजिएगा...


कथा परिचय

मुखर्जी साहब बैंक के बड़े मैनेजर...बरसों से रहीम मियां मुखर्जी साहब के घर पर ड्राइवरी करते आ रहे थे...मुखर्जी साहब का बेटा सुदीप्तो तो अपने रहीम काका से इतना घुला-मिला था कि स्कूल जाने से पहले तैयार होने में मदद लेने से लेकर दूध भी उन्हीं के हाथों पीता था...सुदीप्तो ग्यारह साल का ज़रूर हो गया था लेकिन होश संभालने के बाद से ही रहीम काका को हर दम आंखों के सामने ही देखता आया था...उनके साथ खेलता...रोज़ नई कहानियां सुनता...या यूँ कहें कि रहीम काका को देखे बिना उसे चैन ही नहीं आता था...रहीम दिन भर मुखर्जी साहब के घर रहते बस रात को ही अपने घर सोने जाते...ये भी अच्छा था कि रहीम जिस अकबर टोला नाम के मोहल्ले में रहते थे, वो मुखर्जी साहब की कॉलोनी कालीबाड़ी के साथ ही सटा हुआ था...पैदल का ही रास्ता था...सुदीप्तो के एक-दो बार जिद पकड़ने पर कि रहीम काका का घर देखना है, रहीम उसे मोहल्ले में लेकर जाकर बाहर से ही अपना घर दिखा लाए थे...घर के अंदर की बदहाली को जानते हुए रहीम की सुदीप्तो को घर ले जाने की हिम्मत नहीं हुई थी...

दृश्य 1

मुखर्जी साहब को क्लोजिंग के चलते आज बैंक जल्दी निकलना है...रहीम गाड़ी पर कपड़ा मार रहे हैं...मुखर्जी साहब तेज़ी से निकलते हैं और रहीम से कहते हैं...रहीम मियां, शहर की फिज़ा बहुत ख़राब चल रही है...ये मंदिर-मस्जिद के विवाद में कब क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता...तुम ऐसा करो, ये दो हज़ार रुपये रख लो और दस-पंद्रह दिन की छुट्टी लेकर घर पर ही रहो...मैं नहीं चाहता कि तुम किसी परेशानी में पड़ो...मेरी फिक्र मत करो मैं आफिस के ड्राइवर रमेश को बुला लूँगा या खुद ही गाड़ी ड्राइव करके काम चला लूंगा...जब माहौल ठंडा हो जाएगा, तब ड्यूटी पर आ जाना...रहीम के मुंह से इतना ही निकल सका...जी साहब...रहीम की आंखों में सुदीप्तो का ही चेहरा घूम रहा था...दस-पंद्रह दिन सुदीप्तो क्या करेगा...और खुद उनका दिन भी कैसे बीतेगा...ये तो अच्छा है कि सुदीप्तो दो दिन के लिए नानी के घर गया हुआ है...नहीं तो रहीम का मुखर्जी साहब के घर से जाना ही मुश्किल होता...रहीम भारी मन से अपने घर की ओर चल दिए...


दृश्य 2

दो दिन हो गए रहीम को ड्यूटी पर नहीं गए हुए...खाली दिन भर घर बैठना मुश्किल हो गया...रहीम गली के नुक्कड़ पर जान मोहम्मद की चाय की दुकान पर जाकर बैठ गए...वहां मज़हब को खतरे की दुहाई देते हुए मोहल्ले का छुटभैया नेता चार पांच लोगों को बैठा देख ज़ोरदार तकरीर झाड़ रहा था...हाथ पर हाथ रखे बैठे रखने से कुछ नहीं होगा...अपनी हिफ़ाजत का इंतज़ाम खुद ही करना होगा...ये पुलिस भी उन्हीं की है और कलेक्टर भी...कर्फ़्यू लगा तो हमारे मोहल्ले में ही सबसे ज़्यादा सख्ती बरती जाएगी...बॉर्डर (अकबर टोला और कालीबाड़ी को जोड़ने वाला नाका) के उस पार उन्हें सारी छूट रहेगी और हमारे बच्चे दूध को भी तरस जाएंगे...इन बातों को सुन रहीम के मुंह से इतना ही निकला...या मेरे मौला, रहम कर...तब तक जान मोहम्मद ने चाय का गिलास रहीम के आगे कर दिया...साथ ही बोला...क्यों बड़े मियां...ड्यूटी पर नहीं जा रहे हो ?...बड़ी बातें करते थे अपने साहब की नेकदिली की, देख लिया सब धरी रह गई...आखिर है तो वो हिन्दू ही न...कर दी न छुट्टी ड्यूटी से...रहीम ने सोचा...अब इस अक्ल के अंधे को क्या जवाब दूं...दिन भर दुकान पर फिरकापरस्ती की बातें सुन-सुन कर इसकी आंखों पर भी पट्टी पड़ गई है..


दृश्य 3

मुखर्जी साहब के घर पूजा हो रही है...सुदीप्तो का आज जन्मदिन जो है...पारंपरिक धोती-कुर्ते में सजा सुदीप्तो पूजा में बैठा तो था लेकिन उसकी आंखें चारों तरफ़ अपने रहीम काका को ही ढूंढ रही थीं...नानी के घर से आने के बाद पापा से कई बार रहीम काका के बारे में पूछ भी चुका था...हर बार यही जवाब मिलता...रहीम काका की तबीयत ठीक नहीं है...दो-चार दिन में ठीक होने के बाद आ जाएंगे...लेकिन जन्मदिन पर रह-रह कर सुदीप्तो को रहीम काका की याद ही आ रही थी...सोच रहा था, शाम को दोस्तों के लिए घर को कौन सजाएगा...गुब्बारे कौन लगाएगा...पापा के जाने के बाद सुदीप्तो घर के बरामदे में आकर बैठ गया...फिर उसे न जाने क्या सूझा...मम्मी को आवाज दी...मम्मा मैं अपने दोस्त भुवन के घर साथ में जा रहा हूं...अभी आ जाऊंगा...ये कहकर सुदीप्तो घर से निकल पड़ा...उसके कदम खुद-ब-खुद अकबर टोला में रहीम काका के घर की ओर बढ़ चले...देखकर आता हूं रहीम काका की क्या हालत है...कालीबाडी के मोड़ पर पहुंच कर सुदीप्तो को समझ नहीं आया कि इतनी पुलिस क्यों खड़ी है यहां...मोड़ पर आते जाते लोगों को हड़का रहे पुलिसवालों की नजर सुदीप्तो पर नहीं पड़ी...



दृश्य 4

नन्हा सुदीप्तो अकबर टोला में जान मोहम्मद की चाय की दुकान तक पहुंच गया...आते जाते लोग सुदीप्तो के धोती-कुर्ते और माथे पर तिलक को अजीब निगाहों से देख रहे थे...जैसे कोई दूसरी दुनिया का बच्चा मोहल्ले में आ गया हो...रहीम जान मोहम्मद की दुकान पर ही थे लेकिन उनका ध्यान अखबार पढ़ने पर था...उनका अखबार से ध्यान छुटभैये नेता की ये आवाज़ सुनकर ही हटा...देखो, बार्डर पार वालों की चालाकी...अब बच्चों को भी हमारी टोह लेने के लिए भेजने लगे हैं...आखिर है तो सपोला ही, मैं तो कह रहा हूं इसे ही ऐसा सबक सिखाओ कि वो हमेशा के लिए याद करे...ये सुनकर रहीम देखने की कोशिश करने लगे कि अचानक ये किस बच्चे की बात करने लगे...रहीम की नज़र सुदीप्तो पर पड़ी, उनके मुंह से निकल पड़ा...सुदीप्तो...ये यहां कैसे आ गया...ओ मेरे परवरदिगार हिफ़ाज़त कर मेरे बच्चे की...न जाने कहां से रहीम के बूढ़े शरीर में बिजली जैसी तेज़ी आ गई...इससे पहले कि छुटभैया नेता अपने दूसरे प्यादों के साथ सुदीप्तो के पास पहुंचता कि रहीम ने झट से जाकर सुदीप्तो को गले से चिपका लिया...मेरे बच्चे तू यहां कहां से आ गया...तब तक छुटभैया नेता भी वहां आ गया...और गरज कर बोला...रहीम मियां आप पीछे हट जाओ...इसे हमारे हवाले करो...हम भी तो जाने कि ये किस मकसद से यहां आया है...दो चार पड़ेंगे तो अभी तोते की तरह बोलने लगेगा...ये सुनकर रहीम ने सुदीप्तो को और ज़ोर से अपने से चिपका लिया...और पूरी ताकत लगा कर बोले...अरे अक्ल के मारों....शर्म करो...एक छोटे से बच्चे के लिए ऐसी बातें करते हो...ज़हर भर चुका है तुम्हारे दिमाग में...ये मेरा ज़िगर का टुकड़ा है...इसे कोई हाथ तो लगा कर देखे...मेरी लाश से गुज़र कर ही इस बच्चे को छू सकोगे...सुदीप्तो ये देखकर थर्रथर्र कांप रहा था और खुद को रहीम काका के पीछे छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगा...रहीम मियां का ये रूप देखकर छुटभैया नेता पैर पटकता और बड़बड़ाता हुआ जान मोहम्मद की दुकान की ओर लौट गया...और किसी को क्या इल्ज़ाम दे, जब तक ऐसे गद्दार हैं कौम का कुछ नहीं हो सकता...रहीम तेज़ी से सुदीप्तो को घर छोड़ने के लिए कालीबाड़ी की ओर बढ़ चले...


दृश्य 5

रहीम नाके पर सुदीप्तो को लेकर पहुंच गए...एक पुलिस वाले ने रौबदार आवाज़ में पूछा...क्यों मियां जी कहां चल दिए...और ये हिंदू बच्चे को लेकर कहां से आ रहे हो...रहीम इतना ही बोल सके...दारोगा जी, ये मेरे साहब का बच्चा है, गलती से इधर आ गया...इसे घर छोड़ने जा रहा हूं...पुलिसवाला--मियाँ जी, माहौल बड़ा खराब है...बच्चे को छोड़कर जल्दी वापस आओ...रहीम--साहब बस मैं झट से आया....रहीम नाके से निकल कर दो गलियों के बाद मंदिर वाले मोड़ पर पहुंचे ही थे कि अचानक शोर उठा...देखो...देखो...ये दढ़ियल हमारे बच्चे को लेकर कहां जा रहा है...मारो... मारो...रहीम इससे पहले कि कुछ बोल पाते कि शोर मचाने वालों में से एक ने सुदीप्तो को रहीम से छीन कर अलग कर लिया...रहीम रोकते ही रह गए और सुदीप्तो... काका, काका चिल्लाते ही रह गया...चारों तरफ़ से रहीम के बूढ़े शरीर पर लात-घूंसों की बरसात होने लगी...बूढा शरीर कब तक मार खाता...निढाल होकर वहीं सड़क पर गिर गया...अपनी बाजुओं की ताकत दिखाने वाले सुदीप्तो को वहां से लेकर चले गए...

सड़क पर गठरी की शक्ल में एक इनसान पड़ा था..ये देखने वाला भी कोई नहीं था कि सांसें चल रही हैं या थम गई...अब इनसान के साथ तो यही होना था...उसे यही सज़ा मिलनी चाहिए थी...आखिर पत्थरदिल दौड़ते भागते बुतों की दुनिया में एक इनसान का क्या काम...

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

हम ब्लॉगिंग क्यों कर रहे हैं...खुशदीप

कल मैंने पोस्ट लिखी थी आंखों का भ्रम...उसमें लिखा था कोई भी बात हो जब तक सारे तथ्यों का पता न हो, नतीजा निकालने की जल्दी नहीं करनी चाहिए...फिर न जाने क्यों आखिर में ये लाइन भी लिख दी थी कि ब्लॉगवुड में आजकल जिस तरह का माहौल दिख रहा है, उसमें ये चिंतन और भी अहम हो जाता है...

और रात को आफिस से आया तो ब्लॉगवाणी पर जिस पोस्ट पर जाकर सबसे पहली नज़र टिकी वो थी भाई शेर सिंह (जिन्हें आप सब ललित शर्मा के नाम से जानते हैं) का ब्लॉगिंग को हमेशा हमेशा के लिए अलविदा कहने का ऐलान...मुझे मस्तमौला कहा जाता है...चाहता तो आज भी ललित जी को टंकी से जोड़कर गुदगुदाने वाले अंदाज़ में ब्लॉगिंग न छोड़ने की अपील कर सकता था...लेकिन मैं ऐसा करूंगा नहीं...ब्लॉगवुड में ऐसा कुछ हो रहा है जिसे देखकर अब मेरा सेंस ऑफ ह्यूमर भी डर के मारे बाहर आने से कतराने लगा है...दरअसल मेरा सवाल ललित भाई से नहीं है कि उन्होंने अचानक ये फैसला क्यों किया...आज मेरा सवाल खुद खुशदीप सहगल से है कि वो ब्लॉगिंग क्यों कर रहा है...ललित भाई तो सुलझे हुए मैच्योर इनसान है...अपना भला बुरा अच्छी तरह समझते हैं...अगर उन्होंने बैठे-बिठाए ब्लॉगिंग छोड़ने का फैसला किया तो इसके पीछे ज़रूर कोई न कोई गहरी चोट होगी...ये वजह पूछ कर मैं उनकी निजता में दखल भी नहीं देना चाहता...लेकिन उनकी एक बात जिसे भाई अविनाश वाचस्पति ने अपनी पोस्ट में दोहराया भी कि एक दिन तो ब्लॉगिंग को छोड़कर सभी को जाना है...इस सवाल ने मुझे कचोट कर रख दिया है...क्या एक दिन मैं भी...

देर सबेर हो भी सकता है कि मेरा मन भी उचाट हो जाए या मैं जीविका से जु़ड़े कार्यों में इतना व्यस्त हो जाऊं कि न चाहते हुए भी मुझे ब्लॉगिंग को राम-राम कहनी पड़े...ब्लॉगिंग में आए-दिन की उठा-पटक देख कर मन खिन्न ज़रूर है लेकिन अभी ऐसी स्थिति भी नहीं कि ब्लॉगिंग के लिए लैपटॉप को ताला लगा दूं...हां ये ज़रूर हो सकता है कि अपनी सक्रियता घटा दूं...अभी जो रोज़ एक पोस्ट डालकर आप सबको पकाता हूं, आगे से हफ्ते में एक-दो बार ही ब्लॉग पर आपका सिर खाऊं..लेकिन ऐसा करने से पहले कुछ सवाल ज़रूर उठाना चाहता हूं...अगर हो सके तो आप भी अपने मन की बात इन सवालों के ज़रिए ढूंढने की कोशिश कीजिएगा...

हम ब्लॉगिंग क्यों कर रहे हैं...

जहां तक मेरा सवाल है मैं तो सिर्फ और सिर्फ आत्मसंतु्ष्टि के लिए ऐसा कर रहा हूं...रोज़ पोस्ट लिख कर मैं कोई तीर नहीं मार रहा बल्कि अपना ही दिन भर का तनाव दूर भगाता हूं...हौसला अफ़जाई के लिए आपकी जो टिप्पणियां आती हैं, वो मेरे लिए टॉनिक का का काम करती हैं...और अगर कोई समझता है कि ब्लॉग में कलमतोड़ लेखन के ज़रिए हम समाज को बदल डालेंगे तो ये फिलहाल मुंगेरी लाल के हसीन सपने से ज़्यादा कुछ नहीं लगता...


क्या हम स्कूल के बच्चे हैं...

मैं देख रहा हूं कि जिस तरह स्कूल के बच्चों में टॉप आने के लिए होड़ लगी रहती है, वैसी ही एक अंधी दौड़ ब्लॉगवुड में भी है...स्कूल के बच्चों की तरह ही हममें ईर्ष्या भाव, ग्रुप बनाकर एक दूसरे की टांग खिंचाई करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है...हम ये चिंता छोड़कर कि हमें क्या लिखना है, ये नज़र ज़्यादा रखते हैं कि दूसरा क्या लिख रहा है...और यही सारी समस्या की ज़़ड़ है...


पोस्टों की चर्चा का महत्व क्या है...

सात महीने में मैंने जो अनुभव लिया है, उसमें मुझे लगता है (हो सकता है मैं गलत हूं) कि ब्लॉगवुड में सबसे ज़्यादा वैमनस्य फैलाने के लिए ये चर्चा वाली पोस्टें ही ज़िम्मेदार है...अगर कोई चर्चाकार पूरी ईमानदारी और समर्पण भाव के साथ भी चर्चा करता है तो फेवरिटिस्म के आरोपों से बच नहीं सकता...इन चर्चाओं का सबसे ज़्यादा जो महत्व मुझे नज़र आता है वो ये है कि ये किसी भी ब्लॉगर की चिट्ठाजगत के सक्रियता क्रमांक को सुधारने में उत्प्रेरक का काम करती हैं...और इसी चक्कर में सारा गुलगपाड़ा होता है...मेरा सवाल है कि जब एग्रीगेटर मौजूद हैं तो फिर इन चर्चाओं की ज़रूरत ही कहां है...एग्रीगेटर खुद ही स्क्रॉल के ज़रिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं करते कि  24 घंटे की सभी पोस्टों के लिंक रोटेशन के आधार पर आते रहें...रेंटिंग का कोई सर्वमान्य फार्मूला निकालकर हर पोस्ट की रैटिंग की जाती रहे...इससे खुद-ब-खुद अच्छे लिंक हर पाठक को मिलते रहेंगे...


संवादहीनता की बीमारी

मेरा अपना मानना है कि ज़्यादातर गलतफहमी की वजह संवादहीनता होती है...अगर आपको किसी से कोई शिकायत है तो उसे सार्वजनिक मंच पर लाने की जगह पहले उस शख्स से दिल खोल कर बात करनी चाहिए...मेरा दावा है कि अगर ऐसा होता है तो आधे से ज़्यादा झगड़े तो स्वत ही खत्म हो जाएंगे...अरे बात करने में क्या जाता है...अपना गुबार निकाल दीजिए...दूसरे की व्यथा सुनिए...यही अपने आप में हर मर्ज की दवा है...

नियम-कायदे न होना

ब्लॉगिंग वैसे भी खुला खेल फर्रूखाबादी है...कोई नियम नहीं, कोई कायदा नहीं...सब अपनी मर्जी के मालिक...लेकिन ये प्रवृत्ति कहीं न कहीं निरंकुशता को भी जन्म दे रही है...क्या वरिष्ठ ब्लॉगरजन इस दिशा में कोई पहल नहीं कर सकते...पत्रकारिता में कोई किसी पर डंडा नहीं चलाता, फिर भी हर पत्रकार पत्रकारिता धर्म से जु़ड़ी बातों का पालन करता है...मसलन बच्चों और महिलाओं से जुड़ी कोई नेगेटिव पोस्ट है तो उनकी पहचान छुपाई जाएगी...चेहरे ब्लर कर दिए जाएंगे...दूसरों के धर्म पर सवाल उठाने वाली रिपोर्टिंग से परहेज किया जाएगा, बिना पुष्टि या तथ्यों की पड़ताल के कोई रिपोर्ट नहीं लिखी जाएगी...अगर शिकायत या आरोप वाली कोई बात है तो दूसरी पार्टी से बात कर उसका वर्जन भी लिया जाएगा...दोनों वर्जन आने के बाद ही रिपोर्ट प्रकाशित या प्रसारित की जाएगी...लेकिन ब्लॉगिंग में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है...जिसे चाहे गरिया दो, जो चाहे शब्द लिख दो...कोई नहीं डरता...लेकिन ऐसा करने वाले एक बार साइबर क्राइम के चपेटे में आ गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे...इसलिए अच्छा है कि हम ही समझ जाएं...

वरिष्ठ ब्लॉगरजन आचार-संहिता बनाएं...

ब्लॉगवुड में ऐसे कई निर्विवाद और वरिष्ठ ब्लॉगरजन है जिनका हर कोई सम्मान करता है...ये आपस में तय करके ब्लॉगिंग के लिए कोई आचार-संहिता बनाएं...ब्लॉगिंग को साफ सुथरे और सुचारू रूप से चलाने के लिए हर ब्लॉगर के लिए उस आचार-संहिता का पालन करना ज़रूरी हो...अगर किसी ब्ल़ॉगर को कोई शिकायत हो तो पहले इन्हीं वरिष्ठ ब्लॉगरजन के मंडल के पास ही दर्ज कराए...और अगर कोई ब्लॉगर इन नियमों का पालन नहीं करता तो उसके खिलाफ एक्शन लेने का अधिकार भी इसी मंडल के पास रिज़र्व हो...

ये मात्र मेरे विचार हैं, ज़रूरी नहीं आप सब इनसे सहमत हों...लेकिन कोई भी समाज तभी समाज बनता है जब नियम कायदों से चलता है...बेलगाम रहने पर तो जंगलराज ही रहता है...जैसा कि आजकल हिंदी ब्लॉगिंग में दिखने भी लगा है...मैं सवाल करता हूं कि अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में वैसे ही टंटे कम हैं जो हम ब्लॉगिंग में भी उन्हें ही पाल लें...

अंत में ललित भाई से आग्रह करूंगा, जिस वजह या शख्स की वजह से भी आपने ये फैसला किया, उसके साथ एक बार दिल खोल कर अपनी बात ज़रूर कर लें...हो सकता है दोनों ओर से गुबार निकल जाएं और सारी गलतफहमियां दूर हो जाएं...एक छोटे भाई के कहने से ललित भाई ऐसा करके तो देखिए...फिर उसके बाद जो भी आप फैसला करें, हम सबको स्वीकार होगा...ब्लॉगिंग रहे न रहे, हमारे आपस में जो संबंध बने हैं वो तो तमाम उम्र बने ही रहेंगे...


एक गाने की चंद लाइनों से पोस्ट को खत्म करता हूं...

इन उम्र से लंबी सड़कों को, हमने तो खत्म होते देखा नहीं...
जीने की वजह तो कोई नहीं, जीने का बहाना ढूंढता है,
एक अकेला इस शहर में आबोदाना ढूंढता है, आशियाना ढूंढता है...
ढूंढता है...

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

आंखों देखा भ्रम...खुशदीप

एक बुज़ुर्ग ट्रेन पर अपने 25 साल के बेटे के साथ यात्रा कर रहे थे...



ट्रेन स्टेशन को छोड़ने के लिए तैयार थी...


सभी यात्री सीटों पर अपना सामान व्यवस्थित करने में लगे थे...


जैसे ही ट्रेन ने चलना शुरू किया, 25 साल के युवक की खुशी, उत्साह देखते ही बना था...


युवक ट्रेन की खिड़की वाली सीट पर बैठ कर बाहर के नज़ारे देखने लगा...





युवक खिड़की से हाथ बाहर निकाल कर बाहर बह रही शीतल हवा का अनुभव करने लगा...


फिर चिल्ला कर बोला...पापा, पापा...देखो पेड़ पीछे की ओर भाग रहे हैं...


बेटे की बात सुनकर बुज़ुर्ग मुस्कुराया और हां में सिर हिलाने लगा...


पास बैठे एक दंपति युवक की ये सब हरकतें देख रहे थे...


उन्हें 25 साल के युवक का बच्चे की तरह हरकतें करना बड़ा अजीब लग रहा था...


फिर वो युवक अचानक बोला...पापा.. तालाब में जानवर नहाते कितने अच्छे लग रहे हैं...ऊपर देखो, बादल ट्रेन के साथ चल रहे हैं...


अब ये सब देखते हुए दंपति की बेचैनी बढ़ती जा रही थी....


इस बीच पानी बरसना शुरू हो गया...कुछ बूंदें युवक के हाथ पर भी गिरने लगीं...


पानी के स्पर्श का आनंद युवक के चेहरे पर साफ़ झलक रहा था...


इसी मस्ती में युवक बोला...पापा...बारिश हो रही है, पानी की बूंदे मेरे हाथ को भिगो रही है...पापा, पापा देखो, देखो...


अब दंपति से रहा नहीं गया...पति बुज़ुर्ग से बोला...आप डॉक्टर के पास जाकर अपने बेटे का इलाज क्यों नहीं कराते...



बुज़ुर्ग बोला...जी, हम आज अस्पताल से ही लौट रहे हैं...

....

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और मेरे बेटा पहली बार ज़िंदगी के सारे रंग देख रहा है...उसे अस्पताल में आंखों की रौशनी का वरदान मिला है...



स्लॉग चिंतन

जब तक सारे तथ्यों का पता न हो, नतीजा निकालने की जल्दी नहीं करनी चाहिए...


ब्लॉगवुड में आजकल जिस तरह का माहौल दिख रहा है, उसमें ये चिंतन और भी अहम हो जाता है...

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

पुनर्जन्म सिर्फ़ भारतीयों का होता है, क्यों...खुशदीप

भगवान के दरबार में एक देवदूत आकर शिकायत करता है...स्वर्ग में कुछ भारतीय हैं और समस्याएं खड़ी कर रहे हैं..स्वर्ग के गेट को झूला बना कर झूल रहे हैं...सफेद लिबास की जगह एक से बढ़कर एक डिजाइनर कपड़े पहन रहे हैं...रथों पर घूमने की जगह मर्सिडीज़ और बीएमडब्लू को दनदनाते चला रहे हैं...अपनी चीज़ों को डिस्काउंट ऑफर कर बेच रहे हैं...जब देखो स्वर्ग की सीढ़ियों को ब्लॉक कर देते हैं...वहीं सीढ़ियों पर बैठकर चाय के साथ समोसे उड़ाना शुरू कर देते हैं...

ये सुनकर भगवान मुस्कुरा कर बोले...भारतीय हमेशा भारतीय ही रहते हैं...स्वर्ग मेरे सभी बच्चों के रहने के लिए है...देवदूत तुमने स्वर्ग का हाल तो बयां कर दिया, चलो नर्क में क्या हाल है, ये भी तुम्हे शैतान के ज़रिए सुना देते हैं...शैतान को कॉल लगाओ...



शैतान फोन पर आकर कहता है...हैलो, अरे...अरे..., ठहरिए मैं एक मिनट में आता हूं...

एक मिनट बाद फोन पर शैतान...हां तो मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं...

देवदूत...मैं जानना चाह रहा था कि नर्क में तुम्हे किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है..

शैतान....ओफ्फो...अब ये क्या...रुकिए...माफ कीजिए...ये नया पंगा देख कर अभी फोन पर आता हूं...

पांच मिनट बाद शैतान बदहवासी की हालत में लौटता है...कहता है...हां मैं लौट आया...तुम क्या सवाल पूछ रहे थे...

देवदूत...तुम्हे कैसी दिक्कतों...

शैतान...हूं...अरे बाबा...अब क्या हुआ...ओह...ये मेरी समझ से बाहर है...आप ज़रा ठहरो...

इस बार शैतान पंद्रह मिनट बाद आया...बोला...देवदूत माफ़ करना...अभी मैं बात करने की हालत में नहीं हूं....ये भारतीय नर्क को रहने के लिए बेहतर जगह बनाने की खातिर यहां की आग को बुझाकर एयरकंडीशनर फिट करने की कोशिश कर रहे हैं...टैकनीक के इतने जुगाड़ू हैं कि नर्क का सीधा स्वर्ग से कनेक्शन जोड़ने के लिए हॉट लाइन लगाने की जुगत लगा रहे हैं...इन्हें काबू में रखने में मुझे नानी याद आ गई है...कुछ तो चाय-पकोड़े की दुकान खोलने में ही लगे थे...बड़ी मुश्किल से रोका है...मैं तो भगवान से गुहार करने जा रहा हूं जैसे ही इन भारतीयों का धरती पर समय पूरा होने के बाद ऊपर आने का टिकट कटे, इन्हें पुनर्जन्म के रूप में रिटर्न टिकट थमा देना चाहिए....



स्लॉग ओवर

मक्खन बड़ा रूआंसा मुंह बनाकर बैठा हुआ था...



तभी ढक्कन आ गया...पूछा...क्या हुआ मक्खन भाई, सब खैरियत तो है...


मक्खन...क्या खैरियत...दो महीने पहले चाचा जी भगवान को प्यारे हो गए...वसीयत में मेरे नाम भी एक लाख रुपये छोड़ गए....


ढक्कन...बेचारे चाचा जी...


मक्खन...और पिछले महीने मेरी बुआ का निधन हो गया...वो भी आंखें मूंदने से पहले कह गई थी कि मरने के बाद उनकी कार मुझे दे दी जाए...


ढक्कन...अरे यार बड़ा दुख हुआ...दो महीने में तुम्हारे दो करीबियों की मौत...भगवान तुम्हें हौसला दे...

मक्खन...ख़ाक़ हौसला मिले...इस महीने की 28 तारीख हो गई है और अभी तक कहीं से कोई ख़बर नहीं आई है...

खाने के लिए जीना, जीने के लिए खाना...खुशदीप

रोजाना जो खाना खाते हो वो पसंद नहीं आता ? उकता गये ?

............थोड़ा पिज्जा कैसा रहेगा ?





नहीं ??? ओके....पास्ता ?

नहीं ?? ...इसके बारे में क्या सोचते हैं ?





आज ये खाने का भी मन नहीं ? ... ओके .. क्या इस मेक्सिकन खाने को आजमायें ?







दुबारा नहीं ? कोई समस्या नहीं .... हमारे पास कुछ और भी विकल्प हैं........

ह्म्म्मम्म्म्म ... चाइनीज ???????






बर्गर्स...???????






ओके .. हमें भारतीय खाना देखना चाहिए ....... ? दक्षिण भारतीय व्यंजन ना ??? उत्तर भारतीय ?






जंक फ़ूड का मन है ?






हमारे पास अनगिनत विकल्प हैं ..... .. टिफिन ?






मांसाहार ?








ज्यादा मात्रा ?






आप इनमें से कुछ भी ले सकते हैं ... या इन सब में से थोड़ा- थोड़ा ले सकते हैं ...



अब शेष बची पोस्ट के लिए परेशान मत होइए...



मगर .. इन लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है ...






इन्हें तो बस थोड़ा सा खाना चाहिए ताकि ये जिन्दा रह सकें ..........



इनके बारे में अगली बार तब सोचना जब आप किसी केफेटेरिया या होटल में यह कह कर खाना फैंक रहे होंगे कि यह स्वाद नहीं है !!






इनके बारे में अगली बार सोचना जब आप यह कह रहे हों... यहाँ की रोटी इतनी सख्त है कि खायी ही नहीं जाती....







कृपया खाने के अपव्यय को रोकिये...

अगर आगे से कभी आपके घर में पार्टी/ समारोह हो और खाना बच जाये या बेकार जा रहा हो तो बिना झिझके आप 1098 (केवल भारत में ) पर फ़ोन करें - यह एक मजाक नहीं है - यह चाइल्ड हेल्पलाइन है...वे आयेंगे और भोजन एकत्रित करके ले जायेंगे...

मैंने ई-मेल से मिले संदेश को ज़्यादा से ज़्यादा प्रचारित करने के लिए ये पोस्ट लिखी है...आप भी अपने हर जानने वाले तक इस संदेश को पहुंचाने की कोशिश कीजिए ताकि उन बच्चों का पेट भर सकें जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है...

'मदद करने वाले हाथ प्रार्थना करने वाले होंठो से अच्छे होते हैं...





स्लॉग ओवर

अदनान सामी (पतला होने के इलाज से पहले वाले) को एक दावत में बुलाया गया...





अदनान के लिए खास तरह का टेबल लगाया गया था...हर तरह की डिश टेबल पर मौजूद...



वेटर आया और अदनान की टेबल पर डेढ़ सौ गर्मागर्म रोटियां एक टोकरी में रख कर चला गया...



अदनान ने ये देखा और गुस्से में वेटर को आवाज़ देकर बुलाया और झाड़ लगाई...



मुझे समझा क्या हुआ है बे...डंगर (जानवर)...इतनी रोटियां खाऊंगा मैं...चल ऊपर से एक रोटी उठा कर ले जा....

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

एक 'बड़ी' सी लव स्टोरी...खुशदीप

दो बुज़ुर्ग, एक विधुर और एक विधवा, एक दूसरे को बरसों से अच्छी तरह जानते थे...लेकिन दोनों शहर के अलग अलग ओल्ड एज होम में रहते थे...



एक बार किसी एनजीओ ने वृद्धों के सम्मान के लिए लंच का आयोजन किया...शहर के सारे ओल्ड एज होम्स में रहने वाले वृद्धों को भी आमंत्रित किया गया...इनमें वो विधुर और विधवा भी शामिल थे...संयोग से दोनों को लंच के दौरान बैठने के लिए एक ही टेबल मिल गई...पहले इधर उधर की बातें हुईं और फिर विधुर ने हिम्मत दिखाते हुए बोल ही डाला...क्या तुम मुझसे शादी करना पसंद करोगी...

छह सेंकड तक विधवा सोचती रही और फिर बोली...हां...हां...मैं तुमसे शादी करूंगी...

लंच खत्म हो गया...दोनों ने एक दूसरे का अभिवादन किया और अपने अपने ओल्ड एज होम में आ गए...

अगले दिन बुज़ुर्ग विधुर महोदय बड़े परेशान...यही सोच सोच कर हलकान हुए जा रहे थे कि जिस महिला को प्रपोज़ किया था उसने जवाब में हां कहा था या न...

लाख याद किया, लेकिन बेकार...ये तो अच्छा था महिला का नंबर था जनाब के पास...आखिर फोन मिला ही दिया...हौसला बटोर कर इधर उधर की बातें की...बताया कि अब यादाश्त पहले जैसी नहीं रही...अक्सर चीज़े भूल जाता हूं...विधुर ने एक दिन पहले लंच पर विधवा के साथ बिताए अच्छे वक्त को भी याद किया...आखिर में काम की बात पर आते हुए कहा...मैंने जब तुम्हे शादी के लिए प्रपोज़ किया था तो तुमने क्या जवाब दिया था...हां या न...

विधुर की खुशी का ठिकाना न रहा, जब उसने विधवा को फोन पर कहते सुना...हां...मैंने हां कहा था और दिल से तुम्हारा शादी का प्रपोज़ल कबूल किया था...लेकिन...

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तुमने अच्छा किया मुझे फोन कर पूछ लिया...वरना मैं भी कल से ही ये सोच सोच कर परेशान थी कि वो कौन सा शख्स था जिसने मुझे प्रपोज़ किया था...लाख कोशिश करने पर भी याद नहीं आ रहा था...

(ई-मेल से अनुवाद)



स्लॉग ओवर



मक्खन की बहन को डाकू उठा कर ले गए...

मक्खन बेचारा करे तो करे क्या...

बुरे वक्त पर आख़िर दोस्त ही काम आते हैं...मक्खन के परम सखा ढक्कन ने आगाह करते हुए सलाह दी...

ये डाकू बड़े ख़तरनाक होते हैं...जाने कब क्या कर बैठें...इसलिए खाली हाथ बिल्कुल नहीं जाना...


मक्खन डाकुओं के डैने पर गया और हाथ में...



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दो किलो आम ले गया...

रविवार, 4 अप्रैल 2010

अपनी पोस्ट पर खुद टिप्पणी करते रहना कितना जायज़...खुशदीप

रवींद्र प्रभात जी की पोस्ट से पता चला कि परिकल्पना ब्लॉग उत्सव 2010, 15 अप्रैल से शुरू होने जा रहा है...रवींद्र जी के मुताबिक उत्सव के दौरान सारगर्भित टिप्पणी करने वाले टिप्पणीकार को भी विशेष रूप से सम्मानित किया जाएगा...इसी से पता चल जाता है कि ब्लॉगिंग में सारगर्भित टिप्पणियों का कितना महत्व होता है...


मैं इस पोस्ट में ये नहीं लिखने जा रहा कि ब्लॉगिंग टिप्पणियों के लालच में नहीं की जानी चाहिए...मैं ये भी नहीं लिखने जा रहा कि गंभीर और अच्छे लेखों पर टिप्पणियों का अकाल पड़ा रहता है...मैं ये भी नहीं लिखने जा रहा कि टिप्पणी का स्वरूप कैसा होना चाहिए...क्या सिर्फ वाह-वाह कर ही अपने पाठक धर्म की इतिश्री कर लेनी चाहिए...ये सब वो सवाल हैं जिन पर अनगिनत पोस्ट लिखी जा चुकी हैं...



जिस तरह टीवी पर एक कोल्ड ड्रिंक की एड आती है...डर सभी को लगता है...डर से मत डरो....डर के आगे बढ़ो...डर के आगे ही जीत है...इसी तरह मेरा भी यही मानना है कि टिप्पणी को देखकर कहे चाहे कोई कुछ भी लेकिन सभी को असीम संतोष और आनंद मिलता है...अब इसके लिए तर्क कुछ भी दिए जाएं...और नए ब्लॉगर के लिए तो टिप्पणी टॉनिक से कम अहमियत नहीं रखती...


लेकिन इस पोस्ट को लिखने का मेरा मकसद दूसरा है...मेरा आपसे सवाल है कि क्या खुद की पोस्ट पर खुद ही टिप्पणियां करना नैतिक दृष्टि से सही है...अगर किसी की टिप्पणी आपके ब्लॉग पर आती है, तो बिना मतलब हर टिप्पणी देने वाले का शुक्रिया अदा करने के लिए खुद की पोस्ट पर ही टिप्पणियां बढ़ाते जाना, क्या कुछ खटकता नहीं है...ये बात ठीक है कि अगर कोई टिप्पणीकर्ता आपसे सवाल पूछता है, या किसी मुद्दे पर किसी ख़ामी की ओर इंगित करता है, या निर्मल हास्य के तहत चुटकी लेता है, तब तो उसका टिप्पणी के ज़रिए जवाब देना समझ आता है...पोस्ट लिखने के बाद अगर आपको याद आता है कि कोई अहम बिंदु छूट गया है...उसकी भी टिप्पणी के ज़रिए जानकारी दी जा सकती है...लेकिन हर टिप्पणी पर अपनी टिप्पणी देकर टिप्पणियों की संख्या बढ़ाते जाना, कुछ जमता नहीं...


यहां अपने गुरुदेव समीर लाल जी समीर को पढ़-पढ़ कर सीखे एक पाठ का ज़िक्र करना चाहूंगा...समीर जी की किसी भी पोस्ट पर उनकी खुद की टिप्पणी रेयरेस्ट ऑफ रेयर (दुर्लभ में भी दुर्लभतम) ही मिलती है...वो भी तभी जब उनसे सीधे कोई सवाल पूछा गया हो...या समीर जी ने किसी चुटीले संदर्भ का उल्लेख करना हो...मुझे सात महीने में सिर्फ एक बार ही ऐसा दुर्लभ मौका मिला है जब समीर जी ने अपनी पोस्ट पर मेरी टिप्पणी के जवाब में खुद की टिप्पणी के ज़रिए अपने उदगार व्यक्त किए थे...

अब तय कीजिए कि अपनी पोस्ट पर खुद टिप्पणियां देते रहना कितना जायज़ है...बाकी इस विषय पर आप सब की राय ज़रूर जानना चाहूंगा...




स्लॉग चिंतन


एक गांव सूखे की मार से बेहाल था...




सारे गांव ने चौपाल पर एकत्र होकर इंद्रदेवता को मनाने के लिए सामूहिक प्रार्थना करने का फैसला किया...




सब प्रार्थना के लिए पहुंच गए...






एक बच्चा छाता भी साथ लेकर आया...





इसे कहते हैं विश्वास की हद...

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

पंगा !!! और वो भी मक्खन से...खुशदीप

मक्खन की लॉटरी निकली...ईनाम था मुफ्त विदेश यात्रा...लेकिन देश सिर्फ दो ही थे...बांग्लादेश या अफ्रीका का कोई भुखमरी वाला देश...
मक्खन ने सोचा...बांग्लादेश तो पास ही है...अफ्रीका दूर है वही चला जाए...


मक्खन को अफ्रीकी देश पहुंचा दिया गया...मक्खन इतना भोला कि उस देश में घूम भी आया लेकिन नाम उसे आज तक याद नहीं हो सका....


मक्खन उसी देश में एक दिन सड़ती गर्मी में तफ़रीह के लिए निकला...एक जगह खड़ा होकर मक्खन जूसी आइसक्रीम के चटखारे ले रहा था कि पास खड़े एक गधे से मक्खन की खुशी देखी नहीं गई...दबे पांव पीछे से आया और मक्खन को एक दुलत्ती झाड़ कर सरपट दौड़ता बना...


मक्खन ठहरा मक्खन...पराये मुल्क में बेइज़्ज़ती कैसे बर्दाश्त कर लेता....वो भी एक गधे की लात...आव देखा न ताव मक्खन भी गधे के पीछे पीछे दौड़ने लगा...गधा आगे-आगे मक्खन पीछे पीछे....


अब गधा था बड़ा चालू...अफ्रीकी देश की गली गली से वाकिफ़...मक्खन जी को एक चौराहे पर डॉज देकर पतली गली में घुस कर छिप गया...


मक्खन जी बड़े परेशान...ये तो बेइज्ज़ती का भी फालूदा हो रहा है...तभी मक्खन की नज़र एक गली में खड़े ज़ीबरा (Zebra) पर पड़ गई...ये देखते ही मक्खन का चेहरा खिल गया...



मक्खन ज़ीबरा के सामने जाकर तन कर खड़ा हो गया और बोला...साले...समझता क्या है बे अपने आप को....अक्ल में तेरा भी बाप हूं...ये फटाफट ट्रैक सूट पहन कर आ गया...क्या सोच रहा था, मैं धोखा खा जाऊंगा....तुझे पहचान नहीं पाऊंगा...

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

सीक्रेट ऑफ हैप्पी मैरिड लाइफ़...खुशदीप

लो जी आज आपको तमाम उम्र शादी को सुखी बनाए रखकर खुश रहने का राज़ बताता हूं...क्या करूं घर वालों ने न जाने क्या सोच कर नाम खुशदीप रख दिया था...अब नाम को सार्थक तो करना ही है न...

हां तो जनाब, ईर्ष्या के मारे मेरा एक दोस्त ( अरे अरे आप गलत समझ रहे हो ब्लॉगिंग वाली ईर्ष्या नहीं),  मेरे पीछे पड़ गया कि बताऊं मेरी खुशहाल शादी का राज़ क्या है....मैंने उपदेश झाड़ने के अंदाज़ में बताना शुरू किया...



शादी दो पहिए की गाड़ी है...दोनों पहियों को एक दूसरे के लिए प्यार और सम्मान के अपनी ज़िम्मेदारियों को समझना चाहिए...अगर ये मंत्र अपनाओगे तो वैवाहिक जीवन में कहीं कोई दिक्कत नहीं आएगी...

दोस्त ने कहा...क्या इसे तुम और अच्छी तरह समझा सकते हो...

मैंने कहा...लो और सुनो, मेरे घर में, जितने भी बड़े मुद्दे होते हैं, उन पर मैं फैसले लेता हूं, और जितने भी छोटे मुद्दे, उन पर मेरी पत्नी...और हम कभी एक दूसरे के फ़ैसलों में दखल नहीं देते...

वो दोस्त अब भी हुड़कचुल्लू की मुद्रा में बैठा था...अपड़िया जैसे कुछ समझ नहीं आया...बोला....ज़रा फैसलों के बारे में और खुल कर बताओ...किस तरह के बड़े मुद्दे और किस तरह के छोटे मुद्दे...


मैंने कहा...यार तू भी न बस, अरे भई छोटे मुद्दे जैसे... कार कौन सी खरीदनी है, पैसा कितना बचाना है, कहां इन्वेस्ट करना है...प्रापर्टी कहां खरीदनी है, कब अपने पैतृक शहर जाना है, कौन सा सोफ़ा, एसी, खरीदना है, महीने का बजट बनाना, सुंदर मेड को घर में रखना है या नहीं...इन सब पर मेरी पत्नी फैसले करती है...मुझे बस हां में अपनी मुंडी हिलानी होती है...

दोस्त ने फिर उंगली की...लेकिन तुम्हारा रोल...

मेरा जवाब था...ये छोटे छोटे तुच्छ सवालों पर मैं अपना कीमती वक्त और दिमाग जाया नहीं करता...मेरे फैसले सिर्फ बड़े मुद्दों पर होते हैं...

दोस्त...जैसे कि...

मैं....जैसे कि अमेरिका को ईरान पर हमला करना चाहिए या नहीं...पाइप लाइन पर भारत को ईरान-पाकिस्तान समझौता मानना चाहिए या नहीं...पाकिस्तान से अमेरिका को न्यूक्लियर डील करनी चाहिए या नहीं...भारत को चांद पर मानव को भेजने के लिए पैसा खर्चना चाहिए या नहीं...अमिताभ बच्चन को गुजरात का ब्रैंड एबेंसडर बनना चाहिए या नहीं...सचिन तेंदुलकर को करियर के पीक फॉर्म में रिटायर हो जाना चाहिए या नहीं...और भी बहुत सारे...अब क्या क्या बताऊं...एक बात और, मैं जो भी फैसला लूं, पत्नीश्री कभी ऐतराज नहीं जताती (सच बताऊं, मुझ पर इतना विश्वास है कि मेरी बात को वो सही तरीके से सुनती भी नहीं...)





स्लॉग ओवर

मक्खन रेलवे स्टेशन पर मक्खनी के साथ पंजाब जाने के लिए ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था...



इतने में पंजाब मेल आ गई...मक्खन ने आव देखा न ताव, झट से कूद कर ट्रेन पर चढ़ गया...



फिर ट्रेन के दरवाजे़ से ही मक्खनी से बोला....
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पंजाब मेल पर जैसे मैं जल्दी से चढ़ा हूं, ऐसे ही जब पंजाब फीमेल आए, तू भी झट से चढ़ जाना...

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

महफूज़ के ब्लास्ट को अमेरिकी सैल्यूट...खुशदीप

सबसे पहली बात...जो मैं कहने जा रहा हूं उसे अप्रैल फूल की पोस्ट समझ कर कतई न लें...ये बिल्कुल सेंट परसेंट पुख्ता ब्लॉगर्स के दिलों को बाग बाग कर देने वाली ख़बर है...और मैं बड़ा खुशकिस्मत हूं कि महफूज़ ने सबसे पहले ये ख़बर मुझे दी...और मुझसे एक मिनट भी रहा नहीं जा रहा...इसलिए इतनी बड़ी खुशख़बरी आप से फौरन शेयर कर रहा हूं...ये इतनी बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ है कि एक दिन में एक पोस्ट का मेरा फंडा भी धरा का धरा रह गया है...



जबलपुर में 14 मार्च को लाल टी शर्ट में सजे महफूज़ मियां स्थानीय सम्मानित ब्लॉगर्स के साथ

दरअसल महफूज़ ने जबलपुर से ही मुझे ये मुंह मीठा करने वाली ख़बर दी है...अरे अरे वो नहीं जो आप समझ रहे हैं...महफूज़ मियां घोड़ी भी चढ़ जाएंगे...फिलहाल तो वो कामयाबी के ऐसे घोड़े पर सवार है जिसे अंकल सैम यानि अमेरिका भी सैल्यूट कर रहा है...अब ज़्यादा पहेलियां न बुझा कर आप को असली बात बताता हूं....

महफूज़ की एक अंग्रेजी कविता 'Fire is still alive' अमेरिका के मैडिसन स्टेट के Wisconsin University के Emeritus professor John L. Nancy Diekelmann ने T-Shirt पर प्रकाशित की है... यह टी-शर्ट पूरे अमेरिका व यूरोपियन, भारत समेत एशियन देशों में बेची जाएंगी... इस कविता को Wisconsin University के क्लिनिकल डिपार्टमेंट में सब्जेक्ट में जोड़ लिया गया है...यानि यह कविता अमेरिका के सिलेबस में पढाई जाएगी.... John L. Nancy diekelmann विश्व के जाने माने लेखक, एकेमेडिशियन और पर्यावरणविद हैं...साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सलाहकार मंडल में chief advisor व senate के nominated member हैं...उन्होंने जैसे ही टी-शर्ट का पहला पीस प्रोड्यूस हुआ ...वैसे ही चार टी-शर्ट महफूज़ को priority postal mail से भेज दीं...इस पोस्ट के ज़रिए विश्व में कहीं भी तुरंत दो दिन में डाक पहुंच जाती है... महफूज़ की ये कविता एक सामाजिक संदेश देती है. और साथ ही पर्यावरण को सहेज कर रखने की नसीहत भी...


यह टी-शर्ट पूरे अमेरिका में उत्पादित हो चुकी है और तीन दिन में डेढ़ लाख टी-शर्ट बिक चुकी हैं और हर बिकी हुई टी-शर्ट पर महफूज़ को रॉयल्टी मिलेगी...यह रोयल्टी इस साल जून से मिलना शुरू हो जाएगी...

महफूज़ को यूनिवर्सिटी की ओर से इस उपलब्धि के बारे में पिछले साल सितंबर में मेल मिला था...तब उसने एक पोस्ट भी लिखी थी...आप इस लिंक पर जाकर उस मेल को देख सकते हैं...



महफूज़ के पिता कर्नल साहब और मम्मी आज इस दुनिया में बेशक न हो लेकिन वो जिस जहां में भी है, उनकी खुशी का ठिकाना नहीं होगा...चलिए आज कर्नल साहब की तरफ से मैं ही अपने ट्रेडमार्क स्टाइल में गा देता हूं...

तुझे सूरज कहूं या चंदा


तुझे दीप कहूं या तारा


मेरा नाम करेगा रौशन


जग में मेरा राज दुलारा...



महफूज़...शाबाश...



ब्लॉगवुड का, लखनऊ का, गोरखपुर का, मेरा और सबसे ऊपर भारत का नाम दुनिया में रौशन करने के लिए...

लालू जी का एपाइंटमेंट लेटर और डूबते मक्खन के हाथ मछली...खुशदीप

ममता दी ने जब से लालू जी का रेलवे मंत्रालय छीना है, बेचारे बेरोज़गार हो गए...लेकिन उनका हावर्ड में मैनेजमेंट सिखाने का पोर्टफोलियो किस काम आता..


.लालू जी को नौकरी मिल ही गई...वो भी ऐसी वैसी नहीं, दुनिया के नंबर दो के अमीर बिल गेट्स की कंपनी माइक्रोसॉफ्ट कॉरपोरेशन में...लालू जी को रेल मंत्रालय से छुट्टी होने की भनक पहले से ही लग गई थी...इसलिए उन्होंने अपना बॉयोडाटा पहले से ही बिल गेट्स को भेज दिया था...थोड़े दिन बाद लालू जी को बिल गेट्स की कंपनी से जवाब मिला...

डियर मिस्टर लालू प्रसाद,


यू डू नॉट मीट अवर रिक्वायरमेंट्स, प्लीज़ टू नॉट सेंड एनी फरदर कॉरेसपॉन्डेंस, नो फोन कॉल शैल भी एंटरटेन्ड...


थैंक्स


बिल गेट्स

लालू जी ने जैसे ही जवाब पढ़ा खुशी के मारे बल्लियों उछलने लगे...फौरन एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई...बोले...

भाइयों और बहनों, आप को ये जानकर खुशी होगी कि हमका अमेरिका में नौकरी मिल गई है...

सब बड़े खुश हुए और लालू जी को बधाइयां देने लगे...

लालू...

अब हम आपको अपना एपांइटमेंट लेटर पढ़ कर सुनाएंगे...नहीं तो ये विरोधी दल वाले बुडबक इसमें भी कोई दोष निकाल कर कह देंगे कि ललवा झूठ बोलता है....लेटर अंग्रेज़िवा में है, इसलिए तुम सब की सुविधा खातिर हम इसका अनुवाद भी साथ-साथ करते जाएंगे...

डियर मिस्टर लालू प्रसाद....प्यारे लालू प्रसाद भैया

यू डू नॉट मीट...आप तो मिलते ही नहीं

अवर रिक्वॉयरमेंट... हमको तो ज़रूरत है

प्लीज़ डू नॉट सेंड एनी फरदर कॉरेस्पोन्डेंस....अब लेटर वेटर भेजने की कौनो ज़रूरत नाही...

नो फोन कॉल....फूनवा की भी ज़रूरत नहीं है

शैल भी एंटरटेन्ड....आपकी जी खोल के ख़ातिरवा होगी...

थैंक्स....आपका बहुत बहुत शुक्रिया...

बिल गेट्स...तोहार बिलवा...



डिस्क्लेमर...हो सकता है लालू जी का ये एपांइटमेंट लेटर आपको पहले भी पढ़ने के लिए हाथ लगा हो...लेकिन अप्रैल की पहली तारीख को इसे फिर पढ़ने का अलग ही मज़ा है....



स्लॉग ओवर...

मक्खन मुंबई चौपाटी घूमने गया...मक्खन है तो मक्खन....बैठे बिठाए पंगा लेने की आदत....समुद्र के बिल्कुल किनारे की दीवार पर खड़ा होकर हवा खाने लगा...चक्कर आया और मक्खन जी सीधे समुद्र में...डूबने लगे कि हाथ में एक मछली आ गई...मक्खन ने दरियादिली दिखाते हुए मछली को समुद्र से बाहर फेंकते हुए कहा....

जा, तू तो अपनी जान बचा....क्या याद करेगी किस नेकदिल इंसान से पाला पड़ा था...