बुधवार, 31 मार्च 2010

ब्लॉगर्स सावधान !!! कुछ भी हो सकता है...खुशदीप

बताते हैं कि पुराने ज़माने में हिंदुस्तान में किसी ने चाय का नाम तक नहीं सुना था...ईस्ट इंडिया कंपनी आई...अंग्रेज़ आए...लोगों को सड़कों-चौराहों-नुक्कड़ पर मुफ्त में जग भर भर के चाय पिलाई जाने लगी...खालिस दूध पीने वाले हिंदुस्तानियों को चाय का ऐसा चस्का लगा कि आज अधिकतम घरों में सुबह की शुरुआत चाय की प्याली से ही होती है...विरले ही हैं जो देश में खुद को चाय की च्यास से बचाए हुए हैं...

आप कहेंगे चाय का ब्लॉगिंग से क्या लेना-देना...है भईया, बहुत कुछ है....वही तो बताने जा रहा हूं इस पोस्ट में... मैंने ब्लॉगवाणी पर घूमते हुए दो बड़ी ही खुशफहमी वाली पोस्ट देखीं...इनमें लिखा था हिंदी के लिए गूगल फिर एड देना शुरू करने जा रहा है...अगर हक़ीक़त में ऐसा है तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है...लेकिन मुझे इस ख़बर से ज़्यादा अहम वो ख़बर लग रही है जो इसी हफ्ते चीन से आई है...गूगल इंक ने पिछले सोमवार को चीन में सर्च इंजन ऑपरेशन की सुविधा देनी बंद कर दी है...अब चीन में कोई सर्च पर जाता है तो उसे हांगकांग के सर्वर पर अन्सैन्सर्ड रिज़ल्ट्स की तरफ री-डायरेक्ट कर दिया जाता है...अब यहां आप खुद सोच कर देखिए कि किसी दिन भारत में भी ऐसा ही हो गया तो आप भी बस गूगल सर्च पर ढूंढते ही रह जाओगे, हाथ कुछ भी नहीं आएगा...

गूगल की ओर से लिए गए इस अभूतपूर्व फैसले पर कंपनी का कहना है कि दो महीने पहले ही इस बारे में आगाह कर दिया गया था...गूगल का ये भी आरोप है कि चीन में उसकी सेवाओं को सुनियोजित तरीके से साइबर अटैक का निशाना बनाया जा रहा था...गूगल ने ये तर्क भी दिया है कि चीन सरकार का उस पर दबाव था कि वो अपनी तरफ से ही साइट्स की मॉनिटरिंग करते हुए सेल्फ-सेंसरशिप लागू करे...अर्थात गूगल ने काम बंद करना मंज़ूर किया लेकिन झुकना नहीं...

गूगल अब चीन के सब्सक्राइबर्स को हांगकांग रूट के ज़रिए अन्सेन्सर्ड सर्च देने की कोशिश कर रहा है...यानि अब चीन के पाठक थ्यान आन मन चौक, तिब्बत और दलाई लामा से जुड़े विवादित मुद्दों तक भी पहुंच बना सकते हैं...लेकिन इस मामले में चीन गूगल से भी एक कदम आगे है...चीन ने ग्रेट फायरवाल सर्विस के ज़रिए हांगकांग सर्च रूट को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया है...अब चीन के 40 करोड़ वेब यूज़र्स पर क्या बीत रही होगी, आप इसका खुद ही अंदाज़ लगा सकते हैं...

खुदा न खास्ता कभी भारत में भी ऐसा होता है तो सभी ब्लॉगर्स बेभाव किनारे लग जाएंगे...मुझे जहां तक उपाय नज़र आ रहा है, सबसे पहले हमें अपनी खुद की वेबसाइट बनानी चाहिए...मैंने तो देशनामा.कॉम बना ली है...जल्दी ही उस पर शिफ्ट कर जाऊंगा...आप सबको भी मेरी यही राय है, बाकी आप अपना फैसला अच्छी तरह ले सकते हैं...मैं समझता हूं इस काम में अवधिया जी, पाबला जी और कनिष्क कश्यप से मदद ली जा सकती है...मैं तो अवधिया जी से अपील करता हूं कि जिस तरह समर्पित भाव से वो ब्लॉगिंग की आराधना करते हैं, वो अगर फुल टाइम ब्लॉगर्स की इस काम में मदद करें तो सभी का बेड़ा पार हो जाए...सब की वेबसाइट बन जाए तो सरकार, कारपोरेट या अन्य स्रोतों से एड की संभावनाएं तलाशी जाएं..

जहां तक मेरी जानकारी है, अपना वेबसाइट बनाने के लिये निम्न बातें जरूरी हैं...


1. डोमेननेम रजिस्टर करानाः रजिस्ट्रेशन एक साल तक के लिये ही है... प्रतिवर्ष नवीनीकरण कराना पड़ता है...एक से अधिक वर्षों के लिये भी रजिस्टर कराया जा सकता है...






2. वेब होस्टिंग लेनाः प्रति माह होस्टिंग का किराया देना पड़ता है... किराये की राशि अलग अलग प्लान के अनुसार अलग अलग होती है जो कि कम से कम प्रतिमाह होती है...इससे कम किराये में भी होस्टिंग मिल सकती है किन्तु उनके कन्ट्रोल पैनल में वांछित सुविधाएँ कम होती हैं...






3. अपने डोमेननेम को अपने वेबहोस्टिंग में लाना...






4. अपना ब्लॉग बनाने के लिये वर्डप्रेस को इंस्टाल करना...






5. वर्डप्रेस को हिन्दी के लिये कॉन्फिगर करना...






6. वर्डप्रेस में मनपसंद टेम्प्लेट डालना...






7. आवश्यक प्लगिन्स को वर्डप्रेस में डालना...






8. ब्लॉग लिखना आरम्भ कर देना...



आशा है इस विषय पर और सुधि ब्लॉगर्स भी अपनी राय लिखें, जिससे सब एक दूसरे के अनुभवों से सीखते हुए आगे के रास्ते पर सतर्कता के साथ बढ़ सकें...

सोमवार, 29 मार्च 2010

नेकी कर, लिफ़ाफ़े में डाल...खुशदीप

पोस्ट ऑफिस में एक सीनियर क्लर्क उस डेस्क का काम देखा करते थे जहां अधूरे या अस्पष्ट पतों वाली डाक की छंटाई होती थी...

एक दिन सीनियर क्लर्क को ऐसा ख़त मिला जिस पर कांपते हाथों से किसी ने सिर्फ.. गॉड... लिखा हुआ था...






सीनियर क्लर्क ने सोचा, ख़त का लिफ़ाफ़ा खोल कर देखा जाए, शायद वहां से कोई सुराग मिले कि भेजने वाला ख़त कहां भेजना चाहता है...



ख़त पर लिखा था...



डियर गॉड,


मैं 83 साल की विधवा हूं, बहुत छोटी सी पेंशन पर मेरा गुज़ारा होता है... कल मेरा किसी ने पर्स चुरा लिया...उसमें सौ डॉलर थे...अगली पेंशन जब तक नहीं आती मेरे जीने का सहारा बस वही रकम थी...अगले रविवार को क्रिसमस है...मैंने अपने दो दोस्तों को घर पर बुलाया है...बिना पैसे उनके लिए मैं कोई खाने का सामान नहीं खरीद सकती...न ही मेरा कोई रिश्तेदार है जिससे मदद मांग सकूं...गॉड आप ही मेरी अकेली उम्मीद हो... क्या आप मेरी मदद करोगे...


आपकी
एडना



ये ख़त पढ़कर सीनियर क्लर्क की आंखों में आंसू आ गए...उसने स्टाफ के सभी सहयोगियों को वो ख़त दिखाया...सबने अपने वालेट से कुछ कुछ न डॉलर निकाल कर विधवा को मदद भेजने के लिए सीनियर क्लर्क को दे दिए...इस तरह कुल 96 डॉलर इकठ्ठे हुए...वो उन्होंने एक लिफ़ाफ़े में डालकर विधवा को भेज दिए...


ये काम करने के बाद पोस्ट ऑफिस के सारे स्टॉफ के चेहरे खुशी से पूरा दिन चमकते रहे...सब विधवा एडना और उसके दो दोस्तों की पार्टी के बारे में सोचते और बातें करते रहे...



क्रिसमस आया और चला गया...



दो-तीन बाद फिर उसी विधवा का ख़त गॉड के नाम पर आया...

ख़त की बात सुनते ही सारा स्टाफ दौड़ा दौड़ा आ गया और सबके सामने ही सीनियर क्लर्क ने ख़त खोल कर पढ़ा...


उस पर लिखा था...



डियर गॉ़ड,

मैं आपका किन शब्दों में शुक्रिया करूं...मुसीबत में आप किस तरह मेरी मदद के लिए आगे आए...


आपके प्यार के तोहफ़े की वजह से ही मैं दोस्तों के लिए शानदार डिनर का इंतज़ाम कर सकी...हमने बहुत मज़े लिए...मैंने दोस्तों को आपकी मेहरबानी के बारे में भी बताया...


हां, आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि आपके भेजे लिफ़ाफ़े से 4 डॉलर कम थे...ये ज़रूर पोस्ट ऑफिस में काम करने वाले हरामज़ादों की कारस्तानी होगी....

आपकी
एडना



स्लॉग ओवर



ढक्कन...शादी क्या है...



मक्खन...कुंवारों के लिए शादी एलपेन्लिबे (कैंडी) के एड की तरह है...'जी ललचाए, रहा न जाए'....



और शादीशुदाओँ के लिए...



...



...



क्लोरोमिंट का एड...'दोबारा मत पूछना'...

औरत और उसके आंसू क्यों ख़ास होते हैं...खुशदीप

एक छोटा बच्चा मां से पूछता है...मां, तुम रो क्यों रही हो...



मां...क्योंकि मैं एक औरत हूं...



बच्चा...मुझे समझ नहीं आया...



मां बच्चे को गले से लगा कर कहती है...बेटा तुम कभी नहीं समझोगे...





बाद में बच्चा अपने पिता से पूछता है...मां बिना कोई वजह क्यों रोती  है...



पिता...सारी औरतें बिना वजह रोती हैं...



वो बच्चा बड़ा होकर पुरुष बन गया, लेकिन अब भी उसे समझ नहीं आया कि औरतें क्यों रोती है...



आखिरकार उसने भगवान को फोन मिलाया...जब भगवान फोन पर आए तो उसने पूछा...भगवन, औरतें इतनी जल्दी क्यों रोने लगती हैं...



भगवान...जब मैंने औरत को बनाया, ये सोचा कि वो विशेष हो...






मैंने उसके कंधे इतने मज़बूत बनाए कि वो दुनिया का बोझ उठा सके...






तब भी दिल से इतनी मुलायम कि सबके आराम का ख्याल रख सके...






मैंने उसे अंदर से इतनी दृढ़ता दी कि वो नए जीवन को जन्म दे सके...और फिर नया जीवन लेने वाला बच्चा बड़ा होकर मां का दिल दुखी करे तो वो उसे भी बर्दाश्त करने की शक्ति रखे...






मैंने उसे इतनी हिम्मत दी है कि जब सब थक कर हार मान ले, वो चट्टान की तरह अपने परिवार के लिए खड़ी रहे, बिना कोई शिकायत करे...बीमारी या मुसीबत में अपनों का ख्याल रखे....






मैंने उसे वो संवेदना दी है कि अपने बच्चों को हर हाल में प्यार करे, चाहे उसके जिगर के टुकड़े उसका दिल कितनी बुरी तरह ही क्यों न दुखाएं...






मैंने औरत को इतनी शक्ति दी है कि वो अपने पति की गलतियों के बावजूद उसे साथ लेकर चले...






मैंने उसे ये समझने की ताकत दी है कि अच्छा पति कभी पत्नी का दिल नहीं दुखाता, लेकिन कभी कभी उसकी खूबियों का इम्तिहान लेता है...जानना चाहता है कि उसका साथ खड़े रहने का प्रण कितना मज़बूत है...


.


और अंत में, मैंने उसे आंसू दिए...ये उसका विशेषाधिकार है कि कब उसकी आंखों से आंसू बाहर आए...






देखो मेरे बच्चे...औरत की खूबसूरती उन कपड़ों में नहीं होती जो वो पहनती है...आकर्षक फिगर जिसकी वो मालकिन होती है...या सुंदर केश जिन्हें वो बड़े जतन से संवार कर रखती है...






औरत की खूबसूरती उसकी आंखों में देखनी चाहिए...यही दरवाज़ा उसके दिल तक ले जाता है...दिल जिसमें प्यार रहता है...






मेरी इस बात को उन सब औरतों तक पहुंचाओ जिन्हें तुम जानते हो...अगर ऐसा करोगे तो कुछ अच्छा घटेगा...तुम किसी का हौसला और मज़बूत करोगे...






मेरी इस बात को उन सब पुरुषों तक भी पहुचाओ जो सच में एक औरत के जीवन के मायने जानना चाहते हैं...और जानना चाहते हैं, क्यों वो औरों से अलग और खास होती है...




(ई-मेल से अनुवाद)



स्लॉग ओवर


एक दिन मक्खन बड़ी तेज़ी से मेरे घर आकर बोला....भाई जी, हथौड़ा और कुछ कीलें हैं तो दे दो...



मैंने कहा...देता हूं भाई, लेकिन ऐसी क्या ज़रूरत आ गई...




मक्खन....भाई जी, आज ही नया कंप्यूटर लाया हूं, उसमें WINDOWS लगानी है...

शनिवार, 27 मार्च 2010

बच्चे आप से कुछ बोल्ड पूछें, तो क्या जवाब दें...खुशदीप

बड़े दिन से हंसी ठठे वाली पोस्ट लिख रहा था...आज कुछ सीरियस लिखने का मूड है...पहले मैं इस विषय को ब्लॉग पर लिखने को लेकर बड़ा ऊहापोह में था...लिखूं या न लिखूं...इसी दुविधा में था कि आज अविनाश वाचस्पति भाई से बात हुई...मैंने अविनाश भाई से कहा कि अंग्रेज़ी ब्लॉग्स पर बोल्ड विषयों पर भी खूब बेबाकी से लिखा जाता है....तो क्या हिंदी ब्लॉग अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ है जो बोल्ड टॉपिक्स को झेल सके...लेकिन मेरा करीब छह महीने की ब्लॉगिंग का अनुभव कहता है जो भी हिंदी ब्लॉगिंग में हैं, सभी बड़े मैच्योर और सुलझे हुए हैं...अगर किसी बहस का आधार बोल्ड विषय को बनाया जाए तो ज़रूर सभी खुल कर बात रखेंगे...अविनाश भाई ने भी इस पर सहमति जताई...तभी मैं इस विषय पर कुछ लिखने की हिम्मत दिखा पा रहा हूं...


जिस तरह रिले रेस चलती है उसी तरह हमारी या किसी भी प्राणी की जीवन रेस चलती है...हमें अपनी दौड़ पूरी करने के बाद बैटन अपनी संतान या उत्तराधिकारी को पकड़ाना होता है...किसी भी प्रजाति या स्पीसिज़ के सर्ववाइवल के लिए ज़रूरी है कि प्रजनन के ज़रिए उसे आगे बढ़ाए...ये सृष्टि का विधान है...जैव विकास इसी तरह आगे बढ़ता है...अब इसके लिए ज़रूरी है पुरुष और महिला का मिलन...जब ये एक ज़रूरी नियम हैं तो फिर इस पर बात करने से हम कतराते क्यों हैं...



हम जिस ज़माने में पैदा हुए तब से अब तक बहुत सारा पानी गंगा में बह चुका है...जो बातें हमें काफ़ी बड़े होने के बाद पता चलीं वो आज की पीढ़ी को बहुत छोटी उम्र में ही पता चल जाती हैं...तब आज की तरह सैटेलाइट टीवी नहीं था...जो खुलापन किसी वक्त विदेश में देखकर हम ताज्जुब किया करते थे, वो बुद्धु बक्से के ज़रिए हमारे ड्राइंग रूम तक पहुंच चुका है...आप कब तक नज़र रख पाएंगे कि बच्चा टीवी, इंटरनेट या मोबाइल पर क्या देखे और क्या नहीं...और ये शाश्वत सत्य है कि आप बच्चे को जिस चीज़ के लिए रोकेंगे, उसे कौतुहल के चलते वो जानने की इच्छा और प्रबल होगी...वो चोरी छिपे ये सब देखे तो आप क्या कर लेंगे...या मानिए वो स्कूल या घर के बाहर दूसरे बच्चों की सोहबत में कुछ ऐसा-वैसा सीखे तो आप कैसे उसे रोक पाएंगे...मेरा ये मानना है कि बाल मस्तिष्क बहुत कच्चा होता है...उसे हैंडल करने के लिए सबसे ज़्यादा केयर की ज़रूरत होती है...आपकी सख्ती या ज़रूरत से ज़्यादा ढील के चलते बच्चे के दिमाग में कुछ गलत बैठ गया तो बड़े होने पर विकार बनकर उसके विकास में कई तरह की समस्याएं खड़ी कर देता है...इसलिए यहां मां-बाप की भूमिका बहुत अहम हो जाती है...


जीवन के इस ज़रूरी पाठ (सेक्स) के बारे में बच्चा सही जानकारी कहां से ले...आज ये कहने से काम नहीं चलता कि बड़े होने पर अपने आप सब कुछ आ जाता है...ये तर्क सिर्फ दिल को तसल्ली देने के लिए ही हो सकते हैं कि शेर को शिकार करना कोई सिखाया जाता है या मछली को पानी में तैरना कोई सिखाया जाता है...अब आप खुद बताइए जब टीवी पर कोंडोम, गर्भनिरोधक गोली या परिवार नियोजन के बारे में कोई एड आता है और आप बच्चों के साथ ड्राइंग रूम में बैठे साथ देख रहे हैं तो आपके चेहरे पर क्या भाव आते हैं...रिमोट से चैनल बदल देते हैं...मुंह दूसरी तरफ़ घुमा लेते हैं...कोई दूसरी बात से ध्यान दूसरी ओर करने की कोशिश करते हैं...स्थिति तब और अजीब हो जाती है जब कोई छोटा बच्चा उन एड के बारे में आपसे कोई सवाल दाग देता है...आप या तो उसे झिड़क देते हैं या फिर सवाल को टाल जाते हैं...यहां बच्चे की उत्कंठा शांत नहीं होती...बाल-मन की प्रकृति है कि वो नया सब कुछ जानने, सब कुछ सीखने की कोशिश करता है...अब आप उसे नहीं बताते या रोकते हैं तो उसके मन में पेंच जरूर रह जाता है कि आखिर मुझसे ये बात छुपाई क्यों जा रही है...फिर इस समस्या का समाधान कैसे हो...क्या बच्चे को ऐसे ही उनके हाल पर छोड़ दिया जाए...या इस टॉपिक के लिए कोई साइंटिफिक एप्रोच अपनाई जाए...



बच्चे क्लास में भी तो बॉयोलॉजी के चैप्टर में रिप्रोडकशन का चेप्टर पढ़ते हैं...वहां उनकी नया जानने की बाल सुलभ भावनाएं तो रहती हैं, लेकिन उनके मन में कोई ऐसा वैसा गलत ख्याल नहीं आता...तो क्यों न पिता बॉयोलॉजी के उस चैप्टर या बाज़ार में मिलने वाले बॉडी पार्ट्स चार्ट्स के ज़रिए ही बच्चों को शारीरिक संरचना के बारे में समझाए...यहां बस इनोवेटिव होने की ज़रुरत है...

मेरा ये मानना है कि बच्चे में जब हार्मोनल चेंज आने शुरू होते हैं तो लड़कियों को तो उनकी माएं काफ़ी कुछ बता देती हैं...लेकिन लड़कों से कोई बात नहीं करता...मेरी समझ से यहां पिताओं की भूमिका बहुत अहम हो जाती है...पिता को बेटे से दोस्त की तरह बात करनी चाहिए...
किशोरावस्था में लड़कों के शरीर में भी बड़े हार्मोनल चेंज आते हैं...लेकिन उन्हें दोस्तों से या घर के बाहर से जो जानकारी मिलती है, वो अधकचरी होती है...इससे बच्चे के मन में गिल्ट आना शुरू हो जाता है...मैं यहां दो शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता था लेकिन उन्हें लिखा बिना कोई चारा भी नज़र नहीं आ रहा...किशोरावस्था में बैड वैटिंग या मास्टरबेशन बड़ा ही सीक्रेट या यूं कहें गंदे कहे जाने वाले शब्द हैं...लेकिन ये मानव शरीर की प्रकृति के चलते भी हो सकता है...अगर घर के पानी की टंकी पूरी तरह भर जाती है तो ओवरफ्लो होना शुरू हो जाती है...ये लड़के के जवानी की दहलीज पर कदम रखने का भी प्रतीक है...बस इतनी सी बात है...ज़िम्मेदार पिता को किशोर बेटे को समझाना चाहिए कि अति हर चीज़ की बुरी होती है...लेकिन प्रकृति भी अपने कुछ नियमों से चलती हैं...इन्हें लेकर मन में अपराधबोध नहीं लाना चाहिए...

अभी पिछले दिनों देहरादून में एक वाक्या हुआ था...एक सातवीं के लड़के ने टायलेट में चौथी की बच्ची के साथ उलटा सीधा करने की हरकत थी...आप कह सकते हैं कि ये सब जो टीवी पर दिखाया जा रहा है उसका असर है...सही बात है...कल को ये समस्या किसी भी बच्चे के साथ पेश आ सकती है...लेकिन इसका ये इलाज भी तो नहीं टीवी बंद करके ही ताक पर रख दिया जाए...बच्चे सही राह पर चलें, ये देखना भी तो हमारा फर्ज है...अब हम कब तक बच्चों को ये कह कर भ्रमाते रहेंगे कि मम्मी बेबी को भगवान के पास से लाई है...बच्चे बहुत स्मार्ट हो गए हैं...जिस तरह आप चाहते हैं कि बच्चे हमेशा आप से सच बोलें, उसी तरह बच्चे भी चाहते हैं कि पापा-मम्मी भी उनसे झूठ न बोलें...

अगर आप बच्चे का करियर बनाने के लिए अपना सब कुछ झोंक देते हैं...तो वैवाहिक जीवन भी ज़िंदगी का बड़ा सच है...बच्चे के वैवाहिक जीवन में इग्नोरेंस या गलत जानकारी की वजह से कोई समस्या न आए, इसके लिए भी तो हमारा कुछ फर्ज बनता है...अभी आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ में एक बड़ा रिवोल्यूशनरी कोर्स शुरू हुआ है...जिनकी शादी होने जा रही है, उनके लिए ये कोर्स बड़ा एडुकेटिव है...इससे सेक्स या ह्यूमन रिलेशंस को लेकर कई तरह की भ्रांतियां दूर हो जाती है...आज इसी तरह की एप्रोच अपनाने की ज़रूरत है...


इस दिशा में मैं डॉ टी एस दराल से अपील करता हूं कि कोई आसान भाषा में चार्ट्स के ज़रिए ऐसा प्रेंजेंटेशन तैयार करें जिनके ज़रिए मां-बाप सीख सकें कि बच्चों से सेक्स को लेकर कैसे बात की जाए...अगर ब्लॉगर भाई भी इस विषय में कुछ कहना चाहते हैं तो खुलकर अपनी बात रखें...खजुराहो और वात्सायन के देश में संस्कृति के नाम पर हम कब तक ढपोरशंख बने रहेंगे...एचआईवी और एड्स के खतरे के चलते हमें और सावधान होने की ज़रूरत है...नई पीढ़ी को सही जानकारी देना हमारा फ़र्ज बनता है...ज़माना बदल गया है...हम कब बदलेंगे...




डिस्क्लेमर- अगर इस लेख में मेरे इस्तेमाल किए गए एक दो शब्दों से किसी को असुविधा हुई है तो मैं पहले ही माफ़ी मांग लेता हूं...



ज़रूरी सूचना...आज स्लॉग ओवर छुट्टी पर है...मक्खन ने अलबेला खत्री जी के सम्मान में राजीव तनेजा भाई और संजू तनेजा भाभी की ओर से अपने घर पर दी गई दावत में इतना कुछ खा लिया कि लंबी तान कर सो रहा है...उठाने पर भी नहीं उठ रहा...




 

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

बड़े घर की बेटी...खुशदीप

आज आपको एक सच्चा किस्सा सुनाने जा रहा हूं...ये मेरे एक नज़दीकी रिश्तेदार के घर की बात है...इसे पढ़ने के बाद आपको लगेगा कि हमारे बुज़ुर्गों में भी कितना गजब का सेंस ऑफ ह्यूमर होता है...ये किस्सा मुझे जब भी याद आता हे उस बुज़ुर्ग महिला का गरिमामयी चेहरा खुद-ब-खुद मेरे ज़ेहन में आ जाता है, साथ ही मेरे होठों पर मुस्कान भी आ जाती है...उस महिला को दुनिया छोड़े अब कई साल हो गए हैं...उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धांजलि...

अब आता हूं किस्से पर...जिस बुज़ुर्ग महिला की बात मैं कर रहा हूं, उनका अच्छा खासा मध्यमवर्गीय परिवार है...उसी महिला के पोते की शादी दिल्ली के एक बहुत ही रईस और ऊंचे घराने में हो गई....लड़की अपने मां-बाप की अकेली लड़की और तीन भाईयों की बहन थी...सभी उस पर जान छिड़कने वाले...लड़की पढ़ी लिखी थी लेकिन बचपन से ही लाडो से पली थी...इसलिए काम वगैरहा की ज़्यादा आदत नहीं थी...



शादी के बाद भी मायके वालों ने खूब तोहफे देना जारी रखा...छह सात महीने बाद घर में आने वाले नन्हे मेहमान की आहट हुई तो सब बड़े खुश...लड़की के मायके वालों की खुशी का तो पूछो नहीं...साथ ही बेटी के स्वास्थ्य की भी फिक्र...अब जब भी मायके से कोई आता...बस यही कहता बेटी अपना ध्यान रखो...आराम करो...अब वो आराम तो पहले से ही इतना करती थी...हर वक्त पलंग पर पसरे रह कर टीवी देखते रहना..ऊपर से मायके वाले हर बार आकर हिदायतें और दे जाते...बाकी घर वालों से भी कह जाते...बिटिया लापरवाह है, इसलिए आप सब ही इस का ध्यान रखिएगा...अब जब भी लड़की की मां आती यही रिकॉर्ड बजा जाती जैसे ससुराल वालों को जब तक कहा नहीं जाएगा वो बहू का ख्याल ही नहीं रखेंगे...

एक बार बेटी की मां आराम आराम की हिदायतें देते हुए अपनी रौ में ही बोले जा रही थी कि दादी अम्मा (बुज़ुर्ग महिला) का सब्र जवाब दे गया...धीरे से बोलीं...आराम तो बिटिया पहले से ही बहुत कर रही है...अब आप कहो तो उसके पलंग पर एक और पलंग डाल देते हैं....



स्लॉग ओवर


गुल्ली का बायोलॉजी का प्रैक्टीकल था...


वायवा (मौखिक इम्तिहान) लेने के लिए बाहर से एक्जामिनर आया हुआ था...


स्पेसीमेन के तौर पर एक पंछी की सिर्फ टांगे दिखाकर एक्ज़ामिनर ने गुल्ली से पूछा...उस पंछी का नाम बताओ जिसकी ये टांगे हैं...


गुल्ली ने बिना वक्त जाया किए कहा... मुझे नहीं पता...


एक्जामिनर...तुम इम्तिहान में फेल हो...अपना नाम बताओ...


गुल्ली... मेरी टांगे देखिए...


एक्जामिनर...क्यों...


गुल्ली...मेरे नाम का पता चल जाएगा...



नशों ने मारे गबरू कैसे कैसे...खुशदीप

एक भालू सिगरेट का सुट्टा लगाने की तैयारी कर रहा था कि एक चूहा उसके पास आया...चूहे ने कहा...इतने शक्तिशाली, इतने हैंडसम जवान हो, क्यों खुद को इस नामुराद सिगरेट से जलाने में लगे हो...तुम इसे नहीं पी रहे , बल्कि ये तुम्हे पी रही है...छोड़ दो इसकी लत, आओ मेरे साथ दौड़ो, देखो ये जंगल, ये दुनिया कितनी खूबसूरत है...

भालू को ये सुनकर अपने पर शर्म आई और कुछ लम्हे सोचने के बाद पश्चाताप के लिए चूहे के साथ दौड़ने लगा...





अभी कुछ ही दूर गए थे कि एक हाथी अफ़ीम का अंटा चढ़ा रहा था...ये देखकर चूहा रुक गया...दोनों हाथ कमर पर रखकर हाथी को हड़काते हुए बोला...कहने को तुम गजराज हो लेकिन अक्ल तुम्हे धेले की नहीं है...बस शरीर ही शरीर है तुम्हारे पास...ये अफ़ीम के चक्कर में अपना क्या हाल बना लिया...छोड़ दो ये नशा...मेरे साथ दौड़ो, इस जंगल, इस दुनिया के रंग-बिरंगे नज़ारे देखो...

हाथी भी चूहे से ये सब सुनकर बड़ा शर्मसार हुआ और चुपचाप पीछे-पीछे दौड़ने लगा...

आगे चले तो एक शेर टेबल पर नमकीन के साथ व्हिस्की पीने की तैयारी कर रहा था...चूहे ने वैसे ही धमक कर शेर से भी कहा...जंगल कितना....ये सुनना ही था कि शेर ने व्हिस्की का गिलास एक और रखा...और चूहे के सात-आठ झन्नाटेदार जड़ दिए...ये देखकर हाथी और भालू से रहा नहीं गया...दोनों शेर से बोले...क्यों मार रहे हो इस नेक आत्मा को...एक तो बेचारा तुम्हे नशे की गर्त से निकाल कर ज़िंदगी की तरफ़ ले जाना चाहता है और तुम इसे पीट रहे हो...


ये सुनकर शेर बोला...नेक आत्मा और ये...तुम इसके चक्कर में कहां पड़ गए...पिछली
बार भी मुझे ये जंगल में सात-आठ घंटे दौड़ाता रहा था...वो तो मुझे बाद में पता चला कि ये कमीना तो....




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पक्का भंगेड़ी है...




स्लॉग ओवर

मक्खन के छाते में एक छेद था...

ढक्कन...मक्खन भाई तुम्हारा छाता तो नया लगता है, फिर इसमें ये छेद क्यों हैं...

मक्खन...खोती दे पुतर, बारिश रुक जाएगी ते तेरा प्यो आके मैनू दसेगा...

( गधी के बेटे, बारिश रुक जाएगी तो तेरा बाप आकर मुझे बताएगा)

गुरुवार, 25 मार्च 2010

ओेए लक्की, लक्की ओए...खुशदीप

अपना लक पहन कर चलो...ये पढ़ कर आपको ज़रुर याद आ गया होगा कि मैं लक्स कोज़ी की एड का ज़िक्र कर रहा है...लेकिन कुछ पहनने से लक बदलता है या नहीं, ये मैं नहीं जानता लेकिन आज आपको लक यानि किस्मत की महिमा बताता हूं...



लक मैटर्स...



एक कंपनी में एक्जीक्यूटिव पोस्ट के लिए आवेदन मांगे गए....

देखते ही देखते तीन सौ आवेदन आ गए...लेकिन कंपनी के पास वक्त बहुत कम था...और किसी को नौकरी पर रखना भी बहुत जल्दी था...

बॉस ने सेक्रेट्री से डेस्क पर रखे तीन सौ आवेदनों में से नीचे रखे 50 को कॉल करने के लिए कहा...और बाकी सारे आवेदनों को रद्दी की टोकरी में फेंकने के लिए...

ये सुनकर सेक्रेट्री का मुंह खुला का खुला रह गया...फिर भी उसने हिम्मत करके पूछा...क्या 250 आवेदन फेंक दिए जाएं, बिना देखे....अगर इनमें वाकई श्रेष्ठ उम्मीदवारों के भी आवेदन रद्दी में चले गए तो...


बॉस ने ये सुनने के बाद मुस्कुराते हुए कहा...

यस, तुम्हारा तर्क बिल्कुल ठीक है, लेकिन मैं अपने ऑफिस में ऐसे लोग नहीं चाहता जिनका लक खराब हो...

-बेकी होरोविट्ज (रीडर्स डाइजेस्ट)



स्लॉग गीत


ओए लकी, लकी ओए



स्लॉग ओवर

मक्खन...

नी मक्खनिए....जब मैंने तुझे पहली बार देखा था तो तेरी फिगर बिल्कुल कोक की बॉटल की तरह होती थी..


मक्खनी...

ठंड रख, मैं अब भी कोक की बॉटल ही हूं...फर्क सिर्फ इतना है पहले 300 ML की थी, अब दो लीटर वाली हो गई हूं...



बुधवार, 24 मार्च 2010

कामयाब होना है, घर की चीज़ों की बात सुनिए...खुशदीप

हर घर कुछ न कुछ कहता है...नेरोलक पेंटस का ये एड आपने कभी न कभी ज़रूर देखा होगा...मैं कहता हूं घर क्या, घर का हर कमरा, कमरे की हर चीज़ भी आप से कुछ न कुछ कहती है...यहां तक कि सफलता का मंत्र भी बताती हैं...यकीन नहीं हो रहा न...तो लीजिए, खुद ही पढ़िए कमरे की हर चीज़ आपसे कैसे मुखातिब है....







छत कहती है...मेरे पास ऊंचाई है,






पंखा कहता है....खुद को ठंडा रखो,






घड़ी कहती है....हर मिनट कीमती है,






दर्पण कहता है....कोई भी काम करने से पहले मुझे ज़ेहन में रखो,






खिड़की कहती है...अपने से बाहर निकल कर दुनिया-जहां को भी देखो,






कलेंडर कहता है...खुद को हमेशा अप-टू-डेट रखो,






दरवाज़ा कहता है...हाथ आए अवसर को कभी नहीं छोड़ो,






और बिस्तर कहता है...






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सब बकवास है...मस्त चादर ओढ़ कर सोजा...



स्लॉग ओवर

सवाल...इंडियन क्रिकेट टीम और टॉयलेट में क्या समानता है...






मक्खन...वहां भी धोनी है और वहां भी....




(डिस्क्लेमर....निर्मल हास्य)

मंगलवार, 23 मार्च 2010

देवी कैटरीना की स्तुति में कविराज अक्षय की रचना की संदर्भ सहित व्याख्या...खुशदीप

पढ़ाई के तरीके बदल रहे हैं...अब उन तरीकों से बच्चों को पढ़ाने पर ज़ोर दिया जा रहा है जिन्हें वो आसानी से समझ सकें...जैसे बच्चा-बच्चा और किसी को पहचानता हो या न हो लेकिन सचिन तेंदुलकर और शाहरुख़ ख़ान को ज़रूर पहचानता होगा...इसलिए अब कई सेलेब्रिटीज़ को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है...कहते हैं कविता हमारे जीवन से खत्म होती जा रही है...लेकिन धन्य है हमारा बॉलीवुड जो दिन प्रति दिन हमें न जाने कब से एक से बढ़ कर सस्वर गाई जाने वाली रचनाएं दिए  जा रहा है...अब कल्पना कीजिए इन्हीं रचनाओं को पद्य के रुप में हिंदी के पाठ्यक्रम में स्थान मिलना शुरू हो जाए तो हमारे नौनिहाल किस तरह संदर्भ सहित व्याख्या करेंगे...उसी की एक बानगी...

अध्यापक का सवाल...

संदर्भ प्रसंग सहित निम्नलिखित कालजयी रचना की व्याख्या कीजिए...


जी करदा भई जी करदा, तैनू झप्पियां पावां, जी करदा....


छात्र का उत्तर...


संदर्भ और प्रसंग...

ये पंक्तियां प्रेम के परम पुजारी संत अक्षय कुमार के ऐतिहासिक श्रव्य और दृश्य महाग्रंथ सिंह इज़ किंग की अमर रचना...जी करदा भई जी करदा, तैनू झप्पियां पावां, जी करदा....से उद्धृत की गई हैं....




व्याख्या...

इस कविता में कविराज अक्षय कुमार जब भी देवी कैटरीना को गुलाबी रंग के वस्त्रों में नृत्य का रस बिखेरते देखते हैं तो इनका चंचल मन व्याकुल हो उठता है...उनके संयम का बांध टूट जाता है और उनके मुखारबिंदु से स्वत ये अनमोल वचन निकलने लगते हैं...कविराज अक्षय किसी याचक की तरह करबद्ध होकर निवेदन करते हैं...हे, देवी कैटरीना...मेरा तैणू झप्पियां पाण नू बड़ा जी करदा ए...

यानि...हे देवी कैटरीना, तुझे आलिंगनबद्ध करने को मेरा बड़ा मन करता है...






निष्कर्ष...

ये रचना हमारे कविराज संत अक्षय कुमार जी की घोर अधीरता और कामुक प्रवृत्ति की ओर बड़े प्रभावशाली ढंग से इंगित करती है...साथ ही देवी कैटरीना के अप्रतिम सौंदर्य से भी परिचय कराती है...


ये तो रहा एक छात्र का उत्तर...अगर ब्लॉगर बिरादरी में से कोई इस रचना पर और प्रकाश डालना चाहे या कोई और महान व्याख्या करना चाहे तो टिप्पणी बॉक्स में उनका स्वागत है...मेरा व्यक्तिगत अनुरोध विशेष तौर पर परम पूज्य श्री श्री 1008 बी एस पाबला जी महाराज से है कि वे अवश्य इस रचना पर अपने अनमोल विचारों से हमें सराबोर करें...


अंत में सभी ब्लॉगरगण से अनुरोध है कि इस कालजयी रचना का स्वयं कविराज अक्षय कुमार और देवी कैटरीना के ज़रिए रसास्वादन करे और आनंद के सागर में गोते लगाएं...

स्लॉग गीत

जी करदा भई जी करदा, तैनू झप्पियां पावां, जी करदा....

रविवार, 21 मार्च 2010

कहां महफूज़ है एक स्टार ब्लॉगर...खुशदीप

कल मैनपुरी से ब्लॉगर भाई शिवम मिश्रा का फोन आया...उन्होंने बड़ी फ़िक्र जताई कि न तो ये स्टार ब्लॉगर महोदय फोन उठा रहे हैं, न ही इनका कोई अता-पता चल रहा है...मैंने भी कहा, भैया मुझसे आखिरी बार पांच छह दिन पहले जनाब ने बात की थी...आखिरी बार ये मिस्टर हैंडसम जबलपुर के ब्लॉगरों के बीच हीरो बने हुए मीडिया से मुखातिब होते हुए देखे गए...जबलपुर में ही इनकी ननिहाल है...मुझे तो पूरा शक है कि लखनऊ के इस नवाब के हाथ-पैर नीले (पीले लड़कियों के होते हैं) करने की तैयारी चल रही है...तभी ये शख्स कहीं अंडरग्राउंड हो गए हैं....

अब मैंने थक-हार कर लापता इस स्टार ब्लॉगर की तलाश में एड देने की सोची है...शुरुआत ब्लॉगवुड से ही कर रहा हूं...शायद यही बात बन जाए, थाने के चक्कर काटने की नौबत ही न आए...



तलाश......तलाश....तलाश 



नाम....मिस्टर एक्स (कुछ लोग बड़बोला होने का आरोप भी लगाते हैं)


उम्र....जितनी भी हो लगते जनाब पच्चीस से ऊपर के नहीं हैं...


इस स्टार ब्लॉगर का ताल्लुक नफ़ासत और नज़ाकत के शहर से है, लेकिन हैं पूरे रोडी (रिफाइन्ड, वेल एडुकेटेड, कल्चर्ड रोडी)....


पढ़ाई में हमेशा आला ...तर्क में अच्छे से अच्छे शास्त्री का मुकाबला


खूबसूरती के मामले में हैंडसम सलमान ख़ान सरीखा...


दिल का भला और दूसरों के हमेशा काम आने वाला...अपनों की परेशानी में सब कुछ झोंक देने वाला....


कभी अपने सुंदर मुखारबिन्दु से ऐसे मधुर वचन कह जाते हैं कि दूसरा तिलमिलाता हुआ पैर पटकता रह जाता है...इसके अलावा वो बेचारा करे भी क्या


जनाब का पैट डॉयलॉग है...हम जहां जाकर खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है...


सुपर कॉन्फिडेंट जनाब गजब के फ्लर्ट भी हैं...दिल हथेली पर लिए घूमते हैं...इसलिए हसीनाएं खास तौर पर इनकी भोली सूरत पर न जाएं और अपने विवेक से काम लें...


किसी को भी ये शख्स दिखाई दें तो तत्काल अपने सबसे नज़दीकी ब्लॉगर को इसकी सूचना दें...सूचना देने वाले के लिए जबरदस्त ईनाम भी है...सूचना देने वाले के गले में 51 नरमुंड की माला डालकर इस स्टार ब्लॉगर की शादी में चीफ़ गेस्ट बनाया जाएगा...यही नहीं पहले राम प्यारी की अगुआई में ताऊ के प्यारे जानवर सूचना देने वाले का लखनऊ स्टेशन पर स्वागत करेंगे और फिर जुलूस की शक्ल में स्टार ब्लॉगर के घर तक ले जाएंगे...जनाब, अब आप किस बात का इंतज़ार कर रहे हैं...लग जाइए न फौरन स्टार ब्लॉगर की तलाश में...



लाल टी शर्ट में सजे ये महाशय आखिरी बार सार्वजनिक तौर पर इस महीने की 14 तारीख को जबलपुर में देखे गए...



स्लॉग गीत

स्टार ब्लॉगर की तलाश में मेरे जैसे कई ब्लागर ये गाना गाते हुए मारे मारे फिर रहे हैं...

चंदा को ढूंढने तारे निकल पड़े....


फिल्म... जीने की राह 1969

शनिवार, 20 मार्च 2010

मेरी डबल सेंचुरी और भगवान लापता...खुशदीप

ब्लॉगिंग में जितने प्यार की मैं उम्मीद के साथ आया था, उससे दुगना क्या, कहीं ज़्यादा गुना मुझे मिला...देखते ही देखते ये मेरी 200वीं पोस्ट आपके सामने हैं....पिछले साल 125 लिखी थीं...इस साल की ये 75वीं पोस्ट है...छह दिसंबर को मेरी 100वीं पोस्ट की तरह मेरे अज़ीज सतिंद्र जी ने इस बार मुझे एक हफ्ते पहले ही सतर्क कर दिया था कि 20 मार्च को मेरी 200वीं पोस्ट होगी...पिछली बार की तरह उन्होंने मुझे अब तक मिली टिप्पणियों का आंकड़ा भी भेज दिया...पोस्ट की डबल सेंचुरी है तो कुछ बढ़िया कॉकटेल तो बनता है न बॉस...

खैर ये सब चक्कर छोड़िए, पहले आपको एक मज़ेदार किस्सा सुनाता हूं...किस तरह बद से बदनाम बुरा होता है...

स्लॉग ओवर

दो नन्हे बाल गोपाल बड़े नटखट, बड़े शैतान...पूरी कॉलोनी का हर वक्त नाम में दम किया रखते थे...कहते है न पूत के पांव पालने में नज़र आ जाते हैं, तो जनाब जिस तरह की इनकी हरकतें थी, उससे एक बात तो तय थी कि दोनों बड़े होकर ब्लॉगर बनेंगे...आए दिन उनकी शरारतों और ज़माने की शिकायतों ने बाल गोपालों की मां बेचारी का जीना दुश्वार कर दिया...तभी उस मां को किसी ने सलाह दी कि शहर में एक बहुत पहुंचे हुए महात्मा आए हुए हैं, बिगड़े बच्चों को तो वो चुटकियों में ठीक कर देते हैं...

मां बेचारी ने भी सोचा, मैंने तो सारे उपाय कर देख लिए हैं, चलो इस महात्मा को भी आजमा लेती हूं...शायद कोई चमत्कार हो जाए...इन दोनों बाल गोपालों में से एक आठ साल का था और दूसरा दस का...रुतबा इतना बढ़िया था कि आस-पास कहीं भी कुछ उलटा-सीधा होता, पहला शक इन दोनों पर ही जाता...मां ने महात्मा से बच्चों को ठीक करने की गुहार लगाई...महात्मा तैयार तो हो गए लेकिन इस शर्त पर कि दोनों बच्चों से अलग-अलग मिलेंगे...मां ने तय किया कि सुबह आठ बजे छोटे बेटे को भेज देगी और बड़े को दोपहर 12 बजे...

अब छोटे मियां को सुबह आठ बजे महात्मा के सामने पहुंचा दिया गया...महात्मा ने लाल-लाल आंखों से बच्चे को घूरा और फिर कड़क आवाज़ में पूछा कि भगवान कहां है...छोटे उस्ताद ठहरे छोटे उस्ताद...सीटी बजा मुंह गोल वाले अंदाज़ में जवाब देने की मुद्रा में आ गए....लेकिन मुंह से आवाज़ नहीं निकली...महात्मा ने फिर पूछा....कहां हैं भगवान...छोटे उस्ताद ने एक्शन रिप्ले के अंदाज़ में फिर वही मुंह गोल करके दिखा दिया...आवाज़ इस बार भी नहीं निकली...



अब महात्मा का पारा चढ़ गया...बच्चे की तरफ़ उंगली करते हुए फिर ज़ोर से पूछा....मैं पूछ रहा हूं कहां हैं भगवान...ये सुनना था कि छोटा उस्ताद सीट से उठा और तेज़ी से कमरे से निकला और तेज़ी से भागता हुआ घर वापस आया और खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया....बड़े भाई ने ये देखा तो छोटे भाई से पूछा कि बता तो सही, हुआ क्या...

छोटे उस्ताद ने तेज़ तेज़ सांस लेते हुए कहा कि इस बार लगता है हम वाकई बहुत बड़ी मुसीबत में फंस गए हैं....

आख़िर हुआ क्या...

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अरे इस बार भगवान गुम हो गए और वो समझ रहे हैं कि हम दोनों ने ही उन्हें गायब किया है....

तो ये है जनाब बद से बदनाम बुरा...

चलिए स्लॉग ओवर भी हो गया...अब आता हूं अपनी इस 200वीं पोस्ट की कहानी पर...16 अगस्त 2009 को मैंने देशनामा पर पहली पोस्ट....कलाम से सीखो शाहरुख...डाली थी...लेकिन टाइमलाइन गलत होने की वजह से पोस्ट पर तारीख 17 अगस्त दर्ज हुई...तब से अब तक ब्लॉगिंग के सफ़र में जो भी मुझसे अच्छा-बुरा बन सका वो मैं पोस्ट पर डालते गया...लेकिन इस दौरान जो मैंने आपका बेशुमार प्यार कमाया, वही सबसे बड़ी पूंजी है...इस दौरान मेरे आइकन्स समेत बड़ों ने मेरा हौसला बढ़ाया, सुझाव दिए...रास्ता दिखाया...वहीं हमउम्र साथियों और छोटे भाई-बहनों ने भी मुझे भरपूर प्यार दिया...मैं किसी एक का नाम नहीं लेना चाहूंगा...सभी मेरे लिए सम्मानित हैं...हां गुरुदेव समीर लाल समीर का नाम इसलिए लूंगा कि उन्होंने ब्लॉगिंग के रास्ते पर पहले दिन से उंगली पकड़ कर चलना सिखाया...



मेरा ब्लॉगिंग का सफ़र



देशनामा ब्लॉग बनाया...फरवरी 2009



पहली पोस्ट डाली...16 अगस्त 2009



ब्लॉगिंग के दिन...217



पोस्ट लिखीं...200



पाठक संख्या...50,450 (20 मार्च 2010, रात 11बजे )



टिप्पणियां... 5,340 (20 मार्च 2010, रात 11 बजे)



आख़िर में गीत के ज़रिए मेरे जज़्बात...



स्लॉग गीत

चले थे साथ मिल कर, चलेंगे साथ मिल कर


तुम्हे रुकना पड़ेगा, मेरी आवाज़ सुन कर

इसे पढ़ कर आपका ख़ून भी खौलने लगेगा...खुशदीप

मातृभूमि की सेवा करने वाले सैनिक क्या अलग मिट्टी के बने होते हैं...क्या वो आपके-हमारी तरह इंसान नहीं होते...सरहद पर दुश्मन से मोर्चा लेते हुए शहीद होने वाले रणबांकुरों की रगों में क्या कुछ अलग तरह का लहू दौड़ता है...आज एक पिता की नज़र से बताता हूं आपको ऐसे ही कुछ जांबाज़ों की कहानी...वो अब इस दुनिया में नहीं हैं...लेकिन उनके साथ जो बीती, उसे सुनकर आपका ख़ून भी खौलने लगेगा...

एक पिता ने अपने शहीद बेटे के साथ कुछ और शहीदों के गुनहगारों को सज़ा दिलाने के लिए मुहिम छेड़ी है...ये पिता जानते हैं कि रास्ता बहुत मुश्किल है...लेकिन उन्होंने इस मुहिम को ही अपना जीवन समर्पित कर दिया है...



लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया अपने माता-पिता के साथ



यहां मैं बात कर रहा हूं शहीद लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया की...4 जाट रेजीमेंट का वो जियाला ऑफिसर जिसने करगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ का सबसे पहले पता लगाया था...15 मई 1999 को एलओसी के अंदर भारतीय सीमा में पेट्रोलिंग करते 22 साल के लेफ्टिनेंट कालिया और उनके साथी पांच रणबांकुरों को पाकिस्तानी सेना के घुसपैठियों ने बंधक बना लिया...इन छह जांबाज़ों के शहीद होने से पहले पाकिस्तानी कायरों ने तीन हफ्ते तक उन्हें बंधक बना कर रखा...देश के इन सपूतों के साथ किस तरह की दरिंदगी के साथ पेश आया गया ये 9 जून 1999 को पाकिस्तानी सेना की ओर से सौंपे गए शवों से ही पता चल सका...



शवों पर जगह-जगह सिगरेट से द़ागे जाने के निशान, कानों में जलती सलाखों से छेद, आंख़े फोड़ कर शरीर से निकाल दी गईं, ज़्यादातर हड़डियों और दांतों को तोड़ दिया गया, उंगलियां काट ली गई और भी न जाने क्या क्या...इस तरह का शारिरिक और मानसिक अत्याचार कि शैतान भी शरमा जाए...22 दिन के पाशविक जुल्म के बाद सभी छह जवानों को गोली मार दी गई...भारतीय सेना के पास सभी छह शहीदों की विस्तृत पोस्टमार्टम रिपोर्ट है...पाकिस्तानी सेना ने सारे अंतरराष्ट्रीय नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए ये अमानवीय अत्याचार किया...जुल्म की इंतेहा के बावजूद हमारे रणबांकुरों ने दुश्मन के सामने घुटने नहीं टेके...सब कुछ सहने के बावजूद देशभक्ति और बहादुरी की मिसाल कायम की...लेफ्टिनेंट कालिया के साथ शहीद होने वाले पांच सिपाहियों के नाम हैं-



1. सिपाही अर्जुन राम पुत्र श्री चोक्का राम


गांव और पीओ....गुडी


तहसील और जिला नागौर (राजस्थान)






2. सिपाही भंवर लाल बगारिया पति श्रीमती भवरी देवी


गांव...सिवेलारा


तहसील और ज़िला सीकर


राजस्थान






3. सिपाही भीकाराम पति  भावरी देवी


गांव पटासार, तहसील पचपत्वा


ज़िला बाड़मेर, राजस्थान






4. सिपाही मूला राम पति श्रीमती रामेश्वरी देवी


गांव कटोरी, तहसील जयाल


ज़िला नागौर, राजस्थान






5. सिपाही नरेश सिंह पति श्रीमति कल्पना देवी


गांव छोटी तल्लाम


जिला अलीगढ़, उत्तर प्रदेश




देश के लिए सर्वोच्च बलिदान हर जवान के लिए फख्र की बात होती है, लेकिन कोई अभिभावक, कोई सेना, कोई देश उस जालिम बर्ताव को बर्दाश्त नहीं कर सकता जो भारत माता के सच्चे सपूतों के साथ किया गया...अगर हमने युद्धबंदियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार और उनके हक और हकूक के लिए आवाज नहीं उठाई तो हर मां-बाप अपने कलेजे के टुकड़ों को सेना में भेजने से पहले सौ बार सोचने लगेंगे...जो लेफ्टिनेंट कालिया और उनके पांच बहादुर साथियों के साथ हुआ, बुरे से बुरे सपने में भी और किसी के लाल के साथ न हो...


ताज्जुब की बात है ज़रा ज़रा सी बात पर आसमान एक कर देने वाले देश के मानवाधिकार संगठन भी इस मुद्दे पर कानों में तेल डालकर सोए हुए हैं...मैं इस पोस्ट के ज़रिए पूरी ब्लॉगर बिरादरी और देश के नागरिकों से अपील करता हूं कि इस मुद्दे पर लेफ्टिनेंट कालिया के पिता का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दें...अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन पर इतना दबाव डाला जाए कि वो पाकिस्तान को ये पता लगाने के लिए मजबूर कर दे कि वो कौन से वर्दीधारी शैतान थे जिन्होंने दरिंदगी की सारी हदें पार कर डालीं...बेनकाब हो जाने के बाद इंसानियत के इन दुश्मनों को ऐसी कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाए कि दुनिया में फिर कोई युद्धबंदियों के साथ ऐसा बर्ताव करने की ज़ुर्रत न कर सके...लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के पिता डॉ एन के कालिया का पता और फोन नंबर हैं...


डॉ एन के कालिया

सौरभ नगर


पालमपुर- 176061 (हिमाचल प्रदेश)


फोन नंबर +91(01894) 232065

E-mail- nkkalia@bsnl.in



लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के पिता डॉ एन के कालिया ने ई-मेल के ज़रिए भी इस आवाज़ को बुलंद करने की मुहिम छेड़ रखी है...मेरे पास भी एक ई-मेल आया है...कल मैं भी जितने लोगों के ई-मेल एड्रैस जानता हूं सब को वो अपने नाम को लिखने के बाद फॉरवर्ड करूंगा...आपको भी बस यही करना है....ज़्यादा से ज़्यादा अपने जानने वालों को वो ईृ-मेल भेजें....


लेफ्टिनेंट सौरभ समेत इन छह रणबांकुरों ने मोर्चे पर अपने प्राणों का बलिदान इसलिए दिया कि हम अपने घरों में चैन से सो सकें...क्या हमारा उनके लिए कोई फ़र्ज नहीं बनता है...आप चाहें तो डॉ एनके कालिया का फोन के ज़रिेए भी इस मुहिम के लिए हौसला बढ़ा सकते हैं....



जय हिंद....



स्लॉग गीत



ए मेरे वतन के लोगों, ज़रा आंख में भर लो पानी,


जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुरबानी...

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

लो चुटकियों में कश्मीर मुद्दे का हल...खुशदीप



भारत भलमनसाहत दिखाते हुए जब भी पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाता है, पाकिस्तान किसी न किसी बहाने कश्मीर को बीच में ले आता है...63 साल से यही कहानी चली आ रही है...दोनों देशों के बीच 176 बार बातचीत हो चुकी है...लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात...


लेकिन जिस मुद्दे को बड़े बड़े तीसमारखां नहीं सुलझा सके, उसे एक समझदार राजनयिक ने कैसे चुटकियों में सुलझा दिया...आप खुद ही पढ़िए...



संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक चल रही थी...भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों को भी बैठक को संबोधित करना था...पहले भारतीय प्रतिनिधि ने बोलना शुरू किया...

मैं अपने देश का नज़रिया रखने से पहले ऋषि कश्यप का ज़िक्र करना चाहूंगा...वही ऋषि कश्यप जिनके नाम पर कश्मीर का नाम पड़ा...ऋषि कश्यप ने एक चट्टान पर तीर मारा तो वहां से निर्मल जल का झरना फूट पड़ा...दूध की तरह जल देखकर ऋषि महाराज का नहाने का मन कर आया....उन्होंने चट्टान पर कपड़े उतार कर रखे और झरने में कूद गए...स्नान से अच्छी तरह तृप्त होने के बाद ऋषि बाहर आए, तो ये क्या...उनके कपड़े ही गायब...दरअसल एक पाकिस्तानी ने उनके कपड़े चुरा लिए थे...



भारतीय प्रतिनिधि के मुंह से जैसे ही पाकिस्तान का नाम सुना, आदत के मुताबिक पाकिस्तानी प्रतिनिधि टोकने के लिए झट अपनी सीट से खड़ा हो गया और फुंकारते हुए बोला....

ये क्या बेहूदा झूठे आरोप लगा रहे हैं आप...वहां पाकिस्तानी कहां से आ गए...

भारतीय प्रतिनिधि ने मुस्कुराते हुए कहा....

यही तो मैं अपने काबिल दोस्त को समझाना चाहता हूं...पाकिस्तान कश्मीर में कहां से आ गया...लेकिन न तो ये समझने को तैयार हैं और न ही पिछले छह दशक से इनकी हुकूमत...


भारतीय प्रतिनिधि की बात सुनकर संयुक्त राष्ट्र के बाकी सभी सदस्य मु्स्कुराने लगे और पाकिस्तानी प्रतिनिधि को मायूस होकर अपनी सीट पर बैठना पड़ा...


हो गया कश्मीर का हल...लेकिन ये क्या इतना अच्छा सपना देखते हुए मेरी नींद क्यों खुल गई....



चलिए जाने दीजिए फिलहाल तो कश्मीर पर मेरा पसंदीदा गीत सुनिए....



स्लॉग गीत

कितनी खूबसूरत ये तस्वीर है,


ये कश्मीर है, ये कश्मीर है....



फिल्म....बेमिसाल 1982

गुरुवार, 18 मार्च 2010

दम ले ले घड़ी भर, ये आराम पाएगा कहां...खुशदीप

समुद्र किनारे मछुआरों के सुंदर से गांव में एक नौका खड़ी है...

एक सैलानी वहां पहुंचता है और मछुआरों की मछली की क्वालिटी की बड़ी तारीफ़ करता है...



सैलानी पूछता है...इन मछलियों को पकड़ने में तुम कितना वक्त लगाते हो...

एक-स्वर में जवाब मिलता है...ज़्यादा नहीं...

तुम समुद्र में ज़्यादा वक्त क्यों नहीं लगाते जिससे ज़्यादा मछलियां पकड़ी जा सकें...

मछुआरों से जवाब मिलता है...हम जितनी भी मछलियां पकड़ते हैं, वो हमारी ज़रूरत पूरी करने के लिए काफ़ी होती हैं..

लेकिन तुम अपने खाली वक्त में क्या करते हो...

हम देर से उठते हैं...अपने बच्चों के साथ खेलते हैं...पत्नियों के साथ बढ़िया खाना बना कर खाते हैं, शाम को हम दोस्त-यार मिलते हैं...साथ जाम टकराते हैं...गिटार बजाते हैं...गाने गाते हैं...मौज उड़ाते हैं..फिर थक कर सो जाते हैं...या यूं कहें ज़िंदगी का पूरा आनंद लेते हैं...

मैं हावर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए हूं...मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं...मेरी सलाह है कि तुम मछलियां पकड़ने में ज़्यादा वक्त लगाया करो...और जितनी ज़्यादा मछलियां पकड़ोगे, उन्हे बेचकर ज़्यादा पैसे कमा सकते हो...फिर उसी पैसे को बचाकर  बड़ी नौका खरीद सकते हो...

फिर उसके बाद...

बड़ी नौका पर काम बढ़ेगा तो तुम दूसरी, तीसरी नौकाएं खरीद सकते हो...फिर तुम्हारा नौकाओं का पूरा बेड़ा हो जाएगा...अब तुम बिचौलियों को मछली देने की जगह सीधे प्रोसेसिंग प्लांट से डीलिंग कर सकोगे...फिर शायद अपना ही प्लांट लगा लो...तुम इस छोटे से गांव को छोड़ किसी महानगर में जाकर बस सकते हो...वहां से तुम अपना खुद का कारपोरेट हाउस बना सकते हो...

ये सब कितना टाइम लेगा...

शायद बीस से पच्चीस साल...

उसके बाद क्या होगा...

उसके बाद...सैलानी हंसते हुए बोला...जब तुम्हारी कंपनी काफ़ी बड़ी हो जाएगी तो फिर तुम शेयर खरीदने-बेचने में पैसा लगाकर बेशुमार  कमा सकते हो...करोड़ों में खेल सकते हो...

करोड़ों में...सच...फिर उसके बाद

फिर तुम चैन से रिटायर हो सकते हो...समुंद्र किनारे किसी छोटे से सुंदर गांव में बसेरा बना सकते हो...सुबह आराम से उठो...थोड़ी मछलियां पकड़ो...बच्चों के साथ खेलो...पत्नी के साथ मनपसंद खाना बनाकर खाओ...शाम को दोस्तों के साथ रिलैक्स करो...ड्रिंक लो...कहीं कोई काम की टेंशन नहीं...

सलाह के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया श्रीमान...लेकिन जो आपने सबसे आखिर में बताया...वही ज़िंदगी तो हम अब भी जी रहे हैं...फिर पच्चीस साल बेकार करने का मतलब...


मॉरल ऑफ द स्टोरी

इसे ठीक तरह जानिए कि आप ज़िंदगी में कहां जा रहे हैं...

आप जहां जाकर रुकना चाहते हैं, देखिए शायद आप वहां पहले से ही खड़े हों...




इस पोस्ट को पढ़ने के बाद ये गीत ज़रूर सुनिए...



स्लॉग गीत

वहां कौन है तेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहां,


दम ले ले घड़ी भर, ये आराम पाएगा कहां...



गाइड, 1965

बुधवार, 17 मार्च 2010

अजब गजब रिश्ते...खुशदीप

एक अमेरिकी और एक भारतीय बार में बैठे ड्रिंक पर ड्रिंक चढ़ा रहे थे...

भारतीय अपना ग़म गलत करने के लिए अमेरिकी से बोला...जानते हो, मेरे घर वाले भारत में मेरी शादी गांव की एक लड़की से कराना चाहते हैं...अरेंज्ड मैरिज...कहते हैं कि हमारा रिश्ता बचपन में ही तय हो गया था...लेकिन मैं अपनी होश में जिस लड़की से कभी मिला नहीं...उसके स्वभाव को नहीं जानता...उससे आंख बंद कर कैसे शादी कर लूं...मैंने घरवालों से साफ़ मना कर दिया कि जिस लड़की से मैं प्यार नहीं करता, उससे किसी सूरत में भी शादी नहीं कर सकता...मैंने जब से दो-टूक मना किया है तभी से मेरे घर वाले मुझसे सख्त नाराज़ है...परिवार में समस्या हैं...

ये सुनकर अमेरिकी ने एक पैग और चढ़ाया और कुटिल मुस्कान के साथ बोला...बस इतनी सी बात...अब सुनना चाहते हो मेरी हालत...तो दिमाग की हर ख़िड़की अच्छी तरह खोल कर सुनो... तुम अरेंज्ड मैरिज के ख्याल से दुखी हो...कह रहे हो तुम्हारे परिवार में समस्या हैं...अब लव मैरिज का मेरा किस्सा सुनो...

मैंने एक विधवा से शादी की...मैं उससे बेहद प्यार करता था और हमारी डेटिंग तीन साल तक चली थी...शादी के कुछ साल बाद मेरे पिता का मेरी सौतेली बेटी से प्यार हो गया और दोनों ने शादी कर ली...इस तरह मेरे पिता मेरे दामाद बन गए और मैं अपने पिता का ससुर बन गया...


क़ानूनन मेरी सौतेली बेटी अब मेरी मां है और मेरी पत्नी मेरी नानी...


अभी से सिर चकराने लगा...एक पैग और लो और आगे सुनो...दिक्कत तब और बढ़ी जब मेरा बेटा हुआ...अब मेरा बेटा मेरे पिता का साला है और मेरा मामा...


अभी बस कहां, और सुनो...रही सही कसर तब पूरी हो गई जब मेरे पिता का बेटा हुआ...यानि मेरा भाई जो कि रिश्ते में मेरा नाती भी लगा...और तुम कह रहे हो तुम्हारे परिवार में दिक्कत आ गईं हैं...

अभी आखिरी हथौड़ा आना बाकी है....इस अमेरिकी के परिवार में और क्या-क्या रिश्ते एक दूसरे के साथ या अपने के खुद अपने के साथ हो सकते हैं...मेरे दिमाग ने तो काम करना बंद कर दिया है...आप सोच सकते हैं तो सोचिए और जवाब दीजिए...



स्लॉग ओवर

मक्खन प्लेन में जा रहा था...कि अचानक उसकी नज़र किसी पर पड़ी और सीट पर खड़ा होकर चिल्ला कर बोला...

'HIJACK'...


इससे पहले कि सारे यात्री सदमे में आते...


दो लाइन छोड़ कर एक आदमी उठा और मक्खन जितनी गर्मजोशी से बोला...


'HIMACK'...

दरअसल वो मक्खन का बरसों पहले बचपन में बिछड़ा दोस्त जयकिशन था...



और मक्खन उसे  'JACK' कह कर बुलाता था और जयकिशन मक्खन को 'MACK'....

मंगलवार, 16 मार्च 2010

ज़िंदगी है क्या, बोलो ज़िंदगी है क्या...खुशदीप


ज़िंदगी है क्या...


     

आप भी बताइए, आपकी नज़र में ज़िंदगी है क्या...



स्लॉग गीत

ज़िंदगी है क्या, बोलो ज़िंदगी है क्या...


फिल्म....सत्यकाम (1969)

सिर्फ गीत सुनना है तो इस लिंक पर सुनिए




स्लॉग ओवर

मक्खन की नज़र में ज़िंदगी है क्या...


मक्खन के पिता की मौत हो गई....मक्खन ज़ोर ज़ोर से रो रहा था...

तभी मक्खन का फोन आया...मक्खन ने सुना तो और दहाड़े मार कर रोने लगा...


ढक्कन ने पूछा...भाई मक्खन क्या हुआ, किसका फोन था...


मक्खन...मेरी बहन का फोन था, उसके भी पिता की मौत हो गई है...







रविवार, 14 मार्च 2010

अगर जल्दी में हैं तो इसे न पढ़ें...खुशदीप

बर्थ-सर्टिफिकेट सबूत है हमारे जन्म का...


डेथ-सर्टिफिकेट सबूत है हमारी मौत का...


फोटो सबूत हैं हमारे ज़िंदा रहने का...







अब आप एक ठंडी सांस लीजिए...और पूरे सकून के साथ इसे धीरे-धीरे पढ़िए...



मैं मानता हूं...

कि दो लोग आपस में तर्क करते हैं, इसका ये मतलब नहीं कि वो आपस में प्यार नहीं करते...

और सिर्फ़, इसलिए कि वो तर्क नहीं करते, ये मतलब नहीं हो जाता कि वो आपस में प्यार नहीं करते...




मैं मानता हूं...

कि कभी मुझे गुस्सा आता है तो मुझे हक़ है गुस्सा करने का, लेकिन ये मुझे क्रूर होने का हक़ नहीं देता..




मैं मानता हूं...

कि हमें दोस्त बदलने की आवश्यकता नहीं, अगर हमें लगता है कि दोस्त बदल गए हैं...



मैं मानता हूं...

कि कोई आपका कितना भी अच्छा दोस्त क्यों न हो, लेकिन कभी न कभी उसकी कोई बात आपको ज़रूर आहत करेगी और आपको उसे इसके लिए अवश्य माफ़ कर देना चाहिए...






मैं मानता हूं...

कि तुम एक झटके में ऐसा कुछ कर सकते हो जो तुम्हारे दिल को ज़िंदगी भर दर्द देता रहेगा....





मैं मानता हूं...

कि मैं वैसा बनने के लिए लंबा वक्त ले रहा हूं, जैसा कि मैं दिल से बनना चाहता हूं...



मैं मानता हूं...

कि जिन्हें तुम चाहते हो, उनसे हमेशा प्यार भरे शब्दों से ही विदा लो...हो सकता है कि तुम आखिरी बार उन्हें देख रहे हो...



मैं मानता हूं...

कि आप बहुत आगे तक जा सकते हैं, ये समझने के बाद भी कि अब और नहीं चला जा सकता...



मैं मानता हू..

कि जो भी हम करते हैं, उसके लिए हम ही ज़िम्मेदार है...ये मायने नहीं रखता कि हम अपने को गलत समझते हैं या सही...



मैं मानता हूं...

कि हमें अपने व्यवहार को काबू में रखना चाहिए, नहीं तो वो आप पर काबू कर लेगा...



मैं मानता हूं...

कि हीरो वो होते हैं जो नतीजे की परवाह किए बिना वही करते हैं, जो कि होना चाहिए...और जब ऐसा किए जाने की सबसे ज़्यादा आवश्यकता है...



मैं मानता हूं...

धन गिनती गिनने का संक्रमित तरीका है...




मैं मानता हूं...

कि कभी आप कठिनाई में हो और महसूस कर रहे हों कि जिनसे तुम्हे ठोकर मिलने की सबसे ज्यादा उम्मीद हो, वही तुम्हारी मदद के लिए सबसे आगे खड़े होते हैं...



मैं मानता हूं...

कि परिपक्वता इस बात से तय नहीं होती कि आप जीवन में कितने बसंत देख चुके हो, ये निर्भर करती है कि आपको जीवन में क्या-क्या अनुभव हुए और उनसे आपने क्या सीखा...




मैं मानता हूं...

कि हमेशा ये काफ़ी नहीं होता कि दूसरे आपको माफ़ कर दें, कभी-कभी आपको खुद को माफ़ करना भी सीखना चाहिए...




मैं मानता हूं...

कि तुम्हारा दिल कितनी भी बुरी तरह से क्यों न टूटा हो, लेकिन दुनिया आपके दुख के लिए रुकेगी नहीं...



मैं मानता हूं..

कि हमारे परिवेश और परिस्थितियों ने इस बात को प्रभावित किया कि हम जीवन में क्या बने...लेकिन हम जो बने, उसके लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ हम ही ज़िम्मेदार हैं...



मैं मानता हूं...

कि किसी सीक्रेट को जानने के लिए आपको ज़्यादा व्याकुलता नहीं दिखानी चाहिए...हो सकता है कि सीक्रेट को जानने के बाद आपका जीवन ही हमेशा के लिए बदल जाए...



मैं मानता हूं...

दो लोग बिल्कुल एक जैसी चीज़ को ही देखते हैं, लेकिन उनका देखने का नज़रिया बिल्कुल अलग हो सकता है...



मैं मानता हूं..

कि आपका जीने का तरीका कुछ ही घंटों में उन लोगों की वजह से बिल्कुल बदल सकता है, जो आपको बिल्कुल नहीं जानते...




मैं मानता हूं...

कि आपके सम्मान में दीवार पर कितने भी प्रमाण-पत्र क्यों न टंगे हो, ये साबित नहीं करता कि आप अच्छे इनसान भी हो...




मैं मानता हूं...

कि जिन लोगों की आप ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा फ़िक्र करते हैं, वही आपसे जल्दी ही दूर कर दिए जाते हैं...



मैं मानता हूं...

कि ज़रूरी नहीं कि सबसे ज़्यादा खुश वहीं लोग हो जिनके पास ज़िंदगी का सब कुछ बढ़िया उपलब्ध हो, सबसे ज़्यादा खुश वो हैं जो जैसा भी मिले उसी में से ही बढ़िया निकाल लेते हैं...



ईश्वर आपका शुक्रिया, उन सभी अच्छे लोगों के लिए जिन्होंने जीवन-यात्रा में हमारी मदद की...






ईश्वर आपका भला करे...



(ई-मेल से अनुवाद)

शनिवार, 13 मार्च 2010

मक्खन की मदद कीजिए, मिस मल्लू की इंग्लिश सुनिए...खुशदीप

मक्खन बेचारा पूरी ज़िंदगी एक सवाल का जवाब सोचते-सोचते मर गया लेकिन उसकी मुश्किल दूर नहीं हुई...इससे पहले कि आप स्लॉग ओवर में मक्खन की मदद करें, पहले बात क्लास टीचर मिस मल्लू की...मिस मल्लू की एक्सीलेंट इंग्लिश की...

मिस मल्लू को पब्लिक स्कूल में नौकरी मिल गई...बच्चों को पढ़ाने में उनका जवाब नहीं...बच्चों पर हर वक्त इंग्लिश में बोलने पर ही ज़ोर...अगर कोई बच्चा हिंदी में बोलता मिलता तो फौरन फाइन...अब मिस मल्लू के क्लास में इस्तेमाल किए जाने वाले इन दस गोल्डन वाक्यों को भी देख लीजिए....



1. डोन्ट टॉक इन फ्रंट ऑफ माई बैक...






2. बोथ ऑफ यू थ्री गेट आउट ऑफ द क्लास...






3. व्हाय आर यू सो लेट, से यस ओर नो...






4. टेक फाइव सेंटेमीटर वायर ऑफ एनी लेंथ...






5. बी क्वाइट, जस्ट नाओ प्रिंसिपल पास्ड अवे...






6. आई हैव टू डाटर्स, बोथ ऑफ दैम आर गर्ल्स...






7. व्हाय आर यू लुकिंग एट द मंकी आउटसाइड, व्हैन आय एम स्टैंडिग हेयर...






8. आल ऑफ यू स्टैंड इन ए स्ट्रेट सर्किल...






9. विद रेफरेंस टू द अबव, प्लीज़ रेफ़र टू माय बिलो...






10. कवरिंग नोट : आय एम एन्क्लोस्ड हेयरविद...







स्लॉग ओवर

मक्खन पूरी ज़िंदगी सोचता रहा, सोचता रहा...

....

सोचता रहा...

....

सोचता रहा...

....

सोचता रहा...

....



....


और सोचते सोचते मर गया, कि अगर मेरी बहन के दो भाई हैं तो मेरे क्यों नहीं...

फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था...खुशदीप

ये नज़्म है, ग़ज़ल है...क्या है मैं नहीं जानता...किसने लिखी है, उसे भी मैं नहीं जानता...ई-मेल पर भेजने वाले ने शायर का नाम नहीं लिखा..आपको पता हो तो बताइएगा...लेकिन जिसने भी लिखी है, उसके हाथ चूमने को जी करता है...





तेरी डोली उठी


मेरी मय्यत उठी




फूल तुझ पर भी बरसे


फूल मुझ पर भी बरसे




फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था


तू सज गई


मुझे सजाया गया






तू भी नए घर को चली


मैं भी नए घर को चला






फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था


तू उठ के गई


मुझे उठाया गया






महफ़िल वहां भी थी,


लोग यहां भी थे






फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था


उनका हंसना वहां


इनका रोना यहां






काज़ी उधर भी था, मौलवी इधर भी था


दो बोल तेरे पढ़े, दो बोल मेरे पढ़े


तेरा निकाह पढ़ा, मेरा जनाज़ा पढ़ा






फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था


तुझे अपनाया गया


मुझे दफ़नाया गया




स्लॉग गीत

ये गीत जब भी मैं सुनता हूं, न जाने मुझे क्या हो जाता है...आप भी सुनिए...


जब भी ये दिल उदास होता है


जाने कौन आस-पास होता है...

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

एक सवाल का जवाब दीजिए...खुशदीप

वाकई माहौल बड़ा गरम है...कुछ भी कहना ख़तरे से खाली नहीं है...कौन बुरा मान जाए...कौन लाठी बल्लम निकाल ले...कुछ पता नहीं ...जो नारी ममता की बरसात करती है...प्रेम और वात्सल्य का पर्याय मानी जाती है...पुरुषों के सब मुद्दों को सुलझाने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर साथ चलती है...लेकिन ब्लॉगवुड में उसी नारी को मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है...आप से बस एक सवाल के जवाब की उम्मीद करता हूं...

मेरा सवाल

सतयुग हो या कलयुग अग्निपरीक्षा हमेशा सीता को ही क्यों देनी पड़ती है ?



स्लॉग स्टोरी

एक और किस्सा आपको सुनाने का मन कर रहा है...शायद ब्लॉग पर ही कहीं पढ़ा है...याद नहीं आ रहा कहां...अगर इसे पढ़ने के बाद आपको याद आ जाए तो मुझे बता ज़रूर दीजिएगा...अफगानिस्तान में तालिबान की वहशी हुकूमत में महिलाओं को घरों में कैद करके रख दिया गया था...स्कूल जाना बंद...खेलों में हिस्सा लेना बंद, शरीर को पूरी तरह ढक कर रखना, मनोरंजन के सभी साधनों से दूर रहना...बहुत ज़रूरी हो तो घर के किसी पुरुष के साथ ही बाहर निकलने की इजाज़त...और भी न जाने क्या-क्या...



तालिबान का शासन अमेरिका ने खत्म करा दिया...फिर देखा गया कि पुरुषों के हमेशा पीछे चलने वाली महिलाएं अब पुरुषों के आगे चल रही थीं...सबने सोचा अफगानिस्तान बदल गया...अब इसकी हक़ीकत भी जान लीजिए...जगह जगह बिछी बारूदी सुरंगों का पता लगाने के लिए पुरुषों के पास और कोई ज़रिया नहीं था, इसीलिए महिलाओं को आगे रखा जा रहा था...

मतलब ये कि दौर कोई भी हो सोच नहीं बदलेगी...


स्लॉग गीत

चलिए छोड़िए ये सब टंटे, महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में पास हो गया है, पहली बाधा तो दूर हुई, बेशक अभी और भी बहुत रुकावटें बाकी है...लेकिन अभी तो सेलिब्रेट करने का वक्त है...मेरी तरफ से पूरी मातृशक्ति के लिए ये गीत...

कांटों से खींच के ये आंचल

गुरुवार, 11 मार्च 2010

आपकी मुस्कान का सम्मान...खुशदीप

आज की ये पोस्ट इरफ़ान भाई को समर्पित है...देश के अग्रणी कार्टूनिस्ट इरफ़ान को हिंदी अकादमी ने वर्ष 2008-09 के लिए काका हाथरसी सम्मान देने की घोषणा की है...43 साल के इरफ़ान भाई का सम्मान पूरे ब्लॉगवुड का सम्मान है...अपने ब्लाग इतनी सी बात से इरफ़ान भाई रोज़ हमें गुदगुदाते रहते हैं...इरफ़ान भाई को हंसी के बादशाह काका हाथरसी के नाम से जु़ड़ा सम्मान मिला है, ये अपने आप में ही बड़े गौरव की बात है..





इरफ़ान भाई के लिए यही कहने को मन करता है...

इबादत नहीं है माला घुमा देना


इबादत है किसी रोते को हंसा देना...



इरफ़ान भाई


वैसे तो इरफ़ान भाई किसी परिचय के मोहताज नहीं है लेकिन कार्टून का जब भी ज़िक्र आता है तो इरफ़ान का नाम खुद-ब-खुद ज़ुबान पर आ जाता है...नवभारत टाइम्स, इकोनॉमिक टाइम्स, फाइनेंशियल एक्सप्रेस, एशिएन ऐज के स्टाफ कार्टूनिस्ट रह चुके इरफ़ान  दुनिया की प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन के लिए अपनी सेवाएं दे चुके हैं...टाइम के चीफ कार्टूनिस्ट रैनन आर ल्यूरी अपने कार्टून न्यूज़ में प्रकाशित इरफ़ान के कार्टून की दिल खोल कर तारीफ कर चुके हैं..फार इस्टर्न इकोनॉमिक रिव्यू ऑफ हांगकांग में प्रकाशित होने के साथ इरफ़ान एशिया के श्रेष्ठ कार्टूनिस्ट के तौर पर जापान फाउंडेशन के न्योते पर 2005 में टोक्यो का दौरा कर चुके हैं...2007 में भारत के चीफ जस्टिस का कार्टून बनाने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने इरफ़ान को चार महीने की सज़ा सुनाई थी...फिलहाल जनसत्ता में दरअसल के नाम से और नागपुर के लोकमत समाचार में दैनिक कार्टून छप रहे हैं...

हिंदी अकादमी पुरस्कार 23 मार्च को दिल्ली के श्रीराम सेंटर सभागार में समारोह में दिए जाएंगे..बांग्ला की प्रसिद्ध साहित्यकार महाश्वेता देवी ये पुरस्कार देंगी...हिंदी अकादमी का सर्वोच्च पुरस्कार शलाका सम्मान वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को दिया जाएगा...


अकादमी के कुछ अन्य पुरस्कार विजेता...


विशिष्ट योगदान सम्मान...मुज़ीब रिज़वी

काव्य सम्मान...कन्हैया लाल नंदन

गद्य विद्या सम्मान...सुधीश पचौरी

नाटक सम्मान...असगर वज़ाहत

बाल साहित्य सम्मान...रेखा जैन

ज्ञान प्रौद्योगिकी सम्मान...बालेंदु दाधीच



साहित्यकार सम्मान पाने वाले ग्यारह विशिष्टजन...

पुरुषोत्तम अग्रवाल


कृष्ण कुमार


गगन गिल


पंकज सिंह


द्रोणवीर कोहली


पंकज सिंह


अब्दुल बिस्मिल्लाह


लीलाधर मंडलोई


बनवारी (पत्रकारिता)


इंद्रनाथ चौधुरी


रामेश्वर प्रेम


सुरेश सलिल

बुधवार, 10 मार्च 2010

भारत में बस भारतीय ही नहीं...खुशदीप

एक अमेरिकी नागरिक भारत घूमने आया और फिर वापस अपने देश गया...वहां वो अपने एक भारतीय दोस्त से मिला...दोस्त ने बड़ी उत्सुकता के साथ पूछा कि अमेरिकी को भारत कैसा लगा...

अमेरिकी ने जवाब दिया...भारत एक महान देश है...इसका स्वर्णिम प्राचीन इतिहास है...प्राकृतिक संसाधनों की वहां भरमार है...

दोस्त ने फिर पूछा...और तुम्हे भारतीय कैसे लगे...


भारतीय....??? कौन भारतीय...??? मैं भारत में एक भी भारतीय से नहीं मिला...

भारतीय दोस्त बोला...क्या बेहूदगी है...भारत में तुम और किससे मिले...

अमेरिकी ने जवाब दिया... कश्मीर में मैं कश्मीरी से मिला...

पंजाब में एक पंजाबी से मिला...इसी तरह बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान, बंगाल, तमिलनाडु, केरल में बिहारी, मराठी, मारवाड़ी, बंगाली, तमिल, मलयाली से मिला...

फिर मैं एक मुस्लिम, एक हिंदू, एक सिख, एक ईसाई, एक जैन, एक बौद्ध से मिला...

और भी कई से मिला...लेकिन एक भी भारतीय से नहीं मिला...

वो दिन दूर नहीं जब हम फिर से रियासतों का समूह हो जाएंगे, राज्यों को राष्ट्र से भी ऊपर माना जाने लगा...प्रांतवाद और इलाकाई प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाले राष्ट्र विरोधी नेता चाहते भी ऐसा ही हैं...

ऐसी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दीजिए...

हमेशा कहिए...जय हिंद....


मेरा कोई नाम नहीं है...मेरी बस एक पहचान है...मैं भारतीय हूं...





स्लॉग ओवर


मक्खन और ढक्कन को रास्ते में दो बम मिले...

मक्खन...चल पुलिस को दे आते हैं...

ढक्कन...अगर कोई बम रास्ते में ही फट गया तो...

मक्खन...झूठ बोल देंगे...एक ही मिला था...

मंगलवार, 9 मार्च 2010

सृजन का संतुलन...खुशदीप

ऊपर वाला ब्रह्मांड को बनाने की प्रक्रिया में था...साथ ही अपने मातहतों को सृष्टि का सार बताता भी जा रहा था...देखो, सृजन के लिए सबसे ज़रूरी है, संतुलन...

मसलन हर दस हिरण के पीछे एक शेर होना चाहिए...

इसी तरह मेरे देवदूतों, दुनिया में  अमेरिका नाम का देश है...मैंने उसे समृद्धि और धनधान्य दिया है तो साथ ही इनसिक्योरिटी और तनाव भी दिया है...

यहां अफ्रीका है...ये कुदरत के नज़ारों से मालामाल है लेकिन मौसम की सबसे बुरी मार भी यहीं देखने को मिलती है...

इसी तरह साउथ अमेरिका है, मैंने उन्हें बहुत सारे जंगल दिए हैं, लेकिन साथ ही बहुत कम ज़मीन दी है...जिससे उन्हें जंगल काटने का मौका मिलता रहे...


तो तुमने देखा हर चीज़ संतुलन में है...

तभी एक देवदूत ने पूछा कि पृथ्वी पर ये सुंदर सा कौन देश नज़र आता है...

ऊपर वाला...आहा...ये तो दुनिया का ताज है...भारत...मेरी सबसे अनमोल रचना..

यहां समझदारी से काम लेने वाले और मित्रवत व्यवहार करने वाले लोग हैं...


यहां कल-कल बहते झरने, नदियां और मनोरम पहाड़ हैं..


संस्कृति है जो महान परंपराओं की पहचान है...




तकनीकी तौर पर कुशाग्र और सोने के दिल वाला है ये देश...


ये सब कहने के बाद ऊपर वाला ख़ामोश हो गया...

तब तक सवाल पूछने वाला देवदूत हैरान-परेशान हो गया...आखिर पूछ ही बैठा...आपने तो कहा था कि हर चीज़ संतुलन में है...फिर भारत...

ऊपर वाले ने शांत भाव से जवाब दिया...

प़ड़ोसियों को देखो, जो मैंने भारत को दिए हैं...

सोमवार, 8 मार्च 2010

क्या हम बीमार हैं...खुशदीप

जी हां, ठीक पढ़ा आपने...क्या हम सब बीमार हैं...आप कहेंगे कि भईया तुम अपनी निबेड़ो, हम भले-चंगों को साथ क्यों लपेटते हो...लेकिन मेरी इल्तज़ा ये है कि पहले इस पिक्चर पोस्ट को गौर से पढ़ लीजिए...क्या हम वाकई स्वस्थ हैं...

मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के क्लिनिक में रूटीन चेक-अप के लिए पहुंचा...रिपोर्ट के बाद पक्का हो गया कि मैं बीमार था...




जब ऊपरवाले ने मेरा ब्लड प्रेशर चैक किया तो मेरे अंदर संवेदना बहुत कम थी...





जब मेरा टेम्प्रेचर लिया गया तो थर्मामीटर पर 40 डिग्री के साथ अवसाद नोट किया गया...





मेरा ईसीजी लिया गया तो पता चला कि मुझे 'प्यार के कई बाइपास' की जरूरत हैं क्योंकि मेरी नाड़ियां अकेलेपन से ब्लॉक थी और खाली दिल तक नहीं पहुंच सकती थीं...



मैं हड्डी और जोड़ एक्सपर्ट के पास गया क्योंकि मैं अपने भाई से कंधे से कंधा मिला कर नहीं चल सकता था...क्योंकि मैं दोस्तों को गले नहीं लगा सकता था...मुझे ईर्ष्या का फ्रैक्चर जो हुआ था...





जब मेरी आंखों का टेस्ट हुआ तो मुझे दूर का कम दिखाई देता था...क्योंकि मैं अपने भाई और बहनों की खामियों के सिवा कुछ देख ही नहीं सकता था...





जब मैंने कम सुनने की शिकायत की तो डायग्नोस में पाया गया कि मैंने दिन प्रतिदिन के आधार पर खुद तक आने वाली ईश्वर की आवाज़ सुनना बंद कर दिया है....




इस सबके लिए ईश्वर ने मुझे मुफ्त परामर्श दिया...मैं जब क्लिनिक से निकला तो ऊपर वाले की दया से ठान चुका था कि जो भी सत्य के शब्दों के साथ प्राकृतिक उपचार मुझे सुझाया गया है, उस पर पूरा पूरा अमल करूंगा..





हर सुबह  कृतज्ञता का एक गिलास लूंगा...





जब काम पर जाऊंगा तो शांति का एक चम्मच लूंगा...




हर घंटे एक कैप्सूल संयम, एक कप भाईचारा और एक गिलास विनम्रता का लूंगा...



घर लौटने पर एक खुराक प्रेम की लूंगा...





बिस्तर पर जाते वक्त दो गोली विवेक की लूंगा...




दिन भर दुख और हताशा के साथ जो सामना हुआ, उसके आगे हार नहीं मानूंगा

ऊपर वाला जानता है, तुम कैसा महसूस करते हो...

ऊपर वाला पूरी सटीकता के साथ जानता है कि तुम्हारी ज़िंदगी के साथ क्या किया जाना है...



तुम्हारे लिेए ईश्वर का उद्देश्य बिल्कुल साफ और फिट बैठने वाला है

वो तुम्हे वो सब दिखाना चाहता है जो तुम सिर्फ जीने से ही समझ सकते हो, तुम किस अंदाज़ से और कहां रह कर जी रहे हो...


रविवार, 7 मार्च 2010

पालने में ब्रह्मा, विष्णु, महेश...खुशदीप

संसद में महिला रिज़र्वेशन बिल पर सोमवार से जो तूफ़ान आएगा सो आएगा...लेकिन ब्लॉगवुड में नारी विमर्श पर युद्ध चरम पर पहुंच गया लगता है...संसद में लालू यादव, मुलायम यादव और शरद यादव महिला रिज़र्वेशन बिल को फेल कराने के लिए पूरी ताकत लगा देंगे...उनका कहना है कि एक तिहाई रिजर्वेशन दिया गया तो सब पढी लिखी आधुनिक अगड़े समाज की महिलाएं ही उन सीटों पर कब्ज़ा कर लेंगी...जबकि ओबीसी की महिलाओं में पढ़ाई लिखाई का स्तर कम होने की वजह से उन्हें कोई लाभ नहीं मिलेगा....इसलिए वो कोटे में भी कोटा पहले सुनिश्चित करना चाहते हैं...

ये तो खैर संसद की बात है...लेकिन ब्लॉगवुड में जो हो रहा है वो बहुत ही दुखद है...मेरा ये मानना है कि नारी विमर्श पर ये बहस ही बेमानी है...जब दो हाथ बराबर हैं तो फिर ये किसी को जताने की ज़रूरत ही क्यों होती है कि पुरुष और नारी बराबर है...मैंने एक बार गांधी जी के धर्म के बारे में विचार पड़े थे...गांधी जी के अनुसार अगर ये कहा जाता है कि हिंदू धर्म सहिष्णु है, तो यहां भी कहीं न कहीं अपने को श्रेष्ठ साबित करने की ग्रंथि ही काम कर रही होती है...इसलिए अगर कोई कहता है कि महिलाओं को वो सभी अधिकार मिलने चाहिए जो पुरुषों को हासिल हैं...मेरी समझ में यहां भी कहीं न कहीं पुरुष की अपने को श्रेष्ठतर बताने की मंशा ही काम कर रही होती है...

एक सवाल और नारी का पहनावा क्या हो, इसको लेकर भी आए-दिन सवाल उठाए जाते रहते हैं...मानो सारी संस्कृति का ठेका हमने ही ले रखा है...राखी सावंत, बिपाशा बसु या मल्लिका शेरावत अगर रिवीलिंग कपड़े पहनती हैं तो संस्कृति के ठेकेदार शालीनता का सवाल उठा कर आसमान सिर पर उठा लेते हैं...लेकिन अगर सलमान खान शर्ट उतारते हैं या रणबीर नंगे बदन टॉवल भी खोल देता है, फिर कहीं संस्कृति को आंच नहीं आती, फिर कहीं कोई सवाल नहीं उठते, ये दोहरे मानदंड क्यों...किसी ने सच ही कहा है कि ये देखने वाले की आंखों पर होता है कि वो किस निगाह, किस मानसिकता से किसी को देखता है...

इसी सिलसिले में सती अनुसुईया की कहानी का जिक्र करना चाहता हूं...एक बार किसी सद्पुरुष का प्रवचन सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था...वहीं सुनी थी ये कथा...पता नहीं कितनी याद रही है...अगर कुछ गलत हो तो जिन्हें ठीक से पता हो, सुधार दीजिएगा...

अत्री महाराज के लिए सती अनुसुईया का पत्नी धर्म कितना महान था कि नारद जी ने उसकी कीर्ति देवलोक में भी पहुंचा दी...सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती के लिए ये सुनना बड़ा कष्टप्रद था...हठ कर उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को अनुसुईया का इम्तिहान लेने भेज दिया...तीनों साधु का वेश बनाकर अनुसुईया के द्वार पहुंच गए...अतिथि और साधु का सत्कार धर्म जानकर अनुसुईया ने तीनों से भोजन का आग्रह किया...लेकिन तीनों तो इम्तिहान लेने की ठाने थे...तीनों ने कहा कि भोजन हम इसी शर्त पर करेंगे, अगर तुम नग्न होकर हमें भोजन कराओगी...वाकई सती अनुसुईया के लिए ये धर्मसंकट वाली स्थिति थी...साधुओं को भोजन नहीं कराती तो अतिथि धर्म का पालन नहीं होगा...लेकिन जो शर्त है वो पतिव्रता स्त्री के लिए पूरी करना किसी स्थिति में संभव नहीं...फिर पूरे मनोयोग से सती अनुसुईया ने इस धर्मसंकट से निकलने के लिए प्रार्थना की...इस प्रार्थना ने ही सती अनुसुईया को वो शक्ति दी कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश को छह-छह माह के बालक बना दिया...तीनों को पालने में लिटा दिया...तीनों शिशु की तरह ही पैर पटकने लगे...अब मां  अगर शिशु को दूध पिलाती है तो सृष्टि चलती है...अब अपने नवजात शिशुओं से लज्जा का सवाल ही कहां...



सती अनुसुईया से पतियों को फिर देवस्वरूप में लौटाने के लिए आग्रह करतीं पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती...

पता नहीं मैंने क्यों यहां इस कहानी का ज़िक्र किया...लेकिन एक बार फिर यही कहना चाहूंगा, दूसरे पर उंगली से उठाने से पहले खुद को आइने में देख लेना चाहिए...

बाकिया दी गल्ला छडो, बस दिल साफ़ होना चाहिदा...

शनिवार, 6 मार्च 2010

ऑल टाइम बेस्ट एक्टर कौन....खुशदीप

आपका सबसे पसंदीदा अदाकार या अदाकारा कौन है...दिलीप कुमार या मधुबाला....शाहरुख ख़ान या काजोल...या फिर कोई और...आज मैं आपको बताने जा रहा हूं कि भारत के वो कौन-कौन से अदाकार-अदाकारा हैं जिन्हें एशिया के 25 ऑल टाइम ग्रेट की फेहरिस्त में जगह मिली है...इस फेहरिस्त को खास मौके के लिए तैयार किया है इंटरनेशनल न्यूज़ की दुनिया में सबसे बड़े नाम सीएनएन ने...7 मार्च को न्यूयॉर्क में ऑस्कर अवार्ड समारोह होना है...उससे पहले जारी की गई एशिया के बेहतरीन कलाकारों की सर्वकालिक सूची में पांच नगीने भारत के हैं...गुरुदत्त, प्राण, नर्गिस, मीना कुमारी और अमिताभ बच्चन...एशिया के किसी भी देश से ये सबसे ज़्यादा कलाकार हैं...इसके बाद चीन से तीन अदाकारों को सूची में शुमार किया गया है...पाकिस्तान से मोहम्मद अली और जेबा बख्तियार को जगह मिली है...दिलचस्प बात ये है कि मोहम्मद अली (क्लर्क) और जेबा बख्तियार (हिना) दोनों ही बॉलीवुड में भी काम कर चुके हैं...जापान, कंबोडिया, सिंगापुर, थाईलैंड मलयेशिया और कोरिया से भी कुछ अदाकारों के नाम इस फेहरिस्त में है...लेकिन यहां बात सिर्फ़ भारत के पांच अनमोल रत्नों की...



नर्गिस दत्त


असल नाम- फ़ातिमा रशीद


जन्म- 1 जून 1929


निधन- 3 मई 1981


करियर- 1942-1967





सीएनएन ने ऑल टाइम बेस्ट की फेहरिस्त में नर्गिस को शामिल करते हुए लिखा है कि उनकी जैसी अदाकारी की रेंज सिनेमा के इतिहास में कम ही मिलती है...उन्हें परदे पर देखना हमेशा हवा के ताज़ा झोंके की तरह लगता था...निर्माता-निर्देशक महबूब ख़ान ने जिस तरह नर्गिस को मदर इंडिया में राधा के किरदार में पेश किया, वो खुद ही इतिहास बन गया...मदर इंडिया न सिर्फ ऑस्कर के लिए नामिनेट हुई बल्कि इस फिल्म की तुलना विश्व सिनेमा में कालजयी फिल्म गॉन विद द विंड से की गई...ये नर्गिस की फिल्म में बेमिसाल अदाकारी ही थी कि 53 साल बाद भी मदर इंडिया को ऑस्कर समारोह से पहले याद किया जा रहा है....



मीना कुमारी


असल नाम- महज़बीन बानो


जन्म- 1 अगस्त 1932


निधन- 31 मार्च 1972


करियर- 1939-1972







मीना कुमारी...ट्रेजिडी क्वीन...इसी नाम के साथ मीना कुमारी को याद किया है सीएनएन ने...1962 में आई साहिब, बीवी और गुलाम में नशे में डूबी पत्नी के किरदार ने मीना कुमारी को एशिया के 25 ऑलटाइम बेस्ट कलाकारों की फेहरिस्त में शामिल करा दिया...सर्वे में खास तौर पर ज़िक्र किया गया है कि फिल्म में निभाया गया मीना कुमारी का किरदार असल ज़िंदगी में भी काफ़ी कुछ उनसे मेल खाता था...रिश्ते टूटने के दर्द को शराब में डूब कर भुलाने की कोशिश...मीना कुमारी ने जिस अहसास के साथ इस किरदार को जिया वो 48 साल बाद आज भी महसूस किया जा सकता है...मीना कुमारी बेशक अब इस दुनिया में नहीं है....



प्राण


असल नाम- प्राण कृष्ण सिकंद


जन्म- 12 फरवरी 1920


करियर- 1940-2003 (रिटायर्ड)







नाम के मुताबिक ही किरदार में जान डालने वाले प्राण ने छह दशक से भी लंबे करियर में तीन सौ से ज़्यादा फिल्मों में काम किया...2003 में खुद ही अभिनय को अलविदा कह देने वाले प्राण को सीएनएन ने ऐसा अदाकार बताया है जो विलेन बनता था तो आंखों से ही इतनी क्रूरता टपकाता था कि देखने वालों के दिल दहल जाते थे....लेकिन यही प्राण जब चरित्र अभिनेता बन कर मनोज कुमार की फिल्म में मलंग बाबा का रोल करते हैं तो दर्शक जार जार रो उठे...ये इत्तेफ़ाक ही है कि सीएनएन की फेहरिस्त में प्राण के साथ एक नाम अमिताभ बच्चन का भी है...अगर प्राण न होते तो अमिताभ बच्चन वो न होते जो आज हैं...दरअसल प्रकाश मेहरा को ज़जीर में इंस्पेक्टर विजय के किरदार के लिए एंग्री यंगमैन की तलाश थी...धर्मेंद्र, देवानंद, राजकुमार सभी इस रोल को ठुकरा चुके थे...तभी प्राण ने प्रकाश मेहरा से कहा...एक फिल्म लगी है बॉम्बे टू गोवा...उसमें अमिताभ का एक सीन देखकर आओ...उस सीन में शत्रुघ्न सिन्हा अमिताभ को मुक्का मारते हैं...अमिताभ मुक्का खाने के बाद च्युइंग गम खाते हुए ज़मीन से जिस तरह उठते हैं, प्राण को उसी सीन से पता चल गया था कि अमिताभ के अंदर कैसी आग है...प्रकाश मेहरा ने अमिताभ को साइन किया और इतिहास बन गया...ये खुद ही बताता है कि प्राण खुद ही अभिनय की खान ही नहीं रहे बल्कि अदाकारी के नगीने पहचानने वाले जौहरी भी रहे हैं...



अमिताभ बच्चन


असल नाम- अमिताभ हरिवंश श्रीवास्तव


जन्म- 11 अक्टूबर 1942


करियर- 1969 से जारी






फेहरिस्त में अमिताभ बच्चन ही इकलौता नाम है जो भारतीय सिनेमा के आकाश पर आज भी उसी शिद्दत के साथ चमक रहा है जैसा कि 1973 में जंज़ीर में इस्पेक्टर विजय के किरदार में बिजली की तरह कौंधा था....सत्तर के दशक का एंग्री यंगमैन अस्सी का दशक आते-आते वन मैन इंडस्ट्री बन चुका था...67 साल की उम्र में अमिताभ आज भी काम में वैसे ही व्यस्त हैं जैसे कि अपने उत्कर्ष पर हुआ करते थे...41 साल इंड्रस्ट्री में बिता देने के बाद भी अमिताभ का सुपरस्टार का दर्जा कायम है...और शायद यही है वो पहलू जो अमिताभ को और कलाकारों से अलग कर देता है...



गुरुदत्त


असल नाम- वसंत कुमार पादुकोण


जन्म- 9 जुलाई 1925


निधन- 10 अक्टूबर 1964


करियर- 1944-1964






गुरुदत्त...वो नाम जो भारतीय सिनेमा के गोल्डन युग की सबसे बड़ी पहचान है...सीएनएन ने गुरुदत्त की तुलना विश्व सिनेमा के शिखरों में से एक ओरसन वेल्स से की है...प्यासा (1957) में वजूद के लिए जद्दोजहद करते शायर के गुरुदत्त के किरदार को अल्टीमेट माना गया है...फेहरिस्त में प्यासा के साथ गुरुदत्त की एक और फिल्म कागज़ के फूल का भी जिक्र किया गया है...गुरुदत्त को इस दुनिया को अलविदा कहे बेशक 46  साल हो गए लेकिन विश्व में जहां कहीं भी भारतीय सिनेमा की बात आती है तो पहला नाम गुरुदत्त का ही जेहन में आता है...

आखिर में इस महान कलाकार को आइए प्यासा के उन्ही के एक गीत से याद करते हैं...


ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...