रविवार, 28 फ़रवरी 2010

समीर संतरीमंडल शपथ ग्रहण समारोह की तैयारी...खुशदीप

ब्रेकिंग न्यूज़...ब्रेकिंग न्यूज़़...मेरे पत्रकारिता करियर की सबसे बड़ी और सनसनीखेज़ रिपोर्ट...वो रिपोर्ट जिससे हिंदुस्तान की तस्वीर पलटने वाली है...कल दिल्ली में केंद्रीय कैबिनेट की बैठक हुई...बैठक में महंगाई और बजट में एक्साइज ड्यूटी बढ़ाए जाने से जनता की नाराजगी से निपटने पर खास तौर पर विचार हुआ...घंटों की मगज़मारी के बाद निष्कर्ष यही निकला कि जनता अब जाग चुकी है, इसे और उल्लू नहीं बनाया जा सकता....फिर किया तो किया क्या जाए...क्या विरोधी दलों को तश्तरी पर सजा कर सत्ता सौंप दी जाए या नये चुनाव का जोखिम लिया जाए...हर्गिज नहीं...फिर क्या...क्यों न इस बार देश में राष्ट्रीय सरकार के विकल्प को आजमाया जाए...एक बार ये भी कर के देख लिया जाए...लेकिन राष्ट्रीय सरकार का मुखिया किसे बनाया जाए...नेताओं से लोगों का भरोसा उठ चुका है इसलिए नेता की जगह किसी दूसरे को ही देश की बागडोर सौंपी जाए...जो हरदिलअज़ीज़ हो...बजट के लिए पैसे की भी कमी न आने दे...और जनता में हर किसी को खुश रख सके...

ये सब चल ही रहा था कि भूतल-परिवहन और राष्ट्रीय राजमार्ग विकास मंत्री कमलनाथ ने कहा कि मैं एक नाम सुझा सकता हूं...जो देश-विदेश में बहुत पॉपुलर है...अपनी बात (टिप्पणी) से ही किसी का भी जी खुश कर सकता है...उसे दुनिया भर में दौरों के लिए सरकारी विमान की भी ज़रूरत नहीं...उसके पास अपनी उड़नतश्तरी है जिस पर बैठकर वो शख्स सर्र से कहीं भी पहुंच सकता है...कमलनाथ ने उस शख्स का नाम लिया- समीर लाल समीर...ये सुनकर मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा...फौरन हॉटलाइन पर समीर जी से संपर्क किया गया...समीर जी ने सारी बात सुनी और फिर नम्रता से कहा कि अनूप शुक्ल मेरे से वरिष्ठ हैं, पहले उन्हें ये ऑफर की जाए...दिल्ली से अनूप जी के तार जोड़े गए...अनूप जी ने प्रस्ताव सुनकर कहा कि वो लोकनायक जयप्रकाश नारायण की परंपरा वाले हैं, इसलिए खुद सत्ता संभालने में नहीं बल्कि खुद के किंगमेकर रहने में विश्वास रखते हैं...इसलिए समीर जी को ही ये ज़िम्मेदारी सौंपी जाए...अनूप जी से ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद समीर जी तैयार हो गए...लेकिन उन्होंने एक शर्त और रख दी...समीर जी ने कहा कि वो मंत्री जैसे किसी पद में विश्वास नहीं रखते...समाजवाद को मानते हैं...इसलिए जहां जहां भी मंत्री शब्द इस्तेमाल होता है उसे बदल कर संतरी कर दिया जाए....जैसे समीर जी ने खुद अपने पद के लिए प्रधानसंतरी शब्द सुझाया...

मरती क्या न करती...सरकार ने समीर जी की सारी बात मान ली...ये सब चल ही रहा था कि रचना जी को गुप्तचर सूत्रों से पता चल गया कि नारी की जगह पुरुष को प्रधानसंतरी बनाया जा रहा है...और उन्हें सिर्फ महिला विकास संतरालय देकर ही टरकाया जा रहा है...उन्होंने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए हेग जाकर वर्ल्ड कोर्ट में शिकायत करने की धमकी दे डाली...बड़ी मुश्किल से उन्हें उपप्रधानसंतरी के पद से मनाया जा सका...इस बीच अदा जी टंकी पर चढ़ गईं...उन्हें महिला विकास का महकमा दिए जाने के बाद ही शांत किया जा सका...

समीर जी के प्रधानसंतरी बनने की बात सुनकर मैने सोचा चलो अब तो मेरे भी दिन फिर जाएंगे...पूरे छह महीने हो गए गुरुदेव-गुरुदेव करते...जीभ तक घिस गई मक्खन लगाते-लगाते...कोई मलाईदार महकमा तो मिल ही जाएगा...लेकिन तभी मेरी आंखों के आगे डॉ अरविंद मिश्रा का रुआबदार चेहरा घूरता हुआ महसूस होने लगा...जैसे पूछ रहा हो...हो गए सब उसूल-आदर्श हवा...संतरी पद की सोचते ही जीभ लपलपाने लगी...अब करूं तो करूं क्या...संतरी पद लेता हूं तो रुसवाई...नहीं लेता तो अपना भारी नुकसान...मैंने इस मुद्दे को गुरुदेव पर ही छोड़ा...गुरुदेव ने भी ऐसा तोड़ निकाला कि सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी....मुझे बिना विभाग का संतरी बना दिया गया...

अब देखिए बाकी संतरालयों के प्रभारियों की सूची...

अरविन्द मिश्रा - मानव संसाधन विकास, इस राइडर के साथ ऐसी कोई एडल्ट पोस्ट नहीं लिखेंगे जिससे ब्लॉगर बच्चे बिगड़ें

अजय कुमार झा - जन संपर्क

विवेक सिंह -खोया-पाया विभाग (गुमशुदगी)

डॉ टी एस दराल - स्वास्थ्य

मसिजीवी- शोध एवं अनुसंधान

ताऊ रामपुरिया - पशुधन विकास

मिथिलेश दुबे- बाल विकास

शहरोज- भाषा समन्वय

ज्ञानदत्त पाण्डेय -रेलवे

दिनेश राय द्विवेदी - न्याय एवं विधि

सुमन - नाइस नाम से नया विभाग

अविनाश वाचस्पति - घेटो विकास

डॉ कविता वाचकनवी : संस्कृति

महफूज़ अली - किशोर सुधार गृह

अनिल पुसद्कर- जलपान व्यवस्था (विशेष तौर पर समोसा निर्माण)

आशा जोगलेकर- पर्यटन

सरवत जमाल - समीक्षा

राज भाटिया - प्रवासी भारतीय

विनीत कुमार - प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष

राजीव तनेजा - फोटो निदेशालय

संगीता पुरी- मौसम पूर्वानुमान

सतीश सक्सेना - निर्माण

डॉ.अनुराग- साहित्य और विवेचना

रश्मि रविजा- क्रिएटिविटी

शिखा वार्ष्णेय-  उच्चायुक्त, भारतीय हाईकमीशन, लंदन

वाणी- पत्नी शिकायत प्रकोष्ठ

सलीम- ह्दय परिवर्तन रोग विभाग

रुप चंद्र शास्त्री मयंक-  पेटेंट एवं कॉपीराइट विभाग

ललित जी- ब्लॉगर बच्चों को डराऊ विभाग

निर्मला कपिला- ममता मंत्रालय

जी के अवधिया- वृद्ध कल्याण

हिमांशु- गंगा स्वच्छता विभाग

दीपक मशाल- बुंदेलखंड विकास

गौतम राजरिशी- डिफेंस

बीएस पाबला- पंगा विभाग

लावण्या जी- समृद्धि, धरोहर, कला खज़ाना विभाग

गिरीश चंद्र बिल्लौरे मुकुल- टेप एवं रिकॉर्ड विभाग

बवाल- टोपी पहनाओ विभाग

दर्पण- कांच निर्माण

गोदियाल जी- सामाजिक सद्भाव

महेंद्र मिश्र- पुर्नवास विभाग

मो सम कौन (संजय अनेजा) : डॉन विभाग (अरे दीवानो, मुझे पहचानो, कहां से आया मैं हूं कौन)

विवेक रस्तोगी- फास्ट फूड कंट्रोल विभाग

रानी विशाल- नवीनीकरण विभाग

शोभना चौधरी- युवा कल्याण

कुलदीप हैप्पी- ब्लॉगवुड विकास

श्रद्धा जैन- बिजली (कभी कभी ही ब्लॉग पर चमकती हैं)

अल्पना वर्मा- सांग एंड ड्रामा निदेशालय

बबली- नव साहित्य सृजन

शेफाली पांडेय- पद्म पुरस्कार वितरण विभाग

सतीश पंचम- देवदासी उद्धार

धीरू सिंह- कुपोषण नियंत्रण

अजित वडनेरकर- देश के सवा अरब नागरिकों की पहचान के लिए अलग-अलग शब्द देने का विभाग

पंडित वत्स- हवन व अनुष्ठान संतरालय

शरद कोकास- पुरातत्व संतरालय

जाकिर अली रजनीश- सम्मान संतरालय

रवींद्र प्रभात- ईमानदारी संतरालय

सुरेश चिपलूनकर- पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त

हरकीरत हीर- दर्द निवारण संतरालय

मनोज कुमार- न कोऊ से दोस्ती, न कोऊ से बैर संतरालय

डॉ अजित गुप्ता- स्पीकर, ब्लॉग सभा

एम वर्मा- प्यार बांटू संतरालय

विवेक रंजन श्रीवास्तव- टिप्पणी निगरानी विभाग

नीरज गोस्वामी- बिना विभाग के वरिष्ठ संतरी

प्रवीण त्रिवेदी- प्राइमरी विभाग

गिरिजेश राव -वर्तनी सुधार संतरालय ( क ख ग सिखाने पर विशेष ज़ोर)

वंदना- आतिथ्य सत्कार संतरालय

हरि शर्मा- वाणिज्य संतरालय

अलबेला खत्री- मनोरंजन और शालीनता विकास संतरालय


पता चला है कि सागर, यशवंत मेहता सन्नी, अंतर सोहेल, मयंक, रोहित (बोले तो बिंदास), पारुल, फौजिया, अमरेंद्र त्रिपाठी, प्रवीण पथिक, नीशू तिवारी, कनिष्क कश्यप,पकंज मिश्रा, सेमलानी जैसे युवा साथियों ने संतरीमंडल में जगह न मिलने पर बग़ावती तेवर दिखाने के संकेत दिए हैं...उन्हें पहले फील्ड में कुछ साल बिताने के बाद संतरी पद मांगने की सलाह दी गई है...सुना है कि ये सब अपना अलग घेटो बनाने पर विचार कर रहे हैं...

आखिर में सबसे अहम बात...ये सूची आदि ब्लॉगर डॉ अमर कुमार जी का अनुमोदन मिलने के बाद ही अमल में लाई जा सकेगी...

ये सब चल ही रहा था कि किसी ने मेरे ऊपर होली के रंगों से भरी बाल्टी उढ़ेल कर नींद से उठा दिया...

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

कैसे ब्लॉगर हो आप, PSPO भी नहीं जानते...खुशदीप

टीवी पर अक्सर ओरिएंट पंखों की एक एड देखने को मिल जाती थी जिसमें उनकी बड़ी खिल्ली उडाई जाती थी जो PSPO के बारे में नहीं जानते...PSPO यानि पीक स्पीड परफॉरमेंस आउटपुट...ये एड कम्पेन इतना हिट हुआ था कि अगर कोई कुछ नहीं जानता था तो लोग तकिया कलाम की तरह इस्तेमाल करने लगे थे कि हॉ, ये PSPO भी नहीं जानता...ऐसा ही कुछ हाल ब्लॉगवुड के ज्ञानी-ध्यानियों की पोस्ट पढ़कर मेरा भी हो जाता है...




...अंग्रेज़ी मिश्रित हिंदी ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है कि अपन के पास बगले झांकने के सिवा और कोई चारा नहीं रह जाता...सही है जनाब ब्लॉगिंग का क्या मज़ा, जब तक पोस्ट में दो-चार ऐसे करारे शब्द न डाले जाएं कि पढ़ने वाले कहने को मजबूर न हो जाएं...हाय, हम PSPO भी नहीं जानते....अगर हम ऐसा नहीं कर सकते तो लानत है हमारे ज्ञानी होने पर...ऐसा नहीं करेंगे तो घाट पर बकरियों के साथ पानी पीते अपने लेखन के शेर को अलग कैसे दिखा पाएंगे...

खैर इससे पहले कि ये पढ़ते-पढ़ते आप सबका मेरा गला घोटने का मन करने लगे, मैं उस शब्द पर आता हूं जिसने मुझे ये सोचने को मजबूर कर दिया कि मैं PSPO भी नहीं जानता...ये शब्द था घेटो (GHETTO)...माफी चाहूंगा, पहले कभी सुना नहीं था, इसलिए पता नहीं वर्तनी सही भी लिख पा रहा हूं या नहीं...तो जनाब घेटो शब्द का इस्तेमाल ब्लॉगर मीट या संगठन के लिए किया गया था...नया सा लगा, मतलब नहीं जानता था इसलिए सही शाब्दिक अर्थ जानने के लिए डिक्शनरी खोल कर बैठ गया...जो अर्थ मिले वो ये थे...अलग-थलग किए गए लोगों की बस्ती....या द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले चाहरदीवारी से घिरी यहूदियों की बस्ती...

पहली बार दिव्य-ज्ञान हुआ कि अगर अजय कुमार झा जैसा घर फूंक तमाशा देखने वाला कोई नेक बंदा मिलने-मिलाने की महफिल में प्यार से बुलाता है तो वो घेटो बना रहा होता है...या अविनाश वाचस्पति जैसा ब्लॉगरों का भला चाहकर खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला कोई सज्जन घर पर चाय के लिए किसी को बुलाता है तो अपने घेटो का भूमि-पूजन कराने की सोच रहा होता है...अब जो घेटो शब्द का इस्तेमाल कर निशाना साध रहे हैं वो बेचारे सही तो कह रहे हैं...अजय कुमार झा या अविनाश वाचस्पति अलग-थलग प्रजाति का ही तो प्रतिनिधित्व करते हैं...हां, बड़ी संख्या में मूर्खों का जमावड़ा ज़रूर इन दोनों की पोस्ट का इंतज़ार करता रहता है...

खैर, आज नहीं तो कल, ये सभी मूर्ख झक मार कर हमारी पोस्ट ही पढ़ने आएंगे...और जाएंगे कहां....भई अजय कुमार झा तो संवेदनशील जीव हैं, उन्हें विद्वतता के कोड़ों से ताने मार-मार कर इतना परेशान कर दो कि या तो वो टंकी पर ही चढ़े रहें या वो अच्छे-अच्छे विषयों पर लेखन भूलकर बस हमारे सवालों के जवाब देने में ही उलझे रहें....अविनाश वाचस्पति जी ज़रूर जीवट वाले लगते हैं...इसलिए उन पर गुटबाज़ी को बढ़ावा देने सरीखे बाण चलाकर घायल किया जाए...बस उन्हें ऐसा कर दिया जाए कि उनकी कलम से कविता के सिवा और कुछ निकले ही नहीं...

जनाब इस तरह कोई भला होता है ब्लॉगिंग का जिस तरह अजय कुमार झा और अविनाश वाचस्पति ने सीधा-सच्चा सोच लिया था...इसके लिए तो क्रांतिकारी ग्लास्नोस्त और पेरेस्त्रोइका की ज़रुरत होती है...अब ये झा या वाचस्पति जैसे प्राणी क्या जानें कि ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका क्या होता है...PSPO जो नहीं जानते...हमसे पूछो हम बताते हैं...अरे ये वो हथियार हैं जिनके दम पर मिखाइल गोर्बाच्योव ने अस्सी के दशक के मध्य में इस्तेमाल कर सोवियत यूनियन की तस्वीर बदल कर वो रूस बनाया था जिसे आज हम देखते हैं...ये एक दो लंच या टी मीटिंग से कहीं क्रांतियां आती है...अब आपमें से विद्वानों को छोड़कर सीधे-साधे ब्लॉगर चकराने लगे होंगे कि ये ग्लास्नोस्त और पेरेस्त्रोइका क्या बला होती हैं...ये दोनों बलाएं घेटो के ही बड़े भाई बहन है...ग्लास्नोस्त का मतलब है खुलापन और पेरेस्त्रोइका का मतलब है वो अभियान जिसके तहत रूस की आर्थिक और राजनीतिक पॉलिसी को नया रूप दिया गया था...अब तो आप भी मानेंगे न ब्लॉगिंग को ग्लास्नोस्त और पेरेस्त्रोइका का झंडा उठाने वाले की ज़रूरत है न कि अजय कुमार झा और अविनाश वाचस्पति जैसे लोगों कि जिनके बारे में कहा जा सकता है...आई मौज फकीर की, दिया झोंपड़ा फूंक...

भई और किसी को हुआ हो या न हो मैं ज़रूर PSPO जान गया हूं...कबीर जी का दोहा ही आज से अपने लिए बदल रहा हूं....

ज्ञानी जो देखन मैं चला, ज्ञानी न मिलया कोए,

जो मन खोजा आपना, तो मुझसे ज्ञानी न कोए...



(डिस्क्लेमर...होली की तरंग में लिखी गई पोस्ट है, अन्यथा न लें)

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

प्रणब दा ! रोटी तो मिलती रहेगी न...खुशदीप

परसो ममता दी का दिन था...आज प्रणब दा का है...बजट का दिन है...प्रणब दा को फिक्र होगी...फिस्कल घाटे की...जीडीपी की...रुपया आएगा कहां से...रुपया जाएगा कहां...लेकिन आंकड़ों की बाज़ीगरी के इस वार्षिक अनुष्ठान से हमारा-आपका सिर्फ इतना वास्ता होता है कि क्या सस्ता और क्या महंगा...इनकम टैक्स में छूट की लिमिट बढ़ी या नहीं...होम लोन सस्ता होगा या नहीं...लेकिन इस देश में 77 करोड़ लोग ऐसे भी हैं जिनका प्रणब दा से एक ही सवाल है...रोटी मिलेगी या नहीं...



कल मोटे-मोटे पोथों में आर्थिक सर्वे संसद में पेश किया गया...सर्वे में सुनहरी तस्वीर दिखाई गई कि भारत ने आर्थिक मंदी पर फतेह हासिल कर ली है...अगले दो साल में नौ फीसदी की दर से विकास का घोड़ा फिर सरपट दौड़ने लगेगा...लेकिन आम आदमी को इस घोड़े की सवारी से कोई मतलब नहीं...उसे सीधे खांटी शब्दों में एक ही बात समझ आती है कि दो जून की रोटी के जुगाड़ के लिए भी उसकी जेब में पैसे होंगे या नहीं...

या दाल, चावल, आटे के दाम यूं ही बढ़ते रहे तो कहीं एक वक्त फ़ाके की ही नौबत न आ जाए...ये उसी आम आदमी का दर्द है जिसके दम पर यूपीए सरकार सत्ता में आने की दुहाई देते-देते नहीं थकती थी...चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस नारा लगाती थी...आम आदमी के बढ़ते कदम, हर कदम पर भारत बुलंद...लेकिन आठ महीने में ही आम आदमी की सबसे बुनियादी ज़रूरतों पर ही सरकार लाचार नज़र आने लगी...

महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर रखा है...लेकिन राष्ट्रपति के अभिभाषण के ज़रिए सरकार ने गिन-गिन कर वजह बताई कि खाद्यान्न की कीमतें क्यों काबू से बाहर हो गईं...सरकार के मुताबिक...

खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई...


दुनिया में दाल, चावल, खाद्य तेल के दाम तेज़ी से बढ़े...


किसानों को फसल का ज़्यादा समर्थन मूल्य दिया गया...

ग्रामीण इलाकों में लोगों की आय बढ़ी...

ज़ाहिर है कि खाद्यान्न की कीमतें काबू से बाहर हुईं तो लोगों को राहत पहुंचाना भी तो सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है...सौ दिन में तस्वीर बदलने के दावे करने वाली सरकार ने वादा तो पूरा किया...लेकिन नई तस्वीर आम आदमी को और बदहाल करने वाली रही...विरोधी दल महंगाई पर सरकार को घेरती है तो सरकार इसे राजनीति कह कर खारिज कर सकती है...लेकिन अगर सरकार का आर्थिक सर्वे ही सरकार पर उंगली उठाता है तो स्थिति वाकई ही गंभीर है...आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि

सरकार ने सूखे और मानसून फेल होने पर खरीफ़ ( मुख्यतया चावल) की फसल बर्बाद होने का ढिंढोरा पीटा, जिससे जमाखोरियों को बढ़ावा मिला...


सरकार ने स्टॉक में मौजूद खाद्यान्न को नज़रअंदाज किया नतीजन सही तस्वीर प्रचारित न होने से आपदा जैसी स्थिति महसूस की जाने लगी...


सरकार ने रबी (मुख्यता गेहूं) की फसल अच्छी रहने का सही अनुमान नहीं लगाया


आयातित चीनी को बाज़ार में लाने में देर की गई, जिससे अनिश्चितता का माहौल बना और महंगाई को पर लग गए..


ऐसे में स्पष्ट है मानसून फेल होने से स्थिति इतनी नहीं बिगड़ी जितनी कि बाज़ार शक्तियों ने मोटे मुनाफे के चक्कर में बंटाधार किया...सरकार इन शक्तियों पर काबू पाने की जगह अपने ही विरोधाभासों में उलझी रही...कभी कांग्रेस शरद पवार को महंगाई के लिए कटघरे में खड़ा करती तो कभी पवार पूरी कैबिनेट को ही नीतियों और फैसलों के लिए ज़िम्मेदार ठहरा देते...सरकार के इसी ढुलमुल रवैये के बीच आर्थिक सर्वे जो इशारे दे रहा है, वो आम आदमी की और नींद उ़ड़ाने वाले हैं...राशन के खाने, खाद और डीजल पर से सब्सिडी वापसी की तलवार और वार करने के लिए तैयार है...आर्थिक सर्वे में विकास दर में बढ़ोतरी के अनुमान के साथ आने वाला कल बेशक सुनहरा नज़र आए, लेकिन आम आदमी की फिक्र आज की है...और इस आज को सुधारने में सरकार भी हाथ खड़े करती नज़र आती है...और शायद यही सबसे बड़ा संकट है...


स्लॉग ओवर

मक्खन के पुत्र गुल्ली के स्कूल में इंस्पेक्शन के लिए इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल समेत बड़े अधिकारी आए हुए थे...अधिकारी गुल्ली की क्लास में पहुंचे...किस्मत के मारे गुल्ली पर ही इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल ने सवाल दाग दिया...अंग्रेजी में बताओ तुम्हारे क्लास टीचर का क्या नाम है...

गुल्ली थोड़ी देर तक सोचता रहा फिर बोला...ब्युटीफुल रेड अंडरवियर...

ये सुनकर इंस्पेक्टर को गुस्सा आ गया...क्लास टीचर से मुखातिब होते हुए कहा...व्हाट नॉनसेस, यही सिखाया है बच्चों को...

ये सुनकर टीचर ने डरते-डरते जवाब दिया...जनाब सही तो कह रहा है, मेरा नाम है... सुंदर लाल चड्ढा....

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

संस्कृति एक्सप्रेस ले लो, आतंक एक्सप्रेस दे दो...खुशदीप

रेल बजट आ गया...आपने अब तक जान भी लिया होगा...ममता दी की रेल ने बंगाल की बम-बम कर दी...आप खुश है कि किराए नहीं बढ़े...एसी में तो कहीं बीस रुपये की छूट भी मिल गई है...54  नई गाड़ियों में जितनी ज़्यादा से ज़्यादा ममता दी बंगाल ले जा सकती थीं ले गईं...हल्ला मच रहा है कि...दी ऐसा क्यों किया...2011 में ममता दी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव लड़ना है...आपको नहीं लड़ना...फिर क्यों गले का ऑक्टेन हाई किए हुए हो...


आभार...हिंदुस्तान टाइम्स

ममता दी बंगाल को दी जाने वाली गाड़ियां सिर्फ बंगाल तक ही सीमित नहीं रखना चाहती...वो एक कदम आगे बढ़ाना चाहती हैं...गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के 150वें जयंती वर्ष में ममता उनकी यादों से जुड़ी जगहों का तीर्थ कराने के लिए संस्कृति एक्सप्रेस चलाना चाहती हैं...गुरुदेव ने अपनी ज़िंदगी का एक हिस्सा बांग्लादेश (तब भारत का ही भाग) में बिताया था...ममता भारत के साथ बांग्लादेश में भी उन सभी जगहों तक संस्कृति एक्सप्रेस ले जाना चाहती हैं जहां जहां गुरुदेव के चरणकमल पड़े थे...चलिए मान लीजिए संस्कृति एक्सप्रेस चल भी गई लेकिन बांग्लादेश की ज़मीन पर पाकिस्तान से खाद-पानी लेकर पनप रहे आतंकवादी संगठन कुछ और ही चाहते हैं...वो अपनी आतंक एक्सप्रेस को भारत के हर उस कोने तक ले ले जाना चाहते हैं, जहां वो आतंक की एक से बड़ी एक इबारत लिख सकें...

ये सच है कि ममता अगर संस्कृति एक्सप्रेस की योजना को परवान चढ़ाना चाहती हैं तो उनके जेहन में बांग्लादेश के वो आम नागरिक भी हैं जो गुरुदेव के रवींद्र संगीत और रवींद्र गीति में वैसे ही आनंद का अनुभव करते हैं, जैसा कि पश्चिम बंगाल में किया जाता है...दूसरी ओर बांग्लादेश में सक्रिय आतंकी संगठन हरकत उल जेहाद अल इस्लामी (हूजी) जैसे आतंकी संगठन हर उस आदमी को अपने साथ जोड़ना चाहते हैं जो भारत को दुश्मन नंबर एक मानता है...


ज़ाहिर है हूजी को पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद की शह है...इंडियन मुजाहिदीन के संस्थापक आमिर रज़ा ख़ान ने भी कोलकाता से निकलने के बाद बांग्लादेश का रुख किया था...बाद में पाकिस्तान भाग गया...

पिछले आठ साल में भारत में हुई पचास से ज़्यादा आतंकी वारदातों में हुजी का नाम सामने आया...11 जुलाई 2006 को मुंबई में हुए सीरियल लोकल ट्रेन ब्लास्ट को अंजाम देने के पीछे भी हुजी का हाथ मान जाता रहा है....असम में हिंसा के ज़रिए आंदोलन चलाने वाले संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) को भी छिपने और घात लगाकर दुश्मन पर हमले की ट्रेनिंग लेने के लिए बांग्लादेश की ज़मीन सबसे ज़्यादा रास आई...उल्फा का प्रभाव बांग्लादेश के छह ज़िलों में है...यहीं नहीं उल्फा का प्रमुख नेता अनूप चेतिया बांग्लादेश में ही कैद है...इन सब संगठनों का पैसा भी बांग्लादेश के बैंकों के ज़रिए ही आता है....ऐसे में क्या गारंटी कि ममता दी जो संस्कृति एक्सप्रेस बांग्लादेश ले जाना चाहती है उसका इस्तेमाल हूजी जैसे संगठन आतंक की आंधी भारत भेजने में नहीं करेंगे...सवाल बड़ा है लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है...ममता दी के पास भी नहीं...



स्लॉग गीत

खैर छो़ड़िए ये सब टंटे आप तो एक प्यारा सा लोकगीत सुनिए...इस गीत का लिंक कल पीडी भाई ने टिप्पणी के ज़रिए मेरी पोस्ट पर दिया था...पीडी भाई को यूनुस जी की ओर से उपलब्ध कराया गया ये गीत इतना मस्त है कि न जाने कितनी बार सुन चुका हूं, फिर भी मन नहीं भर रहा...यकीन नहीं आता तो इस पोस्ट पर जाकर आप खुद ही सुन लीजिए...

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

भारतीय रेल को कितना जानते हैं आप...खुशदीप

रेल...बचपन से ही जब ये नाम सुनता एक अजीब सा रोमांच शरीर में दौड़ने लगता.. रेलगाड़ी में बैठकर दूर शहरों में रहने वालों से मिलने की खुशी और दूसरा अपर बर्थ पर कूदते-फांदते धमाचौकड़ी मनाने की यादें...ट्रेन में यदा-कदा अब भी सफ़र करते हैं...लेकिन जनाब अब वो पहले वाली बात कहां...आनलाइन रिजर्वेशन, तत्काल सुविधाओं ने रेल की यात्रा अब कहीं ज़्यादा आसान बना दी है...बस अंटी में माल होना चाहिए....




रेल मंत्री ममता बनर्जी का रेल बजट 15वीं लोकसभा में दूसरा और कुल मिलाकर तीसरा रेल बजट है...इस साल के आखिर तक बिहार और अगले साल पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं...रेल बजट तैयार करते समय ये दोनों तथ्य ममता बनर्जी के ज़ेहन में अवश्य रहे होंगे...

खैर छोड़िए राजनीति...उससे जुड़ी ख़बरें तो आप तक पहुंच ही जाएंगी...मैं भारतीय रेलवे के कुछ सुने-अनसुने तथ्य बताता हूं...ये तो आपको पता ही होगा कि भारतीय रेलवे विश्व में सबसे बड़ा नियोक्ता (नौकरी देने वाला संगठन) है...रेलवे के पास सोलह लाख कर्मचारी हैं..एक करोड़ तीस लाख मुसाफिर रोज़ भारतीय रेलवे की 14,300 ट्रेनों के माध्यम से यात्रा करते हैं...देश में करीब सात हज़ार रेलवे स्टेशन हैं...भारतीय रेलवे के पास 63,028 किलोमीटर लंबा रेल-ट्रैक है...16,300 किलोमीटर ट्रैक पर बिजली से चलने वाली ट्रेन दौड़ सकती हैं...भारतीय ट्रेनें रोज़ कुल मिलाकर जितना सफ़र करती हैं वो पृथ्वी से चांद की दूरी से साढ़े तीन गुणा ज़्यादा है....आप ये जानकर हैरान होंगे कि आज़ादी से पहले रेलवे को चलाने के लिए 42 कंपनियां काम करती थीं...


भारतीय रेल...दिलचस्प तथ

पहली पैसेंजर ट्रेन कब चली...16 अप्रैल 1853, बॉम्बे और ठाणे के बीच

पहला रेलवे पुल...डैपूरी वायाडक्ट (मुंबई-ठाणे रूट पर)

पहली रेलवे सुरंग...पारसिक टनल

पहली अंडरग्राउंड रेलवे...कलकत्ता मेट्रो

पहला कंप्यूटरीकृत रेलवे रिज़र्वेशन सिस्टम शुरू हुआ... नई दिल्ली (1986)

पहली इलैक्ट्रिक ट्रेन...3 फरवरी 1925 को बॉम्बे वीटी और कुर्ला के बीच

ट्रेन में टॉयलेट सुविधा कब शुरू हुई...फर्स्ट क्लास (1891), लोअर क्लास (1907)

सबसे छोटे नाम वाला स्टेशन...आईबी (उड़ीसा)

सबसे बड़े नाम वाला स्टेशन... श्री वेंकटानरसिम्हाराजूवरियापेटा (तमिलनाडु)

व्यस्तम रेलवे स्टेशन...लखनऊ (64 ट्रेन की रोज़ आवाजाही)

सबसे लंबी दूरी तय करने वाली ट्रेन... जम्मू तवी और कन्याकुमारी स्टेशनों के बीच चलने वाली हिमसागर एक्सप्रेस( 74 घंटे 55 मिनट में 3751 किलोमीटर)

सबसे छोटी दूरी वाला रूट...नागपुर से अजनी (3 किलोमीटर)

बिना स्टॉप सबसे लंबी दूरी वाली ट्रेन...त्रिवेंद्रम राजधानी (528 किलोमीटर, 6.5 घंटे में)

सबसे लंबा रेलवे पुल...सोन नदी पर बना नेहरू सेतु (100,44 फीट)

सबसे लंबा प्लेटफॉर्म...ख़ड़गपुर (2733 फीट)

सबसे लंबी रेलवे सुरंग....कोंकण रेल लाइन पर कारबुडे सुरंग (6.5 किलोमीटर)

सबसे पुराना चालू इंजन... फेयरी क्वीन (1855)

सबसे तेज़ ट्रेन...भोपाल शताब्दी (140 किलोमीटर प्रति घंटा)

भारत में स्टीम इंजनों का निर्माण 1972 के बाद बंद हुआ...







स्लॉग गीत


ये गीत ज़रूर देखिए-सुनिए...बिना टिकट स्टीम इंजन की यात्रा कर लेंगे...

रेलगाड़ी रेलगाड़ी छुक छुक, छुक छुक


बीच वाले स्टेशन बोले रुक रुक, रुक रुक...

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

अमीर बनना है, इसे पढ़िए...खुशदीप

अमीर बनने का नुस्खा आपको बताऊंगा...ऐसा नुस्खा जिसमें आपकी धन-दौलत छिनने का कभी डर ही नहीं रहेगा, लेकिन पहले ज़िंदगी...

जिंदगी कैसी है पहेली हाय, कभी ये रुलाए, कभी ये हंसाए...

इस पहेली को सुलझा तो नहीं सकता लेकिन आज विद्वान पुरुषों के अनमोल ख़जाने से कुछ मोती निकाल कर आपके साथ ज़रूर बांट सकता हूं...

1. सांप और चींटें

जब सांप ज़िंदा होता है तो चींटें खाता है...जब सांप मर जाता है तो चींटें सांप को खाते हैं...वक्त कभी भी बदल सकता है...ज़िंदगी में कभी किसी की कमतर समझते हुए अनदेखी मत करो...

2.रोज़ नई गलती

एक ही गलती को दुबारा मत करो...कई नई गलतियां इंतज़ार कर रही हैं...हर दिन अलग गलती पर हाथ आजमाओ...सीखने से बेहतर और कोई चीज़ नहीं...

3. जैसी सोचो, वैसी ज़िंदगी

किसी दूसरे का व्यवहार बदलने का सबसे अच्छा तरीका है खुद उसके साथ बदल जाओ...याद रखिए सूरज मक्खन को पिघलाता है तो मिट्टी को कड़ा भी बनाता है...ज़िंदगी वैसी ही होती है, जैसे कि हम सोचते हैं...इसे खूबसूरती के साथ सोचिए....

4. हम बहते धारे हैं

ज़िंदगी समुद्र की तरह है...बिना किनारे हम आगे बढ़ रहे हैं...कुछ भी हमारे साथ नहीं रहता है...साथ रहती हैं तो कुछ लोगों की यादें जो हमें लहरों की तरह छूते हैं...



5. सही अमीर

जब भी आप जानना चाहो कि आप कितने अमीर हो गए हो....अपनी धन-दौलत मत गिनो...बस आंखों में आंसू लाओ...फिर उन हाथों की गिनती करो जो उन आंसुओं को दिल से पोंछने की कोशिश करते हैं...यही असल अमीरी है...

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

1411 बाघ बचाने की मुहिम @ बाघ, ब्लॉगर, पारसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या...खुशदीप

देश में बाघ लगातार घट रहे हैं...


देश में ब्लॉगर लगातार बढ़ रहे हैं...

क्या घोर कलयुग है...


क्या ये बढ़ते हुए ब्लॉगर घटते हुए बाघों के लिए कुछ नहीं कर सकते...


कर सकते हैं जनाब बिल्कुल कर सकते हैं...



डार्विन की नेचुरल सेलेक्शन की थ्योरी कहती है विकास की दौड़ में जो प्रजाति पीछे रह जाती है, वो गधे के सिर के सींग की तरह गायब हो जाती है...डॉयनासोर किसी वक्त इस ज़मीन पर राज करते थे...लेकिन अपने को कुदरत की बदलती ज़रूरतों के अनुसार खुद को ढाल नहीं पाए और अंतत पूरी तरह धरती से गायब हो गए...

लेकिन बाघ के मामले में कहानी दूसरी है...बाघ बेचारा इनसान के लालच के चलते विलुप्त होने के कगार पर आ गया है...जंगल जिस तरह कट रहे हैं, प्राकृतिक संतुलन जिस तरह बिगड़ रहा है, बाघ बेचारे रहें तो रहें कहां ..पिछली सदी के शुरू में देश में चालीस हज़ार बाघ थे...1973 आते-आते देश में सिर्फ 1827 बाघ रह गए...उसी साल बाघों को बचाने के लिए प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया...इस वक्त सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में सिर्फ 1411 बाघ रह गए हैं...वो दिन दूर नहीं जब बाघ सिर्फ फोटो में देखने की चीज़ ही रह जाएगा और उसका नामोंनिशां भी हमारी ज़मीन से मिट जाएगा...

क्या आपको अब भी नहीं लग रहा कि बाघों को बचाने के लिए जागरूकता बढ़नी चाहिेए...ब्लॉगवुड को कुछ करना चाहिए...वन्यजीव प्रेमियों की आवाज़ के साथ इतनी आवाज़ तो मिलानी चाहिए कि सत्ता के बहरे कानों में भी गूंज सुनाई देने लग जाए...

अब आप कहेंगे कि बाघों के लिए इतनी हायतौबा क्या करनी...ठीक है जनाब बाघ के लिए आपका दिल नहीं धड़कता, इनसान के लिए तो धड़केगा न...अगर इनसान ऐसे ही ज़मीन पर कम होने लग जाएं तो भी आप ऐसे ही मूकदर्शक बने बैठे रहेंगे...मुंबई का पारसी समुदाय तो आपको याद होगा...हिंदी फिल्मों में ढीकरा ढीकरा करते पारसी बुज़ुर्ग तो आप हर्गिज नहीं भूले होंगे...देश में ज़्यादातर पारसी मुंबई में ही रहते आए हैं...

जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार विभाजन से पहले 1940-41 में देश में 114,890 पारसी थे...1951 आते आते देश में पारसियों की आबादी 111,711 रह गई....अब अनुमान लगाया जा रहा है कि 2020 तक देश में सिर्फ 23,000 पारसी रह जाएंगे...पारसियों की आबादी में 31 फीसदी आबादी 60 साल से ऊपर के लोगों की है...जबकि राष्ट्रीय औसत में 60 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों का 7 फीसदी ही बैठता है...पारसियों में सिर्फ 4.7 प्रतिशत ही छह साल से कम उम्र के बच्चे हैं..अगर यही हाल रहा तो हमारे देश से पारसियों का बिल्कुल सफाया हो जाएगा....




पारसियों के कम होने की वजह पलायन और कम संतान का होना है...बाघ भी बेचारे खाने की खातिर अपने मूल स्थान से पलायन को मजबूर होते हैं और लालची इनसान के हत्थे चढ़ जाते हैं...क्या हम बाघों के लिए ये नारा बुलंद नहीं कर सकते...

Save Tigers, Save Yourself....

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

इस पोस्ट को हिट कराना मेरे लिए चैलेंज...खुशदीप

जी हां, ठीक पढ़ा आपने...मुझे हर हाल में अपनी ये पोस्ट हिट करानी है...लेकिन मेरे पास लिखने के लिए आज कोई सॉलिड मुद्दा नहीं है...फिर...फिर क्या...जो फॉर्मूला कुछ और ब्लॉगर भाई अपना सकते हैं, वो मैं नहीं अपना सकता क्या...शाहरुख़ ख़ान...माई नेम इज़ ख़ान... को हिट कराने के लिए मार्केट-शास्त्र की हर ट्रिक आजमा सकते हैं, मैं नहीं आजमा सकता क्या...शाहरुख़ ख़ान ने तो 1988 में दिल्ली के हंसराज कालेज से इकोनॉमिक्स में बीए ऑनर्स किया था...इसलिए बाज़ार के बेसिक्स जानते हैं...लेकिन मैं क्या करूं, मैं तो प्लेन बीएससी हूं...बहरहाल My name is Khushdeep...And I am a juggler...

खैर छोड़िए मुझे मनमोहन देसाई के हिट फॉर्मूले लॉस्ट एंड फाउन्ड की तर्ज पर ही आज हिट पोस्ट बनानी है...इसके लिए मुझे सबसे आसान नज़र आता है कि ब्लॉगवुड के किसी स्टार ब्लॉगर का दामन पकड़ूं और भवसागर तर जाऊं...ये गाता हुआ...पायो जी मैंने ब्लॉग रत्न धन पायो....ठीक है यही काम करता हूं...अंधविश्वास की आग में खुद हाथ जलाने से अच्छा है कि किसी स्टार ब्लॉगर का ही दिल जलाया जाए...लेकिन कौन है वो स्टार ब्लॉगर, जिसका नाम टाइटल में लेने मात्र से ही नैया पार हो जाती है...कुछ लोग उस मिस्टर एक्स को बड़बोला भी कहते हैं...पढ़ाई में हमेशा आला रहा...तर्क में अच्छे से अच्छे शास्त्री का मुकाबला कर सकता है...खूबसूरती के मामले में हैंडसम सलमान ख़ान सरीखा...सलमान की तरह ही दिल का भला और दूसरों के हमेशा काम आने वाला...अपनों की परेशानी में सब कुछ झोंक देने वाला....

आप उसे बेशक बड़बोला कहें या न कहें लेकिन मैं उसे ब्लॉगवुड में बम का गोला मानता हूं...लेकिन मैं ऊपर जिस चैंलेज की बात कर चुका हूं...उसे यहां बताता हूं...दरअसल आज मैंने फैसला किया है कि उस स्टार ब्लॉगर का नाम मैं पोस्ट में कहीं नहीं लिखूंगा...और फिर भी आपको समझ आ जाएगा कि आखिर ये महाशय हैं कौन....

ये जनाब वो पारस पत्थर हैं, जिनके नाम की ही इतनी तासीर है कि जिस पोस्ट के भी टाइटल में ये टंग जाए वो पोस्ट उस दिन की टॉप फाइव में आना निश्चित है...लेकिन मैं क्या करूं मुझे इसी स्टार ब्लॉगर के नाम के सहारे अपनी पोस्ट सब को पढ़वानी है...लेकिन मैंने तो कसम खाई है कि उसका नाम नहीं लूंगा...

बड़ी मुश्किल है चलिए थोड़े हिंट देता हूं...ये जनाब शाहरुख़ ख़ान की शान में कसीदे पढ़ते हुए खामख्वाह...खामख्वाह वालों से भिड़ जाते हैं...इस चक्कर में कई दूसरे भाइयों को भी पोस्ट का चारा डाल देते हैं...कभी खुद को सबसे पहला ब्लॉगर (अपने आकलन के अनुसार) घोषित कर मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल देते हैं...कभी अपने सुंदर मुखारबिन्दु से ऐसे मधुर वचन कह जाते हैं कि दूसरा तिलमिलाता हुआ पैर पटकता रह जाता है...इसके अलावा वो बेचारा करे भी क्या...इस स्टार ब्लॉगर का ताल्लुक नफ़ासत और नज़ाकत के शहर से है, लेकिन हैं पूरे रोडी (रिफाइन्ड, वेल एडुकेटेड, कल्चर्ड रोडी)....अगर इनसे कोई कह दे कि आप से पहले भी कुछ नाचीज ब्लॉगर हो चुके हैं...तो इस बंधु के चेहरे पर ज़रा सी भी शिकन नहीं आती...इनका तपाक से जवाब होता है...कोई बात नहीं पहले नहीं तो क्या, अब सही, आज तो हम जहां जाकर खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है...

अब तक आप समझ ही गए होंगे, ये सुपरमैन मिस्टर एक्स हैं कौन...चाह कर भी इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता...क्योंकि इन्होंने लेखन की लाजवाब शैली से ब्लॉगवुड में इतने चाहने वाले जो बना रखे हैं...अब आप भला किस किस से पंगा लोगे.... जहां तक इनके नाम से पोस्ट हिट कराने का सवाल है, तो उसके लिए कुछ धांसू शीर्षक मैं सुझाता हूं...

1. मिस्टर एक्स तत्काल मिस्टर वाई से माफ़ी मांगो...


2. मिस्टर एक्स लखनऊ का नाम बदनाम मत करो...


3. मिस्टर एक्स अपनी खूबसूरती का ढिंढोरा मत पीटो...


4. मिस्टर एक्स ज़ुबान पर लगाम रखो...


5. मिस्टर एक्स तुमने कभी नारी विरोधी टिप्पणी दी थी...आखिर तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई थी...

6. मिस्टर एक्स तुम शाहरुख़ के ख़िलाफ़ उलटा सीधा कुछ कह ही कैसे सकते हो...


7. मिस्टर एक्स तुम शादी क्यों नहीं करते...


8. मिस्टर एक्स तुम अपनी ट्रेन क्यों मिस कर देते हो...


9. मिस्टर एक्स तुम खाते क्यों हो...पीते क्यों हो...रोते क्यों...हंसते क्यों हो...

10. फाइनली मिस्टर एक्स, तुम जीते ही क्यों हो....

फलां...फलां..फलां...

बस इन दस फॉर्मूलों में आपको मिस्टर एक्स का नाम हटाकर उस स्टार ब्लॉगर का असली नाम फिट करना है...बस देखो पोस्ट हिट ही हिट...आपके सामने मेरी तरह मजबूरी कोई है कि कसम खा रखी है, आज की पोस्ट में उस स्टार ब्लॉगर का नाम ही नहीं लेना...


मॉरल ऑफ द स्टोरी...

जब मैं बिना स्टार ब्लॉगर के नाम का ज़िक्र किए अपनी पोस्ट अपने नाम से ही हिट करा सकता हूं तो आप क्यों नहीं...क्यों दूसरे के कंधे पर चढ़ कर बंदूक चलाई जाए...कितनी बार लगा सकते हैं आप इस तरह हिट निशाना...एक बार, दो बार, तीन बार...फिर उसके बाद...उसके बाद क्या...

इक तारा बोले,
तुन तुन तुन तुन,
वो क्या कहे है तुमसे,
सुन सुन सुन सुन...

सिर्फ और सिर्फ अपने नाम पर भरोसा करना सीखिए...आपका नाम कभी आपको धोखा नहीं देगा...दूसरे की पूंछ पकड़ कर नदी पार करना चाहोगे तो डूबने का खतरा बना रहेगा...अपना नाम ही अपने लेखन से इतना बड़ा कर दो कि

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले,


खुदा बंदे से ये पूछे बता तेरी रज़ा क्या है...



स्लॉग ओवर

इस दुनिया में महिलाएं तुलनात्मक दृष्टि से पुरुषों से ज़्यादा खुश कैसे रह लेती हैं...




जवाब...




सोचो...



सोचो...




थोड़ा और सोचो...




नहीं पता, अरे सीधी सी बात महिलाओं की कोई पत्नी जो नहीं होती...

(डिस्क्लेमर...स्लॉग ओवर निर्मल हास्य, याद रखिए होली आने वाली है)

मुस्कुराइए कि आप दुनिया में हैं...खुशदीप

एक दृष्टिहीन लड़का सुबह एक पार्क में अपनी टोपी पैरों के पास लेकर बैठा हुआ था...उसने साथ ही एक साइनबोर्ड पर लिख रखा था...मेरी आंखों में रौशनी नहीं है, कृपया मदद कीजिए...टोपी में कुछ सिक्के पड़े हुए थे...





 तभी एक दयालु सज्जन लड़के के पास से गुज़रे..वो दो मिनट तक चुपचाप वहीं खड़े रहे...फिर अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाल कर लड़के की टोपी में डाल दिए...इसके बाद उस सज्जन को न जाने क्या सूझी...उन्होंने लड़के का साइनबोर्ड लिया और उसके पीछे कुछ लिखा और उलटा करके लगा दिया...फिर वो सज्जन अपने ऑफिस की ओर चल दिए...इसके बाद जो भी पार्क में लड़के के पास से गुज़रते हुए उस बोर्ड को पढ़ता, टोपी में सिक्के या नोट डाल कर ही आगे बढ़ता...

जिस सज्जन ने साइनबोर्ड को उलट कर कुछ लिखा था, दोपहर बाद वो फिर पार्क के पास से निकले...सज्जन ने सोचा देखूं तो सही लड़के की लोगों ने कितनी मदद की है...लड़के की टोपी तो सिक्के-नोटों से भर ही गई थी...बाहर भी कुछ सिक्के गिरे हुए थे...वो सज्जन फिर दो मिनट लड़के के पास जाकर खड़े हो गए...बिना कुछ बोले...तभी उस लड़के ने कहा...आप वही सज्जन हैं न जो सुबह मेरा साइनबोर्ड उलट कर कुछ लिख गए थे...

ये सुनकर चौंकने की बारी सज्जन की थी कि बिना आंखों के ही इसने कैसे पहचान लिया...लड़के ने फिर पूछा कि आपने आखिर उस पर लिखा क्या था...सज्जन बोले...मैने सच ही लिखा था...बस तुम्हारे शब्दों को मैंने दूसरे अंदाज़ में लिख दिया था कि आज का दिन बहुत खूबसूरत है, लेकिन मैं इसे देख नहीं सकता...

साइनबोर्ड के दोनों साइड पर जो लिखा गया था उससे साफ़ था कि लड़का दृष्टिहीन है...लेकिन लड़के ने जो लिखा था, वो बस यही बताता था कि वो देख नहीं सकता...लेकिन सज्जन ने जो लिखा, उसका भाव था कि आप कितने सौभाग्यशाली हैं कि दुनिया को देख सकते हैं...ज़ाहिर है साइनबोर्ड की उलटी साइड का ज़्यादा असर पड़ा...


स्लॉग चिंतन

आपके पास जो है उसके लिए ऊपरवाले का शुक्रगुज़ार रहो...क्रिएटिव होने के साथ अलग कुछ नए तरीके से सोचो...प़ॉजिटिव रहो...


जब आपको ज़िंदगी रोने की 100 वजह देती है...ज़िंदगी को बताओ कि आपके पास मुस्कुराने के 1000 बहाने हैं...जो बीत गया है उस पर पछताते ही नहीं रहो...अपने आज को पूरे विश्वास के साथ संभालो...आने वाले कल के लिए दिल से सारा डर दूर करके तैयार हो.. बस खुद पर भरोसा रखो...


दुनिया में सबसे ज़्यादा खूबसूरत किसी को मुस्कुराते देखना होता है...


उससे भी ज़्यादा खूबसूरत ये जानना होता है कि उसकी इस मुस्कुराहट की वजह आप है...

(ई-मेल से अनुवाद)

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

'चमत्कार' को नमस्कार ?...खुशदीप

जो दिखता है क्या वो हमेशा सच होता है...विश्वास या अंधविश्वास...इसे अलग करने के लिए कोई तो लकीर होती होगी...जो आप देखने जा रहे हैं, मैं नहीं जानता कि ये क्या है...आप ये फोटो-फीचर देखिए फिर खुद ही किसी नतीजे पर पहुंचिए...मेरे कुछ सवाल है, वो बाद में...पहले कुंभाकोणम की ये खबर...

तमिलनाडु के अखबार दिनाकरण में इस साल 16 जनवरी को खबर छपी थी...इससे एक दिन पहले सूर्य ग्रहण था...कुंभाकोणम के साथ ही थेप्पेरुमन्नालुर के अग्रहारम गांव में श्री विश्वनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है...खबर के मुताबिक मंदिर के पुजारी ने  सूर्य ग्रहण वाले दिन मंदिर के गर्भगृह का दरवाज़ा सुबह साढ़े दस बजे खोला और पानी लेने के लिए बाहर गया...वहां उसने देखा कि मंदिर स्थित बेल के पेड़ से एक कोबरा मुंह में पत्ती लेकर नीचे उतर रहा है...फिर उस कोबरा ने गर्भगृह में जाकर शिवलिंग के ऊपर उस पत्ती को रख दिया...यही क्रम उसने कई बार और दोहराया...पुजारी के अनुसार कोबरा अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए सूर्य ग्रहण के दौरान अर्चना कर रहा था....

पुजारी का ये दावा भी है कि पिछले तीन सूर्य ग्रहणों से हर बार ये कोबरा ऐसे ही मंदिर में आकर अर्चना करता है...15 जनवरी के सूर्य ग्रहण से पहले जो सूर्य ग्रहण पड़ा था उस दिन पुजारी और कुछ स्थानीय नागरिकों ने फोटोग्राफर का इंतज़ाम किया था...कोबरा के लिए दूध भी रखा गया था...लेकिन उस दिन कोबरा प्रकट नहीं हुआ था....

इस बार कोबरा पर नज़र पड़ते ही पुजारी ने गांव में रहने वाले फोटोग्राफर थेनेप्पन को बुलवा लिया...गांव के कुछ और लोगों ने भी ये नज़ारा अपनी आंखों से देखा...जिस अग्रहारम गांव की ये घटना है वहां पीढ़ियों से लड़कों के नाम नागलिंगम या नागराज रखने की परंपरा चली आ रही है...






























आपने फोटो देख लिए...

अब मेरे आप सबसे से चंद सवाल...



क्या ये वाकई चमत्कार है...


क्या ये फोटो वास्तविक हैं...यानि इनसे कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है...



जब कोबरा पिछली बार फोटोग्राफर के वहां रहने पर प्रकट नहीं हुआ तो इस बार भी फोटोग्राफर के वहां पहुचने पर चला क्यों नहीं गया...



तमिलनाडु में कहीं ये खबर अंधविश्वास की अति की प्रवृत्ति के चलते अखबार ने अपना सर्कुलेशन बढ़ाने की गरज से तो नहीं छापी...

बहरहाल, जो भी है, मुझे ई-मेल से ये फोटो-फीचर मिला तो आप के साथ बांटने की इच्छा हुई...अब आप विश्वास रखते हों या इसे अंधविश्वास मानते हो, आप अपने मत के लिए स्वतंत्र हैं...मेरा अनुरोध बस यही है कि इस पोस्ट को बस दिलचस्प ख़बर की तरह लीजिएगा...


इस पोस्ट पर भाई शरद कोकास की राय विशेष तौर पर जानना चाहूंगा...

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

मेरा धर्म, मेरी पूजा...खुशदीप

इबादत नहीं है माला घुमा देना,
इबादत है रोते को हंसा देना...






स्लॉग ओवर

दो दिन पहले नाइस वाली पोस्ट पर मैंने आपको मक्खन की अंग्रेज़ी से रू-ब-रू कराया था...लेकिन आज आपको ऐसा ही एक बिल्कुल सच्चा वाकया सुनाता हूं...मेरठ में हमारी दुकान पर एक सेल्समैन था...जनाब को बात-बात पर अंग्रेज़ी झाड़ने का बड़ा शौक ..कुछ शब्द सुन-सुन कर सीख लिए थे बस उन्हीं को इस्तेमाल करता रहता था...जैसे फर्स्ट क्लास मतलब बढ़िया, थर्ड क्लास मतलब घटिया...अब अंग्रेज़ी के किसी प्रचलित शब्द का ठीक मतलब आए या न आए. अंदाज़े से बातचीत में फिट करना ज़रूर उसका शगल बन गया था...एक बार मेरे से वही सेल्समैन बतिया रहा था...दो दिन पहले ही वो पत्नी के साथ अपनी साली के घर होकर आया था...अब पता नहीं उसे साढ़ू भाई से क्या खुंदक थी...हां साली के बारे में उसके बड़े अच्छे विचार थे...मुझसे बोला...भाईसाहब, आपको क्या बताऊं, मेरा साढ़ू तो एकदम नॉनसेंस है, न बात करने की तमीज, न उठने-बैठने का सलीका...लेकिन मेरी साली...अब क्या बताऊ उसके बारे में...बस ये समझ लीजिए बिल्कुल चीप एंड बेस्ट...





इन महाशय ने सुन-सुन कर राय बना ली थी कि सबसे अच्छा मतलब चीप एंड बेस्ट...

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

दुनिया पर छा जाना है, इसे पढ़िए...खुशदीप

एक जर्मन नागरिक ऐसे मंदिर में गया जहां निर्माण कार्य अभी चल रहा था...वहां उसने देखा कि एक मूर्तिकार बड़ी तन्मयता से भगवान की मूर्ति को अंतिम रूप देने में लगा है...वहीं साथ में ही उसी भगवान की हू-ब-हू एक मूर्ति और रखी थी...जर्मन थोड़ा हैरान हुआ...आखिर उससे अपने को रोका नहीं गया और उसने मूर्तिकार से पूछ ही लिया...क्या मंदिर में एक ही भगवान की दो मूर्तियों की आवश्यकता है...


ये सुनकर मूर्तिकार काम में लगे लगे ही मुस्कुराया...बोला...नहीं बिल्कुल नहीं...एक मंदिर में एक भगवान की एक ही मूर्ति होती है...लेकिन पहले मैंने जो मूर्ति बनाई, वो मुझसे क्षतिग्रस्त हो गई...



जर्मन ने साथ रखी मूर्ति को बड़े गौर से देखा...कहीं क्षतिग्रस्त होने जैसी कोई बात नज़र नहीं आ रही थी...जर्मन ने कहा... मूर्ति तो बिल्कुल सही सलामत नज़र आ रही है...

मूर्तिकार ने काम में ही मगन रहते हुए कहा...मूर्ति की नाक गौर से देखोगे तो वहां बाल जैसी दरार नज़र आएगी...

बड़ी मुश्किल से जर्मन को वो दरार दिखी...

जर्मन ने फिर पूछा... इस मूर्ति को मंदिर में लगाया कहां जाएगा...

मूर्तिकार....बीस फीट ऊंचे स्तंभ पर...

जर्मन....अगर मूर्ति को इतनी ऊंचाई पर लगाना है तो किसे पता चलेगा कि मूर्ति की नाक पर बाल के बराबर छोटी सी दरार है...

मूर्तिकार ने पहली बार नज़र उठाकर जर्मन को देखा और बोला...सिर्फ़ दो को ये पता होगा...मुझे और मेरे भगवान को...


स्लॉग चिंतन

अगर आप अपने काम में माहिर बनने की ठान लें तो ये इस पर कतई निर्भर नहीं करता कि कोई आप की तारीफ़ करता है या नहीं...


किसी काम को साधने की कला आपको अपने अंदर से ही मिलेगी...किसी बाहर वाले की बातों से वो न बढ़ेगी, न घटेगी..


उत्तमता वो गुण नहीं जो दूसरों के नोटिस करने से निखरे...ये खुद पर भरोसे और तसल्ली की बात है...

इसलिए कड़ा परिश्रम करो और अपने-अपने कार्य-क्षेत्र में छा जाओ...

(ई-मेल से अनुवाद)

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

यही है NICE च्वायस बाबा...खुशदीप

आप कहेंगे कि ये तो सुना था कि यही है राइट च्वायस बेबी...लेकिन ये क्या...यही है NICE च्वायस बाबा...क्यों सिर्फ पेप्सी के लिए ही कह सकते हैं कि यही है राइट च्वायस बेबी...पेप्सी तो पराए घर की है...और क्या उसने पेटेंट कराया हुआ है...नहीं भैया पेटेंट तो किसी और ने कराया है...और वो है खालिस भारतीय सिद्धपुरुष...दिल थाम कर बैठिए, सुनने के लिए कि किसने पेटेंट कराया है और क्यों पेटेंट कराया है...ये हैं अपने नाइस (NICE) बाबा...

ये बाबा सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठे हुए हैं...दुख-सुख, जीवन-मरण...ये सभी को निर्विकार भाव से लेते हैं...न सावन हरे, न भादो सूखे...लेकिन इनके अविष्कार किए हुए एक मंत्र NICE का संसार के तुच्छ प्राणी इतना अमानवीय प्रयोग कर रहे हैं कि बाबा का क्रोध से त्रिनेत्र खुल गया है....बस किसी भी घड़ी NICE बाबा का तांडव शुरू हो सकता है..

.ऐसा नहीं कि NICE बाबा को आधुनिक नियम-क़ानूनों का पता न हो...बाबा ने रात-रात जाग कर और अमेरिकी वकीलों से सलाह लेकर अपने मंत्र NICE को पेटेंट करा लिया...इसलिए पहले ही आगाह कर देता हूं कि अगर कोई सज्जन इस पोस्ट पर अब तक NICE कमेंट करने की सोच रहा है तो अंजाम भुगतने के लिए खुद ही ज़िम्मेदार होगा...इधर आपने NICE लिखा नहीं कि ऑटोमेटेड तकनीक से आपका नाम अमेरिका के पेटेंट डिपार्टमेंट के पास पहुंच जाएगा...फिर आपको पहले अफगानिस्तान-पाकिस्तान की सीमा पर स्थित पहाड़ियों की किसी कंदरा में पहुंचाया जाएगा...और ऊपर से ड्रोन आप पर अचूक निशाना लगाने के लिए आकाश में विचरण करते रहेंगे...अब बताइए कभी लिखेंगे किसी को कमेंट में NICE, VERY NICE...लेंगे NICE बाबा से पंगा...





स्लॉग ओवर

कभी अंग्रेजी में हाथ तंग होना वरदान भी साबित हो सकता है...एक बार मक्खन अपने परम सखा ढक्कन के साथ विदेश घूमने गया...अब मक्खन ने विदेश में भी खाली सड़क के किनारे वही काम कर दिया जो हमारे देश में सुसु कुमार कहीं भी करने से नहीं घबराते...सड़क को ओपन टायलेट समझने वाले मक्खन पर एक सार्जेंट की नज़र पढ़ गई...सार्जेंट ने मक्खन के पास आकर जमकर अंग्रेजी में हड़काना शुरू किया...मक्खन को कुछ समझ आया नहीं...लेकिन मक्खन के दिमाग की बत्ती जली और उसने पलटवार किया...BABA BABA BLACK SHEEP, HAVE YOU ANY WOOL..सार्जेंट को मक्खन के भोलेपन पर तरस आ गया और उसने चेतावनी देने के साथ मक्खन को छोड़ दिया...ढक्कन दूर से ये नज़ारा देख रहा था....सार्जेंट के जाने के बाद ढक्कन दौड़ा आया और मक्खन को शाबाशी देते हुए बोला...यार तेरा तो बड़ा जलवा है...तूने तो अंग्रेजी में सार्जेंट की छुट्टी कर दी...चुपचाप चला गया...मक्खन सीना फुलाते हुए बोला...अभी तो सिर्फ BABA BABA ही सुनाई थी...सोच अगर TO, THE PRINCIPAL, I BEG TO SAY...पूरी सुना देता तो उसका क्या हाल होता...

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

ज़िंदगी चाहिए या बेडरूम...खुशदीप

शीर्षक पढ़ कर चौंकिए मत...ये भी मत कहिएगा मुझे हवा लग गई है या लटके-झटके आ गए हैं...मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि ये वाली पोस्ट पहले पढ़ लीजिए...अगर फिर कोई आपको इससे अच्छा शीर्षक सूझे तो मुझे बताइएगा ज़रूर...खास तौर पर घर से दूर या विदेश में रहने वाले या विदेश जाने की चाहत रखने वाले इस कहानी को ज़रूर पढ़े...ये कहानी भी अंग्रेज़ी में मुझे ई-मेल से मिली है...मैंने इसका अनुवाद किया है...



जैसा कि हर माता-पिता का सपना होता है, मैंने सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की डिग्री अच्छे नंबरों से हासिल कर ली...प्लेसमेंट टेस्ट के बाद अमेरिका की एक बड़ी कंपनी में मुझे नौकरी भी मिल गई...अमेरिका...अवसरों की ज़मीन...जैसे ही मैंने अमेरिका की धरती पर पांव रखा, मेरे पंख निकल आए...सबसे बड़ा अरमान जो सच्चा हो गया था...लेकिन साथ ही देश की मिट्टी छूटने की कसक भी थी...लेकिन मैंने सोच लिया था कि बस पांच साल अमेरिका रहूंगा...इतनी देर में अच्छा खासा पैसा जुटा लूंगा और अपने देश में ही सम्मान के साथ ज़िंदगी जीने के लिए लौट जाऊंगा...



मेरे पिता सरकारी कर्मचारी थे...इतने सालों की नौकरी के बाद भी वो बस एक चीज़ ही बना पाए थे, जिसे वो फख्र के साथ अपना कह सकते थे...वो था सुंदर सा वन बेडरूम फ्लेट...मैं अपने पिता के लिए इससे कुछ ज़्यादा करना चाहता था...धीरे धीरे अमेरिका में समय गुज़रता गया...घर की याद रह रह कर सताने लगी...हर हफ्ते मैं माता-पिता से सस्ते इंटरनेशनल कार्ड के ज़रिए भारत बात किया करता था...इसी तरह दो साल बीत गए...दो साल मैक़्डॉनल्ड के पिज्जा और बर्गर के...कभी कभार दोस्तों के साथ डिस्को जाने के...फॉरेन एक्सचेंज रेट देखते रहने के...जब भी रुपया लुढ़कता, खुश हो जाता बगैर कुछ किए मेरी जमा राशि बढ़ गई है...


आखिरकार मैंने शादी का फैसला कर लिया...अपने माता-पिता से कहा कि मुझे सिर्फ दस दिन की छुट्टी मिल रही है...इन्हीं दस दिनों में सब इंतज़ाम करना है...मैंने छांटकर सबसे सस्ती फ्लाईट से भारत का टिकट बुक कराया...भारत पहुंच कर छह दिन लड़कियों के फोटो देखने में ही बीत गए...छुट्टियां खत्म होती जा रही थी...जो फोटो और रिश्ता मौजूद विकल्पों में सबसे बेहतर लगा, उसी को चुन लिया...ससुराल वाले भी मेरा रिश्ता हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे, इसलिए एक-दो दिन में ही शादी का सारा इंतज़ाम करा दिया...अपने माता-पिता को कुछ पैसे देकर और पड़ोसियों से उनका ख्याल रखने को कह कर मैं और मेरी पत्नी अमेरिका आ गए...


पत्नी का घर और अपने शहर से बहुत लगाव था...दो महीने तक तो उसे चेंज अच्छा लगा...लेकिन फिर उसे घर और घरवालों की याद सताने लगी...खास तौर पर उस वक्त जब मैं काम पर जाता और वो घर पर अकेली रहती...अब वो हफ्ते में एक बार की जगह दो, कभी-कभार तीन बार भारत बात करने लगी...मेरा पैसा भी पहले के मुकाबले कहीं तेज़ी से खर्च होने लगा...


दो साल और बीत गए...इस बीच ऊपर वाले ने हमें दो सुंदर बच्चों की सौगात भी बख्श दी...बेटा और बिटिया...जब भी मैं अब भारत माता-पिता से बात करता वो एक ही हसरत जताते...जीते जी पोते और पोती के चेहरे देखने की...हर साल मैं भारत जाने की सोचता...कभी काम की मजबूरी और कभी परिवार बड़ा हो जाने की वजह से पैसे की अड़चन...हर साल भारत जाना अगले साल के लिए टल जाता...फिर एक दिन संदेश आया कि मेरे माता-पिता बीमार है...नौकरी जाने के डर से मैं अपनी कंपनी से छुट्टी मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पाया...फिर एक हफ्ते में ही दो मनहूस संदेश मिले...पहले पिता और फिर मां, दुनिया छोड़ कर चले गए...कुछ करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों ने ही माता-पिता का अंतिम संस्कार कराया...मैं दिल पर पहाड़ जैसा महसूस करने लगा कि मेरे माता-पिता पोते-पोती का मुंह देखने की हसरत लिए ही दुनिया से चले गए...


कुछ और साल बीते...मैंने भारत जाकर ही बसने का फैसला किया...लेकिन दोनों बच्चों को ये फैसला कतई पसंद नहीं था...हां पत्नी भारत लौटने की सोचकर बहुत खुश थी...आखिरकार हम संभावनाएं तलाशने के लिए भारत पहुंच गए...लेकिन मैं ये देखकर दंग था कि नोएडा जैसे शहर में भी प्रॉपर्टी की कीमत आसमान छू रही थी...मेरे पास जो पैसा जमा था, वो इतना नहीं था कि कोई अच्छा मकान खरीद लूं और साथ ही भविष्य की ज़रूरतों के लिए रकम बचा कर रख लूं...लेकिन पत्नी ने तो ठान ही लिया था अमेरिका नहीं लौटना...मेरे दोनों बच्चे भारत में रहने को तैयार नहीं...फिर एक रास्ता निकाला, मैं और दोनों बच्चे अमेरिका वापस आ गए...पत्नी से ये वादा करके कि मैं दो साल में भारत हमेशा रहने के लिए आ जाऊंगा...फिर साल बीतते गए...दो साल का वादा पूरा नहीं हो सका...मेरी बिटिया ने एक अमेरिकी के साथ शादी कर ली...मेरा बेटा भी अमेरिका में अपनी ही दुनिया में मस्त था....लेकिन एक दिन मैंने सोच लिया...बस बहुत हो गया...अब और नहीं...मैं पत्नी के पास भारत आ गया...मेरे पास अब इतना पैसा भी था कि नोएडा के किसी अच्छे सेक्टर में दो बेडरूम वाला फ्लैट खरीद सकूं...


अब मैं साठ साल से ऊपर का हूं...नोएडा में अपने फ्लैट में अकेला रह रहा हूं...पत्नी कुछ महीने पहले ही दुनिया को अलविदा कह गई है...घर से बाहर तभी निकलता हूं जब साथ वाले मंदिर में जाना होता है...मंदिर में भी दो-तीन घंटे अकेले बैठे शून्य में ताकता रहता हूं...सोचता हुआ कि मैं जो पूरी जवानी भागता रहा, क्या उसकी कोई सार्थकता थी...मेरे पिता ने मामूली सरकारी नौकरी के बावजूद भारत में रहते हुए ही वन बेडरूम सेट बनाया था...मेरे पास भी अब एक फ्लैट के अलावा और कुछ नहीं है...मैंने अपने माता-पिता, पत्नी को खो दिया...बच्चे खुद ही मुझसे जुदा हो गए...किस लिए सिर्फ एक अतिरिक्त बेडरूम के लिए...

फ्लैट वापस आ गया हूं...खिड़की से देख रहा हूं...बाहर पार्क में वेलेन्टाइन्स डे पर कुछ लड़के-लड़कियां फुल वोल्यूम पर गाने लगाकर डांस कर रहे हैं...बिना कोई संकोच या बड़े-बूढ़ों की फिक्र किए...ये सेटेलाइट टीवी की वजह से हमारी युवा पीढ़ी भारतीय मूल्यों और संस्कारों को खोती जा रही है...चलो इस माहौल में भी मेरा बेटा और बिटिया कभी-कभार अमेरिका से कार्ड डालकर या फोन से मेरा हाल-चाल तो पूछ लेते हैं...इतनी भारतीयता तो है उनमें अब भी....किसी दिन मैं भी माता-पिता की तरह मरूंगा तो शायद पड़ोसी ही मेरा अंतिम संस्कार करेंगे...भगवान उनका भला करे...लेकिन सवाल फिर वही क्या मैंने जो इतना सब कुछ खोया वो एक बस एक अतिरिक्त बेडरूम के लिए...


स्लॉग चिंतन

आप भी मनन कीजिए...जीवन एक अतिरिक्त बेडरूम से कहीं बड़ा है...जीवन को ऐसे ही मत गंवाइए, इसे जीना सीखिए..वैसे ही जिएं जैसे कि आपका दिल चाहता है...


स्लॉग गीत


ये गीत मैंने पहली बार छोटे भाई दीपक मशाल की पोस्ट पर सुना था...मेरे कहने पर एक बार इसे सुन ज़रूर लीजिए...

वक्त का ये परिंदा रुका है कहां,
मैं था पागल जो इसको बुलाता रहा...
चार पैसे कमाने मैं आया शहर,
गांव मेरा मुझे याद आता रहा...

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

किसी का सम्मान हो गया है...खुशदीप


समारोह में किसी का सम्मान हो गया है,


क्या आदमी वाकई इनसान हो गया है...




सिर पर पत्थर उठाता है बबुआ,


क्या बचपन सच में जवान हो गया है...


क्या आदमी वाकई इनसान हो गया है...




बूढ़े बाप का ख़ून जलाता है बेटा,


क्या सही में लायक संतान हो गया है...


क्या आदमी वाकई इनसान हो गया है...






नारी है आज इस देश की राष्ट्रपति,


क्या चंपा का घर में बंद अपमान हो गया है...


क्या आदमी वाकई इनसान हो गया है...






आज़मगढ़ में पंचर लगाता है जमाल,


क्या किस्मत का शाहरुख़ ख़ान हो गया है....


क्या आदमी वाकई इनसान हो गया है...






समारोह में किसी का सम्मान हो गया है...


 
जमाल,क्या किस्मत का शाहरुख़ ख़ान हो गया है....




मौन...खुशदीप

क्या आप आंख से टपके इस कतरे की ज़ुबान समझते हैं...


आप के प्यार ने मुझे हमेशा के लिए खरीद लिया है...







शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

सम्मान नहीं, मेरे लिए आपका प्यार ही सब कुछ...खुशदीप

काम से आकर बैठा हूं...लैपटॉप खोला...आदत के मुताबिक सबसे पहले अपनी पोस्ट पर टिप्पणियों पर नज़र डाली...एक टिप्पणी भाई ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ की थी...
खुशदीप जी, आपको सूचित करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि आपको संवाद सम्मान-नामित श्रेणी के लिए चुना गया है...आपका मेल आई डी उपलब्ध न होने के कारण अभी तक आपको ई प्रमाण पत्र वगैरह नहीं भेजा जा सका है...कृपया मुझे zakirlko@gmail.com पर मेल करने का कष्ट करें, जिससे अग्रेतर कार्यवाही की जा सकें...

पहले तो विश्वास नहीं हुआ कि मैंने ऐसा कौन सा तीर मार दिया है कि सम्मान के लिए चुना गया हूं...कौतुहलवश जाकिर भाई ने जो लिंक दे रखा था, उस पर क्लिक कर दिया...इसे पढ़ कर पता चला कि सलीम ख़ान भाई को नवोदित ब्लॉगर सम्मान और मुझे नवोदित ब्लॉगर नामित सम्मान के लिए चुना गया है...ज़ाकिर भाई के अनुसार संवाद सम्मान 2009 के अन्तर्गत सिर्फ उन्हीं नामों पर विचार किया गया, जो नामांकन के द्वारा प्राप्त हुए थे। वे नाम रहे- सर्वश्री/सुश्री आदर्श राठौर, नवीन प्रकाश, नीर, रंजू राठौर, प्रवीण त्रिवेदी, मिथिलेश दुबे, मोहम्मद कासिम, महफूज अली, खुशदीप सहगल, चंदन कुमार झा, सलीम खान, रमेश उपाध्याय, गिरिजेश राव, अदा, वाणी शर्मा, सुशीला पुरी...

ज़ाकिर भाई का कहना है कि इन सारे नामों पर गौर करने और ब्लॉगर से जुड़े विभिन्न पक्षों पर विचार करने के बार जो दो नाम सामने आए, वे थे सलीम खान और मेरा... मेरे बारे में ज़ाकिर भाई का कहना था कि मुझे ब्लॉगिंग में बहुत अधिक समय नहीं हुआ है, फिर भी मैं अपनी लेखनी और ब्लॉग प्रबंधन के कारण सदैव चर्चा में रहता हूं और अपनी लगभग हर पोस्ट को हिट करवा ले जाता हूं...ज़ाकिर भाई आपने मुझे इतना अच्छा कमेंट दिया, इसके लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया..

जहां तक सम्मान पर मेरे खुद के नज़रिए की बात है, वो मैं पोस्ट में आगे स्पष्ट करूंगा...पहली बात तो ज़ाकिर भाई, मैं जानता हूं कि आपने संवाद सम्मान के लिए बहुत अधिक मेहनत की है...इसलिए आपने जो भी प्रक्रिया अपनाई होगी, काफी सोच-समझ कर अपनाई होगी...मुझे नहीं पता कि जब आपके पास इस श्रेणी विशेष के लिए 16 लोगों के नामांकन आए तो आपने उनमें से दो नाम छांटने के लिए कौन सा मानदंड अपनाया या कौन सी जूरी का सहारा लिया...सलीम भाई के बारे में ज़ाकिर भाई ने ज़रूर लिखा है कि उनकी समझ से 'नवोदित ब्लॉगर' सम्मान के वे सबसे योग्य उत्तराधिकारी हैं...

ज़ाकिर भाई अब यहां सवाल उठता है कि आपने सलीम भाई के साथ मेरा नाम भी अंतिम दो के लिए अपनी समझ से चुना या मतदान या जूरी जैसी कोई प्रक्रिया अपनाई थी...अगर आपने सिर्फ अपनी समझ से 16  में दो नाम छांटे हैं तो निश्चित रूप से आपने संवाद सम्मान पर सवाल उठाए जाने को मौका दे दिया...टिप्पणियों के ज़रिए आपको ये स्पष्ट भी होने लगा होगा...मुझे सब ने बधाई दी, इसके लिए मैं सभी का शुक्रगुज़ार हूं...अदा जी और मेरे अनुज मिथिलेश दूबे ने मेरे लिए जो विचार व्यक्त किए, उन्हें जानकर मैं अभिभूत हूं...लेकिन उन्होंने सलीम भाई को सम्मान दिए जाने पर सवाल भी उठाया है...एक टिप्पणी अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी भाई की भी है...काफी लंबी चौड़ी टिप्पणी की है...लेकिन एक सवाल अमरेंद्र जी ने सीधा मुझसे किया है....वो ये है...

अब अंतिम बात खुशदीप जी से , क्या आप इस पुरस्कार को सलीम खान के साथ स्वीकारने जा रहे हैं ? यदि स्वाभिमान आपको इसकी इजाजत देता है तो मेरी तरफ से भी बधाई ले लीजिये !

अमरेंद्र भाई, आप शायद भूल गए कि सम्मान को लेकर अलबेला खत्री जी ने जब ब्लॉगर सम्मान समारोह की एक कैटेगरी में मेरा नाम नामितों की सूची में शामिल किया था तो मैंने क्या रुख अपनाया था...व्यस्तता के चलते आपको उस प्रकरण का पता न हो तो मैं यहां फिर से अपनी उस पोस्ट का लिंक दे रहा हूं...मैंने अलबेला जी से आग्रह किया था कि मेरा नाम नामितों की सूची में से हटा दें...मुझे ऐसा महसूस हुआ था कि अलबेला जी बड़ी मेहनत से उस कार्यक्रम को अंजाम दे रहे थे...लेकिन मेरे इस तरह का दृष्टिकोण अपनाने से उनकी भावनाएं ज़रूर आहत हुई थीं...अलबेला जी ने मेरी पोस्ट पढ़ने के बाद ये कहा था कि वो सोच रहे हैं कि ब्लॉगर सम्मान समारोह कराएं भी या नहीं...और अंतत उन्होंने कार्यक्रम अनिश्चितकाल के लिए स्थगित भी कर दिया...अलबेला जी के ये स्टैंड लेने के बाद मिथिलेश दूबे ने मेरी पोस्ट पर आकर छोटे भाई जैसे इन शब्दों के साथ नाराजगी भी जताई थी...

एक बार फिर ब्लोगिंग की गुटबाजी साफ दिख रही है , शायद आप लोगो को बुरा लगे... मुझे समझ नहीं आ रहा कि इस पर विवाद क्यो है , मुझे नाम होने पर कम बल्कि नाम ना होने पर ज्यादा विवाद दिख रहा है... जो ये सब आयोजन कर रहा है वह कुछ समझकर कर रहा है , पैसा जिसका काम उसका... आप लोगो को उनका उत्साहवर्धन करना चाहिए पर आप लोग उनपर लांछन लगा कर उनका हौसला पस्त करने की भरपूर कोशिश कर रहे है , जो कि सरासर गलत है... आप को सम्मान नहीं चाहिए मत लीजिए आप लोगो को शायद लग रहा है कि ये पुरस्कार आप लोगो के लायक नहीं है... जहाँ तक मै जानता हूँ कि हर सम्मान अपने आप में बहुत बड़ा होता है , और न लेने का मतलब यह होता है कि आप उसका विरोध कर रहें है या वह आपके लायक नहीं है...


मुझे पता है कि मेरे कुछ और अज़ीजों को भी मेरा उस तरह का स्टैंड पसंद नहीं आया था...

तो अमरेंद्र भाई आपको ये सब बताना इसलिए ज़रूरी था कि मेरा सम्मान को लेकर जो नज़रिया तब था वही नज़रिया अब भी है...एक बात और साफ़ कर दूं कि मैंने न तो अपना नामाकंन ज़ाकिर भाई को किसी श्रेणी के लिए भेजा है और न ही मुझे ये पता है कि मेरे नाम का प्रस्ताव करने वाले कौन लोग हैं...अगर ज़ाकिर भाई अपनी किसी पोस्ट में कहीं ये स्पष्ट कर देते कि मेरा नाम भी नामितों की सूची में है तो मैं पहले ही ज़ाकिर भाई से अनुरोध कर अपने नाम को हटवा देता...ठीक वैसे ही जैसे मैंने अलबेला खत्री जी से किया था...

मैंने ब्लॉगिंग में आने के बाद जो कमाया है वही मेरे लिए सबसे बड़ी पूंजी है...ये पूंजी है बड़ों का आशीर्वाद, हमउम्र साथियों का भरोसा और छोटों का प्यार...यही मेरे लिए सम्मान, हौसला, प्रेरणा सब कुछ है...लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं कि मैं ज़ाकिर भाई की अथक मेहनत को कम करके आंक रहा हूं...लेकिन मैं अपने उसूलों की वजह से ये सम्मान स्वीकार नहीं कर सकता...ज़ाकिर भाई ये कह कर मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता था..पर करना पड़ रहा है....आपको एक बात का भरोसा ज़रूर दिलाता हूं कि मैने जिस तरह अलबेला जी को मना किया था ऐसे ही आगे भी भूल से कभी मेरा नाम इस तरह किसी सम्मान के लिए लाया जाता है तो मैं उसे स्वीकारने में विनम्रता से असमर्थता जता दूंगा...ज़ाकिर भाई पर अगर इस तरह सब उंगली उठाए तो वो भी सही नहीं है...

रही बात सलीम भाई की...निश्चित रूप से उनकी पहले की शैली और अब की शैली में परिवर्तन आया है...और अगर इस तरह के सम्मान से वो और अच्छा लिखने को प्रेरित होते हैं तो ये हमारे ब्लॉगवुड के लिए बड़ी सुखद बात है...लेकिन अगर सलीम हताश होकर फिर पुरानी राह पर लौट जाते हैं तो उससे ज़्यादा दुखद बात और कोई नहीं होगी....इसलिए बड़ी मुश्किल से ब्लॉग जगत में सौहार्द का माहौल बन रहा है...इसलिए सभी को थोड़ी उदारता से काम लेना चाहिए...ये सम्मान सम्मान के चक्कर में आपस में कटुता के बीज नहीं डलने देने चाहिएं...मुझे सच में दिल से बड़ी खुशी होती कि मेरी जगह ज़ाकिर भाई अगर महफूज़ अली या मिथिलेश दूबे या किसी और ऊर्जावान युवा साथी को सम्मान के लिए चुनते...

हां, अमरेंद्र भाई...आपसे एक छोटी सी शिकायत है, इसे अन्यथा मत लीजिएगा....आपने इस पोस्ट पर जो लोग टिप्पणी करने आए, एक तरह से उन सभी को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है...अगर इस तरह का ही दृष्टिकोण अपनाया जाता रहा तो ब्लॉगर भाई कहीं टिप्पणी करने से पहले भी अब सौ बार सोचा करेंगे...ये कतई हिंदी ब्लॉगिंग के प्रचार-प्रसार के लिए सही नहीं होगा...उम्मीद करता हूं कि मेरा नज़रिया सभी के सामने साफ़ हो गया होगा...फिर भी कहीं कोई आशंका है तो मैं उसका हर घड़ी जवाब देने के लिए तैयार हूं...यहां एक बात और न जाने क्यों याद आ रही है...पाप से घृणा करो, पापी से नहीं...

ज़ाकिर भाई आपसे एक अनुरोध और...आपने संवाद सम्मान के लिए स्पांसर ढूंढ रखा है...आपने अभी अनिल पुसदकर भाई की एक पोस्ट पढ़ी होगी जिसमें उन्होंने एमए में पढ़ रही एक लड़की पर कैसी घोर विपदा आ गई है, का ज़िक्र किया है...अगर उसकी स्पांसर से कुछ मदद करा दे तो उस बेचारी की तकलीफ कुछ कम हो सकेंगी...वैसे आप जो 1001 रुपये नकद का जो सम्मान दे रहे हैं, मैं जानता हूं इसे जीतने वाले सभी ब्लॉगर भाई खुशी खुशी किसी दुखियारी की मदद के लिए दान कर देंगे...ये मेरी सिर्फ एक सलाह है...इसमें और कोई निहितार्थ नहीं है...चलिए काफी कुछ लिख लिया...अब स्लॉग ओवर से थोड़ा माहौल हल्का कर दिया जाए...



स्लॉग ओवर

जॉन अब्राहम और बिपाशा बसु की शादी हो गई (मान लीजिए)....

दोनों को सुपुत्र की प्राप्ति हुई...

लेकिन ये क्या जूनियर जॉन महाराज तवे की तरह काले निकले...

जॉन ने बिपाशा से कहा...मैं गोरा, तुम सांवली...फिर ये क्यों इतना काला....

बिपाशा का जवाब था...मैं हॉट, तुम हॉट...जल गया लाला...

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

सरकार अब मौन है...खुशदीप

चलिए सरकार की दुकान...

क्या खरीदना है...पेट के लिए रोटी, हाथ के लिए रोज़गार, सिर के लिए छत...



सरकार की दुकान से जवाब मिलेगा....ये तो नहीं है...सपने हैं वो ले लो...सिनेमा है वो ले लो...माई नेम इज़ ख़ान है, वो ले लो, मल्टीप्लेक्स ले लो, ब्लू टूथ वाले एक से बढ़ कर एक मोबाइल ले लो...चमचमाती कारें ले लो...

आप कहेंगे कि न जी न इनकी भला हमारी औकात कहां...हमें रोटी न सही सिक्योरिटी दे दो...

सरकार कहेगी...मज़ाक करते हो, शर्म नहीं आती...तुम्हे सिक्योरिटी की क्या ज़रूरत...आम आदमी तो फैंटम होता है...निहत्था मैदान में खड़ा रहता है...ललकारता हुआ सरहद पार के कसाबों को, बोट से बैठ कर आओ बेरोकटोक...चलाओ जितनी चाहे गोलियां...आम आदमी फीनिक्स है...फिर खड़ा हो जाएगा अपनी राख़ से धूल झाड़ता हुआ...

लेकिन ये बेचारे मंत्री, नेता, अभिनेता...असली बकरी तो ये हैं...फाइव स्टार सुविधाओं वाले घरों में रहते हैं...बेचारे आसमान में उड़ते रहते हैं...ज़मीन पर तो कभी-कभार ही पैर धरते हैं...सिक्योरिटी इन्हें दें या अपने अंदर  सुपरमैन लिए आम आदमी तुझे....


ए रे आम आदमी...तू क्यों अपने से इतना मोह करता है...रोटी तुझे मिलेगी नहीं...तुझे तो मरना ही है...भूख से मर या कसाब की गोली से...फिर काहे ये नवाबों जैसे नखरे दिखाता है...सिक्योरिटी-सिक्योरिटी चिल्लाता है...खामख्वाह हमसे भी झूठ बुलवाता है...रावणराज में रामराज की बात कराता है...

जनता का स्पीकर ऑन है...


लेकिन सरकार अब मौन है...




स्लॉग ओवर

हमारे ख़िलाफ़ सक्रिय शक्तियां कभी भी हमारे अंदर की शक्ति से बड़ी नहीं हो सकतीं..


ऊपर वाले पर भरोसा रखिए...


वो ऐसी किसी शक्ति को हमारे सामने नहीं भेजेगा जिसका कि हम सामना न कर सकें...

लेकिन पत्नी के सामने ऊपर वाला भी मदद करने में हाथ खड़े कर देता है...


जय पत्नी शक्ति...

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

शेर मारना कितना आसान...खुशदीप

एक दिन मैंने आपको शेर सिंह (ललित शर्मा) जी के डैन में घुसकर वहां का आंखों देखा हाल सुनाया था...अपने इन शेर सिंह जी की तो मूछें ही इतनी गज़ब हैं कि कोई भी देखे तो थर्र-थर्र कांपने लगे...खैर इन शेर सिंह जी से तो कोई पार नहीं पा सकता...हां, अगर असली के शेर को पकड़ना चाहते हैं तो उसके एक से बढ़कर एक नायाब नुस्खे हैं मेरे पास...जानना चाहते हैं तो देर किस बात की...लीजिए आजमाइए...





1. न्यूटन स्टाइल...

शेर को खुद को पकड़ने दीजिए...


हर क्रिया की बराबर विपरीत प्रतिक्रिया होती है...


शेर आपकी पकड़ में आ जाएगा...



2. आइंस्टीन स्टाइल...

शेर से उल्टी दिशा में दौड़ना शुरू कीजिए...


अधिक सापेक्ष गति (रिलेटिव वेलोसिटी) की वजह से शेर को तेज़ दौड़ना पड़ेगा, शेर जल्दी थक जाएगा...


अब आप उस पर आसानी से काबू पा सकते हैं...



3. भारतीय पुलिस स्टाइल...

किसी भी जानवर को पकड़ कर रात भर लॉकअप में रखो...

सुबह वो खुद मान लेगा, वही शेर है...





4. रजनीकांत स्टाइल...

कभी चश्मा उछालो, कभी सिगरेट, कभी गोली चलाकर कारतूस को पकड़ कर दो टुकड़े कर दो, साथ ही
धमकियां देते रहो, आ रहा हूं मैं...

शेर को डर-डर कर जीना पड़ेगा, और एक दिन ऐसे ही डरते हुए मर जाएगा...



5. जयललिता स्टाइल...

रात दो बजे पुलिस कमिश्नर को शेर के घर भेजो...नींद में ही उड़ा दो...



6. आर्ट फिल्म डायरेक्टर स्टाइल...

सुनिश्चित करिए कि शेर सूरज की रौशनी से दूर रहते हुए अंधेरे कमरे में सिर्फ मोमबत्ती के धीमे प्रकाश में जिए...उसके कानों में हमेशा कुछ न कुछ बुदबुदाते रहो...


शेर इतना पक जाएगा कि खुद ही सुसाइड कर लेगा...



7. करन जौहर स्टाइल

शेरनी को जंगल में शेर के पास भेज दो...


दोनों में प्यार हो जाएगा...


एक शेरनी और भेजो...उसके पीछे एक और शेर...


पहले शेर को पहली शेरनी से और दूसरे शेर को दूसरी शेरनी से प्यार है...


लेकिन दूसरी शेरनी को दोनों शेरों से प्यार है...


अब एक तीसरी शेरनी को जंगल में भेज दो...


अब तक आप सिर खुझाते हुए कुछ नहीं समझ पा रहे होंगे...कोई बात नहीं...अब इसे 15 साल बाद पढ़िएगा...


फिर भी कुछ नहीं समझ पाएंगे...




8. गोविंदा स्टाइल...

शेर के सामने पांच-छह दिन लगातार डांस करो...


शेर खुद ही गश खाकर मर जाएगा



9. मेनका गांधी स्टाइल...

किसी शेर को ख़तरे से बचाओ...अपने घर ले जाओ और उसे लगातार मूली, शलजम जैसी हरी सब्जियां खिलाओ...


शेर थोड़े दिन में खुद ही भूख से दम तोड़ देगा...



10. राहुल द्रविड़ स्टाइल...

शेर से कहो कि वो आपको बोलिंग करे...


शेर 200 बोल फेंक लेगा, आपका स्कोर होगा 1 रन...


शेर बोलिंग क्रीज पर ही स्लो मोशन में गिरेगा और हमेशा के लिए आंखें बंद कर लेगा...




कोई भी तरीका अपनाइए, मोक्ष गारंटीड है...

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

दिल्ली में ब्लॉगर-ए-बहारा, एक लेटलतीफ़ रिपोर्ट...खुशदीप

आदमी सोचता क्या है...लेकिन होता वही है जो मंज़ूर-ए-खुदा होता है...मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ...कल दिल्ली में ब्लॉगर-ए-बहारा महफिल पर मैंने कल शाम साढ़े छह बजे तक ही रिपोर्ट लिख ली थी...लेकिन कल शाम से ही नोएडा में हमारे सेक्टर में ब्रॉडबैंड महाराज ऐसे रूठे कि मेरा बैंड बजा दिया...कल से आज रात तक मैं पोस्ट को देख-देख कर कुढ़ता रहा लेकिन ब्रॉडबैंड वालों को मेरे पर तरस नहीं आया...आज किसी तरह बीएसएनएल वालों को हाथ-पैर जोड़कर मनाया और अब ये रिपोर्ट आपको पेश-ए-नज़र कर रहा हूं...हर बार त्वरित रिपोर्ट देता हूं, इस बार लेटलतीफ रिपोर्ट ही सही...और सब रिपोर्ट पढ़ी, इसे भी पढ़ लीजिए...

ब्लॉगरों के दिलों की महफिल से आकर घर बैठा हूं...पहला काम जो देखा, जो सुना, जो हुआ...आप तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं...कहीं कागज कलम लेकर कुछ नोट नहीं कर रहा था...इसलिए जहां तक यादाश्त काम करेगी, वहां तक आपको बताने की कोशिश करूंगा...फोटो की कमी ज़रूर आपको खलेगी...लेकिन अजय कुमार झा भाई, अविनाश वाचस्पति जी, ड़ॉ टी एस दराल और अन्य उपस्थित ब्लॉगर बंधु जल्द से जल्द आप तक फोटो पहुंचाने की कोशिश करेंगे...


पूर्वी दिल्ली के निर्माण विहार मेट्रो रेलवे स्टेशन के बिल्कुल साथ मौजूद जीजी बैंक्वट हॉल में हुआ आज ये दिलों का मेल...पिछली 15 नवंबर को भी यहा झा जी के अभिनव प्रयास से इसी जगह दिनेश राय द्विवेदी जी, बीएस पाबला जी, इरफ़ान भाई (कार्टूनिस्ट) से मिलने का मौका मिला था...इस बार द्विवेदी जी ने तो पहले ही आने में असमर्थता जता दी थी, जहां तक इरफ़ान भाई का सवाल है उन्हें काका हाथरसी सम्मान मिला है, इसलिए शायद वो व्यस्तता के चलते नहीं आ पाए...खैर पिछली महफिल वालों में से मैं, अजय भाई, राजीव तनेजा, संजू तनेजा, विनीत उत्पल आज भी पहुंचे...

आज की महफिल के दूल्हा (मेहमान-ए-खुसुसी) जर्मनी से आए राज भाटिया जी रहे...महफिल में आए सभी ब्लॉगर राज जी के शुक्रगुज़ार हैं कि उनकी वजह से सबको आपस में भी मिलने का मौका मिल गया...लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा सरप्राइज़ रहा...लंदन से आई कविता वाचक्नवी जी की मौजूदगी....अदब में जितना बड़ा नाम, उतनी ही रूआबदार शख्सीयत...इनके अलावा....

डॉ टी एस दराल जी


अविनाश वाचस्पति जी


एम वर्मा जी


सरवत जमाल जी


पं डी के शर्मा वत्स जी


सतीश सक्सेना जी


मसिजीवी जी


विनीत कुमार


मोइन शम्सी


मिथिलेश दूबे


प्रवीण पथिक


नीशू तिवारी


विनोद कुमार पांडेय


पदम सिंह


अमित गुप्ता (अंतर सोहेल)


नीरज जाट


तारकेश्वर गिरी


प्रतिभा कुशवाहा


कनिष्क कश्यप


मयंक सक्सेना


यशवंत मेहता

जहां तक मैं समझता हूं, सभी के नाम आ गए हैं...फिर भी कोई नाम छूट गया हो या मेरी कमअक्ली की वजह से गलत लिखा गया हो तो माफ कर दीजिएगा...और लगे हाथ कमेंट भेज कर भूल-सुधार भी करा दीजिएगा...हां तो अब शुरुआत से बताता हूं कि आज दिन भर हुआ क्या...

अजय भाई ने ग्यारह बजे से चार बजे तक का टाइम दिया था...सोचा अब तो नोएडा से सीधी मेट्रो जाती है...इसलिए कोई दिक्कत नहीं आएगी...घर के पास नोएडा का सेक्टर 18 स्टेशन सबसे नज़दीक पड़ता है...वहां तक पैदल ही गया और लक्ष्मी नगर स्टेशन का टोकन ले लिया...क्योंकि पता लक्ष्मी नगर डिस्ट्रिक्ट सेंटर का था...इसलिेए सोचा लक्ष्मी नगर स्टेशन ही उतरा जाए...यही मारे गए गुलफ़ाम...वो तो भला हो रास्ते में ही दिमाग की बत्ती जल गई...झा जी को फोन मिला कर पूछ ही लिया कि कौन सा स्टेशन सबसे पास है...झा जी ने बताया निर्माण विहार...बीच के ही एक स्टेशन से दस रूपये का फालतू चूना लगवा कर निर्माण विहार तक का टोकन लिया...निर्माण विहार स्टेशन पहुंच कर जान में जान आई...क्योंकि जी जी बैंक्वट हाल वहां से दो सौ कदम की दूरी पर ही था...पिछली बार का देखा हुआ था, इसलिए झट से पहुंच गया...

वहां पहुंचते-पहुंचते मुझे पौने बारह बज गए थे...लेकिन इस बार ज्यादातर ब्लॉगर टाइम से आ गए थे...राज भाटिया जी को पहली बार देखा, जैसा समझा था बिल्कुल वैसा ही पाया...सच्चे, खरे और मुंह पर ही सब कुछ साफ कह देने वाले...बिना कोई लाग लपेट...उनके साथ ही बैठे थे...अविनाश भाई और कविता जी....कविता जी से मिलना सुखद भी था और अप्रत्याशित भी...कविता जी का मेरे लिए कमेंट था...मैं ब्लॉग वाली फोटो में ज़्यादा यंग लगता हूं...मेरी वो फोटो एक साल पुरानी ही है...लेकिन शायद ब्लॉगिंग के लिए नींद के बलिदान का असर मेरे चेहरे पर दिखने लगा है...कुछ सोचना ही पड़ेगा...खैर छोड़िए मुझे...

वहीं राजीव तनेजा जी उसी गर्मजोशी से मिले जैसे कि हमेशा मिला करते हैं... हां, राजीव जी की बैटर हॉफ यानि संजू तनेजा जी को लेकर मैंने पिछली बार जैसी भूल नहीं की...पहले उन्हें ही अभिवादन किया...अजय भाई पिछली बार की तरह ही इस बार भी कभी फोन, कभी व्यवस्था के लिए निर्देश देने में व्यस्त और मेज का सबसे आखिरी कोना पकड़े बैठे थे...मैंने चुटकी ली...टंकी की तरह क्यों सबसे दूर बैठे हैं...अजय भाई चिरपरिचित ठहाके के साथ गले लगकर मुझसे मिले...चार-पांच चेहरों को छोड़ बाकी सभी से रू-ब-रू होने का मेरे लिए पहला मौका था..लेकिन यहां पिछली बार की तरह पाबला जी और द्विवेदी सर  की कमी भी शिद्दत के साथ महसूस हुई...

एक बात और, महफूज अली जनाब पिछले एक महीने से मुझसे कहते आ रहे थे कि सात तारीख को आप सब से मिलूंगा...लेकिन मौका आया तो हुआ क्या...शताब्दी का रिजर्वेशन कराने के बावजूद आज सुबह टाइम पर उठ नहीं सके और ट्रेन मिस करनी पड़ी...अब जनाब को भी मलाल तो बहुत हुआ लेकिन क्या कर सकते थे...मुझे और अजय भाई को महफूज़ ने सुबह सुबह ही अपने इस कारनामे के बारे में बता दिया था...मैंने कहा भी कि महफूज़ को अब टाइम से उठाने वाली होम मिनिस्टर ले ही आनी चाहिए...किसी ने चुटकी ली...वो आ गई तो फिर महफूज़ मियां रात भर सो ही कहां पाएंगे...पाबला जी और ललित शर्मा भाई के आने की भी मुझे उम्मीद थी...लेकिन वो भी नहीं आ सके...एक और जनाब भी वादा पूरा न कर सके...वो थे बरेली वाले धीरू सिंह जी...पिताश्री की तबीयत नासाज होने की वजह से उन्हें अपना कार्यक्रम रद्द करना पड़ा...मैं मेट्रो पर ही था कि धीरू भाई ने फोन पर न पहुंच सकने की सूचना दे दी थी...

खैर अब मेज पर सब बैठ चुके थे...लेकिन यहां सिटिंग की व्यवस्था कुछ ऐसी थी कि असहजता महसूस हो रही थी...अविनाश भाई ने तत्काल खुले में राउंड सिटिंग अरेंजमेंट करा दिया...इसी बीच डॉ टी एस दराल भी अपने गरिमामयी व्यक्तित्व के साथ आ पहुंचे...दराल सर के हाथों में राज जी के लिए बड़ा प्यारा सा बुके था...फिर धीरे-धीरे जमावड़ा बढ़ता गया...विनोद कुमार पांडेय, विनीत कुमार, एम वर्मा जी, सतीश सक्सेना जी, मिथिलेश दूबे, नीशू तिवारी, मयंक सक्सेना, सब एक एक कर आते गए...लेकिन सबसे पहले विदा लेने वालों में कविता वाचक्नवी जी थीं....उनका दिल्ली में ही अन्यत्र कोई पूर्व निर्धारित कार्यक्रम था...लेकिन जाने से पहले कविता जी भारतीय संस्कारों के बारे में बहुत अच्छी अच्छी बातें बता गईं...उनकी मुझे एक बात और बहुत अच्छी लगी...वो थी हिंदी के प्रसार के लिए सभी ब्लॉगर हिंदी के श्रेष्ठ साहित्यकारों की रचनाओं को ब्लॉग पर लाने की कोशिश करें....कविता जी ने विदाई ली...लेकिन इससे पहले एक और अच्छी बात हुई कि राज भाटिया जी और कविता जी के बीच पहले कभी संवाद (विवाद नहीं) हुआ होगा, उस संदर्भ में दोनों ने बड़े अच्छे और प्रभावशाली ढंग से अपने-अपने रुख को साफ़ किया...
मसिजीवी जी को भी जल्दी जाना था, इसलिए उन्होंने भी विदा मांगी और कविता जी को उनके गंतव्य पर छोड़ने की पेशकश भी कर डाली...

इसके बाद राउंड टेबल पर सभी ने एक-एक कर परिचय देना शुरू किया...डॉ टी एस दराल हैं तो ठेठ देहलवी लेकिन पृष्ठभूमि हरियाणा की है...उन्होंने हरियाणा के एक ताऊ का मजेदार किस्सा भी सुनाया...दराल सर के मुताबिक जब वो एमबीबीएस कर रहे थे तो ताऊ ने उनसे पूछा कौन सी जमात में हो...डॉक्टर साहब ने कहा-एमबीबीएस...इस पर ताऊ ने कहा यो के होवे से...बारहवी से बड़ी होवे या छोटी...डॉक्टर साहब ने किसी तरह बारहवी और एमबीबीएस के पांच साल जोड़कर जमातों का हिसाब बताया...लेकिन ताऊ तब भी मुत्तमईन नहीं हो सका...ये ही कहता रहा कोई डीएसपी, कलक्टर वाला कोर्स करते तो ज़्यादा बढ़िया रहता...यहां मैंने भी जोड़ा कि डॉक्टर साहब पहले हरियाणवी दिखे जो बात का सीधा और सरल जवाब देते हैं...नहीं तो किसी से पूछो कि टाइम के होया से...हरियाणवी टाइम नहीं बताएगा उल्टे जो जवाब देगा वो ये होगा...फांसी चढ़ना के...

परिचय के दौरान सरवत जमाल जी और सतीश सक्सेना जी ने बड़े प्रभावी ढंग से ब्लॉग जगत में सौहार्दपूर्ण माहौल की आवश्यकता पर ज़ोर दिया...साथ ही गुटबाज़ी से बचते हुए अपने लेखन पर ही सारी शक्ति लगाने की बात कही...जमाल साहब का ग़ज़लों का ब्लॉग है...उनके ख्याल जानकर उन्हें नियमित पढ़ने की इच्छा जागृत हो गई...

इस बीच विनीत कुमार भाई ने भी बेबाक अंदाज़ में अपनी बात रखी...उनकी इस शैली का ही मैं बड़ा प्रशंसक हूं...मीडिया पर उनके शोध और गहरी पकड़ की वजह से मैं अपने को उनका शागिर्द मानता हूं...विनीत भाई की एक बात मुझे बहुत पसंद आई...उन्होंने कहा कि ब्लॉग बड़ा ही सशक्त माध्यम है...ज़रूरत है इसकी ताकत पहचानने की....विनीत भाई के अनुसार हमारा परिवेश तेज़ी से बदलता जा रहा है...जिस दौर में हमारा बचपन बीता...वो भी बड़ी जल्दी बीते दौर की बात हो जाएगा और शहरों के तेज़ी से विकसित होने की वजह से कई चीजों को हम नॉस्टेलजिया की तरह ही याद करेंगे...मसलन सिंगल स्क्रीन थिएटर की जगह अब महानगरों में मल्टीप्लेक्स ही दिखाई देने लगे हैं...स्कूलों की जगह फाइव स्टार स्कूल दिखाई देने लगेंगे...कस्बे, खेत-खलिहानों की सौंधी खुशबू सिर्फ किस्सों तक ही सीमित रह जाएगी, ऐसे में नॉस्टेलजिया को आधार मान कर लिखी जाने वाली पोस्ट को पाठकों का बड़ा दायरा मिलेगा...विनीत के अनुसार ब्लॉगिंग में विरोध के स्वरों की भी अपनी अहमियत है...इसे सकारात्मक ढंग से लिया जाना चाहिए...ये अपने विकास के लिए भी आवश्यक है...

इस मौके पर डॉ दराल ने एक बड़ी अच्छी सलाह दी कि ब्लॉगिंग में हम उतना ही टाइम का निवेश करें जितना कि हम आसानी से अफोर्ड कर सके...इसकी वजह से अपनी दूसरी ज़िम्मेदारियों को प्रभावित नहीं होने देना चाहिए...एक मसला बेनामी टिप्पणियों का भी उठा....इनसे निपटने के लिए अजय जी जल्द ही आसान भाषा में कुछ पोस्ट लिखेंगे...फेक आईपी का पता लगाना खर्चीला काम है...लेकिन इससे निपटने के लिए भी आज की बैठक में सहमति बनी...मेरा इस संदर्भ में सुझाव था कि अगर कोई बेनामी किसी पोस्ट पर जाकर खुराफात करता है तो हम सब का फर्ज बनता है कि उस पोस्ट पर जाकर बेनामी महाराज की खबर लेते हुए जमकर लताड़ लगाएं...मॉडरेशन से संबंधित तकनीकी जानकारी भी अजय जी और राजीव तनेजा भाई जल्दी ही अपनी पोस्ट में देंगे...

ये सब चल रहा था कि पहले पनीर टिक्का, फ्रेंच फ्राई और कॉफी का दौर चला...बातों में सब इतने मशगूल थे कि अविनाश भाई और अजय भाई को सबसे ज़ोर देकर लंच के लिए आग्रह करना पड़ा...खाना भी महफिल की तरह शानदार था....पापड़, सलाद, रायता, शाही पनीर, दम आलू, पालक कोफ्ता, गोभी-आलू, पुलाव, नान और मुंह मीठा करने के लिए गर्मागर्म गुलाब जामुन...सब प्लेट्स लेकर फिर राउंड टेबल पर आकर जम गए...साथ-साथ बातें चलती रहीं...

अजय भाई ने बताया कि समीर लाल जी समीर अप्रैल या मई में भारत आने वाले हैं...उनके आने पर कोई बड़ा आयोजन ज़रूर होगा...राज भाटिया जी ने भी कहा कि वो भी मई में भारत दोबारा आने की कोशिश करेंगे...इस मौके पर सभी ने समीर जी के व्यक्तित्व की जमकर तारीफ की...सबने ये इच्छा भी जताई कि जो भी प्रोग्राम रखा जाए उसमें समीर जी को ज़्यादा से ज़्यादा सुना जाए...उनके अनुभवों का लाभ उठाया जाए...नए ब्लागर्स ने एकसुर में कहा कि समीर जी जिस तरह हर नए ब्लॉगर को प्रोत्साहित करते हैं उसने उन्हें और अच्छा लिखने की प्रेरणा मिली ...मैने भी कहा कि न तो मेरी समीर जी से आज तक ई-मेल पर कोई बात हुई है और न ही फोन पर...लेकिन मैंने जितना उनकी पोस्ट और टिप्पणियों को पढ़ते-पढ़ते सीखा है और सीख रहा हूं वो पूरी ज़िंदगी का फ़लसफ़ा है...

बातचीत के दौरान टिप्पणियों पर ये भी बात उठी कि उनका कोई अर्थ होना चाहिए...जैसे पोस्ट के ऊपर टिप्पणी देते वक्त आपके पास कोई उससे जुड़ी जानकारी है तो ज़रूर दें...पोस्ट का मर्म ज़रूर समझ लें...नहीं तो कभी कभी नाइस लिख देने से अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है...

इस बीच अब सब की निगाहें अपने प्यारे मिथिलेश दूबे पर आ जमी थी...वो क्या कहते हैं...लेकिन मिथिलेश कम ही बोल रहे थे...हां प्रवीण पथिक ने ज़रूर मिथिलेश के बारे में बताया...पहली शिकायत ये थी कि मिथिलेश के सिर्फ मोहतरमा शब्द के इस्तेमाल करने पर ही उन्हें टिप्पणियों के ज़रिए इतना कुछ सुनाया गया...जबकि वरिष्ठ कहे जाने वाले ब्लॉगर्स गालियों का इस्तेमाल करने पर भी साफ बच निकलते हैं...उन पर कोई ऐतराज नहीं करता...इस मौके पर अजय भाई, मैंने, और भी ब्लॉगर भाइयों ने मिथिलेश से कहा कि सारे तुम से बड़ा प्यार करते हैं...ब्लॉगिंग में सबसे छोटा होने की वजह से सभी खास तौर पर चाहते हैं...इसलिए सभी ने हक मानते हुए मिथिलेश को सलाह देनी चाही...मिथिलेश से मैंने ये भी कहा कि तुम्हारी संस्कृति और कई विषयों पर इतनी अच्छी पकड़ है, उस पर जमकर लिखो...चाहे हफ्ते में सिर्फ दो पोस्ट दो...लेकिन वो हो इतनी शानदार कि सभी को पढ़ने में मज़ा आ जाए...अजय कुमार झा जी ने बड़े भाई के अंदाज में मिथिलेश को आदेश दिया...जाते ही सबसे पहले पोस्ट लिखने का काम करना...लेकिन मिथिलेश फिर भी थोड़ी दुविधा में दिखे...अब देखना है कि मिथिलेश कब अजय भाई और सबकी बात का मान रखते हुए पोस्ट डालते हैं...

हां, इस बीच महफूज़, दीपक मशाल, अनिल पुसदकर भाई के फोन भी आते रहे...कई ब्लॉगर से उनकी बात हुई...फोटो भी धड़ाधड़ खींचे जा रहे थे...वो सभी आपको जल्दी देखने को मिलेंगे...बातों में कब चार बज गए किसी को पता ही नहीं चला...हां, एक बात और मयंक सक्सेना की...वो कभी मेरे साथ काम कर चुके हैं...आते ही उन्होंने मुझे याद दिलाया...मयंक ने भी कई मुद्दों पर असरदार ढंग से बात रखी..पदम जी ने कम टिप्पणियों से नए लेखकों का हौसला टूटने का मुद्दा उठाया...इस पर दराल सर ने समझाया कि शुरू में सबको दिक्कत आती है...लेकिन अच्छा लिखा जाए तो धीरे-धीरे टिप्पणियां भी बढ़ने लगती हैं...

हां, बैठक में मेरे फेवरिट नीरज जाट जी महाराज भी पधारे थे...एक तो मेरे मेरठ के और ऊपर से वृतांत लिखने की उनकी शैली...घुमक्कड़ी लेखन में नीरज जाट जैसा लेखन मैंने कहीं और नहीं देखा है, ये मैं दावे से कह रहा हूं...एक बात और मिथिलेश दूबे हो या नीरज जाट, यशवंत मेहता हो या मयंक सक्सेना, नीशू तिवारी हो प्रवीण पथिक..विनोद पांडेय हो या विनीत उत्पल...सभी का युवा जोश देखकर लगा कि हिंदी ब्लॉगिंग को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता...साथ ही हमारे भारत को...

चलिए अब विदा लेता हूं...जितना याद रहा सब आप तक पहुंचाने की कोशिश की...कुछ छूट गया हो तो आज की महफिल में मौजूद रहे सभी साथियों से फिर माफी चाहता हूं...

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

आंसू रोक कर दिखाओ इसे पढ़ने के बाद...खुशदीप

ये कहानी इंटरनेट से ही अंग्रेज़ी में मुझे किसी ने ई-मेल की है...ये कहानी अगर देश के हर इंसान को पढ़ा दी जाए, हर टीचर को पढ़ा दी जाए, हर बच्चे को पढ़ा दी जाए...मेरा दावा है इस देश की तस्वीर बदल जाएगी...

स्कूल का पहला दिन...ग्रेड पांच की क्लास में टीचर मिसेज मुखर्जी बच्चों से एक झूठ कह रही है...मैं तुम सब बच्चों से एक जैसा प्यार करती हूं...लेकिन ये कैसे मुमकिन हो सकता है...क्योंकि सबसे अगली लाइन में सिर झुकाए हुए रॉनी बैठा है...

मिसेज मुखर्जी देख रही थीं कि रॉनी और बच्चों के साथ न खेलता था, न ही मिक्स-अप होता था...उसके कपड़े भी सलीके से नहीं होते थे...देखते ही लगता था कि रॉनी को अच्छी तरह नहलाने की ज़रूरत है.... रॉनी को देखकर मिसेज मुखर्जी को यही लगता कि इस बच्चे को स्टडी में बहुत ज़्यादा मेहनत करने की ज़रूरत है...

रॉनी के पेपर चेक होने के लिए आए तो मिसेज मुखर्जी ने सख्त टीचर की तरह मार्किंग करते हुए उन पर लाल पेन से बड़ा-बड़ा एफ ग्रे़ड (सबसे फिसड्डी) मार्क कर दिया...प्राइमरी सेक्शन की हेड होने के नाते मिसेज मुखर्जी को हर बच्चे की प्रोग्रेस पर नज़र रखनी थी...इसी प्रक्रिया में एक दिन मिसेज मुखर्जी के हाथ रॉनी के पिछली क्लासेज़ के रिकॉर्ड की फाइल भी लगी...जैसे जैसे फाइल पढ़ना शुरू किया, मिसेज मुखर्जी के चेहरे के भाव बदलते गए...

ग्रेड एक की क्लास टीचर ने लिखा था...रॉनी बेहद हंसमुख और प्रतिभावान बच्चा है...अपना काम बड़ी अच्छी तरह करता है...अच्छे संस्कार वाले रॉनी को पाकर कोई भी टीचर खुद को खुशकिस्मत समझ सकती है...

ग्रेड दो की क्लास टीचर ने लिखा था...रॉनी विलक्षण छात्र है...क्लॉस के सभी बच्चों की जान है...लेकिन कभी-कभी अपनी मां की बीमारी के चलते परेशान दिखाई देता है...दिखता है कि घर में ज़रूर रॉनी को दिक्कत का सामना करना पड़ता होगा...

ग्रेड तीन की क्लास टीचर ने लिखा...मां की मौत का रॉनी पर असर दिखने लगा है...वो अपना श्रेष्ठ दिखाना चाहता है लेकिन उसके पिता शायद पूरा ध्यान नहीं दे रहे...अगर रॉनी के बारे में कुछ विशेष न सोचा गया तो घर का माहौल रॉनी के अंदर के अच्छे छात्र को खत्म कर डालेगा...

ग्रेड चार की क्लास टीचर ने फाइल पर लिखा था...रॉनी गुमसुम रहने लगा है...न वो किसी दोस्त के साथ खेलता है और न ही बात करता है...अक्सर क्लास में सोता दिखाई देता है...


ये सब पढ़ने के बाद मिसेज मुखर्जी को अपनी गलती का अहसास होने लगा ...मिसेज मुखर्जी को तब और भी ग्लानि हुई जब टीचर्स डे पर सब बच्चों ने खूबसूरत पैकिंग और रिबन से बंधे तोहफ़े लाकर उन्हें दिए और रॉनी ने एक सादे ब्राउन पेपर में लिपटी छोटी सी भेंट उनके आगे झिझकते हुए रखी.. मिसेज मुखर्जी ने पेपर को खोला तो उसमें से निकली दो चीज़ों को देखकर और सभी बच्चे हंसने लगे...पेपर से एक हाथ का कड़ा निकला, जिसके कुछ पत्थर टूटे हुए थे...साथ ही एक चौथाई भरी परफ्यूम की बॉटल थी...

मिसेज मुखर्जी ने बच्चों की हंसी को दबाते हुए फौरन कहा...ओह कितना प्यारा कड़ा है...ये कहते हुए मिसेज मुखर्जी ने कड़ा हाथ में डाल लिया...साथ ही परफ्यूम की बॉटल से हथेली और कपड़ों पर थोड़ा स्प्रे कर लिया...अलौकिक खुशबू जैसा चेहरे पर भाव दिया...रॉनी उस दिन स्कूल खत्म होने के बाद भी मिसेज मुखर्जी से ये कहने के लिए रुका रहा...मैम, आज आपसे मुझे मॉम जैसी खुशबू आई...

उस दिन रूम में आने के बाद मिसेज मुखर्जी की आंखों से एक घंटे तक आंसू झरझर बहते रहे...उसी दिन से मिसेज मुखर्जी ने बच्चों को रटाना, लिखाना और मैथ्स पढ़ाना छोड़ दिया...इसकी जगह मिसेज मुखर्जी ने बच्चों को ज़िंदगी पढ़ाना शुरू किया...



रॉनी पर मिसेज मुखर्जी का खास ध्यान रहने लगा...जैसे जैसे मिसेज मुखर्जी रॉनी पर ज़्यादा वक्त देने लगीं, रॉनी के अंदर का प्रतिभावान छात्र लौटने लगा...जितना मिसेज मुखर्जी हौसला बढ़ातीं, उससे दुगनी रफ्तार से वो रिस्पांस देता...साल का आखिर आते-आते रॉनी क्लास के दस स्मार्ट और होशियार बच्चों में फिर गिना जाने लगा...मिसेज मुखर्जी के इस झूठ के बावजूद कि वो क्लास के सभी बच्चों को एक जैसा प्यार करती हैं...



एक साल बाद मिसेज मुखर्जी को अपने रूम के दरवाजे के नीचे कागज का नोट मिला...जिस पर रॉनी ने लिखा था...जितनी भी टीचर्स ने मुझे पढ़ाया, आप सबसे अच्छी हैं...

छह साल बाद फिर मिसेज मुखर्जी को रॉनी का एक नोट मिला...मैंने सेकंडरी स्कूल पूरा कर लिया है...क्लास में थर्ड पोज़ीशन रही है....और आप अब भी मेरी ज़िंदगी की सबसे अच्छी टीचर हैं...

चार साल बाद मिसेज मुखर्जी को रॉनी का फिर खत मिला...लिखा था...जल्दी ही कॉलेज से ऑनर्स के साथ ग्रेजुएट हो जाएगा और आप अब भी ज़िंदगी की सबसे अच्छी और पसंदीदा टीचर हैं...

तीन साल और गुज़र गए...फिर मिसेज मुखर्जी के पास रॉनी का खत आया...पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी हो गई है...आप अब भी मेरी ज़िंदगी की सबसे अच्छी और पसंदीदा टीचर हैं...लेकिन इस खत के नीचे रॉनी का नाम कुछ लंबा लिखा हुआ था...रॉनी के रॉय, एमडी

कहानी यही खत्म नहीं हो जाती...उसी वसंत में मिसेज मुखर्जी को एक और खत मिला...लिखा था...मुझे एक लड़की का साथ मिला है और जल्दी ही दोनों शादी करने वाले हैं...रॉनी ने ये भी लिखा था कि उसके पिता का दो साल पहले निधन हो गया, इसलिए क्या मिसेज मुखर्जी शादी में उस जगह पर बैठना पसंद करेंगी, जहां लड़के की मां बैठती है...

मिसेज मुखर्जी ने वैसा ही किया जैसी कि रॉनी ने इच्छा जताई थी....और जानते है क्या...शादी वाले दिन मिसेज मुखर्जी आशीर्वाद देने पहुंची तो उनके हाथ में वही कड़ा था और उनके पास से उसी परफ्यूम की खुशबू आ रही थी जो बरसों पहले रॉनी ने तोहफे में मिसेज मुखर्जी को दिए थे...

रॉनी और मिसेज मुखर्जी एक दूसरे को देखने के बाद दस मिनट तक गले लगे रहे...बिना कुछ बोले...आंखों से छमछम बहता पानी ही सब कुछ बोल रहा था...बड़ी मुश्किल से रॉनी (डॉ रॉनी के रॉय, एमडी) मिसेज मुखर्जी के कान में बुदबुदा सका...शुक्रिया मॉम, मेरे ऊपर भरोसा करने के लिए...शुक्रिया मुझे अपनी अहमियत का अहसास दिलाने के लिए...और मुझे जताने के लिए मैं भी बदलाव ला सकता हूं...

मिसेज मुखर्जी ने रॉनी को और ज़ोर से गले लगाते हुए कहा...नहीं मेरे बच्चे...तुम जो कह रहे हो गलत कह रहे हो, उलटे तुम मेरे वो टीचर हो जिसने मुझे पढ़ाया कि मैं भी कुछ बदल सकती हूं...तुमसे मिलने से पहले तो मुझे पता ही नहीं था कि असल में पढ़ाया कैसे जाता है...



ये अनुवाद पूरा करने के बाद मेरी आंखे पूरी तरह नम हैं...शब्द पानी से धुले लग रहे हैं...सोच रहा हूं क्या मैं भी कहीं छोटा सा ही कोई बदलाव ला सकता हूं...आप क्या सोच रहे हैं...