रविवार, 31 जनवरी 2010

तोड़ दो गांधी के सारे बुत...खुशदीप

मायावती के बुत प्रेम पर लिखी पोस्ट पर भाई प्रवीण शाह, पी सी गोदियाल जी और मेरे अज़ीज़ धीरू भाई ने कुछ सवाल उठाए थे...उनके सवालों में दम है...उनके कहने का लब्बोलुआब यही है कि गांधी, नेहरू, इंदिरा, राजीव गांधी के बुतों, स्मारकों, लाल किले, कुतुब मीनार, ताज महल के रखरखाव पर इतना खर्च होता है तब कोई उंगली क्यों नहीं उठाता...खरी बात है...यहां मैं थोड़ा सा ट्रैक चेंज करता हूं...आपको राजकुमार हिरानी की फिल्म लगे रहो मुन्नाभाई के एक दृश्य में ले चलता हूं...मुन्ना भाई बुज़ुर्गों के बीच बैठा है और उसे गांधी पर लेक्चर देना है...गांधी की आत्मा पीछे से आकर मुन्ना भाई को गाइड करती है...एक सवाल के जवाब में गांधी कहते हैं...देश में मेरे जितने भी बुत लगे हैं तोड़ दो...जितने दफ्तरों-स्कूलों में मेरे चित्र लगे हैं, उतार दो...अगर मुझे वास्तव में कहीं रखना है तो अपने दिल में रखो...



ये संवाद मुझे बहुत पसंद है...मायावती जी को भी मैं यही डायलॉग सुनाना चाहता हूं...इत्तेफ़ाक से गांधी की 62वीं पुण्यतिथि पर ही मैं इस पोस्ट को टाइप कर रहा हूं...दरअसल हम में ऐसे बहुत कम लोग होंगे जिन्होंने गांधी को रु-ब-रू देखा होगा...गांधी को दुनिया से गए 62 साल हो गए...इसलिए गांधी के बारे में हमारी जो भी धारणा है वो हमारे घरों में बुज़ुर्गों के मुंह से सुनाई गई बातों पर आधारित है...इसलिए गांधी का आप दिल से सम्मान नहीं करते तो फिर राजघाट, गांधी के बुत, स्मारक, साहित्य के आपके लिए कोई मायने नहीं है...और यदि आप गांधी का दिल से सम्मान करते हैं तो भी इन बुतों का कोई औचित्य नहीं है...क्योंकि गांधी तो आपके दिल में हैं...वहां से उन्हें कोई ताकत नहीं हटा सकती...

बहन मायावती जी से भी मैं यही कहना चाहता हूं...अगर आप अपने कामों से गरीब-गुरबों, पिछड़े-कुचले वर्गों के दिलों में जगह बना लेती हैं (या कहीं कहीं बना भी ली है) तो फिर आपको किस बात का डर...फिर आप जिन्हें मनुवादी कहती रही हैं वो लाख कोशिश कर लें इतिहास में आपका नाम दर्ज होने से नहीं रोक सकते...मायावती जी के लिए मेरी सारी शुभकामनाएं हैं...अगर वो किसी दिन देश की प्रधानमंत्री बनती हैं तो मैं इसलिए खुश नहीं हूंगा कि एक दलित की बेटी प्रधानमंत्री बनी...मैं इसलिए खुश हूंगा कि बादलपुर गांव की बेटी तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद पढ़ लिख कर अपनी योग्यता के बल पर देश की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंची...

अब आता हूं अपनी पोस्ट पर मिली विचारोत्तेजक टिप्पणियों पर...पहले प्रवीण शाह भाई की टिप्पणी जस की तस...

खुशदीप जी,
बहन मायावती जी ऐसा क्यों कर रही हैं इसको समझने के लिये आपको दलित मानस को भी समझना पढ़ेगा, काफी चिंतन-मनन है इस सब के पीछे... अभी बस इतना ही कहूँगा कि यह क्रिया नहीं प्रतिक्रिया है...सदियों से हाशिये पर रखे गये वर्ग जिसने आजादी से न जाने क्या-क्या उम्मीद लगाई हुई थीं...उस वर्ग की उम्मीदें योजनाबद्ध तरीके से तोड़ीं गई... वोट बैंक से ज्यादा कभी कुछ नहीं समझा गया जिनको...उनकी प्रतिक्रिया...ठेंगा दिखाती, मुँह चिड़ाती, अपने जागने, खुद के महत्व को पहचानने का उदघोष करती एक प्रतिक्रिया...मेरे ऊपर के टिप्पणीकारों ने जो कमेंट दिये हैं ऐसे कमेंट मिलेंगे यह पता था उस दलित नेत्री को... जितना ऐसा कहा जायेगा...दलित चेतना उतना ही जागृत होगी...मुद्दों को, असमानता को, भेदभाव को किनारे कर अपने और केवल अपने हित की चिन्ता करते खाते पीते, पेट भरे, लिबराइजेशन और ग्लोबलाइजेशन की गाय को दुहते, अगड़े बुद्धिजीवी वर्ग के सौन्दर्यबोध और कम्फर्ट लेवल को भले ही यह कदम चोट पहुंचाता है...पर यह उठाया भी इसी लिये गया है। और हाँ, कभी समय मिले तो गिनती करियेगा कि हमारे अघोषित पर निर्विवाद राजवंश के सदस्यों के कितने बुत खड़े हैं देश में, कितना खर्चा हुआ उन पर, कितनी सड़कें, संस्थान, पुल हवाई अड्डे, चौराहे, बाजार आदि आदि हैं उनके नाम पर ?


फिर आई पीसी गोदियाल जी की टिप्पणी...

@ प्रवीण जी शायद सही कह रहे है !
दलितों का तर्क देखिये : अगर मायावती के बुतों से आपको दिक्कत हो रही है तो फिर क्यों ये लालकिले, क़ुतुब मीनार, ताज महल इत्यादि को जीवित रखे हो, और इतने अरबो रूपये हर साल रख-रखाव पर खर्च कर रहे हो ? इनको बनाने में भी तो हजारो निरीह, गरीब मजदूरों का शोषण और बलिदान हुआ था ! कल तुम्ही लोग, तुम्हारी ही सरकारे, मायावती के स्मारकों को भी उसी तरह संजोयेंगी जैसे आज आप लोग लाल किले को संजो के रखे हो ! लेकिन प्रवीण जी एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि मायावती का उद्देश्य चाहे जो भी हो, लेकिन मुझे दुःख इस बात का है कि यह सब मेरे पैसे से और मेरे बच्चो का पेट काटकर बनाया जा रहा है इसलिए मैं इसका विरोध कर रहा हूँ ! इज्जत बुत बनाने से नहीं दिलो में जगह बनाने से मिलती है ! आज आप उत्तर प्रदेश के हालात देख रहे है ? फिर भी ये भेड़े बार बार इसी गडरिये को कुर्सी सौंप रही है !

फिर मेरे अज़ीज़ धीरू भाई की टिप्पणी...

यह कोई नया तो काम नही है सदियो से बुत बनवाये जाते रहे है .बेचारी दौलत माफ़ किजिये दलित की बेटी ने अगर मूर्ति अपनी लगवाली तो क्या गुनाह किया . आप और हम जैसे उच्च मानसिकता के लोगो को कोई काम ही नही है इसके अलावा...

आप तीनों की बात अपनी जायज़ है...लेकिन यहां मेरे मन में कुछ सवाल उमड़ते हैं...इन्हें देश के एक आम नागरिक के नज़रिए से लीजिएगा, किसी जाति या पेशे से बांध कर नहीं...मायावती जी 21 मार्च 1997 को पहली बार और 13 मई 2007 को चौथी बार देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं...पहली तीन बार से इस बार की अहमियत इसलिए ज़्यादा है क्योंकि मायावती सिर्फ अपनी पार्टी बीएसपी को मिले बहुमत के आधार पर सत्ता में आईं...यानि इस बार मायावती जैसे स्वतंत्र होकर फैसले ले सकती हैं, पहले नहीं ले सकती थीं..लेकिन यहां मैं सवाल करता हूं कि क्या उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार होने बिल्कुल बंद हो गए हैं...क्या गांवों में गरीब खुशहाल हो गए हैं...क्या तालीम की रौशनी हर गरीब बच्चे को मिलने लगी है...क्या गांवों में पानी, बिजली, शौचालय जैसी बुनियादी ज़रूरतों की व्यवस्था हर घर में हो गई है...पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में आज भी दलितों को वोट नहीं डालने दिए जाते...क्या वहां सब ठीक हो गया...

आप कहेंगे कि जादू की छड़ी से पलक झपकते ही ये काम नहीं हो सकते...इसमें वक्त लगेगा...सही बात है आपकी...लेकिन क्या वो इच्छाशक्ति ईमानदारी से दिखाई दे रही है...मायावती बिना किसी लागलपेट कहती हैं कि उन्हें पार्टी चलाने के लिए पैसा चाहिए, इसलिए वो अपने लोगों से चंदा कर इसे जुटाती हैं...चाहे जन्मदिन के बहाने सही...लेकिन मायावती जी आप इन गरीबों की ताकत के बल पर सत्ता में हैं तो आपकी योजनाएं वाकई गरीबों का जीवन-स्तर उठाने वाली होनी चाहिए...आप की योजनाएं जिस तरह अरबों खर्च कर स्मारक बनाने के लिए स्पष्ट हैं, सुप्रीम कोर्ट तक की नाराज़गी मोल ले लेती हैं, वैसे ही गरीबों (गरीब मतलब गरीब, बिना किसी जाति का विभेद किए) के कल्याण के लिए भी काम होता साफ दिखना चाहिए...

किसी जमाने में ये नारा ज़रूर सुना जाता था कि तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार...लेकिन आज आप सर्वजन समाज की बात करती हैं...अब नारे भी बदल गए हैं...हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है...

यहां मैं अब कुछ सवाल उठाने जा रहा हूं, उस पर मुझे आरक्षण विरोधी नहीं मान लीजिएगा...ये सच है कि जब पढ़ता था तो सीपीएमटी में 85 प्रतिशत नंबर लाने के बाद भी उत्तर प्रदेश के किसी मेडिकल कालेज में दाखिला नही पा सका था...सिर्फ गाजीपुर के होम्योपैथी मेडिकल कॉलेज में सीट मिली थी, जहां मैने खुद ही एडमिशन नहीं लिया था...उस वक्त एक किशोर के अपरिपक्व मस्तिष्क की तरह ही मुझे बड़ा गुस्सा आया था कि मेरे से आधे भी कम नंबर पाने वाले लोग सिर्फ आरक्षण की बैसाखी थामकर मेडिकल कालेज में एमबीबीएस या बीडीएस में प्रवेश पा गए और मैं सिर्फ अपने भाग्य को कोसता रहा कि मैं क्यों सवर्ण घर में पैदा हुआ...मुझे भी ऐेसे घर में पैदा होना
चाहिए था जहां जाति के आधार पर मुझे आरक्षण का लाभ मिल जाता....लेकिन जैसे-जैसे सोच परिपक्व होनी शुरू हुई, वैसे मुझे भी लगा कि जो सदियों से ऊंची जातियों का अत्याचार सहते आए हैं, उनको आगे लाने और समाज में समरस करने के लिए सरकार ने आरक्षण जैसी व्यवस्था की है तो कोई बुराई नहीं की...लेकिन यहां मेरा फिर सवाल है कि क्या वाकई आरक्षण ने समाज समरस कर दिया...

आज मेडिकल कालेज में सवर्ण, पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जातियों के छात्रों के गुट साफ-साफ अलग नजर आते हैं...यानि हम आरक्षण के ज़रिए चले तो थे भेदभाव मिटाने और ये और बढ़ गया...ये हमारे नीतिनिर्माताओं की भूल थी कि वो आरक्षण को ही सामाजिक बदलाव का एकमात्र औज़ार समझ बैठे...आरक्षण का भरपूर लाभ अनुसूचित जातियों की क्रीमी लेयर ने उठाया...आर्थिक स्थिति से सुदृढ़ हो जाने के बावजूद ये क्रीमी लेयर अपनी अगली पीढ़ियों को आरक्षण का लाभ दिलाती रही है...लेकिन गांव का गरीब कलुआ कलुआ ही रहा...वो कल भी समाज के ताने सहने के साथ जीवन जीने को अभिशप्त था...वो आज भी वैसा ही जीवन जी रहा है...

आज़ादी के वक्त कहा गया था कि आरक्षण सिर्फ दस-पंद्रह साल तक रहेगा..लेकिन हर दस साल बाद इसे बढ़ाया जाता रहा...मैं ये नहीं कह रहा कि आरक्षण नहीं होना चाहिए...मेरा आग्रह सिर्फ इतना है कि ऐसी व्यवस्था बने कि जिसमें एक गरीब के बच्चे को भी वैसी ही शिक्षा का अधिकार मिले जैसा कि एक अमीर के बच्चे को मिलता है...हमारी सरकार शिक्षा के राष्ट्रीयकरण के बारे में क्यों नहीं सोचती...टैक्स का पैसा शिक्षा पर लगाया जाए तो वो देश का सच्चा निवेश होगा...गरीबों के बच्चों को अच्छी से अच्छी कोचिंग, किताबें, वर्दी, वज़ीफ़ा दिलाने का सरकार प्रबंध करे जिससे वो अमीरों के बच्चों के शिक्षा के स्तर तक बराबरी पर आ सकें...इस काम में वक्त लगेगा...लेकिन शुरुआत तो कीजिए...बच्चों को उनकी प्रतिभा के अनुसार बहुत छोटी उम्र में ही छांटिए...ज़रूरी नहीं सारे ग्रेजुएट बनें...अगर कोई खेल में अच्छा प्रदर्शन दिखा रहा है तो उसे बेसिक शिक्षा के साथ स्पोर्ट्स की बेहतरीन ट्रेनिंग दिलाई जाए...मायावती जी हो या राहुल गांधी अगर वाकई दलितों या गरीबों के दिल से हितेषी हैं तो समरस समाज बनाने के लिए शिक्षा से ही पहल करें...ऐसी व्यवस्था कीजिए कि अगर किसी के मां-बाप बच्चे की अच्छी शिक्षा का खर्च उठाने में समर्थ नहीं है तो सरकार अपने पैसे से उस बच्चे को पढाए-लिखाए...और जब वो बच्चा कुछ बन जाए तो वो अपनी कमाई से उस पैसे को सरकार को वापस कर दे जो बचपन में उसकी पढ़ाई पर सरकार ने लगाया था...ये पैसा फिर और गरीब बच्चों की पढ़ाई पर काम आएगा...इस तरह जो आने वाली पीढ़ियां आएंगी उनकी सोच वाकई बहुत खुली होगी और उनमें एक दूसरे के लिए नफ़रत नहीं बल्कि सहयोग का भाव होगा...ये भावना होगी कि सबको मिलकर भारत को आगे बढ़ाना है...अब
आप सोचिए राजघाटों, शांतिवनों, शक्ति स्थलों, वीर भूमियों या अंबेडकर स्मारकों पर अरबों रुपया बहाना सही है या गरीब चुन्नू या नन्ही की शिक्षा पर पैसा खर्च करना...

रही मूर्तियों के ज़रिए चेतना जगाने की बात तो अभी दो दिन पहले भाई रवीश कुमार जी की एक पोस्ट देखी थी...उसमें उन्होंने कमाल की तस्वीर लगाई थी...आरा से दीपक कुमार जी ने रवीश भाई को ये तस्वीर भेजी थी...ये तस्वीर थी जयप्रकाश नारायण जी की मूर्ति की...जेपी कभी किसी सरकारी पोस्ट में नहीं रहे...वो लोगों के दिलों में रहे...इसलिए उनकी मूर्ति के लिए अरबों रुपये के स्मारक या पार्क की ज़रूरत नहीं है सिर्फ दो पत्थर ही बहुत हैं...शायद बुतों में अहम पूरा होता दिखने वालों को इस तस्वीर से ही कोई संदेश मिले....


आभार रवीश कुमार जी

शनिवार, 30 जनवरी 2010

मुंबई का भीखू म्हात्रे कौन...खुशदीप

आपने राम गोपाल वर्मा की फिल्म सत्या देखी होगी...अगर हां, तो आपको मनोज वाजपेयी का निभाया भीखू म्हात्रे का किरदार भी याद होगा...भीखू म्हात्रे फिल्म के एक दृश्य में चट्टान पर चढ़कर चिल्लाता है मुंबई का किंग कौन....है कोई भीखू म्हात्रे का मुकाबला करने वाला...कोई नहीं साला...ये एक फिल्म की बात थी...लेकिन आज एक उम्रदराज़ शेर इसी अंदाज में ये सवाल दाग रहा है...शेर में इतनी ताकत बची नहीं कि चट्टान पर चढ़ कर दहाड़ सके...इसलिए वो अखबारनुमा अपने चिट्ठे सामना से ही दिल की भड़ास निकाल कर खुद को तसल्ली दे रहा है...


माई नेम इज़ ठाकरे

ये शख्स कहना चाह रहा है माई नेम इज़ ठाकरे...बाल ठाकरे....कुछ कुछ वैसे ही अंदाज़ में जैसे शाहरुख़ ख़ान 12 फरवरी को अपनी रिलीज होने वाली फिल्म में कहने जा रहे हैं...माई नेम इज़ ख़ान...शाहरुख ने पिछले साल अगस्त में अमेरिका के नेवार्क हवाई अड्डे पर तलाशी के दौरान भी कहा था...माई नेम इज़ ख़ान...बॉलीवुड के बादशाह की इस तरह तलाशी पर बवंडर आ गया था...शाहरुख के परम सखा राजीव शुक्ला ने तत्काल शाहरुख की इस व्यथा को अपने चैनल के माध्यम से देशवासियों तक पहुंचा दिया था...लोगों को पता चल गया था कि शाहरुख की कोई फिल्म आने वाली है....माई नेम इज़ ख़ान...


माई नेम इज़ ख़ान

अब फिल्म की रिलीज से ठीक पहले शाहरुख ने एक और बयान क्या दिया...शिवसैनिक कमर कस कर शाहरुख के खिलाफ सड़कों पर उतर आए...ठाणे में माई नेम इज़ ख़ान के पोस्टर तक फाड़ डाले...शाहरुख ने दरअसल आईपीएल (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का ट्वंटी ट्वंटी का तमाशा) में शाहिद आफरीदी समेत पाकिस्तान के कुछ खिलाड़ियों को बोली में कोई भाव न मिलने पर अफसोस जताया था...

शाहरुख़ ख़ान आईपीएल में कोलकाता की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स के मालिकों में से एक हैं....शाहरुख के मुताबिक "आईपीएल के तीसरे सीज़न के लिए पाकिस्तानी खिलाड़ियों को चुना जाना चाहिए था...पाकिस्तानी खिलाड़ी टी-20 के चैम्पियन हैं...हमें सबको बुलाना चाहिए...अगर कुछ मुद्दे थे, तो उन्हें पहले ही सामने लाना चाहिए था. सब कुछ सम्मानपूर्ण तरीक़े से हल हो सकता था.... हर दिन हम पाकिस्तान पर आरोप लगाते हैं और पाकिस्तान हम पर... ये एक मुद्दा तो है ही..."

दरअसल शाहरुख को पाकिस्तान और अरब वर्ल्ड में भी दीवानगी की हद तक चाहने वाले बहुत हैं...और अब बॉलीवु़ड की फिल्मों का बाज़ार भी सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है...शाहरुख की फिल्मों को ओवरसीज़ भी वैसा ही रिस्पांस मिलता है जैसे भारत में...शाहरुख हो या आमिर आजकल अभिनय, फिल्म निर्माण के साथ मार्केटिंग के फंडे भी खूब जानते हैं...आईपीएल के नाम पर पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिए हमदर्दी जताकर पाकिस्तान में शाहरुख ने अपने मुरीदों की तादाद और बढ़ा लीं...अब भारत के भीतर और बाहर शाहरुख के प्रशंसक उन्हें परदे पर ये कहता देखने के लिए बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं...माई नेम इज़ ख़ान...

लेकिन शाहरुख मार्केटिंग में फायदे ढूंढ रहे थे तो मातोश्री में बैठे उम्रदराज़ शेर बाल ठाकरे को शाहरुख पर निशाना साधने में शिवसेना के लिए एक और संजीवनी बूटी नज़र आई...शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने मुंबई में बाला साहेब के आशीर्वाद से बयान दागा, "अगर शाहरुख़ ख़ान चाहते हैं कि पाकिस्तानी खिलाड़ी यहाँ खेलें, तो उन्हें इस्लामाबाद या कराची में जाकर मैच खेलना चाहिए...अगर वे अपनी टीम में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को शामिल करते हैं, तो उन्हें इसका नतीजा भुगतने के लिए भी तैयार रहना चाहिए...वो ऐसी टीम लाकर देखें, फिर शिवसेना बताएगी कि वो क्या करती है...

दरअसल बाल ठाकरे जानते हैं कि उद्धव ठाकरे तेवरों के मामले में राज ठाकरे से उन्नीस साबित हो रहे हैं...इसलिए बाल ठाकरे के पास एक ही चारा बचा है कि वो खुद ही पुरानी फॉर्म में लौटें...भिवंडी विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव में जीत से शिवसैनिकों में जागे उत्साह को वो जिलाए रखना चाहते हैं...महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव होने वाले हैं...और बाल ठाकरे अब भतीजे राज ठाकरे से हर उस मुद्दे में आगे रहना चाहते हैं जो मराठी माणुस की ज़मीन से किसी न किसी रूप में ताल्लुक रखता हो...

और बाल ठाकरे को मौके भी मिल रहे हैं...अब क्या ज़रूरत थी रिलायंस इंडस्ट्री के सर्वेसर्वा मुकेश अंबानी को ये कहने की कि मुंबई हो दिल्ली, कोलकाता हो या चेन्नई, सब पर सभी भारतीयों का हक है...हर बात से ऊपर है कि हम भारतीय हैं...लंदन में एक किताब की लॉन्चिंग के मौके पर मुकेश अंबानी ने ये बात क्या कही कि मुंबई में जलजला आ गया...बाल ठाकरे ने लिखा है कि "मराठी लोगों का मुंबई पर उतना ही अधिकार है, जितना मुकेश अंबानी का रिलायंस कंपनी पर...मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है और उसकी राजधानी रहेगी.. मुंबई और मराठी माणुस की राह में दखल मत दो... जब पंडित मुकेश अंबानी कहते हैं कि मुंबई, चेन्नई और दिल्ली सभी भारतीयों की है तो वह अहमदाबाद, जामनगर और राजकोट जैसे शहरों को क्यों छोड़ देते हैं...मैं मुकेश अंबानी को एक सच्चा मुंबईकर मानता था... उनके पिता और मेरे मित्र दिवंगत धीरूभाई मुंबई के प्रति वफादार थे...अंबानी अपना औद्योगिक साम्राज्य मुंबई और महाराष्ट्र की वजह से इतना फैला पाए...धीरूभाई हमेशा जानते थे कि वह मुंबई के कर्जदार हैं...तब मुकेश ने क्यों अलग रास्ता अपनाया..."

ठाकरे ने यह चेतावनी भी दी कि अंबानी को महाराष्ट्र के लोगों को भड़काए बिना अपना काम करना चाहिए...

ये इत्तेफ़ाक ही है कि इधर बाल ठाकरे मुकेश अंबानी को हड़का रहे थे और अमेरिका में फोर्ब्स मैगजीन मुकेश अंबानी़ को सबसे अमीर भारतीय के साथ दुनिया के ताकतवर अरबपतियों में आठवें नंबर पर शुमार कर रही थी...मुकेश की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज़ की हैसियत 73 अरब डॉलर आंकी गई है... फोर्ब्स के अनुसार अकेले मुकेश के पास ही 32 अरब डॉलर हैं...


माई नेम इज़ अंबानी

मुकेश अंबानी से पहले बीते साल नवंबर में शिवसेना प्रमुख इसी मुद्दे पर सचिन तेंदुलकर को राजनीति से दूर रहने का परामर्श दे चुके हैं... ठाकरे ने तब कहा था कि सचिन को खुद को क्रिकेट तक सीमित रखना चाहिए और राजनीति की पिच पर दखल नहीं देना चाहिए... सचिन तेंदुलकर ने भी कहा था कि मुंबई सभी के लिए है... ठाकरे ने इसकी आलोचना करते हुए कहा था कि सचिन को राजनीति की पिच पर आकर मराठी माणुस को आहत करने की कोई जरूरत नहीं है... ऐसी टिप्पणियां करके सचिन मराठी मानस की पिच पर रन आउट हो गए हैं... आप तब पैदा भी नहीं हुए थे जब मराठी मानस को मुंबई मिली और 105 मराठी लोगों ने मुंबई के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी...


माई नेम इज़ तेंदुलकर

बाल ठाकरे जानते हैं कि शाहरुख, मुकेश अंबानी और सचिन तेंदुलकर तीनों अपने-अपने फील्ड के बादशाह हैं...इसलिए उन्हें चुनौती देंगे तो उनके वोट बैंक में ये संदेश जाएगा कि शेर बूढ़ा हो गया तो क्या हुआ है तो शेर ही...और वो बड़े से बड़े दिग्गज को आज भी ललकारने का माद्दा रखता है...लेकिन क्या कोई बाल ठाकरे से ये पूछेगा कि शाहरुख जिस बॉलीवुड का प्रतिनिधित्व करते है, वो मुंबई से बाहर चला जाए, मुकेश अंबानी जो भारतीय उद्योग के सबसे चमकते सितारे हैं, वो अपना हेडक्वार्टर मुंबई से बाहर ले जाएं या मराठी माणुसों में से ही एक सचिन तेंदुलकर जिस क्रिकेट के भीष्म पितामह कहलाए जाते हैं, उस क्रिकेट (बीसीसीआई) का मुख्यालय ही मुंबई से बाहर चला जाए तो मुंबई या मराठी माणुस का कौन सा भला होगा...इस सवाल का जवाब ठाकरे सामना में नहीं देना चाहेंगे...क्योंकि अगर वो ऐसा करेंगे तो फिर ये कैसे कह पाएंगे...मुंबई का किंग कौन....

स्लॉग ओवर


बड़े बुज़ुर्ग बच्चों से कहते हैं...दिल लगाके पढ़ो...
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बच्चों का जवाब...अगर दिल लगा लेंगे तो पढ़ाई फिर ख़ाक़ करेंगे...

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

इक बुत बनाऊंगा ...खुशदीप

इक बुत बनाऊंगा तेरा और पूजा करूंगा,


अरे मर जाऊंगा प्यार अगर मैं दूजा करूंगा...


इक बुत बनाऊंगा... (असली नकली, 1962)




किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है,


परस्तिश की तमन्ना है, इबादत का इरादा है,


किसी पत्थर की मूरत से...(हमराज,1967)

ये दोनों गाने आज अचानक लब पर आ गए...क्यों आ गए...ये कोई मुहब्बत वगैरहा का चक्कर नहीं...ये एक इंसान की खुद से दीवानगी की हद तक मुहब्बत का मामला है...कोई बंदा आत्ममुग्ध होकर किस हद तलक जा सकता है...वो चाहता है कि उसके बुत जगह-जगह नज़र आए...यानि अपने कर्म से ज़्यादा बुतों के ज़रिए हमेशा के लिए अमर-अजर हो जाए...और सिर्फ बुत तक ही बात रूक जाती तो गनीमत थी...यहां तो बुतों को स्थापित करने के लिए भी कोई गली मोहल्ले का चौराहा नहीं हज़ारों एकड़ में फैले लंबे चौड़े पार्क चाहिएं...संगमरमर के चमचमाते फर्श चाहिएं...करोड़ों करोड़ के खर्च के बाद बुत विराज भी गए...अब चिंता इनकी हिफ़ाजत की...उसके लिए फिर करोड़ों चाहिएं...आखिर देश में ये कहां हो रहा है...ये हो रहा है देश के सबसे ज़्यादा आबादी वाले और विकास की दृष्टि से आखिरी पायदानों पर खड़े राज्य उत्तर प्रदेश में...




उत्तर प्रदेश की बागडोर बहनजी के हाथ में है...बहनजी यानि मायावती...खुद को जीती-जागती देवी बताने वाली मायावती... जो मायावती ने किया वो देश तो क्या एशिया में भी उसकी मिसाल कहीं नहीं मिलती... मायावती सरकार ने यूपी विधानसभा में एक बिल पेश किया...इस बिल का लब्बोलुआब यही है कि कि लखनऊ के नौ और नोएडा के एक स्मारक की हिफ़ाज़त के लिए स्पेशल फोर्स का गठन किया जाएगा...

शुरुआत में इस फोर्स के लिए 54 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है...फिर हर साल 14 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे...बुतों और स्मारकों की हिफ़ाजत के लिए अगर एक दिन का खर्चा निकाला जाए तो ये पौने चार लाख रुपये बैठता है....दस पार्कों के निर्माण पर 1,213 करोड़ रुपये पहले ही खर्च किए जा चुके हैं...अब सरकारी खज़ाने के पैसे से बुतों और पार्कों की हिफ़ाजत भी होगी...विधानसभा में पेश किए गए बिल के मुताबिक स्पेशल फोर्स के लिए नई बटालियन बनेगी...अफसरों को छोड़कर पूरी फोर्स के लिए सीधी भर्ती होगी...




इन स्मारकों में मायावती के साथ बीएसपी के संस्थापक कांशीराम और देश के संविधान निर्माता डॉ भीमजी राव अंबेडकर के भी बुत शामिल है...ये सही है महापुरुषों को भुलाया नहीं जाना चाहिए...लेकिन याद करने का ये कौन सा तरीका है कि पहले अरबो की लागत से बुत, पार्क, स्मारक बनाएं जाएं और फिर उनकी हिफ़ाजत के लिए भी रोज लाखों खर्च करने पड़े....और ये सब उसी नेता के ज़रिए हो रहा है जो खुद को दलित-पिछड़ों, गरीब-गुरबों की सबसे बड़ी हितैषी होने का दावा करती है...सरकारी खजा़ने से किए जाने वाले इस पैसे और ज़मीन का इस्तेमाल क्या विद्या के मंदिर, अस्पताल आदि खुलवाने में नहीं किया जा सकता....इतने पैसे से न जाने कितने गांवों का उद्दार हो जाता...उन गांवों का जहां विकास की किरण तक नहीं पहुंच पाती...

मायावती जी माफ़ कीजिएगा...दलित चेतना की आप कितनी भी दुहाई देती हों, सर्वजन समाज का नारा देकर सबको साथ लेकर चलने का अलख जगाती हों, लेकिन इससे तस्वीर नहीं बदलेगी...तस्वीर बदल सकती है अगर आप बुतों में अपना अहम तलाशना बंद करें और सही मायने में आखिरी पायदान पर खड़े लोगों की ज़िंदगी में बदलाव लाने की कोशिश करें...ये कोशिश आपकी राजनीति की ज़रूरत नहीं बल्कि दिल से होनी चाहिए...



स्लॉग ओवर

चार लाइना सुना रिया हूं वाले प्रख्यात हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा ने एक बार खुद ही कविता के ज़रिए ये किस्सा सुनाया था...सुरेंद्र जी दिल्ली की जिस कॉलोनी में रहते हैं, वहां के निवासियों ने सोचा सुरेंद्र जी ने कॉलोनी का नाम रौशन किया है, इसलिए कॉलोनी वालों का भी कोई फर्ज़ बनता है...सब ने तय किया कि कॉलोनी के बीचोंबीच पार्क के पास एक खाली जगह में सुरेंद्र शर्मा जी का बुत लगवा दिया जाए...बात सुरेंद्र जी तक पहुंची...सुरेंद्र जी ने कॉलोनी के कर्ता-धर्ताओं से पूछा कि बुत पर कितना खर्च आएगा...जवाब मिला...यही ढाई-तीन लाख रुपये...सुरेंद्र जी ने इस पर तपाक से कहा...रे मूर्खों, क्यों इतनी परेशानी ले रिये हो, माल अंटी से मेरे हवाले करयो, मुझे खुद ही सुबह-शाम बुत वाली जगह खड़ा देख लियो...

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

ब्लॉग रत्न, ब्लॉग विभूषण, ब्लॉग भूषण, ब्लॉग श्री सम्मान...खुशदीप

अब आप कहेंगे ये कौन से सम्मान है भाई...क्यों जब लाख विवादों के बावजूद भारतरत्न, पद्मविभूषण, पद्मभूषण और पद्मश्री सम्मान बांटे जाते हैं तो क्या ब्लॉगवुड अपने लिए ब्लॉग रत्न, ब्लॉग विभूषण, ब्लॉग भूषण, ब्लॉग श्री सम्मान शुरू नहीं कर सकता...भईया क्या विवाद सिर्फ पद्म सम्मानों की बपौती हैं...और फिर विवादों का हमारी ब्लॉग बिरादरी में कौन सा घाटा है....अगर विवाद ही मानदंड हैं तो कसम उड़ानझल्ले की ब्लॉगवुड किसी से पीछे नहीं रहने वाला...अब विवाद खुद ही शर्म-शर्म में या घिस-घिस कर हार मान ले तो अलग बात, वरना एक-दूसरे की टांग खिंचने में ब्लॉगवुड के जांबाज़ भी किसी से कम थोड़े ही हैं...

अब आप का सवाल होगा पद्म सम्मान तो गबन, हमले, शिकार जैसे गंभीर आरोपों वाले भद्रपुरुषों को भी दिए जा सकते हैं...तो फिक्र नॉट, कानूनी नोटिस जैसी धमकियां तो ब्लॉगवुड में भी शुरू हो गई हैं...बस जल्द ही ऐसा दिन भी आएगा जब ब्लॉगवुड के विवाद बेशर्मी की इतनी ऊंचाइयां छूने लगेंगे कि अपराध से हाथ मिलाने में भी उन्हें कोई हिचक महसूस नहीं होगी...आखिर उम्मीद पर दुनिया कायम है...के भईया, ऑल इज़ वैल...

मैं तो सिर्फ आपको सद् गति के इस मार्ग पर चलने के लिए दो प्रेरणास्रोतों का ही हवाला दे सकता हूं...इन दोनों परमपूजनीय, प्रातस्मरणीय विभूतियों को इस साल भारत सरकार पद्म सम्मानों से विभूषित कर खुद को सम्मानित महसूस कर रही है...आप भी इन महान आत्माओं के दिखाए मार्ग पर चलने का प्रयास करें...जघन्य न सही, साइबर अपराध ही सही, कुछ तो पुण्य अपने नाम के साथ जोड़ें...तभी तो आपका नाम, आपके नेक अपराध के अनुसार ब्लॉग रत्न, ब्लॉग विभूषण, ब्लॉग भूषण या ब्लॉग श्री की सूचियों में डाला जा सकेगा...

लीजिए अब पद्म सम्मान पाने वाली दो विभूतियों से परिचय पाकर खुद को कृतार्थ करें...


1. पद्मभूषण संत सिंह चटवाल



संत सिंह चटवाल अपने पुत्र के विवाह समारोह में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ- फाइल फोटो



परिचय...

होटल व्यवसायी, न्यूयॉर्क और दिल्ली मे बॉम्बे पैलेस के नाम से होटल

विशिष्ट योगदान...

सीबीआई ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की न्यूयॉर्क शाखा से नब्बे लाख डालर कर्ज न चुकाने के मामले में मुकदमा चलाया था, 1996 में गिरफ्तार किया गया, जमानत पर छूटे, बाद में सीबीआई ने मुकदमा वापस ले लिया...क्लिंटन परिवार के नज़दीकी, डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए चंदा जुटा कर देने में माहिर, अमेरिका में खुद को दो बार बैंकों का कर्ज न चुकाने के लिए  दीवालिया घोषित कर चुके हैं...



2. पद्मश्री सैफ़ अल़ी ख़ान





परिचय...

अभिनेता और मंसूर अली ख़ान पटौदी-शर्मिला टैगोर के साहबजादे


विशिष्ट योगदान...

A....फोटो-जर्नलिस्ट हमला केस

पटियाला में 29 सितंबर 2008 को दो फोटो-जर्नलिस्ट पर हमला करने के आरोप में रेलवे पुलिस में मामला दर्ज, आईपीसी की धारा 506 (हत्या की धमकी), 341 (हमला), 536 (संपत्ति का नुकसान) के उल्लंघन की शिकायत

B...1998 में जोधपुर काला हिरण शिकार मामला

वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट की धारा 52 (शिकार के लिए उकसाना) के तहत मामला दर्ज, 1998 में राजस्थान में फिल्म हम साथ साथ हैं की शूटिंग के दौरान काला हिरण शिकार मामले में सलमान खान के साथ सह अभियुक्त...

ब्लॉगर बिरादरी अब भी सोचना बाकी है...अपराध की राह पर बढ़िए, सम्मान पाइए, यशस्वी बनिए...


स्लॉग चिंतन

हम तूफ़ान से लाए है कश्ती निकाल के...


मेरे बच्चों, चटवाल को पद्यभूषण देना संभाल के...

(डिस्क्लेमर...पोस्ट को निर्मल हास्य की तरह लें और कृपया और कोई निहितार्थ न निकालें...)



बुधवार, 27 जनवरी 2010

मैं चला विदेश...खुशदीप


आप भी कहेंगे, ये बैठे बिठाए मुझे क्या सूझा...ये भारत-भारत रटते मैं विदेश का मुरीद कैसे हो गया...भई, अब क्या करूं...गुरुदेव समीरलाल जी समीर, राज भाटिया जी, अदा जी, कविता जी, अर्चना जी, शिखा वार्ष्णेय जी, अल्पना वर्मा जी, श्रद्धा जैन जी, दीपक मशाल सभी विदेश में ही तो है...आखिर कोई तो विदेश में सेट करा ही देगा...लेकिन अब भईया जाएं तो जाएं कैसे...पासपोर्ट तो भूले-बिसरे कई साल पहले बनवा लिया था...लेकिन वीज़ा कैसे बने...ये अमेरिका, कनाडा, यूके, जर्मनी वाले इतनी आसानी से वीज़ा कोई देते हैं...

फिर क्या करूं...बड़ा सोचा, बड़े हाथ पैर मारे...फिर जाकर ठीक जगह पहुंच गया...अब लगता है मेरी समस्या हल हो जाएगी...आप सब भी जानना चाहते हैं विदेश जाने के लिए वीज़ा बनवाने का रामबाण नुस्खा...लीजिए अब ज़्यादा नहीं घुमाता, देखिए वीज़ा वाले बाबा का चमत्कार...





अमेरिका जाने की चाहत रखने वालों के लिए खास हिदायत-

कृपया H1N1 के लिए एप्लाई नहीं करें,इसके लिए पास के अस्पताल के स्वाइन फ्लू वार्ड में आवेदन करें...


( डिस्क्लेमर : पूरी पोस्ट निर्मल हास्य, मैं भारत में ही भला हूं, विदेश जाने का हाथ की रेखाओं में कोई योग नहीं लगता)

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

गणतंत्र बना सीनियर सिटीजन...खुशदीप

साठ साल का हो गया हमारा गणतंत्र...साठ साल की उम्र में नौकरीपेशा इंसान रिटायर हो जाता है...लेकिन हमारा गणतंत्र तो अभी सही ढंग से जवान भी नहीं हुआ...26 जनवरी 1950 को जब संविधान लागू हुआ था उस वक्त देश की 45 फीसदी आबादी यानि 16 करोड़ 20 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे थे...आज 60 साल बाद देश में गरीबी का जो ताजा आंकड़ा है उसके मुताबिक गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग 45 फीसदी से घटकर 37 फीसदी रह गए हैं...लेकिन इस 37 फीसदी को आबादी में तब्दील किया जाए तो ये 40 करोड़ बैठता है...यानि सिर्फ संख्या की बात की जाए तो साठ साल में गरीब ढाई गुणा बढ़ गए...

लेकिन हमारे शहरों में बन रहे मॉल्स, फ्लाईओवर्स, चमचमाती कारें, आलीशान इमारतें, आधुनिक हवाई अड्डे, मेट्रो दूसरी ही कहानी कहते हैं...बाहर से आने वाला कोई भी मेहमान विकास के मेकअप से पुते इस चेहरे को देखकर कह सकता है कि भारत काफी बदल गया है...लेकिन यही बदलाव उसी शहर की मलीन बस्ती (स्लम्स) में उड़नछू हो जाता है...शहरों से निकल कर गांव का रुख कीजिए...बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के दूर-दराज के इलाकों में जाइए, गांवों में घर के नाम पर मिट्टी और फूस की झोपड़ियां, भूमिहीन मज़दूरों के चेहरों से साफ पढ़ा जा सकता है कि साठ साल पहले जैसे उनके दादा-पड़दादा थे, वो ठीक उसी हालात में ज़िंदगी जीने को अभिशप्त हैं...यानि विकास के नाम पर वो एक इंच भी आगे नहीं सरक सके हैं...




अनेकता में एकता का दावा करने वाले इस देश में क्या जात-पात का भेद मिट गया...या विशुद्ध जाति के आधार पर ही राजनीतिक संगठन खड़े किए जाने लगे...आज कोई जय हिंद क्यों नहीं कहता...सिर्फ अपनी भाषा, अपनी बोली, अपने प्रांत के फायदे की ही बात हम सोचते हैं...साथ मिलकर देश को आगे बढ़ाने की हम क्यों नहीं सोचते...जब तक देश से गरीबी, भूख, बेरोज़गारी, अशिक्षा, बीमारियों का सफाया नहीं हो जाता हमारे विकास के सारे दावे खोखले हैं...मैं किसान की हालत को लेकर ही इस पोस्ट में 1950 और आज की स्थिति को लेकर आर्थिक मोर्चे की बात करुंगा...किसान खुशहाल हुआ है या साठ साल  पहले से भी ज़्यादा बदहाल...

अगर हम आर्थिक मानदंडों की बात करें तो भारत ने काफी तरक्की की है...किसी भी देश की माली हालत को उसके सकल घरेलू उत्पाद यानि ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (जीडीपी) से नापा जाता है...इस लिहाज से भारत ने 1950 से आज तक 500 गुना लंबी छलांग लगाई है...1950-51 में देश का जीडीपी 9,719 करोड़ रुपये था जो 2008-09 में बढ़कर 49,33,183 करोड़ रुपये हो गया...साठ साल पहले प्रति व्यक्ति सालाना आय 255 रुपये थी जो अब बढ़कर 33,283 रुपये हो गई...लेकिन इसी बीच देश की आबादी तीन गुना से भी ज़्यादा बढ़ गई...इसी दौरान इस्पात का उत्पादन 50 गुना, सीमेंट का उत्पादन 70 फीसदी, बिजली का उत्पादन 128 फीसदी और खाद्यान का उत्पादन चार गुना बढ़ा...लेकिन क्या देश के दूर-दराज के गांवों को इस तरक्की का कोई फायदा मिला...

ये सही है जब देश आज़ाद हुआ तो अंग्रेज इसे दाने-दाने को मोहताज छोड़ गए थे...एक अनुमान के मुताबिक ब्रिटिश अपने आखिरी 20 साल में देश से 15 करोड़ पाउंड हर साल निचोड़ कर ले गए...कुल मिलाकर बात की जाए तो अंग्रेज बीस साल में 3 अरब पाउंड झटक कर ले गए...बीसवीं सदी के पहले 50 साल में देश ने सिर्फ 0.1 फीसदी सालाना विकास दर से तरक्की की...दुनिया में सबसे ऊपजाऊ ज़मीन होने के बावजूद ब्रिटिश हुकूमत के दौरान 25 अकाल देश ने देखे और इसमें तीन से चार करोड़ लोगों को जान गंवानी पड़ी...

आज़ादी के बाद देश में जो बड़ा बदलाव आया है वो ये है कि 1950 में जीडीपी में 53 फीसदी हिस्सेदारी खेती-किसानी की होती थी जो अब घटकर 21 फीसदी रह गई है...दूसरी ओर उद्योग की हिस्सेदारी इसी दौरान जीडीपी में 14 से बढ़कर 27 फीसदी हो गई, सर्विस सेक्टर की हिस्सेदारी 1950 के 33 फीसदी से बढ़कर अब 52 फीसदी हो गई है...यानि 1950 में जो भूमिका कृषि सेक्टर निभा रहा था अब कमोवेश वो रोल सर्विस सेक्टर के पास चला गया है...आज भी देश में 60 फीसदी आबादी का गुजारा कृषि से ही चलता है लेकिन पिछले एक दशक से कृषि उत्पादन में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है...उलटे खेती की लागत में ज़रूर तेज़ी से इज़ाफा हुआ है...ये स्थिति बड़ी खतरनाक है...अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई भी उतार-चढ़ाव होता है उसका सीधा असर देश में महंगाई के तौर पर दिखता है...

सीधी सी बात है आपके लिए चीनी महंगी होती है तो इसका मतलब ये नहीं गन्ना किसानों को कोई फायदा हो रहा है...चीनी महंगी इसलिए हो रही है कि चीन ने अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से बड़ी मात्रा में चीनी खरीदी...हमारे लिए खरीदने को चीनी ही नहीं बची...और जो चीनी खरीदी गई उसके बेचने वालों ने मुंहमांगे दाम लिए...यानि आयातित चीनी के महंगे दाम चुकाने के लिए हमारी जेब पर ही डाका पड़ा......फायदा बिचौलियों, कमीशनखोरों और जमाखोरों ने उठाया...किसान को तो खुद ही खाने के लाले पड़े हुए हैं...पिछले एक दशक में बड़ी संख्या में युवकों ने कृषि से मुंह मोड़कर शहरों की ओर रुख किया...लेकिन क्या इतने युवकों को खपाने के लिए देश में रोज़गार का सृजन हुआ...सिर्फ असंगठित सेक्टर में मजदूरों की संख्या बढ़ती गई...नतीजा शहरों में भी स्लम बढ़ते गए...

पिछले दो दशक में आर्थिक सुधारों ने धन्ना सेठों को और धनी किया...सर्विस सेक्टर में काम करने वाले मध्यम वर्ग के सपनों को पंख लगाए नतीजन उपभोक्ता वस्तुओं का बड़ा बाज़ार भी साथ में विकसित हुआ...लेकिन गरीब और गरीब होता गया...दाल-रोटी का जुगाड़ करना भी अब गरीब के लिए चांद-तारे तोड़ना जैसा होता जा रहा है...फिर भी हम कह रहे हैं देश आगे बढ़ रहा है...लेकिन गरीब को पीछे छोड़ ये लंगड़ी चाल क्या देश को सच में आगे ले जाएगी...क्या ये सवाल गणतंत्र के सीनियर सिटीजन बनने यानि 61 वें साल में प्रवेश करने पर कोई मायने रखता है...या हम सिर्फ अपने लिए ही कार का नया ब्रैंड खरीदने के लिए सोचते रहेंगे....

स्लॉग गीत

गणतंत्र दिवस पर याद कीजिए भारत कुमार यानि मनोज कुमार और उनकी फिल्म पूरब और पश्चिम के इस गीत को जो देशभक्ति के लिए आ़ज भी नस-नस में जोश भर देता है....

दुल्हन चली हा बहन चली, पहन तीन रंग की चोली...


स्लॉग ओवर

कल मक्खन ने बड़ा मासूम सा सवाल मुझसे पूछा...मैं तो जवाब क्या ही देता, आप खुद ही उस सवाल पर गौर कर देखिए...

मक्खन...भाईजी, इस साल 26 जनवरी कौन सी तारीख को पड़ेगी...

रविवार, 24 जनवरी 2010

ये पढ़िए, सोच बदल जाएगी...खुशदीप

एक अस्पताल के रूम में दो बुज़ुर्ग भर्ती थे...दोनों ही गंभीर रूप से बीमार थे...एक बुज़ुर्ग को रोज अपने बेड पर एक घंटा बैठने की इजाज़त दी जाती थी ताकि उसके फेफड़ों में भर जाने वाले पानी को शरीर से बाहर निकाला जा सके...उस बुज़ुर्ग का बेड कमरे की इकलौती खिड़की के पास मौजूद था...लेकिन दूसरा बुजु़र्ग उठकर बैठने वाली हालत में भी नही था...इसलिए अपने बेड पर हमेशा पीठ के बल लेटा रहता था...बड़ी मुश्किल से कोहनियों के सहारे ही लेटे-लेटे कभी-कभार सिर ही ऊंचा कर सकता था...

दोनों बुज़ुर्ग घंटों आपस में बातें करते रहते थे...वो अपनी पत्नियों की बात करते, परिवार की बात करते, नौकरी, छुट्टियां कैसे बिताते, यानि हर विषय पर बात करते...इसके अलावा पहला बुज़ुर्ग जब एक घंटे के लिए कमरे की खिड़की के पास बैठता तो अपनी ओर से बाहर का सारा नज़ारा दूसरे लेटे हुए बुज़ुर्ग को सुनाता था...




पहला बुजु़र्ग इतने दिलचस्प और विविध ढंग से रोज़ बाहर की रंगों भरी ज़िंदगी के किस्से सुनाता कि लेटे हुए बुज़ुर्ग को अपनी बीमारी और दर्द सब भूल जाता, वो अपने को आम लोगों की तरह ही स्वस्थ और ज़िंदगी से ही भरा हुआ महसूस करने लगता...ख़िड़की के बाहर पार्क, एक मनोरम झील, झील में अठखेलियां करती बत्तखें, पार्क में बच्चों की शरारतें, एक-दूसरे के हाथों-हाथों में डालकर दुनिया की सुध-बुध खोए युवा जोड़े...पहला बुज़ुर्ग सारे दृश्य उकेरता रहता और दूसरा बुज़ुर्ग आंखें बंद कर उन्हीं रंगों में खो जाता...

एक दिन पहले बुज़ुर्ग ने बाहर से गुज़र रही रंग-बिरंगी परेड का आंखों देखा हाल भी दूसरे बुज़ुर्ग को सुनाया...साउंडप्रूफ़ कमरा होने की वजह से लेटा हुआ बुज़ुर्ग परेड के बैंड की धुनों को तो नहीं सुन सकता था लेकिन दिमाग में उसका असर पहले बुज़ुर्ग के शब्दों के मुताबिक महसूस ज़रूर कर सकता था...

इसी तरह दिन, हफ्ते, महीने गुज़रते गए....

एक सुबह नर्स कमरे में रोज़ाना की तरह दोनों बुज़ुर्गों को स्पंज बाथ दिलवाने के लिए गर्म पानी लेकर आई तो खिड़की के पास वाले बेड के बुज़ुर्ग को बिना हरकत किए सोए देखा...नर्स ने नब्ज चेक की...बुज़ुर्ग के चेहरे पर असीम शांति थी और वो रात को नींद में ही दुनिया को छोड़कर जा चुका था...ये देखकर नर्स की भी आंखें नम हो गईं...उसने अस्पताल के स्टॉफ को बुलाकर पहले बुज़ुर्ग के पार्थिव शरीर को ले जाने के लिए कहा...

दूसरे बुज़ुर्ग को भी पहले बुज़ुर्ग का साथ छूट जाने का बहुत दुख हुआ...उसने नर्स से आग्रह किया कि क्या उसे खिड़की के साथ वाले बेड पर शिफ्ट किया जा सकता है...नर्स ने बुज़ुर्ग की इच्छा का मान रखते हुए तत्काल उसे दूसरे बेड पर शिफ्ट करा दिया...कमरे से नर्स के जाने के बाद दूसरे बुज़ुर्ग ने कोहनी के बल सिर उठाते हुए खिड़की के बाहर झांकने की कोशिश की...लेकिन ये क्या खिड़की के बाहर तो सिर्फ खाली दीवार थी...

दूसरा बुज़ुर्ग हैरान....बेड के साथ लगा बेल का बटन दबा कर नर्स को बुलाया...नर्स से पूछा कि वो पहला बुज़ुर्ग जिस मनोरम झील, पार्क की बात करता था, वो कहां हैं...ये सुनकर नर्स की आंखें फिर गीली हो गईं और धीमे शब्दों में जवाब दिया...उनकी आंखों में रौशनी नहीं थी और वो तो इस खाली दीवार तक को नहीं देख सकते थे...


स्लॉग चिंतन




खुद जैसे भी मुश्किल हालात से गुज़र रहे हो लेकिन दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने में ही जीवन का असली आनंद है...

दुख बांटो तो आधा हो जाता है, लेकिन खुशी बांटों तो दुगनी हो जाती है...

अगर सही में अमीर बनना चाहते हो तो उन चीज़ों को गिनो जिन्हें पैसे से खरीदा नहीं जा सकता...

आज (TODAY) सबसे बड़ा तोहफ़ा (GIFT) है, इसीलिए तो ये प्रेज़ेंट (PRESENT) है...

शनिवार, 23 जनवरी 2010

मियांजी पधारो म्हारे ब्लॉगवुड...खुशदीप

बधाइयां जी बधाइयां...समूचे ब्लॉगवुड के लिए खुशियां मनाने का मौका जो आया है...आरतियां उतारो...मंगलगीत गाओ...आज हमारे बीच नया मेहमान जो आया है...नाम जानना चाहते हैं...तो नाम है...मियां जी...ज़रा सुनो !...क्या कहा नाम अजब सा है...अरे नाम अजब-गज़ब नहीं होगा तो क्या होगा...इन्होंने इंसान योनि से कोई जन्म लिया है...ये नन्हे मियांजी तो बहुत पहुंची हुई आत्मा हैं...ये दुनिया पर अवतरित होने से पहले गर्भ में नौ महीने नहीं रहे हैं...पैदा होते ही मुखारबिंद से मधुर वचनों की बरसात करने वाले मियां जी खुद दावा कर रहे हैं कि वो पिछले पांच साल से ब्लॉगवुड की हर हरकत पर नज़र रख रहे हैं...इन्होंने दुनिया में आने से पहले ही कई बरसाती नदी-नालों को ब्लॉगवुड में आने के बाद वक्त के थपेड़े खाने के बाद गुम होते देखा है...अब ये कलयुगी अवतार नहीं तो और क्या हैं...अब आप सोचेंगे कि ऐसी महान आत्मा को दुनिया में लाने के लिए ज़िम्मेदार कौन होगा...धन्य है वो जनक जिसने मियां जी को जन्म दिया...अब आप उस जनक को बधाई देने के लिए बेचैन होंगे...लेकिन मुश्किल यही है मियां जी भी अपने प्रोफाइल में ज़्यादा कुछ नहीं बता रहे और उनका जनक भी सामने नहीं आ रहा...न जाने क्यों वो जनक बदनामी के डर से घुला जा रहा है...ब्लॉगवुड से आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा...

ये मियां जी बॉलीवुड, हॉलीवुड, टॉलीवु़ड, लॉलीवुड और ब्लॉगीवुड, न जाने कौन-कौन से वुड की ख़ाक़ छान चुके हैं...अगर आप इनके अनमोल वचनों के बारे में ज़्यादा नहीं जानते तो आज मेरी पोस्ट पर जाकर इनकी टिप्पणियों को पढ़ आइए...

अब आप मेरे बारे में इनकी राय जान चुके होंगे...अब मियांजी की ओर से मुझे दिए गए आशीर्वादों और उन पर मेरे जवाबों को सुनिए...

मियांजी का आशीर्वाद नंबर 1

मैं आत्ममुग्ध हूं....

मेरा जवाब

मियां जी मेरी आंखे खोलने के लिए धन्यवाद...मैं तो यही समझता था कि ब्लॉगिंग में मैंने ऐसा कोई तीर नहीं मारा कि आत्ममुग्ध होता फिरूं...वैसे मियांजी मेरी किसी एक पोस्ट का भी हवाला दे देते जिसमें मेरी महानता का बखान होता...


मियांजी का आशीर्वाद नंबर 2
पिछले कुछ दिनों से मैं रोज़ ब्लॉगवुड शब्द का इजाद करने के लिए अपनी पीठ ठोक रहा हूं...वरिष्ठ और गरिष्ठ ब्लॉगर भी इस काम के लिए मुझे दाद पर दाद दिए जा रहे हैं...

मेरा जवाब

अगर मेरी याददाश्त साथ दे तो मैंने महफूज और सलमान खान की तुलना करते हुए 12 जनवरी को अपनी पोस्ट..महफूज इक झूमता दरिया... में अनायास ब्लॉगवुड और बॉलीवुड शब्दों का इस्तेमाल किया था...उसी पोस्ट पर अदा जी ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि उन्हें ब्लॉगवुड शब्द अच्छा लगा...उस पोस्ट के बाद मैंने अपनी किसी पोस्ट में नहीं कहा कि मैंने ब्लॉगवुड शब्द को इजाद किया...हां, ब्लागर बिरादरी के लिए ज़रूर तीन-चार जगह ब्ल़ॉगवुड शब्द इस्तेमाल करता रहा...हां, कल...हर ब्लॉग कुछ कहता है...वाली पोस्ट पर मैंने ब्लॉगर बिरादरी से ये जानना चाहा कि
ब्लॉग जगत के लिए ब्लॉगवुड शब्द इस्तेमाल करने पर सबकी राय क्या है...इसी बात को विवाद का रंग देने के लिए मियांजी को इस दुनिया में आना पड़ा...

मियांजी का आशीर्वाद नंबर 3

इसे आशीर्वाद की जगह दावा कहा जाए तो ज़्यादा अच्छा होगा...स्वयंभू गुरु की तरह मियांजी ने मुझे बताया कि ब्लॉगवुड नहीं सही शब्द ब्लॉगीवुड होता है...इस व्युत्पत्ति के लिए मियां जी ने मुंबई से बॉलीवुड, अमेरिका से हालीवुड, कोलकाता से टॉलीवुड और लाहौर से लॉलीवुड शब्द निकलने का हवाला दिया...बकौल मियां जी मुझे झटका देने वाला एक और बम बाकी था कि कुश जी बहुत पहले ही ब्लॉगीवुड शब्द को इजाद कर चुके हैं और सारे गरिष्ठ ब्लॉगर इस बात को जानते हैं...

मेरा जवाब

शुक्र है मैंने अनजाने में ब्लॉगीवुड का इस्तेमाल नहीं कर दिया, ब्ल़ॉगवुड ही किया...नहीं तो मुझ पर आज कॉपीराइट, पेटेंट न जाने कौन कौन से कानूनों के तहत मुकदमा दर्ज हो जाता...भइया ब्ल़ॉगीवुड हो या ब्ल़ॉगवुड, कोई इन शब्दों के पहले इस्तेमाल के लिए किसी को माला तो पहनाने जा नहीं रहा ...अब अगर कुशजी ने पहली बार ब्लॉगीवुड इस्तेमाल किया तो बड़ी अच्छी बात है कि हमारे ख्याल मिलते जुलते हैं...पिछले पांच महीने से मैं ब्लॉगिंग में हूं, कम से कम मैंने तो किसी को ब्लॉगवुड या ब्लॉगीवुड का इस्तेमाल करते देखा नहीं...और अगर दो साल पहले कुशजी ने ब्लॉगीवुड का इस्तेमाल किया था तो वो मुझे कैसे पता चल जाता...और ये ऐसा मुद्दा ही कहां है जिसे विवाद की शक्ल दे कर मेरी तरफ बंदूक तानी जा रही है...मियांजी ने तो उस पोस्ट का लिंक दिया नहीं जिसमे कुश जी ने बोलीवुड़ या ब्लागीवुड़ जैसे शब्दों का इस्तेमाल एक व्यंग्य में किया था...लेकिन कल जैसे ही बेनामी मियांजी ने मेरे पर तोप दागी वैसे ही बिना वक्त गंवाए कुश जी ने आकर पहली टिप्पणी में अपने उस व्यंग्य का लिंक दिया

http://chitthacharcha.blogspot.com/2008/10/blog-post_2006.html
आज की चर्चा बोलीवूड़ स्टाइल में.


कुश जी का एक बेनामी टिप्पणी पर अचानक ऐसा करना मुझे आश्चर्यजनक लगा...मेरी एक बात समझ नहीं आई कि कुश जी ने पहली टिप्पणी में सिर्फ लिंक क्यों दिया...वहां एक भी शब्द क्यों नहीं लिखा...वहीं मियांजी की भर्तस्ना क्यों नहीं की...इसलिए मैंने टिप्पणी कर कुश जी से पूछा...

"@कुश जी,

आपने सिर्फ लिंक देकर छोड़ दिया...बाकी एक भी शब्द नहीं लिखा...मुझे याद पड़ता है तो आप पिछले पांच महीने में सिर्फ एक बार मेरी किसी पोस्ट में कमेंट करने आए थे...आज...मियां जी...ज़रा सुनो!!! के जन्म लेने के साथ आप फिर अचानक अवतरित हो गए...कहीं इस नवजात शिशु से आपका कोई संबंध तो नहीं..."

जय हिंद...


मेरा कुश जी से इससे पहले संवाद सिर्फ बबली प्रकरण में हुआ था...पुराने सब ब्लॉगर तो उस प्रकरण के बारे में जानते हैं लेकिन नये ब्ल़ॉगर जो नहीं जानते उनके लिए मैं वो लिंक दे देता हूं....कि किस तरह बबली जी की पोस्ट पर कमेंट करने को लेकर कई वरिष्ठ ब्लागर्स की टांग खींचने की कोशिश की गई थी...मैं तो उस वक्त खैर नया नया था लेकिन मुझे भी बाकायदा एक हिटलिस्ट बनाकर उसमें डाल दिया गया था.....इस पोस्ट पर कुश जी और मेरे बीच टिप्पणियों के ज़रिए हुए संवाद पर खास तौर पर गौर कीजिएगा...

हां, मैं हूं बबली जी का वकील...

ये जो मैं लिंक दे रहा हूं, ये चिट्ठाचर्चा की 16 सितंबर 2009 वाली पोस्ट है इसे पढ़ेंगे तो आपको पता चल जाएगा बबली जी का नाम लेकर किस तरह कई वरिष्ठ और कनिष्ठ ब्लॉगर्स को निशाना बनाने की साज़िश रची गई थी...

कौन है आज का ब्लोगर ऑफ़ द डे?

जैसे उस विवाद का अंत हुआ था...कल भी कुश जी ने मेरी पोस्ट पर दूसरी टिप्पणी में मियांजी जैसे बेनामी टिप्पणीकारों की भर्त्सना करते हुए उनका आईपी अड्रैस पता करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था...मैं भी यही चाहता हूं कि एक बार माहौल खराब करने वाले या दो ब्ल़ॉगर के बीच कटुता पैदा करने की साजिश करने वाले इन मियांजी जैसे बेनामियों का सिर गंजा कर सरे बाज़ार जूते लगने चाहिए...कुश जी की दूसरी टिप्पणी जस की तस...

"मैं एक वेब डेवेलपमेंट कंपनी में हु.. कई बार किसी वेबसाईट के लिए डोमेन बुक करते है तो पता चलता है किसी ने बहुत पहले ही लिया हुआ है.. इसका ये मतलब नहीं कि हमने कोपी किया.. बस हमारी सोच और उनकी सोच मिलती है.. वैसे भी जो कुछ हम सोचते है वो कोई और भी कही ना कही सोच रहा होता है... ऐसा कई बार हो जाता है...सागर ने इस पोस्ट का लिंक दिया था.. लंच से पहले अपना लिंक तो दे ही दिया था जहाँ मैंने ये शब्द खोजा था.. आपने भी खोज लिया.. अच्छी बात है..फेक प्रोफाईल से काम लेना बहुत गलत है.. मेरे खिलाफ तो कई लोगो ने इस्तेमाल किया है... एक बार किसी ने डिम्पल के बारे में कायरता पूर्ण टिपण्णी की थी बहुत ही घटिया.. महफूज़ भाई से गुज़ारिश है कृपया उन लोगो के आई पी का पता लगाये.. ताकि इस ब्लोगिंग से कुछ तो गन्दगी दूर हो.. मेरी आवश्यकता पड़े तो बताइयेगा महफूज़ भाई..


खुशदीप भाई से कोई शिकायत नहीं.. ख़ुशी हुई कि अपनी सोच वाले और भी कई है.."


इस बीच मेरे पास सागर का भी फोन आया...जिसमें उसने बताया कि बेनामी की हरकत और मेरे कमेंट से कुशजी आहत हुए हैं...सागर ने ये भी कहा कि इस प्रकरण को यहीं खत्म कर देना चाहिए....सागर ने पोस्ट पर मुझे टिप्पणी में इस प्रकरण पर कुछ न लिखने की सलाह भी दी...

"शुक्रिया खुशदीप बाबू,
देर से आने के लिए मुआफी... सबसे पहले मेरा नाम का जिक्र अपने पोस्ट में किया इसके लिए शुक्रिया... सुबह से देख रहा हूँ इस पोस्ट को लेकिन फुर्सत निकल कर कमेन्ट नहीं कर पाया... कुश जी को लिंक मैंने ही दिया था क्योंकि आज वो चिठ्ठाचर्चा करने वाले थे... दुःख इस बात पर हुआ कि कुछ वरिष्ठ ब्लॉगर भी बड़े छोटे मन के हैं... इसपर ज्यादा कुछ नही कहूँगा ... बस इतना याद दिलाना है कि कल आप कुछ और लिखने वाले हैं जिसका आपने वादा किया है... आप उस पर एकाग्र हों.. आप खुद इतना अच्छा माहौल बना कर लिखते हैं... पत्रकारिता का स्टुडेंट होने के नाते मैंने हमेशा से आपको पढ़ा... और आपने जिस तरेह से ब्लॉग को नियमित और मेंटेन रखा है वो प्रशंशनीय है... आपके पढने वाले कुछ नियमित पाठक हैं... उसे एक बेहतरीन पोस्ट से वंचित ना करें... बांकी सब चीजें आती जाती रहती हैं... अभी ज्यादा नहीं लिख सकता बॉस शनिवार को ऑफिस में ही होते हैं... .).).) हाँ सोमवार को नयी पोस्ट मत लिखिए... मैं सन्डे को पढ़ नहीं पाता... अपनी ब्लॉग्गिंग दफ्तर से खाली समय में होती है..."

लेकिन इसी बीच मेरे सवाल पूछने से नाराज होकर कुश जी ने तीसरी और आखिरी बार मेरी पोस्ट पर आकर ये टिप्पणी दी....

"@खुशदीप जी
मैंने अपने कमेन्ट के ऊपर आपका कमेन्ट पढ़ा नहीं था.. अगर पढ़ लिया होता तो कमेन्ट ही नहीं करता.. गलती थी जो यहाँ पर कमेन्ट किया.. जो लोग कान बंद करके बैठते है उन्हें आप कुछ समझा नहीं सकते.. आपको आपका शब्द मुबारक..और हाँ अपनी बात कहने के लिए मुझे बेनामी बनने की जरुरत भी नहीं.. गलती के लिए माफ़ी यहाँ दोबारा आ गया.."

अब लो कल्लो बात की तरफ से फाइनल ब्लास्ट..



मैंने तो कहीं नहीं कहा कि मेरा ब्लॉगवुड पर पेटेंट है, लेकिन कुश जी की आठ अक्टूबर
2008 से पहले भी 19 जुलाई 2008 को तरुण जी ब्लॉगीवुड नहीं ब्लोगवुड शब्द का इस्तेमाल कर चुके हैं...लिंक ये रहा...

भले ही फ्लाप आश्रम चलायें लेकिन इन ब्लोग को मत पढ़िये



अब आपने सब कुछ पढ़ लिया...मैंने अपनी तरफ से सब कुछ साफ करने की कोशिश है...अब अगर मैं गलत हूं तो सभी बड़े और सम्मानित जन मेरे कान पकड़ सकते हैं...मेरा इस पोस्ट को लिखने का आशय यही था कि ये बेनामी टिप्पणीकार किसी भी पोस्ट पर आकर ज़हर बुझे तीर चलाकर ब्ल़ॉगवुड में सौहार्द के माहौल को तार-तार करना चाहते हैं...इस गंदगी को रोकने के लिए ज़रूर कुछ न कुछ किया जाना चाहिए...

बाकी ब्लॉगवुड के इस विवाद को यहीं दफन कर देना चाहिए...किसी को ब्ल़ॉगवुड शब्द अच्छा लगता है तो इस्तेमाल करे, नहीं लगता तो न करे...ये अपनी-अपनी सुविधा का सवाल है...मेरे पास वैसे भी ऐसे पचड़े पालने के लिए वक्त नहीं है...गलत बात न किसी से करता हूं और न ही गलत बात किसी की सहता हूं...अब इस मसले पर मैं आगे कुछ नहीं कहूंगा...चलिेए छोड़िए ये सारा चक्कर, आइए मूड बदलने के लिए स्लॉग ओवर पर...

स्लॉग ओवर

मक्खन ने मक्खनी को आगाह करते हुए कहा कि अगर उसके लिए कोई फोन आए
तो कहना कि घर पर नहीं हूं...फोन आता है...मक्खनी फोन उठाती है... कहती
है...वो घर पर है...मक्खन घूरते हुए कहता है...ये क्या कहा, मैंने क्या कहा था...
मक्खनी...फोन तुम्हारे लिए नहीं मेरे लिए था....

हर ब्लॉग कुछ कहता है...खुशदीप

नैरोलेक पेंट का एड शायद आपने भी देखा होगा...हर घर कुछ कहता है...ज़िंदगी का हिस्सा बन चले ब्लॉगवुड की बात करूं तो यहां भी हर ब्लॉग अपने खास अंदाज़ में कुछ कहता है...आपको बस दिल से सुनना होता है...पढ़ना होता है...आज मैंने एक पोस्ट पढ़ी जिसमें अलग अलग विषयों का उल्लेख करते हुए पांच-पांच शीर्ष ब्लॉगों के नाम सुझाने की गुज़ारिश की गई थी...पहले तो मैं इस पोस्ट का औचित्य ही नहीं समझ पाया...ये कोई क्लास नहीं है, जहां पांच-पांच टॉप स्टूडेंट्स को छांटा जाए....दूसरी बात ब्लॉग्स को विषय की हदों में बांधना भी मुझे ऐसा लगता है जैसे बहते पानी पर बांध बना देना...अरे जो जी में आता है बिंदास लिखिए....जो जीवन आप जी रहे हैं, उसमें कई बातें आप दूसरों से बांट नहीं पाते...अंदर ही दबा लेते हैं...ब्लॉग आपको मौका देता है दिल के गुबार को बाहर लाने का...

यहां मैं नज़ीर देना चाहूंगा जवां खून वाले दो छोटे ब्लॉगर भाइयों की...एक महफूज़ और दूसरा सागर...महफूज़ तो आलराउंडर है, कविता, गद्य, शोध....कुछ भी रवानगी के साथ कह सकता है...लेकिन सागर ज़्यादातर कविता में ही अपने भावों को व्यक्त करता हूं...बोल्ड अंदाज़ में कुछ भी लिख जाता है...साफ़-सपाट...महफूज़ और सागर, दोनों में एक बात बड़ी अच्छी है, दोनों अपनी कमज़ोरियों को बिल्कुल नहीं छुपाते...डंके की चोट पर लिखते हैं...यकीन मानिए यही चीज़ इंसान को अपने पर भरोसा करना सिखाती है...कई बार आप ये सोच कर कि लोग क्या कहेंगे, चुप रहते हैं...या फिर अपने को वैसा दिखाने की कोशिश (प्रीटैंड) करते हैं जो कि असल में आप है नहीं...मैं कहता हूं निकाल फेंकिए अपने अंदर से इस हिचक को...बेबाक अंदाज़ में अपने को अभिव्यक्त कीजिए...अपनी खामियों को भी और अपनी खूबियों को भी...आप देखेंगे कि जितना अपने बारे में आप सच लिखेंगे, उतना ही पाठकों में ज़्यादा पसंद किए जाएंगे...

जब भी कोई नया ब्लॉगर आता है तो उसकी यही ख्वाहिश होती है कि रातों-रात उसकी पहचान बन जाए...पांच महीने पहले मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया था तो मेरे साथ भी यही हुआ था...मैं खुशकिस्मत रहा...मुझे थोड़े वक्त में ही ब्लॉगवुड में बुज़ुर्गों से आशीर्वाद, हमउम्र साथियों से प्रोत्साहन और छोटों से भरपूर प्यार मिल गया...इससे मेरा हौसला बहुत बढ़ा...यही हौसला है जो मुझे, चाहे मैं कितना भी थका क्यों न हूं...कुछ न कुछ नया लिखने की शक्ति दे देता है...कमेंट्स के ज़रिए मुझे ब्लॉगवुड का प्यार भी हाथोंहाथ मिल जाता है...अगर कोई मेरे विचारों से असहमति जताता है तो उसे मैं अपने लिए और अच्छी बात मानता हूं...इसे इसी तरह लेता हूं कि मेरी पोस्ट ने सभी को कुछ न कुछ कहने को उद्वेलित किया...इस मामले में मैं प्रवीण शाह भाई का बड़ा कायल हूं...वो विरोध भी जताते हैं तो बड़े संयम और शालीन तरीके से...उनसे संवाद (विवाद नहीं) कायम कर आनंद आ जाता है...यही तो ब्लागिंग का मज़ा है...हां, एक बात मैं ज़रूर अपने युवा साथियों से कहना चाहता हूं...ब्लॉगिंग पर्सन टू पर्सन ट्यूनिंग की बात है...आपको ब्लॉग विशेष के ज़रिए उस ब्लॉगर के मिज़ाज को समझने की कोशिश करनी चाहिए...कमेंट्स देते हुए भी अपने शब्दों का चयन पूरी तरह तौल-मोल के बाद करना चाहिए...एक गलत शब्द भी आपके बारे में गलतफहमी खड़ी कर सकता है...ब्लॉगिंग भी एक किस्म का रेडियो पर कमेंट्री सुनने जैसा है...जैसे कि आप कमेंट्री सुनते समय अपने अंदाज़ से दिमाग में चित्र बनाते रहते हैं, ऐसे ही ब्लॉग पर आपकी लेखनी (टाइपिंग) से आपके व्यक्तित्व के बारे में दूसरों के बीच पहचान बनती है..

यहां याद रखना चाहिए कि बंदूक से निकली गोली और ज़ुबान से निकले बोल, कभी वापस नहीं आते...इसलिए ऐसी बात कही ही क्यों जाए, जिस पर बाद में पछताना पड़े...और रही बात आपकी पहचान बनने की, तो वो सिर्फ आपका लेखन ही बनाएगा...दूसरा ओर कोई शार्टकट यहां काम नहीं करता...एक बार आपका रेपुटेशन बन जाए तो फिर उसी मानक के अनुरूप आपको अच्छा, और अच्छा लिखते रहने के लिए प्रयास करते रहना चाहिए...आप ईमानदारी से ये काम करेंगे तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको आगे बढ़ने से रोक नहीं सकती...

चलिए स्लॉग ओवर में आपको आज रेपुटेशन की अहमियत पर ही एक किस्सा सुनाता हूं...लेकिन पहले आप सभी से एक सवाल...मैंने तीन-चार पोस्ट पहले लिखी अपनी पोस्ट...महफूज़ इक झूमता दरिया...में समूचे ब्लॉग जगत या बिरादरी के लिए ब्लॉगवुड शब्द का इस्तेमाल पहली बार किया था...अदा जी ने इसे पसंद करते हुए कमेंट भी किया था...आज दीपक मशाल ने भी अपनी पोस्ट में इस शब्द का इस्तेमाल किया तो मुझे बहुत अच्छा लगा...आप सब को ब्लॉग जगत के लिए ब्लॉगवुड नाम कैसा लगता है...अगर अच्छा लगता है तो इसे ही इस्तेमाल करना शुरू कर दीजिए...एक बार ये प्रचलन में आ गया तो बॉलीवुड को भी टक्कर देने लगेगा...लेकिन पहले आप अपनी राय बताइए कि ब्लॉगवुड शब्द कैसा है...

स्लॉग ओवर

रॉल्स रॉयस कार पिछली सदी की शुरुआत में बनना शुरू हुई थी...ये कार रखना तभी से दुनिया भर में स्टेट्स-सिंबल माना जाता रहा है...ऑफ्टर सेल्स सर्विस में भी इस कार को बनाने वाली कंपनी का जवाब नहीं है...


                                     
1905 मॉडल रॉल्स रॉयस कार, मानचेस्टर के म्युज़ियम ऑफ साइंस एंड इंडस्ट्री में सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखा गया दुनिया का सबसे पुराना वाहन


देश को आज़ादी मिलने से पहले की बात है...एक भारतीय सेठ ने शहर में अपना रूतबा दिखाने के लिए विलायत से रॉल्स रॉयस कार मंगाने का फैसला किया...शिप के ज़रिए कार भारत आ भी गई...कार आते ही सेठ का घर-घर में चर्चा होने लगा...लेकिन एक महीने बाद कार में खराबी आ गई...कार चलने का नाम न ले...ये देख सेठ को बहुत गुस्सा आया...सेठ ने फौरन कार बनाने वाली कंपनी को टेलीग्राम भेजा...किस बात का आपका नाम है....एक महीने में आपकी रॉल्स रॉयस कार ने जवाब दे दिया...अब बताओ क्या करूं मैं इसका...टेलीग्राम पढ़ने के बाद कंपनी में हड़कंप मच गया...आखिर दुनिया भर में साख का सवाल था...अगले ही दिन कंपनी ने इंजीनियरों की पूरी टीम भारत रवाना कर दी...टीम ने सेठ के पास आकर रॉल्स रॉयस कार का मुआयना किया...कार का बोनट खोलते ही इंजीनियर हंसने लगे...सेठ को ये देखकर और भी गुस्सा आया...बोला..मैंने आपको यहां हंसने के लिए नहीं कार का नुक्स ठीक करने के लिए बुलाया है...इस पर इंजीनियरों की टीम के हेड ने कहा...सॉरी सेठ जी, हमें बताते हुए खुद शर्म आ रही है कि इस कार को बनाते वक्त हम इसमें इंजन डालना ही भूल गए थे...इस पर सेठ ने कहा...ये कैसे हो सकता है, कार तो एक महीना चली है...इस पर इंजीनियरों की टीम के हेड ने कहा...वो एक महीना तो कार अपने नाम के रेपुटेशन से ही चल गई.....

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

डॉक्टर टीएस दराल के तीन मरीज़...खुशदीप

सुबह डाक्टर टी एस दराल अपने नर्सिंग होम में बैठे हुए थे...एक पहलवाननुमा मरीज़ कमर दर्द से कराहता हुआ डॉक्टर दराल के चैम्बर में पहुंचा...मरीज़ का बुरा हाल था...

डॉक्टर साहब ने उसे बेड पर लिटा कर चेक किया...फिर कहा...ओके, ठीक हो जाओगे...लेकिन तुम्हारी कमर को हुआ क्या...मरीज़ बोला...डॉक्टर साहब आप से क्या छुपाना...मैं एक नाइट रेस्तरां में बॉक्सर (हुड़दंगियों पर नज़र रखने वाला) का काम करता हूं...रात भर ड्यूटी देकर सुबह घर पहुंचा तो अपने बेडरूम से मुझे कुछ आवाज़ें सुनाई दी...मैं बेडरूम में दाखिल हुआ तो वहां मेरी पत्नी के अलावा कोई नहीं था...लेकिन बॉलकनी का दरवाजा खुला हुआ था...मैं झट से वहां पहुंचा...बॉलकनी से नीचे झांक कर देखा तो एक आदमी अपने कपड़े ठीक करता हुआ भाग रहा था...मैंने आव देखा न ताव, बॉलकनी में रखा पुराना फ्रिज ही उठा कर उस आदमी पर दे मारा...वो फ्रिज उठाने के चक्कर में ही मेरी कमर का बल निकल गया...

ड़ॉक्टर दराल ने बॉक्सर जी को वार्ड में भेजा ही था कि दूसरा मरीज़ और आ पहुंचा...उसकी हालत तो और भयावह थी...ऐसे जैसे किसी ने हथोड़े का वार कर चपटा बना दिया हो...दर्द से छटपटाता हुआ...डॉक्टर साहब ने पूछा...भई, हौसला रखो...पहले ये बताओ, ऐसा हाल तुम्हारा किस वजह से हुआ....दूसरा मरीज़ बोला......डॉक्टर साहब...कुछ न पूछो...कुछ महीने पहले छंटनी में मेरी नौकरी चली गई थी..तभी से बेरोज़गार हूं...आज एक कंपनी के बुलावे पर इंटरव्यू देने जाना था...पर अलार्म लगाना भूल गया...सुबह देर से उठा तो इंटरव्यू का टाइम सिर पर आ गया था...बस किसी तरह मुंह धो कर झटपट कपड़े अड़ा कर ही भागा जा रहा था...पेंट की बेल्ट बांध रहा था कि किसी ने मल्टीस्टोरी बिल्डिंग की पता नहीं कौन सी बॉलकनी से भारी-भरकम फ्रिज मेरे ऊपर दे मारा...

ये सुनकर डॉक्टर को बॉक्सर की बात याद आ गई लेकिन बोले कुछ नहीं...दूसरे मरीज की मरहम पट्टी कर उसे भी वार्ड में भेज दिया...दूसरा मरीज चैम्बर से रुखसत ही हुआ था कि एक तीसरा मरीज़ और आ पहुंचा...डॉक्टर साहब उसे देखते ही पहचान गए...वो मक्खन था...मक्खन का हाल तो पहले दोनों मरीजो से भी ज़्यादा बुरा था...डॉक्टर दराल ने ठंडी सांस लेकर पूछा कि अब भईया मक्खन तुम्हे क्या हुआ...

मक्खन के मुंह से बड़ी मुश्किल से शब्द निकले....वो..ओ...ओ...डॉ...क्टरररर...सा..अ..आब....मैं...
सुबह...फ्रिररररिज़ ...में......बैठा....थ..अआ....क....कि...सी...ने...उठअअआ...कअअर....
थ..ररर्रड....फ्लोओओर....से...नीईचेएएएए...देएएएए...माआआआररररा....


(वो डॉक्टर साहब, मैं सुबह फ्रिज़ में बैठा था कि किसी ने उठा कर थर्ड फ्लोर से नीचे दे मारा)....

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है...खुशदीप

सीने में जलन, आंखों में तूफ़ान सा क्यों है...
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है....

पहले लिंक पर इस गीत को सुन लीजिए....फिर जो मैं इस पोस्ट में कहने जा रहा हूं, उसका दर्द अच्छी तरह समझा जा सकेगा...1979 में आई फिल्म गमन में फारूख शेख उत्तर भारत से मुंबई जाकर टैक्सी चलाकर गुज़ारा करते हैं...कल महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने फरमान जारी किया है कि मुंबई में टैक्सी वही चला सकेगा जो पंद्रह साल से मुंबई में रह रहा हो, मराठी जानता हो...बाल ठाकरे या राज ठाकरे मराठी माणुस की ज़मीन पर खुल कर राजनीति करते है...उसी मराठी माणुस को साधने के लिए कथित राष्ट्रवादी पार्टियां कांग्रेस और एनसीपी भी पीछे नहीं
है...लेकिन क्या मराठी माणुस बनाम उत्तर भारतीय का राग अलाप कर नफ़रत के बीज बोने वाले राजनीति के इन मठाधीशों ने कभी मुंबई से भी पूछा है कि वो क्या चाहती है...क्या मुंबई के दो पैरों में से एक पैर काट देने के बाद मुंबई उसी रफ्तार से दौड़ सकती है जिसके लिए वो जानी जाती है...




कहते हैं मुंबई कभी सोती नहीं...यहां की रफ्तार कभी थमती नहीं...यहां की चमक-दमक सिल्वर स्क्रीन पर उतरती है तो दूर बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश में बैठे बेरोज़गार युवक की आंखे चौंधियाने लगती हैं...फिर वही युवक सपनों की दुनिया का दिमाग में ख़ाक़ा बनाकर मुंबई की ओर खिंचा चला आता है...इस उम्मीद में कि यहां उसे पैसा, शोहरत सभी कुछ मिलेगा...अभाव की ज़िंदगी के काले सच पर परदे की रंगीनियों का सफेद झूठ भारी पड़ता है...

लेकिन मुंबई में जीने की जद्दोजहद का सच सपने देखने जैसा आसान नहीं है...यहां की कड़वी हक़ीक़तें इक लम्हा उम्मीद जगाती हैं तो दूसरे ही लम्हे इंसान को तोड़ कर रख देती हैं...लेकिन इस सब के बीच भी ज़िंदगी कहीं रूकती नहीं, चलती रहती है...मुंबई का मराठी माणुस हो या उत्तर भारत से आया कोई भैया...सब को जीने के लिए मुंबई से कुछ न कुछ मिलता रहता है...किसी को कम तो किसी को ज़्यादा...लेकिन ये ज़्यादा पाने की कशमकश ही टकराव को ज़मीन देती है...इस सब को जानने के बावजूद कि स्थानीय और बाहरी की ज़िंदगी आपस में इतनी गुथी हुई है कि एक-दूसरे के बिना दो कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता...भला वो कैसे बस आपको इसके लिए एक दो नज़ीर देता हूं...

गुड मार्निंग मुंबई कहने के लिए बेड टी की ज़रूरत ज़्यादातर लोगों को होती है...लेकिन ये चाय की प्याली बिना दूध के बन नहीं सकती...और मुंबई के बड़े हिस्से को दूध उत्तर भारत के लोग ही मुहैया कराते हैं...मुंबई की मशहूर जोगेश्वरी डेरी में छह सौ दूध वाले हैं और ये सभी के सभी उत्तर भारतीय है...यहां तीन हज़ार भैंसों से तीस हज़ार लीटर दूध रोज़ आसपास के घरों में पहुंचता है...कमोवेश यही सूरत मुंबई की दूसरी डेरियों की भी है....

अगर मुंबई को पाकसाफ़ दिखना है तो यहां के बाशिंदों के कपड़े भी झकाझक बेदाग़ दिखना ज़रूरी है...यही कपड़े साफ़धुलने के लिए धोबी तलाव जाते हैं...वहां कपड़े धोने वाले दस हज़ार लोगों में से तीन-चौथाई से ज़्यादा उत्तर भारतीय हैं...मुंबई को रफ्तार यहां की टैक्सियां देती हैं...और इन टैक्सियों को रफ्तार देने के लिए एक्सीलेटर पर जिन लोगों के पैर पड़ते हैं, उनमें भी एक बड़ा हिस्सा उत्तर भारतीयों का है...

मुंबई की इस कॉस्मोपालिटन ज़िंदगी का संदेश साफ़ है...मराठी माणुस बनाम उत्तर भारतीय का सवाल मुंबई के आम आदमी से ज़्यादा घाघ राजनेताओं की ज़रूरत है...इस सब के बीच मुंबई का खुद का सवाल है...इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों हैं, आइना हमें देखकर हैरान सा क्यों है....

(NB...आपसे निवेदन है कि मैंने...किस मिट्टी के बने होते हैं जननायक...वाली अपनी पिछली पोस्ट पर पत्रकारिता के धर्म, जननायक, गांधी परिवार, वंशवाद, राहुल गांधी की भूमिका के बारे में पोस्ट जितनी लंबी दो टिप्पणियों में अपनी बात साफ की है...उस पर प्रवीण शाह भाई की टिप्पणी भी आई है...मुझे अच्छा लगेगा यदि आप उस पोस्ट पर दोबारा जाकर मेरे विचार जानेंगे...वसंत पंचमी की आप सबको बहुत बहुत बधाई...)

बुधवार, 20 जनवरी 2010

किस मिट्टी के बने होते हैं जननायक...खुशदीप

जननायक कौन होता है...वो जो राजनीति की गोटियों को साधता हुआ सत्ता के शीर्ष पर पहुंच जन-जन का स्वयंभू भाग्यविधाता बन जाता है...या जननायक वो होता है जो सत्ता के लोभ को तज कर जन-जन के दिलों पर राज करता है...सत्ता ताकत तो दिलाती है लेकिन सम्मान व्यक्ति के आचरण से ही मिलता है...

कल पूरा कोलकाता सड़क पर था...एक नायक को आखिरी विदाई देने के लिए...कॉमरेड ज्योति बसु को लाल सलाम देने के लिए...हाल फिलहाल के इतिहास में बंगाल में ऐसा कोई मौका नहीं आया जब किसी नेता को विदाई देने के लिए ऐसा जनसैलाब उमड़ा हो...ज्योति बाबू ने तेइस साल तक बंगाल पर एकछत्र राज करने के बाद सन 2000 में खुद ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर बुद्धदेव भट्टाचार्य को उस पर बिठा दिया था...एक दशक तक खुद को कोलकाता के इंदिरा भवन तक सीमित रखने के बाद भी ज्योति बसु कभी अप्रासंगिक नहीं हुए...लोगों के दिलों से दूर नहीं हुए...सबूत कल मिला...



कोलकाता में ज्योति बसु को लोगों का आखिरी सलाम

एक तरफ ज्योति बाबू... इकलौते कम्युनिस्ट नेता, जो प्रधानमंत्री की कुर्सी के एकदम नजदीक पहुंच गये थे...अपनी पार्टी में वो बस एक वोट के चलते प्रधानमंत्री की कुर्सी से चूक गए...बाद में उस एक वोट को इतिहास का सबसे गलत वोट कहा गया...वोट देने वाले ने भी माना, वह ऐतिहासिक गलती थी...अब याद कीजिए कुछ ऐसे नेताओं को जो जनता के प्यार से नहीं परिस्थितियों के फेर की वजह से देश में सत्ता की सबसे आला कुर्सी तक पहुंचे...ऐसे ही चेहरों में मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, पी वी नरसिंहा राव के नाम जेहन में आते हैं...ये सब ही अब इस दुनिया में नहीं है...लेकिन क्या इनमें से किसी एक के लिए भी कहीं वैसा जनसैलाब उमड़ा जैसा कोलकाता में ज्योति बसु के लिए उमड़ा...ज़ाहिर है जो दिलों पर राज करते हैं वो सत्ता की ताकत के मोहताज नहीं होते...

खाते-पीते और जाने-माने परिवार में जन्मे और विलायत में पढ़ाई करने वाले ज्योति बसु बंगाल की राजनीतिक धारा के अलग छोर रहे...शायद इसीलिए लोग उन्हें बाबू कहते थे तो उसमें उनका प्यार और हक साफ झलकता था...ज्योति बाबू सत्ता में थे तो उनकी पुलिस ने ममता बनर्जी को घसीटकर राइटर्स बिल्डिंग से लालबाजार के लाकअप में पहुंचा दिया था...लेकिन बुज़ुर्ग नेता के रूप में ज्योति बसु बंगाल के कस्टोडियन बन गये...ममता बनर्जी सिंगूर में टाटा के ज़मीन अधिग्रहण के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठीं तो ज्योति बसु परेशान दिखाई दिए...इसलिए नहीं कि बंगाल में उनके वाममोर्चा की सरकार को चुनौती पेश आ रही थी बल्कि इसलिए कि उन्हें ममता की बिगड़ती सेहत की फिक्र थी....

ज्योति बाबू ने सच्चे वामपंथी कैडर के नाते आंखें और पूरा देहदान करने का ऐलान किया था...उनकी इस इच्छा के अनुरुप 17 जनवरी को उनके निधन वाले दिन उनके दोनों नेत्र निकाल लिए गए थे...उनके नेत्रों ने दो लोगों को इस दुनिया को देखने का मौका दिया...जहां तक उनके देहदान की बात है, उनका शव कोलकाता के सेठ सुखलाल करनानी मेडिकल अस्पताल (एसएसकेएम) पहुंचा दिया गया...यानि मरने के बाद भी एक नायक की देह जन-जन को फायदा देने के काम ही आएगी....

नायक ऐसे ही होते हैं...अब याद कीजिए ज़रा लोकनायक जय प्रकाश नारायण की...कांग्रेस की ज़मीन की चूलें हिलाकर जेपी लोकनायक बने थे...संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है...का नारा देने वाले जेपी ने आठ अक्टूबर 1979 को शरीर त्यागा था तो पूरा पटना उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए सड़कों पर निकल आया था...जेपी भी कभी सत्ता के किसी पद पर नहीं रहे लेकिन समग्र क्रांति के ज़रिए उन्होंने जन-जन के दिलों पर हुकूमत की...जननायक ऐसे ही होते हैं...

अब ज़रा आपको देश की सरहद से बाहर ले जाता हूं...याद कीजिए एक प्रिंसेज को...राजकुमारी डायना को...जीते जी डायना अपनों से प्यार और सम्मान के लिए तरसती रहीं...सम्मान उन्हें मिला मरने के बाद...वो भी अपनों से कहीं ज़्यादा लोगों से...छह सितंबर 1997 को पूरा लंदन आंखों में आंसु लिए अपनी इस पीपल्स प्रिंसेज को अंतिम विदाई देने के लिए सड़कों पर उमड़ आया था...दिलों पर राज करने वाले ऐसे ही होते हैं...जिन्होंने खुद को सत्ता के लोभ से ऊंचा कर लिया उनका मुकाम लोगों के दिलों में और भी ऊंचा हो गया...

लेकिन यहां एक सवाल मेरे जेहन में आता है प्रधानमंत्री की कुर्सी तो सोनिया गांधी ने भी ठुकरा कर त्याग की मिसाल दी थी...तो क्या वो भी एक जननायिका हैं...यहां संदेह इसलिए होता है क्योंकि वो खुद को नहीं अपने पुत्र राहुल गांधी को गांधी परिवार के वारिस के तौर पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहती हैं...यानि लोगों से ज़्यादा पुत्र के भविष्य की फिक्र यहां देखी जा सकती है...राहुल गांधी डिस्कवरी ऑफ इंडिया की मुहिम के तहत पूरा देश नाप रहे हैं...खुद को प्रधानमंत्री के लायक बनाने से पहले राहुल पूरे देश की ज़मीनी हक़ीकत समझ लेना चाहते हैं...लेकिन मैं कहता हूं राहुल गांधी के पास प्रधानमंत्री के पद से भी ऊंचा उठने का मौका है...राहुल ऐलान कर दें कि वो कभी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे...जैसा कि राहुल कहते हैं एक देश में दो देश के फर्क को पाटना है...राहुल अपनी सारी ऊर्जा इसी मिशन पर लगाएं...राहुल अगर ऐसा करने की हिम्मत दिखा सकते हैं तो बेशक वो प्रधानमंत्री न बन पाएं लेकिन लोगों के दिलों पर उनकी हुकूमत को कोई खारिज नहीं कर सकेगा...लेकिन क्या राहुल ऐसा कर पाएंगे...उस रास्ते पर आगे बढ़ पाएंगे जो इंसान को नेता से आगे जननायक के कद तक पहुंचा देता है...क्या राहुल बनेंगे पीपल्स प्रिंस...

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

छिछोरेपन का 'न्यूटन' लॉ...खुशदीप

आप अगर साइंस या फिजिक्स के छात्र रहे हैं तो न्यूटन द ग्रेट के बारे में ज़रूर जानते होंगे...वहीं जनाब जिन्होंने गति (मोशन) के नियम बनाए थे...लेकिन ये बात फिजिक्स पढ़ने वाले छात्रों की है...कुछ हमारे जैसे छात्र भी होते थे जो क्लास में बैठना शान के खिलाफ समझते थे...गलती से कभी-कभार खुद ही पढ़ लेते थे तो पता चलता था कि प्रोटॉन हो या न्यूट्रान या फिर इलैक्ट्रॉन सब का एटम (परमाणु) में स्थान निर्धारित होता है...प्रोटॉन और न्यूट्रान तो न्यूक्लियस में ही विराजते हैं...इलैक्ट्रॉन बाहर कक्षाओं में स्पाईडरमैन की तरह टंगे रहते हैं...लेकिन कुछ हमारे जैसे फ्री इलैक्ट्रॉन भी होते हैं जो न तो न्यूक्लियस में बंधे रहना पसंद करते थे और न ही किसी कक्षा में लटकना...सौंदर्यबोध को प्राप्त करने के लिए कॉलेज के बाहर ही सदैव चलायमान रहते थे...

इलेक्ट्रोन का चुम्बकीय क्षेत्र बहुत गतिशील फोटोन को अपनी ओर आकर्षित करता है, प्रेम करता है... जब भी कोई विद्युत आवेश गतिशील होता है तो एक चुम्बकीय क्षेत्र बनता है...गतिशील फोटोन का भी चुम्बकीय क्षेत्र होता है... जब इलेक्ट्रान और फोटोन दोनों के चुम्बकीय क्षेत्र समान आवृत्ति पर गुंजन करते हैं तो तो गूटर-गूं, गूटर-गूं होना निश्चित है...

अब पास ही गर्ल्स डिग्री कॉलेज में इतराते-बल खाते फोटोनों (या फोटोनियों) का गुरुत्वाकर्षण चुंबक की तरह हमें खींचे रखता तो हम क्या करते...ये तो उन बुजुर्गों का कसूर था जिन्होंने दोनों डिग्री कालेजों को साथ ही बसा दिया था...बस बीच में लक्ष्मण रेखा की तरह एक दीवार बना दी...अब आग और घी इतना साथ रहेंगे तो कयामत तो आएगी ही...अरे ये क्या मैं तो पिछले जन्म के क्या इसी जन्म के राज़ खोलने लगा...भाई पत्नीश्री भी कभी-कभार हमारे ब्लॉग को पढ़ लेती है... मुझे घर में रहने देना है या नहीं...

खैर छोडि़ए इसे अब आता हूं न्यूटन जी का नाम लेकर कॉलेज में बनाए हुए हमारे छिछोरेपन के नियम से...



न्यूटन द ग्रेट

"हर छिछोरा तब तक छिछोरापन करता रहता है...जब तक कि सुंदर बाला की तरफ़ से 9.8 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से नुकीली हील वाला सैंडल उसकी तरफ नहीं आता...ये फोर्स (बल) बेइज्ज़ती
कहलाता है...और ये बल शर्मिंदगी के समानुपाती (डायरेक्टली प्रपोशनल) होता है...अगर छिछोरापन फिर भी कायम (कॉन्स्टेंट) रहता है तो बेइज्ज़ती की ये प्रक्रिया अनंत ( इंफिंटी) को प्राप्त होते हुए अजर-अमर हो जाती है..."


और इस तरह हम भी अमरत्व को प्राप्त हुए...

रविवार, 17 जनवरी 2010

ब्लॉगर बिरादरी !!! मुझे शेरसिंह से बचाओ...खुशदीप

ले आया भईया मैं जान पर खेल कर सबूत...सुबह जो मैंने ब्रेकिंग न्यूज़ दी थी...उसका सबूत आप तक लाने के लिए बस ये समझ लीजिए मुझे शेरसिंह के मुंह में हाथ देना पड़ा...वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी कि शेर महाराज को आज उनकी पुरानी गुले-गुलज़ार 'बिल्लो चमन बहार' (शेरनी) ने चाय पर बुलाया हुआ था...बस मुझे मौका मिल गया, शेर सिंह की मांद में घुसने का...कसम उड़ानझल्ले की अगर शेर महाराज  को मेरी भनक भी मिल गई होती तो अब तक तो वो मुझे चबा-चबा कर गटकने के बाद हाज़मोला के गोलों से अपना हाज़मा दुरुस्त कर रहे होते...

राजे-रजवाड़ों, नवाबों, शिकारचियों के यहां आपने शेर की खालें दीवारों से लटकती देखी होंगी...लेकिन शेरसिंह के डैन में मैंने अपनी आंखों से ब्लॉगरों की खालें लटकती देखीं...नीचे बाकायदा तख्तियां भी लटकती देखीं...फलाने ने फलाने दिन शेरसिंह के ख़िलाफ़ किसी टिप्पणी या पोस्ट में उलजलूल कुछ बका था...सच मानों ये मंज़र देखने के बाद मेरी बाज़ुओं के रोए तो क्या सिर के बाल तक खड़े हो गए थे...ठीक वैसे ही जैसे टीवी पर इलैक्ट्रिक स्विच की एड आती है- शॉक लगा, शॉक लगा...

घिग्घी मेरी बंधी हुई थी फिर भी मैं अपने पेशे के धर्म को निभाता रहा...आखिरकार मैं ढूंढते-ढूंढते उस सबूत तक पहुंच ही गया जिसे देखकर आपको भी यकीन हो जाएगा कि शेरसिंह के बारे में जो मैंने सुबह दावा किया था वो सौ फ़ीसदी सही था...शेरसिंह का दुनिया के जानेमाने शूटर और व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत के इकलौते ओलम्पिक्स गोल्ड मेडल विनर अभिनव बिंद्रा से शूटिंग की ट्रेनिंग लेना जारी है...लीजिए आप भी देखिए वो सबूत...



अभिनव बिंद्रा ट्रेनिंग देने के लिए तैयार




शेरसिंह 'ललित शर्मा' निशाना लेते हुए



शेरसिंह 'ललित शर्मा' की शूटिंग की एक और बानगी


अब एक टंकी पर चढ़ने वाला ही दूसरे टंकी पर चढ़ने वाले के दिल के दर्द को समझ सकता है...अभिनव ये कह कर टंकी पर चढ़े कि शूटिंग एसोसिएशन और भारतीय खेल अधिकारियों का रवैया सही नहीं है, इसलिए वो शूटिंग ही छोड़ देंगे...लेकिन टंकी पर पहले से ही हनुमान कुमार झा और शेरसिंह शर्मा चढ़े बैठे थे...अभिनव से दुआ-सलाम होने के बाद तीनों ने एक-दूसरे से अपना दर्द बांटा...अभिनव ने कहा...देखो ओलम्पिक्स में सदी तक भारत पसीना बहाता रहा लेकिन व्यक्तिगत स्पर्धा में गोल्ड की हवा तक नहीं मिली...मैंने गोल्ड दिलाया लेकिन अब मुझसे ही कह रहे हैं ट्रायल देना होगा...अभिनव ने खुद का दुखड़ा सुनाने के बाद हनुमान कुमार झा और शेरसिंह शर्मा से अपनी बीती सुनाने को कहा...

प्यार के दो बोल सुनते ही दोनों फट पड़े...एकसुर में बोले...कितनी जी-जान से अपना कीमती वक्त निकालकर हम ब्लॉगवुड के लिए चर्चा का चारा तैयार किया करते थे...क्या सिला दिया इन एहसानफरामोशों ने...हमारी ईमानदारी पर ही उंगली उठा दी...चारे की पोटलियों में कहीं अपना नाम नहीं दिखा तो आसमान सिर पर खड़ा कर दिया...शेरसिंह ने शिकायत के लहजे में अभिनव से कहा...शेर हैं, महीनों भूखे रह लेंगे...लेकिन कभी घास नहीं खाएंगे...अब आप ही बताओ, अभिनव भाई टंकी पर न चढ़े तो और क्या करें...अभिनव भाई, कसम से जी कर रहा है कि आपकी राइफल लेकर टंकी से उतरें और फिर देखें कि कौन हमसे पंगा लेता है...दोनों का दर्द सुनकर अभिनव की आंखों में भी आंसू आ गए...उसने कहा, फिक्र मत करो, मैं दूंगा तुम्हे ट्रेनिंग...और फिर वही टंकी पर ट्रेनिंग सेशन शुरू हो गया...

अंदर की ख़बर है हनुमान कुमार झा और शेरसिंह शर्मा पूरी तरह ट्रेंड होने के बाद ही टंकी से उतरे हैं...अब मुझे अपनी फिक्र हो रही है...इस पोस्ट का हनुमान कुमार झा और शेरसिंह शर्मा को पता चल गया तो मेरा तो शहीद होना तय है...अब यही गाना मेरे लबों पर है...

कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों...अब तुम्हारे हवाले ब्लॉगिंग-ए-हेवन साथियों...


(निर्मल हास्य)

(और ये हास्य नहीं है- ललित शर्मा सच में बहुत अच्छे शूटर हैं...देश में कई बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर मेडल अपने नाम कर चुके हैं...समझ गए न...)

शनिवार, 16 जनवरी 2010

टंकी पर श्री श्री ब्लॉग शिरोमणि...खुशदीप

आज महेंद्र मिश्र जी ने समय चक्र में एक पोस्ट डाली-आख़िर जा टंकी का है भला ?.... महेंद्र जी ने बड़े दिलचस्प और रोचक ढंग से ब्लॉगर नगर और उसकी टंकी का ज़िक्र किया...मैंने तब ही टिप्पणी में वादा किया था कि रात को टंकी की महिमा पर कुछ लिखूंगा ज़रूर...अब उसी वादे को पूरा कर रहा हूं...वैसे भी पिछले तीन-चार दिन से कुछ सीरियस मुद्दों पर ही लिखे जा रहा था...इसलिए आज आपके साथ-साथ अपना भी ज़ायका बदलना चाहता था...महेंद्र जी का शुक्रिया...उन्होंने मुझे ये मौका दिया...

हां तो जनाब आते हैं ब्लॉगर नगर और उसकी अद्भुत टंकी पर...महेंद्र जी ने ब्लॉगर नगर के बाशिंदों की तादाद 1760 बताई है...इस टंकी की महिमा का बखान करना इसलिए ज़रूरी है कि कोई भी इस टंकी की चोटी को फतेह किए बिना ब्लॉगर-ए-आज़म के तख्त पर नहीं बैठ सकता...जिस तरह बादशाह अकबर की सेकुलर छवि पर कोई उंगली नहीं उठा सकता...इसलिए ब्लॉगर-ए-आज़म के ख़िताब को विवादों से परे रखने के लिए हिंदी उपनाम श्री श्री ब्लॉग शिरोमणि से विभूषित करने की  भी साथ ही घोषणा की गई...

शार्ट में महेंद्र जी के बड्डे और छोटे ने टंकी पर किसी के चढ़ने के तरीके बताए थे...उसका लब्बो-लुआब ये निकला था...

पहला-कोई अच्छा लिखता दिखे तो उसे ताड़ के पेड़ पर चढाने की जगह टंकी पर चढ़ा दो और जब उससे खुद उतरते न बने तो हंसी-ठिठोली के ज़रिए नीचे उतार दो...


दूसरा- इतनी उंगली करो (माफ़ कीजिएगा, इससे सटीक खांटी शब्द कोई मिल नहीं पाया) कि वो अक्ल का मारा परेशान होकर खुद ही स्पाइडरमैन की तरह टंकी पर सरपट चढ़ता चला जाए..


तीसरा- टंकी पर चढ़ने की इस रफ़्तार को देखकर कोई और भोला भी वैसे ही नक्शे-कदम पर चलते हुए पीछे-पीछे टंकी पर चढ़ने लगे...

ये सब चल ही रहा था...कि ब्लॉगर नगर के बड़े-बुजुर्गों ने सोचा कि ये ब्लॉगिंग है पिछले साल के लोकसभा चुनाव वाली बीजेपी नहीं...जिसे देखो खुद को फन्नेखां समझते हुए अनुशासन हाथ में ले रहा है...इसलिए अनुशासन बनाए रखने के लिए महापंचायत बुलाई गई...एजेंडे में सिर्फ एक सूत्र पर ही विचार किया गया...कैसे किसी को टंकी पर चढ़ाया और उतारा जाए ?...सबसे पहले टंकी का मुआयना किया गया...अरे ये क्या टंकी में ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियां तो बनी ही नहीं थीं...

दिमाग के काफ़ी घोड़े दौड़ाने के बाद तय हुआ कि जिस तरह दही की हांडी तोड़ने के लिए एक के ऊपर एक चढ़ कर रास्ता बनाया जाता है...ऐसे ही सर्वाधिक सम्मानित ब्लॉगर को टंकी पर चढ़ाने के लिए सभी ब्लॉगर अपने कंधों का योगदान देंगे...टंकी पर सम्मानित ब्लॉगर कब पहला कदम रखेगा, इसका भी शुभ मुहूर्त निकलवाया गया...ठीक उतने बजे ही सम्मानित ब्लॉगर टंकी पर पदार्पित होंगे...सम्मानित ब्लॉगर को टंकी पर चढ़ाने वाला दिन भी आ गया....बाजे-गाजे के साथ सभी ब्लॉगर बारातियों की तरह सज-धज कर आ पहुंचे...सम्मानित ब्लॉगर को एक के ऊपर एक कंधा देते हुए टंकी के शिखर की ओर चढ़ाया जाने लगा...लेकिन विधि का विधान देखिए...जैसे ही मुहूर्त का वक्त आया, सम्मानित ब्लॉगर महोदय मुहूर्त का टाइम भूल गए...उन्होंने नीचे वाले से पूछा...नीचे वाला भी ठहरा ब्लॉगर, सिर्फ अपने अलावा उसे दूसरे की पोस्ट क्यों याद रहे, वो भी मुहूर्त का टाइम भूल गया...इस तरह सबसे नीचे वाले तक का नंबर आ गया...याद तो उसे भी नहीं था लेकिन वो बाकी ब्लॉगर से ज़्यादा समझदार था...उसने अपने ऊपर वाले से कहा...तू यही ठहर... मैं अंदर कंट्रोल रूम में सारी व्यवस्था पर थर्ड रेफ्री की तरह नज़र रख रहे सबसे बुज़ुर्ग ब्लॉगर से मुहूर्त का टाइम पूछ कर आता हूं...जैसे ही मुहूर्त का सही टाइम हुआ, सबसे नीचे वाला ब्लॉगर ठीक उसी टाइम निकल कर कंट्रोल रूम की ओर चल दिया...अब उसके निकल जाने के बाद सर्वाधिक सम्मानित ब्लॉगर समेत बाकी ब्लॉगर महानुभावों का क्या हाल हुआ....उस पर सोचना मना है....

(डिस्क्लेमर...इस लेख को सिर्फ निर्मल हास्य की तरह लें...और कोई निहितार्थ मत ढूंढिएगा प्लीज़...)

क्या आप अपने बच्चों को अच्छी तरह जानते हैं...खुशदीप

क्या आप अपने बच्चों को अच्छी तरह जानते हैं...उनके दिमाग में हर वक्त क्या रहता है, आप उसे पढ़ना जानते हैं...मुझे आज ये मुद्दा उठाने के लिए मजबूर किया है ऐसी कुछ उम्मीदों ने जो हक़ीक़त बनने से पहले ही दम तोड़ गईं...इन उम्मीदों को बचाया जा सकता था...इन छोटे-छोटे सपनों का दम निकालने के लिए कौन ज़िम्मेदार है...सबसे आगे रहने की अंधी दौड़...एजुकेशन सिस्टम या खुद आप और हम...

मध्य प्रदेश के देवास में दसवीं की छात्रा सपना चौहान ने स्कूल में ही सल्फास खाकर खुदकुशी कर ली...सपना ने सुसाइड नोट में बड़ा-बड़ा लिखा "I QUIT"...ठीक वैसे ही जैसे फिल्म थ्री इडियट्स में हॉस्टल में रहने वाला एक छात्र गले में फंदा डालकर जान देने से पहले लिख कर छोड़ जाता है...बताया जाता है कि सपना को स्कूल के एक टीचर ने एक ही दिन में साइंस प्रैक्टीकल की कॉपी पूरी करने के लिए धमकाया था...सपना दबाव में टूट गई और जान देकर अपने मां-बाप के सपनों को भी तोड़ गई...

कोल्हापुर का दशरथ पाटिल, मुंबई के माटुंगा में बीकॉम फर्स्ट इयर की छात्रा शिवानी सेठ, विरार में दसवीं का छात्र सूरज, नासिक की प्रियंका और धनश्री पाटिल....कई नाम हैं खुदकुशी करने वाले छात्र-छात्राओं की फेहरिस्त में...अकेले महाराष्ट्र मे पिछले 12 दिन में 25 युवा उम्मीदें दम तोड़ चुकी हैं...क्या बच्चों में आगे निकलने की होड़ का चेहरा इतना ख़ौफनाक हो गया है कि बच्चों को दबाव सहने की जगह खुदकुशी में ही छुटकारा नज़र आने लगा है...ऐसी स्थिति लाने के लिए ज़िम्मेदार कौन है...आज ज़रा बच्चों की दिनचर्या पर ज़रा नज़र दौड़ाइए...स्कूल में पढ़ाई, ट्यूशन में पढ़ाई, घर पर पढ़ाई...और अगर रिलेक्स होने के लिए थोड़ा ब्रेक लेते हैं तो कंप्यूटर, टीवी या वीडियो गेम...और किसी काम के लिए घर से बाहर निकलना तक नहीं...आउटडोर खेलने के लिए जाएं तो जाएं कहां...कहीं पार्क बचे ही नहीं...और अगर कहीं हैं भी तो वहां इतनी बंदिशें लगा दी जाती हैं कि बच्चे उन्हें दूर से ही राम-राम कर लेना बेहतर समझते हैं...

इंटरनेट, आरकुट ने बच्चों की ऐसी साइट्स तक भी पहुंच बना दी है जहां तनाव, अवसाद को बढ़ावा देने वाले लेख भरे रहते हैं...ये सब बच्चों को शारीरिक दृष्टि से तो नुकसान पहुंचा ही रहा है उनकी मनोस्थिति पर भी बुरा असर डाल रहा है...कहते हैं न अच्छी चीज़ सीखने में उम्र बीत जाती है और बुरी चीज़ पकड़ने में दो मिनट नहीं लगते...कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ देने वाली फिल्म थ्री इ़डियट्स को सपना चौहान की खुदकुशी के लिए कटघरे में खड़ा किया जा सकता है...लेकिन क्या वास्तव में सारा कसूर फिल्म का ही है...फिल्म में दबाव से बचने के लिए खुदकुशी का रास्ता कहीं नहीं दिखाया गया है...फिल्म में तो यही संदेश दिया गया है कि सिर्फ अच्छे मार्क्स ही कामयाबी की गारंटी नहीं होते...दूसरा बहुत कुछ भी ज़रूरी होता है आदमी की सक्सेस के लिए...

क्या आपने नोट किया है कि बच्चे फेसबुक, आरकुट पर वर्चुअल में अपने को एक्सप्रेस करते हुए पूरा दिन बिता सकते हैं...लेकिन किसी अनजान आदमी या परिचित से भी फोन पर भी बात करनी हो तो कन्नी काटने की कोशिश करते हैं...दरअसल बच्चों ने अपनी ही एक दुनिया बना ली है...छोटी उम्र, बड़ी उम्मीदें...सक्सेस के लिए शार्टकट की उधेड़बुन में ये अपरिपक्व मस्तिष्क न जाने क्या-क्या सोच लेते हैं...और अगर इन्हें उस सोच के मुताबिक असल ज़िंदगी में होता नहीं दिखता तो ये अतिरेक में कोई भी कदम उठाने  का भी दुस्साहस कर सकते हैं...हमारी दिक्कत ये है कि हम अपनी उम्र के हिसाब से सोचते हैं...और बच्चों से भी यही उम्मीद रखते हैं कि वो भी वैसा ही सोचें...ऐसा करते हुए आप ये भूल जाते हैं कि आप भी एक झटके में इस स्थिति में नहीं पहुंचे...क्या-क्या पापड़ नहीं बेले...आपके पास तज़ुर्बा दर तज़ुर्बा बनी सोच है...बच्चों के पास जब वो तजु़र्बा ही नहीं है तो ये कैसे मुमकिन है कि आप जैसे नज़रिए से ही दुनिया को समझने लगे...आज काउसलिंग की भी बड़ी वकालत की जाती है...लेकिन बच्चे को जो काउंसलिंग माता-पिता या घर के दूसरे सदस्यों से मिल सकती है वो बाहर से हर्गिज़ नहीं मिल सकती..


ये सही है कि सभी बच्चों का आईक्यू एक-सा नहीं हो सकता...लेकिन ये भी सच है कि अगर बच्चा पढ़ाई में ज़्यादा तेज़ नहीं है तो उसमें कोई न कोई हुनर ऐसा ज़रूर होगा, जिसमें वक्त बिताना उसे अच्छा लगता होगा....बच्चे में छिपी इन छोटी-छोटी क्वालिटी को पहचानिए...उसे प्रोत्साहित कीजिए...साथ ही ये बताना शुरू कीजिए कि करियर के लिए अब बेशुमार अवसर उपलब्ध हैं...अब वो ज़माने लद गए जब बच्चा इंजीनियरिंग या मेडिकल एंट्रेस में सफल नहीं होता था तो उसे बेकार मान लिया जाता था...आज हर फील्ड में संभावनाएं हैं...बच्चे में हुनर कैसा भी है उसे निखार कर करियर की शेप देने वाले संस्थान बाज़ार में मौजूद है...बच्चों को बस ये समझाना है कि अगर एक रास्ता बंद होता है तो सौ रास्ते और खुल जाते हैं...दिल्ली में आजकल बीए, बीकॉम, बीएससी कराने वाले कॉलेजों में भी प्लेसमेंट के लिए कंपनियां आने लगी हैं....बच्चों को बताया जाए कि अगर वो ज़िंदादिली के साथ चुनौतियों का सामना करते हैं तो किसी भी तरह की पढ़ाई के बाद शानदार करियर बना सकते हैं...दसवीं, बारहवीं में परसेंटेज का पहाड़ न खड़ा कर पाने या एंट्रेस एग्ज़ाम में कामयाबी न मिलने से ही दुनिया नहीं रुक जाती...




बच्चों को उन महान हस्तियों की नज़ीर दी जा सकती हैं जिन्होंने नाकामी पर नाकामी झेलने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और उन ऊंचाइयों तक ही पहुंच कर दम लिया जहां से सारी दुनिया बौनी नज़र आती है..सिर्फ एक उदाहरण देता हूं...अमिताभ बच्चन का...जिन्हें उनके पिता हरिवंश राय बच्चन ने कभी नैनीताल में शेरवुड स्कूल में नसीहत दी थी...मन का हो तो अच्छा और न हो तो और भी अच्छा...वही अमिताभ बच्चन युवावस्था में रेडियो पर नौकरी मांगने गए तो उनकी आवाज़ को फेल कर दिया गया था...बाद में उसी आवाज़ का पूरा देश दीवाना हुआ...अमिताभ के करियर की शुरुआत में एक के बाद एक दर्जनों फिल्में पिटी लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी...अपने अंदर की आग़ को बुझने नहीं दिया...इसी का नतीज़ा रहा...ज़ंज़ीर, दीवार, शोले का एंग्री यंगमैन...जो वनमैन इंडस्ट्री बन गया...लेकिन इन्हीं अमिताभ बच्चन के लिए नब्बे के दशक में फिल्मों की असफलता के साथ ऐसा बुरा दौर भी आया कि उनकी कंपनी एबीसीएल का भट्ठा बैठ गया...गले तक अमिताभ को कर्ज़ में डुबो दिया...लेकिन हिम्मत अमिताभ ने यहां भी नहीं हारी...कठिनाइयों से लड़े और कौन बनेगा करोड़पति के ज़रिए फिर मुकद्दर का सिकंदर बन कर दिखाया....

बच्चों को ऐसे ही प्रेरक प्रसंग ढूंढ ढूंढ कर सुनाना चाहिए...किसी उपदेशक की तरह नहीं बल्कि उनका दोस्त बनकर...उसी उम्र में पहुंच कर जिस उम्र में आपके बच्चे हैं....और किसी भी तरह हफ्ते में एक बार ही सही बच्चों के साथ आउटिंग पर जाने की कोशिश कीजिए...चाहे घर के सबसे पास वाले पार्क में ही सही...बच्चों में यही विश्वास भरें कि वो कितने अहम हैं...घर के लिए भी और देश के लिए भी...मैंने खुद की गिरेबान में झांककर देखा तो बच्चों का सबसे बड़ा गुनहगार मुझे अपने में ही दिखा...अब पक्का ठान लिया है, छुट्टी वाले दिन कुछ भी हो जाए, बच्चों को साथ लेकर घर से बाहर मस्ती करने के लिए कहीं न कहीं ज़रूर जाऊंगा...



स्लॉग चिंतन

रेत अगर मुट्ठी से फिसलती है तो उसका भी एक मकसद होता है...ईश्वर उस मुट्ठी को इसलिए खाली कराता है क्योंकि वो वहां आसमान को उतारने के लिए जगह बनाना चाहता है...हर कोई चाहता है...इक मुट्ठी आसमान...

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

सूरज का सातवां घोड़ा...खुशदीप

आप जानते हैं सूरज के सातवें घोड़े के बारे में...आज सूर्य ग्रहण है...हरिद्वार में महाकुंभ आरंभ हो चुका है...लेकिन मैं इस पोस्ट में सिर्फ सूरज के सातवें घोड़े की बात करूंगा...कैसे इस सातवें घोड़े पर ही टिका है आपका, मेरा, हम सब का नसीब, हमारे देश का नसीब...





बताते है कि इस बार महाकुंभ पर जो ग्रहयोग बने हैं वो 535 साल बाद बने हैं...मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या और सूर्य ग्रहण एक साथ...ज़ाहिर है सदी का पहला महाकुंभ ऐसे ग्रहयोग के बीच हो रहा है तो हरिद्वार जाकर पवित्र गंगा में डुबकी लगाने को हर कोई अपना सौभाग्य समझेगा...इस मौके पर जिसकी जो आस्था है, उसका मैं पूरा सम्मान करता हूं...लेकिन इस पोस्ट पर मेरा आग्रह धार्मिक न होकर सामाजिक है...सूर्य ग्रहण को लेकर हर एक के अपने विचार हो सकते हैं...लेकिन मुझे सिर्फ सातवां घोड़ा याद आ रहा है...(दिवंगत धर्मवीर भारती जी के कालजयी उपन्यास सूरज का सातवां घोड़ा पर इसी शीर्षक के साथ श्याम बेनेगल 1992 में बेहतरीन फिल्म भी बना चुके हैं...)

हिंदू पौराणिक कथा के मुताबिक सूर्य देवता के रथ को सात घोड़े खींचते हैं...इनमें छह घोड़े हट्टे-कट्टे हैं...लेकिन सातवां घोड़ा कमज़ोर और नौसिखिया है...वो हमेशा सबसे पीछे रहता है...लेकिन पूरे रथ के आगे बढ़ने की गति इस सातवें घोड़े की चाल पर ही निर्भर करती है...अब ज़रा इसी संदर्भ में अपने प्यारे देश भारत की बात सोचिए...पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने देश को 2020 तक पूर्णत विकसित होने का विज़न दिया...लेकिन क्या देश सही मायने में तब तक विकसित बन सकता है जब तक देश में आखिरी पायदान पर खड़ा व्यक्ति भूखा है...जिसके सिर पर छत नहीं है...तन पर पूरे कपड़े नहीं है...हम महानगरों में बड़े बड़े म़ॉल्स, फ्लाईओवर्स, आर्ट ऑफ द स्टेट एयरपोर्टस देखकर बेशक कितने ही खुश हो लें लेकिन देश सही मायने में तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक इस देश में आखिरी पायदान पर खड़े शख्स के पैरों में भूख, बेरोज़गारी और बीमारी की बेड़ियां हैं...मैं इस शख्स को ही भारत के सूरज का सातवां घोड़ा मानता हूं...हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक दिन ऐसा भी आता है कि जब बाकी के छह घोड़े उम्र ढलने की वजह से अशक्त हो जाते हैं...तब सूर्य देवता के रथ को आगे ले जाने का सारा दारोमदार इस सातवें घोड़े पर ही आ टिकता है...तो भारत के रथ को दुनिया में आगे बढ़ाने के लिए उसके सातवें घोड़े को ताकत कैसे मिले, क्या ये सवाल हमें आंदोलित कर सकता है...

मैंने सुना है महाकुंभ के लिए इस बार समूचा बजट 525 करोड़ रुपये का है...ज़ाहिर है देश विदेश से पांच करोड़ श्रद्धालु अगले तीन महीने में हरिद्वार में जुटेंगे...130 वर्ग किलोमीटर में फैली कुंभनगरी में सारी व्यवस्थाओं पर मोटी रकम खर्च होना लाज़मी है...लेकिन कुंभ का आस्था के अलावा बाज़ार शास्त्र भी है...ज़्यादा विस्तार में न जाकर इस संदर्भ में आपको सिर्फ एक उदाहरण देता हूं...अगले तीन महीने में हरिद्वार में सिर्फ़ फूलों-फूलों का ही 400 करोड़ रुपये का कारोबार होगा...ज़ाहिर है ये फूल और दूसरी पूजा सामग्री गंगा में ही जाएगी...यानि गंगा का प्रदूषण कई गुणा और बढ़ जाएगा... उसी गंगा का जिसकी सफ़ाई के लिए हम करोड़ों रूपये के मिशन बना रहे हैं...

इंसान का लालच पहाड़ों को जिस तरह नंगा कर रहा है, प्रकृति का संतुलन ही बिगड़ता जा रहा है...धरती गर्म (ग्लोबल वार्मिंग) होते जाने की वजह से ग्लेशियर्स खत्म हो रहे हैं...गंगा समेत हिमालय की सारी नदियां सिकुड़ती जा रही है...अब आपको गंगा में डुबकी लगाकर पुण्य कमाने का मौका मिले तो ये सवाल ज़रूर सोचिएगा कि आने वाले महाकुंभों के लिए क्या गंगा मैया बचेगी भी...अगर मन में कुछ आशंका पैदा होती है तो क्या हमारा फर्ज़ नहीं हो जाता कि हम अभी से चेत जाएं...सोती सरकार को जगाएं...करोड़ों टन कचरा गंगा में बहाने वालों को समझाएं...भईया जब गंगा ही नहीं बचेगी तो फिर काहे की आस्था और काहे का कुंभ....न फिर तुम और न ही हम...

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

मक्खन की जेब पर डाका...खुशदीप

रवीश कुमार जी ने कस्बा ब्लॉग में अपराध का नारीवाद शीर्षक से एक फोटो-पोस्ट हाल ही में डाली थी...उसमें हरिद्वार में मनसा देवी मंदिर के बाहर एक सूचनात्मक बोर्ड का फोटो लगाया गया था, वही फोटो यहां रिपीट कर रहा हूं...



अब आपको बताता हूं ये शायद आपके भी काम की चीज़ हो...अगर आप दिल्ली आकर मेट्रो की सवारी करते हैं या भविष्य में करने का इरादा रखते हैं तो सतर्क रहिएगा...अभी हाल ही में यहां महिलाओं का एक गैंग पकड़ा गया...इस गैंग की महिलाएं ज़्यादा भीड़ वाले रूट पर छोटे बच्चों को गोद में लेकर सफ़र करती थी...इनका अपराध का तरीका भी बड़ा गज़ब था...ये शिकार ताड़ कर छोटे बच्चे को बिल्कुल साथ लाकर चिपका देती थीं...भीड़ की वजह से आप ऐतराज भी नहीं कर सकते...फिर बच्चा तो बच्चा ही है...कभी वो आपको हाथ मारेगा और कभी पैर...तीन चार मिनट में ही आप इसे नॉर्मल मानकर नज़रअंदाज़ करना शुरू कर देंगे...बस इसी मौके की तो शातिर महिलाओं को तलाश रहती थी...आप ज़रा से असावधान हुए नहीं कि आपकी जेब से पर्स या मोबाइल गया...दरअसल जब आप की जेब की सफाई हो रही होती है तो आपको यही लगता रहेगा कि वही बच्चा आपको छू रहा है...इसलिए फिर आगाह करता हूं कि कभी दिल्ली आएं तो मेट्रो पर चौकस होकर सफ़र कीजिएगा...

अब ये समाज है...यहां महिलाओं की भी आधी आबादी है...इसलिए जिस तरह पुरुष अपराधी हो सकते हैं, वैसे ही महिलाएं भी हो सकती हैं...ये तय है कि अपराध जगत में महिलाओं का अनुपात पुरुषों से बहुत कम होता है...लेकिन ऐसा नहीं कि महिलाएं अपराधी हो ही नहीं सकतीं...ऐसे में जिस तरह मेट्रो को लेकर मैं आपको आगाह कर रहा हूं, वैसे ही मनसा देवी पर उस बोर्ड के ज़रिए किया गया है...

रवीश जी ने अपनी पोस्ट में चोरी का जेंडर शब्द भी इस्तेमाल किया था...उस पोस्ट पर अपराध की मनोस्थिति को भी नारी विमर्श से जोड़ने के संदर्भ में टिप्पणी आई थी...वो सिर्फ फोटो पोस्ट थी, इसलिए सूचना वाले बोर्ड को देखकर ही टिप्पणियां की गई...एक टिप्पणी मे उस फोटो को दिखाए जाने के औचित्य पर ही सवाल उठा दिया गया...मैं अपनी इस पोस्ट के ज़रिए यहां किसी बहस को जन्म नहीं देना चाहता...सिर्फ यही कहना चाहता हूं कि हर चीज़ को पुरुष और नारी के चश्मे से देखना सही नहीं होता...अपराधी अपराधी होता है, महिला या पुरुष के रूप में उसका वर्गीकरण करना सही नहीं....और कहीं कुछ हास्यबोध से कोई बात कही जाती है तो उसका उसी शैली में जवाब देना ही अच्छा होता है...ज़रूरी नहीं हर बात को गंभीर चिंतन की ओर मोड़ दिया जाए....

अरे मारा पापड़ वाले को...आप कह रहे होंगे कि शीर्षक तो मैंने मक्खन की जेब पर डाला है और क्या अंट-शंट लिखे जा रहा हूं...मक्खन की चिंता है...तो देर किस बात की...चलिए न स्लॉग ओवर में....


स्लॉग ओवर

मक्खन काम पर जाने के लिए तैयार हो रहा था...पर ये क्या जेब से पर्स ही गायब...मक्खन हैरान-परेशान...बड़ा दिमाग पर ज़ोर लगाया....कहां गया...कहीं गिर तो नहीं गया...अरे कल मेट्रो से कनॉट प्लेस तक गया था...मेट्रो में ही तो नहीं किसी ने हाथ की सफ़ाई दिखा दी....मक्खन इसी उधेड़बुन में था कि ढूंढू तो ढ़ूंढू कहां....कुछ नहीं सूझा तो किचन में काम कर रही मक्खनी को आवाज लगाई...मक्खनी आई तो वो खुद ही परेशान दिखाई दी...मक्खन ने पूछा...कहीं मेरा पर्स तो नहीं देखा....मक्खनी...ओ जी, मैं आपके पर्स की क्या जानूं...मेरी तो खुद सोने की अंगूठी गुम हो गई है....उंगली में ढीली हो रही थी...पता नहीं कहां गिर गई...कल से ढूंढ-ढूंढ कर थक गई हूं....मक्खन ने ये सब सुनने के बाद धीरे से कहा...तुम्हारी अंगूठी तो मेरी जेब में मिल गई है....


( डिस्क्लेमर- स्लॉग ओवर को निर्मल हास्य की तरह लें...कृपया इसे कोई और रुख नहीं दीजिएगा)