गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

घर घर की कहानी...रूई का बोझ...दूसरी किस्त...खुशदीप

रूई का बोझ...कल तक बताई कहानी से आगे...दो बड़े बेटों के राजी न होने पर बूढ़े पिता को छोटे बेटे-बहू के साथ रहना पड़ता है...थोड़े दिन तो सब ठीक रहता है...लेकिन फिर...



सबसे छोटी बहू भी पिता के साथ रहने को लेकर कुढ़ने लगती है...दो टाइम रुखी-सूखी रोटी देकर ही अपनी ज़िम्मेदारी की इतिश्री समझ लेती...इसके अलावा पिता की किसी बात पर कान नहीं धरती...पति के कान भी भरने लगी कि बाबूजी दिन भर खाली बैठे रहते हैं, आप दिन भर खटते रहते हो, इन्हें भी कोई काम वगैरहा करना चाहिए...छोटी बहू की ये खीझ धीरे धीरे अपमान का रूप लेने लगी...पिता का पुराना दोस्त कभी-कभार मिलने आता तो पिता बहू से चाय के लिए कहते...जवाब मिलता, घर में दूध खत्म है, चाय नहीं बन सकती...पिता बेचारे मन मसोस कर ही रह जाते...लेकिन दोस्त सब समझता था...वो समझाने की कोशिश करता कि दिल पर मत लगाया करो...वही दोस्त ढाढस बंधाने के लिए कहता है...


बूढ़ा पिता रूई के बंडल की तरह होता है,
शुरू में उसका बोझ महसूस नहीं होता,
लेकिन जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है, ये भारी होता जाता है,
बूढ़ा पिता फिर रूई के गीले बंडल की तरह हो जाता है,
भारी, भारी और भारी,
फिर हर बेटा इस बोझ से पीछा छुड़ाना चाहता है...


एक दिन ऐसा भी आता है कि पिता हर चीज़ के लिए बेटे पर निर्भर हो जाता है...उसके पास अपना कोई पैसा भी नहीं बचता...सब कुछ तो वो बेटों को दे चुका होता है...


इसी दौरान सबसे बड़े बेटे की बड़ी बेटी की शादी तय हो जाती है...बड़ा बेटा सोचता है कि पिता छोटे भाई के साथ रह रहे हैं, इसलिए शादी पर पिता के लिए नया जोड़ा वही बनवाएगा...पिता के साथ रहने वाला बेटा सोचता है कि शादी बड़े भाई के घर में है, इसलिए पिता को जोड़ा भी वही खरीद कर देगा...पिता अपनी पोटली में से पुराना सिल्क का कुर्ता निकालता है...बरसों पहले किसी बेटे की शादी के दौरान ही सिलवाया था...लेकिन अब उसमें जगह जगह छेद हो गए थे...पिता बेटे को कुर्ता दिखा कर कहता है कि मेहमानों के सामने इसे पहनने से परिवार की इज्जत खराब होगी...लेकिन बेटा पिता की बात एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देता है...बहू एक कदम और आगे निकल कर जान कर इतनी ऊंची आवाज़ में टोंट मारती है कि पिता सुन ले...पैर कब्र में हैं और अब भी इन्हें स्टाइल मारना है...


पिता दिल पर पत्थर रखकर बेटा-बहू को तो कुछ नहीं कहते...लेकिन अकेले कमरे में गुस्सा निकालते हुए खुद ही बड़बड़ाते हैं- मैं बूढ़ा हूं, इसलिए सही खा-पी नहीं सकता, सही कपड़े नहीं पहन सकता...क्या इस दुनिया में मैं अकेला हूं जो बूढ़ा हुआ...क्या तुम सब कभी बूढ़े नहीं होगे...बूढ़े व्यक्ति के लिए सबसे मुश्किल घड़ी तब आती है जब उससे सब बात करने से भी कतराने लगते हैं...खाली बैठे एक-एक लम्हा बिताना मुश्किल हो जाता है...उनमें ये हताशा घर करने लगती है कि उनकी किसी को अब ज़रूरत नहीं, वो बस धरती पर बोझ बन कर रह गए हैं...


एक दिन पोता अलग अलग मौसमों के महत्व के बारे में ज़ोर-ज़ोर से पढ़ रहा होता है...बूढ़े पिता से ये सुनकर रहा नहीं जाता और उनकी भड़ास बाहर आ जाती है...बूढ़ों के लिए कोई मौसम अच्छा नहीं होता...सारे मौसम बूढ़ों के दुश्मन होते हैं...इस तरह के माहौल में रहते-रहते पिता चिड़चिड़े होने के साथ कभी-कभी बच्चों की तरह जिद भी करने लगते हैं...एक दिन वो मक्के की रोटी खाने के लिए अड़ जाते हैं...लेकिन छोटी बहू मना कर देती है...तर्क देती है कि मक्के की रोटी पचेगी नहीं और वो बीमार पड़ गए तो सब उसे ही दोष देंगे कि उसने ख्याल नहीं रखा...छोटी बहू दूसरा खाना पिता के कमरे में रखने के साथ कहती है जब भूख सताएगी तो खा लेना...लेकिन पिता पर भी जैसे सनक सवार हो गई थी...कसम खा ली कि खाऊंगा तो मक्के की रोटी ही खाऊंगा नहीं तो कुछ नहीं खाऊंगा...लेकिन उस रात पिता सो नहीं पाते...यही डर सताता रहता है कि कहीं कोई कुत्ता या बिल्ली खाना खा गया तो बहू यही समझेगी कि रात को उसने ही खाना खा लिया....


जब घर के सदस्यों में ठीक से संवाद होना बंद हो जाता है तो इस तरह की तनातनी बढ़ती ही जाती है...फिल्म में भी पिता और छोटे बेटे के बीच मतभेद बढ़ते जाते हैं...हद तब हो जाती है जब छोटी बहू पति पर ज़ोर देकर कहती है कि पिता को सामने के कमरे से निकाल कर पीछे कोठरीनुमा कमरा रहने के लिए दे दिया जाए...बेटा पिता से पीछे कमरे में जाने के लिए कहता है...पिता मना करते हैं तो दोनों में ज़ुबानी जंग के बाद धक्का-मुक्की शुरू हो जाती है...बेटे का धक्का लगने से पिता ज़मीन पर गिर जाते हैं...


गांव वाले भी ये नज़ारा देख रहे होते हैं...पिता ये देखकर समझते हैं कि उनके परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल गई...इस घटना के बाद पिता को हर रिश्ता बेमानी नज़र आने लगता है...वो अपने एक जानने वाले से कहते हैं कि अब उन्हें इस घर में एक मिनट भी नहीं रहना है, इसलिए वो उन्हें किसी आश्रम में छोड़ आए...पिता का ये रूप देखकर छोटे बेटे और बहू को भी डर लगता है कि अगर ये इस तरह चले गए तो पूरे गांव बिरादरी में उनकी थू-थू हो जाएगी...वो बेटे (पोते) को पिता को मनाने के लिए भेजते हैं...लेकिन पोते की बात से भी पिता का दिल नहीं पसीजता...

लेकिन हमेशा गृहस्थी में रहते आए व्यक्ति के लिए एक झटके में सारे नाते तोड़ लेना आसान भी नहीं होता...जब भी घर में झगड़ा-क्लेश होता है वो सोचता यही है कि कहीं अलग जाकर रहना शुरू कर दे लेकिन कुछ ऐसा उसके अंदर चलता रहता है जो उसे ये कदम उठाने से रोकता रहता है...


जैसे ही पिता गांव से बाहर आते हैं वो जानने वाले से पूछते हैं कि आश्रम कितना दूर है...फिर कहते हैं कि थोड़े दिन आश्रम में रह कर घर लौट आएंगे सिर्फ पोते की खातिर...क्योंकि वो बार-बार कह रहा था कि बाबा जल्दी ही आप लौट आना...अब घरवालों से अलग रहने का विचार पिता को परेशान करना शुरू कर देता है...फिर कहते हैं कि वो आश्रम के मंदिर में माथा टेक कर शाम को ही घर लौट आएंगे...थोड़ी देर बात पिता कहते हैं...आश्रम जाने की भी क्या ज़रूरत है वो प्रार्थना तो घर पर भी कर सकते हैं...वो जानने वाले पर ज़ोर देकर बैलगाड़ी को वापस घर के लिए मुड़वा लेते है...


यहीं फिल्म का अंत हो जाता है...ये तो थी कहानी...लेकिन इससे निष्कर्ष क्या निकला...

हम जिस माहौल में आज रह रहे हैं, आने वाला कल इससे भी मुश्किल होगा...ऐसे में जीवन के सांध्यकाल को संवारने के लिए आज हम क्या-क्या कर सकते हैं, इस पर मैं भी एक दिन सोचता हूं...आप भी सोचिए...फिर एक दूसरे से अपने विचार बांटते हैं...



(जारी है, कल पढ़िएगा निष्कर्ष)

25 टिप्‍पणियां:

  1. यह फिल्म बहुत अच्छी है। पिछले साल अंग्रेजी में लिखा हुआ एक लेख इस फिल्म के ऊपर पढ़ा था, हो सकता है आपने न पढ़ा हो और यह एक संयोगमात्र ही हो परंतु उस लेख और आपके लेख में बहुत सारी समानतायें हैं। कुछ लाइन्स तो बिल्कुल ऐसी लगती हैं जैसे कि उनका हिन्दी में अनुवाद मात्र कर दिया गया हो। बल्कि आपकी पोस्ट में इस्तेमाल किया गया फोटो भी उसी लेख से लिया गया लगता है।

    अंग्रेजी लेख का लिंक नीचे दिया है, कृपया स्थिति साफ करें।

    http://passionforcinema.com/rui-ka-bojh-pankaj-kapur%E2%80%99s-another-milestone-performance/

    अगर यह एक संयोग मात्र है तो क्षमा करें पर अगर आपने उस लेख से कुछ लिया है तो आपको उस लेख का संदर्भ और लिंक देना चाहिये।

    -विक्रम

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  2. @विक्रम जी,
    आपने या मेरी पोस्ट को पढ़ा नहीं...या फिर आपका प्रयोजन कुछ और है...

    आप इस पोस्ट की पहली किस्त भी पढ़ते तो ये बात शायद न लिखते...पहली बात तो रूई का बोझ चंद्र किशोर जैसवाल जी के उपन्यास पर आधारित है, इसलिए इसकी मौलिकता का श्रेय सिर्फ जैसवाल जी को ही जाता है...पहली किस्त में ये भी साफ है कि सुभाष अग्रवाल जी ने फिल्म बनाई और फिल्म में किन-किन पात्रों ने काम किया...

    रही फोटो की बात तो ये फिल्म का ही एक दृश्य है और गूगल पर उपलब्ध है...इसलिए किसी फिल्म के दृश्य पर भी आप कॉपीराइट जताना चाह रहे है तो बात दूसरी है...

    एक उपन्यास के कथासार पर फिल्म बनी और उसी कथासार को इस पोस्ट का आधार बनाया गया...जैसा कि आपके दिए लिंक वाले अंग्रेजी लेख में बनाया गया...

    यहां मकसद फिल्म के जरिए एक बेहद ज़रूरी सामाजिक मुददे बुज़ुर्गो की दशा पर विचार करना है, जिसे आपने अपनी टिप्पणी के ज़रिए कुछ और ही मोड़ देने का प्रयास किया है..

    अच्छी बात कहीं भी हो चाहे वो फिल्म के ज़रिए हो या उपन्यास के ज़रिए उसका ज़्यादा से ज़्यादा प्रसार किया जाना चाहिए...

    यहां तो आपने उपन्यासकार से भी ज़्यादा उसके कथासार को लेख में लिखने वाले को अहम बना दिया...रिसर्च के दौरान गूगल या विकीपीडिया पर उपलब्ध सामग्री से रेफरेंस लिया जाता है, वो मैंने भी लिया...अगर आप ये कहना चाह रहे हैं कि फिल्म के उपन्यासकार से ज़्यादा समालोचक को तरजीह दी जानी चाहिए, तो ठीक है मैं गुनहगार हूं...और लेख में उन भाईसाहब के नाम का ज़िक्र भी होता तो मैं ज़रूर इस पोस्ट में करता जैसे कि जैसवाल जी का किया...

    अभी इस पोस्ट की अंतिम कड़ी आनी है...जिसमें सामाजिक चिंतन की ओर हमें बढ़ना है...ब्लॉगिंग का यहां उद्देश्य
    व्यक्तिगत ब्लॉगिंग के लेवल से निकल कर सामूहिक विचार की ओर ले जाना है...आप भी बुजुर्गों की दशा पर क्या सोचते हैं, इस पर अपने अमूल्य विचारों से अवगत कराएं तो मुझे खुशी होगी...

    डेढ़ साल की ब्लॉगिंग में मैंने कई अच्छे ई-मेल का अनुवाद किया है और उनका स्पष्ट तौर पर अपनी पोस्ट में उल्लेख भी किया है...

    जय हिंद...

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  3. मार्मिक कथा है ...
    और कथा क्या वास्तविकता ही है , हर दूसरे घर की ...पता नहीं लोग कैसे भूल जाते हैं की एक दिन उनको भी इसी अवस्था से गुजरना है !

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  4. बुजुर्गों के हालात तो साफ़ हो गए । अब इसका हल क्या है , इस पर विचार करना पड़ेगा ।

    यह कहानी और फिल्म गुजरे ज़माने के हालात दर्शाती है । अब लोग समझदार हो गए हैं । संसाधन भी बढ़ गए हैं । इसलिए एक व्यक्ति रिटायर होने से पहले ही अपनी प्लानिंग कर लेता है बुढ़ापे की । इस तरह वह वित्तीय तौर पर सुरक्षित हो जाता है ।
    लेकिन इमोशनल सपोर्ट के लिए फिर भी औलाद पर निर्भर रहना पड़ता है । यहाँ सब का रोल आता है । इस पक्ष को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता । लेकिन यहाँ दोनों का अपना अपना फ़र्ज़ है । एक संयुक्त परिवार में रहते हुए मात पिता और अगली पीढ़ी के बीच एक संतुलित सम्बन्ध होना ज़रूरी है । जहाँ दोनों एक दुसरे की मानसिक स्वतंत्रता और आत्म निर्भरता को देखते हुए , अनावश्यक हस्तक्षेप न करें ।

    यदि एक साथ रहना संभव न हो , तो बच्चों को मात पिता के सुख सुविधा का पूरा ख्याल रखना चाहिए और समय समय पर यथोचित अपना योगदान देते रहना चाहिए ।
    हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक दिन सभी को इन्ही परिस्थितियों से गुजरना है ।

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  5. रुई का बोझ फिल्म संयुक्त्त परिवार में होने वाली समस्याओं और सम्पति के बंटवारे के बाद बेटों पर निर्भर हो चुके बुजुर्ग पिता की हालत को गम्भीर मुद्दा मानकर बनायी गयी फिल्म है। पंकज कपूर ने अपने अभिनय से इस फिल्म को बहुत अच्छा बना दिया है। बड़े दुख की बात है कि ऐसी गम्भीर फिल्में ज्यादा दर्शकों तक नहीं पँहुच पाती। एन एफ डी सी से तो कुछ भी अपेक्षा करना गलत है यह संस्था बहुत सारी अच्छी फिल्मों पर कुंडली मार कर बैठी हुयी है।

    -विक्रम

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  6. खुशदीप जी,

    शुक्रिया आपके कमेंट का।

    पहले कमेंट की पहली पंक्ति में ही लिखा कि फिल्म बहुत अच्छी है। उपन्यास पढ़ा नहीं है। क्या आपने पढ़ा है?

    आपका कमेंट पढ़कर थोड़ा दुख हुआ कि उपन्यास और फिल्म में दिखायी समस्या की आड़ लेकर आप पहले कमेंट में उठाये गये मुद्दे को टाल रहे हैं। आपके लेख की पहली किस्त की लगभग हर पंक्ति Passionforcinema.com पर छपे लेख का अनुवाद मात्र है। आपकी और पाठकों की सुविधा के लिये आपके प्रथम लेख में टिप्पणी बाक्स में मूल अंग्रेजी लेख से सम्बन्धित पंक्तियाँ लेकर पोस्ट की हैं। आप देख लें और विचार कर लें।
    इतना तो सभी समझते हैं कि किसी पुस्तक के ऊपर अगर पांच लोग लिख रहे हैं तो वे उस विषय के बारे में अपनी सोच अपने शब्दों में लिखते हैं, अगर तीसरा लेखक पहले दो के लिखी हुयी समालोचना आदि से कुछ लेता है, या अपनी भाषा में अनुवाद मात्र करके लिख देता है तो उसका नैतिक कर्त्वय है कि वह मूल लेख का संदर्भ दे और अगर नेट से लिया गया है तो लिंक भी दे वरना इस हरकत को Plagiarism कहा जाता है। दुख की बात है कि हिन्दी में ब्लागिंग करने वाले बहुत सारे लेखक इस बात की गम्भीरता को या तो समझते नहीं या जान बूझ कर नजर अंदाज कर देते है। आश्चर्य की बात है कि जब अखबार आदि में वे ऐसी किसी घटना के बारे में पढ़ लेते हैं तो ऐसा करने वाले के खिलाफ ब्लाग्स लिखते है।

    हम सबको ज्ञात है कि गूगल सिर्फ और सिर्फ एक सर्च इंजन है, इसके द्वारा पायी गयी सामग्री को कोई ऐसे ही नहीं प्रयोग में ला सकता कि गूगल से मिली है। अगर कोई विकीपीडिया जैसे स्त्रोत से सामग्री ले रहा है तो उसे वहाँ का संदर्भ और लिंक देना चाहिये।


    बात विषय की ही होती जैसा कि आपका आग्रह है तो आप अपने शब्दों में ऐसा लेख लिखते जो किसी अन्य लेख की नकल मात्र न लगता। समालोचना किसी किताब से उठाकर पंक्तियाँ छापना नहीं होता, उसमें लेखक अपनी व्याख्या देता है।

    आपको बताने का प्रयास इसलिये किया गया क्योंकि जैसे उपन्यास और फिल्म एक सामाजिक समस्या की बात उठाते हैं ऐसे ही आपके द्वारा किया गया कार्य भी एक सामाजिक समस्या है जिसकी ओर मैंने इशारा किया।

    अगर आपको नहीं लगता कि आपने कुछ गलत किया है तो जरुर मेरा प्रयास गलत है और आशा है आप माफ करेंगे।

    ब्लागिंग संसार में यह रोज होता है कभी हो सकता है आपको इस मुद्दे पर लिखता पाया जाये।

    शुक्रिया।

    -विक्रम

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  9. एक विचारणीय अति संवेदनशील विषय पर अनावश्यक बहस से विषय से ध्यान हट जाता है । कृपया विषय को एक सार्थक अंत तक ले जाकर अपना योगदान प्रदान करें ।

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  10. उपन्यास का अंत बहुत ही अच्छा है क्योकि वो व्यावहारिक और सच है | आत्मसम्मान सभी के पास होता है पर जब अपने परिवार की बात आती है तो हम सभी उसे भुला कर हर हाल में जी लेते है परिवार छोड़ना वास्तव में इतना आसान नहीं होता है और दूसरी बात ऐसे मामलों में बुजुर्गो का परिस्थितियों के आगे आत्मसमर्पण करके ये कहना की अब कुछ बोलूँगा ही नहीं उनकी स्थित और भी ख़राब कर देता है उसके बजाये यदि वो हर गलत बात का विरोध करे तो संभव है की कम से कम स्थिति और ख़राब तो नहीं होगी |

    असल में आज कल इस तरह की जो घटनाए सामने आ रही है वो हमें और सजग और सचेत बना रही है अपने बुढ़ापे के लिए | मुझे तो लगता है की कभी कभी कुछ चीजे इतनी आगे बढ़ जाती है की हम उसे पीछे नहीं खीच सकते है समाज में अब बच्चो की जो सोच बन गई है अब हम उसे नहीं बदल सकते है वो बहुत आगे निकाल चुके है | अच्छा हो की हम लोग ही अभी से हर संभव उपाय अपने बुढ़ापे को सुरक्षित करने के लिए कर ले |

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  11. डा. दराल साहब,

    माफ कीजियेगा यदि आपके हिसाब से मूल विषय से कम महत्व का मुद्दा किसी लेख की नकल करने का हो तो। अगर नकल का मुद्दा इतना हल्का हो तो किसी की पीएच्डी की थीसिस दूसरा नकल करके डाक्टेरेट ले सकता है। क्या किसी को आपत्ति हो सकती है कि बुजुर्गों की हालत पर गम्भीर विचार विमर्श ही न किया जाये बल्कि कुछ ठोस कदम भी उठाये जायें?

    खुशदीप जी के लेख की दूसरी किस्त भी Passaionforcinema पर छपे अंग्रेजी लेख की नकल है। दोनों किस्तों में पंक्तियों का क्रम भी वही है जो मूल लेख में है। दूसरी किस्त को पढ़कर तो ऐसा भी संदेह होता है कि खुशदीप जी ने न तो किताब पढ़ी है और न ही फिल्म देखी है क्योंकि उन्होने फिल्म का संवाद तक गलत कोट किया है। ऐसा हो गया है क्योंकि उन्होने अंग्रेजी से हिन्दी बनायी है, जबकि Passaionforcinema के लेख में पहले ही हिन्दी संवाद का अर्थ अंग्रेजी में किया गया होगा इस तरह से खुशदीप जी के लेख तक आते आते संवाद कुछ और ही हो गया है।

    खुशदीप जी गलती न करते तो मूल विषय से हटने की बात ही कहाँ थी जैसा कि वे और आप आरोप लगा रहे हैं।

    उन्हे साफ साफ शुरु में ही लिख देना चाहिये था कि वे किसी और के लिखे लेख से लेकर सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होने उपन्यास पढ़ा होता या फिल्म देखी होती तो उन्हे जरुरत ही नहीं पड़ती गूगल से सामग्री सर्च करने की। वे अच्छा लिखते हैं और काफी समय से लिख रहे हैं, इस बार भी लिख लेते।

    अगर बात इतनी साधारण होती जैसा कि वे दिखा रहे हैं कि गूगल से सामग्री मिल गयी। क्या वे कृपया उस सामग्री के मूल लिंक कम से कम यहाँ टिप्पणी में देने की कृपा करेंगे जहाँ जहाँ से उन्होने रिसर्च की हुयी सामग्री ली है?

    अगर उन्होने उपन्यास पढ़ा होता और फिल्म देखी होती तो सिर्फ कहानी लिखने के लिये उन्हे गूगल की शरण में न जाना पड़ता। और अगर कहीं से सामग्री ली है तो ईमानदारी की बात होती है उस स्त्रोत का संदर्भ और लिन्क देने में और अगर किसी साइट पर से सामग्री लेना प्रतिबंधित है तो वहाँ से अनुमति लेने में।

    मैंने फिल्म देखी है इसलिये पता है कि passionforcinema.com का लेख फिल्म पर है, वह केवल फिल्म की कहानी ही नहीं है। ऐसे लेख लिखने में किसी की मेहनत लगी होती है।

    आश्चर्य है कि इन बातों का कोई महत्व इस ब्लाग पर नहीं है।

    -विक्रम

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  12. @ विक्रम,
    यार आप तो अच्छा खासा लिख लेते हो..आपकी आईडी पर गया तो निराशा हुई...वो तो बेनामी निकली...न कोई ब्लॉग दिखा और न ही कोई आपका लिखा हुआ कोई लेख...

    पहली बात तो मैं कभी आलोचना से नहीं डरता, इसलिए आपकी यहां सारी टिप्पणियां जस की तस छाप रहा हूं...

    आप जानबूझकर एक अच्छे विषय का रुख मोड़ना चाह रहे हैं, इसलिए लगातार मेरी पोस्ट पर आ रहे हैं...बेनामियों के इस खेल से मैं अच्छी तरह वाकिफ हूं...

    आपके लिए बुज़ुर्गों की दशा से ज़्यादा कोई दूसरा खेल ही महत्वपूर्ण लगता है...

    जिस लेख की आप इतनी वकालत कर रहे हैं, उसके लेखक का नाम तो कम से कम बता दें, जिससे मैं उस सज्जन से अपने पाप का प्रायश्चित कर सकूं...

    जय हिंद...

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  13. इस दौर के बाद अब माता-पिता कुछ सम्‍भल गए हैं और जीते जी अपना पैसा बेटों को नहीं देते हैं। इससे कम से कम पैसे की दृष्टि से तो लाचार नहीं हों। बागबां जैसी फिल्‍मों के बाद अब माता-पिता अलग रहकर अपनी दुनिया बसाने लगे हैं।

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  14. हम सबको अपनी बैलगाड़ी मोड़कर वापस ले जानी होगी।

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  15. खुशदीप जी,

    शुक्रिया आपका कि आपने टिप्पणियों को छापा।

    बहुत निराशा हुयी आपका रुख देखकर। लाखों लोग ब्लागिंग कर रहे हैं, हम जैसे कुछ पाठक भी होते हैं जो ब्लाग पढ़ते रहते हैं, जैसे आपके ब्लाग पर नजर पँहुच गयी। अपने विचार रखने के लिये ब्लागिंग करना जरुरी है, यह बात आज से पहले नहीं सीखी थी।
    ब्लाग शुरु करने की सामग्री आप दे रहे हैं सच्चाई को न मानकर। मूल लेख का लिंक और सामग्री और आपकी दोनों किस्तों के लिंक और टिप्पणियाँ एक पोस्ट का जुगाड़ तो कर ही देंगे :) पर न पहले ऐसा इरादा था कि आप पर व्यक्तिगत टिप्पणी की जाये न ही अब है। पहली टिप्पणी मुद्दे पर थी, सोचा था कई बार ब्लागर पोस्ट करते हुये किसी कारणवश लिंक देना भूल जाते हैं और शायद आप भी ऐसी भूल कर बैठे हों। बहुत से लोग भूल सुधार लेते हैं। आपने इसे अपने अहं पर ले लिया और कुतर्क का सहारा लेने लगे। मेरे ब्लाग लिखने न लिखने, अच्छा या बुरा लिखने से इस मामले में आपकी हरकत पर कोई असर नहीं पड़ता।

    अगर आपको लगता है कि आपके ब्लाग पर कोई सुनियोजित हमला हो गया है तो सच से यह मुँह छिपाने वाली बात है। पता आपको भी है कि आपने नकल करके गलती की है। बात किसी लेखक की हिमायत करने की नहीं है, बात सच की है। इस मामले में आपमें इतनी सच्चाई नहीं दिखायी देती कि आप यही स्वीकर कर लेते कि हाँ आपने न उपन्यास पढ़ा है न फिल्म देखी है। आप अभी भी हिचकिचा रहे हैं सच्चाई को स्वीकार करने से मानो आपका सारा पिछला लेखन कम मूल्य का हो जायेगा अगर आपने इस मामले में सच्चाई मान ली।

    आप चाहें तो सारी टिप्पणियाँ हटा सकते हैं, जिन्हे पढ़ना आता है , जो Plagiarism के मुद्दे को समझते हैं वे आपकी किस्तों की सच्चाई से परिचित हो चुके होंगे। आप जितना छिपना चाहेंगे उतना ही अपनी नेट साख के प्रति अन्याय करेंगे।
    चूँकि आप ईमानदार नहीं रह पाये हैं कम से कम इस मामले में सो इस मामले को यहीं विराम देते हैं। जैसे आपके मूल्य हों उसी अनुसार आप सोच-विचार करके उचित कार्यवाही कर लें।
    आपके ब्लाग पर यह आखिरी टिप्पणी है।

    -विक्रम

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  16. अपने संध्याकाल को सुधारने के लिये तो मैं अभी कुछ नहीं करना चाहता। हाँ अपने बुजुर्गों का जिनका संध्याकाल चल रहा है, उनके लिये अब थोडा ज्यादा समय और ज्यादा सुविधा देने का प्रयास जरूर करूंगा। इस लेखश्रृंखला के लिये आभार

    प्रणाम

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  17. यही तो हकीकत है सभी की ........कल को हम आज देख सकते हैं और उसके लिए प्रयास भी कर सकते हैं ताकि कल ऐसा ना हो मगर शायद मोह की जंजीरें इतनी गहरी होती हैं की इन्सान उन्ही में फँस कर रह जाता है .

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  18. बस इतना कहुंगा कि यह कहानी सच्ची हे, ओर इस के पात्रो को मै खुब पहचानता हुं. धन्यवाद

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  19. कहीं पहचाना सा लगा सब कुछ!

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  20. kabhi kissa a BAGWAAN BHEE HO---
    blog par ham log jo bhee likhate hai ya kahi se copy karte hai wah sab jo hamco aacchha lagata hai koshish karte hai ki aap logo ko kuch aacchha padhane ko de n -- ki --bekar --- ki bahas---
    Aap ki kahani aaj ke samaj ka ghanona chahara ugagar karti hai---
    aap bhee joint family ka matlab jante hai
    aur hum to aaj deelli main rah kar rog hi gaon ka ek do baar mansik roop se ghoom kar laut aate hai----ham aap ke saath ahi----

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  21. बुजुर्गो की दशा पर जीवंत कहानी के लिए साधुवाद .आपका प्रयास सराहनीय एवं प्रेरणादायी है .

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  22. ये पोस्ट तो रह ही गयी थी। बहुत अच्छा विष्य है इसे जारी रखो। ये जीवन्त उदाहरण शायद किसी की सोई हुयी संवेदना जगा दें। आशीर्वाद।

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  23. आपकी अति उत्तम रचना कल के साप्ताहिक चर्चा मंच पर सुशोभित हो रही है । कल (27-12-20210) के चर्चा मंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.uchcharan.com

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  24. mere khayaal se to ek kaanoon ye hona chaahiye ki antim samay tak budhe mata pita ko apne sath hi rakhna hai...chahe vo bete ho ya ikloti beti.

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