गुरुवार, 16 सितंबर 2010

कश्मीर पर क्या आप चुप ही रहेंगे...खुशदीप

मेरी कोशिश रहती है कि जिन मुद्दों पर विवाद के आसार दिखते हैं, उनसे दूर ही रहा जाए...लेकिन कश्मीर पर बिना लिखे कुछ रहा नहीं जा रहा...कश्मीर में हिंसा और आक्रोश का दौर पिछली 11 जून से चल रहा है...तीन महीने में 90 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है...लेकिन ये आग कैसे बुझाई जाए, किसी को समझ नहीं आ रहा...न युवा सीएम उमर अब्दुल्ला को और न ही दिल्ली में मनमोहन सिंह सरकार को...आप की कश्मीर पर राय कुछ भी हो, लेकिन ये तो मानेंगे ही कश्मीर राष्ट्रीय मुद्दा है...क्या कश्मीर में शांति लाना सिर्फ राजनीतिक नेतृत्व की ज़िम्मेदारी है...क्या राष्ट्र का हिस्सा होने के नाते हमारा कुछ फर्ज़ नहीं बनता...



केंद्र सरकार की आज दिल्ली में बुलाई सर्वदलीय बैठक में यही फैसला लिया जा सका कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल जम्मू-कश्मीर जाकर मौके का मुआयना करेगा और सभी वर्गों के लोगों से बातचीत करेगा....सरकार कश्मीरियों की भावनाओं का ध्यान रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है बशर्ते कि वो भारतीय संविधान के दायरे में हो...प्रतिनिधिमंडल कब कश्मीर जाएगा, तारीख तय नहीं हुई हैं...प्रतिनिधिमंडल की यात्रा का कार्यक्रम गृह मंत्रालय और जम्मू-कश्मीर सरकार मिलकर तय करेंगे...चलिए उन्हें अपने तरीके से काम करने दीजिए...हम अपने तरीके से काम करते हैं...

अगर राष्ट्रीय महत्व के फैसलों में जनभावना का ध्यान रखा जाना चाहिए, तो जनभावना को बनाने के लिए क्या हमारा कोई कर्तव्य नहीं बनता..और ब्लॉग तो अब लोकतंत्र का पांचवां खम्भा बनने की ओर अग्रसर है...इसलिए इस दृष्टि से ब्लॉगर की भूमिका तो और भी महत्वपूर्ण हो जाती है...मेरा उद्देश्य कश्मीर पर बहस को शुरू करना है...लेकिन पहले मैं कुछ बातें स्पष्ट कर दूं...इस बहस को सार्थक आयाम तभी दिया जा सकेगा, जब पहले से दिमाग में हम कोई बंधी-बंधाई सोच लेकर न चले...कुछ नए अंदाज से सोचा जाए...इसका सीधा तरीका है...कश्मीर को लेकर जितने भी पक्ष हैं, आप उनकी जगह अपने को खड़ा कर सोचें...जैसे कि आप मान लें...

1 आप आम कश्मीरी नागरिक है, जो धरती की जन्नत पर रहते हुए जेहन्नुम की आग को झेल रहा है...
2 आप जम्मू-कश्मीर के युवा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की जगह सीएम की कुर्सी पर बैठे हैं...
3 आप कश्मीरी पंडित है जिसे अपने घर को छोड़कर दो दशक से शरणार्थियों की तरह जीवन गुज़ारना पड़ रहा है...
4 आप जम्मू या लेह के नागरिक हैं जिन्हें कश्मीर को ज़्यादा तरजीह दिए जाने.की वजह से भेदभाव की शिकायत है...
5 आप प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जगह पर हैं और राष्ट्र को एकसूत्र में बांध रखने की आप पर ज़िम्मेदारी है..
6 आप केंद्र में विरोधी दल के नेता हैं, हर मुददे को राजनीति के नफ़े-नुकसान के तराजू में तौल कर कोई फैसला लेने की जगह वाकई देशहित में आप फैसला लेते हैं...
7 आप कश्मीर में मुख्य विरोधी दल पीडीपी की नुमाइंदगी कर रहे हैं, जिसका काम कश्मीरी अवाम की आवाज़ को बुलंद करना है, साथ ही अपनी राजनीति की लकीर को बड़ा करते हुए उमर अब्दुल्ला को सरकार से हटाना है...
8. आप कश्मीर में सैनिक होने के नाते अपनी ड्यूटी बजाते हुए दिन-रात कभी आतंकवाद तो कभी युवा कश्मीरियों के आक्रोश का सामना करते हैं...
9 आप अलगाववादी संगठन हुर्रियत कान्फ्रेंस, जेकेएलएफ के नुमाइंदे हैं और आपका लक्ष्य कश्मीर की आज़ादी है..
10 आप कश्मीर में सेब की बागबानी करते हैं...सेब का बंपर उत्पादन होते हुए भी उठान न होने की वजह से माल आपके सामने सड़ रहा है...



एक बार फिर गुज़ारिश करुंगा कि किसी भी समस्या का समाधान सिर्फ अपनी चलाने से या फोर्स से नहीं निकल सकता...समाधान हाथ में पत्थर उठाने या बुलेट से भी नहीं निकल सकता...समाधान अगर निकलेगा तो वो सिर्फ ठंडे दिमाग से आमने-सामने बैठ कर बातचीत से ही निकलेगा...हमें अपनी बात कहने के साथ दूसरा क्या कह रहा है, ये भी सुनने का संयम रखना होगा...और इस बहस में हिस्सा लेने के लिए मेरी एक और विनती है, अतीत की कड़वी यादों को जितना कम से कम कुरेदा जाए, उतना ही बेहतर रहेगा...बीते कल में जो हो गया, वो हमारे हाथ में नहीं है...हमारे हाथ में सिर्फ आज है...इस आज में हम खता करते हैं तो अंजाम आने वाले कल की पीढ़ियों को भुगतते रहना होगा...आइए आपका स्वागत है, खुले मन से इस खुली बहस में हिस्सा लीजिए...और हां अगर मतभेद आते हैं तो उसे संवाद की तरह ही लिया जाए विवाद की तरह नहीं...मैं अपनी तरफ से अगले कुछ दिन तक इसी मुद्दे पर रोज कुछ नया रखने की कोशिश करुंगा...

46 टिप्‍पणियां:

  1. समाधान अगर निकलेगा तो वो सिर्फ ठंडे दिमाग से आमने-सामने बैठ कर बातचीत से ही निकलेगा....
    bahut hi jvalant aur chintaniya samsya ko acchi trah se sanvadon ke aadan pradradan ke liye uthaya aapane jo ki prashnshniya hai
    Mamala wo rukh leta jaraha hai ki aapka hi nahi hindustaan ke hit me sochane wale har bhartvasi ka chup baithana ab bahut mushkil hai .....Aabhar
    अनुष्का

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  2. हम और कर भी क्या सकते है .... जब प्रधानमंत्री अदालतों को चुप करवा सकते है तो हमारी बिसात क्या ?

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  3. कोई भी दल इस समस्या को ले कर गंभीर नहीं है........आपने जो बाते लिखी है पढने में और सुनने में बहुत अच्छी लगती है पर यथार्थ कुछ और ही है !! माफ़ कीजियेगा अगर मेरी बात बुरी लगे तो पर पानी सर के ऊपर जा चुका है अब भी अगर हम केवल बातचीत से ही काम लेते रहे तो हो चुका इस मुद्दे का हल ........आर पार की लड़ाई के सिवाए मुझे कोई हल नहीं दिखता......कश्मीरी आवाम क्या चाहती है अगर यह सच में देखा जाता तो आज यह नौबत आई ही ना होती ........ ना केंद्र और ना ही राज्य की सरकार .....कोई भी इस मुद्दे का हल नहीं निकाल पाएगी .....आप देख लीजियेगा .......वह इच्छा शक्ति है ही नहीं !

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  4. चंद सिरफिरे लोगो औऱ सियासत ने इसे इतना तूल दे दिया है कि ये सबसे बड़ी समस्या लगने लगी है। अगर जन्नत में ही रहने वाले लोगो ने धर्म के नाम पर अपने पंडित भाईयों को अकेले मरने के लिए नहीं छोड़ दिया होता तो कश्मीर आज भी स्वर्ग होता। इसके लिए पूरी तरह से कश्मीर की सियासत और उसमें धर्म के नाम पर पागल लोग ही जिम्मेदार हैं। आज जब कश्मीर का युवा देश के अन्य युवाओं की तरह आगे बढ़ना चाहता है तो अब पाकिस्तान समर्थक पत्थर लेकर बच्चों को सड़कों पर मरने के लिए भेज रहा है।

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  5. कटु है लेकिन हक़ीकत है कि जहाँ इस्लाम का मामला हो जाय वहाँ जनता, नेता, बुद्धिजीवी आदि आदि सभी चुप रहना या गोल गोल बातें करना ही पसन्द करते हैं।
    मैं बस इतना समझ पाया हूँ कि कश्मीर समस्या इस्लाम बहुल जनसंख्या, ज़ेहादी विचारधारा, भयानक ऐतिहासिक भूलों और सामरिक सम्वेदनशीलता की जटिल परिणति है। समस्याग्रस्त होना कश्मीर की नियति है।
    हमें भी ऐसी समस्याएँ पैदा करने का शौक है। देखते जाइए, हम लोगों के वृद्ध होने तक ऐसे और क्षेत्र भी 'डेवलप' हो जाएँगे। न तो हम साफ सोच सकते हैं, न कह सकते हैं और न कर सकते हैं। ... सुबह सुबह काहे कुरेद दिए भैया?

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  6. निश्चित ही किसी भी समस्या का समाधान तभी निकल सकता है, जब कि उस समस्या में उपस्थित दोनों पक्ष समाधान निकालना चाहते हों..अगर दोनों पक्ष समाधान चाहते ही न हों, तो हमारे आपके लाख सर पटक लेने पर भी समाधान नहीं निकल सकता.

    समस्या बनी रहना ही दोनों पक्षों को अन्य मुद्दों से भटकाव की सहूलियत देता है, तब वो भला क्यूँ इससे निज़ात पाना चाहेंगे.

    मुझे नहीं लगता है समस्या समस्या की वजह से है, समस्या सोची समझी सियासी वजहों से हैं. भ्रम उत्पन्न करने और भटकाव देने का माध्यम बनी हुई है.

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  7. ईमानदारी से समस्या सुलझाने की कोशिश की गयी होती तो आज ना कश्मीर में , ना देश के अन्य हिस्सों में ऐसे हालात होते ...!

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  8. जन्नत को जहन्नुम बना दिया है और साथ में दाव पर लगा है लाखो नौनिहालों का भविष्य .. जिनका सत्र २-२ साल पीछे चल रहा है

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  9. कांग्रेस हर जगह असफल है फिर भी लोग चुन रहे हैं उनको बार बार - क्या कर सकते है !

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  10. बहुत जटिल समस्या है कश्मीर। लेकिन केन्द्र, राज्य सरकार और कश्मीरी जनता मिल कर सुलझा सकती है इसे।

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  11. खुशदीप जी आपने कई प्रश्‍नों के साथ परामर्श मांगा है। यदि मैं मनमोहन सिंह होती तो कश्‍मीर को प्राथमिकता से लेकर कडी कार्यवाही करके अलगाववादियों के इरादों को समाप्‍त करवा देती। सारे ही कश्‍मीरी पंडितों को वापस उनके घर दिला देती। जैसे सरदार पटेल ने 565 रियासतों का विलीनीकरण करवाया था वैसे ही कश्‍मीर का भी करवा देती।
    यदि मैं उमर अबदुल्‍लाह होती तो युवा पीढी को सम्‍प्रदायवाद के विष से अलग रखते हुए उन्‍हें विकास के अर्थ समझाती। यह भी बताने का प्रयास करती कि भारत और पाकिस्‍तान में कितना अन्‍तर है।
    यदि मैं कश्‍मीर की नागरिक होती तो हिंसा का मार्ग छोडकर उन्‍नति के मार्ग को चुनती।
    यदि मैं कश्‍मीरी पण्डित होती तो अपने वतन वापसी की आवाज को कभी दबने नहीं देती।
    आपने बहुत सारे प्रश्‍न किए हैं सभी के उत्तर नहीं दे रही हूँ क्‍योंकि पोस्‍ट लम्‍बी हो जाएगी। कश्‍मीर समस्‍या का हल केवल दृढता है, यदि ऐसा नहीं किया गया तो आज कश्‍मीर सम्‍प्रदायवाद के कारण भारत से अलग होगा तो कल पूर्वांचल और फिर दक्षिण के प्रांत। भारत वापस 565 रियासतों में बंट जाएगा। इसलिए देश को आज सरदार पटेल जैसे प्रधान मंत्री की आवश्‍कता है।

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    1. आपके उपरोक्त कथन से पूर्णता सहमत हूँ.

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  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  13. कश्मीर वाकई एक गंभीर समस्या बन चुकी है, और इसमें दोनों देशों के राजनीतिज्ञों का ही हाथ है. मेरे विचार से इसके हल के लिए नरम और गरम दोनों प्रकार के स्वभाव को एक साथ अपनाना पड़ेगा. जो लोग पकिस्तान समर्थक हैं, उन्हें पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े वाले कश्मीर में भेज देना चाहिए और LOC को सील कर देना चाहिए. ताकि उन्हें भी तो पता चले पाकिस्तान जैसे भ्रष्ट देश में रहने का मज़ा.

    मेरे ख़याल से कश्मीरियों को अपनी समस्याओं का निदान चाहिए, उन्हें समझा दिया गया है की भारत से अलग होकर ही उनकी समस्याओं का निदान हो सकता है. अगर हम उन्हें अपना मानते हैं तो उन लोगो से संवाद कायम करके सही सन्देश को लोगो तक पहुँचाना ज़रूरी है.

    अगर गरमपंथी कश्मीरी नेताओं को एकदम से किनारे किया गया अथवा उनके खिलाफ कार्यवाही की गई तो यह आग में घी डालने जैसा होगा. इससे उनका मंसूबा पूरा हो जाएगा. बल्कि अभी के लिए नरमपंथी गुटों को आगे लाना चाहिए और धीरे-धीरे गरम पंथी गुटों को समाप्त करने की दीर्घकालीन योजना बनानी चाहिए. यह गुट ही समस्या की सबसे बड़ी जड़ हैं. पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से आदेश प्राप्त करके, यही लोग कश्मीर की फिजा को खराब करते हैं. इनसे बहुत ही सख्ती से लेकिन चुप-चाप निपनता चाहिए.

    मनमोहन सिंह का काम सभी पक्षों से बातचीत के ज़रिये समस्या को सुलझाने, लोगों को सरकार के प्रति विश्वास जगाने और रोज़गार के अवसर उपलब्ध करने का होना चाहिए. वहीँ उमर अब्दुल्लाह का काम गरमपंथियों से निपटने का होना चाहिए, इस काम के लिए कश्मीरी पुलिस को ही महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ेगी. और इसके लिए पुलिस को भरपूर सहयोग मिलना चाहिए. हमारी सेना का काम बोर्डर की सुरक्षा होना चाहिए, क्योंकि यही वह क्षेत्र है जहाँ से आतंकवाद को सबसे अधिक सहारा मिलता है. इसके लिए और अधिक सेना की तैनाती होनी चाहिए. वहीँ प्रदेश की सुरक्षा के लिए लोकल कश्मीरी पुलिस को ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए.

    जो लोग यह सोचते हैं कि कांग्रेस को हटा कर कोई हल निकल सकता है, तो चाहे सरकार किसी भी दल के हो बिना इच्छा शक्ति के यह कार्य असंभव है. कांग्रेस से पहले भी कई सरकार आ चुकी हैं, लेकिन नतीजा सिफर ही था. बल्कि उन दिनों में आतंकवाद चरम सीमा पर था. आज अंतर्राष्ट्रीय माहौल के कारण ही सही, आतंकवादी गतिविधियों में कमी आई है और इसका फायदा हमारी सरकार को उठाना चाहिए.

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  14. पहली बात स्पष्ट कर दूं कि यहां बहस कश्मीर पर है, पाकिस्तान पर नहीं...कश्मीर जो हमारा अपना है...अगर हम फोर्स की बात करते हैं तो वो पाकिस्तान के खिलाफ दिखाई जानी चाहिए, जिसने हमारे कश्मीर के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर रखा है...यहां हमें इंदिरा गांधी जैसा दृढ़निश्चयी प्रधानमंत्री चाहिए...जिसने पाकिस्तान के ही दो टुकड़े करके दिखा दिए थे...लेकिन कश्मीर हमारे घर की बात है...यहां सिर्फ फोर्स से समस्या का निदान निकालने की बात सोचने से काम नहीं चलने वाला...हमारे जवान कश्मीर और पूर्वोत्तर की आग को बुझाने में ही उलझे रहेंगे तो बॉर्डर पर पूरा ध्यान कैसे दिया जा सकेगा...पाकिस्तान अब गिलगित और बाल्तिस्तान जैसे इलाकों को भी चीन को तश्तरी पर रखकर देना चाह रहा है...चीन हमें चारों ओर से घेरना चाहता है...इन सामरिक खतरों की तैयारी करने की जगह सेना को हमने आंतरिक मसलों में ही उलझा रखा है...एक बात और, किसी को दबाव में लेकर अपने साथ रखने की कोशिश करने से कहीं ज़्यादा अच्छा है उसका दिल जीतकर सही में अपना बनाना...
    मुझे खुशी है कि इस बहस को जो मैं स्वरूप देना चाहता था, अजित गुप्ता जी ने इसे ठीक उसी संदर्भ में लिया...सिर्फ नाउम्मीदी जताने या सरकार को कोसते रहना इस बहस का उद्देश्य नहीं है,,,आप अपनी तरफ से भी समाधान सुझाएं, यही इस बहस की कोशिश है...

    जय हिंद..

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    1. आपकी टिप्पणी से पूर्णता सहमत हूँ

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  15. KASHMIR ke naujawan bhatak gaye hai, unhe dikhana padega kee pakistan, ghulam kashmir ke nagriko ke halaat kia hain,
    jab wo is sach se wakif honge, tab unhe ahasas hoga ki woh in alagawadiyo kaa sath dekar jannnat se khubsurat jagah ko badnaam kar rahe hai,

    Umar abdulla sahab ko janta ke beech jaana hoga, patharbaji kee ek wajah berojgaari bhi hai, kyonki KHALI DIMAG SHAITAAN kaa kaam ho raha hai waha pey.

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  16. आज अच्छा मुद्दा उठाया है
    वैसे शाहनवाज़ की बात भी सही है। सरकार कोई भी हो सभी एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। विपक्ष मे बैठ कर सभी शेर बन जाते हैं लेकिन जब खुद पर बारी आती है तो ठुस्स हो जाती है। जो भी सरकार रहे उसे इस समस्या को निपटाने को प्राथमिकता देनी चाहिये।
    हर फूल कली यहाँ रोयी सी लगती है
    वादिओं की रोनक खोई सी लगती है

    मखमली बागों की सरजमी काश्मीर
    बस खून से सनी लोई सी लगती है

    बहुत अच्छा आलेख और अच्छे सवाल। शुभकामनायें।

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    1. आपकी टिप्पणी से पूर्णता सहमत हूँ

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  17. समाधान अगर निकलेगा तो वो सिर्फ ठंडे दिमाग से आमने-सामने बैठ कर बातचीत से ही निकलेगा...हमें अपनी बात कहने के साथ दूसरा क्या कह रहा है, ये भी सुनने का संयम रखना होगा.

    लाख टके की बात कह दी आपने..

    नीरज

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  18. पहले तो जिन दस्तावेजी सबूतों के बल पे हम कश्मीर को अपना कहते हुए फूले नहीं समा रहे है…कुछ वैसे ही दस्तावेजी सबूत पाकिस्तान के पास भी हैं जिनके बल पर वो कश्मीर पर अपना हक जाता रहा है| ये तथ्य है कि आज़ादी के बाद कश्मीर वहाँ के राजा श्री हरी सिंह जी की मर्जी से पाकिस्तान की झोली में चला गया था जिसके बदले में पाकिस्तान को कश्मीर की तमाम ज़रूरतों का जिम्मा अपने ऊपर लेना था लेकिन हुआ इसके उलट ही….कश्मीर की ज़रूरतों और प्राथमिकताओं को नज़र अंदाज़ कर वहाँ के लोगों की मदद करने के बजाये वहाँ पर पकिस्तान के कबाईलियों द्वारा सरेआम लूटपाट और जघन्य हत्याओं का दौर चल निकला| जिसकी कई मर्तबा पाकिस्तान की तत्कालीन सरकार से शिकायत करने के बावजूद भी वहाँ के हुक्मुरानो के कान पे जूं तक नहीं रेंगी…जिससे निराश हो राजा हरी सिंह ने भारत से मदद की गुजारिश की और बदले में कश्मीर के हस्तांतरण के कागज़ात भारत को सौंप दिए| अब एक ही क्षेत्र पर वो भी अपना दावा जाता रहे हैं और हम भी…

    इसी मुद्दे को लेकर आमने-सामने के कई युद्ध भी लड़े जा चुके हैं और अब पाकिस्तान द्वारा आंतकवाद की शक्ल में छद्म युद्ध जारी है… वो हर साल हज़ारों हज़ार करोड़ रूपए इस बाबत खर्च कर रहा है कि कश्मीर में अस्थिरता का माहौल बना रहे और हम भी हर साल उस से कई गुणा ज्यादा इसलिए खर्च कर रहे हैं कि वहाँ अमन और शान्ति का माहौल बना रहे
    ये सब हमेशा इसी तरह से चलता रहेगा …वो खर्च करते रहेंगे और हम भी खर्च करते रहेंगे…दरअसल… इस पूरे मामले की लगाम जिन लोगों के हाथ में है…उनमें से कोई भी इस समस्या का हल नहीं चाहता….भले ही वो पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी याने के ‘आई.एस.आई’ वाले हों या फिर कश्मीर के अलगावादी नेता हों…या यहाँ दिल्ली में बैठे हमारे हुकुमरान हों अथवा हमारी मिलिट्री वाले हों…कहने का मतलब ये कि भले ही वो कोई छोटे से छोटा अथवा बड़े से बड़ा शख्स हो …जिस किसी का भी कश्मीर से अपना खुद का हित जुड़ा हुआ है…वो इस समस्या का हल नहीं होने देना चाहता|

    ‘आई.एस.आई' वाले पाकिस्तानी सरकार से कश्मीर में आंतक फैलाने के नाम से हर वर्ष हज़ारों करोड़ रुपया ऐंठते हैं…उसी पैसे से कश्मीर के अलगावादी नेताओं की रोजी रोटी चलती है और उसी पैसे से गरीब बेरोजगारों के लालच देकर आंतकवादी बनने के गुर सिखाए जाते हैं…उसी पैसे से मदरसों में छोटे-छोटे बच्चों को आंतकवाद का पाठ पढाया जाता है……और उसी पैसे को घुसपैठ कराने के नाम पर हमारे भ्रष्ट फौजियों को दिया जाता है…उसी पैसे से दंगा करने और करवाने वालों की गुजर-बरस होती है…उसी पैसे की गरमी से तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता और उनके नेता शोर मचाते हैं…और फिर क्या गारंटी है कि ‘आई.एस.आई' वाले उस पैसे को समूचा इस नेक काम के लिए(उनके हिसाब से ये एक नेक काम है) ही खर्च करते हैं…अपने लिए कुछ बचा के नहीं रखते?

    अब आप ही बताएँ कि इनमें से भला कौन चाहेगा कि उसके फलते-फूलते घर को कश्मीर समस्या की हल रूपी बुरी नज़र लग जाए?

    इसी तरह हमारी सरकार ने भी पाकिस्तान के इस हमले से बचाव के लिए उससे कई गुना ज्यादा बजट निर्धारित कर रखा है…ज़ाहिर है कि उसकी भी इसी तरह से बन्दर-बाँट होती होगी…कहने का तात्पर्य ये कि जिस किसी के भी कश्मीर से हित जुड़े हैं…भले ही वो हमारी नज़र में अनैतिक क्यों ना हों…वो कभी भी नहीं चाहेगा कि कश्मीर समस्या का कभी हल भी हो…

    ये सब देख के यही लगता है कि….आम आवाम की किस्मत में पिसना लिखा है और उसे हर हाल में पिसना ही है…

    पाकिस्तान…कश्मीर पर अपना दावा किसी भी हालत में नहीं छोडेगा और हम उसे पूरा लिए बिना मानेंगे नहीं… अगर इस सोच से निजात पा हमारे और उनके हुक्मुरान अगर खुले दिल से सोचें तभी इस समस्या का स्थायी रूप से कोई हल निकल सकता है वर्ना नहीं…

    मेरे ख्याल से दोनों पक्षों में अगर कोई समझौता हो सकता है तो इस बात पर हो सकता है कि नियंत्रण रेखा को ही अपना बार्डर मान हमेशा के लिए इस विवाद को यहीं विराम दे दिया जाए…

    जय हिंद

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    1. आपकी टिप्पणी से पूर्णता सहमत हूँ

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  19. पहले तो जिन दस्तावेजी सबूतों के बल पे हम कश्मीर को अपना कहते हुए फूले नहीं समा रहे है…कुछ वैसे ही दस्तावेजी सबूत पाकिस्तान के पास भी हैं जिनके बल पर वो कश्मीर पर अपना हक जाता रहा है| ये तथ्य है कि आज़ादी के बाद कश्मीर वहाँ के राजा श्री हरी सिंह जी की मर्जी से पाकिस्तान की झोली में चला गया था जिसके बदले में पाकिस्तान को कश्मीर की तमाम ज़रूरतों का जिम्मा अपने ऊपर लेना था लेकिन हुआ इसके उलट ही….कश्मीर की ज़रूरतों और प्राथमिकताओं को नज़र अंदाज़ कर वहाँ के लोगों की मदद करने के बजाये वहाँ पर पकिस्तान के कबाईलियों द्वारा सरेआम लूटपाट और जघन्य हत्याओं का दौर चल निकला| जिसकी कई मर्तबा पाकिस्तान की तत्कालीन सरकार से शिकायत करने के बावजूद भी वहाँ के हुक्मुरानो के कान पे जूं तक नहीं रेंगी…जिससे निराश हो राजा हरी सिंह ने भारत से मदद की गुजारिश की और बदले में कश्मीर के हस्तांतरण के कागज़ात भारत को सौंप दिए| अब एक ही क्षेत्र पर वो भी अपना दावा जाता रहे हैं और हम भी…

    इसी मुद्दे को लेकर आमने-सामने के कई युद्ध भी लड़े जा चुके हैं और अब पाकिस्तान द्वारा आंतकवाद की शक्ल में छद्म युद्ध जारी है… वो हर साल हज़ारों हज़ार करोड़ रूपए इस बाबत खर्च कर रहा है कि कश्मीर में अस्थिरता का माहौल बना रहे और हम भी हर साल उस से कई गुणा ज्यादा इसलिए खर्च कर रहे हैं कि वहाँ अमन और शान्ति का माहौल बना रहे
    ये सब हमेशा इसी तरह से चलता रहेगा …वो खर्च करते रहेंगे और हम भी खर्च करते रहेंगे…दरअसल… इस पूरे मामले की लगाम जिन लोगों के हाथ में है…उनमें से कोई भी इस समस्या का हल नहीं चाहता….भले ही वो पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी याने के ‘आई.एस.आई’ वाले हों या फिर कश्मीर के अलगावादी नेता हों…या यहाँ दिल्ली में बैठे हमारे हुकुमरान हों अथवा हमारी मिलिट्री वाले हों…कहने का मतलब ये कि भले ही वो कोई छोटे से छोटा अथवा बड़े से बड़ा शख्स हो …जिस किसी का भी कश्मीर से अपना खुद का हित जुड़ा हुआ है…वो इस समस्या का हल नहीं होने देना चाहता|
    क्रमश:

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  20. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  21. ‘आई.एस.आई' वाले पाकिस्तानी सरकार से कश्मीर में आंतक फैलाने के नाम से हर वर्ष हज़ारों करोड़ रुपया ऐंठते हैं…उसी पैसे से कश्मीर के अलगावादी नेताओं की रोजी रोटी चलती है और उसी पैसे से गरीब बेरोजगारों के लालच देकर आंतकवादी बनने के गुर सिखाए जाते हैं…उसी पैसे से मदरसों में छोटे-छोटे बच्चों को आंतकवाद का पाठ पढाया जाता है……और उसी पैसे को घुसपैठ कराने के नाम पर हमारे भ्रष्ट फौजियों को दिया जाता है…उसी पैसे से दंगा करने और करवाने वालों की गुजर-बरस होती है…उसी पैसे की गरमी से तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता और उनके नेता शोर मचाते हैं…और फिर क्या गारंटी है कि ‘आई.एस.आई' वाले उस पैसे को समूचा इस नेक काम के लिए(उनके हिसाब से ये एक नेक काम है) ही खर्च करते हैं…अपने लिए कुछ बचा के नहीं रखते?

    अब आप ही बताएँ कि इनमें से भला कौन चाहेगा कि उसके फलते-फूलते घर को कश्मीर समस्या की हल रूपी बुरी नज़र लग जाए?
    क्रमश:

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  22. इसी तरह हमारी सरकार ने भी पाकिस्तान के इस हमले से बचाव के लिए उससे कई गुना ज्यादा बजट निर्धारित कर रखा है…ज़ाहिर है कि उसकी भी इसी तरह से बन्दर-बाँट होती होगी…कहने का तात्पर्य ये कि जिस किसी के भी कश्मीर से हित जुड़े हैं…भले ही वो हमारी नज़र में अनैतिक क्यों ना हों…वो कभी भी नहीं चाहेगा कि कश्मीर समस्या का कभी हल भी हो…

    ये सब देख के यही लगता है कि….आम आवाम की किस्मत में पिसना लिखा है और उसे हर हाल में पिसना ही है…

    पाकिस्तान…कश्मीर पर अपना दावा किसी भी हालत में नहीं छोडेगा और हम उसे पूरा लिए बिना मानेंगे नहीं… अगर इस सोच से निजात पा हमारे और उनके हुक्मुरान अगर खुले दिल से सोचें तभी इस समस्या का स्थायी रूप से कोई हल निकल सकता है वर्ना नहीं…

    मेरे ख्याल से दोनों पक्षों में अगर कोई समझौता हो सकता है तो इस बात पर हो सकता है कि नियंत्रण रेखा को ही अपना बार्डर मान हमेशा के लिए इस विवाद को यहीं विराम दे दिया जाए…

    जय हिंद

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  23. हर मसले की तरह कश्मीर मसले का भी हल है पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नेता हल नहीं होने देना चाहते,
    यहाँ भी पधारें:-
    अकेला कलम...

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  24. @राजीव कुमार तनेजा भाई,
    आपकी लेखनी का ये रूप देखकर हतप्रभ हूं...एक व्यंग्यकार जब ज्वलंत मुद्दे पर कलम चलाता है तो किस खरे अंदाज़ में सामने आता है, ये आज आपने इन टिप्पणियों से साबित किया है...विश्वास है कि इस बहस में आगे भी ऐसे ही अपने विचार से सार्थक योगदान देते रहेंगे...

    जय हिंद...

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    1. आपकी टिप्पणी से पूर्णता सहमत हूँ

      हटाएं

  25. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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  26. जब तक हम इस झगडे की जड तक नही जायेगे, कुछ नही होगा, सब से पहले जड को खत्म करे, चाणक्या वाली नीति से, जो हमारे चाचा नेहरु दोस्ती के पोढे के रुप मै हमारे दिलो मे रोप गये है धारा ३७० को हटाये, फ़िर इन कशमीरियो से साफ़ बात करे की वो इस देश मै रहना चाहते है तो हमारे बने वर्ना जाये जहां उन का मन करता है, ओर इस सब से पहले, उस हराम की ओलाद को सब्क जरुर सिखाये जो इन्हे भडका रहा है, जेसे किसी परिवार मै लडाई झगडे होते है तो घर वाले कारण देखते है, ओर अगर कोई घर के किसी मेम्बर को भडका रहा हो तो सब से पहले उस के दांत तोडते है, ओर कोई रास्ता नही, इस के सिवा, ६३ साल से शांति से ही तो बात करते रहे है, लाखो कशमीरी हिन्दू धक्के खा रहे है, तो क्या अब इन लोगो के पांव पकड कर गिड गिडाये भाई हम तो मुर्ति पुजक है, हमे माफ़ करो, घर की इज्जत के लिये हम सब सहते रहेगे...जिस के हाथ मै जुता हो उस से सब डरते है, तो सरकार कब जुता ऊठायेगी???

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  27. राजीव जी की बात से पूर्णतय सहमत हु | मुझे लगता है की कश्मीर समस्या रूपी पेड़ के पत्ते, शाखाये तोड़ने से बात नहीं बनेगी जरुरत उसके जड़ को काटने की है तो सबसे पहले अलगाववादी नेताओ में से जो नरमपंथी है उन्हें सत्ता की मलाई का स्वाद लगाया जाये चुनाव ना लड़ने का उनका व्रत भंग कराया जाये और उनको सरकार में शामिल भी किया जाये फिर उनसे मिल कर गरमपंथियो को भी इस चुनावी प्रक्रिया में लपेटा जाये और उनको भी मलाईदार पद दिए जाये पर पड़ोस से आ रही दूध की सप्लाई रुकवा दी जाये | जब वहा से आ रहा दूध बंद हो जायेगा तो निश्चित रूप से वो यहाँ से मिल रही मलाई पर निर्भर हो जायेंगे और सरकार बनाने और और उसे बचाने के खेल में व्यस्त हो जायेंगे | अलगाव वादियों को अनदेखा करके हम ये समस्या हल नहीं कर सकते है सबसे पहले उन्हें ही खुद में शामिल करना होगा भले ही उनके इगो को मालिश करना पड़े | पर समस्या यही है की यहाँ तो लोग चाहते ही नहीं है की वो चुनावी प्रक्रिया में शामिल हो चुनावी जंग में एक और दुश्मन कौन लाना चाहेगा |

    दूसरी बात आजाद कश्मीर को भारत में मिलाने का ख्याली पुलाव पकाना बंद कर दिया जाये और भारत के लोगो को भी भड़काना जी हा भड़काना ये कह कर की पूरा कश्मीर हमारा है और हम उसे ले कर रहेंगे बंद किया जाये और एल ओ सी को बार्डर मानने की हिम्मत दिखाई जाये | पर हमारे और आप के जीते जी ये नेता इसे संभव नहीं बनाने वाले है |

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  28. एक बात और मै हर जगह देखती हु की कश्मीरी पंडितो की बात उठाई जाती है पर एक बार जरा उनसे तो पूछिये की इतने सालो बाद जो ज्यादातर कही न कही बस चुके है और बहुतो की ( सारे के नहीं ) जिंदगी पटरी पर आ चुकी है क्या वो कश्मीर लौटना चाहते है यदि उनसे कहा जाये की वो कश्मीर जाना चाहेंगे या कश्मीर में उनकी जो जमीन जायदाद है उसकी कीमत ले कर वही पर रहना चाहेंगे जहा पर वो है | मुझे लगता है वो इतने सालो से जहा पर है वही पर रहना चाहेंगे ज्यादा से ज्यादा वो कश्मीर को अपना गाव मन कर बस वहा कभी कभी जाने की सोचेंगे जैसा की मुंबई में हजारो लोग जो देश के हर हिस्से से यहाँ आ कर बसने के बाद यहाँ से कभी वापस नहीं जाते है पर अपने जन्म स्थली से रिश्ता बनाये रखते है |

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  29. @यहां हमें इंदिरा गांधी जैसा दृढ़निश्चयी प्रधानमंत्री चाहिए...जिसने पाकिस्तान के ही दो टुकड़े करके दिखा दिए थे.|

    खुशदीप जी यही तो समस्या है जम हम भारतीय ही ये मानते है की हमने पाकिस्तान के दो टुकडे कर दिए है तो सोचिये की एक आम पाकिस्तानी इसको किस रूप में लेता होगा | उसको तो यही लगेगा ना की भारत ने हमारे देश को तोडा है हम भी उसके साथ यही करेंगे पंजाब ना सही कश्मीर को ना छोड़ेंगे भारत के भी उसी तरह से टुकडे कर देंगे | मुझे तो लगत है की उस समय बंगलादेश को आजाद करना ही नहीं था पाकिस्तान जो वहा कर रहा था उसे पढने के बाद तो यही लगता है की यदि आज वो पाकिस्तान का हिस्सा होता तो वो उनका कश्मीर समस्या बन चूका होता और वो वही पर अपना सर फोड़ रहे होते और हम सब चैन से जी रहे होते |

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  30. कुछ नहीं जी, इज़रैल से सबक लें :)

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  31. कश्मीर समस्या का कोई हल नहीं है केवल वक्त ही समाधान निकालेगा

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  32. खुशदीप भाई .........फ़ेसबुक पर एक कम्युनिटि है ....सेव जम्मू ....इसमें एक बार झांक कर देखिए ..........जाने कैसा कैसा सच भरा पडा है हर तर्क वितर्क से दूर ...जाने ये समस्या या कहूं कि नासूर कब ठीक हो पाएगा ????

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    आदरणीय खुशदीप जी,
    एक पोस्ट लिखी थी मैंने भी कश्मीर के मुद्दे पर १२ जुलाई को...
    विचार तो अभी भी वही हैं...अत: पोस्ट से ही उद्धृत कर देता हूँ:-

    कश्मीर को मैं समस्या नहीं मानता... वहाँ तो इम्तहान है उन मूल्यों का जिसके आधार पर हमारा यह देश बना है...स्वायत्तता, पाकिस्तान में विलय या नये इस्लामिक मुल्क की जो यह माँग कश्मीर में उठती है उसका आधार यह नहीं है कि पाक अधिकृत कश्मीर में बहुत अच्छा राज चलता है... आधार सिर्फ धर्म है... वे यह मान कर चलते हैं कि दिल्ली में हिंदुओं का राज है...और क्योंकि कश्मीरी पंडितों को भगाकर अब घाटी में उन लोगों ने केवल एक ही धर्म का वर्चस्व कर दिया है...अत: भारत का कोई भी दखल या अधिकार उन्हें मंजूर नहीं...

    यह स्थिति 'समस्या' नहीं अपितु हमारे देश के लिये चुनौती है और अवसर भी...अपने स्थापना के मूल्यों को परखने व दॄढ़ करने का...बंदूक या पत्थर उठाकर देश को चुनौती देते यह आतंकी व अलगाववादी और उत्साहित होते हैं यदि इन्हें मीडिया में जगह मिले...कथित रूप से सुरक्षा बलों के हाथ मरे लोगों पर तो स्यापा कर रहा है मीडिया...पर क्या कश्मीर के सुदूर गांवों में इन अलगावी-आतंकियों द्वारा फैलाई दहशत के शिकार नहीं दिखते उसको... अक्सर उन गांवों में अपनी दहशत को बनाये रखने के लिये ये किसी बेकसूर का या तो गला रेत देते हैं ता सरे आम गोलियों से भून देते हैं उसे...मुखबिरी, जेहाद से दगा या कश्मीर की आजादी के खिलाफ होने का इल्जाम लगा कर...

    जिस तरह की मानसिकता पाकिस्तान रखता है उसमें कश्मीर आज भारत का 'बफर जोन' बन गया है... यह अगर हाथ से निकला तो क्या यही आग जम्मू, हिमांचल, पंजाब व हरियाणा में नहीं लगाई जायेगी हमारे इस पड़ोसी द्वारा...

    आतंकवाद व अलगाववाद को पूरी दुनिया में कभी भी बातचीत की मेज पर बैठ कर खत्म नहीं किया जा सका है... उसे खत्म किया जाता है प्रचार व चर्चा नाम की उसकी आक्सीजन को काट कर...लंबे समय तक उनके इरादों को विफल करते हुए थका-थका कर...एलटीटई, मिजो व नागा आतंक-अलगाव वाद इसके उदाहरण हैं...

    हमारा राजनीतिक नेतृत्व इस चुनौती के आगे सीना तान कर खड़े हो...भारत की अखंडता नॉन नेगोशियेबल होनी चाहिये...जब आप ऐसे फैसले लेते हैं तो कुछ जान-माल का नुकसान लाजिमी है...पर इस नुकसान के डर से मुल्क धार्मिक आतंक-अलगाव के आगे घुटने नहीं टेकते...

    कश्मीर की चुनौती का हल यही है...थका-थका कर मारो आतंकी-अलगाववादियों को...उन्हें हेडलाइन न बनने दो...अपने आप ही खतम हो जायेंगे उनमें बहुत से... बाकी के लिये फौज है ही!



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    आदरणीय खुशदीप जी,
    १२ जुलाई को पोस्ट लिखी थी कश्मीर भारत के लिये समस्या नहीं बल्कि इम्तहान है...यह चुनौती भी है और अवसर भी...हल एकदम सीधा सादा व आसान है ।
    उसी से कॉपी-पेस्ट कर रहा हूँ:-
    कश्मीर को मैं समस्या नहीं मानता... वहाँ तो इम्तहान है उन मूल्यों का जिसके आधार पर हमारा यह देश बना है...स्वायत्तता, पाकिस्तान में विलय या नये इस्लामिक मुल्क की जो यह माँग कश्मीर में उठती है उसका आधार यह नहीं है कि पाक अधिकृत कश्मीर में बहुत अच्छा राज चलता है... आधार सिर्फ धर्म है... वे यह मान कर चलते हैं कि दिल्ली में हिंदुओं का राज है...और क्योंकि कश्मीरी पंडितों को भगाकर अब घाटी में उन लोगों ने केवल एक ही धर्म का वर्चस्व कर दिया है...अत: भारत का कोई भी दखल या अधिकार उन्हें मंजूर नहीं...
    यह स्थिति 'समस्या' नहीं अपितु हमारे देश के लिये चुनौती है और अवसर भी...अपने स्थापना के मूल्यों को परखने व दॄढ़ करने का...बंदूक या पत्थर उठाकर देश को चुनौती देते यह आतंकी व अलगाववादी और उत्साहित होते हैं यदि इन्हें मीडिया में जगह मिले...कथित रूप से सुरक्षा बलों के हाथ मरे लोगों पर तो स्यापा कर रहा है मीडिया...पर क्या कश्मीर के सुदूर गांवों में इन अलगावी-आतंकियों द्वारा फैलाई दहशत के शिकार नहीं दिखते उसको... अक्सर उन गांवों में अपनी दहशत को बनाये रखने के लिये ये किसी बेकसूर का या तो गला रेत देते हैं ता सरे आम गोलियों से भून देते हैं उसे...मुखबिरी, जेहाद से दगा या कश्मीर की आजादी के खिलाफ होने का इल्जाम लगा कर...
    जिस तरह की मानसिकता पाकिस्तान रखता है उसमें कश्मीर आज भारत का 'बफर जोन' बन गया है... यह अगर हाथ से निकला तो क्या यही आग जम्मू, हिमांचल, पंजाब व हरियाणा में नहीं लगाई जायेगी हमारे इस पड़ोसी द्वारा...
    आतंकवाद व अलगाववाद को पूरी दुनिया में कभी भी बातचीत की मेज पर बैठ कर खत्म नहीं किया जा सका है... उसे खत्म किया जाता है प्रचार व चर्चा नाम की उसकी आक्सीजन को काट कर...लंबे समय तक उनके इरादों को विफल करते हुए थका-थका कर...एलटीटीई, मिजो व नागा आतंक-अलगाव वाद इसके उदाहरण हैं...
    हमारा राजनीतिक नेतृत्व इस चुनौती के आगे सीना तान कर खड़े हो...भारत की अखंडता नॉन नेगोशियेबल होनी चाहिये...जब आप ऐसे फैसले लेते हैं तो कुछ जान-माल का नुकसान लाजिमी है...पर इस नुकसान के डर से मुल्क धार्मिक आतंक-अलगाव के आगे घुटने नहीं टेकते...
    कश्मीर की चुनौती का हल यही है...थका-थका कर मारो आतंकी-अलगाववादियों को...उन्हें हेडलाइन न बनने दो...अपने आप ही खतम हो जायेंगे उनमें बहुत से... बाकी के लिये फौज है ही!


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  35. कश्मीर की समस्या इसलिए नहीं बनाई गई है कि इसका हल निकले ..ये इसलिए बनाई गई है कि इसका हल कभी भी न निकले...ये राजनीतिज्ञ हमेशा एक मुद्दा ऐसा रखना ही चाहते हैं..जो बस ज्वलंत रहे और जिसके बल पर वो अपनी सत्ता की रोटी सेंकते रहें...यही तो ट्रंप कार्ड है ..इमोशनल ब्लैकमेलिंग के लिए ....यहाँ हमलोग इतनी सारी बातें कर रहे हैं...आपको क्या लगता है इतने धुरंधर सत्ताधारियों को इन बातों का इल्म नहीं है...अजी जनाब है, बहुत अच्छी तरह से है, उनके सलाहकारों की फौज ने क्या उनको ये बातें नहीं बताई होगी ? लेकिन ये मुद्दा अगर सुलझ गया तो उनके चुनावी मुद्दे क्या होंगे....फिर कौन सा चोकलेट दिखायेंगे वो लोगों को ....हाँ नहीं तो..!

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