बुधवार, 11 अगस्त 2010

हाथों की कलाकारी...खुशदीप

क्रिएटिवटी कहीं भी मिल सकती है...लेकिन एडवरटाइज़िंग का तो पेशा ही क्रिएटिविटी का होता है...ये बेहतरीन कॉपीराइटिंग या विजुअल्स का ही नतीजा होता है कि हम किसी अनजान ब्रैंड को भी घर की शोभा बना लेते हैं...यही वजह है कि हर कन्ज्युमर ब्रैंड के बजट का निश्चित हिस्सा एडवरटाइज़िंग पर खर्च होता है...नीचे एक मोबाइल नेटवर्क के एड-कैम्पेन की कुछ झलकियां हैं...आप फोन नहीं बस हाथों से की गई कलाकारी को देखिए...















स्लॉग ओवर

मक्खन गुल्ली से...तुम्हारा रिज़ल्ट क्या रहा...

गुल्ली...पांच सबजेक्ट में फेल हो गया...

मक्खन...आज से मुझे अपना डैड मत कहना...

गुल्ली...कम ऑन डैड, मैंने अपना स्कूल रिज़ल्ट बताया है, डीएनए टेस्ट का रिज़ल्ट नहीं...

16 टिप्‍पणियां:

  1. ही ही ही ही ....... अपना गुल्ली भी तो बहुत क्रियेटिव है... आखिर बेटा जो मक्खन का ठहरा...

    अरे भैया... आप कभी संजय अनेजा जी के फत्तू से मिले हैं...? मिलिएगा बिलकुल अपने मक्खन जैसा है ...


    जय हिंद ........

    --
    www.lekhnee.blogspot.com

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  2. बहुत अच्छी कलाकारी है...
    मुझे याद है बचपन में हम हाथों की छाया देख कर कुछ जानवर बनाया करते थे ....
    गुल्ली तो बस अपने बाप ही गया है...कितना भी डी.एन .ए. टेस्ट करवा लेवे...

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  3. हाहाहाहाहाहाहाहाहाहा न इंडियन बाप सुधरेंगे न बेटे

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  4. बहुत बढिया कलाकारी .. और जबाब देने में तो गुल्‍ली का जबाब नहीं !!

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  5. वाह क्या कलाकारी है, और डीएनए. टेस्ट हा हा हा...

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  6. इन चित्रों में हाथों के अलावा भी बहुत कुछ है। खास कर इंसान का दिमाग।

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  7. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  8. गुल्लि तो बहुत ही बदमाश है भई!!


    कलाकारी मस्त रही.

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  9. ज़बरदस्त क्रिएटिवटी, पहले भी देख चूका हूँ.... बल्कि मेरे तो काम ही यही है... :-) आज किसी भी ब्रांड को पब्लिक में पेश करने के लिए विज्ञापन जगत में नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं, जो की काबिले तारीफ हैं. आखिर विज्ञापन ही तो ब्रांड की पहचान होती है. ब्रांड के गुण तो खरीदने के बाद ही मालूम चलते हैं.

    और गुल्ली ने भी आज कमाल कर दिया है :-) मक्खन की तो बोलती ही बंद हो गई...... :-)

    बहुत खूब!

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  10. जब भी टीवी पर विज्ञापन आते हैं मैं उन्‍हें देखने की हमेशा वकालात करती हूँ और कहती हूँ कि क्रियटीविटी देखनी हो तो विज्ञापन देखो। सच में कई विज्ञापन बहुत ही क्रियटिव होते हैं मन तृप्‍त हो जाता है।

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  11. एक हास्य लिखा है आपको देखाना आवश्यक है ...
    http://satish-saxena.blogspot.com/2010/08/blog-post_11.html

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  12. कलाकारी गज़ब की है और गुल्ली तो है ही अपने बाप जैसा।

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  13. हा हा हा गज़ब का स्लाग ओवर और गज़ब की कलाकारी। शुभकामनायें

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  14. गुल्ली से पार पाना आसान काम नहीं है .......बच के रहना !!

    जय हिंद !

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