मंगलवार, 13 जुलाई 2010

ब्लॉगिंग की दुम...खुशदीप

कल अवधिया जी की पोस्ट पढ़ कर मज़ा आ गया...वाकई ब्लॉगर के मन की दशा को अवधिया जी ने हू-ब-हू लफ्ज़ों में उतार दिया...अपनी पोस्ट पर पल-पल टिप्पणियों की संख्या बढ़ती देखने की किसी ब्लॉगर की आतुरता को जिस सटीकता से अवधिया जी ने बयां किया है, ये साबित करता है कि धूप में बाल सफ़ेद करने का तज़ुर्बा क्या होता है...

टिपीकल ब्लॉगर बेशक किसी दूसरे की पोस्ट पर बड़ी मुश्किल से टिप्पणी दे, लेकिन अपनी पोस्ट पर चाहता है कि टिप्पणियों की संख्या लगातार बढ़ती रहे...क्यूं भई क्या सिर्फ आप ही व्यस्तता का बहाना दे सकते हो...क्या आप को ही दुनिया जहां के काम हैं...बाकी क्या सब खाली बैठे भुट्टे भून रहे हैं जो सिर्फ ये इंतज़ार करते रहें कि कब आपकी पोस्ट आए और वो टिप्पणी देकर खुद को धन्य कर लें...या फिर आपका ब्लॉग अमिताभ बच्चन के बिग अड्डा जैसा है...जो खुद किसी को एक टिप्पणी भी न दें या भूले से भी किसी पोस्ट पर अपने पढ़ने वाले पाठकों का ज़िक्र न करें लेकिन उनकी पोस्ट पर टिप्पणियों की गंगा अविरल बहती ही रहती है...

मैं खुद किसी घरेलू परेशानी में फंसा होने की वजह से दूसरी पोस्ट पर वैसे टिप्पणियां नहीं कर पा रहा जैसे कि पहले करा करता था...जब परेशानी दूर हो जाएगी तो फिर उसी रूटीन पर आ जाऊंगा...जैसी परेशानी मुझे है, ऐसी परेशानी दूसरे ब्लॉगर्स को भी हो सकती है...इसलिए मेरी टिप्पणियों का ग्राफ गिर रहा है तो मुझे कोई मलाल नहीं...ये संतोष ज़रूर है कि मुझे पढ़ने वाले पहले की तरह ही स्नेह बनाए हुए हैं...कोशिश करता हूं कि हर पोस्ट में कुछ अलग सा देता रहा हूं, जिससे प्रेडिक्टेबल न रहूं...मुद्दा हो या कोई लाइट बात, जो संदेश देना चाहता हूं बस वो सही संदर्भ में सब तक पहुंचता रहे...

अवधिया जी ने बड़े सही शब्दों में दर्द व्यक्त किया है कि टिप्पणी न मिलने पर आखिर कब तक अपने को धिक्कारा जा सकता है...अवधिया जी के शब्दों में...यही सोचकर तसल्ली दे लेते हैं अपने आपको कि लोगों में इतनी अकल नहीं है जो हम जैसे महान ब्लोगर के पोस्ट को समझ पायें...जब पोस्ट को समझेंगे ही नहीं तो भला टिप्पणी कहाँ से करेंगे?

अवधिया जी, फ़िक्र मत कीजिए, हम भारतीयों की आदत है कि या तो हम किसी महान व्यक्ति के दुनिया से जाने के बाद या फिर विदेश में कोई सम्मान मिल जाने के बाद उसको वो सम्मान देना शुरू करते हैं जिसका कि वो योग्य होता है...गुरुदत्त बेचारे को जीते जी क्या मिला...लेकिन दुनिया से जाने के बाद उनकी प्रतिभा के कसीदे गाए जाने लगे...या अभी देखिए कि फ्रांस की किसी नपुझन्नी संस्था से अपने लिए सम्मान का जुगाड़ कर लिया जाए और उसका जमकर भारत में प्रचार कराया जाए...फिर देखिए आपको महानता के किस ताड़ पर चढ़ा दिया जाता है...

आज स्लॉग ओवर भी कुछ खास है...इसे ब्लॉगजगत से ही जोड़ कर देखिएगा...


स्लॉग ओवर

मक्खन बेटे गुल्ली से...बताओ हाथी और घोड़े में क्या फर्क होता है...

गुल्ली...डैडी जी, डैडी जी...जो घोड़ा होता है न उसकी दुम पीछे होती है...और जो हाथी होता है न, उसकी न...



,,,



...



...

आगे-पीछे दोनों जगह दुम होती है...
 

22 टिप्‍पणियां:

  1. घोडे की दुम पीछे और हाथी की आगे भी वाह । टिप्पणी हम देने की कोशिश तो करते है पर इसके बावजूद आशा करते हैं कि हमे जरूर टिप्पणियां मिलती रहें . भई इंटरएक्टिव साधन इसीसे तो चुना न कि प्रतिक्रियाएं मिलें और तुरंत मिलें ।

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  2. वाह वाह वाह

    दो दूम वाला हाथी पहली बार देखा

    जय हिंद

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  3. ओह!! तभी आपकी टिप्पणियाँ नहीं दिख रहीं..हम समझे कि अमिताभ तो नहीं हो गये कहीं..हा हा!!

    सही विश्लेषण किया है!!

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  4. ब्लागर की दुम गायब हो रही है, आदमी न हो जाए!

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  5. यह तो घर घर की कहानी है , यानि हर ब्लॉग की ।
    ऐसा लगता है कि ब्लोगवाणी के बंद होने से ब्लोगिंग में ग्लोबल मंदी का दौर आ गया है ।
    लेकिन चिंता न करें , मंदी ज्यादा नहीं टिकने वाली ।

    वैसे फ्रीक्वेंसी काम करने से चार्ज बढ़ जाता है ।

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  6. """दो दूम वाला हाथी पहली बार देखा""",,,वाह ...

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  7. दो दुम वाला हाथी! सब कुछ संभव है भाई। लेकिन खुशदीप भाई आपकी टिप्पणी का क्या टिप्पणी की महिमा कभी बरनि न जाई। बहुतै बढिया लिखते हैं आप।

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  8. खुशदीप जी, आपका मक्खन तो लाल बुझक्कड़ से भी बढ़कर निकला। लाल बुझक्कड़ ने तो हाथी के पैरों के निशान देखकर यही कहा थाः

    एक तो जाने लाल बुझक्कड़ दूसर जाने ना कोय।
    चारों पाँव में चक्की बाँध के हरिना कूदे होय॥

    पर मक्खन ने तो हाथी के दो दुम बना दिये! वाह वाह!!

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  9. हम भी इस लिए ही लिखते रहते है .........महान ब्लॉगर जो है !! ;-)

    जल्दी फ्री हो जाइये नहीं तो आप भी बिग बी हो जायेगे !


    [ अरे अमिताभ बच्चन नहीं बिग बी मतलब बड़ी बी ...........हर वक़्त व्यस्त रहने वाली,(पहले तो हर घर में एक हुआ करती थी आज कल शायद दिखती भी नहीं है) ] ;-)

    मक्खन को अगर कोई चुप करा सकता है तो वह सिर्फ़ गुल्ली ही है !

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  10. हम तो मानते हैं कि टिप्‍पणी श्रेष्‍ठ होनी चाहिए जिससे हमारी पोस्‍ट की कीमत बढे, फिर वे चाहे कम ही क्‍यों ना हो। किसी भी मुद्दे की बात पर स्‍वस्‍थ चर्चा हो जाए तो अच्‍छा लगता है लेकिन केवल टिप्‍पणी करने के लिए ही टिप्‍पणी करना कहाँ तक उचित है। संख्‍या में कुछ नहीं धरा, गुणवत्ता होनी चाहिए। मैं कई बार अनुभव करती हूँ कि लेखक का भाव कुछ और होता है और टिप्‍प्‍णी कुछ और। ऐसे में लगता है कि मन से पढी नहीं गयी। हमारे विचारों का आदान-प्रदान तो संख्‍या से कभी भी नहीं तौला जा सकता।

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  11. अज मेरे मन की बात कही है। सच मे कई बार खुद पर इतनी टिप्पणियाँ पा कर भी ग्लानी होती है जब लोग कहते हैं कि अच्छी पोस्ट अप्र टिप्पणी नही मिलती और बेकार की पोस्ट पर टिप्पनियों का ढेर्5 ल्क़ग जाता है लेकिन वो ये भूल जाते हैं कि टिप्पणी पाने वाले मेहनत कितनी करते हैं। अगर मैं रोज़ 50 ब्लाग पढूँ तो क्या उनमे से आधी टिप्पणियों की भी हकदार नही?। अगर कोई टिप्पणी करे न तो कैसे पता चलेगा कि आपका लिखा पढने योग्य है भी या नही उनमे सभी टिप्पणियाँ चाहे औपचारिकता मे ही होती हों मगर लेखक का उत्साह वर्द्धन करती हैं हमारा भी मन होता है कि हम इतने समय मे कुछ लिखें मगर ब्लाग के लिये टिप्पणी को भी कम महत्व नही देती। इस लिये बजाये किसी से ईर्ष्या करने के हम उसके उत्साह ऊर्जा को समझें। मै तो बहुत से ऐसे ब्लाग्ज़ पर जाती हूँ जहाँ से मुझे पता होता है कि मुझे टिप्पणी नही मिलेगी फिर ये ले दे कैसे हुया? ागर ब्लाग लेखन करना है तो टिप्पणियों के महत्व को नकारा नही जा सकता।ांच्छा किया ये [पोस्ट लिख कर मुझे भी अपनी बात कहने का अवसर मिल गया। सोच रही थी इस विषय पर एक पोस्ट लिखूँ मगर मेरा काम हो गया। धन्यवाद और शुभकामनायें

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  12. दो दुम वाला हाथी ;-)

    बहुत खूब!

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  13. खुशदीप भाई, पता नहीं क्यों, अवधिया जी का ब्लॉग मेरे कम्यूटर महाराज पर खुलता ही नहीं है...... :-(

    आपके माध्यम से ही उनकी पोस्ट के बारे में जानकारी मिली.....

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  14. वैसे तो सभी ने अपने अपने मन की कह ही ली है और वो ही सबके मन की बात भी है मगर अजित गुप्ता जी ने बिल्कुल सही कहा …………उनसे सहमत हूँ……………वैसे ये सिलसिला यहाँ चलता ही रहेगा………………महान ब्लोगर सिर्फ़ लिखते हैं अपेक्षा नही करते इसलिये…………ब्लोगर तुम बढे चलो,धीर बन बढे चलो,हाथ मे कलम हो तो टिप्पणियाँ भी मिल जायेंगी……………वैसे ब्लोगवानी बंद होने से सभी की टिप्पणियों का ग्राफ़ गिरा है।

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  15. बहुत सही. टिप्पणियां तो शादी का लिफ़ाफ़ा हैं.:)

    रामराम.

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  16. मेरी टिपण्णी यह रही ! हाज़िर हैं !

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  17. वाह वाह............यानि कि कुल मिला कर हमारे जैसे फ़ुलटाईमर टिप्पणिकार के लिए वैकेन्सी खुल गई है ........। हाज़िर होते हैं ..कल से सरकार ...आपकी ही नहीं सबकी पोस्ट पर...बांकी महान .......हा हा हा ..........

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  18. मै ब्लॉग जगत के हाथियों और घोड़ों के बारे मे सोच रहा हूँ ....।

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