दो सूरतें जो आपकी शख्सीयत को तय करती हैं-
पहली सूरत...
आप अपने बारे में क्या सोचते हैं, जब आपके पास कुछ भी नहीं होता...
दूसरी सूरत...
आप दूसरों के बारे में क्या सोचते हैं, जब आपके पास सब कुछ होता है...
स्वामी विवेकानंद ने कहा था-
आदमी परिंदे की तरह उड़ना चाहता है...
आदमी कोयल की तरह गाना चाहता है...
आदमी मोर की तरह नाचना चाहता है...
आदमी मछली की तरह तैरना चाहता है...
लेकिन आदमी बस आदमी बन कर ही नहीं जीना चाहता...
रही ना पूरी अनपढ़ की अनपढ़...खुशदीप
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मक्खन अपनी कार के दो पहिये अचानक उतारने लग गया...
मक्खनी ने कहा...ये क्या कर रहे हो? कार के दो पहिये क्यों उतार रहे हो?
मक्खन...चुप कर ज़ाहिल औरत, रही ...






सुन्दर पोस्ट...आभार!!!
ReplyDeleteस्वामी विवेकानंद की बात आधे लोग मान लें तो देश का क्या दुनिया का कायाकल्प हो जाए। आधुनिक भारत की सही सोच हैं स्वामी विवेकानंद।
ReplyDeleteइन आँखों में थोड़ी नमी हो जाये
ReplyDeleteकाश आदमी बस आदमी हो जाये
विचारणीय पोस्ट
ReplyDeleteक्यों होता है ऐसा ...
ReplyDeleteआदमी कितना कुछ करना चाहता है , कर सकता है ...मगर उसके पास सबकुछ आते ही उसका अहंकार इतना बढ़ जाता है कि उसके भीतर का आदमी समाप्त हो जाता है ...वह दूसरों को दुखी कर , देख कर संतुष्ट क्यों होता है ...अपनी खुशियों में खुश काम ...दूसरों की खुशियों से ज्यादा दुखी ...क्यों होता है ..!
उत्तम विचार वाला पोस्ट!
ReplyDeleteवाह खुश दीप भैया वाह हमेशा नया ताज़ा गज़ब विचार
ReplyDeleteदूसरी सूरत तक शायद कोई नहीं पहुँच पाता । वैसे भी मनुष्य की फितरत ही यही है --और , और , और चाहिए ।
ReplyDeleteइसी और के चक्कर में आदमी इन्सान नहीं बन पाता ।
अच्छा लिखा है ।
Khushdeep ji,
ReplyDeleteindino zara aniyamit hun ...thodi si vyastata ho gayi hai..kripa karke maaf kijiyega...
aaj ki pravishthi bhi hamesha ki tarah laajwaab hai...
vani ki baat se sahmat hun...
बिलकुल सही आज दार्शनिक से नजर आ रहे हो? बहुत बहुत आशीर्वाद।
ReplyDeleteबहुत सही !!
ReplyDeletekash ham aadmi ban kar jee paate....:)
ReplyDeleteजय हो महाराज जय हो !
ReplyDeleteअगर मेरे पास सब कुछ हो तो मै जीरो हो जाऊंगा, ओर अब जितना है अगर इस से कम हो तो भी कोई फ़िक्र नही, क्योकि हम ने समझोता करना सीख लिया है, बस यही चाहता हुं मै जेसा हुं वेसा ही रहूं, धन्यवाद
ReplyDeleteबिलकुल ठीक कहा खुशदीप भाई
ReplyDeleteलेकिन आदमी बस आदमी बन कर ही नहीं जीना चाहता..
ReplyDeleteलेकिन आदमी बस आदमी बन कर ही नहीं जीना चाहता.
ReplyDeleteयही तो सारा खेल है..
आपकी हर पोस्ट कोई न कोई सीख देती है .....
ReplyDeleteबहुत मेहनत करते हैं हर पोस्ट पे आप ......!!
हाँ पता था किसी न किसी गीत की पंक्तियाँ ही होंगी आपकी टिपण्णी में ......
उनके ख्याल आये तो .......
खुशदीप भैया.....,
ReplyDeleteइन दिनों ज़रा अनियमित हूँ ...थोड़ी सी व्यस्तता हो गई है ..कृपा करके माफ़ कीजियेगा ...
आज कि प्रविष्ठी भी हमेशा कि तरह लाजवाब है ...
अदा कि बात से सहमत हूँ ...
जय हिंद....
भैया कोशिश तो यही करते हैं कि आदमी बनकर ही जिया जाए इसी कारण प्रेम को ही महत्व देते हैं। आज दुनिया में ऐसे बहुतायत में लोग हैं जो आदमी बनने की तरफ प्रवृत्त होते है। मेरे ख्याल से प्रत्येक व्यक्ति चाहे कितना ही खराब क्यों ना हो लेकिन वह भी अपने परिवार और बच्चों के बारे में तो सोचता ही है और जो भी ऐसा सोचता है वह आदमी बनने की ओर ही कदम बढाता है।
ReplyDeleteआदमी का आदमी होना ही सबसे ज़्यादा ज़रूरी है
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