गुरुवार, 10 जून 2010

ब्लॉगवाणी, सुन ले अर्ज़ हमारी...खुशदीप

ज़रा सामने तो आओ छलिए,


छुप-छुप छलने में क्या राज़ है,


यूं छुप न सकेगा परमात्मा,


मेरी आत्मा की ये आवाज़ है...

सोच रहे होंगे, क्यों सुना रहा हूं आपको ये गाना...अब ये गाना न गाऊं तो और क्या करूं...कुछ पोस्टों से देख रहा हूं कि किन्हीं भद्रपुरुष को ये इंतज़ार रहता है कि कब मेरी पोस्ट ब्लॉगवाणी पर आए और कब वो नापसंदगी के चटके लगाना शुरू करें...कल तो कमाल ही हो गया...जैसे किसी ने कसम खा ली थी कि मेरी पोस्ट को ब्लॉगवाणी की हॉट लिस्ट में आने ही नहीं देना...जैसे ही आती वैसे ही उसे नापसंदगी का रेड सिग्नल दिखाकर मैदान से बाहर कर दिया जाता...

वैसे ये तो मैं कह-कह कर हार गया हूं, मेरी पोस्ट पर जो भी आपको नापसंद आए, आप खुलकर कमेंट के ज़रिए उसका इज़हार करें..मैं गलत हूंगा तो फौरन अपनी गलती मान लूंगा...अन्यथा यथाशक्ति आपकी शंकाओ को दूर करने की कोशिश करुंगा...लेकिन सिर्फ नापसंदगी का चटका लगाना और कमेंट में कुछ भी न कहना, इससे मैं अपने को कैसे सुधार पाऊंगा...

हां, अगर किसी का ये मकसद है कि मेरे नाम को देखते ही मेरी पोस्ट को टांग पकड़कर नीचे खींच लेना या बाहर का रास्ता दिखा देना...तो मैं उस सज्जन का काम आसान करे देता हूं...मेरा ब्लॉगवाणी से अनुरोध है कि मेरी पोस्ट को हॉट लिस्ट में डाला ही न जाए...इससे उन सज्जन को रोज़-रोज़ जेहमत नहीं उठानी पड़ेगी कि बिना नागा मेरी पोस्ट पर नापसंदगी का चटका लगाना है...

जो ब्लॉगरजन मुझे दिल से करीब मानते हैं, उनसे भी अनुरोध है कि आप मेरे ब्लॉग का लिंक सीधा अपने ब्लॉग पर जोड़ लें, जिससे पोस्ट डालते ही पता चल जाए...बाकी ये मैंने कभी किया नहीं कि किसी ब्लॉगर को कभी ई-मेल भेजा हो कि मेरी पोस्ट आ गई है, कृपया नज़रे इनायत कर दीजिए...ये मेरी फितरत में ही नहीं है...अगर पढ़ने लायक लिखूंगा तो आप ज़रूर पढ़ेंगे...कूड़ा लिखूंगा तो आप उस पर कोई तवज्जो दिए बिना रद्दी की टोकरी में पहुंचा देंगे...

एक बार फिर ब्लॉगवाणी से अनुरोध कि बंदर के हाथ उस्तरा देने वाले इस खेल के औचित्य पर दोबारा सोचे...ब्लॉगवाणी खुद भी तय कर सकता है कि वाकई किसी पोस्ट में नापसंद करने लायक कुछ है या नहीं...या फिर सिर्फ निजी खुन्नस निकालने के लिए ही नापसंदगी के चटके का इस्तेमाल किया जाता है....आखिर ब्लॉगवाणी ने नापसंदगी के चटके के प्रावधान की शुरुआत कुछ सोच समझ कर ही की होगी...ब्लॉगवाणी से फिर आग्रह है कि इस मुद्दे पर अपने विचार स्पष्ट करे...


स्लॉग ओवर

एक आदमी का रिश्तेदार ही डॉक्टर था...बड़ा हंसमुख....शार्प सेंस ऑफ ह्यूमर..

उस आदमी ने डॉक्टर से पूछा कि आप अपने प्रेस्क्रिप्शन में ऐसा क्या लिखते हैं जो सिर्फ कैमिस्ट या पैथोलॉजी लैब वालों को ही समझ आता है...

डॉक्टर...घर के आदमी हो इसलिए ट्रेड सीक्रेट बता देता हूं...हम प्रेस्क्रिप्शन में लिखते हैं...मैंने अपने हिस्से का लूट लिया है, अब तुम भी लूट लो...




डिस्क्लेमर...इन डॉक्टरों में डॉ अमर कुमार, डॉ टी एस दराल, डॉ अनुराग, डॉ प्रवीण चोपड़ा शामिल नहीं है

46 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल सही संज्ञा दी भैया कि 'बन्दर के हाथ में उस्तरा' मैं भी यही चाहता हूँ कि ये बंद हो.. क्योंकि लोग ये नहीं देखते कि लिखी गई पोस्ट कभी-कभी महत्त्वपूर्ण भी हो सकती है.. बस नाम देखा नहीं कि नापसंद मारा.. डिस्क्लेमर ना भी लगाते तब भी शक नहीं था इन चिकित्सकों पर.. :)

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  2. मुबारक हो आपने नापसंदगी का पचासा मार लिया है.. मैं तो अभी ३४ पर ही खेल रहा हूँ.. :)

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  3. सुझाव : चटको को देख कर चटको ही मत
    कारण : यह किसी चटके हुये दिल की कराह है ।
    प्रतिकार : अपने ब्लॉग पर यह टैग-लाइन रख दो, " इक दिन बिक जायेगा माटी के मोल, तू भी चटक जायेगा इन चटकों को छोड़ "
    समाधान : उधर देखो ही मत, जब तक ज़नाबे आली की टिप्पणी न आ जाये, " ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे "
    विकल्प : ई-मेल सदस्यता का लिंक लगाओ, फ़ीडबर्नर पर उपलब्ध है ।

    इन डॉक्टरों में डॉ अमर कुमार, डॉ टी एस दराल, डॉ अनुराग, डॉ प्रवीण चोपड़ा शामिल नहीं है

    क्यों.., हम चार डॉक्टरों को क्यों छोड़ा ? क्या हमारे डॉक्टर होने पर कोई शक है ?

    एक बार समीर भाई खुशी खुशी घर पहुँचे, बहुत बड़ा तीर मारा था । चहक कर भाभी से बोले, " लो ये पकड़ो.. लाँन्ड्री से अपने सारे कपड़े लेता आया, फिर न कहना कि मैं कोई मदद नहीं करता हूँ ।
    भाभी चौंक कर बोलीं, " लाँन्ड्री की रसीद कहाँ मिल गयी, क्या तुमने मेरे पर्स से पैसे तो नहीं निकाल लिये ?
    समीर भाई हनक से बोले, " मैं क्यों तुम्हारे पर्स को हाथ लगाने लगा ? जरा याद रखा करो लाँन्ड्री की रसीद ड्रेसिंग टेबल की ड्राअर में थी । "
    भाभी कन्फ़्यूजिया गयीं, " वह तो मेरे पर्स में है, ड्रेसिंग टेबल की ड्राअर में तो तुम्हारा डाक्टर का प्रेस्क्रिप्शन रखा था !"
    समीर भाई चकरा गये, " हद है..डाक्टर के प्रेस्क्रिप्शन पर लाँन्ड्री से कपड़े भी मिल जाते हैं । फिर तो यह बड़े काम की चीज है ! "
    आदाब अर्ज़ है !

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  4. हा हा! डॉक्टर अमर का कमेंट.. :)

    वैसे तो हम आपको हॉट लिस्ट से नहीं, लिस्ट से देख कर आते हैं. आज जाना कि लोग हॉट लिस्ट से देखकर पहुँचते हैं..मगर जब तक कोई आयेगा नहीं या लिस्ट देखेगा नहीं..तब तक आप हॉट लिस्ट में पहुँचोगे कैसे??

    निश्चिंत रहिये.

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  5. हमारे लिये तो नापसन्द का सवाल ही नही है। खुशदीप भाई की हर पोस्ट हसाते हुए पते की बात कह देने वाली होती है। बहुत बढिया चटका।

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  6. ब्लागवाणी को इसपर सोचना चाहिये क्योकि वास्तव में 99% इसका दुरूपयोग हो रहा है.

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  7. प्रेस्क्रिप्शन शानदार लिखा है आपने ...
    चटके के चटके से क्या फर्क पड़ता है ..
    पढने वाले आपको पढ़ते ही हैं ...!!

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  8. मैंने भूल से एक पसंद का चटका लगा कर स्कोर ४ कर दिया है ....जबकि इच्छा तो नापसंद की ही थी -याद है आपको एक बार आपने यहीं पर क्या कंफेसन किया था ? या बताना पड़ेगा ? और अब ब्लोग्वानी से क्या कह रहे हैं ?
    बच्चे सही कहते हैं उनके सामने आज अनुसरण के लिए कोई रोल माडल नहीं है !

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  9. लगता है.. आप बहुत पजेसिव है... पसंद नापसंद को लेकर...

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  10. आप भी इस फेर में पड़े हो?

    आप तो ऐसे न थे!

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  11. आईये सुनें ... अमृत वाणी ।

    आचार्य जी

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  12. नापसंद वैसे सच में खुच खुन्नस निकालने के लिए हो रहा है..बाकी निर्णय तो ब्लॉगवाणी का है...वैसे डॉ. जी की कथा तो बेहतरीन..बढ़िया स्लॉग ओवर..धन्यवाद

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  13. .
    .
    .
    फालतू की चिंता...
    ब्लॉगवाणी से एक इम्प्रैक्टिकल और वाहियात अनुरोध...

    आप स्वयं को और अपनी पोस्ट को इतना सीरियसली क्यों लेते हैं खुशदीप जी...

    आज तक कभी कहीं पर लगाया नहीं...
    आज आपकी इस पोस्ट पर नापसंदगी का चटका लगा रहा हूँ।

    आभार!

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  14. मजाक नहीं, सच है, मोहल्ले का केमिस्ट डाक्टर की पर्ची पर ड्रॉप्स की जगह शैम्पू दे चुका है और बीमार उस का इस्तेमाल भी कर चुका है। बड़ी मुश्किल से उसे पुलिस के फंदे से बचाया जा सका।
    कभी कभी केमिस्ट भी डाक्टर की पर्ची को नहीं पढ़ पाते, अंदाज से काम चलाते हैं।

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  15. "अगर पढ़ने लायक लिखूंगा तो आप ज़रूर पढ़ेंगे...कूड़ा लिखूंगा तो आप उस पर कोई तवज्जो दिए बिना रद्दी की टोकरी में पहुंचा देंगे..."
    इसी तरह से ब्लॉगवाणी पर पसन्द और नापसन्द के चटके की चिन्ता छोड़ कर लिखें। अन्तर ही क्या पड़ता है उससे। उसकी चिन्ता में रहने से तो बस ...

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  16. बड़े भाई साहब, कतिपय लोग ब्लॉगवाणी पर पसन्द के चटके और टिप्‍पणियों की भीख (स्‍पष्‍ट या अस्‍पष्‍ट रूप में या एक तरह से कैम्‍पैनिंग कर के)मांगकर पहले अपनी पोस्‍ट हाट में चढ़ाते हैं फिर स्‍टार ब्‍लॉगर बनने का प्रयास करते हैं, फिर समयचक्र में जब पहिया घूमता है तो यही उलटा चलता है तो नापसंद चटके लगने लगते हैं. आप ऐसे लोगों में से नहीं है आपकी लेखनी में दम है, ब्‍लॉगवाणी वालों से संपर्क करने पर किस आईपी और किस आईडी से नापसंद चटकें लगाए गए है स्‍पष्‍ट पता लग जायेगा.
    वैसे यह शुरू से होते आया है. नापसंद के चटकों को प्रसिद्धि के नए सोपान समझें चिंता छोड़ें और लिखते रहें.

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  17. आपकी बात सही है...बन्दर के हाथ में उस्तरा देना गलत है

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  18. पढ़ने वाले तो आपकी पोस्ट पढ़ ही लेंगे चाहे हॉट में हो ना हो।

    वैसे, मैं कभी ब्लागवाणी पर जाता हूँ तो आज की हलचल > पढ़े गये पर नजर डाल लेता हूँ। हॉट या पसंद किये गये की तरफ़ झांकता भी नहीं :-)

    वैसे भी यकीन कीजिए कि ब्लागवाणी से कई गुना अधिक पढ़ी जाती हैं पोस्ट्स

    किसी मंजिल का एक ही रास्ता नहीं होता :-) आप ही बताईए कनाट प्लेस जाने का एक ही रास्ता या साधन है क्या?

    वैसे यह बात सही है कि खिन्नता आती है ऐसी बातों से। बिना पोस्ट खोले नापसंद किया जाना यदि रोक सके ब्लागवाणी तो इस प्रणाली से कोई शिकायत न हो संभवत:

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  19. ये सिर्फ आपका ही दर्द नहीं खुशदीप जी, और भी बहुत से लोगों का है जिसमें हम भी शामिल हैं।

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  20. ओहो आप भी न कहाँ नापसंदगी के चटके पर अटक गये, लिखते रहिये हम तो पढ़ ही रहे हैं। आपके नियमित पाठक पढ़ रहे हैं, चिंता न करें, बंदरों को कुछ भी दो या न दो, वो किसी न किसी चीज को उस्तरा बना ही देते हैं, इसलिये बंदरों की छोड़िये।

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  21. M. VERMA जी की बात से पूर्णत: सहमत हूँ.

    "ब्लागवाणी को इसपर सोचना चाहिये क्योकि वास्तव में 99% इसका दुरूपयोग हो रहा है."

    नापसन्दी चटका
    अब बंद होना चाहिए।

    जिसने टांग ही खींचनी है,
    उसे टिप्पिया के कहना चाहिए।

    खुशदीप सहगल जी की,
    इस बात में बहुत दम था।

    लगता है चाय में दूध थोडा ज्यादाह
    और पानी कम था।

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  22. blogvani is free service then HOW CAN WE DEMAND any thing its upto them to decide how to run their website

    its permutation and combination of hot pasand naa pasnad and kament that takes up or down the post from scroll

    if your post was read 50 times liked 5 dislike o and comment 14 and others is read 33 liked 3 dislike o and comment 16 then by putting a napasand on your post the other post comes up

    its more a tech trick then any thing try your self khusdeep and you will also get fun out of it !!!!!!!!

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  23. खुशदीप जी,

    1) कितने लोग हॉट लिस्ट देखकर पढ़ने आते हैं?

    2) इस कथित हॉट लिस्ट की औकात क्या है, सिर्फ़ 24 घण्टे ही ना, उसके बाद क्या?

    3) कितना भी अच्छा लिखेंगे तब भी नापसन्द का चटका लगाने वाले कौए मौजूद हैं, कल तो मैंने सिर्फ़ एक फ़ोटो लगाई और "नैनो" पोस्ट लिखी उस पर भी "भाई लोगों" ने नापसन्द के चटके लगा दिये…

    4) डॉ अमर साहब की चिकित्सकीय सलाह उत्तम है ही, फ़ीडबर्नर लगाओ, जितने सब्स्क्राइबर हैं उतने पाठक तो आपके "पक्के ग्राहक" हैं ही, बाकी थोड़े बहुत ब्लागवाणी और गूगल से आ जायेंगे… चटका-फ़टका जाये भाड़ में…

    अपन ने भी फ़ीडबर्नर लगा रखा है, पाठक खुश हैं कि उन्हें मेरी पोस्ट इधर-उधर ढूंढनी नहीं पड़ती… इस साल के अन्त तक सब्स्क्राइबर संख्या 1000 तक पहुँचाने का लक्ष्य है… आगे जैसी ऊपर वाले की मर्जी… :)

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  24. खुशदीप जी, वाकई पसंद नापसंद का चटका बड़े गुल खिला रहा है। इसका इलाज होना ही चाहिए।

    जहाँ तक क्वालिटी की बात है, तो जो अच्छा है, वही पढ़ा जाना चाहिए, और उसे प्रमोट भी किया जाना चाहिए। वैसे इस सम्बंध में मेरी एक जिज्ञासा है। आप अपनी हर पोस्ट में अपना नाम क्यों इस्तेमाल करते हैं?

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  25. ज़ाकिर भाई,
    जब ब्लॉगिंग में नया-नया आया था तो देखता था कि लोग स्टार ब्लागर्स का नाम टाइटल में लिख कर पोस्ट हिट करा लेते थे...मैंने तब ही सोचा था कि टाइटल में कभी किसी दूसरे ब्लॉगर का नाम नहीं लूंगा ( बहुत ज़रूरी होने पर ही महफूज़, पाबला जी का नाम मैंने दो-तीन पोस्ट के टाइटल में लिया)...और अगर नाम लेना ही है तो क्यों न अखबारों की बाइलाइन की तरह अपने ही नाम का इस्तेमाल पोस्ट के टाइटल में किया जाए...इससे दो फायदे होते हैं, जो मुझे पसंद करते हैं उन्हें आसानी से एग्रीगेटर पर मेरी पोस्ट मिल जाती है...और जो नापसंद करते हैं, उन बेचारों को भी पोस्ट ढूंढने की जेहमत नहीं उठानी पड़ती...सीधे मेरा नाम देखा और अपना काम कर दिया...

    जय हिंद...

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  26. खुशदीप भाई,
    इसे भूल जाईए,खुश रहिए,
    नापसंद के इन चटकों की तो अब आदत सी पड़ गयी है।
    एक दो बार गुस्सा हमें भी आया था और पोस्ट लिख दी थी।
    दिल्ली यात्रा की पांचवी पोस्ट के बाद हमारी पोस्ट
    आज तक हॉट पर आने ही नहीं दी,मित्रों ने।
    चाहे कोई कितना भी नापसंद करले
    जिन पाठकों को आना है वे तो आएंगे ही।
    इससे एक फ़ायदा हुआ है हिट्स बढी हैं।
    लोग ये देखने आते हैं कि इतनी नापसंद लगी है
    जरुर कोई काम की पोस्ट होगी,देख लिया जाए।
    क्योंकि पाठक समझ चुके हैं कि जिस पर नापसंद है
    वो ही पढने लायक पोस्ट है।
    इसलिए नापसंद भी चलते रहे किसी की आत्मा की शांति के लिए।

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  27. बन्दर के हाथ में उस्तरा @ क्या सटीक संज्ञा दी है ..वैसे ये सिर्फ आपके साथ नहीं हो रहा ये नियमित नापसंदगी का चटका हम सबको लगाया जाता है ..कोई हैं जो सिर्फ नापसंद करने में ही विश्वास रखते हैं :)
    स्लोग ओवर हमेशा कि तरह बढ़िया है.

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  28. चाहे कोई खुश हो चाहे गालियाँ हज़ार दे .............मस्तराम बन के ब्लॉग्गिंग के दिन गुज़ार दे!
    जय हिंद !

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  29. ham to nausikhiye hain........abhi!! dhire dhire aap sabo ke posts se pata chalega.......ye blogwani hai kya.......:)

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  30. मैं भी सहमत हूँ । वास्तव में इसमें
    किसी प्रकार के मूल्यांकन का कोई
    उचित रास्ता नहीं बन सकता । क्योंकि
    ब्लाग्स की संख्या हजारों में है । ये
    कौन लोग है । जो अपनी कुन्ठा
    इस तरह व्यक्त करते हैं ।
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

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  31. इतनी भीषण गर्मी में पोस्‍ट हॉट पर लाने का कोई औचित्‍य भी नहीं है। शीतल रहने दें, पोस्‍ट को भी, टिप्‍‍पणियों को भी और इन दोनों के दाताओं को भी और करें ब्‍लॉगवाणी का धन्‍यवाद।

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  32. अच्छा किया जो डिस्क्लेमर दे दिया ... :-))

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  33. पसंद नापसंद व्यक्तिगत मामला है । इसे सार्वजनिक कर के व्यर्थ ही उत्पात और विवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है ।

    ब्लोगिंग ने अमर , दराल , अनुराग, चोपड़ा निकम्मा कर दिया
    वर्ना डॉक्टर हम सब भी थे काम के ।

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  34. इस पर मै कुछ सलाह नही दे सकती ...बस ये कुछ लाईने है....

    "जीत की खुशी का इज़हार करना आसान होता है...हार को गरिमा के साथ स्वीकारना बहुत मुश्किल..."

    "रंग लाती है हिना पत्थर पर पिस जाने के बाद,........सुर्ख रूह होता है इनसान, ठोकरें खाने के बाद.".

    "आप अतीत तो नहीं बदल सकते लेकिन आने वाले कल की चिंता में घुलकर आप अपने आज के साथ अन्याय करते हैं..".

    "क्या आप जानते है कि आपकी कार का विंडशील्ड क्यों इतना बड़ा और रियरव्यू मिरर क्यों इतना छोटा होता है...क्योंकि आपका आने वाला कल ही अहम है, बीता हुआ कल नहीं...इसलिए आगे देखिए और बढ़ते रहिए"

    ये सारी लाईनें आपकी पिछली पोस्टों से ली गई हैं...........

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  35. जो लोग जिसको नापंसद करते हैं वही लोग उसको सबसे ज्यादा पंसद करते हैं। कुख्यात नहीं होंगे तो क्या ख्यात नहीं होगे।

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  36. भैया यह छलिया...छुप छुप कर ही आयेगा....


    जय हिंद....

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  37. bhai saheb, der se aaya lekin durust aaya, ek baat pe yakin karoge, ki jaise aap logo ka ek samuh hoga, vaise hi aapke virodhiyo ka bhi ek samuh hoga kahi na kahi jo lagatar napasand ke chatke lagaa rahaa hoga.
    simple.

    baki jyda nai samajh me aata mujhe, aap bade log ho aap log janoge bandhu........

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  38. छलिया त चुप्पे ही आएगा ना..... सामनें आ कर ताल ठोक कर भिडते तो सही होता।
    वह कहते हैं ना "आग लगे बस्ती में हम रहें मस्ती में" तो जो अपनें हाथ है उसी की चिंता करेंगे... जो अपनें हाथ नहीं उसके बारे में सोच कर क्या फ़ायदा...

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  39. अरे खुशदीप जी !
    हमें तो नापसंदगी की आदत हो गयी है...अगर कोई न लगाये तो लगता है कुछ गड़बड़ है...जैसे आज ...मेरी पहली पोस्ट पर किसी ने नहीं लगाया ...मुझे लगा लोग छुट्टी पर चले गए हैं...या फिर भूल गए हैं....
    यही गा रहा था मन...
    चटका लगाने वाले क्या तेरे मन में समाई
    काहे को चटका न लागाई तूने....
    काहे को चटका न लागाई तूने....
    हूँ केयर्स ....मुझे तो न टिपण्णी की परवाह होती है न ही चटकों की...अगर ऐसा नहीं होता तो मैं इंतज़ार करती कि ढेर सारी टिप्पणी हो जाए फिर दूसरी पोस्ट पब्लिश करूँ ...लेकिन मैं तो लिखती हूँ और पब्लिश कर देती हूँ...अपनी ख़ुशी क लिए लिखती हूँ गाती हूँ...मेरे पाठक मेरा साथ देते हैं
    ये उनका बड़प्पन है...और मैं ह्रदय से आभारी हूँ...
    हाँ नहीं तो...!!

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  40. ye chatka vataka apani samajh nahin aata hai ki lagayen kaise? mujhase to lagata hi nahin hai.

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