शनिवार, 5 जून 2010

ये महफ़िल मेरे काम की नहीं...खुशदीप

गोल्ड एफएम पर आज हीर रांझा का एक गीत सुना...कैफ़ी आज़मी के बोल...मदन मोहन का संगीत...रफ़ी साहब की आवाज़...आप सब जानते हैं कि मुझे फिल्मी गीतों के मुखड़ों के ज़रिए कमेंट करने की बुरी आदत है...क्या करूं...अपनी दिल की बात कहने के लिए मुझे इससे अच्छा कोई रास्ता नज़र नहीं आता...आज पूरी पोस्ट ही इस गाने के ज़रिए कहने का मन है...ऐसा क्यों है, मैं खुद भी नहीं जानता...आप बस ये गाना देखिए, पढ़िए और सुनिए...




ये दुनिया ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं,


मेरे काम की नहीं...


ये दुनिया ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं,


मेरे काम की नहीं...


किसको सुनाऊं हाले दिल-ए-बेक़रार का,


बुझता हुआ चराग हूं अपने मज़ार का


ए काश भूल जाऊं, मगर भूलता नहीं


किस धूम से उठा था जनाज़ा बहार का,


ये दुनिया ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं,


मेरे काम की नहीं...




अपना पता मिले न ख़बर यार की मिले,


दुश्मन को भी ना ऐसी सज़ा प्यार की मिले,


उनको खुदा मिले, है खुदा की जिन्हें तलाश,


मुझको बस इक झलक मेरे दिलदार की मिले,


ये दुनिया ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं,


मेरे काम की नहीं...




सेहरा में आके भी मुझको ठिकाना न मिला,


गम को भुलाने का, कोई बहाना न मिला,


दिल तरसे जिसमें प्यार को, क्या समझूं उस संसार को


इक जीती बाज़ी हार के, मैं ढूंढू बिछड़े यार को


ये दुनिया ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं,


मेरे काम की नहीं...



दूर निगाहों से आंसू बहाता है कोई,


कैसे ना जाऊं मैं, मुझको बुलाता है कोई


या टूटे दिल को जोड़ दो, या सारे बंधन तोड़ दो,


ए पर्बत रस्ता दे मुझे, ए कांटों दामन छोड़ दो,


ये दुनिया ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं,


मेरे काम की नहीं...


ये दुनिया ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं,


मेरे काम की नहीं...

36 टिप्‍पणियां:

  1. किसको सुनाऊं हाले दिल-ए-बेक़रार का,
    बुझता हुआ चराग हूं अपने मज़ार का
    ए काश भूल जाऊं, मगर भूलता नहीं
    किस धूम से उठा था जनाज़ा बहार का,
    ये दुनिया ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं,
    मेरे काम की नहीं...

    mere bhi kaam ki nahi ....
    sach mein...!!!

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  2. क्‍या हो गया है आप सभी लोगों को, जो ऐसे गाने गा रहे हैं? मुझे लगता है कि इन कुछ दिनों में बहुत बदलाव आया है यहाँ। हमें तो रास आती है आप लोगों की महफिल।

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  3. क्या कारण है इस गाने को गाने का। वैसे इंसान का दिल होता है कभी कभी बिना काऱण भी रोने को करता है। पर ये गाना काफी शानदार है। पर प्लीज इसे हमेशा न गाएं

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  4. Okay !

    भई, आप लोग ऎसे क्यों कर रहे हो ?
    मैं भी अपना गुरुकुल बन्द कर दूँ क्या ?
    क्या मिड-नाइट ड्रिंक योजना आरँभ कर दूँ,
    या मैं भी गाना गाऊँ ?

    ऎ क़ातिब-ए-बिलाग बता, क्या मैंनें किया है
    क्यों मुझसे ख़फ़ा है तू क्यों मुझसे ख़फ़ा है
    क्या मुझसे हुआ हैऽऽ..क्या मुझसे हुआ है

    औरों के हिस्से में टिप्पणी ट्रैफ़िक
    और मुझको क्यूँ चटका-ए-नापसँद
    चटका-ए-नापसँद.. ओ क्या मैंनें किया है
    ओँ क्याँ मैंनें कियाँ हैं, क्यों मुँझसें ख़फ़ाँ हैं तूँ क्यों मुँझसें ख़फ़ाँ हैं

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  5. गम को भुलाने का, कोई बहाना न मिला,

    -चले आओ, दवा तैयार है. :)

    बड़े गंभीर मूड में गुनगुना रहे हो..चलिए अब मख्खन मख्खनी को लाईये. :)

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  6. आज तो बहुत ही सुन्दर और सदाबहार नगमा लगाया है!

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  7. ऐसा क्या हुआ जो आज भाई सेड सांग ?

    ये दुनिया ऐसी ही थी और ऐसे ही चलेगी पार्थ।

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  8. खुशदीप जी का उदासी से क्या काम ...
    खुशियों के दीप जलाएं ...!!

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  9. गाना तो ठीक है, पर उदासी?
    ये क्यों और कहाँ से आ टपकी?

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  10. इसके बाद मुझे तो यही गाना याद आया .........

    कुछ तो लोग कहेंगे ,लोगो का काम है कहना
    छोडो बेकार की बातो में कही बीत न जाए रैना ........

    कुछ रीत जगत की ऐसी है हर एक सुबह की शाम हुई ,
    तू कौन है तेरा नाम है क्या ,सीता भी यहाँ बदनाम हुई .
    फिर क्यों संसार की बातो से ...भीग गए तेरे नैना ......कुछ तो .....

    हमको जो ताने देते है ,हम खोये है उन रंगरलियो में
    हमने उनको भी चुप-चुप के ,आते देखा इन गलियों में
    ये सच है झूठी बात नहीं ....तुम बोलो ये सच है ना .....कुछ तो .......

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  11. खुशदीप जी आपके कहने से क्या होगा ,आपकी इस महफ़िल को तो जरूरत है और इस महफिल के जानदार व शानदार लोग जानते हैं की इस महफिल में आपका मौजूद रहना क्या महत्व रखता है और उसकी क्या उपयोगिता है | आपने दर्द को बयान किया इसके लिए हम सब आपसे साथ हैं ,अगर आपको हमारी किसी प्रकार के सहयोग की जरूरत हो तो | अरे आप तो जिन्दा दिल इन्सान हैं और इस महफिल में तो कई मुर्दा दिल भी रहते हैं !!!

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  12. khush dip ji bhut khub meraa bhi slaam qubul kijiye gaanon giton ki tippni se logon ko rijhaanaa koi aapse sikhe. akhtar khan akela kota rajsthan

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  13. बताईए!
    ज़्यादातर साथी ऐसा कह रहे जैसे कुछ जानते ही नहीं!!

    दिल की बात आपने कह दी है।
    चिंता न करें, यही गीत कुछ दिनों बाद दूसरी जगह दिखने वाला है

    ए काश भूल जाऊं, मगर भूलता नहीं
    किस धूम से उठा था जनाज़ा बहार का

    :-(

    बी एस पाबला

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  14. यह गाना तो हमें भी बहुत पसंद है । न सिर्फ बोलों के लिए बल्कि रफ़ी की गायकी के लिए भी ।
    इसे पर्सनल लेने की कहाँ ज़रुरत है, खुशदीप को गाने बहुत अच्छे लगते हैं भाई ।

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  15. आजकल जो ब्लॉगजगत में चल रहा है..उसे देख-सुन और पढकर मेरा भी यही गाने का मन करता है लेकिन फिर ये ख्याल आता है कि...

    कुछ तो लोग कहेइगे...लोगों का काम है कहना ...

    मेरे ख्याल से हमें अपना काम चुपचाप करते रहना चाहिए... वक्त खुद उनसे अपना पूरा हिसाब लेगा...
    अंत में बस यही कहूँगा कि...
    "कल तक जो खेल रहे थे दावानल से
    अब अंत निश्चित है उनका
    इस पल..उस पल किसी भी पल में"

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  16. क्या ब्लोग्वानी ऐसे ब्लोगों को रख कर खुश होता है या यह उसकी मजबूरी है
    देख लीजिये खुद ही ब्लोग्वानी को जहां मां बहन की हद दर्जे की अश्लील गालियाँ खुले आम दिखाई जाती हैं आगे पढ़ें और देखें

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  17. ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना
    फूलों में कलियों में बागों की गलियों में मिले सुख कहीं ना

    लो जी हमने भी अपनी बात आज गाने से कह दी

    प्रणाम

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  18. मिले ना तुम से जी घबराये
    मिले तो आंख चुराये
    ना जाने क्या हो गया है

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  19. चलिये जनाब काम की नही तो....
    चलो दिल दार चलो चांद के पार चलो... हम नही तेयार चलो.... तुम अकेले ही चलो

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  20. ham to issi duniya me jeeyenge.........ye duniya ya mahfil ke bina ham nahi..........:D

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  21. kabhi mulaqat hui to aap ko apnee aawaaz men aapko sunaunga ye geet ....

    bahut khooooooooooooob!!!!!!!

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  22. अपने लिए जिए तो क्या जिए.. तू जी ऐ दिल ज़माने के लिए....

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  23. आपने तो अच्छी खासी अंताक्षरी करा दी, खुशदीप जी...

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  24. खुशदीप भाई ,
    हरेक संवेदनशील ब्लोग्गर को एक न एक दिन ऐसा गाना जरूर याद आता है और आएगा भी इस ब्लोग जगत में , क्या कहा जाए दिल है न , मानता ही नहीं कि जो लोग यहां पढ लिख रहे हैं , उनसे ऐसा अनापेक्षित सा भी कुछ मिल सकता है । खैर क्या कहा जाए ..सच है कि जिसके पास जो होगा देने के लिए वही तो देगा । आप अपना मूड ठीक करें और लिखते रहें ।

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  25. छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी
    नए दौर पर लिखेंगे हम मिलकर नई कहानी

    आज मौसम बड़ा बेईमान है बड़ा

    मैं जट यमला पगला दीवाना..

    कल क्या होगा किसको पता अभी जिन्दगी का ले लो मजा

    किसी की मुस्कुराहटों पर हो निसार किसी का दर्द मिल सकें तो ले उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार
    जीना इसी का नाम है..

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  26. अरे क्या हो गया खुशदीप जी !
    मक्खन को लाइए सब ठीक हो जायेगा :)

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  27. जहाँ खुशदीप जी को गरियाया जाता है और ओये खुशदीपे जैसा लिखने वाले की टिप्पणियाँ सजा कर रखी जाती हैं वहाँ तो लोग कुछ नहीं कह पाते यहाँ आ कर अन्जान बनते हैं।
    संभलिये वक्त सब कुछ देख रहा है सज्जनों।
    अगर अब भी किसी को विश्वास न हो तो देख ले पिछले 15 दिनों में आई पोस्टें और सैकड़ों बेनामी टिप्पणियां। उसके बाद अगर आप सब भी कोरस में गाने लगोगे कि ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है।
    है हिम्मम्त तो क्लिक करो
    neeshooalld.blogspot.com
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    जल्दी करो वरना आज कोई हाथ पैर जोड़ कर इसे मिटवाने वाला है

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  28. खुशदीप जी ऐसे मित्रों से सावधान रहिये जो सिर्फ मज़ा लेने आते हैन यहान

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  29. @कूप कृष्ण जी,

    आपने मेरे लिए इतनी फ़िक्र दिखाई, उसके लिए आभार...

    रही बात मुझे गरियाने की तो अगर किसी को इससे खुशी मिलती है तो मैं उसमें भी खुश हूं...क्योंकि मिर्ची सुनने वाले हर हाल में खुश...

    और जहां तक खुशदीपे ओए का आपने ज़िक्र किया है तो ये संबोधन डॉ अमर कुमार जी ने मेरे लिए इस्तेमाल किया था...ये ठीक वैसे ही था जैसे घर में मेरी मां, पिता, बड़े भाई और बहन सबसे छोटा होने की वजह से मुझे बुलाते हैं...डॉ अमर जी के एक एक शब्द में मेरे लिए कितना स्नेह छुपा है, वो मैं अच्छी तरह जानता-समझता हूं...वो बताने की चीज़ भी नहीं है...डॉ अमर जी को समझने के लिए आपको छायावाद को समझना होगा...एक उदाहरण देता हूं, भारतीय राजनीति में मेरी नज़र में अटल बिहारी वाजपेयी से अच्छा वक्ता (मैं नेता नहीं कह रहा हूं) और कोई नहीं हुआ...और वो अपनी बात को कहने के लिए जिन संकेतों का इस्तेमाल करते रहे हैं, वो अद्भुत रहा है...बस यही कहूंगा डॉक्टर साहब (सूरज-चंदा) के लिए...

    सूरज न बदला, चंदा न बदला,
    कितना बदल गया इनसान...

    जय हिंद...

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  30. @ आदरणीय खुशदीप जी,
    मेरा सादर नमस्कार स्वीकारें
    अभी मेल इनबॉक्स में फ़ॉलो-अप कमेन्ट में उपरोक्त वार्तालाप देखा, क्योंकि मैं कमेन्ट्स का कीड़ा हूँ । इन्हें कुतरना मुझे बहुत भाता है । असली व्यक्तित्व परीक्षा टिप्पणी-बक्से में / से ही होती है, ऎसा मैं मानता हूँ ।
    यदा कदा दिये गये अनौपचारिक सँबोधन को आपने खुले नज़रिये लिया, यह आपका बड़प्पन है । मैं अक्सर महिला ब्लॉगर्स को भी ऎ लड़की, ओ बिटिया कह कर सँबोधित कर बैठता हूँ, क्योंकि मेरे मन में उस समय अनायास वही भाव उभरता है ।
    यह मेरा स्वभावतः व्यक्तिगत दोष है कि, जहाँ औपचारिकतायें निभानी पड़ें, वहाँ झाँकने तक से मैं बचता हूँ ।
    आप मुझे मान देते हैं, बुरा नहीं लगता.. पर एक बार पुनर्विचार करें कि क्या मैं तारीफ़ के काबिल भी हूँ ?
    भवदीय - अमर कुमार


    @ कूप कृष्ण,
    प्रसँगतः विदित हो कि गुमनामों की तलाश मेरा तकनीकी शगल है ( इसे ऍथिकल-हैकिंग भी कहा जाता है ), ताज़्ज़ुब नहीं कि आप अपने पते ठिकाने सहित मेरे सँज्ञान में बहुत पहले से ही मौज़ूद हैं, अतः आपको बुरके से बाहर आने का निमँत्रण भी न दूँगा ।
    आप भी मेरा दूसरा स्वभावतः व्यक्तिगत दोष जान लें, वह यह कि ललकार सुन कर मुझ पर ज़ाहिलियत सवार हो जाती है, अपने अस्तित्व की लड़ाई में जाटों वाला यह गुण स्वतः ही पनप गया । आशा है, आप सँस्कीरत की कुछ समझ रखते होंगे ।
    ईश्वर आपको प्रेत-योनि से शीघ्र मुक्ति दे ।
    शेष आपके पिंडदान उपराँत - अमर

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  31. ओये खुशदीपे जैसा लिखने वाले की टिप्पणियाँ सजा कर रखी जाती हैं वहाँ तो लोग कुछ नहीं कह पाते यहाँ आ कर अन्जान बनते हैं का रिफ़ेरेन्स सिरप उसी ब्लोगोन से लिया गया है जिसके लिन्क मैम्ने दिये है।इसके अलावा और कहिन के बारे मेइन ना तो मैने कोई बात कि है ना ही इरादा है अमर कुमार जी के कमेन्त से एक शब्द उथा कर कही उचाल दू इतनी हैसियत नहिन है मेरि।उनकि पुरी तिप्पनि समझनी पडती है।वैसे भी जिस कमेन्त की बात मैने की थी वह किसी बेनामी ने की थी जो अब नीशू के ब्लोग पर नहिन है। http://i46.tinypic.com/10s6wpx.jpg ओर http://i45.tinypic.com/6hkois.jpg के अलावा किसी का ध्यान ही नहिन आया। अमर कुमार जी नाहक नाराज हो रहे उनके किसि कमेन्त के बारे मेइ कोई बात मेरि ओर से नहिन की गैइ है

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  32. जनाज़ा बहार का ...क्या बात है ।

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