मंगलवार, 8 जून 2010

क्या आसान, क्या मुश्किल-2...खुशदीप

जीत की खुशी का इज़हार करना आसान होता है...


हार को गरिमा के साथ स्वीकारना बहुत मुश्किल...








हर रात सपना देखना आसान होता है...


सपने को पूरा करने के लिए संघर्ष बहुत मुश्किल...








हर रात प्रार्थना करना आसान होता है...


छोटी छोटी चीज़ों में भगवान तलाशना बहुत मुश्किल...




 



हम प्यार करते हैं, कहना आसान होता है...


लेकिन हर दिन प्यार का इज़हार करना बहुत मुश्किल...








हर किसी की आलोचना करना आसान होता है...


लेकिन खुद को बेहतर बनाने के लिए अपने अंदर झांकना बहुत मुश्किल...








अपने को बेहतर बनाने के लिए सोचना आसान होता है...


लेकिन इस सोच को बंद कर असल में कुछ करना बहुत मुश्किल...








किसी से पाना बहुत आसान होता है...


लेकिन खुद किसी को कुछ देना बहुत मुश्किल...





19 टिप्‍पणियां:

  1. खुशदीप भाई, बहुत अच्छा... सोलह आनें सच..

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  2. बिल्कुल-सीखने योग्य बातें.

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  3. kya baat hai ....kauno sanyaasi-unyasi banane ka pirogram hai kaa...agar aisa hai to bata dijiyega...dance-unce ka praktise karna padega..bahut din se chhooota hua hai...
    haan nahi to..
    :):):)

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  4. कहना आसान.... करना मुश्किल ...
    रिश्ते जोड़ना आसान ...निभाना मुश्किल ...!!

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  5. बड़ी खरी खरी बात कह डाली आज ...

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  6. सदविचारो का सचित्र वर्णन। सुन्दर!

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  7. ये दूसरी कडी भी बहुत महत्‍वपूर्ण !!

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  8. हर किसी की आलोचना करना आसान होता है...
    लेकिन खुद को बेहतर बनाने के लिए अपने अंदर झांकना बहुत मुश्किल...

    शुभकामनायें खुशदीप भाई !

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  9. सत्य वचन, बहुत ही सुन्दर विचार!

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  10. अपने को बेहतर बनाने के लिए सोचना आसान होता है...


    लेकिन इस सोच को बंद कर असल में कुछ करना बहुत मुश्किल...
    ये सबसे अच्छा लगा.
    वैसे सभी सीखने योग्य हैं.

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  11. सभी बातें सच हैं . मुश्किलों को आसान करना और भी मुश्किल है .

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