शनिवार, 29 मई 2010

एक सवाल का जवाब दीजिए...खुशदीप

देश में भारी बहस छिड़ी है...आतंकवाद को पीछे छोड़ते हुए माओवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है...लेकिन हमारी सरकार तय ही नहीं कर पा रही है कि माओवाद से निपटना कैसे है...ये सिर्फ कानून और व्यवस्था का मामला है...या इससे सामाजिक और आर्थिक विकास जैसे पहलू भी जुड़े हुए हैं...पश्चिम बंगाल के झारग्राम में हावड़ा से मुंबई जा रही ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस में 131 यात्री रात को सोते-सोते ही काल के मुंह में चले जाते हैं...सैकड़ों घायल हो जाते हैं...लेकिन सरकार तय ही नहीं कर पाती कि ये माओवादियों की जघन्य करतूत थी या महज़ एक रेल हादसा...



ममता बनर्जी पहले विस्फोट की बात कहते हुए पश्चिम बंगाल सरकार को कटघरे में खड़ा करती हैं...कानून और व्यवस्था को राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी बताती हैं...तभी वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का बयान आता है कि गड़बड़ी या विस्फोटक जैसी कोई बात सामने नहीं आई है, इसलिए ये सिर्फ एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसा है...एक थ्योरी फिश प्लेट उखाड़े जाने की भी है...

वाकई स्थिति विस्फोटक हो चली है और नेता अपने हितों के हिसाब से बयान दे रहे हैं...ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल के कई ज़िलों में 30 मई को होने वाले स्थानीय निकाय के चुनाव अहम नज़र आ रहे हैं...कांग्रेस से उनका गठबंधन हुआ नहीं...ये किसी से छुपा नहीं कि ममता बनर्जी हर हाल में 2011 के विधानसभा चुनाव में कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग से लेफ्ट का लाल परचम उतार कर तृणमूल की हरी पत्तियों का कब्जा कराना चाहती हैं...उनके लिए केंद्र में रेल मंत्री की गद्दी पश्चिम बंगाल के सीएम की कुर्सी तक पहुंचने के लिए महज़ एक जरिया है...इसलिए कोई बड़ी बात नहीं कि वो आने वाले दिनों में रेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देकर खुद को पश्चिम बंगाल के लोगों के सामने शहीद की तरह पेश करें...

ये साफ है कि देश में जाति, भाषावाद, प्रांतवाद, धर्म की राजनीति करने वाले नेता बहुत हैं...मसलन

मराठी- बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे तो साफ तौर पर मराठी कार्ड खेलते हैं, लेकिन मुंह से कुछ भी बोलें शरद पवार, अशोक चव्हाण, विलास राव देशमुख, आर आर पाटिल जैसे नेता भी वोट बैंक के चलते मराठियों की नाराज़गी मोल नहीं ले सकते...

गुजराती- नरेंद्र मोदी किसी भी मंच से गुजराती अस्मिता का हवाला देना नहीं भूलते...

तमिलनाडु- करुणानिधि की राजनीति कट्टर तमिल समर्थक की है, वहीं जयललिता की राजनीति करुणानिधि विरोध की बेशक हो लेकिन तमिल कार्ड वो भी जमकर खेलती हैं..

कर्नाटक- एच डी देवेगौड़ा कन्नड का सवाल गाहे-बगाहे उठाते रहते हैं

आंध्र- तेलंगाना को लेकर के चंद्रशेखर राव ने झंडा उठा रखा है...अब उसी तेलंगाना के विरोध में शेष आंध्र का रहनुमा बनने की कोशिश वाईएसआर के बेटे जगन मोहन रेड्डी कर रहे हैं...

पंजाब- पा की तर्ज पर प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर बादल की जोड़ी अकाली राजनीति की अलम्बरदार है

जम्मू-कश्मीर- एक तरफ अब्दुल्ला परिवार, दूसरी तरफ मुफ्ती सईद और महबूबा मुफ्ती की बाप-बेटी की जोड़ी कश्मीरियों के सबसे बड़े खैरख्वाह होने का दम भरते हैं

ओबीसी- मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, शरद यादव, छगन भुजबल, गोपीनाथ मुंडे

दलित- मायावती, राम विलास पासवान, उदित राज

ठाकुर- अमर सिंह, राजनाथ सिंह, राजा भैया

गुर्जर- कर्नल के एस बैंसला

मीणा- किरोड़ी लाल मीणा

किसान- महेंद्र सिंह टिकैत, शरद जोशी

आम आदमी की दुहाई देने में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और बीजेपी के सारे राष्ट्रीय नेता कहीं पीछे नहीं है...

लेकिन मुझे आपसे सिर्फ एक सवाल पूछना है कि देश में आदिवासियों की बदहाली की बात करने वाला कौन सा नेता है या आज़ादी के बाद 63 साल में आदिवासियों का कौन सा मज़बूत नेतृत्व देश में सामने आया...

इस सवाल के जवाब के बाद देश की सबसे ज्वलंत समस्या पर बहस के लिए आगे बढ़ेंगे...

23 टिप्‍पणियां:

  1. शिबू सोरेन जो पहले गाँव-गाँव पैदल या साईकिल पर घुमते थे और अब कई SUVs के घोषित-अघोषित मालिक हैं.(?)

    एक सवाल और... आजादी से लेकर अब तक देश में कांग्रेस ने लगभग ८०-८५% समय में और इतने ही राज्यों में शासन किया है... फिर वे देश की बदहाली का जिम्मा क्यों नहीं लेते?

    और एक बात. जो देश अपनी बाहरी-भीतरी समस्याओं से निपटने की क्षमता रखते हैं वे उन्हें पैदा ही नहीं होने देते. जब भारत उन्हें उगने से नहीं रोक सकता तो उन्हें काट फेंकना तो बहुत बड़ी बात है. वर्तमान में हर बड़े देश के नेताओं के पास अगले पचास सालों के ब्लूप्रिंट तैयार है पर हमारे नेता ३-५ सालों से आगे की नहीं सोचते.

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  2. देश का मुखिया तो नही बन पाया है। जहां तक बदहाली की बात है, बात तो सभी करते हैं, बदहाली की, समधान का असर उतना दिखाई नही देता। केवल और केवल घडियाली आन्सू।

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  3. apne swaarth se upar 1inch bhi sochenge tab kuchh hoga na .

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  4. "किसको क्या मिलेगा आदिवासियों की बात करके .............. क्यों की जाए उनकी बात ........पहले अपनी तो सोच ले ..............उनकी देखी जाएगी ..............|"

    यह सब मैं नहीं कह रहा हूँ जी ............... एक नेताजी मिले थे यहाँ आते में ........वही कह रहे थे ..............शायद आपकी पोस्ट पढ़ कर लौट रहे हो !

    जय हिंद !!

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  5. सबको अपनी-अपनी गद्दी की पड़ी है..देश की चिंता किसी को भी नहीं है...ये स्साले!...नेता लोग...सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे है

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  6. खुशदीप जी आप के सवाल का जबाब तो सब ने दिया, इसी के संग मै एक सवाल करता हुं कि इस देश की जनता को पिछले ६२ सालो मै अकल क्यो नही आई, क्यो बार बार इन नेताओ के चक्कर मै पड कर देश के हिस्से करवा रही है कोई पंजाब के नाम से बेकार के नेताओ को वोट दे कर अपना खुन चुसा रहा है तो कोई तामिल के नाम से, कब अकल आये गी इस जनता को कब जागरुक होगे हम, कब तक हम अपने जुते अपने सर पर खाते रहे गे, हमे हमारी फ़िक्र करने वाला नेता नही चाहिये हमे चाहिये जो काम कर के दिखाये,
    आप का आज का लेख बहुत सुंदर है, लेकिन मुझे उस का जबाब नही सुझ रहा

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  7. हमें तो अपनो ने मारा गैरो में कहां दम था.....

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  8. http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post.html जिस्‍म पर आंख।

    इस कविता से प्रेरणा पाकर मैंने अपना ब्‍लोग बनाया है। कृपया मुझे मार्गदर्शन दीजिए।

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  9. जाति धर्म, प्रांत प्रदेश कुछ के घोषित तो कुछ के अघोषित एजेंडा हैं. बस चले तो ये देश को छोटे-छोटे रियासतों में फिर तब्दील कर दें. प्रश्न हरेक के मन में हैं पर किससे किया जाये ये भी तो एक बडा प्रश्न है ...
    अन्धे के आगे रोना
    अपने नैन खोना

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  10. बस, सुन लिया..कोई कैसा जबाब होगा इसका!

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  11. सवाल लाजवाब है पर इसका ना कोई जवाब है ...
    गृह युद्ध के मुहाने पर खड़ा है हमारा देश भी ...!!

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  12. हमें तो कोई जबाब नजर नहीं आता इसका !
    आदिवासियों के हकों की लड़ाई के बहाने खून बहाने वाले नक्सली भी उन्हें अपनी स्वार्थ पूर्ति के छल ही रहें है !

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  13. hum bhi lajawaab hain aur desh bhi lajawaab hai ...is sawaal ka koi jawaab kisi ke paas nahin ...

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  14. khushdip bhaai heshaa privaar mitron shit khush rho aadivaasiyon ke klyaan pr desh men 500 khrb rupye khrh hotaa he lekin yeh pesaa khaan gyaa dekhne ki baat he aadi vaasi netaa to bhut he lekin voh fqir se arb pti bne hen khud jhaarkhnd ke hibu sorn kaa udaahrn hi dekh len . akhtar khan akela kota rajasthan mera hind blog akhtarkhanakela.blogspot.com he

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  15. ये सारे झूठे और निक्कमे हैं ,सत्यमेवजयते से इनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं ,ये सत्ता के लायक नहीं लेकिन सत्ता पे काबिज हैं, असल में हम सब मुर्दें हैं और मुर्दा मरे या जिन्दा रहे क्या फर्क पड़ता है ?

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  16. अख्तर भाई,
    आज रात की पोस्ट इसी पर है कि आदिवासियों के पचास हज़ार करोड़ कौन डकार रहा है...

    जय हिंद...

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  17. पुत्र
    तू खुद होशियार है
    फ़िर ये प्रश्न क्यों दाग रहा है
    पापा जी

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  18. खुशदीप जी, आदिवासियों के लिए काम ईसाई मशीनरी कर रही है, लेकिन उन पर धर्म परिवर्तन का आरोप लगता है। हिन्दु मुस्लिम संगठन एक दूसरे को नीचा दिखाने में पूरी तरह मशगूल हैं। नक्सल धीरे धीरे हर तरफ फैल रहा है, गाँव का किसान अब आत्महत्या कर मरने से बेहतर हकों की रक्षा कर जान देने के लिए तैयार हो रहा है, ऐसे में अब सरकारें अपने महलों की सुरक्षा और बढ़ा लें बेहतर होगा, आम जन का क्या है, वो तो हादसों में शहीद होने के लिए बना है।

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  19. पुरुष की आंख कपड़ा माफिक है मेरे जिस्‍म पर http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_9338.html मेरी नई पोस्‍ट प्रकाशित हो चुकी है। स्‍वागत है उनका भी जो मेरे तेवर से खफा हैं

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  20. बस, सुन लिया..कोई कैसा जबाब होगा इसका!


    Jai hind....

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