सोमवार, 10 मई 2010

अपने तो अपने होते हैं...खुशदीप

कल बात की थी मां के दूध की...एक देश में दो देश होने की...भारत की, इंडिया की...आज बात हाईराइज़ बिल्डिंग्स के दड़बेनुमा वन बीएचके, टू बीएचके फ्लैटों में रहने वाले मॉडर्न कपल्स की...

कभी कभी ये जोड़े फिटनेस के प्रतीक लिबासों में सुबह या शाम हवा पानी बदलने के लिए आसमान से उतर कर ज़मीन पर आते हैं...पार्क के नाम वाली हरीभरी छोटी सी ज़मीन पर टहलते दिखाई देते हैं...मोबाइल का साथ वहां भी नहीं छूटता है...बच्चा साथ मुश्किल ही दिखाई देता है...बच्चा होगा भी तो या तो कमर से बंधे पाउच में कसमसा रहा होगा या प्रैम में टांगे इधर से उधर मारता हुआ आसमान ताक रहा होगा...यही सोचता, शायद अभी मां या पिता की गोद का स्पर्श मिलेगा...बच्चा ज़ोर से रोएगा तो अगले ही पल दूध की बॉटल या वो छल्ले वाला प्लास्टिक का निपल उसके मुंह में होगा...किसी तरह बस चुप रहे...



अब दो पल फुर्सत के निकाल कर टहलने आए हैं, उसमें भी बच्चा रो कर सारा मज़ा खराब कर दे...फिर तो मुंह से यही निकलेगा न...ओह यार...शिट...क्या मुसीबत है...दो घड़ी चैन भी नहीं लेने देता...घर पर कोई संभालने वाला होता तो वहीं छोड़ आते...घर पर संभालने वाला कोई आए भी तो आए कहां से...जाइंट फैमिली में हमें रहना गवारा नहीं...न्यूक्लियर फैमिली मॉडर्न ट्रेंड है...फिर ये ओल्ड माइंडेड दादा-दादी, नाना-नानी के पास रह कर फाइव स्टार मैनर्स कैसे सीखेगा...ये क्या, हम ही कौन से बुज़ुर्गों की टोकाटाकी के बीच एक पल भी रह सकते हैं...उन्हें साथ रखने का मतलब अपनी आज़ादी पर अंकुश लगाना...

हां, पैसे से बच्चे की देखभाल के लिए मेड (आया) रखी जा सकती है...ज़्यादा पैसा है तो गवर्नेस ( हाइली-पेड मेड) की भी सेवाएं ली जा सकती हैं...मेड या गवर्नेस अच्छी नहीं मिलती, कोई बात नहीं ये ड्रीमवर्ल्ड जैसे एयरकंडीशन्ड क्रेश, प्लेइंग स्कूल, डे केयर सेंटर, किस दिन काम आएंगे...अब तो इनकी एसी गाड़ियां ही बच्चों को घर लेने भी आ जाती हैं, जो टाइम बताएगें, उसी टाइम पर वापस घर छोड़ने भी आ जाती हैं...कोई टेंशन नहीं...अंटी में बस माल होना चाहिए...पैसा फेंक, तमाशा देख...

आपकी नज़रों के सामने तो मेड मां से भी बढ़कर बच्चे की देखभाल करती नज़र आएंगी...लेकिन एक बार आपके काम पर जाने की देर है...फिर देखिए मेड के आपके ही घर पर महारानी जैसे ठाठ...बच्चा रोए, जिए उसकी भला से...दूध और पानी की बॉटल पास रख दीं...पीना है तो पी नहीं तो मर...मेड टीवी पर पसंदीदा सीरियल्स कभी नहीं छोड़ेगी...मौका मिला तो बॉय फ्रेंड से फोन पर बात भी कर लेगी...एक बार टीवी पर स्टिंग आपरेशन में एक मेड की करतूत दिखाई जा चुकी है...किस तरह बेरहमी से छोटे से मासूम को पीट रही थी...बेचारा माता-पिता से कोई शिकायत भी नहीं कर सकता...ठीक है सारी मेड या हेल्पर इस तरह के नहीं होते...लेकिन किसी एक भी बच्चे के साथ ऐसा हुआ है तो ख़तरे की संभावना को तो नहीं नकारा जा सकता...

आपके काम पर रहने के दौरान बच्चों को संभालने का एक और तरीका भी निकल आया है...एसी, पूल्स, प्रोजेक्टर से लैस ये क्रेश या प्लेइंग स्कूल देखने पर एक बार तो हर किसी को भ्रम होगा, कि बच्चा यहां से ज़्यादा खुश और कहीं नहीं हो सकता..लेकिन अब आपको ऐसे ही एक क्रेश की हक़ीक़त बताने जा रहा हूं...जिसे सुनकर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे...इस क्रेश में मासूमों को आधे-एक घंटे खिलाने के बाद नींद की हल्की दवा देकर चार-पांच घंटे के लिए सुला दिया जाता था...न बच्चे का रोना-धोना...न संभालने का झंझट...शाम को घर छोड़ने से एक घंटा पहले उठाया और बच्चा मां-बाप के हवाले...यहां भी ये कहा जा सकता है हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं हो सकतीं...कुछ क्रेश अच्छे भी हो सकते हैं...लेकिन आपके पास क्या गारंटी है कि बच्चे के साथ सब अच्छा ही हो रहा होगा...

ऐसी सूरत में फिर करें क्या...किसी पर तो विश्वास करना ही होगा...करिए न विश्वास अपनों पर...वही अपने जिन्होंने आपको भी रात जाग-जाग कर बड़ा किया है...वो क्या आपके लाडलों का आपकी पीठ के पीछे जान से ज़्यादा ध्यान नहीं रखेंगे...मैं बात कर रहा हूं दादा-दादी, नाना-नानी की...लेकिन इसके लिए आपको बड़ा सब्र का प्याला पीना होगा...एडजेस्टमेंट का फंडा सीखना होगा...काश संयुक्त परिवारों का फ़ायदा हम समझ सकें...काश हर भारतीय घर में एक बार फिर ऐसा हो सके...



मेरा पसंदीदा गाना सुनिए...

अपने तो अपने होते हैं....

28 टिप्‍पणियां:

  1. खुशदीप भाई,
    बहुत अच्छा मुद्दा उठाया है, वाकई संयुक्त परिवारों की बहुत आवश्यकता है। वैसे अंधी तरक्की के पीछे भागती हुई हमारी माडर्न सभ्यता शायद बहुत दूर आ गयी है... वापस लौटनें के रास्ते बन्द तो नहीं मगर हां गली कुछ संकरी ज़रुर हो गयी है...

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  2. सच कहा खुशदीप भाई, अपने तो अपने होते है !! आज जब अपने बेटे को अपने पापा की गोदी में खेलता देखता हूँ तो आप को बता नहीं सकता कितना आनंद आता है !! आज कल की इस आपा धापी वाली ज़िन्दगी में हम लोग धीरे धीरे बच्चो को दूर करते जा रहे है उनके दादा - दादी और नाना - नानी से ...........जब कि हम खुद तरसते थे अपने बचपन में इन्ही रिश्तो के लिए !!

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. होगा वैसा भी होगा, खुशदीप जी, एक वक्त फिर से लोगों को संयुक्त परिवार समझ आने लगेगा। अभी तो विलगाव का दौर है। अत्यधिक विलगाव पुनः लगाव उत्पन्न करेगा। व्यवस्था अव्यवस्था में से ही जन्म लेती है।

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  5. सँयुक्त परिवार के अपने फायदे तो हैं,
    पर यदि परिवार का कोई सदस्य इसे परँपराओं को ढोने की लाचारी के नज़रिये से देखता है, तो अनायास ही उसे यही फायदे गौण लगने लगते हैं । मिल्लत के तौर तरीके उसे ज़िल्लत लगते हैं, यदि मुखिया दबँग और निष्पक्ष न हुआ, फिर तो उस परिवार में महाभारत का नया सीक्यूलॅ तैयार ही समझिये । इस पोस्ट में समाज-शास्त्रीय विवेचनाओं के अनेक बिन्दु छिपे हैं.. उन पहलुओं को भी यहाँ रेखाँकित किये जाने की आवश्यकता थी ।

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  6. पहले कई जगह ऐसा भी होता था कि जहाँ बहुत सारे बच्चे होते थे ,कुछ् माँए उन बच्चों को अफीम चटाकर सुला देती थी और अपने काम मे लग जाती थी यह उनकी गरीबी के कारण विवशता हो सकती है । लेकिन यदि आजकल के क्रैश मे ऐसा हो रहा है तो वह उनके व्यवसाय की विवशता होगी

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  7. अभी हाल मे एक तेलगु दोस्त की शिकायत थी कि मेरा बेटा हिंदी, अंग्रेजी, तो बोलता है साथ ही में अब बांग्ला भी बोलने लगा है. पर तेलगु नहीं....बोले भी कैसे...दिन भर बांग्लादेशी या बंगाल की मेड के पास रहेगा तो कैसे सीखेगा अपनी मादरी जूबान..है तो मुसीबत तो न्यूक्लियर फैमली के इस घाटे को सहो...

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  8. वाह पार्क वालों को भी नहीं छोड़ा। आपकी पारखी नजर वाकई कमाल की है। पृथ्‍वी गोल है इसलिए लौट फिर कर फिर से सब कुछ लौट ही आएगा।

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  9. खुशदीप सर,
    बहुत अच्छी श्रृंखला चला रहे हैं आप, आज के समय में इसकी बहुत जरूरत है। व्यक्तिगत आजादी के नाम पर भी एकल परिवार की अवधारणा बल पकड़ती जा रही है। आज हम लोग काम वाली बाई के नखरे तो झेल लेते हैं, पर घर का सदस्य यदि कुछ सलाह दे तो वह हमें नागवार गुजरती है। संयुक्त परिवार का महत्व समझ तो आयेगा लेकिन शायद अभी समय लगेगा और फ़िर आने वाले समय में परिवार में होगा भी कौन? DISC, DINC, लिव-इन रिलेशनशिप - हम इंडिया बन ही गये हैं।
    कुछ सालों बाद शायद कहा जायेगा - इंडिया, जो कभी भारत हुआ करता था।
    आपके अगले लेख का भी इंतज़ार रहेगा।

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  10. बदली हुई दुनिया के बदले हुए रंग...सो कॉल्ड आजादी की सो कॉल्ड कीमत...सामूहिक परिवार के दायित्वों से स्वतंत्रता की कीमत तो चुकानी होगी..कल यही दाम और मंहगे होंगे जब इनके इस तरह पल रहे बच्चे बड़े होंगे और ओल्ड एज होम आबाद होंगे उन्हीं क्रेच में पले बच्चों के पालकों से.

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  11. ऐसी कुछ व्यस्था जिसके बारें में आपने जिक्र किया है ......उसके बारें में मुझे पता ही नहीं था .......दुःख कि बात मासूम बच्चों के साथ ऐसा होता है .

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  12. शुक्र है कि हम लोग अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं,भले ही हम लोग माडर्न न कहलाये मगर हम लोगों को अकेलापन कभी नही सताता।बहुत ज़रूरी मुद्दे उठा रहे हैं आप,आभार आपका।

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  13. @ http://anilpusadkar.blogspot.com/2010/05/blog-post.html
    अनिल भाई !
    बहुत दिनों से इस महत्वपूर्ण विषय पर लिखने का मन था, अविनाश वाचस्पति के घर पर एक बैठक में खुशदीप सहगल की तरफ से यह सुझाव था कि हम लोग कम से कम अपने मुहल्लों में वृद्धों की स्थिति सुधारने और उन्हें हंसाने का कुछ उपाय क्यों न करें ! लगभग दो माह से सोच रहा था इस पर लिखने के लिए मगर जैसे हम अपने इन बड़ों के साथ, आज कल आज कल करते अपना व्यस्त समय एन्जॉय करते निकाल देते हैं , मैं भी भूल सा गया था !

    आज आपने जगा दिया,शुक्रिया ! देखता हूँ कुछ कर पाऊंगा या फिर भूल जाऊँगा ?

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  14. भाई मजा तो परिवार के साथ ही आता है।
    खटपट तो हर जगह होती है पर काम चल जाता है
    तीन कमाने वालों में एक निखट्टु भी चल जाता है
    यह संयुक्त परिवार का मजा है। कभी चुल्हे पर 40 लोगों का खाना बनता था। आज 4 का बनाना मुस्किल है,लोगों के दिल दिमाग सिकुड़ते जा रहे हैं।
    अकेले रहने के नुकसान बहुत हैं, लेकिन नौकरी करने वालों को तो रहना पड़ेगा। उनकी दुनिया सिमट जाती है।

    अच्छी पोस्ट

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  15. बहुत सटीक पोस्ट है....सही मुद्दा उठाया है...विचारणीय विषय है..

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  16. संयुक्त परिवार एक बहुत ही सुन्दर और उपयोगी प्रथा है कोई शक नहीं इसमें ..और रिश्तों की कमी तो बच्चों को क्या हमें भी खलती है...पर माफ़ कीजियेगा खुशदीप जी आप घर से फ्लेट में तो आ गए और मोडर्न कपल भी दिखा दिए जो की सच ही है. परन्तु मोडर्न दादा दादी और नाना नानी के बारे में कहने से चूक गए ....आप ये भूल गए की आज के दादा दादी और नाना नानी भी नुक्लियर परिवार में ही रहे थे और वो भी अपनी स्वतंत्रता के चलते किसी के भी साथ नहीं रहना चाहते चाहे वो उनके अपने बच्चे ही क्यों न हों ..उनकी भी अपनी एक लाइफ होती है ..किट्टी, भजन मण्डली, सामाजिक गोष्ठी और इन सब के चलते वे भी आपके बच्चों की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते ...उनका भी कहना होता है हमने अपने बच्चे अकेले नहीं पाले क्या? अब हमें इस जिम्मेदारी से मुक्त करो और खुद अपने बच्चे पालो.जहाँ आज की युवा पीड़ी अपने तरीको में समझौता नहीं करना चाहती वहीँ आजकल के दादा दादी या नाना नानी भी अपनी जिन्दगी में कोई एडजेस्टमेंट नहीं करना चाहते गए वे ज़माने जब वे अपने पोते पोतियों में ही मस्त रहा करते थे ..अब बहुत कुछ बदल गया है ..और जायज़ भी उन्हें भी अपनी जिन्दगी अपनी तरह से जीने का हक़ है.

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  17. बहुत ही जबरदस्त। संयुक्त परिवार समय की आवश्यकता है, लेकिन कोई समझे तब न। मुझे तो घर में हलचल अच्छी लगती है। कब्रिस्तान में रहने की आदत नहीं है अपने को।

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  18. vicharniya prashn.......har vyavstha ke apne sukh aur dukh hote hain ab ye to hum par nirbhar karta hai ki hum kise apnayein.

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  19. बेहद सटीक लिखा इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर.

    रामराम.

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  20. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  21. बहुत ही चिंतनीय आलेख....पर हल कुछ समझ में नहीं आता...शिखा की बात भी सही है...आजकल दादा-दादी, नाना-नानी का भी अपना जीवन है...वे पहले की तरह सारा समय पोते -पोतियों..नाती-नातियों की देखभाल में नहीं बिता सकते...
    वैसे बीच का कोई रास्ता निकालना चाहिए...और बच्चों को गोद में उठना, दुलार करना बहुत महत्वपूर्ण है..एक बार रीडर्स डाइजेस्ट में पढ़ा था इस से कुछ हारमोंस सीक्रेट होते हैं और उनका कद बढ़ता है..

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  22. आजकल आपका सामाजिक लेखन बहुत ही प्रभावी बन पड रहा है । बहुत ही उम्दा लेख माला चल रही है और विचारोत्तेजक भी ।धन्यवाद । आज सच में ही सबको सोचने की जरूरत है ।

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  23. आंख खोलने वाली जानकारी ।
    बच्चों का पालन पोषण इतना आसान नहीं होता , इसलिए सभी तरह की सावधानी बरतना ज़रूरी है ।
    संयुक्त परिवारों का टूटना , नई पीढ़ी को एक पारिवारिक सुख से वंचित रखता है । बढ़िया लेख ।

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  24. काश संयुक्त परिवारों का फ़ायदा हम समझ सकें...काश हर भारतीय घर में एक बार फिर ऐसा हो सके...
    समसामयिक, शिक्षाप्रद, सोचने को मजबूर करता आलेख

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  25. In a nuclear family, a lady is spared from the tortures by in laws , mahabharatas and unnecessary tensions.

    Above all....the freedom in nuclear families cannot be compromised at any cost. Its the need of the ERA.

    And also i have noticed, parents prefer to stay back at their houses and not ready to move with son and daughter in law. The EGO in elderly people is on rise , because they are capable of managing on their own.

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  26. खुश दीप जी, बहुत अच्छी लगी आज की आप की बाते, कई बार इस बारे लिखना चाहा लेकिन लिख नही पाया, पता नही हम किस ओर मुंह ऊठाये जा रहे है आधुनिकता के नाम से, जब की वो पश्चिम की भी राह नही, लेकिन यह पीढी वापिस नही आने वाली, यह अपने आप को बहुत सयाना समझती है, ओर जल्द ही यह अपना सब कुछ खोने वाले है, आप का आज का लेख पढ कर काश इन्हे कुछ अकल आये अब भी समय है लोट आये उस स्वर्ग मै जिसे यह बंधन कहते है. धन्यवाद

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  27. बिलकुल सही भैया. पहले कहा जाता था शादी दो परिवारों के बीच का रिश्ता होता है पर आजकल ये दो जनों का रिश्ता बन गया है. तभी सब मुश्किल शुरू हो गयी है. खैर बदलाव आएगा. हम जैसे लोग लायेगे..

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