रविवार, 9 मई 2010

आप भारत के हैं या इंडिया के...खुशदीप

कल मेरी पोस्ट पर शेफ़ाली पांडे की टिप्पणी ने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया...न जाने ऐसी कितनी माताएं होंगी जिन्हें रोज़ शेफ़ाली बहना जैसे हालात से गुज़रना होता होगा...कलेजे के टुकड़े को घर छोड़कर काम पर जाना होता होगा...

ये है तस्वीर का एक रुख, भारत की असली तस्वीर का...अब मैं दिखाता हूं आपको इंडिया की एक तस्वीर...मेरे दूर के रिश्ते में एक जोड़ा है...वेल सैटल्ड...पति एमएनसी में वाइस प्रेज़ीडेंट है, पत्नी कॉल सेंटर में वरिष्ठ अधिकारी...सब कुछ है उनके पास...दोनों अपनी हेल्थ पर बड़ा ध्यान देते हैं...लेकिन मैं उनके घर एक बार गया तो उनके दस और छह साल के दोनों बच्चे अपने माता-पिता को फर्स्ट नेम से संबोधित कर रहे थे...न मम्मी, न पापा...और वो जोड़ा खिलखिला कर हंस रहा था...पता चला बच्चे किसी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ते हैं...यानि उन्हें इंटरनेशनल सिटीजन बनाने की तैयारी की जा रही है...विदेश में हर रिश्ते को अंकल-आंट पर ही समेट दिया जाता है...लेकिन ये नया ट्रेंड मां-बाप को भी नाम लेकर बुलाना, किस आधुनिकता का परिचायक है, मेरी समझ से बाहर है...इसी सिलसिले में मुझे ब्लैक फिल्म में बच्ची का रोल करने वाली कलाकार आयशा कपूर भी याद आ रही है...किसी फिल्म पुरस्कार समारोह में उसे अवार्ड मिला तो उसने स्टेज पर आकर अमिताभ बच्चन को अमिताभ और संजय लीला भंसाली को संजय कह कर संबोधित किया...मेरे लिए वो दृश्य भी चौंकाने वाला था...नौ-दस साल की लड़की आयशा और 65 साल के अमिताभ...




यहां ये सवाल उठाया जा सकता है कि ये कुछ ही घरों की बात हो सकती है...देश में अब भी हर घर में माता-पिता को आदर से ही बुलाया जाता है...ठीक बात है आप की...लेकिन कल की मेरी पोस्ट पर राज भाटिया जी की टिप्पणी पर एक बार गौर फरमा लीजिए...राज जी का कहना है कि जर्मनी में लोग (खास तौर पर पुरुष) शादी से बचते हैं...वो कहते हैं जब सब बिना शादी ही मिल जाता है तो फिर इस ज़िम्मेदारी को गले में क्यों बांधा जाए...अब आप कहेंगे कि जर्मनी के परिवेश से भारत का क्या मतलब...मतलब है जनाब...बहुत मतलब है...ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में दुनिया एक ग्लोबल विलेज हो गई है...अब सात समंदर पार सात समंदर पार नहीं रहा...जब हम अपने देश में इंटरनेशनल स्कूल बना सकते हैं, बाहर की यूनिवर्सिटीज़ को यहां न्योता दे सकते हैं, पेप्सी, कोक, केएफसी, मैक्डॉनल्ड जैसी एमएनसी को अपने देश के बाज़ार पर छाते देख सकते हैं तो क्या वहां की कल्चर देश में इम्पोर्ट नहीं होगी...क्या लिव इन रिलेशनशिप, गे-रिलेशन, लेस्बियन रिलेशन...इन सबका नाम भी सुना था किसी ने भारत में...अब नाम ही नहीं सुना जाता बल्कि इनके राइट्स पर खुल कर बहस होती है, परेड निकाली जाती हैं...


मेरा इस सीरीज़ को लिखने का मकसद सिर्फ इतना है कि हमारे एक देश में जो दो देश बनते जा रहे हैं, उसके विरोधाभासों को आप तक पहुंचाऊं...मेज़ोरिटी हमारे देश में भारत वाले घरों की ही है...इसलिए वहां संस्कार है...लेकिन पिछले बीस साल में ग्लोबलाइजेशन का सबसे ज़्यादा फायदा जिन एक प्रतिशत लोगों को मिला वही अब इंडिया की नुमाइंदगी कर रहे हैं...देश का सारा पैसा इन्हीं हाथों में सिमटता जा रहा है...इनका एक पैर देश में और दूसरा पैर बाहर होता है...इन्हें देश या भारत की भावनाओं से कोई सरोकार नहीं, इनका मकसद सिर्फ पैसा और स्टेट्स है...इसके लिए ये कुछ भी कर सकते हैं...और विदेश की जितनी भी संस्कार जनित बुराइयां हैं, यही लोग देश में ला रहे हैं...

आखिर में एक बात कल मेरी पोस्ट पर रश्मि रविजा बहन समेत मातृशक्ति की ओर से कहा गया कि मां के दूध को फिगर से जोड़ कर सारी नारियों को कटघरे में खड़ा करना अनुचित है...बिल्कुल ठीक बात है...लेकिन मेरी पोस्ट के निहितार्थ को अगर ठीक ढंग से पढ़ा गया होता तो शायद ये आरोप मेरे पर नहीं आता...अभी तक मेरा जितना भी ब्लॉगिंग का अनुभव रहा है, आप सबने देखा होगा कि मैं मातृशक्ति का कितना सम्मान करता हूं...मेरा आशय सिर्फ इतना है कि मां का दूध अमृत होता है...और इसका युवा पीढ़ी में जितना प्रचार किया जाए, उतना कम है...डॉक्टर टी एस दराल ने मेरी पोस्ट पर अपनी टिप्पणी से साफ भी किया कि छह महीने तक हर हाल में शिशु को सिर्फ मां का दूध ही मिलना चाहिए...छह महीने से दो साल तक मां के दूध के साथ ठोस आहार और दो साल के बाद भी जहां तक संभव हो बच्चे को मां का दूध पिलाना चाहिए...डब्बाबंद दूध बॉटल के ज़रिए बेहद ज़रूरी होने पर या मेडिकल कॉम्पलिकेशंस पर ही पिलाया जाना चाहिए...लेकिन तीन महीने बाद बच्चे का मां का दूध छूटता है, चाहे वजह नौकरी हो या कोई और, ये बच्चे के साथ तो अन्याय है ही...

आज बस इतना...कल बात करूंगा बच्चे के लिए गोद में उठाना कितना ज़रूरी है और नौकरी वाले न्यूक्लियर फैमली के मां-बाप को छोटे बच्चों को घर पर या क्रेच में छोड़ने के क्या-क्या ख़तरे हो सकते हैं...हां एक बात और, ये मेरे विचार हैं...ज़रूरी नहीं कि आप इन से सहमत हों...सब का अपना जीने का अंदाज़ होता है...और अपने बच्चों की बेहतरी खुद मां-बाप से ज़्यादा अच्छी तरह कौन सोच सकता है...

क्रमश:



स्लॉग कविता



मुझे मां की दुआओं का असर लगता है,


एक मुद्दत से मेरी मां नहीं सोई,


जब मैंने इक बार कहा था,


"मां मुझे डर लगता है"...




(शेफाली पांडे समेत पूरी मातृशक्ति को समर्पित)

28 टिप्‍पणियां:

  1. bahut hi sarthak likha aapne khushdeepji

    aapko bahut badhai
    humhesha karen maa ka samman tabhi kahlayega
    asli mother's-day

    http://sanjaykuamr.blogspot.com/

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  2. मां का जहां मे जहां सम्मान नही होता,

    उस जहां मे रहने वाला इंसान नही होता

    ....सामायिक ससक्त रचना..बधाई

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  3. भैया आज की पोस्ट बहुत ही अच्छी लगी, हम आगे तो बढ़ रहे है पर रिश्तों की मिठास खोती जा रही है.

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  4. मैं ने अपने बचपन में देखा है कि माएँ पाँच बरस तक या अगला बच्चा पेट में आने तक बच्चों को दूध पिलाती रहती थीं। और उन की फिगर कहीं से भी कमजोर नहीं थी। अभी मैं ग्वालों के यहाँ दूध लेने जाता हूँ। वहाँ दूधवाला और उस की पत्नी अक्सर मिलते हैं। कुछ दिन पहले एक लड़का दिखाई दिया तो मैं ने उस से पूछा कि यह कौन है, तो उत्तर मिला कि उस का लड़का है। मैं हैरानी में पड़ गया कि उस औरत का बेटा कोई पच्चीस बरस का है और उस की फिगर अभी भी वैसी ही बनी हुई है। असल में वह ग्वालिन गायों और भैंसों को संभालती है। बहुत श्रम का काम है। किसी भैंस को नियंत्रित करना इतना आसान नहीं होता। यह श्रम है जो देह को जवान रखता है बशर्ते उस के साथ खुराक भी ठीक मिलती रहे और कोई व्यसन न हो।

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  5. aadrniy aapkaaa kubsort lekh pdhaa lekin aek schaai yeh he ke hm hmaare aazaad bhaart ke snvidhaan se bndhe hen or usmen kevl india hi shbd he hindustaan bhaart ki usmen jgh nhin he ab btaao indiaa ke alaava desh ke baaqi naam to asnvedhaanik ho gye naa so plz turnt snvidhaan snshodhn krvaane kaa abhiyaan mere saath mil kr chlaana shuru kro mujhe prtikshaa rhegi . akhtar khan akela kota rajasthan

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  6. अख्तर भाई...
    बड़ी अच्छी बात पकड़ी है आपने...इसीलिए आम आदमी के हाथ बुलंद करने का दावा करने वाली हमारी सरकार जो भी नीतियां बनाती है, उसका फायदा इंडिया वालों को ही मिलता है, भारत वालों को नहीं...सरकार भी बेचारी क्या करे...संविधान में भारत कहीं हैं ही नहीं...बस इंडिया है...इसलिए सरकार और उसके मंत्री अगर भारत और भारत वालों को मिटाकर सिर्फ इंडिया को ग्लोबल वर्ल्ड में खड़ा करने के लिए इतना कुछ कर रहे हैं तो क्या बुरा कर रहे हैं...मैं और आप बस इतना ही कह सकते हैं- मेरा भारत महान...

    जय हिंद...

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  7. भारत को भारत ही रहने दे तो अच्छा है... आज के लेख मै आप ने बहुत कुछ लिख दिया.्जो बहुत अच्छा लगा, धन्यवाद

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  8. aaj ka lekh kal se bhi behtar laga.. Pranam mera bhi har matri shakti ko

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  9. चिन्ता जायज़ है...अच्छा लेखा

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  10. मात पिता को मोम और डैड भी नहीं , नाम से बुलाना --यह तो शायद पश्चिम में भी नहीं होता । वहां भी अंकल, आंटी या फिर टीचर्स को ही नाम से बुलाते हैं । यानि कुछ लोग अंग्रेजों के भी बाप बनते जा रहे हैं ।
    लेकिन आज भी हमारे गाँव में वही संस्कार देखने को मिल जायेंगे जिनसे हमारी पहचान बनी है ।
    बस शहरों में उन्नतिशील परिवारों में यह लुप्त होता जा रहा है ।

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  11. बहुत सही फ़िक्र है, और मुझे तो इसका कोई इलाज भी नही दिखाई देता,

    रामराम

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  12. इब्तिदा-ए-गर्त है रोता है क्या
    आगे आगे देखिये होता है क्या

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  13. पिछली पोस्ट समेत यह पोस्ट भी हम-सोये हुओं को जैसे जगाती है ।
    क्या कहने, इसी तरह सार्थक और जागरूक लेखन में मील के नये पत्थर जुड़ते रहें,
    कैरी ऑन खुशदीपे ।

    इतने बेहतरीन सोच की पोस्ट में इँडिया दैट्स भारत का एक अनछुआ पहलू रहा जाता है, गाँवों में बसने बहुतेरी माँयें कुपोषण , रक्त की कमी, कैल्सियम अल्पता और दो जून की रोटी के लिये जूझते हुये.. चाह कर भी बच्चे को स्तनपान नहीं करवा पातीं । खेत के मेंड़ पर कहीं साये में बच्चे को लिटा कर, शाम की मज़दूरी मिलने तक वह खटते रहने को बाध्य हैं, , निःशब्द !
    कभी सोचा है कि कितने शिशु भुने गेहूँ के सत्तू के घोल पर जी जाते हैं ।
    पर, मैं स्वयँ इसका प्रत्यक्षतः साक्षी हूँ, एण्ड सच एक्सपीरियेन्सेज़ हैव मेड मी ऍ डिफ़रेन्ट परसन.. बोले तो खुरदुर मानूश !

    जहाँ तक इस पोस्ट के शीर्षक का ताल्लुक है, न तो हम भारत में हैं, न ही हम इँडिया बन पाये ।
    दैट्स व्हाई, वी लिव इन भिंडिया.. यहाँ सुधार के सारे प्रयास भिन्डी साबित होते आये हैं ।
    नो भारथ.. नो इँडिया..
    वी ऑर जस्ट लुकिंग डाउन विद ऍ भिन्डिया !

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  14. @डॉ अमर कुमार जी,
    आपकी इस बात ने मुझे कितना संबल दिया है, शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता...आप बस खुद ही समझ जाइए...

    जय हिंद...

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  15. पश्चिमी सभ्यता को सर्वोच्च मानते ये माँ बाप वही करेंगे जिसकी प्रष्ठभूमि उनके माँ बाप ने गर्व के साथ तैयार की है ! गुलाम पहले साहबों को देख सपने देखते थे, उनसे क्या उम्मीद करते हो ! वे वीपी हैं तो भी उसी सभ्यता के मानसिक गुलाम हैं खुशदीप भाई !
    जब बच्चे इन्हें लात मार कर इनकी दी गयी सभ्यता की असलियत बताएँगे तब इन्हें पता चलेगा !
    मगर कुछ तो हमारी बात समझेंगे !
    शुभकामनाएं !

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  16. खुशदीप भैया आपकी एक एक बात सोचने पर मजबूर कर रही है कि आधुनिकता के ओट लिए हमारा समाज कितना गिरता जा रहा है..आने वाले समय में माँ और बाप भी एक राह चलते इंसान की तरह हो जाएँगे कुछ पल साथ चलेंगे फिर बॉय बॉय...यह तो है हमारा समाज..बहुत कुछ है आज आपकी पोस्ट में अगर कोई समझ सकें तो..इस सार्थक लेखनी के लिए दिल से बधाई...मातृ दिवस पर हार्दिक बधाई भैया

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  17. खुशदीप भाई ....डॉ अमर की टिप्पणी के बाद कुछ कहने व सुनने की ज़रुरत नहीं होती ...जय हिंद

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  18. पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के अन्धानुकरण के कारण अपनी मौलिक संस्कृति को लोग नजरंदाज करने लगे हैं। भारतीय जन मानस इसी कारण अलग प्रकार के सोच में ढ़लने लगा है। परिणामत: संस्कृति के प्राण तत्त्व त्याग, बलिदान, सदाचार, परस्परता और श्रमशीलता के स्थान पर पनपने लगी हैं-उच्छृंखलता, अनुशासनहीनता, आलसीपन और स्वार्थपरता जैसी प्रवृत्तियां। नई पीढ़ी इनके दुष्प्रभावों के व्यामोह में अपने को लुटाने और बरबाद करने में लग गई है।क्लबों, होटलों, बारों आदि में शराब और विलासिता में लिप्त अपने दायित्व से बेभान यह युवा पीढ़ी देश को कहां ले जायेगी, यह सोच कर ही भय लगता है।
    स्वस्थ सामाजिक ढाँचा उन्ही लोगो के कंधो पर टिका है , जो सदैवं सांसकृतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं, परंतु आज हमारी सांस्कृतिक मूल्यो का हास हो रहा है । वे लोग जो समाज और संस्कृति के लिए जीते थे वे अब न जांने कहाँ चले गये । जिस सांस्कृतिक धरोहर के लिए हमारी पहचान होती थी जिसके लिए हमारा देश जगतगुरु कहलाता था वे सब आदर्श और सिद्धान्त अब लुप्तप्राय हो गएं हैं । आज हमारी संस्कृति की पहचान धुँधली पड़ गयी है, हमारी संस्कृति का सूर्य अब धुँधला पड़ गया है , आज हालात ऐसे हैं हमारे देश की ,कि धर्म , देश और समाज का अस्तित्व ही मिटता जा रहा है । हर किसी की एक ही मनोदशा और एक ही लक्ष्य है , येन-केन-प्रकारेण स्वार्थपूर्ति । ऐसी स्थिति हमारे समाज और हमारी संस्कृति को सोचने पर मजबूर कर रही है । हर राष्ट्र की अपनी कुछ मौलिकता होती है , सांस्कृतिक और समाजिक पहचान होती है । भारतीय संस्कृति समस्त विविधताओं को एक सूत्र में पिरोती हुई भी प्रेम से ओत प्रोत है । जब भी कहा जाता है कि देश सर्वश्रेष्ठ है तो उसका पहचान सर्वप्रथम मूल्यों और आदर्शो से होता है। भारतीय संस्कृति ने अपनी प्रतिष्ठा को कभी मिटने नहीं दिया , इसीलिए वह गिर-गिरकर भी उठी और सर्वोपरी रही । पिछले तींन हजार वर्षों और विशेष करके १५ सौ वर्षो में आक्रमणकारी संस्कृतियों ने कितनी भी प्रचंड शक्ति के साथ भारत में प्रवेश किया हो, पर वे इस राष्ट्र की मूलभूत चेतना को झुका नहीं सके , बल्कि थक तक हार मान लिया और अन्ततः इसी का एक भाग बनकर रह गये ।

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  19. खुशदीप जी, यहां अमेरिका में आकर कम्‍प्‍यूटर सेट कर लिया है अब आपकी पोस्‍ट नियमित पढ़ने का प्रयास रहेगा। पहली पोस्‍ट पढ़ी नहीं थी लेकिन यह पोस्‍ट कई मुद्दों को साथ लिए है। भारतीय संस्‍कृति परिवार प्रधान है जबकि पश्चिम में व्‍यक्ति प्रधान सोच को बल मिलता जा रहा है और दुर्भाग्‍य से इसी सोच को हमारा अभिजात्‍य वर्ग भी अपनाता जा रहा है। इस कारण हम सब वस्‍तु बनते जा रहे हैं। हमारी संस्‍कृति की जड़े इतनी गहरी हैं कि कोई भी चिंतन इस जड़-मूल से समाप्‍त नहीं कर सकता। यह अवश्‍य है कि अभी संक्रान्ति काल है, कुछ दिनों में ही लोग परिवार की ओर मुड़ने लगेंगे, ऐसा मेरा विश्‍वास है।

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  20. बहुत बढ़िया और सोचने पर मजबूर करता हुआ लेख !!


    मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ !!

    वन्दे मातरम !!

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  21. पूरे कमेंट से मुझे यह जानकर खुशी तो हूई की सब ये मानते हैं कि देश की अधिकांश माताओं को कुपोषण से बचाना जरुरी है..मां स्वस्थ रहेगी तो बच्चा स्वस्थ रहेगा..इसके लिए पुरष मानसिकता में बड़े स्तर पर बदलाव की जरुरत है.....

    आज भी भारत की आर्थिक धुरी महिलाएं ही हैं....किसी को कोई शक हो तो जरा ग्रामिण भारत की स्थिती का आकलन कर ले....


    सिर्फ नौकरी ही औरत के लिए नहीं है. जो करना चाहे कर सकती है औऱ ये पूरी तरह से पति-पत्नी के बीच है..पर घर को संभालने या बच्चों की परवरिश को कम करके न आंके....

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  22. खुशदीप भाई ,
    बिल्कुल सही दिशा में जा रहे हैं आप और मैं पहले से कहता आ रहा हूं कि निर्णय खुद समाज को ही लेना है कि कौन सा रास्ता पकडना है , जो पलडा हावी होगा वो ही भविष्य की संचालक प्रवृत्ति बनेगी । मगर खुशी है कि अभी भारत , हिंदुस्तान का दायरा ही इंडिया से कहीं ज्यादा है और इंडिया वालों को भारत की याद आती रहती है । सच है मिट्टी का खिलौन कभी मिट्टी को नहीं भूलता ।

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  23. दरअसल कुछ लोगों ने पश्चिम के अनुसरण को ही तरक्की समझ लिया है और धीरे-धीरे उनकी संख्या बढती जा रही है शायद इसिलिये भारत मे इंडिया अब साफ़ दिखने लगा है।इस पर सोचना और अपनी संस्कृति को बचाना बेहद ज़रूरी है।आपने हमेशा कि तरह बेहद संवेदनशील मुद्दा उठाया है आप बधाई के पात्र है,मेरे लिये तो,या मेरे भाईयों और बहनो के लिये आई(मां) ही भगवान है,बाबूजी(पिताजी)को हम खो चुके हैं।आज भी देर होने पर आई जागती मिलती है,और इस बात पर सभी बच्चे नाराज़ भी होते हैं मगर उनका कहना है वे मां है और उन्हे क्या करना है,क्या नही वे अच्छी तरह से जानती है।सच मे मां के कदमों मे ही स्वर्ग है।

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  24. अच्छी पोस्ट...
    माता-पिता को दोस्त समझना अलग बात है...पर नाम से पुकारना??...यहाँ भी आस-पास के ,कई सहेलियों के बच्चे इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ते हैं...पर शुक्र है..ये बयार अभी उन्हें नहीं छू गयी है.

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  25. sahi baat kah di hai Dr. Amar ji ...saari baatein wahin khatm ho gayin ..unka aabhar...

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  26. मुझे मां की दुआओं का असर लगता है,


    एक मुद्दत से मेरी मां नहीं सोई,


    जब मैंने इक बार कहा था,


    "मां मुझे डर लगता है"...
    ये पंक्तिया किसकी लिखी हुई हैं? कृपया nilumathur@gmail पर मेल द्वारा बताने का कस्ट करें!

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  27. प्रिय खुशदीप भाई ,

    मैने आपको सबसे पहले प्रिय लिखा , जिसका अर्थ यह है कि आप मुझसे उम्र में कम हैं और प्रिय तो हैं ही ।
    फिर मैने आपको भाई लिखा जिसका अर्थ यह है कि आप उम्र में लगभग बराबर हैं और मैं आपको भाई ही समझता हूँ ।

    अब अगर इसे कार्पोरेट कल्चर के तहत लिखना होता तो मैं लिखता सिर्फ ...खुशदीप ।

    जब मात्र दो शब्द सम्बन्ध को इतने विस्तार से परिभाषित कर सकते हैं तो इन्हे हटाकर हम क्या साबित करना चाहते हैं ?
    अब अगर पिता को या उनके समवयस्क किसी बड़े को लिखना हो तो क्या हम पूजनीय या आदरणीय का प्रयोग नहीं करेंगे या नाम के आगे जी नहीं लगायेंगे ?
    सम्बोधन का तो छोड़ दीजिये वह युग हमारे यहाँ नहीं आयेगा हम किसी और मिट्टी से बने हैं । हम इस कल्चर के लोगों को बता देंगे कि सम्बोधन का अर्थ मात्र सम्बोधन नहीं होता ।

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