बुधवार, 5 मई 2010

सांप जी, अपना धर्म निभाते रहिए...खुशदीप

कल मैंने काफ़ी के कप पेश किए थे...पता नहीं किसी सज्जन को काफ़ी का टेस्ट इतना कड़वा लगा कि उन्हें बदहजमी हो गई...शायद उस सज्जन ने ठान लिया था कि मुझे कॉफी पिलाने का मज़ा चखाना ही चखाना है...वो सज्जन मेरी टांग से ऐसे लिपटे, ऐसे लिपटे कि मुझे गिरा कर ही माने...अवधिया जी ने कल अपनी पोस्ट में लिखा था बंदर के हाथ में उस्तरा...और ये उस्तरा और किसी ने नहीं ब्लॉगवाणी ने ही अनजाने में नापसंदगी के चटके की शक्ल में मुहैया कराया है...
 
 
 
अब या तो वाकई ये कोई ब्लॉगवुड की भटकी हुई आत्मा है जो हॉट लिस्ट पर घूम-घूम कर नापसंदगी का प्रसाद बांटती रहती है या फिर ये कोई भेड़ की शक्ल में छिपा भेड़िया है...आज ये मैं पोस्ट उसी भटकती आत्मा या भेड़िए को समर्पित कर रहा हूं...जितने चाहे नापसंदगी के चटके लगाना चाहता है, लगा ले...मैं साथ ही इस शख्स की तहे दिल से तारीफ़ भी कर रहा हूं...क्योंकि ये शख्स पूरी शिद्दत के साथ अपने धर्म का पालन कर रहा है...जिस तरह संत का धर्म होता है दूसरों का भला सोचना, उसी तरह सांप का धर्म होता है डसना...अगर वो डसे नहीं तो इसका मतलब है कि वो अपने धर्म से विमुख हो रहा है...आज ये पोस्ट धर्म का पालन करने का पूरा मौका दे रही है...किसे ?...कहने की ज़रूरत है क्या ?

43 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छे... संत ना छोडे संतई कोटिक मिले असंत... वैसे ही ब्लागिया तो अपनी बात सुनईबे करेगा... कोई उसका क्या बिगाड लेगा...

    हा हा... मजा आ गया भाई.

    उत्तर देंहटाएं
  2. साँप जी को हमारा भी प्रणाम !!
    आप भी लगे रहिये लिपटने में जैसे हम सब लगे है लिखने में !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बाकि सब तो ठीक है पर लिखने में इतनी कंजूसी क्यों. सांप भी शायद कंजूसी के लिए ही था.

    उत्तर देंहटाएं
  4. खुशदीप सर,
    सांप भी चंदन के वृक्ष पर ही लिपटते हैं।
    ये अपने जहर से खुद ही मरेंगे, पेड़ का क्या लेंगे।
    निभाने दीजिये उन्हें अपना धर्म।
    आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  5. लेकिन मुझे समझ नही आता इतना समय किस के पास है जो पहले अपना नाम ओर मेल आई डी भरे फ़िर पास वर्ड ओर फ़िर नापसंद का चटखा, वेसे तो मै इन सब पर ध्यान नही देता, लेकिन पिछले काफ़ी दिनो से ब्लांग जगत मै इस नापसंद ओर पसंद के वटन का शोर मचा था, ओर मैने अपने ब्लांग पर बहुत ढुढा यह कमब्खत नही मिला, तो किसी ने बताया की यह तो ब्लांग बाणी पर है, वहां जा कर ध्यान से देखा ओर फ़िर अपने ही ब्लांग पर प्रयोग करना चाह ना पसंद के चटखे का, लेकिन वो तो आई डी ओर पास वर्ड मांगे... तो भईया हम तो वही से लोट आये, अरे हम तो वहां टिपण्णी करने से भी बचते है जो रोज रोज आई डी ओर पास वर्ड मांगे...चलिये आप ने सांप को पुरा मोका दिया निकाल लो भाई जितना जहर निकालना है निकालो

    उत्तर देंहटाएं
  6. Chandan vish vyapat nahin.. lipte rahat bhujang.. aap khud itne samajhdaar hain bhaia, kyon aisi chhoti baton se pareshaan hote hain. unhe apna kaam karne dijiye, ek din khud hi thak jayenge.

    उत्तर देंहटाएं
  7. भैया .....आज इसी संपोले ने रश्मि रविजा जी की पोस्ट पर भी नापसंद का चटका लगाया.... तो मैं बहुत सुना कर आया वहां.... जिसने भी लगाया था.... यह कोई ऐसा आदमी है जिसकी बीवी गली के कुत्ते के साथ भाग गई है.... जिसके उँगलियों में बवासीर हो चुका है....... तो वही खीज नापसंद के चटके के रूप में निकाल रहा है.... अभी देखा आपकी पोस्ट पर भी दिया हुआ .... है...मुए ने..... मुआ बिना पहिये के ट्रक के नीचे आ कर मरे.....


    ही ही ही ही ही ही ही ....सब लोग कहेंगे कि यह मुझे हो क्या गया है.....?

    जय हिंद......

    उत्तर देंहटाएं
  8. aur haan lagta hai doctor ki report wale star gayab ho gaye ab poori tarah se.. :) agar nahin hue to ishwar kare jaldi gayab ho jayen.. warna aap sunday ko hafte bhar ki scheduled post daaliye.. aapko fir beemar nahin dekh sakta

    उत्तर देंहटाएं
  9. अरे यह तो पांच से आगे बढ ही नही रहा, मै पसंद पर एक चटखा लगाया आज कुछ नही मांगा ओर संख्या भी नही बढी??

    उत्तर देंहटाएं
  10. बीस साल पहले जब इस मकान में आया तो कालोनी में अक्सर सांप दिखाई दे जाते थे। अब तो दस बारह वर्ष से एक भी नहीं देखा। लेकिन वे याद जरूर आते हैं, कभी कभी कुछ इंसानों को देख कर। ऐसा न हो तो लोग सांप को भूल ही जाएँ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. हम तो एक दिन अन्जाने में ही लिख बैठे थे कि "पता नहीं लोगों को नापसन्द का चटका कैसे मिल जाता है, हमें तो आज तक किसी नें नहीं दिया"...बस वो दिन है ओर आज का दिन...उसी की सजा हर रोज भुगत रहे हैं :-)

    उत्तर देंहटाएं
  12. अरे बाप रे साँप... साँप.... साँप .....
    धुत्त तेरी के आज सिर्फ ३ सांप नज़र आये हमको....
    कभी कभी ४,५ ,६ भी होते हैं खुशदीप जी....
    अब तो इनके बिना पोस्ट लिखने का आनंद ही नहीं आता है...
    ब्लॉग जगत की जलवायु उत्तम किस्म के साँपों के लिए बहुत माफिक है...
    बेचारे साँप ..कितने बेचारे हैं....
    हाँ नहीं तो...!!

    उत्तर देंहटाएं
  13. मेरे पीछे से ये नापसंदगी के झटके भी लगने लगे? मैने पहली बार सुना है नापसंदगी के झटके के बारे मे अभी देखती हूँ। कहीं मुझे भी तो नही कोई डस रहा? शुभकामनायें आशीर्वाद्

    उत्तर देंहटाएं
  14. नकारात्मक प्रभाव को सकारात्मकता से कम किया जा सकता है. यदि पोस्ट वाकई पसन्द हो तो पसन्द का चटका लगाने से शाप के विष के असर को कम (समाप्त तो फिर भी नहीं किया जा सकता है) किया जा सकता है.

    उत्तर देंहटाएं
  15. सुन मेरे............(दोस्त्,भाई,बेटे,........... आदी,आदी )

    तू इधर-उधर मत देख,सीधे-सीधे चलता जा।
    इसकी -उसकी मत सुन,अपने दिल की करता जा।
    अगर इस जीवन में कुछ करने का , ठाना है।
    तो लक्ष्य को देख और आगे बढ़ता जा।
    सुखों को बांटता चल और दुखों को सहता जा।
    नदिया की तरह रह ,निर्मल और शांत बहता जा।
    ख़ुद व्यसनों से दूर रह ,और सबको कहता जा।
    गर आसमां को छुना है ,तो ---------------
    पंख हिला कर उडता जा।

    उत्तर देंहटाएं
  16. बढ़िया लेखन!
    अज्ञेय जी ने लिखा है-
    "साँप तुम सभ्य तो हुए नही,
    बस्तियों रहना भी नही आया!"

    उत्तर देंहटाएं
  17. खुशदीप जैसे लेखक की पोस्ट पर भी नेगेटिव मार्किंग ?? यह हरामजादे अपनी औकात दिखा रहे हैं ! हिन्दी ब्लाग्स में फैली इस गंदगी को दूर करने के लिए और ऐसे लोगों की घटिया मानसिकता समाज को दिखाना बहुत आवश्यक है ...हमें इन लोगों को बेनकाब करना चाहिए ! फैसला आम आदमी, पब्लिक को करने दीजिये की कौन क्या कर रहा है ! मैं आपके साथ हूँ !

    उत्तर देंहटाएं
  18. नापसंदगी वाला चलन भी चल गया अब तो

    उत्तर देंहटाएं
  19. खुशदीप भाई
    ये तो ऐसे ही चलता रहेगा,
    मैने पोस्ट पर 7 जयचंद की औलादें पकड़ी
    और उन्होने साबित भी कर दिया कि हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  20. सच कहूँ खुशदीप, इस पोस्ट की आवश्यक्ता नहीं थी. तुमने बेवजह ऐसे लोगों को एक मौका और दिया चर्चा में आने का.

    उत्तर देंहटाएं
  21. खुशदीप जी, साँप तो डँसता है अपने प्राणों के मोह के कारण से, किन्तु जिनकी आप तुलना साँप से कर रहे हैं वे तो डँस रहे हैं सिर्फ दुष्टता के कारण से। ये वो लोग हैं जिनके बारे में गोस्वमी तुलसीदास जी ने लिखा है - "जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ"। ऐसे लोगों की साँप से तुलना करना साँप का अपमान करना है।

    उत्तर देंहटाएं
  22. क्यों पंगा ले बैठे हुश्दीप जी :-)

    मैं तो ठहाके लगाता हूँ और अता रायपुरी की लाईनें गुनगुना लेता हूँ कि:

    हैं दोस्त सांप की मानिन्द मुझसे लिपटे हुए,
    मेरा वज़ूद ही चंदन है क्या किया जाए!


    खुश रहिए, हुश क्यों करते हैं
    हा हा हा

    बी एस पाबला

    उत्तर देंहटाएं
  23. जब सांप अपना स्वभाव नहीं छोड रहा है तो हम क्यूं अपने स्वभाव अपने पथ से विचलित हों।

    प्रणाम

    उत्तर देंहटाएं
  24. इसके साथ अज्ञेय की "सांप तुम सभ्य क्यों नहीं हुए, तुमने दसना कहाँ से सीखा" वाली कविता भी लगा देते !!!!

    उत्तर देंहटाएं
  25. @सागर,
    इसके साथ अज्ञेय की "सांप तुम सभ्य क्यों नहीं हुए, तुमने दसना कहाँ से सीखा" वाली कविता भी लगा देते !!!!

    अज्ञेय जी की तो नहीं मैं अपनी ही एक कविता लगा देता हूं...

    इंसान का सर्प धर्म...

    इंसान इंसान को डस रहा है
    सांप साइड में खड़ा हंस रहा है...
    सांप को अब एहसास है,
    ज़हर में इंसान मात दे गया है
    सांप गर पहले किसी को नहीं डसता था
    अपराध-बोध में दिन-रात तड़पता था-
    सर्प धर्म निभाने में चूक हो गई
    सांप को अब दिल से तसल्ली है
    इंसान की केंचुली में सांप बस गया है
    अपनों को काटना इंसान का धर्म हो गया है...

    इंसान इंसान को डस रहा है
    सांप साइड में खड़ा हंस रहा है...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  26. इंसान इंसान को डस रहा है
    सांप साइड में खड़ा हंस रहा है...

    वाह वाह,वाह वाह,वाह वाह

    उत्तर देंहटाएं
  27. आ गए, आ गए सांप जी...
    निकल आए सांप जी अपने बिल से...मैं भी कहूं कल से ये क्यों नहीं बाहर निकल रहे थे...पहली बार दोपहर १२.४० पर नापसंदगी के चटके से डसा है...अरे सांप जी आप को इतनी खुशी मिलती है डसने से, बड़े शौक से डसिए...ये तो पता चल रहा है, आप किस शहर से हैं...शायद ललित जी, महफूज़ और पाबला जी तुम्हारी सही लोकेशन ढूंढने में भी कामयाब हो जाएं...फिर आपके गले में माला डालकर सम्मान करने वाला पहला व्यक्ति मैं हूंगा...वैसे ये अपने डसने का क्रम तभी शुरू करते हैं जब किसी की पोस्ट पहले चार या पांच में पहुंच जाती है...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  28. ये चटका कहाँ पाया जाता है हमें तो पता भी नही और साँप जी को कहाँ से मिल गया।

    उत्तर देंहटाएं
  29. साँपों को यों ही डसाते रहो
    ब्लोगिंग का भौंपू बजाते रहो
    ____आल इज वेल

    उत्तर देंहटाएं
  30. नापसंद का चटका लगाने की क्या आवश्यकता है? पसंद नहीं है तो लिख दो पसंद नहीं है..क्यों पसंद नहीं है लिख दो तो और भी अच्छा, न आता हो, तो भी कोई बात नहीं..पसंद आना कोई ज़रूरी है क्या!
    मगर यह क्या कि तुम इतनी मेहनत से पढ़ो, प्रतिकिया दो और हम तुम्हें जान भी ना पायें!
    ...गन्दी बात है.

    उत्तर देंहटाएं
  31. हिंदी ब्लोगिंग अब ढलाई की ओर जाने लगी है।
    आप क्यों भागीदार बनते हैं ?

    उत्तर देंहटाएं
  32. दरअसल सांप बेचारा अपने जीन्स से मजबूर होत है, इसलिए कभी नहीं सुधरता। और यही काम मनुष्य भी करता है।

    उत्तर देंहटाएं
  33. .
    .
    .
    आदरणीय खुशदीप जी,

    "या तो वाकई ये कोई ब्लॉगवुड की भटकी हुई आत्मा है जो हॉट लिस्ट पर घूम-घूम कर नापसंदगी का प्रसाद बांटती रहती है या फिर ये कोई भेड़ की शक्ल में छिपा भेड़िया है...आज ये मैं पोस्ट उसी भटकती आत्मा या भेड़िए को समर्पित कर रहा हूं...जितने चाहे नापसंदगी के चटके लगाना चाहता है, लगा ले...मैं साथ ही इस शख्स की तहे दिल से तारीफ़ भी कर रहा हूं...क्योंकि ये शख्स पूरी शिद्दत के साथ अपने धर्म का पालन कर रहा है...जिस तरह संत का धर्म होता है दूसरों का भला सोचना, उसी तरह सांप का धर्म होता है डसना...अगर वो डसे नहीं तो इसका मतलब है कि वो अपने धर्म से विमुख हो रहा है..."

    ससम्मान असहमत हूँ आपसे, भाई वह नापसंद ही तो कर रहा है... दुनिया की सभी बेहतरीन फिल्म, पेंटिंग, कार, इमारत, रेसिपी, कविता, उपन्यास, पोशाक आदि आदि के साथ भी यह कभी नहीं होता कि सारे लोग उन्हें पसंद करें ही... हर चीज को देखें तो कोई न कोई ऐसा जरूर मिल जायेगा जो उसे नापसंद करता हो... अपना-अपना नजरिया है सबका... कोई बुराई भी नहीं इसमें... तो फिर आप और आपकी पोस्टें भी इस नियम का अपवाद तो नहीं ही हो सकती...

    वैसे मेरी नजर में तो आपको नापसंद करने वाले की बजाय शिकायत उस से होनी चाहिये जो आपको नजरअंदाज करता है ।

    क्षमा कीजिये अपने आलोचक को सांप, भेड़िया या भटकती आत्मा कहना अपन को तो जंचा नहीं... आप की आप जानें।

    आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  34. प्रवीण जी लिखते हैं कि
    दुनिया की सभी बेहतरीन फिल्म, पेंटिंग, कार, इमारत, रेसिपी, कविता, उपन्यास, पोशाक आदि आदि के साथ भी यह कभी नहीं होता कि सारे लोग उन्हें पसंद करें ही... हर चीज को देखें तो कोई न कोई ऐसा जरूर मिल जायेगा जो उसे नापसंद करता हो... अपना-अपना नजरिया है सबका...

    तो, यहाँ प्रवीण शाह जी से पूछना चाहूँगा कि फिल्म, पेंटिंग, कार, इमारत, रेसिपी, कविता, उपन्यास, पोशाक जहाँ भी रहती हैं, दिखाई जाती है, प्रदर्शित होती है तो क्या वहाँ उसे पसंद या नापसंद किए जाने के लिए कोई चार्ट टांगा जाता है? या फिर कोई स्थान रखा जाता है क्या? कि लोग देख सकें किसे कितना पसंद-नापसंद किया गया है, चाहे पसंद-नापसंद का कारण कुछ भी हो!

    उत्तर देंहटाएं
  35. .
    .
    .
    @ आदरणीय पाबला जी,

    फिल्मों की व्युअर रेटिंग जब ली जाती है तो नापसंदगी के इजहार का इंतजाम भी रहता है, आटो एक्सपो में भी फीडबैक के दौरान आप किसी भी मॉडल को कारण बताकर या बिना कारण बताये भी नापसंद कर सकते हैं । ऐसा ही काफी अन्य चीजों के साथ होता है ।

    मैं संदर्भ तो नहीं दे सकता लेकिन कई जगह लोगों ने यह कहा है ब्लॉगवुड में, कि हमारे मिजाज के खिलाफ पोस्टों को नापसंद का चटका लगायें । क्या जरूरी है कि खुशदीप जी या किसी भी अन्य ब्लॉगर की पोस्ट को हर कोई पसंद करे ही ?

    वैसे भी Thumbs UP या Thumbs DOWN का विकल्प लगभग सभी संकलक दे रहे हैं, कोई पाठक इनका प्रयोग कर रहा है तो ऐतराज कैसा ?

    आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  36. प्रवीण शाह जी नकारात्मकता,अनैतिकता वगैरह के बहुत तगडे अनुयायी हैं....दुनिया की हर गलत बात,हर लुच्चे लफंगें के समर्थन में ये सबसे पहले खडे दिखाई देंगें. कमाल की सोच है इनकी, बलिहारी जाऊँ :-)

    उत्तर देंहटाएं
  37. जाने भी दीजिये खुशदीप भाई...कोई फर्क नहीं पड़ता उनके नापसंद के चटके से...पढने वाले,पढना तो नहीं छोड़ देते

    उत्तर देंहटाएं
  38. .
    .
    .
    @ परम आदरणीय पं.डी.के.शर्मा"वत्स" जी,

    "प्रवीण शाह जी नकारात्मकता,अनैतिकता वगैरह के बहुत तगडे अनुयायी हैं....दुनिया की हर गलत बात,हर लुच्चे लफंगें के समर्थन में ये सबसे पहले खडे दिखाई देंगें. कमाल की सोच है इनकी, बलिहारी जाऊँ :-)"

    नहीं देव नहीं !!!!
    गलत आरोप है यह मुझ पर...
    हर बार ऐसा ही नहीं करता मैं... अब देखिये न कुछ लोग दुनिया को बेवकूफ बनाते रहते हैं कि तुम्हारी जिंदगी में जो कुछ घट रहा है वह अंतरिक्ष में घूमते आकाशीय पिंडों के उनकी कक्षा में भ्रमण के कारण हो रहा है तथा इस सब का निदान लाल-पीले-नीले हरे-चमकीले-सफेद पत्थर लोहे-चांदी-सोना-तांबा-पीतल-कांसा-जस्ता आदि में लगा कर अंगूठी-माला आदि में पहनो... पूरा ब्लॉगवुड गवाह है कि इन अनैतिक-नकारात्मक लोगों और इनकी गलत बातों का कभी साथ नहीं दिया मैंने !

    उत्तर देंहटाएं
  39. प्रवीण शाह,
    इत्तेफ़ाक ही है आपसे एक ही दिन में दो बार संवाद करने का मौका मिला है...पहले सतीश सक्सेना भाई की पोस्ट पर और अब खुद की पोस्ट पर...ऑफिस से अभी आया हूं, आप समेत सब के विचार देखे...जवाब में देरी के लिए माफ़ी चाहता हूं...प्रवीण भाई आपसे अच्छा गवाह कौन होगा कि जब से मैंने ब्लॉगिंग शुरू की है, अपनी आलोचना से कभी नहीं घबराया, और न ही विचलित हुआ...यथाशक्ति अपनी आलोचना का जवाब देने की कोशिश की और जहां मेरी खामियां थीं, उन्हें सुधारने का प्रयास किया...आलोचना को मैं खुद भी अपने विकास के लिए बेहद ज़रूरी मानता हूं...लेकिन उस आलोचना को जो सीना ठोककर मर्द की तरह सामने से आकर की जाए...फेस टू फेस...आप से मेरे कुछ मुद्दों पर मतभेद रहे लेकिन मैंने मनभेद कभी नहीं समझा...और सच पूछो तो आपसे संवाद (विवाद नहीं) करते हुए मुझे हर बार अच्छा लगा...मैं नापसंदगी के अधिकार के खिलाफ नहीं हूं...लेकिन इस अधिकार का कोई इस्तेमाल करता है तो कम से कम ये पता तो चलना चाहिए कि पोस्ट में वो क्या था जो नापसंद किया गया...इससे मुझे आगे लिखते वक्त बड़ी आसानी रहेगी कि मैं उन खामियों को फिर कभी न दोहराऊं...जब मुझे पता ही नहीं कि क्या नापसंद किया गया तो नापसंदगी का औचित्य कैसे पूरा होता है...क्रिटिक भी फिल्म, पुस्तक या पेंटिंग्स आदि का विश्लेषण करते हैं तो साफ बताते हैं कि लूपहोल्स कहां कहां थे...हां ये हो सकता है कि उस सज्जन को मेरी पूरी पोस्ट ही पसंद न आई हो या सारी पोस्टें ही पसंद न आ रही हो...तो फिर उस सज्जन को सामने आकर मुझे कह देना चाहिए न कि मैं लिख नहीं सकता, इसलिए लिखना ही छोड़ दूं....

    प्रवीण भाई अगर मैं आलोचना या अपनी बुराई से डरता तो मॉ़डरेशन का इस्तेमाल क्यों नहीं करता...मेरा शुरू से मत रहा है कि जब तक मर्यादा की सीमा का उल्लंघन नहीं किया जाएगा मैं किसी भी टिप्पणी को डिलीट नहीं करूंगा...पोस्ट को छोड़कर अगर कोई व्यक्तिगत खुन्नस, ईर्ष्या की वजह से सिर्फ नापसंदगी के हथियार को इस्तेमाल करता है तो भी क्या वो आपकी नज़र में उचित है...मेरा मानना है कि पीठ के पीछे जो वार करता है वो या तो अपनी पहचान खुलने से डरता है या फिर वो कोई ऐसा भी हो सकता है, जो सामने से तो आपका शुभचिंतक बना रहे और अंदर से आपसे खार खाए...मेरा निवेदन यही है कि मेरा ब्लॉग हमेशा खुला है, जो कहना है मेरी पोस्ट पर आकर कहिए...मैं सारे सवालों के जवाब देने की कोशिश करूंगा...

    आख़िर में एक बात और, मैं हमेशा आपकी साफ़गोई का हमेशा कायल रहा हूं...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  40. श्रीमान जी प्रणाम, रमन शुक्ला फिर से हाज़िर हूं, भाई अब नियमित पाठक हु aapka तो ये पोस्ट भी padh डाली aur सारे टिप्पणियाँ भी कुछ लोगो ने खैर limit kya ki kintu socha भी ना की kahi अगर कोई avyask padh raha hoga to क्या sochega खैर मुझे "Udantastari" साहब की बात achhi लगी ... अब हाथी को हर bhaukte कुत्ते को ghudki नही Deni chahiye .. श्रीमान जी sarthakta की प्राप्ति का prayas करेन ऐसे nirarthak cheezon के piche अपना अमूल्य time न khoyen aayiye sabhi सिर्फ सचिन तेंडुलकर "से seekhe ki if u are a performer then always silence is better than anything else

    उत्तर देंहटाएं
  41. रमन भाई,
    एक पोस्ट मैंने लिखी थी कि मैदान में शोर मचाना दर्शकों का काम होता है, खिलाड़ी का नहीं...खिलाड़ी का काम होता है सिर्फ खेलना...

    लेकिन ये बात सिर्फ खेल के लिए लागू होती है...लेकिन जब कोई राजनीति करता है तो सचिन तेंदुलकर भी चुप नहीं बैठते...वो बाल ठाकरे को ही बता देते हैं कि जनाब मराठी होने पर बेशक मुझे गर्व है लेकिन पहले मैं भारतीय हूं और मुंबई पर हक हर भारतीय का है...
    सामने से आकर आप पर कोई वार करे तो आप अपना डिफेंस कर सकते हैं...लेकिन पीठ पीछे से कोई छुरा घोपे तो
    आप क्या कर सकते हैं...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  42. .
    .
    .
    आदरणीय खुशदीप जी,

    आपके उत्तर से जो मैं समझ पाया वह यह है कि जो भी पाठक नापसंदगी का इजहार करे वह यह बताये भी कि उसे पोस्ट नापसंद क्यों है... आदर्श स्थिति में यह होना भी चाहिये... But, What we are ? An imperfect species trying to survive in an imperfect & unjust world!... इसलिये जैसा चल रहा है उसमें भी कोई खराबी नहीं पाता... हम अपने आप को इतना सीरियसली लेते ही क्यों हैं दोस्त ?

    अब रही बात...

    "पोस्ट को छोड़कर अगर कोई व्यक्तिगत खुन्नस, ईर्ष्या की वजह से सिर्फ नापसंदगी के हथियार को इस्तेमाल करता है तो भी क्या वो आपकी नज़र में उचित है...मेरा मानना है कि पीठ के पीछे जो वार करता है वो या तो अपनी पहचान खुलने से डरता है या फिर वो कोई ऐसा भी हो सकता है, जो सामने से तो आपका शुभचिंतक बना रहे और अंदर से आपसे खार खाए..."

    अब यहाँ पर भी Benefit of Doubt हर हाल में नापसंद करने वाले पाठक को ही देना होगा... ब्लॉगवुड में हर तरह के नमूने बसते हैं, हर ब्लॉगर दरियादिल तो है नहीं... अधिकांश यही कहेंगे कि व्यक्तिगत खुन्नस, ईर्ष्या की वजह से नापसंदगी का हथियार उनके विरूद्ध इस्तेमाल हो रहा है ।

    पाठक के पास सबसे बड़ा हथियार है इग्नोर करना...अपना एक अनुभव बताता हूँ ब्लॉगवुड के एक वरिष्ठ ब्लॉगर ने एक तुकबंदी पोस्ट की... मोटा-मोटा अर्थ यह था कि सर्वोच्च सदन में सारे चोर और निकृष्ट ही भरे हैं... मैंने टिप्पणी दी कि संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिये... मॉडरेशन नहीं था... टिप्पणी छपी भी... पर देखता क्या हूँ कि १० मिनट के भीतर ही जनाब ने उसे हटा दिया... उस दिन के बाद से आजतक कभी गया नहीं उस ब्लॉग पर और न ही कभी जाउंगा... यही मेरा विरोध है।

    आभार!

    उत्तर देंहटाएं