शनिवार, 17 अप्रैल 2010

पिंजरा...खुशदीप

ये आप सब का प्यार ही था जो मुझे पहली कहानी...न हिन्दू, न मुसलमान, वो बस इनसान...लिखने का हौसला मिला था...आज फिर उसी दिशा में एक और प्रयास कर रहा हूं...पिंजरा शीर्षक से कहानी लिख कर...पसंद आए या न आए, स्नेह बनाए रखिएगा...



पिंजरा...

मल्लिका और बादशाह बाग़-ए-बहारा में टहल रहे थे...मौसम भी बड़ा दिलकश था...टहलते-टहलते मल्लिका की नज़र एक पेड़ की शाख पर बैठे बेहद खूबसूरत तोते पर पड़ी...इंद्रधनुषी रंगों से सज़ा ये तोता बड़ी मीठी बोली बोल रहा था...तोते पर मल्लिका का दिल आ गया...यहां तक कि मल्लिका बादशाह से बात करना भी भूल गई...तोते को एक टक देख रही मल्लिका के दिल की बात बादशाह समझ गए...बादशाह ने फौरन सिपहसालारों को हुक्म दिया- शाम तक ये तोता बेगम की आरामगाह के बाहर लगे झूले के पास होना चाहिए...और इस तोते के लिए बड़ा सा सोने का पिंजरा बनवाने का फौरन इंतज़ाम किया जाए...

एक बहेलिये की मदद से सिपहसालारों ने थोड़ी देर में ही तोते पर कब्ज़ा पा लिया...तोते को महल ला कर बेगम की आरामगाह में पहुंचा दिया गया...शाम तक सोने का पिंजरा भी लग गया...तीन-चार कारिंदों को ये देखने का हुक्म दिया गया, तोते को खाने में जो जो चीज़ें पसंद होती है, थोड़ी थोड़ी देर बाद उसके पिंजरे में पहुंचाई जाती रहें...तोते को पास देखकर मल्लिका की खुशी का तो ठिकाना नहीं रह गया...लेकिन तोते के दिल पर क्या गुज़र रही थी, इसकी सुध लेने की भला किसे फुरसत...कहां खुले आसमान में परवाज़, एक शाख से दूसरी शाख पर फुदकना...मीठी तान छेड़ना...और अब हर वक्त की कैद...आखिर इस मल्लिका और बादशाह का क्या बिगाड़ा था, जो ये आज़ादी के दुश्मन बन बैठे...मानता हूं, खाने के लिए सब कुछ है...लेकिन ऐसे खाने का क्या फायदा...मनचाही ज़िंदगी जीने की आज़ादी ही नहीं रही तो क्या मरना और क्या जीना...

तोते का गुस्सा बढ़ जाता तो पिंजरे की सलाखों से टक्करें मारना शुरू कर देता...शायद कोई सलाख टूट जाए और उसे वही आज़ादी मिल जाए. जिसके आगे दुनिया की कोई भी नेमत उसके लिए अच्छी नहीं...सलाखें तो क्या ही टूटने थीं, तोते के पर ज़रूर टूटने लगे थे...दिन बीतते गए तोता उदास-दर-उदास होता चला गया...तोते पर किसी को तरस नहीं आया...दिन-महीने-साल बीत गए...लेकिन तोते का पिंजरे से बाहर निकालने के लिए टक्करें मारना बंद नहीं हुआ...

एक बार मल्लिका बीमार पड़ गई...बादशाह आरामगाह में ही मल्लिका को देखने आए...मल्लिका को निहारते-निहारते ही बादशाह की नज़र अचानक तोते पर पड़ी...तोते को गुमसुम उदास देख बादशाह को अच्छा नहीं लगा...लेकिन उसने मल्लिका से कुछ कहा नहीं...मल्लिका को एक सयाने को दिखाया गया तो उसने बादशाह को सलाह दी कि किसी बेज़ुबान परिंदे को सताने की सज़ा मल्लिका को मिल रही है...इसलिए बादशाह हुज़ूर अच्छा यही है कि पिंजरे में कैद इस तोते को आज़ाद कर दिया जाए...

मल्लिका से जान से भी ज़्यादा मुहब्बत करने वाले बादशाह ने हुक्म दिया कि तोते को फौरन आज़ाद कर दिया जाए...हुक्म पर तामील हुई...तोते के पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया गया...ये देख तोते को आंखों पर भरोसा ही नहीं हुआ...भरोसा हुआ तो तोते ने पूरी ताकत लगाकर पिंजरे से बाहर उड़ान भरी...लेकिन ये क्या तोता फड़फड़ा कर थोड़ी दूर पर ही गिर गया...या तो वो उड़ना ही भूल गया था या फिर टूट टूट कर उसके परों में इतनी ताकत ही नहीं रही थी कि लंबी उड़ान भर सकें...

तोते की ये हालत देख उसे फिर पिंजरे में पहुंचा दिया गया...अब तोता शान्त था...फिर किसी ने उसे पिंज़रे से बाहर आने के लिए ज़ोर लगाते नहीं देखा...शायद इसी ज़िंदगी को तोते ने भी अपना मुस्तकबिल (नियति) मान लिया...


स्लॉग चिंतन...

हमारे पूर्वजों ने जान की कुर्बानी देकर हमें ये दिन दिखाया कि हम आज़ाद हवा में सांस ले सकें...इस आज़ादी की कीमत समझें...इसे यूं ही व्यर्थ न गवाएं...अब शारीरिक गुलामी का नहीं ज़ेहनी गुलामी का ख़तरा है...तरक्की के नाम पर नेता देश को मल्टीनेशन कंपनियों के आगे बेच देना चाहते हैं...याद रखिए कि अब अकेली ईस्ट इंडिया कंपनी नहीं, कई विदेशी कंपनियों की भारत पर गिद्ध नज़र है...कब तक हम ये ख़तरे भूल कर आईपीएल की रंगीनियों में डूबे रहेंगे...मुनाफ़े का बाज़ार काम करेगा, तिजोरियां विदेश में भरेंगी...और हमारे हाथ फिर खाली के खाली ही रहेंगे...

चलते चलते ये गीत भी सुन लीजिए...

स्लॉग गीत

पिंजरे के पंछी रे, तेरा दर्द न जाने कोए

फिल्म- नागमणि (1957)

21 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया याद दिलाया अपने खुशदीप भाई ! हम सब अपनी अच्छी चीजें भूल रहे हैं ...

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  2. खुशदीप जी कुछ समय पहले आपके ही ब्लॉग पर मैंने इसी तरह की बात कही थी की अपने घर का पैसे हम विदेशियों को दे रहे हैं इनकी चीज़ें खरीद कर....
    शारीरिक गुलामी से तो इंसान निकल जाता है लेकिन अगर मन ही गुलाम हो जाए तो उसका खुदा भी कुछ नहीं कर सकता...
    आपका प्रयास सराहनीय है...बहुत सुन्दर....

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  3. सुन्दर कथा!

    "शायद इसी ज़िंदगी को तोते ने भी अपना मुस्तकबिल (नियति) मान लिया..."

    यही तो अन्तर है इन्सान और पशु पक्षी में, इन्सान तो मानता है कि "सम्पन्नतायुक्त गुलामी से विपन्नतायुक्त स्वतन्त्रता बेहतर है (A bean in liberty is better than a comfit in prison.)।"

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  4. चिंतनीय कथा ....
    बहुत ही बढ़िया कहानी लिखी है खुश्दीप जी....आनंद आ गया ....

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  5. यह बात तो सही है भैया..... क़ैद में कोई नहीं रह सकता.... ना ही हम किसी को बाँध कर रख सकते हैं.... यही चीज़ रिश्तों में भी देखने को मिल जाती है.... ज्यादा किसी को बाँध कर रखो तो छटपटाहट तो होने ही लगती है..... आपकी यह कहानी बहुत अच्छी लगी.....


    जय हिंद...

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  6. खुशहाल जी तुस्सी अज खुश कित्ता जी, यही बात मै भी बार बार कहता हुं कि हम आज भी गुलाम है,दिमागी तॊर पर.... बस हम समझना ही नही चाहते.....क्योकि एक गुलाम अपने आप को वफ़ा दार कहलाना पसंद करता है, ओर समझता है, आज भी हम अपने देश बासी को नफ़रत से देखते है, ओर गोरो के तलबे भी चाटने को तेयार है....ओर इस का फ़ल भुगते गे हमारे बच्चे

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  7. बहुत बढ़िया कहानी...खुशदीप भाई...शारीरिक रूप से आज़ाद कर देने पर भी गुलामी की आदत उसे आज़ाद होने नहीं देती...

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  8. बहुत ही सुन्दर सन्देश देती कहानी……………॥बधाई।

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  9. आखिर हालात से सभी समझौता कर लेते हैं।
    विदेशी कंपनियों पर तो नज़र रखनी होगी।
    सही चिंतन।

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  10. काफी पहले स्कूल में एक कविता पढ़ी थी..हमेशा याद रहती है..कहानी को पढ़ कर याद आ गई...पर क्या करें सुनता कौन है..

    हम पंक्षी उनमुक्त गगन के,
    पिजंरबद्ध न गा पाएंगे
    कनक तीलियों से टकराकर
    पंख हमारे टूट जाएंगे
    हम बहता जल पीने वाला
    मर जाएंगे भूखे प्यासे

    जहां तक विदेशियों की बात है....आईपीएल तो खैर बैसे के ताकत पर कानून को ठेंगा दिखाने का सबसे बड़ा सबूत है आज की तारिख में..कितने हैं जो ईमानदारी से काम करते हैं..बस दूर बैठ कर संवेदना जताने की रस्म निभाते रहते हैं...

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  11. सब अच्छा अच्छा लिखा है, ग़र कोई " रात गयी बात गयी " फ़ेनॉमिना से बाहर आ सके ।
    गाना तो बहुत सटीक है, प्रदीप मेरे पसँदीदा गीतकार और गायक हैं ।

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  12. आज सुबह की यह मेरी पहली टिप्पणी है,
    और यह पोस्ट कहती है कि सवेरा अब होने को ही है ।
    आमीन !

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  13. देश की इस हालत का कारण शताब्दियों की गुलामी तो नहीं थी कहीं ...
    उड़ना भूलने के बाद या पंख काटने के बाद पंछी को खुला छोड़ देने से फायदा क्या ...
    का वर्षा जब कृषि सुखाने ...
    मगर इंसान और पक्षियों में यही फर्क है ...इंसान आखिरी दम तक कोशिश करता है ...

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  14. विचारणीय कथा...चिन्तन मांगती है स्लॉगओवर के परिपेक्ष में. बहुत बढ़िया.

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  15. हमने भी पिंजर में बन्‍द एक तोते को उड़ा दिया था लेकिन वो तो उड़ गया था। हाँ इतना जरूर हुआ कि जिन बुजुर्ग का तोता था वो बीमार पड़ गए, कि मेरा तोता कहाँ गया?

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  16. बहुत कुछ कह रही है तोते की कहानी और संदेश भी दे रही है।बहुत शानदार लिखा आपने,बधाई आपको।

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  17. kisi kaa sher yaad aayaa...



    ham huye aise bure waqt mein aazaad..ki bas...

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