ये भी एक दौर है, वो भी एक दौर था,
आज जहां है धोनी, वहां कल कोई और था...
पहले जब कभी जीतता था भारत,
देश रहता होली-दीवाली से सराबोर था...
आज क्रिकेट में जीतता है सिर्फ पैसा,
हर तरफ़ आईपीएल की रंगीनियों का शोर सा...
ये भी एक दौर है, वो भी एक दौर था...
रही ना पूरी अनपढ़ की अनपढ़...खुशदीप
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मक्खन अपनी कार के दो पहिये अचानक उतारने लग गया...
मक्खनी ने कहा...ये क्या कर रहे हो? कार के दो पहिये क्यों उतार रहे हो?
मक्खन...चुप कर ज़ाहिल औरत, रही ...






आज क्रिकेट में जीतता है सिर्फ पैसा
ReplyDelete---बात तो सही है लेकिन इससे नए खिलाड़ियों को उभरने का अवसर भी मिला है।
बेचैन आत्मा जी,
ReplyDeleteयही तो मैं कहना चाह रहा हूं कि पहले देश के लिए खेलना हर क्रिकेटर का सपना होता था...आज हर युवा क्रिकेटर का पहला सपना देश नहीं आईपीएल है...रात तीन-चार बजे तक विदेशों से मंगाई मॉ़डल्स के साथ पार्टियों में जश्न और शराब की मस्ती, ये रंग कौन सा भला कर रहे हैं हमारे युवा क्रिकेटरों का...ये सिर्फ उनकी जड़ों में मट्ठा देने के सिवा और कुछ नहीं है...
जय हिंद...
आज काम से कम दिखावे में लोग विश्वास रखते है...पैसा कमाना मुख्य उद्देश्य हो गया है..बाकी सब सेकेंडरी उद्देश्य....
ReplyDeleteपैसा और चकाचौंध ही आज दुनिया को पसंद आ रहा है !!
ReplyDeleteलोगों के टेस्ट बदल गए हैं भाई जी !
ReplyDeletesahi kaha ji
ReplyDeleteaaj sirf cricket paisa rah gaya h
bhawnaaye to gai paani me
wo bhi din the ki apni team ki haar ke baad khane ko bhi dil nhi karta tha
aur aaj halaat ye h ki sachin ko balling ishant sharma kar raha h
kya fark padta h kaun jeet raha h
खुशदीप भाई!
ReplyDeleteक्या यह खेल है? बिलकुल नहीं। यह मनोरंजन उद्योग है जुआ, सट्टा, लाटरी और कैसीनो जैसा।
बिल्कुल सही कहा………वक्त बहुत तेज़ी से बदलता है मगर इन्सान उसकी गति तो कोई नही जान सकता।
ReplyDeleteकभी इंसानियत के लिये सिर कटाते थे लोग
आज पैसे के लिये काट देते हैं लोग
पैसा जो न करवाये!
ReplyDeleteअजी सच तो यही है.
ReplyDeleteसब पैसे का खेल रह गया है।
ReplyDeleteलेकिन सभी खुश हैं।
"पहले जब कभी जीतता था - भारत,
ReplyDeleteदेश रहता होली-दीवाली-सा, सराबोर था..."
वो भी एक दौर था......ये भी एक दौर है......
और इस पर क्या कहेंगे??? ......"मै बारिश कर दूँ पैसे
की......जो तू हो जाए मेरी...."
सबसे पहले तो यह शिकायत आपसे की एक संभावित उम्दा पोस्ट का आपने गुड गोबर कर दिया ... यह खेल दिल में मेरे उतर ही नहीं रहा... मैंने इसका आज तक एक भी मैच नहीं देखा है.... यहाँ ज़रूर कोई घालमेल है मुझे लगता है की मीडिया भी शायद पेड़ न्यूज़ दिखा रहा है... पैसे ने अच्छे अछे को खरीद लिया है.. ये कैसा खेल है लगता है हम मुजरा देख रहे है.... लोग बिअर पीते हैं, नाच देखते हैं... खेल होता है... स्क्रीन पर खेल के दौरान विज्ञापन पोप अप हो जाता है...
ReplyDeleteमुझे पियूष मिश्र का लिखा याद आता है
आज के जलसों में गूंगा गा रहा
और बहरों का रेला नाचता चिल्ला रहा
हाँ शिकायत तो रह ही गयी... आप बांध कर नहीं लिखे इसलिए ... शायद समय की कमी हो, नेट स्लो हो या जो भी कारण हो ... यहाँ से मुझे ऐसी ही उम्मीदें रहती हैं... पर आप लिखते तो जबरदस्त प्रवाह होता, कुछ जानकारी होती, कुछ राय और बेहतर आ चुके होते.
ReplyDeleteChhee chhee gandee tasveeren bhaia.. ;)
ReplyDeletekavita achchhi likhi
यह क्रिकेट है बाबू खेल पैसो का और अब तो ............आनन्दम आनन्दम .
ReplyDeleteबहुत साल पहले जब क्रिकेट लोकप्रिय हुआ था तब भी यही कुछ कारण थे याद किजिये बेंसन एंड हेजेज कप जो आस्ट्रेलिया मे हुआ था और सुबह ३ या ४ बजे से टी.वी पर लाइव आता था . तब क्रिकेट से ज्यादा वहा बिकनी पहनी लडकिया दिखती थी और उस समय भारत मे लिरिल का विग्यापन देखने मे भी शर्म आती थी परिवार के साथ बैठ कर .
अब तो यह सब आम है अब २१ वी सदी मे यह नही होगा तो क्या कयामत के बाद होगा
बहुत सही कहा है आपने..अब वो चार्म जाता रहा.....पहले वाली बात नहीं रही...इसीलिए नयी पीढ़ी क्रिकेट की बजाय फ़ुटबाल की दीवानी होती जा रही है..MNU..Chelsi..Arsenal.बच्चे बस उसकी ही बातें करते हैं
ReplyDeleteवैसे इससे खेल का मजा तो जाता ही रहा है....पर एक बात सच है देखना कई चाहते हैं पर चुपके चुपके..वरना क्या बात थी जो चीर्यस लीडर कहती हैं कि जवान तो छो़ड़िए बच्चे औऱ बूढ़े भी कम बदतमीजी नहीं करते....हमारी फितरत ही कमीनी है....दूसरे देश में आम है. हमारे यहां अश्ललीलता है....पर हमारे समाज के अधिकतर लोगो की कथनी औऱ करनी .....सब जानते हैं.
ReplyDeleteक्रिकेट के नाम पर तमाशा ....धन्ना सेठों के मन बहलाव का साधन ...
ReplyDeleteये भी एक दौर है ...
ऐसे में भी जनता भारत रत्न देने की मांग करती है।
ReplyDeleteपहले क्रिकेट एक खेल था और अब एक बीमारी....
ReplyDeleteऔर जैसी बीमारी खुशदीप जी दिखा रहे हैं.....कहना पड़ेगा ...जो रोगी को भावे सो वैद्य बतावे....
ऐसा नहीं है कि आज के क्रिकेटरों में खेल भावना और देश प्रेम नहीं रह गया है आपने शायद क्वार्टर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया से जीतने के बाद युवराज का रियेक्शन नहीं देखा...........
ReplyDeleteहां ये भी सही है कि पहले के खिलाड़ियों की तुलना में आज के खिलाड़ियों में पैसा और पोजिशन ज्यादा हावी हो गया है लेकिन येसा भी नहीं है कि उनमें खेल के प्रति समर्पण की भावना नहीं बची है..........