बुधवार, 14 अप्रैल 2010

ईश्वर आपके लिए क्या करे ?...खुशदीप

ईश्वर आपके लिए क्या करे ?...यही था वो टॉपिक जिस पर बुज़ुर्गो के कल्याण के लिए काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ने शहर में रहने वाले बुज़ुर्गों से उनके विचार मांगे...कई बुज़ुर्गों ने अपने विचार भेजे...पांच श्रेष्ठ विचारों को छांट कर उनमें से सर्वोत्तम छांटने के लिए शहर की कुछ जानीमानी हस्तियों को बुलाया गया...उनमें शहर के एक बहुत बड़े कारोबारी भी थे...बड़ी मुश्किल से इस कार्यक्रम के लिए वो वक्त निकाल कर आए थे...टाइप की गई पांच कॉपियों में से आखिरकार सर्वश्रेष्ठ विचार ये चुना गया...

ईश्वर, आज मैं आपसे बहुत खास मांगने जा रहा हूं...हो सके तो मुझे टेलीविजन बना दीजिए...मैं उसकी जगह लेना चाहता हूं...उसी की तरह घर में जीना चाहता हूं...सबसे अहम स्थान पर मैं बैठा रहा हूं और सारा परिवार मेरे इर्द-गिर्द रहे...मैं जब बोलूं तो सब मुझे गंभीरता से सुनें...मैं ही सबके आकर्षण का केंद्र रहूं और बिना कोई रोक-टोक या किसी के सवाल किए अपनी बात कहता रहूं...जब मैं किसी वजह से काम करना बंद कर दूं तो मुझे वैसी ही देखभाल मिले जैसे कि टीवी के काम बंद कर देने पर उसे मिलती है...फौरन उसकी नब्ज़ देखने के लिए मैकेनिक (या डॉक्टर) बुलाया जाता है या उसे ही रिपेयर शॉप (नर्सिंग होम) भेज दिया जाता है...मेरा बेटा काम से थक-टूट कर आने के बाद भी जिस तरह टीवी को कंपनी देना नहीं भूलता, वैसे ही मुझे भी दे...मुझे टीवी की तरह ही लगे कि मेरा परिवार कभी कभी मेरे लिए अपने और सब ज़रूरी काम भी छोड़ सकता है...और सबसे बड़ी बात...मुझे लगे कि मैं अपनी बातो से अपनों को खुश रख सकता हूं, उनका दिल बहला सकता हूं...

आभार गूगल


 
 सर्वश्रेष्ठ विचार किस बुज़ुर्ग ने भेजा था, ये जानने के लिए आयोजकों ने लिस्ट से नंबर के अनुसार बुज़ुर्ग का नाम और पता पढ़ा...

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अब चौंकने की बारी शहर के बड़े कारोबारी की थी...नाम और पता, उसके पिता और खुद के घर का था...


28 टिप्‍पणियां:

  1. Ise hi deep tale andhera kahte hain shayad bade bhaia..
    'jise hans samajhte rahe doston wahi hai kaua nikla..
    jo lagate the sharab virodhi naare unhin ki jeb se pauwa nikla..'

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  2. main bhi yahi kahne waali thi jo Dipak ne kaha DEEPAK TALE HI ANDHERA hota hai...pahle apna ghar vyavsthi kiya jaay fir auron ka...'CHARITY BEGINS AT HOME'.

    hamesha ki tarah dhoowaandhaar pravishthi..
    badhaii....

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  3. वैसे हर घर की यही कहानी है।
    उम्दा पोस्ट।
    सामाजिक सरोकार और पत्रकारीय नज़र वाली ब्लागरी में आपकी शैली अनूठी है खुशदीप। बहुत बधाई....

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  4. मार्मिक
    शायद हम सब जानते हुए वही करते जाते हैं
    रिश्तो के सरोकार विचलित होते जा रहे हैं
    सुन्दर और निर्बाध रचना

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  5. हर बुजुर्ग यही अहसास रहा होगा..कितनी मिलती जुलती रही होंगी सभी की कापियाँ.

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  6. खुशदीप भाई हर दिन पोस्ट लिखना और हर दिन उसमें कुछ न कुछ कह जाना सबके बस की बात नहीं होती । आपकी इस पोस्ट ने बहुत कुछ कह दिया है । आज हालात यही होते जा रहे हैं ।

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  7. बहुत ही दिल को छूती हुई पोस्ट. आजकल रिश्तों में दूरियां बढ़ रही है.

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  8. वर्तमान सामाजिक परित्स्थियों में ऐसे चौंकने के अवसर मिलते रहते हैं ...
    सामाजिक सरोकार के प्रति आपका समर्पण उल्लेखनीय है ...!!

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  9. बुजुर्गवार को ऐसा ही महत्व प्राप्त था। बस अब एकल परिवारों में समस्या हो चली है।

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  10. यही हाल है कुछ लोग ही है जो शहर की चकाचौंध में अपने माँ-बाप के साथ पर्याप्त समय दे पाते है..बाकी तो सब औपचारिकता ही करते रहते है....बहुत बढ़िया आलेख...धन्यवाद खुशदीप भाई

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  11. बहुत सही लिखा है । बुजुर्गों को बस थोडा सा प्यार और अटेंशन चाहिए , जो आजकल की भाग दोड़ की जिंदगी में बच्चे दे नहीं पाते । हालाँकि समय अनुसार यह करना वास्तव में बड़ा मुश्किल काम है ।
    लेकिन मुश्किलों से घबराकर न करना भी तो सही नहीं ।

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  12. आने वाले समय मे टी.वी. भी उठाकर फ़ेंक दिए जाएंगे........आज माता-पिता अपने बच्चों के लिए समय नही निकाल पाते तो भविष्य मे ये बच्चे ......

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  13. समाज सेवा की ओर कदम बढाने से पहले अपने घरों में भी झांक लेना चाहिए .. कहीं वहीं तो आपकी सबसे अधिक जरूरत नहीं !!

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  14. इस पोस्ट से बुजुर्गों के मन की वेदना चित्रित कर दी....अच्छी पोस्ट

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  15. बहुत सटीकता से बात कही है.

    रामराम.

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  16. प्रेरक...शहरों में परिवार के सदस्यों विशेषकर बुजुर्गों से बढ़ रही दूरियों की ओर ध्यान दिलाती कहानी.

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  17. एकदम अलग तरह की पोस्ट होती है आपकी. अलग और अनूठी. बधाई.

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  18. सच मे दिया तले अंधेरा ही है.

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  19. लाजवाब पोस्ट .......आज के समय का सबसे बड़ा सच है .

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  20. खुशदीप जी ...आपकी बात सही है कि आज के ज़माने में हमारे युवाओं और बुजुर्गों में आपसी ताल-मेल और सोहाद्र की काफी कमी है....बुज़ुर्ग चाहते हैं कि बच्चे उनके कहानुसार चलें....उनके लिए समय दें और बच्चे हैं कि उन्हें इस बेफिजूल के काम के लिए वक्त को खर्च करना बिकुल भी गवारा नहीं
    यहाँ बात आ जाती है जेनरेशन गैप कि...बुज़ुर्ग अपने बच्चों को अपनी तरह से..अपने मनमुताबिक...अपनी इच्छा से निर्धारित दिशा में..आँखों पर पट्टी बाँध कर हांकना चाहते हैं और आज के युवा हैं कि वो खुले दिमागे से ...स्वच्छंद हो के बिना किसी मोह-माया या बंधन के खुले गगन में स्वछन्द हो के विचरण करना चाहते हैं...
    अगर हमारे बुज़ुर्ग भी ये सोच के थोडा-बहुत समझौता कर लें कि वक्त के साथ-साथ बदलते ज़माने में उन्हें भी थोड़ा-बहुत अपने आपको बदलना होगा...तो मेरे ख्याल से ऐसी नौबत आए ही नहीं कि हमारे बुज़ुर्ग अपने बच्चों के साथ के लिए तरसें ...
    ये नहीं है कि आज के युवा ये नहीं जानते हैं कि आज वो जो फसल बो रहे हैं...कल को वही उन्हें काटनी भी पड़ेगी ...दरअसल हर नस्ल यही सब अपने बुजुर्गों के साथ होते और करते हुए देखती आई है और अनजाने में खुद(अपने भविष्य से अनजान)उसी नक्शे कदम पर चल रही है

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  21. इस सवाल से सब वाकिफ हैं....पर सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर सब जानते हुए भी लोग इस कुछ करते क्यों नहीं..

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  22. BAHUT SATIK BAT


    WAQAY ME

    सच मे दिया तले अंधेरा ही है
    .लाजवाब पोस्ट .......आज के समय का सबसे बड़ा सच है .


    SHEKHAR KUMAWAT

    http://kavyawani.blogspot.com/

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