खुशदीप सहगल
बंदा 1994 से कलम-कंप्यूटर तोड़ रहा है

सभी टंकी प्रेमियों के लिए पढ़ना ज़रूरी...खुशदीप

Posted on
  • Tuesday, April 13, 2010
  • by
  • Khushdeep Sehgal
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  • सुप्रभात...

    अगर लोग आपकी टांग खिंचाई करते हैं, आपको आहत करते हैं, या आप पर चिल्लाते हैं, परेशान मत होइए...

    बस इतना याद रखिए...हर खेल में शोर दर्शक मचाते हैं, खिलाड़ी नहीं...



    आपका दिन शुभ हो...

    29 comments:

    1. जी
      सही कहा
      खिलाडी का खेल
      दर्शको की कतरर्ब्यौं पर आधारित नही होता

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    2. vaah!
      kya baat kahi hai.
      javab nahi aapaka.

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    3. खिलाड़ी शोर मचाये तो कैसे खिलाड़ी ?

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    4. लोग खिंचाई तो नहीं कर पाते, टांग मैं उनकी तोड़ चुका हूं..फिर मेरी क्या हुआ..खिलाड़ी और दर्शक मिक्स..

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    5. बेईमान खिलाड़ी ही शोर मचाएगा।
      वैसे शतरंज के अलावा बाकी खेलों में शोर मचाया जा सकता है....दोनो ओर से :)

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    6. खिलाड़ी शोर तो नहीं मचा रहे..लेकिन खेलते खलते धीरे से टंगड़ी मार देते हैं सर, इसीलिये दर्शक हल्ला मचा रहे हैं. :)

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    7. अनाड़ी का खेलना खेल का सत्यानाश
      पटरी हो अजीब तो रेल का सत्यानाश
      हाँ नहीं तो...!!

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    8. खिलाड़ी भी शोर मचाता है जब अपील करना होता है

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    9. शोर भी कुछ ही दर्शक मचाते हैं, सब नहीं। और बिना शोर के मैच का आनंद कहाँ।

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    10. शोर मचा लो लेकिन टेंशन नहीं लेना का।

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    11. भाई खिलाडी फ़ाऊल खेल खेले तो दर्शक अपनी टीम के पक्ष मे जरुर चिल्लायेंगे. और हद तो तब होती है जब रेफ़री टंगडी मारने वाले को पीला/ लाल कार्ड नही दिखाता.

      रामराम.

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    12. क्या यार ...खुशदीप भाई !
      इत्ती सी बात लोग नहीं समझ सके ....एक लाइन में पूरा लेख लिख दिया शायद भावुक दिलों को कुछ सहारा मिले

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    13. आपकी बात सही है लेकिन खिलाड़ी बेचारा भी आखिर एक इंसान ही है ...वो कब तक व्यक्तिगत आक्षेप झेल पाता है?...ये उसके स्टेमिना पर निर्भर करता है ...दर्शकों को भी चाहिए कि वो उसके खेल पर ...खेलने के तरीके पर प्रतिक्रिया व्यक्त करें ..ना कि उस पर व्यक्तिगत आक्षेप...लाँछन लगा कर उसके बढते हौंसले को ध्वस्त करने का इंतजाम करें

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    14. खुशदीप भाई , अभी अभी लौटा हूँ तो बात की गहराई समझने में थोड़ी देर लगनी लाजमी है !
      पर फिर भी कहुगा कि आप ने सही कहा,"हर खेल में शोर दर्शक मचाते हैं, खिलाड़ी नहीं"

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    15. @राजीव तनेजा भाई,
      सचिन तेंदुलकर भी खिलाड़ी है न, जब वो बेचारा आलोचनाओं से नहीं बच सका तो बाकी की तो बिसात ही क्या...लेकिन सचिन की गाथा जारी है...बिना विचलित हुए...बिना डिगे...हां, ये ज़रूर है कि

      हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है,
      तब जाकर होता है दीदावरे-चमन पैदा...

      (शेर पता नहीं ठीक से लिखा है या नहीं)

      जय हिंद...

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    16. छोटी पर सार्थक पोस्ट ...

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    17. gahri baat hai pareshaan n hona kisi aisi baat par bahut mushkil hai

      achchi baat kahi hai

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    18. जिस खेल में दर्शकों का शोर न हो , वो खेल भी क्या ।
      अभी तो खेल का आनंद लीजिये ।

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    19. अच्छी पोस्ट...

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    20. सही कह रहे हैं खुशदीप भाई.

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    21. टंकी खुशी का प्रतीक।

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    22. छोटी है पर घाव गंभीर करने का दम रखती है।

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    23. लाख टके की बात ..बस समझने वाले समझ लें इसे तो ही
      अजय कुमार झा

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    24. खतरों के खिलाड़ी!

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