सुप्रभात...
अगर लोग आपकी टांग खिंचाई करते हैं, आपको आहत करते हैं, या आप पर चिल्लाते हैं, परेशान मत होइए...
बस इतना याद रखिए...हर खेल में शोर दर्शक मचाते हैं, खिलाड़ी नहीं...
आपका दिन शुभ हो...
रही ना पूरी अनपढ़ की अनपढ़...खुशदीप
-
मक्खन अपनी कार के दो पहिये अचानक उतारने लग गया...
मक्खनी ने कहा...ये क्या कर रहे हो? कार के दो पहिये क्यों उतार रहे हो?
मक्खन...चुप कर ज़ाहिल औरत, रही ...





जी
ReplyDeleteसही कहा
खिलाडी का खेल
दर्शको की कतरर्ब्यौं पर आधारित नही होता
vaah!
ReplyDeletekya baat kahi hai.
javab nahi aapaka.
खिलाड़ी शोर मचाये तो कैसे खिलाड़ी ?
ReplyDeleteलोग खिंचाई तो नहीं कर पाते, टांग मैं उनकी तोड़ चुका हूं..फिर मेरी क्या हुआ..खिलाड़ी और दर्शक मिक्स..
ReplyDeleteबेईमान खिलाड़ी ही शोर मचाएगा।
ReplyDeleteवैसे शतरंज के अलावा बाकी खेलों में शोर मचाया जा सकता है....दोनो ओर से :)
खिलाड़ी शोर तो नहीं मचा रहे..लेकिन खेलते खलते धीरे से टंगड़ी मार देते हैं सर, इसीलिये दर्शक हल्ला मचा रहे हैं. :)
ReplyDeleteअनाड़ी का खेलना खेल का सत्यानाश
ReplyDeleteपटरी हो अजीब तो रेल का सत्यानाश
हाँ नहीं तो...!!
खिलाड़ी भी शोर मचाता है जब अपील करना होता है
ReplyDeletenice
ReplyDeletevaah!
ReplyDeletekya baat kahi hai.
शोर भी कुछ ही दर्शक मचाते हैं, सब नहीं। और बिना शोर के मैच का आनंद कहाँ।
ReplyDeleteवाह !!
ReplyDeleteशोर मचा लो लेकिन टेंशन नहीं लेना का।
ReplyDeleteभाई खिलाडी फ़ाऊल खेल खेले तो दर्शक अपनी टीम के पक्ष मे जरुर चिल्लायेंगे. और हद तो तब होती है जब रेफ़री टंगडी मारने वाले को पीला/ लाल कार्ड नही दिखाता.
ReplyDeleteरामराम.
बहुत ही बढ़िया जनाब!
ReplyDeleteक्या यार ...खुशदीप भाई !
ReplyDeleteइत्ती सी बात लोग नहीं समझ सके ....एक लाइन में पूरा लेख लिख दिया शायद भावुक दिलों को कुछ सहारा मिले
आपकी बात सही है लेकिन खिलाड़ी बेचारा भी आखिर एक इंसान ही है ...वो कब तक व्यक्तिगत आक्षेप झेल पाता है?...ये उसके स्टेमिना पर निर्भर करता है ...दर्शकों को भी चाहिए कि वो उसके खेल पर ...खेलने के तरीके पर प्रतिक्रिया व्यक्त करें ..ना कि उस पर व्यक्तिगत आक्षेप...लाँछन लगा कर उसके बढते हौंसले को ध्वस्त करने का इंतजाम करें
ReplyDeleteसही कहा
ReplyDeleteखुशदीप भाई , अभी अभी लौटा हूँ तो बात की गहराई समझने में थोड़ी देर लगनी लाजमी है !
ReplyDeleteपर फिर भी कहुगा कि आप ने सही कहा,"हर खेल में शोर दर्शक मचाते हैं, खिलाड़ी नहीं"
@राजीव तनेजा भाई,
ReplyDeleteसचिन तेंदुलकर भी खिलाड़ी है न, जब वो बेचारा आलोचनाओं से नहीं बच सका तो बाकी की तो बिसात ही क्या...लेकिन सचिन की गाथा जारी है...बिना विचलित हुए...बिना डिगे...हां, ये ज़रूर है कि
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है,
तब जाकर होता है दीदावरे-चमन पैदा...
(शेर पता नहीं ठीक से लिखा है या नहीं)
जय हिंद...
छोटी पर सार्थक पोस्ट ...
ReplyDeletegahri baat hai pareshaan n hona kisi aisi baat par bahut mushkil hai
ReplyDeleteachchi baat kahi hai
जिस खेल में दर्शकों का शोर न हो , वो खेल भी क्या ।
ReplyDeleteअभी तो खेल का आनंद लीजिये ।
अच्छी पोस्ट...
ReplyDeleteसही कह रहे हैं खुशदीप भाई.
ReplyDeleteटंकी खुशी का प्रतीक।
ReplyDeleteछोटी है पर घाव गंभीर करने का दम रखती है।
ReplyDeleteलाख टके की बात ..बस समझने वाले समझ लें इसे तो ही
ReplyDeleteअजय कुमार झा
खतरों के खिलाड़ी!
ReplyDelete