रविवार, 11 अप्रैल 2010

न हिंदू, न मुसलमान...वो बस इनसान...खुशदीप

दो-तीन दिन पहले सतीश सक्सेना भाई ने देश की गंगा जमुनी तहज़ीब का हवाला देते हुए पोस्ट लिखी थी...साथ ही कौमी सौहार्द की मुहिम में साथ देने की अपील भी की थी...बहुत सोचा, सतीश भाई का किस तरह साथ दूं...यही सोचते-सोचते एक कहानी ने मेरे दिमाग में जन्म लिया...ज़िंदगी में पहली बार कहानी लिखी है...कोई कमी-पेशी हो तो अनाड़ी समझ कर माफ़ कर दीजिएगा...और अगर मुझे कहीं दुरूस्त कराने की ज़रूरत हो तो ज़रूर कीजिएगा...


कथा परिचय

मुखर्जी साहब बैंक के बड़े मैनेजर...बरसों से रहीम मियां मुखर्जी साहब के घर पर ड्राइवरी करते आ रहे थे...मुखर्जी साहब का बेटा सुदीप्तो तो अपने रहीम काका से इतना घुला-मिला था कि स्कूल जाने से पहले तैयार होने में मदद लेने से लेकर दूध भी उन्हीं के हाथों पीता था...सुदीप्तो ग्यारह साल का ज़रूर हो गया था लेकिन होश संभालने के बाद से ही रहीम काका को हर दम आंखों के सामने ही देखता आया था...उनके साथ खेलता...रोज़ नई कहानियां सुनता...या यूँ कहें कि रहीम काका को देखे बिना उसे चैन ही नहीं आता था...रहीम दिन भर मुखर्जी साहब के घर रहते बस रात को ही अपने घर सोने जाते...ये भी अच्छा था कि रहीम जिस अकबर टोला नाम के मोहल्ले में रहते थे, वो मुखर्जी साहब की कॉलोनी कालीबाड़ी के साथ ही सटा हुआ था...पैदल का ही रास्ता था...सुदीप्तो के एक-दो बार जिद पकड़ने पर कि रहीम काका का घर देखना है, रहीम उसे मोहल्ले में लेकर जाकर बाहर से ही अपना घर दिखा लाए थे...घर के अंदर की बदहाली को जानते हुए रहीम की सुदीप्तो को घर ले जाने की हिम्मत नहीं हुई थी...

दृश्य 1

मुखर्जी साहब को क्लोजिंग के चलते आज बैंक जल्दी निकलना है...रहीम गाड़ी पर कपड़ा मार रहे हैं...मुखर्जी साहब तेज़ी से निकलते हैं और रहीम से कहते हैं...रहीम मियां, शहर की फिज़ा बहुत ख़राब चल रही है...ये मंदिर-मस्जिद के विवाद में कब क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता...तुम ऐसा करो, ये दो हज़ार रुपये रख लो और दस-पंद्रह दिन की छुट्टी लेकर घर पर ही रहो...मैं नहीं चाहता कि तुम किसी परेशानी में पड़ो...मेरी फिक्र मत करो मैं आफिस के ड्राइवर रमेश को बुला लूँगा या खुद ही गाड़ी ड्राइव करके काम चला लूंगा...जब माहौल ठंडा हो जाएगा, तब ड्यूटी पर आ जाना...रहीम के मुंह से इतना ही निकल सका...जी साहब...रहीम की आंखों में सुदीप्तो का ही चेहरा घूम रहा था...दस-पंद्रह दिन सुदीप्तो क्या करेगा...और खुद उनका दिन भी कैसे बीतेगा...ये तो अच्छा है कि सुदीप्तो दो दिन के लिए नानी के घर गया हुआ है...नहीं तो रहीम का मुखर्जी साहब के घर से जाना ही मुश्किल होता...रहीम भारी मन से अपने घर की ओर चल दिए...


दृश्य 2

दो दिन हो गए रहीम को ड्यूटी पर नहीं गए हुए...खाली दिन भर घर बैठना मुश्किल हो गया...रहीम गली के नुक्कड़ पर जान मोहम्मद की चाय की दुकान पर जाकर बैठ गए...वहां मज़हब को खतरे की दुहाई देते हुए मोहल्ले का छुटभैया नेता चार पांच लोगों को बैठा देख ज़ोरदार तकरीर झाड़ रहा था...हाथ पर हाथ रखे बैठे रखने से कुछ नहीं होगा...अपनी हिफ़ाजत का इंतज़ाम खुद ही करना होगा...ये पुलिस भी उन्हीं की है और कलेक्टर भी...कर्फ़्यू लगा तो हमारे मोहल्ले में ही सबसे ज़्यादा सख्ती बरती जाएगी...बॉर्डर (अकबर टोला और कालीबाड़ी को जोड़ने वाला नाका) के उस पार उन्हें सारी छूट रहेगी और हमारे बच्चे दूध को भी तरस जाएंगे...इन बातों को सुन रहीम के मुंह से इतना ही निकला...या मेरे मौला, रहम कर...तब तक जान मोहम्मद ने चाय का गिलास रहीम के आगे कर दिया...साथ ही बोला...क्यों बड़े मियां...ड्यूटी पर नहीं जा रहे हो ?...बड़ी बातें करते थे अपने साहब की नेकदिली की, देख लिया सब धरी रह गई...आखिर है तो वो हिन्दू ही न...कर दी न छुट्टी ड्यूटी से...रहीम ने सोचा...अब इस अक्ल के अंधे को क्या जवाब दूं...दिन भर दुकान पर फिरकापरस्ती की बातें सुन-सुन कर इसकी आंखों पर भी पट्टी पड़ गई है..


दृश्य 3

मुखर्जी साहब के घर पूजा हो रही है...सुदीप्तो का आज जन्मदिन जो है...पारंपरिक धोती-कुर्ते में सजा सुदीप्तो पूजा में बैठा तो था लेकिन उसकी आंखें चारों तरफ़ अपने रहीम काका को ही ढूंढ रही थीं...नानी के घर से आने के बाद पापा से कई बार रहीम काका के बारे में पूछ भी चुका था...हर बार यही जवाब मिलता...रहीम काका की तबीयत ठीक नहीं है...दो-चार दिन में ठीक होने के बाद आ जाएंगे...लेकिन जन्मदिन पर रह-रह कर सुदीप्तो को रहीम काका की याद ही आ रही थी...सोच रहा था, शाम को दोस्तों के लिए घर को कौन सजाएगा...गुब्बारे कौन लगाएगा...पापा के जाने के बाद सुदीप्तो घर के बरामदे में आकर बैठ गया...फिर उसे न जाने क्या सूझा...मम्मी को आवाज दी...मम्मा मैं अपने दोस्त भुवन के घर साथ में जा रहा हूं...अभी आ जाऊंगा...ये कहकर सुदीप्तो घर से निकल पड़ा...उसके कदम खुद-ब-खुद अकबर टोला में रहीम काका के घर की ओर बढ़ चले...देखकर आता हूं रहीम काका की क्या हालत है...कालीबाडी के मोड़ पर पहुंच कर सुदीप्तो को समझ नहीं आया कि इतनी पुलिस क्यों खड़ी है यहां...मोड़ पर आते जाते लोगों को हड़का रहे पुलिसवालों की नजर सुदीप्तो पर नहीं पड़ी...



दृश्य 4

नन्हा सुदीप्तो अकबर टोला में जान मोहम्मद की चाय की दुकान तक पहुंच गया...आते जाते लोग सुदीप्तो के धोती-कुर्ते और माथे पर तिलक को अजीब निगाहों से देख रहे थे...जैसे कोई दूसरी दुनिया का बच्चा मोहल्ले में आ गया हो...रहीम जान मोहम्मद की दुकान पर ही थे लेकिन उनका ध्यान अखबार पढ़ने पर था...उनका अखबार से ध्यान छुटभैये नेता की ये आवाज़ सुनकर ही हटा...देखो, बार्डर पार वालों की चालाकी...अब बच्चों को भी हमारी टोह लेने के लिए भेजने लगे हैं...आखिर है तो सपोला ही, मैं तो कह रहा हूं इसे ही ऐसा सबक सिखाओ कि वो हमेशा के लिए याद करे...ये सुनकर रहीम देखने की कोशिश करने लगे कि अचानक ये किस बच्चे की बात करने लगे...रहीम की नज़र सुदीप्तो पर पड़ी, उनके मुंह से निकल पड़ा...सुदीप्तो...ये यहां कैसे आ गया...ओ मेरे परवरदिगार हिफ़ाज़त कर मेरे बच्चे की...न जाने कहां से रहीम के बूढ़े शरीर में बिजली जैसी तेज़ी आ गई...इससे पहले कि छुटभैया नेता अपने दूसरे प्यादों के साथ सुदीप्तो के पास पहुंचता कि रहीम ने झट से जाकर सुदीप्तो को गले से चिपका लिया...मेरे बच्चे तू यहां कहां से आ गया...तब तक छुटभैया नेता भी वहां आ गया...और गरज कर बोला...रहीम मियां आप पीछे हट जाओ...इसे हमारे हवाले करो...हम भी तो जाने कि ये किस मकसद से यहां आया है...दो चार पड़ेंगे तो अभी तोते की तरह बोलने लगेगा...ये सुनकर रहीम ने सुदीप्तो को और ज़ोर से अपने से चिपका लिया...और पूरी ताकत लगा कर बोले...अरे अक्ल के मारों....शर्म करो...एक छोटे से बच्चे के लिए ऐसी बातें करते हो...ज़हर भर चुका है तुम्हारे दिमाग में...ये मेरा ज़िगर का टुकड़ा है...इसे कोई हाथ तो लगा कर देखे...मेरी लाश से गुज़र कर ही इस बच्चे को छू सकोगे...सुदीप्तो ये देखकर थर्रथर्र कांप रहा था और खुद को रहीम काका के पीछे छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगा...रहीम मियां का ये रूप देखकर छुटभैया नेता पैर पटकता और बड़बड़ाता हुआ जान मोहम्मद की दुकान की ओर लौट गया...और किसी को क्या इल्ज़ाम दे, जब तक ऐसे गद्दार हैं कौम का कुछ नहीं हो सकता...रहीम तेज़ी से सुदीप्तो को घर छोड़ने के लिए कालीबाड़ी की ओर बढ़ चले...


दृश्य 5

रहीम नाके पर सुदीप्तो को लेकर पहुंच गए...एक पुलिस वाले ने रौबदार आवाज़ में पूछा...क्यों मियां जी कहां चल दिए...और ये हिंदू बच्चे को लेकर कहां से आ रहे हो...रहीम इतना ही बोल सके...दारोगा जी, ये मेरे साहब का बच्चा है, गलती से इधर आ गया...इसे घर छोड़ने जा रहा हूं...पुलिसवाला--मियाँ जी, माहौल बड़ा खराब है...बच्चे को छोड़कर जल्दी वापस आओ...रहीम--साहब बस मैं झट से आया....रहीम नाके से निकल कर दो गलियों के बाद मंदिर वाले मोड़ पर पहुंचे ही थे कि अचानक शोर उठा...देखो...देखो...ये दढ़ियल हमारे बच्चे को लेकर कहां जा रहा है...मारो... मारो...रहीम इससे पहले कि कुछ बोल पाते कि शोर मचाने वालों में से एक ने सुदीप्तो को रहीम से छीन कर अलग कर लिया...रहीम रोकते ही रह गए और सुदीप्तो... काका, काका चिल्लाते ही रह गया...चारों तरफ़ से रहीम के बूढ़े शरीर पर लात-घूंसों की बरसात होने लगी...बूढा शरीर कब तक मार खाता...निढाल होकर वहीं सड़क पर गिर गया...अपनी बाजुओं की ताकत दिखाने वाले सुदीप्तो को वहां से लेकर चले गए...

सड़क पर गठरी की शक्ल में एक इनसान पड़ा था..ये देखने वाला भी कोई नहीं था कि सांसें चल रही हैं या थम गई...अब इनसान के साथ तो यही होना था...उसे यही सज़ा मिलनी चाहिए थी...आखिर पत्थरदिल दौड़ते भागते बुतों की दुनिया में एक इनसान का क्या काम...

33 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मार्मिक कहानी है, और वास्तविक भी। ऐसी घटनाएँ वास्तव में घटी हैं। साम्प्रदायिक विद्वेष इंसान को इंसान नहीं रहने देता।
    पर कहानी में एक कमी है। इस तरह के माहौल में वह भी जन्मदिन के दिन कोई भी अपने दोस्त के घर जाने की इजाजत भी नहीं दे सकता। इस से यह कहानी अविश्वसनीय बन जाती है।

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  2. द्विवेदी सर,
    मैंने ऊपर ही लिखा है कि ज़िंदगी में पहली बार कहानी लिख रहा हूं...कमी-पेशी रह सकती है...

    रही बात सुदीप्तो की तो उसने घर के बरामदे से धीरे से ही कहा...और साथ वाले दोस्त के घर में जाने की बात कही...पता नहीं मां ने सुना भी या नहीं सुना...उस कॉलोनी में तब तक ऐसी कोई बात भी नहीं थी...और सबसे बड़ी बात सुदीप्तो के मन में अपने रहीम काका से मिलने की बालहठ घर कर चुकी थी...इसलिए उसने जो ठान लिया था, वो करके ही माना...

    जय हिंद...

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  3. उफ़! भैया कितना मार्मिक चित्रण किया है आपने.... यह तो समझ का ही फेर है.... बहुत पहले पहले एक गाना सुना था .... कि.... ना हिन्दू बनेगा.... ना मुसलमाँ ... बनेगा .....इंसान की औलाद है ...तू इंसान ही बनेगा.... पर अब तो यही आलम है कि तू हिन्दू बनेगा .... और मुसलमाँ भी बनेगा.... इंसान के रूप में तू कुत्ता ही है..... तो कुत्ता ही बनेगा....जो धरम कि बातें करते हैं.... वो सबसे बड़े अधर्मी हैं.... सेकूलर तो वो है.... जिसे धर्म को धारण करने नहीं आया... जिसे धर्म की जानकारी नहीं है.... जिसे धर्म की जानकारी है.... वो सब धर्मों का आदर करेगा.... नास्तिक तो नालायक होते हैं.... जो धर्मी होते हैं वो प्यार करते हैं.... अमन और शान्ति फैलाते हैं.... जो नीच होते हैं... वो मेरा धर्म अच्छा और तेरा खराब की बातें करते हैं.... अधर्मी व्यक्ति ही धर्म की बात करता है.... धर्मी तो न्याय और प्यार की फिजा हवा में घोलते हैं.... नीच व्यक्ति ही धार्मिक सीख देता है.... धर्म तो घर के बंद कमरे में ही अच्छा लगता है.... सड़कों पर अधर्मी ही आते हैं.... अभी फिर अपने विचारों का टोकरा लेकर आऊंगा..... तब तक के लिए ....

    जय हिंद...
    जय हिंदी..
    जय भारत..
    जय ब्लॉग्गिंग...

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  4. एक 'इंसान' की यही हालत होनी ही थी खुशदीप जी,
    इंसानियत को मरते हुए इतनी बार देखा कि अब उसके जिंदा होने पर मुझे शक है......
    हर बार कि तरफ एक नायब पोस्ट...
    आपका शुक्रिया...

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  5. बहुत ही दिल को छुने वाली कहानी है।
    बहुत अच्छा लिखते हैं आप,
    आपने कहानी पहली बार लिखी है और
    मै भी पहली बार आपके ब्लाग पर आया हुं।

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  6. मार्मिक...दिल को छू लेने वाली कहानी लिखने के लिए बहुत-बहुत बधाई....
    ना इक्का...ना दुक्का...पहली बार मारा तो वो भी सीधा बाउंड्री पार वाला ताबड़तोड़ छक्का ...
    भय्यी वाह....मज़ा आ गया जी फुल्ल बटा फुल्ल

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  7. क्या कहूं दादा .... यह हाल हर रामदीन और रहीम का होता है....

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  8. मुझे लोग आजकल हिंदुवादी कहने लगे है .. कहें मेरी बला से....आडवाणी जी के रथ के समय 1990 में और मुंबई हमले के समय कहने को मुसलमान पर दुनिया के सबसे सच्चे इंसान और दिल के कलाम के घर पर मेहमान था....

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  9. मजहब नही सिखाता आपस में बैर रखना
    बहुत मार्मिक और प्रवाहमय रचना. काश सच्चाई को हम समझ पाते और यह वैमनस्य खत्म हो पाता.

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  10. मार्मिक कथा ...बहुत ही भावुक कर दिया ...
    हम लोग हैदराबाद के चारमिनार के जिस इलाके में रहते थे वहां पूरे मोहल्ले में सिर्फ २ घर हिन्दुओं के थे ...वो भी ब्रह्मण ...छुआछूत की कट्टर समर्थक हमारी दादी ...मगर जब भी कर्फ्यू लगता ...गली के मुस्लिम परिवार हमें बाहर जाने के लिए मना करते ..यह कहकर कि जो भी काम हो हमें बता दो ...बाहर खतरा है ...कई बार ऐसी परिस्थिति में परिजनों को फ़ोन करना , दूध सब्जी लाने जैसा काम उन्होंने किया हुआ है ...महासाम्प्रदायिक माहौल में भी हम वहां अपने आप को हमेशा सुरक्षित मानते रहे ...घर में बावड़ी होने के कारण जब भी उन परिवारों को पानी की जरुरत होती ...दादी जरुर मदद करती थी अपनी तमाम धार्मिक मान्यताएं एक तरफ रख कर ...काश कि यह सद्भावना देश के हर मोहल्ले में हो पाती ...

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  11. अति मार्मिक कहानी..अपनी छाप स्थापित कर गई. बहुत उत्तम प्रयास है. इन्सानियत का तो ऐसा ही अन्जाम है आज की दुनिया में.

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  12. पूरी तरह से मार्मिक कहानी है जो की दिल को छु गई। लेकिन करे तो क्या । आखिर कैसे रोका जा सकता है लोगो को।

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  13. आप इंसानियत की बात कर रहे हैं!

    फ़िरदौस जी, भी इंसानियत की बात कर रही हैं तो आज उन्हें काफ़िर ही घोषित कर दिया गया है. सलीम खान ने अपने ब्लॉग पर पोस्ट लिखकर फ़िरदौस जी पर गंभीर आरोप लगाये हैं. इस्लाम का प्रचार करने वाले सलीम खान कितने सभ्य (असभ्य या जंगली कहना उचित रहेगा) हैं, आपके बारे में लिखी इनकी पोस्ट देखकर ही पता चल जाता है.

    दिमाग़ से पैदल ये कुतर्की भारत को भी तालिबान बनाने पर तुले हुए हैं, जब इन्हें भरतीय संस्कृति से इतनी ही नफ़रत है तो क्यों न यह अरब जाकर ही बस जाए. इस देश को इन जैसे तालिबानियों की ज़रूरत नहीं.

    आज फ़िरदौस जी जैसे मुसलमानों की देश को बहुत ज़्यादा ज़रूरत है, साथ ही उनके अभियान को समर्थन देने की, ताकि और देशभक्त लोग आगे आ सकें !!!

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  14. खुशदीप भाई !
    गज़ब का सजीव चित्रण किया है कालीबाड़ी और अकबर टोला के बार्डर का आपने, वास्तविक मार्मिक चित्रण करने में आपका जवाब नहीं आपकी लघु कथा "आँखों देखा भ्रम" ने आँखों में आंसू ही ला दिए थे ! इस कहानी का मूल बदकिस्मती से हमारे देश में अक्सर देखने को मिल जाता है , और नफरत के सौदागर उसे पालने पोसने में लगे रहते हैं .....ऐसी रचनाओं की बेहद जरूरत है जो इस आग पर ठंडा पानी डालने का प्रयत्न करें और इनकी आँखें खुलें !
    ब्लाग जगत की प्रतिक्रियाओं को ध्यान से देखिएगा, यहाँ ऐसे लेखों को पसंद नहीं किया जाता , क्योंकि हम काली बाड़ी में रहते हुए भी रहीम मियां की चिंता करते हैं !
    आपकी लेखनी में जो धार है वह बिरले ही दिखती है खुशदीप भाई ! मेरी सुबह सुबह सार्थक लेखों के लिए शुभकामनायें स्वीकार करें काश भगवान् कुछ और खुशदीप सहगल पैदा करे ...
    हार्दिक शुभकामनायें !

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  15. यदि यह आपकी पहली कहानी है तो यही कहूँगा कि कहानियाँ लिखने की पूरी पूरी प्रतिभा है आप मे!

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  16. कहानी के माध्यम से एक कडवी सच्चाई को कह डाला है...बहुत मार्मिक कहानी है...धर्म के नाम पर कैसे लोग अंधे और बहरे हो जाते हैं..इसका सजीव चित्रण किया है....

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  17. शुक्र है यह कहानी ही है . मेर ड्राइवर भी अशरफ़ नाम का मुसलमान है कई सालो से . एक बार मेरी गाडी मे स्वामी अवधेशानंद जी पीठाधीश्वर जूना अखाडा जा रहे थे तो अशरफ़ ही गाडी चला रहा था उसने पूछा महाराज कुछ मन्दिरो मे लिखा है मुसलमान क अन्दर आना मना है क्या वह इन्सान नही ............. उसका प्रश्न स्वामी जी को भी विचलित कर गया था .
    उसी अशरफ़ ने आडवानी जी ,कल्याण सिंह ,उमाभारती जैसे हिन्दु नेताओ को सुरक्षित यात्रा करायी है .
    हिन्दु मुस्लिम वैर हमारे दिमागो का फ़ितूर है और कुछ नही . इस खरपत्वार को हम ही खाद देते है पानी देते है

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  18. वाह खुशदीप भाई , बेशक इसके बावजूद भी उनपर कोई फ़र्क न पडे मगर कोशिश इंसान बनाने की इसी तरह से होनी चाहिए , जरूरी नहीं कि दूसरे को इंसान बनाने के लिए खुद भी हैवान बना जाए , इंसानियत के ज़ज़्बे को ही सबसे ज्यादा प्रभावी बनाया जाए तो परिणाम अच्छा निकलेगा ही । शुरूआत अच्छी नहीं बहुत अच्छी है कहानी लेखन की ,,शुभकामनाएं
    अजय कुमार झा

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  19. यदि यह कहानी ही है, तो यह एक ठँडे मन और शान्त चरित्र की कहानी है,
    किसी भी तरह का उन्माद विवेक के सारे रास्तों पर नाकेबन्दी कर देता है ।
    जब विवेकहीन या कहिये कि कुटिल पथप्रदर्शक जान बूझ कर अनपढ़ बना कर रखे गये जनसमूह को यह नारा दें कि, तर्क मत करो.. अपने समर्पण को सिद्ध करो, तो कोई क्या उम्मीद करे ?
    खुशदीप, यहाँ अनपढ़ का अर्थ साक्षरता से कुछ अलग भी है !
    लगता है, हम सब एक बड़े षड़यन्त्र के मध्य जी रहे हैं, अपने स्वार्थों और अहमन्यता के चलते बुद्धिजीवी वर्ग तटस्थता में ही अपना परिष्कार देखता है । फिर भी तुम बस लगे रहो, लगे रहो खुशदीप भाई ! तुम्हारे सँग सरकिट की भूमिका मैं निभा लूँगा ।

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  20. रहीम काका, साला इंसान था..... अच्छा हुआ मर गया...

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    महफूज़ भाई की बातों से इत्तेफाक रखता हूँ, यहाँ जो लोग धर्म (किसी भी) की बात करते हैं वो ही सबसे ज्यादा अधर्मी है.

    --- और ऐसे समय में सतीश सक्सेना साहब जैसे लोगों की बहुत जरूरत है.. दिल से कहूँ तो मैं उनका फैन हूँ.

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  21. ek maksad ko poora karatee sarthak kahanee .kaun vishvas karega ki ye aapka pahala prayas tha............ekdum jeevant chitran..........bus ek hee khayal aa raha hai ki agar ye kahanee hee thee to kuch sakaratmak ant karke bhee prerana dayak banaya ja sakta tha.......usase bhai chare ka paigam bhee milta.......... Ye meree soch hai krupaya anytha mat leejiyega.

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  22. अपनत्व जी,
    आपकी सलाह बिल्कुल दुरूस्त है...लेकिन वो सोच सिर्फ उनके लिए है जो इनसान है, ऊंच-नीच समझते हैं...और जो इनसान ही नहीं, वो भी कुछ सोचें, उनके ज़मीर पर चोट हो, इसके लिए उन्हें कुनैन का कड़वा घूंट पिलाना ही पड़ेगा...वैसे भी बिना विष मंथन से अमृत अलग नहीं किया जा सकता...

    जय हिंद...

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  23. कहानी मार्मिक और भावपूर्ण लगी।
    आपने लिखा है इसलिए वाक्यों में सुधार करवाना चाहती हूँ-----(जितना मुझे समझ में आया ,मेरी भी गलती हो सकती है,जरूर सुधारना चाहूँगी )
    -बहुत जगह चिन्हों का प्रयोग नही किया गया है।
    कॄपया सुधार करें ---
    अ-या यूँ कहें कि
    ब-दॄश्य १ में --
    १--....दिन की छुट्टी लेकर घर पर ....
    २--...रमेश को बुला लूँगा या...
    ३--...तब ड्यूटी पर...
    ४--...नानी के घर गया हुआ है ...
    स-दॄश्य २ में-
    १--...दो दिन हो गए रहीम को ड्यूटी पर नहीं गए हुए.....
    २--...घर पर खाली बैठना .....
    ३--...पुलिस भी उन्हीं की ...कलेक्टर...कर्फ़्यू लगा- तो...
    ४--...ड्यूटी पर नहीं जा रहे हो ?...
    ५--...नेकदिली की,देख लिया सब धरी .....
    ६--...है तो वो हिन्दू ....
    ७--...कर दी न छुट्टी ड्यूटी से ...
    द--दॄश्य ३ में --
    १--...मै अपने दोस्त...
    इ--दॄश्य ५--
    १--...पुलिसवाला--मियाँ जी...
    २--...बच्चे को छोडकर जल्दी वापस आओ ...

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  24. धीरू सिंह जी की बातों से इत्तेफाक रखता हूँ.....

    "हिन्दु मुस्लिम वैर हमारे दिमागो का फ़ितूर है और कुछ नही . इस खरपत्वार को हम ही खाद देते है पानी देते है"

    खुशदीप जी आपने कहा - यह आपकी पहली कहानी है, तो यही कहूँगा कि कहानियाँ लिखते रहा करें!!!!!!

    जय हिंद...

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  25. खुशदीप जी
    कहानी क्या ये तो आज की हकीकत है…………………जो इंसान है,इंसानियत का जज़्बा रखता है उसका यही तो सबसे बडा गुनाह है…………………सब धर्म के ठेकेदारों द्वारा बिछाया मायाजाल है वरना हर दिल मे इंसान बसता है।

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  26. Aisi kahani likhne se aapka heere jaise dil ki chamak aur bhi jyada roshni failati hui logon tak pahunchi hai bhaia.. I'm proud of u. badhiya likha(kahani to nahin par haan wo kaun si badi baat hai aapke liye 1-2 baar likhenge to perfection aa jayega).

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  27. @अर्चना जी,
    आपका दिल से आभार...आपने जो संशोधन सुझाए थे, सभी मैंने कर दिए हैं...आपने मेरे लिखे को इतना ध्यान से पढ़ा और प्रूफ़, वाक्य-विन्यास की कई त्रुटियों को पकड़ा...दरअसल मैं फोनेटिक्स टाइप करता हूं और लाख कोशिश करने के बाद भी चंद्रबिंदु डालना नहीं सीख पाया...

    एक बात और अर्चना जी, चश्मेबद्दूर...आप क़यामत की नज़र रखती है...इस बात की तारीफ़ मेरे गुरुदेव समीर लाल जी समीर भी कर चुके हैं...गाने वाले वीडियो में ये पूछ कर...मारा क्यों?...

    जय हिंद...

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  28. Khushdeep ji,
    I never knew that our childhood friend is so multitalented that he can narrate news and write stories with such a high degree of perfection!The story you told is very touching and may have happened not once but many atimes.A very good effort on your part as a story writer.
    In this troubletorn time when the country is going thru a similar phase, be it be the naxal unrest or communal hatred, both are the cancers of the society and a blot on our Indian culture and heritage which preaches tolerance to all races and religions.
    A real sincere effort on your part Khushdeepji.Do keep writing such eyeopener touching stories in the future as well.
    Jai Bharat!

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  29. बहुत अच्छी प्रस्तुति
    bahut khub

    http://kavyawani.blogspot.com/

    shekhar kumawat

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  32. खुशदीप भाई, बहुत ही बढ़िया कहानी लिखी है आपने ...........रहा सवाल गलतियों का तो भाई गलतियाँ तो हम सब एक ही करते है --------- दिमाग वालों की दुनिया में दिल से काम लेते है !!

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