खुशदीप सहगल
बंदा 1994 से कलम-कंप्यूटर तोड़ रहा है

अपनी पोस्ट पर खुद टिप्पणी करते रहना कितना जायज़...खुशदीप

रवींद्र प्रभात जी की पोस्ट से पता चला कि परिकल्पना ब्लॉग उत्सव 2010, 15 अप्रैल से शुरू होने जा रहा है...रवींद्र जी के मुताबिक उत्सव के दौरान सारगर्भित टिप्पणी करने वाले टिप्पणीकार को भी विशेष रूप से सम्मानित किया जाएगा...इसी से पता चल जाता है कि ब्लॉगिंग में सारगर्भित टिप्पणियों का कितना महत्व होता है...


मैं इस पोस्ट में ये नहीं लिखने जा रहा कि ब्लॉगिंग टिप्पणियों के लालच में नहीं की जानी चाहिए...मैं ये भी नहीं लिखने जा रहा कि गंभीर और अच्छे लेखों पर टिप्पणियों का अकाल पड़ा रहता है...मैं ये भी नहीं लिखने जा रहा कि टिप्पणी का स्वरूप कैसा होना चाहिए...क्या सिर्फ वाह-वाह कर ही अपने पाठक धर्म की इतिश्री कर लेनी चाहिए...ये सब वो सवाल हैं जिन पर अनगिनत पोस्ट लिखी जा चुकी हैं...



जिस तरह टीवी पर एक कोल्ड ड्रिंक की एड आती है...डर सभी को लगता है...डर से मत डरो....डर के आगे बढ़ो...डर के आगे ही जीत है...इसी तरह मेरा भी यही मानना है कि टिप्पणी को देखकर कहे चाहे कोई कुछ भी लेकिन सभी को असीम संतोष और आनंद मिलता है...अब इसके लिए तर्क कुछ भी दिए जाएं...और नए ब्लॉगर के लिए तो टिप्पणी टॉनिक से कम अहमियत नहीं रखती...


लेकिन इस पोस्ट को लिखने का मेरा मकसद दूसरा है...मेरा आपसे सवाल है कि क्या खुद की पोस्ट पर खुद ही टिप्पणियां करना नैतिक दृष्टि से सही है...अगर किसी की टिप्पणी आपके ब्लॉग पर आती है, तो बिना मतलब हर टिप्पणी देने वाले का शुक्रिया अदा करने के लिए खुद की पोस्ट पर ही टिप्पणियां बढ़ाते जाना, क्या कुछ खटकता नहीं है...ये बात ठीक है कि अगर कोई टिप्पणीकर्ता आपसे सवाल पूछता है, या किसी मुद्दे पर किसी ख़ामी की ओर इंगित करता है, या निर्मल हास्य के तहत चुटकी लेता है, तब तो उसका टिप्पणी के ज़रिए जवाब देना समझ आता है...पोस्ट लिखने के बाद अगर आपको याद आता है कि कोई अहम बिंदु छूट गया है...उसकी भी टिप्पणी के ज़रिए जानकारी दी जा सकती है...लेकिन हर टिप्पणी पर अपनी टिप्पणी देकर टिप्पणियों की संख्या बढ़ाते जाना, कुछ जमता नहीं...


यहां अपने गुरुदेव समीर लाल जी समीर को पढ़-पढ़ कर सीखे एक पाठ का ज़िक्र करना चाहूंगा...समीर जी की किसी भी पोस्ट पर उनकी खुद की टिप्पणी रेयरेस्ट ऑफ रेयर (दुर्लभ में भी दुर्लभतम) ही मिलती है...वो भी तभी जब उनसे सीधे कोई सवाल पूछा गया हो...या समीर जी ने किसी चुटीले संदर्भ का उल्लेख करना हो...मुझे सात महीने में सिर्फ एक बार ही ऐसा दुर्लभ मौका मिला है जब समीर जी ने अपनी पोस्ट पर मेरी टिप्पणी के जवाब में खुद की टिप्पणी के ज़रिए अपने उदगार व्यक्त किए थे...

अब तय कीजिए कि अपनी पोस्ट पर खुद टिप्पणियां देते रहना कितना जायज़ है...बाकी इस विषय पर आप सब की राय ज़रूर जानना चाहूंगा...




स्लॉग चिंतन


एक गांव सूखे की मार से बेहाल था...




सारे गांव ने चौपाल पर एकत्र होकर इंद्रदेवता को मनाने के लिए सामूहिक प्रार्थना करने का फैसला किया...




सब प्रार्थना के लिए पहुंच गए...






एक बच्चा छाता भी साथ लेकर आया...





इसे कहते हैं विश्वास की हद...

45 comments:

  1. खुशदीप सर, इस बारे में मुझे भी बहुत दुविधा थी। हम तो अभी सीख रहे हैं, बाकी आपका प्रश्न जायज है। भविष्य में ध्यान रखेंगे।
    आभार।

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  2. विल्कुल सही बात कही आपने...
    मुझे तो लगता है कि प्रवचन बाले पोस्ट पर ऐसा ज्यादा होता है जब ब्लॉगर अपनी बात के पक्ष में टिप्पणी पाकर "धन्यबाद" या "शुक्रिया" या "thank " का प्रसाद बांटते हैं...उम्मीद से ज्यादा मिलने से ऐसा ही होता है.....लोग नत-मस्तक होने लगते हैं....और कभी कभी .....
    http://laddoospeaks.blogspot.com/

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  3. bilkul sahi kaha hai apne . lekin sabse achhi tippdi hoti hai. NICE

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  4. भाई जब टिप्पणी नही मिले तो ये शगल भी पाल लेने मे क्या बुराई है?:) वैसे हम तो इस मत के हैं कि पोस्ट लिख और भूल. कोई ज्यादा टिप्पनी मे ऊलजलूल लिखे तो अगली पोस्ट मे निपट लेते हैं. अक्सर आज तक गिने चुने ही मौके ऐसे आये होंगे जब खुद ही टिप्पणी करना पडी हो.

    वैसे ऐसा करने वाले भी सौ प्रतिशत गलत नही. कुछ नये लोग टिप्पणीकार को विशेष सम्मान देने के उद्देष्य से ऐसा कर बैठे होंगे.
    तो कोई बात नही. खुद का माल खुद ही के पास रहा.:

    रामराम.

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  5. अगर टिप्पणी मे कोई सवाल किया गया है तो उसका जबाब तो देना ही पडेगा . लेकिन हर टिप्पणी का जबाब देना तो टिप्पणी मीटर को तेज़ करना ही है .
    सबको अपने गिरहबान मे झाकना चाहिये इस मुद्दे पर

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  6. जब तक कुछ विशेष न हो

    तब तक टिप्‍पणी का
    नहीं है कोई औचित्‍य

    अब वो औचित्‍य

    पुरस्‍कार पाना भी तो सकता है

    हथियाने से पाना तो ठीक है

    पर पाने के लिए मनवाना ठीक नहीं।

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  7. आपका प्रश्न बिलकुल सही है
    लेकिन वाकई नए ब्लोगरों को तो
    लगता है कि टिपण्णी आनी चाहिए
    ठीक प्रेमी के प्रेमिका के लिए इस गाने कि तरह
    "पल भर के लिए हमें कोई प्यार कर ले
    झूठा ही सही"

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  8. खुद की पोस्ट पर टिप्पणी करना ठीक नहीं है। हाँ यदि गंभीर प्रश्न उठे हों तो ही जवाब दिए जाने चाहिए। हालांकि यह ठीक नहीं है। यदि मामला कुछ बड़ा हो तो जवाब देने के लिए अगली पोस्ट लिखी जा सकती है। मुझे यह सुझाव दिया गया था कि पाठकों द्वारा उठाए गए प्रश्नों का उत्तर उसी पोस्ट पर टिप्पणी के रूप में दिया जाना चाहिए। पर मुझे वह कभी भी रुचिकर नहीं लगा। इस से यह होता है कि पहले उस पोस्ट को पढ़ चुके पाठकों तक आप का मंतव्य पहुँचेगा ही नहीं। उत्तर देने के लिए भी अगली पोस्ट ही ठीक है।
    जहाँ तक टिप्पणीकारों को चार चार बार धन्यवाद देने का सिलसिला कुछ लोगों ने अब चलाया है। लेकिन वे कुछ अधिक दीवाने लोग हैं। उन्हें कुछ कहने का कोई लाभ नहीं है।

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  9. आजकल कुछ ब्लोग्स पर एक फ़ैशन देख रहा हूं कि पहली टिप्पणी खुद उस पोस्ट लेखक की ही होती है ..और वो भी पोस्ट की ही कोई लाईन , पहले मुझे लगा कि शायद पोस्ट लिखते समय कुछ छूट गया है वो कहना होगा मगर अब तक उसका औचित्य समझ में नहीं आया ।
    किंतु यहां एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि पोस्ट पर आई कोई टिप्पणी किसी उत्तर या स्पष्टीकरण की अपेक्षा करती है तो उसका उत्तर दिया ही जाना चाहिए । खासकर संवेदनशील पोस्टों पर यदि लगातार प्रतिक्रिया दर प्रतिक्रिया न आए तो फ़िर उसका मकसद खत्म सा हो जाता है । और यदि पोस्ट लेखक निष्क्रिय होकर सिर्फ़ तमाशबीन बनके सब देखेगा तो फ़िर शायद अन्य पाठकों और टिप्पणीकारों को भी उतना मजा न आए । हां सार्थक टिप्पणियों को तो मैं पोस्टों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं । और वे होती भी हैं ..सच कहूं तो मुझे खुद टिप्पणी देने में जितना आनंद आता है उतना पोस्ट लिखने में भी नहीं ..

    अजय कुमार झा

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  10. खुशदीप भाई, यह एक ऐसी दुनिया है जहाँ कोई भी नियम कानून नहीं चल सकता है.. मैं कभी अपने किसी पोस्ट पर हर किसी को धन्यवाद दे देता हूँ, कभी किसी को भी कुछ भी नहीं कहता हूँ.. यह मसला, नैतिक-अनैतिक और सही गलत से परे हटकर पूरी तरह से मूडियल है.. :)

    अगर अपनी बात करूँ तो पिछले चार साल के हिंदी ब्लोगिंग में मुझे यह सीखने को मिला है कि जहाँ लगे कुछ टिपियाने को है सिर्फ वहीं टिपियाओ, यहाँ तक कि किसी पोस्ट पर सिर्फ बधाई देना चाहें तो दे आये, हर जगह वही कापी-पेस्ट मारने कि कला हमेशा काम नहीं आती है, कुछ दिन बाद लोग चिढ जाते हैं.. कोई कमेन्ट करता है तो अच्छा तो लगता है, मगर अब अगर किसी पोस्ट पर ५-६ से अधिक कमेन्ट नहीं मिलते हैं फिर भी मुझे अब कोई समस्या नहीं होती है..

    अब कोई अपने पोस्ट पर टिपियाये चाहे ना टिपियाये यह अधिकार पूरी तरह से उस ब्लोगर का होता है.. अगर वह बकवास टिपिया रहा है अपनी ही पोस्ट पर, तो आखिर कब तक इस तरह अपने पाठक को बरगलाये रख सकता है? कुछ दिन बाद लोग उनसे पीछा छुडाते नजर आयेंगे.. :)

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  11. अब इन सुमन जी की Nice से बढ़कर सारगर्भित टिप्पणी ओर क्या हो सकती है ?

    विशेष टिप्पणीकार सम्मान इन्ही सुमन जी को दिया जाये !!

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  12. wese apne dil ki bat kahu to muje apne blog par comments dekh kar acha lagta he

    magar comments kuch khas ho to



    shekhar kumawat


    http://kavyawani.blogspot.com/

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  13. खुशदीप भैया सबके अपने अपने मत, दुनिया में कोई किसी के जैसा सोच ही नही..और टिप्पणी चर्चा तो महान है ही...मैं कुछ नही कहूँगा इस पोस्ट के बारें में मुझे तो स्लॉग ओवर ही बढ़िया लगा....आत्मविश्वास यही होता है....लाज़वाब सोच एक बालक की....

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  14. खुशदीप भाई,
    हमारे यहां कह्ते हैं
    'कोठी के धान कोठी में'
    समझदार आदमी वह होता है
    जो अपना माल खुद के पास ही
    रखता है:)

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  15. अधिकतर टिप्पणियां प्रायोजित अथवा परस्पर लेन-देन का हिस्सा होती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि एग्रीगेटर भी सबसे ज्यादा पढी गई पोस्ट को सूचीबद्ध करने के लिए पाठकीयता के अलावा,टिप्पणियों की संख्या को ध्यान में रखते हैं। कुछ लोगों ने टिप्पणी मोडरेशन का विकल्प अपना लिया है जिसका उद्देश्य वैसे तो यह बताया जाता है कि अभद्र टिप्पणियों को रोका जाए किंतु देखने में यही आता है कि इस प्रकार का प्रयास प्रशंसायुक्त टिप्पणियों को ही प्रकाशित होने देने के लिए किया जाता है। मेरा विचार है कि लोगों को अपनी बात कहने का अवसर देना चाहिए और लेखक को स्वयं टिप्पणी से तब तक बचना चाहिए जब तक कोई मुद्दा प्रत्यक्ष टिप्पणी की अपेक्षा न रखता हो। जिन लोगों को कोई व्यक्तिपरक टिप्पणी करनी हो,बेहतर है कि वे मेल पर मैसेज भेजें। टिप्पणीकारों को भी मर्यादित होना जरूरी है ताकि ब्लॉग अपनी खीझ व्यक्त करने का माध्यम न बने क्योंकि आप ब्लॉग पर स्वेच्छा से आते हैं और अगर कोई पोस्ट पसंद नहीं आया तो टिप्पणी करने में और वक्त क्यों जाया किया जाए।

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  16. खुशदीप भाई एक वजह और है, अपने ही पोस्ट पर कम से कम एक टिप्पणी करने की ,जैसा कि अजय जी ने भी कहा है...कुछ template ऐसे हैं कि इसमें आप कोई कमेन्ट करके ही follow up पर क्लिक कर सारे कमेंट्स मेल में प्राप्त कर सकते हैं...इसलिए मजबूरी हो जाती है.एक कमेन्ट करने की...मुझे भी अपनी "अपनी उनकी सबकी बातें "वाले ब्लॉग पर एक कमेन्ट करना ही पड़ता है जो शुरू में ही किसी को थैंक्स बोल कर, या किसी बात का जबाब देकर कर लेती हूँ. दूसरे ब्लॉग पर यह समस्या नहीं,इसलिए वहाँ सिर्फ जरूरत पड़ने पर ही जबाब देना पड़ता है.
    और ज्यादा कमेंट्स से अब फर्क किसे पड़ता है....इतने दिनों में इतना तो पता चल ही जाता है कि इसके पीछे क्या क्या तिकड़म करने पड़ते हैं.

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  17. हाँ खुशदीप जी,
    मैं भी पिछले कुछ दिनों से ये प्रवृत्ति देख रही हूँ. किसी की टिप्पणी का जवाब अगर देना ज़रूरी हो, तो दूसरी बात है, पर यहाँ तो कुछ ब्लॉगों पर दूसरों की कम और अपनी टिप्पणियाँ ज्यादा होती हैं. ख़ैर, लोग समझदार हैं और जानते हैं कि कौन किस उद्देश्य से लेखन कर रहा है?

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  18. आपका प्रश्न बिलकुल सही है

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  19. अरे भाई अगर किसी को ऐसा करके ख़ुशी मिलती है तो आप क्यों भांजी मार रहे हैं इनकी ख़ुशी में । :)

    वैसे मुद्दों पर आधारित पोस्ट हो तो टिपण्णी करना आवश्यक भी हो जाता है। यहाँ मैं अजय झा से पूर्ण रूप से सहमत हूँ। खाली तमाशबीन बनकर टिप्पणियां पढ़ते रहना ज्यादती सी लगती है टिप्पणीकारों के साथ।
    एक बात और, ज्यादा टिप्पणियों का मतलब है , ब्लोगर पुराना है और अच्छा लिख रहा है। वर्ना कोई किसी को बिना बात टिपण्णी नहीं देता ।

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  20. एक शंका है

    जब ताऊ खुद अपने ब्लॉग पर लोगों पर फर्जी मुकदमा चला कर १० टिप्पणी और २१ टिप्पणी का जुर्माना थोक रहा था और २४ घंटे के अन्दर जुर्माना ना जमा करने पर ५ और करना पद रहा था तब फिर इनका ये कहना

    वैसे हम तो इस मत के हैं कि पोस्ट लिख और भूल. कोई ज्यादा टिप्पनी मे ऊलजलूल लिखे तो अगली पोस्ट मे निपट लेते हैं.

    कहाँ से उचित है

    कोई ब्लॉगर इसका उत्तर दे सके तो जरूर दे और अगर ताऊ कुढ़ शंका समाधान कर दें तो बहुत बढ़िया
    - सत्य

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  21. शब्द संशोधन - अंत में कुढ़ को खुद पढ़ा जाये

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  22. khushddep bhai ,aap jaise senior bloggers ka bhi to farz hai ki hum jaise naye logon ka dil rakhne ya sarahne ya salah dene ke liye ak do tippniyan to karni hi chahiye ki nahi ...aap log blog par aayenge nahi to bichara aap hi tippni karega ..aakhir kya kare ..bin tippni bin sab soon ..???

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  23. टिप्पणी बॉक्स के उपर ही लिख दिया है:

    आपकी टिप्पणी से हमें लिखने का हौसला मिलता है. बहुत आभार.

    इसलिए बार बार क्या धन्यवाद दें. सीधे किये गये प्रश्न के जबाब के सिवाय तो अपनी बात कहने के लिए आपकी अपनी पोस्ट है ही!!

    सही मुद्दा उठाया है.

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  24. इस पोस्ट पर भाई कमलेश वर्मा की टिप्पणी देखकर मेरे लिए बहुत ज़रूरी हो गया कि यहीं टिप्पणी के माध्यम से उनकी शंका का निवारण करूं...कमलेश जी ने जो सवाल उठाया है बिल्कुल जायज़ है...एक बात तो साफ़ कर दूं कि कमलेश भाई मुझे भी ब्लॉगिंग में आए सात महीने ही हुए हैं, इसलिए मुझे भी अपने वाली केटेगरी में ही रखें...आपकी इस टिप्पणी के बाद कोशिश करूंगा कि शनिवार और रविवार को छुट्टी वाले दिन ज़्यादा से ज़्यादा नए ब्लॉग्स पर जाकर टिप्पणी करूं...मेरी इस पोस्ट का संदर्भ नए-पुराने ब्लॉगर्स से नहीं बल्कि खुद ही टिप्पणियों का आंकड़ा बढ़ाने की प्रवृत्ति से है...

    जय हिंद...

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  25. ये सही है कि अपने ब्लॉग पर टिप्पणियों की बढ़ती हुई संख्या को देख कर अपार खुशी का मीठा-मीठा सा सुखद एहसास होता है लेकिन इसके लिए कृत्रिम तरीके अपनाना मेरे हिसाब से जायज़ नहीं है|
    विचारणीय पोस्ट

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  26. आजकल लड्डू जी अपनी पोस्ट में सबसे पहले खुद टिप्पडी करते हैं
    हम पूछ आये हैं - भैया ऐसा काहे करते हैं - शायद जवाब मिले

    कविता के लिंक जब मांग रहे थे तब तो उनका कमाल देखते बनाता है :)

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  27. गणित का खेल है

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  28. जाने भी दो यारों...

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  29. यदि व्‍यक्ति अपना सम्‍पर्क बढ़ाने के लिए बार-बार धन्‍यवाद आदि से टिप्‍पणियों की संख्‍या बढ़ाता है तो क्‍या फर्क पड़ जाएगा? आत्‍मसंतुष्टि के लिए किया गया कार्य जायज हो सकता है लेकिन उससे आपका सही मूल्‍यांकन नहीं होता। मुझे लगता है कि जब हम किसी की पोस्‍ट पढ़ते हैं तब हमारे मन में भी कुछ विचार आते हैं, तो हम टिप्‍पणी करते हैं। पोस्‍ट लिखने वाला भी चाहता है कि टिप्‍पणी मिले। लेकिन जब पोस्‍ट लिखने वाला अपना प्रीविलेज बना लेता है कि मैं जो चाहे टिप्‍पणी स्‍वीकृत करूं और जो चाहे ना करूं, यह बात मेरे गले नहीं उतर रही। मुझे तो कम से कम अपमान सा लगता है। यदि आपको चिन्‍ता है कि लाग अभद्र शब्‍दों का प्रयोग करते हैं तो उसे मेल को आप ब्‍लाक कर सकते है। लेकिन अभिव्‍यक्ति का अधिकार छीनना स्‍वस्‍थ परम्‍परा नहीं है। यह तो ऐसा ही हुआ कि आप के अनुसार हम लिखें। आपको हमारे परामर्श की आवश्‍यकता नहीं है बस प्रशंसा ही चाहते हैं। इसलिए इस बारे में भी विचार करें। कई बार मैं कुछ गम्‍भीर बात लिखती हूँ और देखती हूँ कि वह अप्रूवल में चला गया है तब लगता है कि आपके विचार की आवश्‍यकता ही नहीं है आप क्‍यों लिख रहे हैं? यदि हमें पूर्व में ही पता लग जाए कि यहाँ अप्रूवल लेना पड़ेगा तो शायद मेरे जैसा व्‍यक्ति तो लिखेगा ही नहीं। क्‍योंकि आपको जी-हजूरियों की तलाश है तो आप उनसे ही लिखवाए और वाह वाही पाए।

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  30. @ सत्य

    हे मित्र असत्य रुपी सत्य,

    खेल और गंभीर लेखन का भेद कर पाते तो सत्य कहलाते.

    पहेली एक खेल है और ऐसा मंच, जहाँ लोग आकर बातचीत करें, रीलेक्स हों और मन हल्का करें. आपश्री जिस का जिक्र कर रहे हैं उस खेल का थीम ही यही था. जो कि वहां हर पोस्ट में स्पष्ट लिखा रहता था.

    अत: उद्देश्य बिना जाने बोलना असत्यता ही कहलाया.

    कवि सम्मेलन के मंच और शांतो हेतु मौन ध्यान के मंच में अंतर करना सीखो, बालक. जब सीख जाओ तब आगे विश्लेषण करना तो उचित लगेगा!!

    कभी शादी ब्याह में नाचने और मातम में चुपचाप बैठने को एक तरह से न तौलने लग जाना..इसी बात से डर लग रहा है.

    रामराम.

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  31. क्या मालुम बच्चा छाता धूप से बचने के लिये लाया हो।

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  32. अपने ब्लॉग में स्वयं टिप्पणी करना, प्रत्येक टिप्पणीकर्ता को धन्यवाद देना आदि एक ट्रिक है संकलकों में महत्वपूर्ण स्थान पाने का। यह ट्रिक एक प्रकार से संकलकों को धोखा देना है इसलिये, मेरे विचार से, हमारे संकलकों भी कर्तव्य हो जाता है कि वे ध्यान रखें कि कौन ऐसा कर रहा है और उन लोगों के विरुद्ध उचित कार्यवाही भी करें।

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  33. खुशदीप भाई हम भी जवाब कम ही देते हैं,बहुत ज्यादा ज़रूरी ना हो तो हमारे ब्लाग पर भी हमारे कमेण्ट नही पाओगे।ये जवाब देना भी अभी हाल ही मे शुरू हुआ है वो भी तब जब हमको ये पता चला कि कमेण्ट करने वाले की जिज्ञासा शांत करना आपका ही काम है।वैसे कुछ लोग तो कमेण्ट पर ही पोस्ट लिख देते है।
    ये स्लाग ओवर का छाता बहु कुछ कह रहा है।

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  34. महोदय,

    पिछले कई दशक से हमारे समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा देने के सम्बन्ध में एक निर्थक सी बहस चल रही है. जिसे कभी महिला वर्ष मना कर तो कभी विभिन्न संगठनो द्वारा नारी मुक्ति मंच बनाकर पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाता रहा है. समय समय पर बिभिन्न राजनैतिक, सामाजिक और यहाँ तक की धार्मिक संगठन भी अपने विवादास्पद बयानों के द्वारा खुद को लाइम लाएट में बनाए रखने के लोभ से कुछ को नहीं बचा पाते. पर इस आन्दोलन के खोखलेपन से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है शायद तभी यह हर साल किसी न किसी विवादास्पद बयान के बाद कुछ दिन के लिए ये मुद्दा गरमा जाता है. और फिर एक आध हफ्ते सुर्खिओं से रह कर अपनी शीत निद्रा ने चला जाता है. हद तो तब हुई जब स्वतंत्र भारत की सब से कमज़ोर सरकार ने बहुत ही पिलपिले ढंग से सदां में महिला विधेयक पेश करने की तथा कथित मर्दानगी दिखाई. नतीजा फिर वही १५ दिन तक तो भूनते हुए मक्का के दानो की तरह सभी राजनैतिक दल खूब उछले पर अब १५ दिन से इस वारे ने कोई भी वयान बाजी सामने नहीं आयी.

    क्या यह अपने आप में यह सन्नाटा इस मुद्दे के खोख्लेपर का परिचायक नहीं है?

    मैंने भी इस संभंध में काफी विचार किया पर एक दुसरे की टांग खींचते पक्ष और विपक्ष ने मुझे अपने ध्यान को एक स्थान पर केन्द्रित नहीं करने दिया. अतः मैंने अपने समाज में इस मुद्दे को ले कर एक छोटा सा सर्वेक्षण किया जिस में विभिन्न आर्थिक, समाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक और धार्मिक वर्ग के लोगो को शामिल करने का पुरी इमानदारी से प्रयास किया जिस में बहुत की चोकाने वाले तथ्य सामने आये. २-४०० लोगों से बातचीत पर आधारित यह तथ्य सम्पूर्ण समाज का पतिनिधित्व नहीं करसकते फिर भी सोचने के लिए एक नई दिशा तो दे ही सकते हैं. यही सोच कर में अपने संकलित तथ्य आप की अदालत में रखने की अनुमती चाहता हूँ. और आशा करता हूँ की आप सम्बंधित विषय पर अपनी बहुमूल्य राय दे कर मुझे और समाज को सोचने के लिए नई दिशा देने में अपना योगदान देंगे.

    http://dixitajayk.blogspot.com/search?updated-min=2010-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&updated-max=2011-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&max-results=6
    Regards

    Dikshit Ajay K

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  35. khushdeep ji
    main tobahut der se aayi hun to aapko sabke vichar mil hi gaye hain magar main kafi had tak aapse sahmat hun agar aap dekhenge to main kabhi bhi apnipost par tippani karke jawab nhi deti jiska bhi prashn hta hai use mail se jawaab deti hun ab ye to hum par hi nirbhar karta hai ki hum kya pasand karte hain ........post mein sarthakta honi chahiye aur uske jawab mein agar ek hi tippani aaye aur wo sarthak ho , us post ka marm samajh aaya ho kisi ko to samajhiye aapka likhna sarthak huya ........uska koi fayada nahi ki tippni 100 aa jayein aur sab ek jaisi ho ya bina padhe hi ----bahut sundar,uttam aadi kahkar de di gayi hon.tippani ho to sarthak , kahne wale ki bhasha ko jisne samjha ho phi rchahe kam hi kyun na aaye.........hamara to yahi vishwaas hai.

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  36. apne blog par tippani keval is kaaran ki ja sakti hai jab kisi ki tippani ka jawaab dena ho, varnaa koi zaroorat nahin hai

    aapne rochak tareeke se sahi bat kahi janaab...

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  37. अपने पोस्ट पर तभी करनी चाहिए जब किसी पाठक की कोई जिज्ञासा/ उलझन या अतिरिक्त जानकारी वगैरह हो।

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  38. अच्छा प्रश्न उठाया है खुशदीप भाई ! मैं जब कभी भी प्रति टिप्पणी देने को मजबूर होता हूँ , कुछ अजीब सा महसूस होता है और कोशिश करता हूँ की सब प्रश्नों का जवाब एक ही टिप्पणी में दिया जाये ! मैंने भी कई जगह लोगों को देखा है ....बढ़िया है ....

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  39. टिप्पणियों को लेकर इतनी महाभारत क्यूँ???जिसको अच्छा लगे वो करे ,अन्यथा रचना पढ़ कर निकल ले!!पर हाँ इतना जरूर है की कुछ ब्लॉग पर टिप्पणियों की संख्या बढ़ने के लिए कभी बारी बारी से नमस्ते की जाती है तो कभी उल जलूल की बातें!!!हाँ अब इस में भी किसी को मज़ा आता है तो लगे रहो!!!लिखी गयी पोस्ट महत्त्व कम होता हो तो हो !!! विश्लेषण या गंभीरता शायद मुद्दा न हो...

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  40. हम तो पोस्ट लिखने के बाद अपने ब्लाग पर दुबारा झाँक कर भी नहीं देखते..मेल से ही पता चल जाता है कि कौन क्या लिख कर गया...जरूरत हुई तो उसकी टिप्पणी का जवाब मेल से ही देने का ही प्रयास करते हैं....

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  41. खुशदीप जी,
    कितने तो धुरंधर और धाकड़ लोग अपनी टिप्पणी दे गए...
    अब हमरी क्या बिसात...??
    वैसे अपनी पोस्ट पर कमेन्ट करना मुझे भी पसंद नहीं है...जबतक कि कोई सीधा सवाल न करे...या फिर किसी ने ईमेल से कोई कमेन्ट भेजा हो और उसे पोस्ट करना हो...
    लेकिन कई पोस्ट्स में देखा है...लेखक सबको धन्यवाद देते हैं जिसे पढ़ कर अच्छा लगता है...इसलिए ये बुरा भी नहीं है...अपनापन तो बढ़ता ही है इससे भी...
    सच पूछिए तो ये अपनी-अपनी सोच है...और अपना-अपना इश्टाइल ...
    हाँ नहीं तो...!!
    विश्वास से बढ़ कर कुछ भी नहीं है दुनिया में...
    बहुत ही अच्छी पोस्ट...हमेशा कि तरह...देर से आई हूँ...लेकिन भूली नहीं थी..

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  42. धन्यवाद के लिये तो कतई टिप्पणी नही देना चाहिये हाँ कोई बहस हो कोई सवाल हो तब ठीक है । और स्पष्टिकरण तो कतई ज़रूरी नहीं जो लिखना हो पोस्ट मे लिखे या ज़्यादा ज़रूरी हो तो अगली पोस्ट में ।

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  43. हमे तो लग रहा है कि हमारे अलावा सभी आदर्श ब्लोगर है.
    हमारी कुछ आपत्तिया है
    १. हो सकता है आपके ब्लोग पर टीपने कोई नया मेहमान आया हो और आपसे उसका परिचय ना हो और उसका ईमेल भी आपके पास ना हो.
    २. हो सकता है आप निजी आचरण मे भी आभार प्रकट करने के कायल हो.
    ३. हो सकता है ब्लोग लेखन और टीपना आपके लिये सामाजिकता का ही हिस्सा हो.

    जहा मुझे लगता है कि आभार प्रकट करना जरूरी है वहा आगे भी अपने ही ब्लोग पर पूरे आत्म सम्मान के साथ आभार प्रकट करता रहुन्गा.

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