खुशदीप सहगल
बंदा 18 साल से कलम-कंप्यूटर तोड़ रहा है

बच्चे आप से कुछ बोल्ड पूछें, तो क्या जवाब दें...खुशदीप

Posted on
  • Saturday, March 27, 2010
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • in
  • Labels: , , , , , , , ,
  • बड़े दिन से हंसी ठठे वाली पोस्ट लिख रहा था...आज कुछ सीरियस लिखने का मूड है...पहले मैं इस विषय को ब्लॉग पर लिखने को लेकर बड़ा ऊहापोह में था...लिखूं या न लिखूं...इसी दुविधा में था कि आज अविनाश वाचस्पति भाई से बात हुई...मैंने अविनाश भाई से कहा कि अंग्रेज़ी ब्लॉग्स पर बोल्ड विषयों पर भी खूब बेबाकी से लिखा जाता है....तो क्या हिंदी ब्लॉग अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ है जो बोल्ड टॉपिक्स को झेल सके...लेकिन मेरा करीब छह महीने की ब्लॉगिंग का अनुभव कहता है जो भी हिंदी ब्लॉगिंग में हैं, सभी बड़े मैच्योर और सुलझे हुए हैं...अगर किसी बहस का आधार बोल्ड विषय को बनाया जाए तो ज़रूर सभी खुल कर बात रखेंगे...अविनाश भाई ने भी इस पर सहमति जताई...तभी मैं इस विषय पर कुछ लिखने की हिम्मत दिखा पा रहा हूं...


    जिस तरह रिले रेस चलती है उसी तरह हमारी या किसी भी प्राणी की जीवन रेस चलती है...हमें अपनी दौड़ पूरी करने के बाद बैटन अपनी संतान या उत्तराधिकारी को पकड़ाना होता है...किसी भी प्रजाति या स्पीसिज़ के सर्ववाइवल के लिए ज़रूरी है कि प्रजनन के ज़रिए उसे आगे बढ़ाए...ये सृष्टि का विधान है...जैव विकास इसी तरह आगे बढ़ता है...अब इसके लिए ज़रूरी है पुरुष और महिला का मिलन...जब ये एक ज़रूरी नियम हैं तो फिर इस पर बात करने से हम कतराते क्यों हैं...



    हम जिस ज़माने में पैदा हुए तब से अब तक बहुत सारा पानी गंगा में बह चुका है...जो बातें हमें काफ़ी बड़े होने के बाद पता चलीं वो आज की पीढ़ी को बहुत छोटी उम्र में ही पता चल जाती हैं...तब आज की तरह सैटेलाइट टीवी नहीं था...जो खुलापन किसी वक्त विदेश में देखकर हम ताज्जुब किया करते थे, वो बुद्धु बक्से के ज़रिए हमारे ड्राइंग रूम तक पहुंच चुका है...आप कब तक नज़र रख पाएंगे कि बच्चा टीवी, इंटरनेट या मोबाइल पर क्या देखे और क्या नहीं...और ये शाश्वत सत्य है कि आप बच्चे को जिस चीज़ के लिए रोकेंगे, उसे कौतुहल के चलते वो जानने की इच्छा और प्रबल होगी...वो चोरी छिपे ये सब देखे तो आप क्या कर लेंगे...या मानिए वो स्कूल या घर के बाहर दूसरे बच्चों की सोहबत में कुछ ऐसा-वैसा सीखे तो आप कैसे उसे रोक पाएंगे...मेरा ये मानना है कि बाल मस्तिष्क बहुत कच्चा होता है...उसे हैंडल करने के लिए सबसे ज़्यादा केयर की ज़रूरत होती है...आपकी सख्ती या ज़रूरत से ज़्यादा ढील के चलते बच्चे के दिमाग में कुछ गलत बैठ गया तो बड़े होने पर विकार बनकर उसके विकास में कई तरह की समस्याएं खड़ी कर देता है...इसलिए यहां मां-बाप की भूमिका बहुत अहम हो जाती है...


    जीवन के इस ज़रूरी पाठ (सेक्स) के बारे में बच्चा सही जानकारी कहां से ले...आज ये कहने से काम नहीं चलता कि बड़े होने पर अपने आप सब कुछ आ जाता है...ये तर्क सिर्फ दिल को तसल्ली देने के लिए ही हो सकते हैं कि शेर को शिकार करना कोई सिखाया जाता है या मछली को पानी में तैरना कोई सिखाया जाता है...अब आप खुद बताइए जब टीवी पर कोंडोम, गर्भनिरोधक गोली या परिवार नियोजन के बारे में कोई एड आता है और आप बच्चों के साथ ड्राइंग रूम में बैठे साथ देख रहे हैं तो आपके चेहरे पर क्या भाव आते हैं...रिमोट से चैनल बदल देते हैं...मुंह दूसरी तरफ़ घुमा लेते हैं...कोई दूसरी बात से ध्यान दूसरी ओर करने की कोशिश करते हैं...स्थिति तब और अजीब हो जाती है जब कोई छोटा बच्चा उन एड के बारे में आपसे कोई सवाल दाग देता है...आप या तो उसे झिड़क देते हैं या फिर सवाल को टाल जाते हैं...यहां बच्चे की उत्कंठा शांत नहीं होती...बाल-मन की प्रकृति है कि वो नया सब कुछ जानने, सब कुछ सीखने की कोशिश करता है...अब आप उसे नहीं बताते या रोकते हैं तो उसके मन में पेंच जरूर रह जाता है कि आखिर मुझसे ये बात छुपाई क्यों जा रही है...फिर इस समस्या का समाधान कैसे हो...क्या बच्चे को ऐसे ही उनके हाल पर छोड़ दिया जाए...या इस टॉपिक के लिए कोई साइंटिफिक एप्रोच अपनाई जाए...



    बच्चे क्लास में भी तो बॉयोलॉजी के चैप्टर में रिप्रोडकशन का चेप्टर पढ़ते हैं...वहां उनकी नया जानने की बाल सुलभ भावनाएं तो रहती हैं, लेकिन उनके मन में कोई ऐसा वैसा गलत ख्याल नहीं आता...तो क्यों न पिता बॉयोलॉजी के उस चैप्टर या बाज़ार में मिलने वाले बॉडी पार्ट्स चार्ट्स के ज़रिए ही बच्चों को शारीरिक संरचना के बारे में समझाए...यहां बस इनोवेटिव होने की ज़रुरत है...

    मेरा ये मानना है कि बच्चे में जब हार्मोनल चेंज आने शुरू होते हैं तो लड़कियों को तो उनकी माएं काफ़ी कुछ बता देती हैं...लेकिन लड़कों से कोई बात नहीं करता...मेरी समझ से यहां पिताओं की भूमिका बहुत अहम हो जाती है...पिता को बेटे से दोस्त की तरह बात करनी चाहिए...
    किशोरावस्था में लड़कों के शरीर में भी बड़े हार्मोनल चेंज आते हैं...लेकिन उन्हें दोस्तों से या घर के बाहर से जो जानकारी मिलती है, वो अधकचरी होती है...इससे बच्चे के मन में गिल्ट आना शुरू हो जाता है...मैं यहां दो शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता था लेकिन उन्हें लिखा बिना कोई चारा भी नज़र नहीं आ रहा...किशोरावस्था में बैड वैटिंग या मास्टरबेशन बड़ा ही सीक्रेट या यूं कहें गंदे कहे जाने वाले शब्द हैं...लेकिन ये मानव शरीर की प्रकृति के चलते भी हो सकता है...अगर घर के पानी की टंकी पूरी तरह भर जाती है तो ओवरफ्लो होना शुरू हो जाती है...ये लड़के के जवानी की दहलीज पर कदम रखने का भी प्रतीक है...बस इतनी सी बात है...ज़िम्मेदार पिता को किशोर बेटे को समझाना चाहिए कि अति हर चीज़ की बुरी होती है...लेकिन प्रकृति भी अपने कुछ नियमों से चलती हैं...इन्हें लेकर मन में अपराधबोध नहीं लाना चाहिए...

    अभी पिछले दिनों देहरादून में एक वाक्या हुआ था...एक सातवीं के लड़के ने टायलेट में चौथी की बच्ची के साथ उलटा सीधा करने की हरकत थी...आप कह सकते हैं कि ये सब जो टीवी पर दिखाया जा रहा है उसका असर है...सही बात है...कल को ये समस्या किसी भी बच्चे के साथ पेश आ सकती है...लेकिन इसका ये इलाज भी तो नहीं टीवी बंद करके ही ताक पर रख दिया जाए...बच्चे सही राह पर चलें, ये देखना भी तो हमारा फर्ज है...अब हम कब तक बच्चों को ये कह कर भ्रमाते रहेंगे कि मम्मी बेबी को भगवान के पास से लाई है...बच्चे बहुत स्मार्ट हो गए हैं...जिस तरह आप चाहते हैं कि बच्चे हमेशा आप से सच बोलें, उसी तरह बच्चे भी चाहते हैं कि पापा-मम्मी भी उनसे झूठ न बोलें...

    अगर आप बच्चे का करियर बनाने के लिए अपना सब कुछ झोंक देते हैं...तो वैवाहिक जीवन भी ज़िंदगी का बड़ा सच है...बच्चे के वैवाहिक जीवन में इग्नोरेंस या गलत जानकारी की वजह से कोई समस्या न आए, इसके लिए भी तो हमारा कुछ फर्ज बनता है...अभी आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ में एक बड़ा रिवोल्यूशनरी कोर्स शुरू हुआ है...जिनकी शादी होने जा रही है, उनके लिए ये कोर्स बड़ा एडुकेटिव है...इससे सेक्स या ह्यूमन रिलेशंस को लेकर कई तरह की भ्रांतियां दूर हो जाती है...आज इसी तरह की एप्रोच अपनाने की ज़रूरत है...


    इस दिशा में मैं डॉ टी एस दराल से अपील करता हूं कि कोई आसान भाषा में चार्ट्स के ज़रिए ऐसा प्रेंजेंटेशन तैयार करें जिनके ज़रिए मां-बाप सीख सकें कि बच्चों से सेक्स को लेकर कैसे बात की जाए...अगर ब्लॉगर भाई भी इस विषय में कुछ कहना चाहते हैं तो खुलकर अपनी बात रखें...खजुराहो और वात्सायन के देश में संस्कृति के नाम पर हम कब तक ढपोरशंख बने रहेंगे...एचआईवी और एड्स के खतरे के चलते हमें और सावधान होने की ज़रूरत है...नई पीढ़ी को सही जानकारी देना हमारा फ़र्ज बनता है...ज़माना बदल गया है...हम कब बदलेंगे...




    डिस्क्लेमर- अगर इस लेख में मेरे इस्तेमाल किए गए एक दो शब्दों से किसी को असुविधा हुई है तो मैं पहले ही माफ़ी मांग लेता हूं...



    ज़रूरी सूचना...आज स्लॉग ओवर छुट्टी पर है...मक्खन ने अलबेला खत्री जी के सम्मान में राजीव तनेजा भाई और संजू तनेजा भाभी की ओर से अपने घर पर दी गई दावत में इतना कुछ खा लिया कि लंबी तान कर सो रहा है...उठाने पर भी नहीं उठ रहा...




     

    47 comments:

    1. मानसिकता बच्चों की समझनी चाहिए और प्रयास करना चाहिए कि वे अपने जननागों के बारे में और अपने ऊपर होने वाले हमलों के बारे में जाने.
      बच्चों को इस दिशा में जागरूक करने के लिए यौन शिक्षा की महती आवश्यकता है.
      जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

      ReplyDelete
    2. मै डॉ टी एस दराल जी की टिपण्णी का इंतजार करुंगा, तब तक मै भी शाली मार बाग घुम आऊं

      ReplyDelete
    3. खुशदीप जी, ऐसे ही विषय पर उन्मुक्त जी भी अपने ब्लौग में लिख चुके हैं. आप उनके ब्लौग में तलाश सकते हैं.

      ReplyDelete
    4. आपने बहुत ही सार्थक पोस्ट लिखा है...और उदाहरण भी एकदम आम जिंदगी के ही है...सच में यही होता है....इस दिशा में प्रयास होने भी चाहिए....वैसे आजकल के माँ-बाप भी बच्चों से खुलने लगे हैं...रफ़्तार धीमी है...बस.

      ReplyDelete
    5. @hindizen.com

      आप लिंक दे देते तो हम सब का भला होता...मुझे खुशी है कि हिंदी ब्लॉगिंग में भी बोल्ड पर बेहद ज़रूरी विषयों पर लिखा जा रहा है...मैं उन्मुक्त जी के ब्लॉग पर जाकर उनका लेख ज़रूर पढ़ूंगा...

      जय हिंद...

      ReplyDelete
    6. आप ने बिलकुल सही लिखा है। अब वह जमाना बीत गया जब इन चीजों को छिपाया जाता था। जैसे लड़कियों को माँएँ शिक्षित करती हैं वैसे ही पिताओं को अपने बेटों को शिक्षित करना चाहिए। मैं तो समझता हूँ कि पिताओं से यह शिक्षा प्राप्त करने पर बच्चे सुसंस्कृत बनेंगे। लुच्चे और लफंगे नहीं।

      ReplyDelete
    7. बढिया आलेख और गम्भीर बहस की शुरूआत है.

      ReplyDelete
    8. ये एकदम सही है कि हमारे समाज में अभी इस बारे में लोग खुल कर बात नहीं करते है और जब स्कूल में sex education शुरू करने के लिए पहल की गयी तो बहुत से लोगों ने विरोध किया. पर ये आपने सही कहा शुरुआत घर से होगी. बस मानसिकता परिवर्तन की ज़रूरत है.

      ReplyDelete
    9. आपसे सहमत हूँ.....अब बच्चों को सभी बातें समय आने पर बता ही देनी चाहिए!

      ReplyDelete
    10. बच्चों के साथ ऐसे विषयों पर चर्चा करने में सबसे बड़ी हिचक होती है कब और कितना बताया जाए ...अगर इस पर सुधिजनो से कुछ मार्गदर्शन मिले तो बेहतर होगा
      अभी कुछ दिनों पहले भतीजी ने "गे समबंधो " के बारे में पूछ कर निरुत्तर कर दिया

      ReplyDelete
    11. सार्थक पोस्ट द्वारा गम्भीर बहस की शुरूआत करने के लिये साधुवाद..वक्त की जरूरत है यह्....

      जय हिंद

      ReplyDelete
    12. खुशदीप भईया, मना कि ये एक बोल्ड विषय है लेकिन ये अश्लील और अनावश्यक विषय नहीं.. बिलकुल भी नहीं.. अगर ये चेतना फैली और अभिभावक जागरूक हुए तो निश्चित रूप से कई बलात्कार के केस रुकेंगे, समाज में जाने कितने sexual harrasement और child abuse के केस रुकेंगे जो कि इस तरह के लेखन के सार्थक पहलू होंगे. इसलिए लोगों के नाराज़ होने की परवाह ना करें.. लोग पढ़ने जरूर आयेंगे. जिन्हें शर्म आएगी वो बिना टिप्पणी किये चले जायेंगे और इससे ज्यादा कुछ नहीं होगा.
      जय हिंद..

      ReplyDelete
    13. सहमत हूँ और निश्चित ही समय पर बच्चों को आवश्यक जानकारी देना चाहिये फिर वो चाहे स्कूली शिक्षा प्रणाली के माध्यम से हो या अभिभावको के माध्यम से.

      ReplyDelete
    14. महत्वपूर्ण जानकारी पढ़ने को मिली ।

      ReplyDelete
    15. बच्चे इधर उधर से कुछ गलत नहीं सीखें...अभिभावकों को ध्यान देना ही चाहिए ....

      ReplyDelete
    16. बाल मनोवि‍ज्ञान पर बदलते जमाने के साथ नए नए शोध होने चाहि‍ए।

      ReplyDelete
    17. आपकी बात सही है...समय आने पर बच्चों को सब कुछ बता देना चाहिए

      ReplyDelete
    18. खुशदीप भाई, आपने एक बहुत अहम् विषय पर चर्चा छेड़ी है। बेशक सेक्स एडुकेशन बच्चों के लिए बेहद ज़रूरी है। हालाँकि सदियों से इसके बिना भी सन्सार चलता रहा है। आखिर कुछ तो कुदरत भी सिखा ही देती है। अब ज़रा सोचिये पशुओं ,पक्षियों और जानवरों को कौन सिखाता है । फिर भी उनका वंश चलता रहता है। अगर लुप्त भी होता है तो इंसान की वज़ह से । आपने एक फिल्म देखी होगी --दी ब्ल्यू लैगून --इसमें कुछ ऐसा ही दिखाया गया है कि किस तरह एक लड़का लड़की प्राकृतिक रूप से सब कुछ सीख जाते हैं।
      लेकिन आजकल के माहौल में सेक्स एडुकेशन बहुत ज़रूरी है । आप को यह जानकार हैरानी होगी कि मुझे मेरे दादाजी ने ४० साल पहले वो बातें बताई , सिखाई , जो आज हम आपने बच्चों को भी नहीं बता पते।
      सही है कि मां --बेटी को और पिता बेटे को कुछ ज्ञान दे सकता है। बस थोडा कम्युनिकेशन चैनल्स खोलने की ज़रुरत है।
      पहले जहाँ प्रोब्लम्स होती थी --स्वपन दोष , हस्त मैथुन , शीघ्र पतन , सफ़ेद पानी , धात ( ये कोई रोग नहीं ) , और अंत में गुप्त रोग।
      आजकल एड्स ने सारा द्रश्य ही बदल दिया है । अब इससे सम्बंधित जानकारी देना बहुत ज़रूरी हो गया है । इससे पहले कि देर हो जाये , सभी अभिभावकों को संभल जाना चाहिए ।

      आपने जिम्मेदारी दी है , मैं जल्दी ही इस विषय पर एक सरल भाषा में लेख प्रस्तुत करूँगा ।

      ReplyDelete
    19. डॉक्टर दराल साहब,
      आपने ये ज़िम्मेदारी ले ली, समझिए सभी का भला हो गया...

      वैसे मैं अपना एक अनुभव शेयर करना चाहता हूं...मैंने एक दिन सोलह साल के बेटे को ज़ूलोजी पढ़ाते पढ़ाते ही आसान भाषा में किशोरावस्था में शरीर में होने वाले परिवर्तन के बारे में सब बताया...अब फर्क ये है कि पहले किसी भी मुद्दे पर वो मुझसे खुल कर बात नहीं कर पाता था...लेकिन अब वो हर बात मुझसे शेयर कर सकता है...उसका कॉन्फिडेंस लेवल भी पहले से कहीं बढ़ गया है...

      जय हिंद...

      ReplyDelete
    20. खुशदीप जी, आपने जो विषय उठाया है वह प्रकारान्‍तर से समाज में उठता रहा है। भारतीय समाज में परिवार संस्‍था के माध्‍यम से ही हम यौन शिक्षा ग्रहण करते थे। ना कोई चार्ट बनाकर समझाना पड़ता था और ना ही कोई पुस्‍तक। लड़कियों को तो आज भी माँ से शिक्षा मिलती ही है जैसा कि आपने भी लिखा है, बस चिन्‍ता का विषय यही है कि लड़कों को आजकल शिक्षा मिलना बन्‍द हो गया है। पूर्व में पिता और गुरु लड़कों को शिक्षित करते थे। मैं कई बार अपनी टिप्‍पणियों में कह चुकी हूँ कि आज लड़कों को संस्‍कारित करने की आवश्‍यकता है। आज जिस प्रकार की यौन शिक्षा विद्यालयों में देने की बात हो रही है वह विकृत रूप है। इस समस्‍या का समाधान केवल मात्र परिवार है और कोई भी नहीं। क्‍योंकि परिवार में ही हम पुरुष और स्‍त्री के अतिरिक्‍त अन्‍य रिश्‍तों से भी बंधे होते हैं तब किताबी ज्ञान की जगह हमें वास्‍तविक ज्ञान की प्राप्ति होगी। नहीं तो हम भी केवल नर और मादा ही बनकर रह जाएंगे। जब कि मनुष्‍य एक सामाजिक प्राणी है।

      ReplyDelete
    21. BAHUT HI ACCHA MUDDA UTHAYA HAI AAPNE . JANKARI SE HAMARE BACHHO GALAT AUR SAHI KE BEECH FARK KAR SAKTE HAIN. AUR KAI TARAH KI BIMARIYON KE BARE MAIN JAGROOK HO SAKTE HAIN.

      ReplyDelete
    22. जब बच्चे बड़े होने लगे तो ऐसा होना भी चाहिए ..ज़रूरी है ताकि वो भी यौन शिक्षा के बारें में अच्छे से समुचित जानकारी पा सकें...बढ़िया थोड़ा अलग पर सार्थक आलेख..धन्यवाद भैया

      ReplyDelete
    23. The post of Unmukt jee is here -
      http://unmukt-hindi.blogspot.com/2007/06/everything-you-always-wanted-to-know.html

      ReplyDelete
    24. सार्थक पहल है एक अहम विषय पर , साधुवाद ।

      ReplyDelete
    25. खुशदीप, मैं आपकी बात से सौ प्रतिशत सहमत हूँ. मेरे ख्याल से हमारे देश में छेड़छाड़ के बहुत से अन्य कारणों में से एक सेक्स एजुकेशन का सही ढंग से न दिया जाना भी है. आपकी ये बात भी सही है कि लड़कियों को तो माँएँ और बहनें बहुत कुछ बता देती हैं, पर लड़कों को ये सारी बातें इधर-उधर के स्रोतों से पता चलती हैं, जो उनके लिये भी घातक है और समाज के लिये भी. आपके ये शब्द बहुत सही हैं.
      "बच्चे क्लास में भी तो बॉयोलॉजी के चैप्टर में रिप्रोडकशन का चेप्टर पढ़ते हैं...वहां उनकी नया जानने की बाल सुलभ भावनाएं तो रहती हैं, लेकिन उनके मन में कोई ऐसा वैसा गलत ख्याल नहीं आता...तो क्यों न पिता बॉयोलॉजी के उस चैप्टर या बाज़ार में मिलने वाले बॉडी पार्ट्स चार्ट्स के ज़रिए ही बच्चों को शारीरिक संरचना के बारे में समझाए...यहां बस इनोवेटिव होने की ज़रुरत है..."
      इस बात पर एक वाकया याद आ रहा है. दीदी की बेटी जब तीन साल की थी, तो अपनी मम्मी की देखादेखी गुड़िया को दूधू पिलाने का अभिनय करने लगी और अपने पापा से बोली, "पापा देखो गुलिया दूधू पी लई ऐ" इस पर जीजाजी ने उससे कहा कि बेटा बड़ी हो जाना, तब दूधू पिलाना. बच्ची ने पूछा " बली हो जाउंगी तो मेला बी दूधू ओगा" तो जीजाजी ने कहा" हाँ, होगा" मैंने जब ये घटना सुनी तो मुझे लगा कि किसी अप्रिय से लगने वाले वाकये को इनोवेटिवली कितनी अच्छी तरह हैंडल किया जा सकता है. इससे बच्चों को सही बात पता चलती है और कुंठा नहीं उत्पन्न होती.
      मैं अपने ब्लॉग "नारीवादी बहस" पर छेड़छाड़ की समस्या पर एक श्रृँखला लिख रही हूँ. उसकी तीसरी और अन्तिम किस्त में मैं लड़कों के सेक्स एजुकेशन की बात लिखने वाली हूँ. इस संदर्भ में आपकी इस पोस्ट का लिंक दे दूँ क्या? आपकी इजाज़त हो तो?

      ReplyDelete
    26. मुक्ति जी लिंक देने की जरूरत नहीं है। पोस्‍ट लगाने की जरूरत है। आपको नुक्‍कड़ से जुड़ने का आमंत्रण भेजा गया है। आप उसे स्‍वीकार लीजिए और बेधड़क होकर उस पर लिखिए, आपका स्‍वागत है।

      ReplyDelete
    27. मुक्ति जी,
      पहले तो आपका आभार, आपने मेरी पोस्ट को उसी सार्थक संदर्भ में लिया जैसा कि मैं चाहता था...मैं अभिभूत हूं कि जिस बोल्ड विषय को रखते हुए मैं डर रहा था, उस पर सुधि ब्लॉगर बिरादरी ने खुल कर प्रतिक्रिया दी...खास तौर पर मुझे खुशी हुई जब मातृशक्ति में से भी कई ने अपनी राय रखी... ये निश्चित रूप से हिंदी ब्लॉगिंग के नए आयाम छूने का संकेत है...अब ऐेसे विषय भी सिर्फ अंग्रेज़ी ब्लॉगिंग की बपौती नहीं रह जाएंगे...और आपने अनुमति की जो बात कही है, ये भी आपका बड़प्पन है...मैं तो चाहता ही यही हूं कि इस मुद्दे का ज़्यादा से ज़्यादा प्रचार हो और पिता इस दिशा में भी अपनी ज़िम्मेदारी समझें...अब डॉ टी एस दराल सर ने भी इस मुद्दे पर काम करना शुरू कर दिया है...जल्दी ही उनकी पोस्ट भी हमारे सामने होगी...बाकी मैं इस विषय पर कोई और मदद कर सकता हूं तो निस्संकोच कहिएगा...

      जय हिंद...

      ReplyDelete
    28. वाह हिंदी ब्लोग्गिंग करवट ले रही है जी ...बहुत खूब ..बस अब इन्हीं तेवरों और ऐसे ही विषयों की जरूरत है ..इन्हें आगा लाया जाए..बहुत शुक्रिया आपका खुशदीप भाई
      अजय कुमार झा

      ReplyDelete
    29. बहुत ही सार्थक पोस्ट है। मुक्ती जी ने जो मुद्दा उठाया है वो भी काफ़ी गंभीर विषय है ,आशा कर रही हूँ कि सेक्स एजुकेशन के नाम पर सिर्फ़ शारीरिक बदलावों और बच्चे कैसे पैदा होते हैं इस पर ही इति नहीं कर दी जाएगी। मैं ने कुछ दिन पहले अपने कॉलेज में सेक्स एजुकेशन पर एक लेक्चर करवाया था। कॉलेज के किशोर युवक युवती श्रोता थे, हमने उनसे कहा कि उनके मन में जो सवाल उठ रहे हैं वो लिख कर हमें दे सकते हैं और बिना नाम लिए उनके जवाब उसी लेक्चर में दिये जायेगें। सवालों की झड़ी लग गयी थी और उस उम्र के बच्चों की अज्ञानता हम टीचर्स के लिए चौंकाने वाली थी। अब ये कार्यक्रम हर साल करने का निश्चय कि्या गया।

      ReplyDelete
    30. चर्चा के लिए अच्छा विषय चुना है आपने!

      ReplyDelete
    31. खुशदीप जी,
      सबसे पहले तो देर से आने के लिए माफ़ी चाहती हूँ,
      मैं एक मुशायरा में गयी थी montreal जो हमारे यहाँ से तकरीबन २ घंटे की ड्राईव पर है...आने जाने में ५ घंटे लग गये और मुशायरा रात के २.३० बजे तक चला, सुबह घर पहुंची हूँ और आपकी पोस्ट पढ़ी...जवाब देना ज़रूरी ही नहीं बहुत ज़रूरी है...
      यहाँ कनाडा में क्लास ३ से ही सेक्स की पढाई शुरू हो जाती है...बुरा तो लगता है कि बच्चे का बचपन की ख़त्म हो जाता है..जो बातें हमें बहुत बाद में पता चलीं थी उनकी जानकारी यहाँ बच्चों को बहुत पहले ही हो जाती हैं स्कूल में ही....फिर मैंने भी अपने बच्चों के साथ बातें करनी शुरू की..आप सही कहते हैं माँ-बेटी के बीच इस तरह की बात आराम से हो जाती है लेकिन बाप-बेटे में नहीं...लेकिन मैंने अपने बेटों के साथ भी बात की है/करती रहती हूँ ...जितना मैं जानती हूँ, इस जिम्मेदारी को संतोष जी भी बहुत अच्छी तरह निभाते हैं...अच्छी बात ये है कि बच्चों में यौन को लेकर कोई कुंठा नहीं है,
      लेकिन किसी बात की अति भी ठीक नहीं होती ..और इसमें यहाँ के स्कूल भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं...जो कभी कभी आक्रोश भी दीलाता है...
      मुझे याद है मृगांक एक दिन घर आया और बहुत परेशान था ..आते साथ ही बताने लगा कि आज स्कूल में उनलोगों को बच्चे की delivery का एक विडियो दिखाया गया जिसे देख कर उसने उस दिन खाना ही नहीं खाया...:) यह घटना हाई स्कूल में मेडिकल में जाने से पहले की है...बात-चीत से ये पता चला की ऐसी भयानक चीज़ देख कर वो सेक्स से ही डर गया...इस तरह ज़रुरत से ज्यादा ज्ञान भी घातक हो सकता है....बच्चों में को एक नैसर्गिग उत्कंठा, अनुराग है उसको बचाते हुए जो भी मार्ग दर्शन किया जाए अच्छा रहेगा....
      आप ने बहुत ही सार्थक मुदा उठाया है...इसपर और बात होनी चाहिए....फिलहाल तो मैंने चाय भी नहीं पी है....मिलते हैं एक ब्रेक के बाद...

      ReplyDelete
    32. This comment has been removed by the author.

      ReplyDelete
    33. aaj ke waqt mein ye vishay ab utna bold nahi rah gaya kyunki ye aaj ki jaroorat hai aur mere khyal se aaj ke bachche bhi sab share kar lete hain parents se agar thoda sa unhein parents ka sath mile ........bas parents ki taraf se ek pahal ki jaroorat hai.

      ReplyDelete

    34. इस विषय पर इतने सार्थक मत-विमर्श गौरतलब हैं ।
      और.. हमें अपने को इसके अनुसार बदलना चाहिये ।
      वर्जनायें एक विकृत उत्कँठा को जन्म तो देती ही हैं,
      साथ ही कभी भूलवश इसके खँडित हो जाने की जो
      स्थिति बनती है..वह आजीवन एक अपराधबोध की
      हीनता से ग्रस लेती हैं ।
      कभी कभी मुझे लगता है, क्या बालविवाह उचित था ?
      एक निरापद आयु में ही खेल खेल में सही एक दूसरे को
      एक्सप्लोर कर लेना उन्हें हानिरहित प्रौढ़ता देता होगा..
      पता नहीं ?
      यदि कोई विज्ञ-जन इस पर प्रकाश डाल सकें, तो खुशी होगी ।

      ReplyDelete

    35. I am sorry for my comment.
      It may please be ignored.. since I did n't knew that this forum has come under perview of approval.
      Sorry khushdeep, Let me repent for being myself.

      ReplyDelete
    36. डॉक्टर अमर कुमार जी,
      सर, मैं मॉ़डरेशन खुद ही लगाना पसंद नहीं करता...लेकिन आज एक बेनामी जी ने आकर तंज कसा था...सिर्फ मेरे ऊपर होता तो मैं सह जाता...वो मेरे साथ एक सम्मानित महिला ब्लॉगर पर भी था...उस कॉमेंट को डिलीट करने के लिए ही मैंने मॉ़डरेशन ऑन किया...सिर्फ पांच-छह मिनट के लिए...संयोग से इसी बीच आपकी टिप्पणी आ गई...जिसे मैंने देखते ही पब्लिश कर दिया...आपकी इस टिप्पणी से मुझे एक बात समझ नहीं आ रही, आशा है आप वैसे ही मेरी शंका का निवारण करेंगे जैसे कि पहले भी करते रहे हैं...क्या आप उन ब्लॉग्स पर टिप्पणी देना पसंद नहीं करते जहां मॉ़डरेशन ऑन रहता है...ये मैं सिर्फ अपनी उत्कंठा शांत करने के लिए पूछ रहा हूं...कृपया इसका कोई और अर्थ न लीजिएगा...आपका एक एक शब्द मेरे लिए गीता से कम नहीं होता...

      जय हिंद....

      ReplyDelete
    37. @ खुशदीप जी,
      मेरे ब्लॉग का उद्देश्य किसी पर 'निशाना साधना' या तंज कसना कभी नहीं रहा। आप मेरी की हुई सारी टिप्पणियों को देख सकते हैं और वहाँ के पोस्ट भी। रही बात आप की पोस्ट पर किए कमेंट की जो शायद यह था (शायद इसलिए कि आप टिप्पणी मिटा चुके हैं)"बोल्ड बेहद बोल्ड! अदा जी के बोल्डनेस के क्या कहने!" तो यह प्रशंसा में की गई थी। वाकई आप की पोस्ट और अदा जी की टिप्पणी में वह बोल्डनेस थी जिसकी हिन्दी ब्लागिंग में कमी है। चूँकि मेरे ब्लॉग पर घनघोर बहस चल रही थी इसलिए लम्बी टिप्पणी नहीं हो पाई और आप लोग उल्टा समझ बैठे।
      आप लोगों को गलतफहमी हुई, इसके लिए शर्मिन्दा हूँ और आप दोनों से मुआफी की दरकार है। ब्लॉग जगत के बाकी जिन लोगों को भी तकलीफ हुई हो उनसे भी मुआफी की दरकार है।
      यदि ऐसा हुआ है तो यह उस ब्लॉगके उद्देश्य के विरुद्ध है। पहली बार हुआ है इसलिए कष्ट अधिक है, आशा है आप लोग समझेंगे।
      रही बात छिपने की, डरने की तो यह मेरे ब्लॉग की प्रथम पोस्ट में ही स्पष्ट किया गया है:
      "इस नामवर दुनिया में सभी बेनामी हैं। स्पष्टीकरण उन्हें देना है जो नाम के साथ घूमते हैं, बात करते हैं और अनर्थ करते हैं।हमें अपने बेनामी होने की सफाई देने की कोई आवश्यकता नहीं। हम लिखेंगे बिन्दास और अपनी बात भी रखेंगे बिन्दास।"
      बेनामी होने का एक उद्देश्य है - लोग वस्तुपरक होकर पढ़ सकें, टिप्पणी कर सकें और बहस कर सकें। नाम होने से मन में दुविधाएँ आती हैं और बात खुल कर सामने नहीं आ पाती।
      खुशदीप जी, मैं उस टाइप का बेनामी नहीं जो कुछ भी अंट शंट टिप्पणी करता रहता है। एक बार मेरी की गई टिप्पणियों को देखिए तो सही।
      बेनामी ब्लॉग जगत का एक खुशनुमा पहलू है जिसकी मर्यादा, हाँ मर्यादा, याद दिलाने के लिए यह ब्लॉग शुरू किया गया। पुराने जमाने में प्रिंट में ऐसा होता रहा है - याद करिए नेहरू का 'चाणक्य' घोस्ट नाम से अपनी ही आलोचना करता लेख।

      ReplyDelete
    38. बेनामी जी,
      अच्छा हुआ आपने मंतव्य स्पष्ट कर दिया...आपने जो एक लाइन की टिप्पणी दी थी, उसमें आगे-पीछे संदर्भ न होने की वजह से किसी को भी गलतफहमी हो सकती थी....अगर आप वहीं पूरी बात लिख देते तो ऐसी स्थिति ही नहीं आती...

      रही बात आपकी कल वाली पोस्ट की तो वो मुझे अच्छी लगी...उस मुद्दे पर मेरी क्या प्रतिक्रिया है, वो मैंने अजय कुमार झा जी के ब्लॉग पर स्पष्ट कर दी...बेनामी होने से मेरा विरोध बस इतना है कि मैं उस व्यक्ति से जिसके मैं विचार पढ़ रहा हूं, वास्तविकता में रू-ब-रू नहीं हो सकता...जिसकी प्रकृति से मैं वाकिफ़ नहीं, उससे कैसे अंतर्सवांद कर सकता हूं...आशा है एक दिन आप ज़रूर असली पहचान के साथ लिखना शुरू करेंगे...आपने गलतफहमी दूर करने के लिए दोबारा लिखा...आभार...

      जय हिंद...

      ReplyDelete

    39. @ खुशदीप सहगल


      बेहतर !
      इस बिन्दु पर बेहतर परिसँवाद की सँभावनायें मौज़ूद हैं,
      यदि हम इसे व्यक्तिगत आक्षेपों की मार से बचा सकें ।
      मैंनें तो बेनामी जी की वह टिप्पणी भी देखी थी, और शायद उन्हें निराशा हो कि मुझे वह कोई ख़ास नोटिस लिये जाने लायक लगा भी नहीं । यह एक चुहल के स्तर से आगे इसे ले जाने की दृष्टि के योग्य है भी नहीं !
      बाद की अपनी टिप्पणी में वह अपनी सफाई पेश करते हुये से नज़र आ रहे हैं, किन्तु मैं उनकी ईमानदारी का कायल हूँ ।
      अब रही आपकी जिज्ञासा, तो मेरा " being myself. " यानि जो हूँ जैसा हूँ कोई निजी अहँ नहीं, बल्कि स्वतँत्र सोच है ! जब मेरे डैने उग ही रहे थे, 18 वर्ष की उस वयस में मैंनें इमरज़ेन्सी और प्रेस सेन्सरशिप के दँश को महसूस किया है । यह भी बात दीगर है कि मैंनें सुबोध ( कान्त सहाय ) या अन्यों की तरह इससे राजनीति में घुसने के दरवाज़े नहीं तलाशे, क्योंकि तब भी मेरा यही मानना था कि एक व्यक्ति या एक विचार जो है, सो है ।
      आप चाहें तो इसे स्वीकार करें.. यह आपकी मर्ज़ी.. पर अस्वीकरण की शर्त पर किसी आलेख की स्वीकृति माँगना हास्यास्पद है । नतीजन यह " आह आह, वाह वाह, या हाज़िरी बजाने की औपचारिकताओं तक सिमट गयी है । यानि हम वही देखें, जो वह दिखाना चाहते हैं, याकि इसके उलट हम वही दिखायें जो वह देखना चाहते हैं ! है न यह दोरँगी सुविधा ? मैं अपनी सोच को इसमें या कहिये कि इस सँवाद-प्रहसन में, क्यों शामिल करूँ ?
      मेरी नज़र में यह एक बुर्जुआ मसनद है, जो आरामतलब बाज़ारवाद को प्रोत्साहित करती है । जनभावना के प्रतिकूल होने मात्र की दुहाई देकर किसी टिप्पणी को स्वयँ ही रोक देने वाले, समाज में आख़िर कौन सा बदलाव लाने जा रहे है ।
      यह परस्पर सौहाद्र के नाम पर एक आरामतलब टिप्पणी-बाज़ार के वायदा-व्यापार से अधिक कुछ और नहीं । अभिव्यक्ति का पाखँड बेचने वाला आपका डेस्क मैनेज़र यदि आपकी स्टोरी में कतर ब्यौंत लगाता है, तो यह उसकी व्यवसायिक मज़बूरी होती है क्योंकि वह सेठ की नौकरी कर रहा है.. ब्लॉगर पर जहाँ सभी अपने मालिक स्वयँ ही हैं, ऎसी अपेक्षायें क्यों ?

      ReplyDelete
    40. @डॉ अमर कुमार जी,
      सर, हमेशा की तरह आपने एक बार फिर मेरे दिमाग पर बंधी एक पट्टी को हटाया...एक नया पाठ पढ़ाया...बताया कि सेंसरशिप कहीं भी हो उसे मान्यता नहीं दी जानी चाहिए...हां, अगर कोई मर्यादा की सीमा लांघे तो अवश्य कोई रेमेडी अपनाई जानी चाहिए...

      जय हिंद...

      ReplyDelete
    41. कहना तो बहुत कुछ चाहता हूँ परन्तु समय अभाव के कारण नहीं कह रहा , मेरा नया पोस्ट पढ़िए ।

      ReplyDelete
    42. मॆ तो बहुत देर मे आया क्या करे अभी नये हॆ..साथ साथ exam मे भी ब्यस्त हॆ..पर दिल से कहू बहुत खुश भी हू कि अच्छा किया देर से आया नही तो इतने अच्छे अच्छे लोगो के विचारो से अवगत कभी ना हो पाता...खुशदीप सहगल जी आपने बहुत ही अच्छा लेख लिखा हॆ...आप वाकई बधाई के हकदार हॆ..

      ReplyDelete
    43. Devnagari fonts nahin hein is liye kshama atah English mein na chahte hue bhi likhna pad raha hai.

      Congratulations for writing this post.I followed Mukti's links.

      ...दो शब्दों से किसी को असुविधा हुई है तो मैं पहले ही माफ़ी मांग लेता हूं...

      Why appologize for something that is natural bodily process? The feelings of shame, guilt arising out of exposure are to be blamed for the purposive ignorance created by our so called modesty. In the agrarian communities, before the city bound existence of middle classes children practically saw animal husbandary practices and knew the most facts of life. The wedding songs and coming of the age rituals in some communities made it possible too. The middle class modesty taboos are killing the nation with AIDS and other calamities of similar order.

      Dr. Daral refering to movie Blue Lagoon is too lame. That was a young couple stranded on an isolated island. How would some young person handle a sexual predator in similar cirumstances? Any thoughts.

      About comapring the human sexuality to animal sexuality is too simplistic. Humans are the only animals that drink and eat when not hungry and mate year round, they have no mating season and biological inhibitions to multiple partners. With these stark differences is it possible to make this compariosn and then not worry about population exlosion and STDs.

      About mothers imparting basic information on bodily changes to daughters in India is again problematic as research studies have shown either conspicuous absence of mothers as information providers or where they happen to provide this information they try to treat it as necessary evil and generate negative self perception of women's body. Treating menstrual cycle as something to be ashamed of and a secret.

      I have prepared some parental education advocacy material on the similar issues based on age appropriate comprehension of the children as part of my violence prevention project. I need help with translating it into devnagari script and other vernacular scripts. If anyone is interested in pursing it please contact me.

      Thank you,

      Desi Girl

      www.girlsguidetosurvival.wordpress.com

      ReplyDelete
    44. khushdeep ji....bilkul sahi kaha hai aapne....kam education dene ki wajah se hi sari problems create hoti hai....ek sahi age aane par gal or boy dono ko hi sab bato ki jankari parents ki aur se de deni chahiye...thanks Archana

      ReplyDelete
    45. एक गंभीर मसले पर बहुत ही ईमानदारी और स्पष्ट ढंग से लिखा है आपने सहमत हूँ आपकी बातों से इसलिए तो मैंने भी लिखा था कि बच्चों पर नज़र रखना ज़रूरी है। न कि यह कि उन पर रोक टोंक लगायी जाये या उनके जिज्ञासु मन को टाला मटोली करके टाल दिया जाया। यहाँ जरूरत है बच्चों को सही ढंग से समझने कि, उनके द्वारा पूछे गए हर सवाल और विषय को कुछ इस तरह समझाने और बताने कि,की उनकी जिज्ञासा शांत हो सके और आगे भी वह आपके सामने अपने मन कि बातें खुलकर कर सके। सार्थक आलेख....

      ReplyDelete
    46. ओह शायद इतनी महत्वपूर्ण पोस्ट मुझसे मिस हो गयी थी ..आपके आगाज को हम अंजाम तक पहुंचा पायें --ईश्वर शक्ति दे !

      ReplyDelete

     
    Copyright (c) 2009-2012. देशनामा All Rights Reserved | Managed by: Shah Nawaz