शुक्रवार, 12 मार्च 2010

एक सवाल का जवाब दीजिए...खुशदीप

वाकई माहौल बड़ा गरम है...कुछ भी कहना ख़तरे से खाली नहीं है...कौन बुरा मान जाए...कौन लाठी बल्लम निकाल ले...कुछ पता नहीं ...जो नारी ममता की बरसात करती है...प्रेम और वात्सल्य का पर्याय मानी जाती है...पुरुषों के सब मुद्दों को सुलझाने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर साथ चलती है...लेकिन ब्लॉगवुड में उसी नारी को मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है...आप से बस एक सवाल के जवाब की उम्मीद करता हूं...

मेरा सवाल

सतयुग हो या कलयुग अग्निपरीक्षा हमेशा सीता को ही क्यों देनी पड़ती है ?



स्लॉग स्टोरी

एक और किस्सा आपको सुनाने का मन कर रहा है...शायद ब्लॉग पर ही कहीं पढ़ा है...याद नहीं आ रहा कहां...अगर इसे पढ़ने के बाद आपको याद आ जाए तो मुझे बता ज़रूर दीजिएगा...अफगानिस्तान में तालिबान की वहशी हुकूमत में महिलाओं को घरों में कैद करके रख दिया गया था...स्कूल जाना बंद...खेलों में हिस्सा लेना बंद, शरीर को पूरी तरह ढक कर रखना, मनोरंजन के सभी साधनों से दूर रहना...बहुत ज़रूरी हो तो घर के किसी पुरुष के साथ ही बाहर निकलने की इजाज़त...और भी न जाने क्या-क्या...



तालिबान का शासन अमेरिका ने खत्म करा दिया...फिर देखा गया कि पुरुषों के हमेशा पीछे चलने वाली महिलाएं अब पुरुषों के आगे चल रही थीं...सबने सोचा अफगानिस्तान बदल गया...अब इसकी हक़ीकत भी जान लीजिए...जगह जगह बिछी बारूदी सुरंगों का पता लगाने के लिए पुरुषों के पास और कोई ज़रिया नहीं था, इसीलिए महिलाओं को आगे रखा जा रहा था...

मतलब ये कि दौर कोई भी हो सोच नहीं बदलेगी...


स्लॉग गीत

चलिए छोड़िए ये सब टंटे, महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में पास हो गया है, पहली बाधा तो दूर हुई, बेशक अभी और भी बहुत रुकावटें बाकी है...लेकिन अभी तो सेलिब्रेट करने का वक्त है...मेरी तरफ से पूरी मातृशक्ति के लिए ये गीत...

कांटों से खींच के ये आंचल

39 टिप्‍पणियां:

  1. हम तो इसे भेडो का खेल ही कहेगे, ओर वो भेडे हम है जो एक के पीछे बिना सोचे चल रही है.......

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  2. मैंने फिर, अपने वजूद को, झाडा, पोंछा, उठाया दीवार पर टंगे टुकडों में बंटें आईने में, खुद को कई टुकडों में पाया, लेकिन समेट लिए हैं सभी टुकड़े और पंख बना लिए हैं, रोक सको तो रोक लो....ये मैं चली .....जूऊऊऊउSSSSSS
    खुशदीप जी.....शुक्रिया..!!!
    हाँ नहीं तो....!!

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  4. यहीं पढ़ा होगा और क्या :)

    http://udantashtari.blogspot.com/2010/02/blog-post_04.html

    अदा जी

    ये जूऊऊऊउSSSSSS...इसका पॉडकास्ट करिये अपनी आवाज में.. :)

    बाकी तो आराम कर लिजिये फिर देखते हैं.

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  5. अग्निपरीक्षा सबको देनी पड़ती है।
    हम बदलेंगे, युग बदलेगा।

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  6. स्त्रियाँ आज भी हैं सीता- सी
    राजमहल के सुख वैभव त्याग कर
    राम के साथ वन गमन को आतुर
    मगर अब नहीं सजाती हैं वे स्वयं अपनी चिता
    अब नहीं देती हैं वे कोई अग्निपरीक्षा ...
    (मेरी एक कविता की कुछ पंक्तियाँ .....)

    हालात इतने बुरे भी नहीं हैं जब तक आप जैसे नारी का सम्मान करने वाले हैं .....
    अच्छी प्रविष्टि ...!!

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  7. घटना बिल्कुल सही है..ऐसे मैने भी सुना है खुशदीप भाई यही है ना सबके अपने अपने तरीके होते है कुछ सही और कुछ बुरे..बस हमें अपना नज़रिया सही रखना है दुनिया में तो बहुत कुछ हो रहा है....

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  8. सीता नाम अग्निपरीक्षा का पर्याय है

    आप सीता नाम से ब्‍लॉग बनायेंगे तो

    उसको भी अग्निपरीक्षा या ब्‍लॉगपरीक्षा देनी होगी।

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  9. मतलब ये कि दौर कोई भी हो सोच नहीं बदलेगी...


    सच है--------!

    आभार

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  10. कुछ भी कहना ख़तरे से खाली नहीं है...कौन बुरा मान जाए...कौन लाठी बल्लम निकाल ले...कुछ पता नहीं ......

    अरे खुशदीप भाई ...खतरा तो सुना है कि चुप बैठने से ज्यादा बढ जाता है ....और बुरा मानने का हक भी तो अपनों को ही है न ...लाठी बल्लम वाले महफ़ूज़ मियां जाने कहां हैं ?? ..रही बात अग्निपरीक्षा की तो सच कहा है आपने ..लेकिन क्या करूं जब कोर्ट में देखता हूं कि हजारों सीताओं का जीवन दहेज़ /कलह /और जाने किन किन कारणों से आग में झुलसाने वालों में .....खुद कोई .....छोडिए ....

    अजय कुमार झा

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  11. सीता ने साक्षात अग्नि परीक्षा दी और राम अपनी ही अग्नि में जिन्‍दगी भरे जले। हमारे परिवार के बुनावट ही ऐसी है कि हम एक दूसरे के सहारे जीवन बिताते हैं। लेकिन जब से भोगवाद हमारे जीवन में आया है तभी से नारी को भोग की वस्‍तु मानकर कैद कर दिया गया। लेकिन आज यही भोगवाद नारी पर भी हावी है और वह भी पुरुष्‍ा को अपनी कैद में करने पर तुली है। जहाँ पूर्व में पति और पत्‍नी के मध्‍य समर्पण था आज अधिकारों ने जगह ले ली है। पति-पत्‍नी, सास-बहु, बाप-बेटा सभी सत्ता के लिए लड़ रहे हैं। परिवारों से निकलकर यह लड़ाई राजनीति में भी जा पहुंची है। मेरे ख्‍याल से हम सभी को आज के युग में अग्नि परीक्षा देनी पड़ रही है।

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  12. "सतयुग हो या कलयुग अग्निपरीक्षा हमेशा सीता को ही क्यों देनी पड़ती है?"

    क्योंकि जिस कार्य को करने की क्षमता पुरुष में न हो, उसे नारी को करना पड़ता है। महिषासुर के वध की क्षमता शिव में नहीं थी इसलिये माता पार्वती को दुर्गा का रूप धरना पड़ा था।

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  13. बडा गंभीर सवाल है जिसका कोई सटीक उत्तर देना किसी के भी वश मे नही है. हालात के अनुसार सब कुछ बदलता रहता है.

    अफ़गानिस्तान वाला किस्सा मैने तो यहां पढा था शायद आपने भी यहीं पढा हो.

    रामराम.

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  14. सब से अच्छी बात अवधिया जी की लगी और उसे ही मेरा कमेन्त मान लें । लगता है अब वक्त बदलने वाला है अगर खुशदीप जैसी सोच सब की बन जाये तो वो दिन दूर नही जब दोनो की बराबर की साझेदारी होगी। पोस्ट स्लागसटोरी सब कुछ नाईस। धन्यवाद और आशीर्वाद भी।

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  15. काफ़ी ग़हरी समजसोच वाला संदेश।

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  16. जो काम पुरूष न कर सके वह कौन करेगा?

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  17. क्योंकि बचपन से चुल्हा-चौका करते-करते आग से खेलने मे वो एक्स्पर्ट हो जाती है और पुरूष वो तो उसके इसी गुण के कारण हिरण्यकश्यप बन कर उसे होलिका बना कर आग मे धकेलता रहता है।और अफ़गिनास्तान के पुरूष भी कौन से अलग हैं।

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  18. उम्दा प्रस्तुति लीक से हटकर विचारणीय पोस्ट ...

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  19. वो सतयुग था जो सीता बच गई , कलयुग की आग में तो ना जाने कितनी सीता रसोई में जलकर मर जाती है,और अपनी पत्नी को आग में झोकने का पौरुष सतयुग हो या कलयुग पुरुष में हमेशा से रहा है.
    "मैं तो टिप्पड़ी करने से डरने लगी हूँ ना जाने किस बात बे बवाल हो जाए "

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  20. खुशदीप भईया पहली बार ये कि आप भी कहाँ कलयुग में सिता माता को ढुढँने में लग गये है । जवाब आपको मिल गया है श्रीमती अजित गुप्ता जी और अवधिया जी से । कैसा रिश्ता कैसा अपना , कैसा पराया , अभी पिछले दिनो ही पढ़ा था पोस्ट पर , ये सब रिश्ते ब्लोगिंग से दूर रहे तभी बढ़िया है ।

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  21. प्रिय मिथिलेश,
    गौर से देखोगे तो आज भी हर नारी में एक सीता मैया ही दिखेगी...बस देखने वाली नज़र चाहिए...वो जैसी है, वो वैसी क्यों दिख रही है, इसके भी ज़रूर कोई कारण होंगे...अगर उन कारणों तक पहुंचे तो शायद हमारी सोच खुद-ब-खुद बदल जाए...

    जय हिंद...

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  22. गौर से देखोगे तो आज भी हर नारी में एक सीता मैया ही दिखेगी...बस देखने वाली नज़र चाहिए..

    चंदन है इस देश की माटी
    तपोभूमि हर ग्राम है
    हर बालिका देवी की प्रतिमा
    बच्चा-बच्चा राम है...

    इस कलियुग में भी...देखने बाली की नजर होनी चाहिए.

    लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से.
    http://laddoospeaks.blogspot.com

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  23. खुशदीप भईया कोई सिता माता बन के नहीं आता , बनाया जाता है उन्हे संस्कारो से , मैं आपसे बिल्कुल सहमत हूं कि देखने वालो का हेरफेर है , लेकिन मैं भी एक सवाल पुछना चाहता हूँ आपसे कि कितनी स्त्रीयां आज के समय सिता माता बनना चाहती हैं और कितने पुरुष भगवान राम बनना चाहते हैं ???

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  24. कब तक सूखी लकड़ी पड़ी रहेगी बंद दीवारों में, कभी तो आग भड़केगी एक चिंगारी लगना बाकी है

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  25. @ मिथिलेश जी
    सभी स्त्रियां सीता और सभी पुरुष राम नही हो सकते और ना ही बनाये जा सकते हैं। और बनना चाहने से भी कोई राम और सीता नही बन सकता।
    संस्कार कोई दवा है क्या जो जबरदस्ती खिला दोगे।

    प्रणाम

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  26. ''Main Ram nahin to fir kyo.. ummeed karoon Sita ki...??''
    lekin Sita ki ummeed to Ram ko bhi bemani thee.. aaj bhi kitne sawal khade hain jinka Ram vadh na kar sake.. Ravan ka kar liya to kya..
    sabko meri taraf se bhi mubarakvaad..
    Jai Hind...

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  27. महिला विधेयक को अधिनियम का रूप लेने दो...राम की ही अग्निपरीक्षा हुआ करेगी. इसीसे डरे लालुओं ने ही तो आसमान सर पर उठा रखा है.

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  28. प्रिय मिथिलेश...
    प्रिय अंतर सोहेल...

    ये सवाल बेमानी है कि कलयुग में कितने पुरुष राम बनना चाहते हैं और कितनी महिलाएं सीता...हम दूसरों से सवाल क्यों करें, जिन पर हमारा बस ही नहीं है...हमारा बस सिर्फ हमारे अपने पर है....इसलिए सिर्फ अपने से ही सवाल करना चाहिए...हर पुरुष के अंदर एक राम होता है और एक रावण...इसी तरह हर महिला के अंदर एक सीता होती है और एक मंथरा...हमें ज़रूरत है बस अपने अंदर के राम और सीता को जगाए रखने की...अगर सब कोई गलत काम करते वक्त बस अपने अंदर के राम और सीता से डरने लगें तो ये सतयुग अपने आप ही दोबारा आ जाएगा...

    जय हिंद...

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  29. सतयुग हो या कलयुग अग्निपरीक्षा हमेशा सीता को ही क्यों देनी पड़ती है ?
    Kyuki jab stri ko sabse jyada jarurat hoti hai purush ke sahiyog ki usake sahare ki tabhi wo use apane sath nahi paati akele chalati hai angaro me ...baat sirf "sath ki hai"
    ek dusare ke bina stri va purush dono hi adhure hai lekin yah purnta har samay bani rahani chahiye .....sankat ki ghadiyon me bhi aur aaananad ke kshano me bhi...!!

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  30. खुशदीप भाई पोस्ट को कॉम्प्लीमेंट करता है आपका ये कमेन्ट है...बहुत ही अच्छी बात कही आपने...".हमें ज़रूरत है बस अपने अंदर के राम और सीता को जगाए रखने की"...इतना समझ लें लोग...फिर तो रामराज्य आने में देर कितनी लगेगी

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  31. मुझे लगता है कथा यदि किसी स्त्री द्वारा रची जाती तो अग्निपरीक्षा का प्रसंग उसमे नहीं होता ।

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  32. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 13.03.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  33. खुशदीप भैया,
    आप और हम-आपसे मिलते जुलते न जाने कितने ? हमेशा मातृशक्ति और नारीशक्ति की बातें करते हैं। हमने ज़माने में कभी किसी स्त्री को भ्रातृशक्ति और पितशक्ति की बात करते नहीं देखा। इन्होंने कभी मर्दों के सपोर्ट में कोई बात कही ? ये अच्छी बात नहीं है। हा हा।

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  34. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  35. Shree Ram Distributors के नाम से यह टिप्पणी मेरी थी जी
    @ आदरणीय खुशदीप जी
    आपकी बात सिर-माथे
    एक सार्थक और शिक्षाप्रद इन पंक्तियों के लिये आभार

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  36. बीती 7158 बरिस से सीता मईया हॉट टॉपिक बनी भयी हैं, इनका तुम पकड़ लिहौ अउर देखिकै ई रँगा खुस भवा । एहि हॉट टॉपिक पर हमहूँ कछु लिखि डारी का॓ऽऽ ?

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  37. जो जिस वक्त कमजोर होता है उसे परीक्षा देनी होती है..समय के उस पड़ाव में सीता थी..और समय बहता गया नाम , लिंग और समूह बदलते गए...

    सवाल हमेशा एक ही शक्ल और लिंग में रहा
    और शायद रहेगा भी

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