रविवार, 7 मार्च 2010

पालने में ब्रह्मा, विष्णु, महेश...खुशदीप

संसद में महिला रिज़र्वेशन बिल पर सोमवार से जो तूफ़ान आएगा सो आएगा...लेकिन ब्लॉगवुड में नारी विमर्श पर युद्ध चरम पर पहुंच गया लगता है...संसद में लालू यादव, मुलायम यादव और शरद यादव महिला रिज़र्वेशन बिल को फेल कराने के लिए पूरी ताकत लगा देंगे...उनका कहना है कि एक तिहाई रिजर्वेशन दिया गया तो सब पढी लिखी आधुनिक अगड़े समाज की महिलाएं ही उन सीटों पर कब्ज़ा कर लेंगी...जबकि ओबीसी की महिलाओं में पढ़ाई लिखाई का स्तर कम होने की वजह से उन्हें कोई लाभ नहीं मिलेगा....इसलिए वो कोटे में भी कोटा पहले सुनिश्चित करना चाहते हैं...

ये तो खैर संसद की बात है...लेकिन ब्लॉगवुड में जो हो रहा है वो बहुत ही दुखद है...मेरा ये मानना है कि नारी विमर्श पर ये बहस ही बेमानी है...जब दो हाथ बराबर हैं तो फिर ये किसी को जताने की ज़रूरत ही क्यों होती है कि पुरुष और नारी बराबर है...मैंने एक बार गांधी जी के धर्म के बारे में विचार पड़े थे...गांधी जी के अनुसार अगर ये कहा जाता है कि हिंदू धर्म सहिष्णु है, तो यहां भी कहीं न कहीं अपने को श्रेष्ठ साबित करने की ग्रंथि ही काम कर रही होती है...इसलिए अगर कोई कहता है कि महिलाओं को वो सभी अधिकार मिलने चाहिए जो पुरुषों को हासिल हैं...मेरी समझ में यहां भी कहीं न कहीं पुरुष की अपने को श्रेष्ठतर बताने की मंशा ही काम कर रही होती है...

एक सवाल और नारी का पहनावा क्या हो, इसको लेकर भी आए-दिन सवाल उठाए जाते रहते हैं...मानो सारी संस्कृति का ठेका हमने ही ले रखा है...राखी सावंत, बिपाशा बसु या मल्लिका शेरावत अगर रिवीलिंग कपड़े पहनती हैं तो संस्कृति के ठेकेदार शालीनता का सवाल उठा कर आसमान सिर पर उठा लेते हैं...लेकिन अगर सलमान खान शर्ट उतारते हैं या रणबीर नंगे बदन टॉवल भी खोल देता है, फिर कहीं संस्कृति को आंच नहीं आती, फिर कहीं कोई सवाल नहीं उठते, ये दोहरे मानदंड क्यों...किसी ने सच ही कहा है कि ये देखने वाले की आंखों पर होता है कि वो किस निगाह, किस मानसिकता से किसी को देखता है...

इसी सिलसिले में सती अनुसुईया की कहानी का जिक्र करना चाहता हूं...एक बार किसी सद्पुरुष का प्रवचन सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था...वहीं सुनी थी ये कथा...पता नहीं कितनी याद रही है...अगर कुछ गलत हो तो जिन्हें ठीक से पता हो, सुधार दीजिएगा...

अत्री महाराज के लिए सती अनुसुईया का पत्नी धर्म कितना महान था कि नारद जी ने उसकी कीर्ति देवलोक में भी पहुंचा दी...सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती के लिए ये सुनना बड़ा कष्टप्रद था...हठ कर उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को अनुसुईया का इम्तिहान लेने भेज दिया...तीनों साधु का वेश बनाकर अनुसुईया के द्वार पहुंच गए...अतिथि और साधु का सत्कार धर्म जानकर अनुसुईया ने तीनों से भोजन का आग्रह किया...लेकिन तीनों तो इम्तिहान लेने की ठाने थे...तीनों ने कहा कि भोजन हम इसी शर्त पर करेंगे, अगर तुम नग्न होकर हमें भोजन कराओगी...वाकई सती अनुसुईया के लिए ये धर्मसंकट वाली स्थिति थी...साधुओं को भोजन नहीं कराती तो अतिथि धर्म का पालन नहीं होगा...लेकिन जो शर्त है वो पतिव्रता स्त्री के लिए पूरी करना किसी स्थिति में संभव नहीं...फिर पूरे मनोयोग से सती अनुसुईया ने इस धर्मसंकट से निकलने के लिए प्रार्थना की...इस प्रार्थना ने ही सती अनुसुईया को वो शक्ति दी कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश को छह-छह माह के बालक बना दिया...तीनों को पालने में लिटा दिया...तीनों शिशु की तरह ही पैर पटकने लगे...अब मां  अगर शिशु को दूध पिलाती है तो सृष्टि चलती है...अब अपने नवजात शिशुओं से लज्जा का सवाल ही कहां...



सती अनुसुईया से पतियों को फिर देवस्वरूप में लौटाने के लिए आग्रह करतीं पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती...

पता नहीं मैंने क्यों यहां इस कहानी का ज़िक्र किया...लेकिन एक बार फिर यही कहना चाहूंगा, दूसरे पर उंगली से उठाने से पहले खुद को आइने में देख लेना चाहिए...

बाकिया दी गल्ला छडो, बस दिल साफ़ होना चाहिदा...

42 टिप्‍पणियां:

  1. आपसे इससे ज्यादा उम्मिद करना भी बेईमानी ही होगी, काश मिथिलेश ये सब देख पाता और आप लोगो को जवाब भी देता । किसी एक के उपर इस तरह से पिल पड़ना कहाँ का न्याय है भाई, मुझे अभी तक नहीं लगा कि मिथिलेश ने कुछ भी गलत लिखा है अपने लेख में , लेकिन कृपा करके अब आप लोग बाज आयें । मैं मिथिलेश का बहुत बड़ा समर्थक रहा हूँ , वह जो लिखता है वह सबके बस बात नहीं हैं , इतनी कम उम्र में ऐसे लेख लिखना मतलब दातों तले चने चबाना है, हाँ हो सकता है कि मिथिलेश अज्ञान वश कुछ लिख देता हो , लेकिन आप लोगो का क्या फर्ज बनता है उसके प्रति ???? मिथिलेश की यही खासियत रही है कि वह बेबाक लिखता है , और आप लोगो नें यह उसकी कमजोरी बना दी है । मुझे व्यक्तिगत रुप से दुःख हुआ था जब मिथिलेश ने पिछली बार ब्लोगिंग छोड़ने का फैसला लिया था , लेकिन ये आप लोग ही थे जिन्होने उसे वापस लाया । एक अच्छे लेखक को आप लोग सही दिशा प्रदान करिए , उसकी उम्र भी कम है , इस हिसाब से आपलोग उसे हतोउत्साहित ना करिए , वह इससे और भी बेहतर लिख सकता है ।

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  2. मै आपके साथ 100% सहमत हु...

    ये सच है कि अश्लील्ता देखने वालो की आंखो मे होती है
    पर सहगल सा'ब !

    आज-कल और कुछ दिखाया भी तो नही जा रहा.....

    आपके विचार अच्छे लगे ....

    ___ राकेश वर्मा

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  3. भाई डॉन,
    आप जो भी है, बेनामी होकर जो कुछ भी कह रहे हैं, उसका कोई मतलब तो नहीं होना चाहिए...लेकिन ये आप मिथिलेश को बीच में कहां ला रहे हैं...मिथिलेश मेरे छोटे भाई सा है...आप एक वृहत विषय को सिर्फ मिथिलेश से जोड़कर क्यों देखना चाह रहे हैं...अगर आपका मकसद मेरे और मिथिलेश के बीच कोई गलतफहमी पैदा करना है तो ये आपकी गलतफहमी है...मिथिलेश और मेरे किसी पोस्ट पर मतभेद हो सकते हैं लेकिन हमारे व्यक्तिगत रिश्ते इससे कहीं ऊंचे हैं...आप इस मुद्दे को निजी राय के नज़रिए से देख रहे हैं...मैं समाज के बड़े परिवेश में देख रहा हूं..बस फर्क इतना ही है...

    जय हिंद...

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  4. खुशदीप सहगल जी जरा सोचिए जो लड़का मात्र १९ साल की उम्र में ऐसे विचार लिखता हो , यहाँ मेरे विचार का मतलब मिथिलेश के अन्य लेखो से भी किया जाये , वह भविष्य में कैसी क्रान्ति ला सकता है इससे आप लोग भली भाती परिचित होंगे । मेरा फिर आप सभी माहनुभाँवो से निवेदन है कि ऐसे लेखक को समझाऐ ना कि दूतकारें , ऐसा नहीं है कि वह सब गलत ही लिखता है नारी को लेकर ,लेकिन उसे गलत ठहरा दिया जाता है । और मुझे बहुत आश्चर्य हुआ ये देखकर कि जिन्हे दुबे जी अपना बहुत बड़ा सपोर्टर मानते थे उनका दूर-दूर तक कोई हमदर्दी नहीं दिखी , खैर ये सब छोड़ीए एक अच्छे लेखक को आप लोग सही दिशा प्रदान करिए ।

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  5. डॉन भाई,
    ये मैं आपको जवाब देने की ज़रूरत नहीं समझता कि मैं मिथिलेश को क्या समझाता हूं और क्या नहीं...

    जय हिंद...

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  6. यार अब तुम भी ये राग अलापने लगे. पता नहीं क्यों तुम लोग हर पंगे में से अपने ब्लाग की टीआरपी बढाने का जुगाड खोजने लगते हो. कल परसों किसी अखबार में हिन्दी ब्लागिंघ के बारे में किसी आलोक नाम के लेखक का एक व्यंग्य लेख पढ रहा था. जैसा पढा हुबहू वैसा ही पाया. हिन्दी ब्लागिंघ मतलब सब निकम्मे लोगों का जमावडा.

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  7. सर्वे यत्र प्रणेतार:, सर्वे पंडितमानिन:
    सर्वे प्राथभ्यं इच्छितं, तद वृंदम हिआशु नश्यति ।।

    हे वत्स, अर्थात..
    जिस समाज में सभी नेता बनना चाहें, सभी अपने को सर्वोतम पंडित समझें, हर कोई चाहे कि सबका अगुआ मैं ही होऊँ, तो ऎसा समाज बहुत जल्दी डूब जाता है

    " साभार :बाबा गुरुघँटाल karishna जी ! "

    तदैव बाबा श्री वदन्ति :
    हिन्दी ब्लागिंघ मतलब सब निकम्मे लोगों का जमावडा.
    हा हा हा.. हा हा

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  8. लिखो स्वांत सुखाय....सोते लोग से क्रांति नहीं होती....जगे लोग क्रांति नहीं करते..परिवर्तन लाते हैं....प्रलाप करने से कोई बडा लेखक नहीं बन जाता....न ही क्रांति लाता है....हर चीज को बैल की तरह हांकने से काम नहीं बनता.....गाड़ी पेट्रोल से चलती है हाकने से नहीं.....कहीं की बात को कहीं ले जाना ब्लॉग में कुछ लोगो का काम है....कोई किसी को पकड़ कर नहीं लाता की ब्लॉग लिखे....या छोड़े .. बेहतर लिखने वाला किसी का मोहताज नहीं होता खासकर ब्लॉग की दुनिया में...ये पब्लिसीटी स्टंट भी हो सकता है....रह गया अखबार के लेख का....तो शायद वो भाई साहब खुद सो रहे हैं....या आने वाले वक्त की आहट को सुन कर अनजान बने हुए हैं. यही लोग बाद में उन राय बहादुरों की तरह नेता बन कर आजादी का आनंद लेने आ जाएंगे....जिन्होंने अंग्रेजी राज में चाटुकारिता कर बड़ी-बड़ी पदवी ले ली....और बाद में लोगो के रहनुमा नेता बनने का ढ़ोंग करने लगे....

    अरे यार नहीं पढ़ना तो मत पढ़ो...
    नहीं लिखना है तो बाढ़ में जाओ...
    लिखना है तो लिखो..क्यों सोचते हो की तुम ने लिख दिया तो फिर कोई नहीं लिख पाएगा....हद है..

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  9. मेरा ये मानना है कि नारी विमर्श पर ये बहस ही बेमानी है...
    यह आपके लेख क मूल मुद्दा है । मेरा यह मानना है कि यह विमर्श तो हमेशा से चला आ रहा है साहित्य मे तो यह बरसों से चल रहा है । गान्धी , कंफ्यूशियस ,विवेकानन्द , महर्शि मनु , प्रसाद , निराला . महादेवी , बहुत सारे लोगों ने नारी की महत्ता को जानकर अपने विचार प्रकट किये हैं
    लेकिन हम देख रहे हैं कि वर्तमान में कार्य और व्यवहार में बहुत अंतर है । न केवल पुरुषों को दोष दिया जा सकता है न केवल स्त्रियों को । इन स्थितियों के लिये ज़िम्मेदार पूंजीवाद , बाज़ारवाद , विश्व के प्रभुत्वशाली राष्ट्रों की धन लिप्सा व साम्राज्य लिप्सा और राजनैतिक सामाजिक व आर्थिक स्थितियाँ ज़िम्मेदार है । स्त्री की स्थिति को इन सन्दर्भों मे भी देखा जाना चाहिये ।
    और अंत में टिप्पणी का स्लॉगओवर.पिछले दिनो आश्रम मे घटित समाचार के सन्दर्भ में ...
    "साधु के वेष में स्त्री को नग्न देखने की इच्छा ?"
    ओह... यह तो कलियुग में भी जारी है । मगर वे देवता नहीं है बल्कि...

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  10. मैं भी यही कहती हूँ...कुछ दिनों के लिए 'नारी' विमर्श स्थगित किया जाए...हमें किसी से भी कैसी भी हिदायत नहीं चाहिये...कम से कम एक १९ वर्ष के बालक से तो हरगिज भी नहीं....मैं हर हाल में उससे बड़ी हूँ, ज्यादा अनुभवी हूँ कई जीवन सँवारा है, कपडे-लत्तों की तमीज है....इस ब्लाग्वुद में सभी अच्छे घरों की सुशिक्षित महिलाएं हैं...लगभग सभी उम्रदार हैं..जीवन संग्राम का सबको अनुभव है....किसी की भी सीख की किसी को भी ज़रुरत नहीं है...सब अपना भला-बुरा जानती हैं...आप सबसे करवद्ध विनती है...इस 'नारी विमर्श' का नाम भी मत लीजिये...अब बहुत हो गया है...बस....
    खुशदीप जी , अभिमन्यु की ऊर्जा को सही दिशा देने की बहुत आवश्यकता है...वर्ना नुक्सान हमारा नहीं ....पात्र का ही है....कभी-कभी कड़वी दवा दी जाती है ...लेकिन भले के लिए ही...असर बाद में होता है ....और पता भी तभी चलता है...दोस्त और दुश्मन का...
    अच्छा लगा देख कर की आज कल डान भी मेदिएशन का काम कर रहे हैं :):)

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  11. महिला आरक्षण .....ब्रहमा विष्णु महेश ........ अनुसुईया ............ यह अभिमन्यु बीच मे कहा से आ गया ? हर पोस्ट को विवादित क्यो कर देते है चन्द लोग

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  12. बाकिया दी गल्ला छडो, बस दिल साफ़ होना चाहिदा....बस, बस..इतना ही समझ जायें तो काफी.

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  13. और आईना भी करतबी नहीं होना चाहिए। मतलब लाफिंग मिरर नहीं। वास्‍तविक दर्पण चाहिए। वैसे साफ दिल वालों को किसी आईने की जरूरत नहीं होती है।

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  14. अब तक पुरुष ही तय करते आए हैं कि नारी को कब और कहाँ क्या पहनना चाहिए। उस ने वही पहना जो उसे पहनने या न पहनने को कहा गया। पुरुष अब भी यही चाहते हैं कि यह परंपरा चलने दी जाए। संकट बस यही है कि अब नारी स्वयं यह चाहती है कि वह खुद तय करे कि वह क्या पहनेगी। उस ने यह आरंभ भी कर दिया। अब सदियों से मिला हुआ अधिकार पुरूष से छिनेगा तो क्या वह बोलेंगा भी नहीं क्या कि 'यह क्या हो रहा है?'
    पुरुष बोल रहा है। नारियाँ उस के बोलने पर जोर-शोर से आपत्तियाँ करती हैं तो यह स्वाभाविक है। आखिर उसे उन के क्षेत्राधिकार में बोलने की आवश्यकता क्या है? यहाँ यह गौण हो गया है कि कौन सही कह रहा है और कौन गलत?
    यह सब चलेगा, एक लंबे समय तक जब तक क्षेत्राधिकार का झगड़ा अंतिम रूप से तय नहीं हो जाता। पर क्या यह झगड़ा कभी तय हो पाएगा?
    श्रीमती जी और बेटी दोनों बाजार से अपने लिए कपड़े खरीद कर लाई हैं। दोनों बदल-बदल कर पहनती हैं और मुझ से पूछती हैं कि कैसा लग रहा है? वे मेरी अनुशंसा चाहती हैं मैं कहता हूँ -अति सुंदर!

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  15. खुशदीप जी मुझे जानना भी नहीं है कि आप मिथिलेश दुबे को क्या समझातें है और क्या नहीं । मेरे कहने का तात्पर्य तो बस इतना ही है कि आप जैसे प्रबुद्ध ब्लोगर को किसी भी यूवा ब्लोगर को निचा दिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए । मुझे याद आता है , कुछ समय पहले अदा जी ने कोई पोस्ट लिखी थी मिथिलेश और महफूज के बिच बचाव के लिए, अदा तो मिथिलेश दुबे की दीदी है , और ये वे खूद कहती हैं, लेकिन अबकी अदा जी भी दूर ही दिखी मिथिलेश से , बात साफ है कि इस बार मिथिलेश के विपक्ष में लोगों जी संख्या ज्यादा है , और कमेण्ट बैंक के चक्कर में कोई खूल के सामने नहीं आ पाया फिर वह चाहे आप हो, या अदा जी या महफूज हों ।मुझे विश्वास है कि मेरे बातों का बुरा नहीं मानेंगे । बाकी आप लोग समझें ।

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  16. खुशदीप जी मुझे जानना भी नहीं है कि आप मिथिलेश दुबे को क्या समझातें है और क्या नहीं । मेरे कहने का तात्पर्य तो बस इतना ही है कि आप जैसे प्रबुद्ध ब्लोगर को किसी भी यूवा ब्लोगर को निचा दिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए । मुझे याद आता है , कुछ समय पहले अदा जी ने कोई पोस्ट लिखी थी मिथिलेश और महफूज के बिच बचाव के लिए, अदा तो मिथिलेश दुबे की दीदी है , और ये वे खूद कहती हैं, लेकिन अबकी अदा जी भी दूर ही दिखी मिथिलेश से , बात साफ है कि इस बार मिथिलेश के विपक्ष में लोगों जी संख्या ज्यादा है , और कमेण्ट बैंक के चक्कर में कोई खूल के सामने नहीं आ पाया फिर वह चाहे आप हो, या अदा जी या महफूज हों ।मुझे विश्वास है कि मेरे बातों का बुरा नहीं मानेंगे । बाकी आप लोग जो समझें ।

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  17. इसे एक परिवार माना जाए और परिवार में कभी भी स्‍त्री और पुरुष का भेद नहीं होता है वहाँ माता या पिता होते हैं। और उनकी बात पर बहस नहीं होती। अब आप लोग लिखें कि माता के क्‍या कर्तव्‍य हैं और पिता के क्‍या कर्तव्‍य हैं।

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  18. डॉन भाई,
    ये बार-बार आपकी सुई मिथिलेश-मिथिलेश के रिकॉर्ड पर क्यों अटकी हुई है...मैंने अपनी पोस्ट में मिथिलेश का कहीं
    कोई उल्लेख किया है क्या...क्या नारी विमर्श पर सिर्फ मिथिलेश ने ही लिखा है...और किसी ने कुछ नहीं लिखा...और यहां मैं अपने विचार लिख रहा हूं...क्या मुझे अपने विचार लिखने का अधिकार नहीं है...ऐसा करना क्या दूसरे को नीचा दिखाना हो गया...और फिर आप बेनामी होकर टिप्पणी कर रहे हैं और साथ अदा जी और महफूज़ को भी नाहक लपेट रहे हैं...ये मेरा ब्लॉग है, आप बात मेरे तक ही सीमित रखिए न...अगर आपको महफूज़ या अदा जी के बारे में कुछ कहना है तो उनके ब्लॉग पर जाकर कहें...वैसे एक बार फिर आपको स्पष्ट कर दूं कि मेरे किसी से क्या रिश्ते हैं, मुझे आपको बताने की ज़रूरत नहीं...
    अब आपने मिथिलेश के बारे में इतना कुछ लिखा है तो सुन लीजिए मेरे उसके बारे में विचार...

    मिथिलेश उन्नीस साल की उम्र में भी जो लेखन में प्रतिभा दिखा रहा है वो दूसरों में सालों-साल कलम घिसने के बाद भी नहीं आ पाती...

    लेकिन ऊर्जा दो तरह की होती है रचनात्मक और विध्वंसात्मक, हमारा काम है मिथिलेश की रचनात्मक प्रतिभा को और निखारने के लिए सलाह देना...

    वाह वाह कह कर ताड़ के पेड़ पर चढ़ा देने वालों की कमी नहीं है, इस दुनिया में...लेकिन ये आदमी के विवेक पर निर्भर करता है कि वो तय करे कि कौन उसका सही चाहने वाला है और किन सिर्फ मौज के लिए फूंक भरने वाला...

    फिलहाल मैं बड़े भाई के नाते मिथिलेश को यही राय दूंगा कि वो उम्र के जिस पड़ाव पर है वहां उसके लिए सबसे पहली वरीयता होनी चाहिए अपना करियर...इम्तिहान में वो ऐसी ही प्रतिभा दिखाए जैसी कि लेखन में दिखाता है...यही दो-तीन साल है बस अपना जीवन बनाने के लिए सारी ऊर्जा एक ही दिशा में लगाने की...मन को एकाग्र नहीं रखेगा, इधर उधर के पचड़ों में फंसाएगा तो उसकी असली दिशा पर असर पड़ सकता है...एक बार जब करियर में पूरी तरह सिक्योर हो जाए तो डंके की चोट पर जो चाहे, वो लिखे...सबसे पहले उसकी पीठ ठोकने वाला मैं हूंगा...

    अब मिथिलेश तुम ही मुझे बताओ कि क्या मैं गलत हूं...

    जय हिंद...

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  19. नारी और पुरुष , हमेशा एक दुसरे के पूरक रहे हैं। फिर भी हमारा समाज पुरुष प्रधान है । अब कितना सही है कितना गलत , यह कहना तो मुश्किल है। लेकिन नारी हो या पुरुष , किसी को भी लज्जान्वित करने का अधिकार नहीं है ।

    आज ही पेपर में पढ़ा ..हॉलीवुड फिल्मों में ओर्गी के बारे में ।

    मनुष्य का मष्तिष्क कितना विकृत हो सकता है , इसकी कोई सीमा नहीं।

    मिथलेश अभी बच्चा है , उसे इस उम्र में प्रिकोशियस बातें करने के बजाय आयु सुलभ विषयों पर लिखना चाहिए ।
    उसमे बहुत संभावनाएं हैं , एक अच्छा लेखक बनने की।
    बाकि तो सही कहा --दिल साफ़ होना चाहिदा।

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  20. भारतीय संस्कृति में तो दोनों को बराबरी का दर्जा दिया गया है
    विवाद के समर्थन में मुट्ठीभर लोग ही हैं

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  21. are ye kya ho raha hai yahan........mithilesh ko kyun ghasit rahe hain sab.........wo to bachcha hai aur bahut achcha hai..........aapki post bahut hi sundar aur sakaratmak soch ke sath likhi gayi hai........stri aur purush ke adhikaron kijung to sadiyon se chali aa rahi hai magar ab waqt aa gaya hai ki sabko apna nazariya badalna hi padega.

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  22. इन डान साहब ने यहाँ यह अहसास कराने का प्रयत्न किया है की मिथिलेश का सबसे बड़े शुभचिंतक यही हैं , और ऐसा करके निस्संदेह यह मिथिलेश का भला कम और नुक्सान अधिक कर रहे हैं , सारी पोस्ट का रुख मोड़ कर मिथिलेश पर ला खड़ा करने वाले इन सज्जन ने मिथिलेश के नासमझ दोस्त होने का सबूत दिया है !

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  23. खुशदीप भाई, कई ब्लॉगर या यों कहें कि अधिकतर ब्लॉगर मुद्दों की बात कम और व्यक्ति की बातें ज्यादा उठाते हैं.ऐसे लोगों के कमेन्ट पर कमेन्ट देना आपकी उर्जा और समय दोनों बर्बाद कर रहा है. जिनके कमेन्ट में व्यक्तिगत आक्षेप हो उसे कह दें---" no personal comment please....'. अपनी राय देने या रखने का अधिकार सबको है, अगर बात मुद्दे की हो. राय ,विचार में भिन्नता केवल मनुष्यों में ही होती है. आप लोग तो कुत्ते-बिल्ली जैसे झगड़ रहे हैं.

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  24. अगर बात मुद्दे की हो. राय ,विचार में भिन्नता केवल मनुष्यों में ही होती है .. इसे स्‍वीकार किया जाना चाहिए .. किसी एक लेखक पर आक्षेप अनुचित है !!

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  25. नमस्कार खुशदीप जी मै आम तौर पर विवादस्पद पोस्टो से दूर ही रहता हूँ ... मगर आप की आज की पोस्ट का विषय सार्थक और उद्देश्य पूर्ण है ये आप की पोस्ट का आंकलन नहीं मेरी समझ है बाकी एक राय इन बेकार की तिपडीयो को मिटा देना या उनका जबाब ही न देना सबसे सार्थक पहल है
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

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  26. ब्रह्मा, विष्णु, महेश को अनुसुईया का इम्तिहान लेने भेज दिया...तीनों साधु का वेश बनाकर अनुसुईया के द्वार पहुंच गए...अतिथि और साधु का सत्कार धर्म जानकर अनुसुईया ने तीनों से भोजन का आग्रह किया...लेकिन तीनों तो इम्तिहान लेने की ठाने थे...तीनों ने कहा कि भोजन हम इसी शर्त पर करेंगे, अगर तुम नग्न होकर हमें भोजन कराओगी...वाकई सती अनुसुईया के लिए ये धर्मसंकट वाली स्थिति थी...साधुओं को भोजन नहीं कराती तो अतिथि धर्म का पालन नहीं होगा...लेकिन जो शर्त है वो पतिव्रता स्त्री के लिए पूरी करना किसी स्थिति में संभव नहीं...फिर पूरे मनोयोग से सती अनुसुईया ने इस धर्मसंकट से निकलने के लिए प्रार्थना की...इस प्रार्थना ने ही सती अनुसुईया को वो शक्ति दी कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश को छह-छह माह के बालक बना दिया...तीनों को पालने में लिटा दिया...तीनों शिशु की तरह ही पैर पटकने लगे...अब मां अगर शिशु को दूध पिलाती है तो सृष्टि चलती है...अब अपने नवजात शिशुओं से लज्जा का सवाल ही कहां...

    A god tale but is it truth ?

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  27. @डॉ अनवर जमाल ,
    पौराणिक कथाएं सत्य हैं या असत्य इस पर कोई बहस नहीं हो सकती, यह केवल आस्था का विषय है जो हम, मानते और पूजते रहें ! शायद आप मेरे कथन से सहमत होंगे कि किसी भी धर्म की विशुद्ध वैज्ञानिक विवेचना संभव ही नहीं है और जब भी नए विद्वानों ने अपनी अपनी भावना अनुसार प्रयत्न किया सिर्फ उपहास क्रोध और तिरस्कार ही मिला और कुछ नहीं ! अतः किसी भी हाल में श्रद्धा का मूल्यांकन अस्रद्धालुओं द्वारा नहीं किया जाना चाहिए !

    आशा है आप मेरी श्रद्धा का सम्मान करेंगे चाहे वह आपकी हो या किसी और की !
    सादर

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  28. ओह मैं थोडी देर से आया , ये डौन जी तो वही हैं जो ब्लोग्गर मीट में मिथिलेश के आने को लेकर मेरी पोस्ट पर बडी सुंदर सुंदर बातें लिख गए थे जिसे मुझे बार बार मिटाना पडा , यहां तो कुछ और ही ...बात क्या है डौन जी .....माजरा कुछ कुछ समझ में आ रहा है डौन/डौनी/डनार्दन ....तारारम पम्पम
    अजय कुमार झा

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  29. लोग लोगन की लड़ाई सदियों से चली आई
    बीच भई न लड़ाई सो प्रीत भई न कहाई .
    भैय्या बस मत छेड़ो बर्रयो के इन छत्ते को
    वरना शांत बहते पानी में आग लग जावेगी
    जब इनमे भई प्रीत पराई सो क़यामत आई
    लोग लोगन की लड़ाई सदियों से चली आई

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  30. ब्लॉगिंग क्या पढ़े-लिखे पशुओं का समूह हो गया है?

    http://laddoospeaks.blogspot.com/2010/03/blog-post_07.html

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  31. मिथिलेश की दीदी हूँ इसीलिए नाराज़ हूँ ...ज़रुरत पड़ी तो चार झापड़ भी लगाउंगी उसे, अगर ये हरकत मेरे अपने बेटे ने की होती तो मैं बात बाद में करती पहले वो लाठी खाता ....और तुम डान जी हो कौन हम भाई बहन के बीच में बोलने वाले.....वो मेरा छोटा भाई है ...और रहेगा इसे कोई मिटा नहीं सकता ...समझे ...तुम भी नहीं...हाँ नहीं तो...

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  32. खुशदीप जी,
    मैं माफ़ी चाहती हूँ आपकी पोस्ट की कोई बात नहीं कर पायी, मुद्दा बिलकुल कहीं आउर ही चला गया...
    हैरान हूँ यह देख कर कि...लोगों कि सोच टिप्पणी से आगे नहीं जा पाती...
    सचमुच ...तेरा क्या होगा हिंदी ब्लॉग्गिंग ???

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  33. हो गया ना कबाड़ा, पूरी पोस्ट का...अक्सर ऐसा ही होता है...आप पोस्ट पढने आते हैं...और टिप्पणियों में उलझ कर रह जाते हैं...वैसे सती अनुसुइया की कहानी की प्रस्तुति बिलकुल समयानुकूल थी...

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  34. औरत की चुप्पी को मत समझना कभी उसकी कमजोरी
    नहीं बचता तबाही का कोई किनारा
    जब आती है बांध तोड़कर धरा जोश में ......

    'तूफ़ान' ने सोमवार तक का भी इन्तजार न किया आपकी पोस्ट पर .......!!!

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  35. @डान
    आप जो भी हों आपका आभार व्यक्त करता हूँ जो आपने मेरे प्रति प्रेम दर्शाया । लेकिन जब इतना ही प्रेम उबर रहा तो जरा अपनी अवकात पर आकार अपने नाम के साथ कमेंण्ट करते तो मुझे और भी खुशी मिलती । जो कमिना पन आप यहाँ दिखा रहे हैं शायद यह आप पहले भी अजय झा जी के ब्लोग पर भी कर चुके है , वहाँ आपने क्या कहा ये तो अजय भईया ही जानते होंगे , लेकिन कृपया आप मेरा पिछा छोड़े , नहीं आगे क्या होता है ये भी मुझे पता है , और हाँ जब इतना ही प्यार है तो अपना नाम तो बाताओं ताकी सब तुम्हारी सच्चाई जांन सके और लोगो को पता चले की मुझसे ये नया ढ़ोगी प्यार करने वाला कौन पैदा हो गया, ये चटुकारिता छोड़ो और खुल के बोलो जो बोलना है , और हाँ आगे से कमेंण्ट करते समय मेरा नाम किसी के साथ मत जोड़ना , नहीं उसके बाद जो परिणाम होगा उसके जिम्मेदार तुम खूद होगे, अपनी अवकात देखने में तुम्हे ज्यादा समय नहीं लगेगा । खुशदीप भईया देर से आने के लिए क्षमा चाहता हूँ, व्यस्तता होने के कारण आ नहीं पाया , लेकिन अब आ गया हूँ देख ही लेता हूँ इनको साथ ही औरो को भी । अगर आपके ब्लोग पर मैंने कुछ भी असभ्य भाषा का प्रयोग किया हो तो मेरी टिप्पणी को हटा दीजियेगा ।

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  36. प्रिय मिथिलेश,
    तुमने मेरे सिर से बहुत बड़ा बोझ उतार दिया...मेरे सिर से क्या...मेरे साथ अदा जी और महफूज़ भी बहुत हल्का महसूस कर रहे होंगे...मैंने तुम्हारे बारे में जैसा सोचा था, ठीक वैसे ही निकले...ये डॉन महाराज जो भी है इन जैसों को उद्देश्य यही होता है कि हमारे बीच गलतफहमी पैदा हो और हम मुद्दों को भूल कर बेकार की बातों में अपना वक्त जाया करें...तुम क्या हो...तुम्हें कहां तक जाना है...मुझे पहले से ही पता है...बस अभी इम्तिहानों पर अपनी पूरी ऊर्जा लगाओ...बाकी सब ऊपर वाले पर छोड़ दो...कभी कभी समंदर की लहरों में हाथ-पैर मारते हुए नहीं लहरों के साथ खुद को बहने भी देना चाहिए....इम्तिहान में सारे रिकॉर्ड तोड़ो, इसी कामना के साथ...

    जय हिंद...

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  37. आपका महिला दिवस से एक दिन पूर्व लिखा गया ये लेख बहुत ही अच्छा लगा।

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  38. पता नहीं मैं क्यूँ लेट हो जाता हूँ.....? आजकल वक़्त बहुत बेरहम है मुझ पर....

    जय हिंद...

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