शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

इसे एक बार पढ़िए ज़रूर...खुशदीप

हम अपने-अपने कामों में बड़े मसरूफ़ हैं...अपने बच्चों को ज़िंदगी में कोई मकाम बनाने के लिए हर तरह की मदद देना चाहते हैं...चाहते हैं कि वो किसी भी मामले में दूसरों से पिछड़े नहीं...लेकिन कभी ठीक यही बात हमारे लिए भी किसी ने चाही थी...चाही थी क्या, वो अब भी ऐसा ही चाहते हैं...हम उनके लिए अब भी बच्चे ही हैं...कभी हमने गौर से सोचा कि वो भी हमसे कुछ कहना चाहते हैं...फिर हमे क्यों एक मिनट के लिए भी उनकी बात सुनने पर ज़ोर पड़ता है...ठीक है जीवन की आपाधापी में हमें आगे बढ़ना है...लेकिन उनकी भी तो सोचिए जिन्होंने हमें यहां तक पहुंचाया है...ई-मेल पर बहुत अच्छा फोटो फीचर मिला है...अनुवाद के बाद आपके लिए पेश कर रहा हूं...एक बार पढिए ज़रूर...


जब तुम हमें एक दिन बूढ़े, कमज़ोर देखोगे...


संयम रखना और हमें समझने की कोशिश करना...





अगर हम से खाते वक्त कपड़े गंदे हो जाएं...अगर हम खुद कपड़े न पहन सकें...


हमें बर्दाश्त करना...वो याद करते हुए जब बचपन में तुम हमारे हाथ से खाते थे...कपड़े पहनते थे...






अगर हम तुमसे बात करते वक्त एक ही बात बार बार दोहराएं, गुस्सा खाकर हमें मत टोकना...हमें सुनना...


याद करना, बचपन में कोई कहानी या लोरी कितनी बार तुम्हे सुनाते थे जब तक तुम चैन की नींद सो नहीं जाते थे...





अगर कभी हम न नहाना चाहें तो हमें गंदगी या आलस का हवाला देते हुए मत झिड़कना...


याद करना बचपन में तु्म नहाने से बचने के लिए कितने बहाने बनाते थे और हमें तुम्हारे पीछे भागते रहना पड़ता था...






अगर हमें कंप्यूटर या आधुनिक उपकरण चलाने नहीं आते तो हम पर झल्लाना नहीं...


याद करना हमने तुम्हे कैसे सिखाया था...सही खाना खाना...सही कपड़े पहनना...अपने अधिकारों के लिए लड़ना...






अगर हम कोई बात करते करते कुछ भूल जाएं तो हमें याद करने के लिए मौका देना...हम याद न कर पाएं तो खीझ मत जाना...


हमारे लिए बात से ज़्यादा अहम है बस तुम्हारे साथ होना और ये अहसास कि तुम हमें सुन रहे हो...






अगर हम कभी कुछ न खाना चाहें तो जबरदस्ती मत करना...हम जानते हैं कि हमें कब खाना है और कब नहीं खाना...


अगर चलते हुए हमारी टांगे थक जाएं और लाठी के बिना हम चल न सकें तो अपना हाथ आगे बढ़ाना...


ठीक वैसे ही जब तुम पहली बार चलना सीखते वक्त लड़खड़ाए थे और हमने तुम्हे थामा था...






और जब हम एक दिन कहें कि और जीना नहीं चाहते और दुनिया को अलविदा कहना चाहते हैं...


हम पर गुस्सा मत होना...एक दिन तुम इसे ज़रूर समझोगे...

इसे सराहने की कोशिश करना कि हमने इतनी उम्र को जिया नहीं बचाए रखा है...








एक दिन तुम महसूस करोगे कि हमने अपनी गलतियों के बावजूद तुम्हारे लिए सदा सर्वेश्रेष्ठ ही सोचा...उसके लिए रास्ता बनाने की हर मुमकिन कोशिश की...

अब हमारे पास आने पर क्रोध, शर्म या दुख की भावना मन में मत लाना...हमें समझने और वैसे ही मदद करने की कोशिश करना जैसे कि तुम्हारे बचपन में हम किया करते थे...






हमें चलने में मदद करो...बाकी की ज़िंदगी हमें प्यार और गरिमा से जीने के लिए हमारा साथ दो...


हम तुम्हे मुस्कुराहट और असीम प्यार से जवाब देंगे, जो हमारे दिल तुम्हारे लिए हमेशा से रहा है...







बच्चे, हम तुमसे प्यार करते हैं....मॉम और डैड
 

35 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा है-
    समझने वाले के लिए बड़ी बात है।
    हमे अपने बुजुर्गों की हर हाल मे सेवा सु्श्रुषा करनी चाहिए।
    ताकि हम पितृॠण से उॠण हो सकें।

    आभार

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  2. कुछ समय पहले एक ई-मेल सर्कुलेट हुआ था जिसमे कि एक सेब के पेड़ की तुलना माता-पिता से की गई थी..
    बहुत ही मार्मिक था वो भी..
    अच्छे लगी ये सीख देती हुई पोस्ट...
    प्रेम
    जय हिंद... जय बुंदेलखंड

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  3. वही जीवन जो एक दिन सबको जीना है ...
    जब तुम होगे साठ साल के और मैं होंगी पचपन की ....:)
    दिल को छू गयी ...!!

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  4. बहुत बढ़िया और विचारणीय प्रस्तुति!!

    अच्छा लगा सभी स्लाईडस देख/पढ़कर.

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  5. सुन्दर और सार्थक विचारों का जनक पोस्ट.
    नहीं भूलना चाहिये कि बुजुर्ग भी बच्चों की ही तरह हैं, उन्हें भी प्यार चाहिये.

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  6. मैने अपने माता पिता को अपने माता पिता की सेवा करते देखा इस्लिये मै भी उनकी किसी तरह की सेवा करने से पीछे नही हूं .

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  7. बहुत ही सुन्दर सन्देश दे रही है यह पोस्ट!

    इस विचार को तो सभी अच्छा ही कहेंगे कि बुजुर्गों की सेवा करना चाहिये पर जब ऐसा समय आयेगा तो करने वाले बिरले ही होंगे।

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  8. बहुत ही बढ़िया...सीख देती हुई पोस्ट

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  9. खुशदीप जी मैने इस पोस्त का लिन्क अपने बच्चों को भेज दिया है आज तो 100 चटक लगाने वाली पोस्ट लाये हैं । सही बात है बच्चों को इसे समझ लेना चाहिये। इस काम की पोस्त को आप ई मेल कर दें तो सभी जगह भेज दूँ जितने बच्चे इसे पढें उतना ही अच्छा है। ये सुन्दर सन्देश सब तक पहुँचे। पीठ थपथपा कर शाबास दे रही हूँ। आशीर्वाद्

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  10. खुशदीप जी निर्मलाजी कह रही हैं कि 100 चटके लगाने वाली पोस्‍ट है परन्‍तु इस पोस्‍ट ने हमारे मन में भी 100 नहीं अनगिनत चटके लगा दिए हैं। कहीं गीला-गीला सा हो गया। अभी बच्‍चों से बात हो रही थी, बेटा पोते के लिए कह रहा था कि इसके साथ कितनी मेहनत करनी पड़ती है? मैंने कहा था कि हमने भी यही किया था लेकिन तुम्‍हें वो याद नहीं। वह बोला कि आपने हमारे लिए किया और हम इसके लिए कर रहे हैं बात तो बराबर है। मैंने कहा कि बात कैसे बराबर हुई, बेचारे माता-पिता तो हमेशा ही सफरर रहे। आज हम तुम्‍हारी कमी महसूस कर रहे है कल तुम करोगे। शायद यह युग ऐसा ही है।

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  11. @निर्मला जी,
    @अजित जी,

    दिल से दिए आशीर्वाद के लिए शुक्रिया...

    ये आज की पीढ़ी को तब समझ आएगा जब वो बुज़ुर्ग होगी और उनसे अगली पीढ़ी कल वैसे ही बात करेगी जैसे कि वो आज अपने बुजुर्गों से कर रहे हैं...वैसे मुझे ये रिले रेस की तरह लगता है...जब एक दौड़ने वाला अपनी बारी पूरी कर लेता है तो बैटन अगले दौड़ने वाले को पकड़ा देता है...फिर वो अगला अपनी बारी पूरी होने तक दौड़ता है...दस्तूर यही है फिर पिछले को भुला दिया जाता है...लेकिन सोचिए अगर टीम जीतेगी तो उसमें सारे दौड़ने वालों का योगदान होगा...इसी तरह अगर संस्कार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को अच्छी तरह पास किए जाते हैं तो जीत उस खानदान की होगी...दुनिया यही कहेगी किस संस्कारवान परिवार से हैं...

    जय हिंद...

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  12. यह पोस्ट पढ़ कर रोना आ गया.... मेरे तो मोंम एंड डैड है ही नहीं.... मैं अनाथ हूँ.........

    जय हिंद......

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  13. यह तो रुलाने वाली पोस्ट है. और इतना सामर्थ्य मुझमें नहीं है खुशदीप जी, माफ़ करें... हम तो आदमी भी नहीं है.. इंसान तो और दूर की बात है...

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  14. आपकी आज तक की सबसे सुंदर पोस्ट।

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  15. कैप्टन खुशदीप,
    आज की आपकी इस उच्चतम प्रस्तुति के लिए मेरे पास सिर्फ़ एक शब्द है...
    'सैलूट'...!!!

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  16. अपनी पोस्ट पर खुद ही टिप्पणी मैं तब करता हूं जब बहुत ही अपरिहार्य होती है...आज ऐसा ही हो रहा है पहले निर्मला जी और अजित जी ने अपने स्नेह से मुझे निहाल कर दिया...अब कुछ और
    टिप्पणियों पर भी कुछ कहने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं...

    महफूज़ मास्टर,
    ये क्या अनाथ जैसे अनाप-शनाप शब्द बोल रहे हो...मेरे और तुम्हारे और सब चाहने वालों के जीते-जी तुमने ऐसा उलटा सीधा बोलने की हिम्मत ही कैसे की...आइन्दा ये गुस्ताखी मत करना...रही डैड और मॉम की बात, वो जन्नत में भी उतने ही खुश हैं जितने ज़मीन पर तुम्हारी तरक्की को देख कर होते...जो आया है, उसने जाना है...डैड और मॉम के साथ की ऊपर वाले को भी ज़रूरत थी...इसलिए बस उनके लिए आंसुओं के साथ नहीं प्यारी सी स्माइल के साथ दुआ किया करो...तुम्हारा हंसता-मुस्कुराता चेहरा ही उन्हें अच्छा लगता है...

    सागर प्यारे,
    न हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा
    इंसान की औलाद है तू इंसान बनेगा

    बस अपने काम को मेहनत और ईमानदारी से करो...किसी का दिल न दुखाओ...हो सके तो रोते और उदास चेहरों पर मुस्कान लाओ...फिर आदमी और इंसान का फर्क करना खुद ही छोड़ दोगे...

    अदा जी,
    ये आपका बड़प्पन है जो मेरे लिए इतना सुंदर कॉम्पलिमेंट दिया...कैप्टन बड़ा भारी और देश की आन-बान-शान से जुड़ा शब्द है...और ये देश के लिए अपना सब कुछ झोंक देने वाले जांबाज़ों के नाम से ही जुड़ना चाहिए...मैं तो बस एक मदारी हूं जो डुगडुगी बजाकर तमाशा दिखाने की कोशिश करता रहता हूं...कभी मजमा अच्छा लग जाता है...कभी अच्छा खेल दिखाने के बाद भी असर नहीं दिखता...यही जीवन है...

    जय हिंद...

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  17. सबसे बढ़िया औऱ सोचने को मजबूर करता लेख..

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  18. khushdeep ji, bachhon ke liye hum bahut kuch sochte hain, unhe desh ka bhavishya kehte hain par inka hi bachpan chhinte dekh khamosh rehte hain...kabhi ye sadak kinare chai pilate dikhte hai, kabhi phool bechte....inka bachpan hum chheen chuke hain isliye desh ka bhavishya bhi andhkaar mein dikhayi deta maaloom padta hai...

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  19. kya kahu samajh me nahi aa raha hai.bas itna kah sakta hun ki kaash aapaki baat har kisi ke samajh me aa jaye to duniya chaman ho jayegi.

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  20. khushdeep ji

    shayad itni der se aayi hun ki kahne ke liye kuch bacha hi nhi ........vaise bhi ye post nhi hai ye to zindagi ki wo sachchayi hai jisse har koi moonh chupana chahta hai magar sach kab pardon mein raha hai.........aapne jis tarah translate karke prastut kiya hai wo sarahniya hai......bas aage kahne ki himmat nhi hai.

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  21. .
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    खुशदीप जी,
    शानदार पोस्ट... अगर पढ़ने वालों में से एक ने भी इसे पढ़कर अपने उन भुलाये मां-बाप को याद किया... जिन्हें जिंदगी की इस दौड़ में दौड़ते-दौड़ते पीछे कहीं छोड़ आया हे वो...और एक क्षण की मुस्कान ले आया उनके चेहरे पर...तो समझिये आपकी ब्लॉगिंग की यह सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

    @ धीरु सिंह जी,
    मैने अपने माता पिता को अपने माता पिता की सेवा करते देखा इस्लिये मै भी उनकी किसी तरह की सेवा करने से पीछे नही हूं .
    यह वो बात है जो मेरी पीढ़ी के जोड़ों को अपनी दीवार पर लिखवा लेनी चाहिये...बड़े-बड़े अक्षरों में...
    आभार इस स्वर्णिम-वाक्य के लिये!

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  22. खूबसूरत एहसास से भरा एक बेहतरीन पोस्ट....हमें अपने माता-पिता को कभी भी भूलना नही चाहिए वो अपनी संतान के लिया कुछ भी करते है उसका कोई मोल नही है..और हमें यह जीवन पर्यंत याद रखनी चाहिए....आज की कुछ बिगड़ी पीढ़ी के लिए एक लाज़वाब सीख...धन्यवाद खुशदीप जी

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  23. .

    जिन्दे रह पुत्तर
    मर्मस्पर्शी और हृदयग्राही,
    मेरी पँडिताइन तो रो ही पड़ीं ।
    मैं रो नहीं पाता, बस निःशब्द और मौन डिस्टर्ब हो लेता हूँ..
    अब तक पढ़ी हुई पोस्ट्स में इसको मिले सौ में सवा लाख नम्बर..

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  24. बहुत ही सुन्दर सन्देश देती और आईना दिखाती पोस्ट....

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  25. खुशदीप भाई ,मेरे लिए ये आज की सबसे बेहतरीन पोस्ट थी , बहुत बडी बात कह दी आपने ,
    अजय कुमार झा

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  26. खुशदीप जी,

    मैंने आपको सिर्फ कहने के लिए 'कैप्टन' नहीं कहा है...

    सच पूछिए तो इस ब्लॉग जहाज के कप्तान बनने के काबिल आप ही नज़र आते हैं..

    हम लोग तो गीत ग़ज़ल, कहानी ..और न जाने क्या-क्या लिख जाते हैं..लेकिन सही मायने में जीवन के संघर्ष से जुडी बातें तो हम आपके ब्लॉग पर ही पढ़ पाते हैं...मैं हर दिन आपकी पोस्ट पढ़ कर थोडा सा बदल जाती हूँ...कल से आज बेहतर इंसान बनने कि कोशिश करती हूँ...इसी लिए आपको 'कैप्टन' कहा है... जीवन समर का कैप्टन..

    शुक्रिया...

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  27. यह व्यवस्था हमारी संस्कृति का अमूल्य रूप दर्शाती है .
    सर्वोत्तम आलेख

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