सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

1411 बाघ बचाने की मुहिम @ बाघ, ब्लॉगर, पारसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या...खुशदीप

देश में बाघ लगातार घट रहे हैं...


देश में ब्लॉगर लगातार बढ़ रहे हैं...

क्या घोर कलयुग है...


क्या ये बढ़ते हुए ब्लॉगर घटते हुए बाघों के लिए कुछ नहीं कर सकते...


कर सकते हैं जनाब बिल्कुल कर सकते हैं...



डार्विन की नेचुरल सेलेक्शन की थ्योरी कहती है विकास की दौड़ में जो प्रजाति पीछे रह जाती है, वो गधे के सिर के सींग की तरह गायब हो जाती है...डॉयनासोर किसी वक्त इस ज़मीन पर राज करते थे...लेकिन अपने को कुदरत की बदलती ज़रूरतों के अनुसार खुद को ढाल नहीं पाए और अंतत पूरी तरह धरती से गायब हो गए...

लेकिन बाघ के मामले में कहानी दूसरी है...बाघ बेचारा इनसान के लालच के चलते विलुप्त होने के कगार पर आ गया है...जंगल जिस तरह कट रहे हैं, प्राकृतिक संतुलन जिस तरह बिगड़ रहा है, बाघ बेचारे रहें तो रहें कहां ..पिछली सदी के शुरू में देश में चालीस हज़ार बाघ थे...1973 आते-आते देश में सिर्फ 1827 बाघ रह गए...उसी साल बाघों को बचाने के लिए प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया...इस वक्त सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में सिर्फ 1411 बाघ रह गए हैं...वो दिन दूर नहीं जब बाघ सिर्फ फोटो में देखने की चीज़ ही रह जाएगा और उसका नामोंनिशां भी हमारी ज़मीन से मिट जाएगा...

क्या आपको अब भी नहीं लग रहा कि बाघों को बचाने के लिए जागरूकता बढ़नी चाहिेए...ब्लॉगवुड को कुछ करना चाहिए...वन्यजीव प्रेमियों की आवाज़ के साथ इतनी आवाज़ तो मिलानी चाहिए कि सत्ता के बहरे कानों में भी गूंज सुनाई देने लग जाए...

अब आप कहेंगे कि बाघों के लिए इतनी हायतौबा क्या करनी...ठीक है जनाब बाघ के लिए आपका दिल नहीं धड़कता, इनसान के लिए तो धड़केगा न...अगर इनसान ऐसे ही ज़मीन पर कम होने लग जाएं तो भी आप ऐसे ही मूकदर्शक बने बैठे रहेंगे...मुंबई का पारसी समुदाय तो आपको याद होगा...हिंदी फिल्मों में ढीकरा ढीकरा करते पारसी बुज़ुर्ग तो आप हर्गिज नहीं भूले होंगे...देश में ज़्यादातर पारसी मुंबई में ही रहते आए हैं...

जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार विभाजन से पहले 1940-41 में देश में 114,890 पारसी थे...1951 आते आते देश में पारसियों की आबादी 111,711 रह गई....अब अनुमान लगाया जा रहा है कि 2020 तक देश में सिर्फ 23,000 पारसी रह जाएंगे...पारसियों की आबादी में 31 फीसदी आबादी 60 साल से ऊपर के लोगों की है...जबकि राष्ट्रीय औसत में 60 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों का 7 फीसदी ही बैठता है...पारसियों में सिर्फ 4.7 प्रतिशत ही छह साल से कम उम्र के बच्चे हैं..अगर यही हाल रहा तो हमारे देश से पारसियों का बिल्कुल सफाया हो जाएगा....




पारसियों के कम होने की वजह पलायन और कम संतान का होना है...बाघ भी बेचारे खाने की खातिर अपने मूल स्थान से पलायन को मजबूर होते हैं और लालची इनसान के हत्थे चढ़ जाते हैं...क्या हम बाघों के लिए ये नारा बुलंद नहीं कर सकते...

Save Tigers, Save Yourself....

23 टिप्‍पणियां:

  1. parsiyon mein ek bahut badi samasya hai...wo khud ko itna alag thalag rakhte hain ki kya kahein...aur antarjaateey vivaah ko bilkul bhi prashray nahi dena bhi ek bahut bada karan hai inke hrash ka...maine kuch samay inke saath bitaya hai...dekh kar yahi anumaan laga hai ki inki kattarta inko...luptta ke kagaar par le aayi hain...aap inmein viklaangta ki bahutayat paayenge..aur iska bahut bada karan hai inmein ..apaas mein hi vivha karna...antarjaatiye vivah bahut had tak vanshanigat jeans ko prabal banate hain...isiliye aap dekhenge ki antarjaatiy vivah se utpann bacche bahut medhaavi hota hain...
    parsiyon ki hras mein yahi baat mukhy roop se kaam kar rahi hai..
    hamesha ki tarah lajwaab post..
    GREAT..!!

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  2. रक्त की शुद्धता को लेकर पारसियों के वैवाहिक सँस्कार के मापदँड इतने कठोर हैं, कि इनकी घटती जनसँख़्या पर कोई अपील शायद ही कारगर हो । एक सामान्य भारतीय से अधिक औसत आयु के बावज़ूद इस कट्टरपन के चलते इनका बड़ी तेजी से ह्वास हो रहा है !
    अपने को अब तक प्रवासी मानने वाला यह तबका इस बिन्दु पर ठहर कर सोचता है कि, वह न घर के रहे न घाट के ।
    ज़ाहिर है, भागते समय के साथ सामँजस्य न बैठाने की जिद ने उन्हें इस कगार पर ला ख़ड़ा किया है ।
    एक और कारण इस समुदाय में थैलेसिमिया माइनर का होना भी माना जा सकता है । इस जेनेटिक हेरिटेज़ को तोड़ने के लिये उन्हें नजदीकी सँबँधों में विवाह करने से हतोस्ताहित करने की आवश्यकता है ।
    देश के आर्थिक विकास में उनके योगदान के मद्देनज़र उनको मुख्यधारा से जोड़े रखे जाने की आवश्यकता थी ।
    मुझे याद नहीं आता कि दादा भाई मौरोजी के बाद उनका कोई सर्वमान्य अगुआ सामने उभर कर आया हो ।
    कुल मिला कर स्थिति चिन्ताजनक तो है ही ।
    इस ओर ध्यानाकर्षण के लिये साधुवाद, वत्स !

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  3. सार्थक आलेख.

    अदा जी/डॉ अमर की सारगर्भित टीप और आपके आलेख का आभार.

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  4. सारगर्भित आलेख
    बाघों की घटती संख्या वाकई चिंताजनक है और यह सिर्फ और सिर्फ मानवीय स्वार्थ का ही परिणाम है

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  5. भाई मैं तो इस मुद्दे पर भी सफ़ेद कमीज पहनने को तैयार बैठा हूँ... कोई मुझे पूछने तो आये

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  6. पारसियों की घटती संख्या के कारण को अदाजी और डॉ. अमर जी की टिप्पणी स्पष्ट कर चुकी है ...
    इस सार्थक आलेख के लिए बहुत आभार ....!!

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  7. तो एक मुहीम और चले प्रायोजक खोजिये

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  8. अदा जी के और अमर कुमार जी की टिप्पणी से आपके इस पोस्ट को और भी अधिक महत्वपूर्ण बना दिया ....आप सभी का आभार

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  9. Aaj lag raha hai ki apne bade bhai purani form me aa gaye.. ek to ye post sona oopar se Ada di aur Dr. Kumar ke suhaga comments.. ho gaya sone pe suhaga..
    Jai Hind...

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  10. भाई, बाघों की बात तो समझ में आती है , लेकिन पारसियों का इससे क्या सम्बन्ध है , ये समझ नहीं आया।
    बाघ तो लाचार हैं , इंसानी सभ्यता के आगे।
    लेकिन पारसियों ने तो ये हालत खुद ही बनाई है।
    अब बिन मांगी सलाह देना क्या उचित रहेगा।
    या यूँ कहें इस प्रजाति को बचाना भी हमारा ही कर्तव्य है।

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  11. बाघ नहीं! जंगल मर रहे हैं। उन्हें बचाना जरूरी है। बाघ तो स्वयमेव ही बच जाएगा। जंगल का अर्थ केवल पेड़ और लताएँ नहीं होते। उन में रहने वाले जानवर भी होते हैं। जंगलों में जब जानवर नहीं रहेंगे तो बाघ कैसे बचेगा? हमें सम्पूर्ण जंगल बचाना होगा। वह भी खुद से।

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  12. सार्गर्भित पोस्ट। क्या कल को ब्लागर्ज़ का भी यही हाल होगा?????????? । आज हम बाघ बचायेंगे तभी कल को लोग ब्लागर्ज़ को बचाने का भी बीडा उठायेंगे इस लिये इस आयोजन के लिये सब को डत जाना चाहिये चलो पहले जंगल काटने वालों के विरुध मुहिम चलायें। शुभकामनायें

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  13. बहुत ही सटीक और सारगर्भित पोस्ट. आभार.

    रामराम.

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  14. आपसे पूरी तरह सहमत हूं खुशदीप भाई,बाघ और पारसी दोनों ही तेजी से घटे हैं।देश में और छत्तीसगढ से भी,यंहा रायपुर से करीब-करीब सारे पारसी मुम्बई जा चुके हैं अपने रिश्तेदारों के पास,और बाघ वो तो जाने-माने रईसों और राजे-महाराजों के ड्राईंग रुम की दीवालों पर चिपका दिये गये हैं।छ्त्तीसगढ के नक्सल प्रभावित जंगलों मे तो बाघों की गिनती भी नही हो पाती है।पता नही वंहा बाघ बचे भी या…………………।

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  15. बाघों का विषय सच में चिंताजनक है .... पारसियों के बारे में तो कुछ नही कह सकते उनका निजी मामला है ....
    वैसे ये इंसान की भूख ही है जो बाघ ही नही कितनी और प्रजातियों को नष्ट करेगी खुद नष्ट नोहे से

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  16. hmmmmmmmmmmmm...vaise parsi to apni is dasha ke liye khud jimmedar hain..han baghon ke liye ham doshi hain.

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  17. वैसे आपने बहुत सफ़ाई और होशियारी के साथ बाघ और पारसियों को आपस में जोडा है.......

    आपकी बात काफ़ी हद तक सही है.....

    =============

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  18. जनगणना के मुताबिक भारत में पारसी समुदाय गायब होता जा रहा है । टाटा जैसे अमीर पारसी घरानों को भी इसकी चिन्ता सताये जा रही है । इसका मूल कारण पारसी महिलाओं का बहुत ऊंची शिक्षा लेना और पश्चिमी रंग में ढ़लना बताया जा रहा है । कहते हैं कि पारसी अमीर इसलिए हुए हैं कि उन्होंने ब्रिटिश राज्य से सहयोग करके ऊंचे पद हासिल किये और अपने बच्चों को भी ऐसे ओहदे दिलवाने के लिए अपने बच्चों को इंग्लैंड में शिक्षा के लिए भेजा और यह परंपरा आज भी जारी है । पारसियों की अमीरी ही आज उनके लुप्त होने का कारण बन रही है । पश्चिमी संस्कृति में महिलाओं के लिए रोल माडल कैरियर और पैसे का है, उस महिला को बुद्धू और पिछड़ा माना जाता है जिसने घर बैठ कर बच्चे पैदा किये । इसी संस्कृति को पारसी महिलाओं ने बखूबी अपनाया और इसीलिये आज उनका समुदाय लुप्त होने के कगार पर है ।

    प्रसिद्ध पारसी हस्ती बहराम दस्तूर ने एक बार कहा था कि पारसी महिलायें तब ही विवाह करना चाहती हैं जब वे जीवन में 'settle' हो जायें और तब तक उसकी प्रजनन की आयु समाप्त हो चुकी होती है । उन्होंने कहा कि आखिर इतना पैसा होने पर भी वे 'settle' क्यों होना चाहती हैं ? भारतीय परम्परा में महिला को आर्थिक तौर पुरुष पर आधीन रहना होता है यानि पुरुष कमाये और वह घर बैठी खाये । वह सही उम्र में विवाह करती है, अपने पति के घर को संभालती है, बच्चे पैदा करती है और इसी से उसको सम्मान मिलता है । खुद पैसा कमाने के चक्कर से वह बेफिक्र होती है, खुद अपनी 'व्यक्तितत्व' की परवाह न करके अपने पति के स्थिति को ही अपना सुख मानती है और सुखी रहती है ।
    पारसियों ने गलती यह की कि पश्चिमी संस्कृति के मुताबिक अपनी महिलाओं के "कैरियर" को अधिक महत्व दिया, मातृत्व को नहीं । जो कौमें इस पश्चिमी संस्कृति को अपनायेंगी वे इसी तरह लुप्त होंगी जैसे भारत में पारसी एवं पश्चिमी देशों में सफेद चमड़ी वाली कौमें । जो व्यक्ति अपने सुख और कैरियर को ज्यादा अहमीयत दे और कौम को अनदेखा करे, उसका लुप्त होना आश्चर्यजनक नहीं ।

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  19. पारसी समाज जितना उत्तर-आधुनिक होता है उस से कहीं ज़्यादा घोर पुराणपंथी!! आपके पास खज़ाना है जनाब!!

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  20. पारसियों के कम होने की वजह वो खुद है, ओर बाघ को खत्म करने मै हम जेसे हत्यारे लोग है, जो शिकार कर के अपनी खुशी पुरी करते है ओर कानून को भी खरीद कर जेब मै रखते है, एक गरीब चुहा भी मार दे तो पुलिस वाले ओर कानून वाले उस का कया हाल करते है... ओर शिकार करने वाले काले हिरन तो क्या गरीब इंसनो को भी मार दे नशे मै तो कोई बात नही... उस देश मै यह गरीब बाघ कब तक बचेगे?

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  21. जी भैया.... एक बात और है.... कि पारसी औरतें ज्यादा महत्वाकांक्षी होतीं हैं.... जिसकी वजह से देर से शादी करतीं हैं.... और जब देर से शादी होती है... तो फर्टिलिटी पिरीअड बीत चुका होता है... और यह मैं नहीं कहता.... २००० का पौपुलैशन आंकडा का कारण कहता है... और बाघों का शिकार ज्यादा इंसान ने इसीलिए किया.... क्यूंकि यह मान्यता है कि...उनके दाँत और हड्डियों और नाखून से... काम शक्ति बढती है.... और खाल का दाम इंटर नैशनल मार्केट में अच्छा मिलता है....



    आपकी पोस्ट बहुत अच्छी लगी....



    जय हिंद...

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