रविवार, 24 जनवरी 2010

ये पढ़िए, सोच बदल जाएगी...खुशदीप

एक अस्पताल के रूम में दो बुज़ुर्ग भर्ती थे...दोनों ही गंभीर रूप से बीमार थे...एक बुज़ुर्ग को रोज अपने बेड पर एक घंटा बैठने की इजाज़त दी जाती थी ताकि उसके फेफड़ों में भर जाने वाले पानी को शरीर से बाहर निकाला जा सके...उस बुज़ुर्ग का बेड कमरे की इकलौती खिड़की के पास मौजूद था...लेकिन दूसरा बुजु़र्ग उठकर बैठने वाली हालत में भी नही था...इसलिए अपने बेड पर हमेशा पीठ के बल लेटा रहता था...बड़ी मुश्किल से कोहनियों के सहारे ही लेटे-लेटे कभी-कभार सिर ही ऊंचा कर सकता था...

दोनों बुज़ुर्ग घंटों आपस में बातें करते रहते थे...वो अपनी पत्नियों की बात करते, परिवार की बात करते, नौकरी, छुट्टियां कैसे बिताते, यानि हर विषय पर बात करते...इसके अलावा पहला बुज़ुर्ग जब एक घंटे के लिए कमरे की खिड़की के पास बैठता तो अपनी ओर से बाहर का सारा नज़ारा दूसरे लेटे हुए बुज़ुर्ग को सुनाता था...




पहला बुजु़र्ग इतने दिलचस्प और विविध ढंग से रोज़ बाहर की रंगों भरी ज़िंदगी के किस्से सुनाता कि लेटे हुए बुज़ुर्ग को अपनी बीमारी और दर्द सब भूल जाता, वो अपने को आम लोगों की तरह ही स्वस्थ और ज़िंदगी से ही भरा हुआ महसूस करने लगता...ख़िड़की के बाहर पार्क, एक मनोरम झील, झील में अठखेलियां करती बत्तखें, पार्क में बच्चों की शरारतें, एक-दूसरे के हाथों-हाथों में डालकर दुनिया की सुध-बुध खोए युवा जोड़े...पहला बुज़ुर्ग सारे दृश्य उकेरता रहता और दूसरा बुज़ुर्ग आंखें बंद कर उन्हीं रंगों में खो जाता...

एक दिन पहले बुज़ुर्ग ने बाहर से गुज़र रही रंग-बिरंगी परेड का आंखों देखा हाल भी दूसरे बुज़ुर्ग को सुनाया...साउंडप्रूफ़ कमरा होने की वजह से लेटा हुआ बुज़ुर्ग परेड के बैंड की धुनों को तो नहीं सुन सकता था लेकिन दिमाग में उसका असर पहले बुज़ुर्ग के शब्दों के मुताबिक महसूस ज़रूर कर सकता था...

इसी तरह दिन, हफ्ते, महीने गुज़रते गए....

एक सुबह नर्स कमरे में रोज़ाना की तरह दोनों बुज़ुर्गों को स्पंज बाथ दिलवाने के लिए गर्म पानी लेकर आई तो खिड़की के पास वाले बेड के बुज़ुर्ग को बिना हरकत किए सोए देखा...नर्स ने नब्ज चेक की...बुज़ुर्ग के चेहरे पर असीम शांति थी और वो रात को नींद में ही दुनिया को छोड़कर जा चुका था...ये देखकर नर्स की भी आंखें नम हो गईं...उसने अस्पताल के स्टॉफ को बुलाकर पहले बुज़ुर्ग के पार्थिव शरीर को ले जाने के लिए कहा...

दूसरे बुज़ुर्ग को भी पहले बुज़ुर्ग का साथ छूट जाने का बहुत दुख हुआ...उसने नर्स से आग्रह किया कि क्या उसे खिड़की के साथ वाले बेड पर शिफ्ट किया जा सकता है...नर्स ने बुज़ुर्ग की इच्छा का मान रखते हुए तत्काल उसे दूसरे बेड पर शिफ्ट करा दिया...कमरे से नर्स के जाने के बाद दूसरे बुज़ुर्ग ने कोहनी के बल सिर उठाते हुए खिड़की के बाहर झांकने की कोशिश की...लेकिन ये क्या खिड़की के बाहर तो सिर्फ खाली दीवार थी...

दूसरा बुज़ुर्ग हैरान....बेड के साथ लगा बेल का बटन दबा कर नर्स को बुलाया...नर्स से पूछा कि वो पहला बुज़ुर्ग जिस मनोरम झील, पार्क की बात करता था, वो कहां हैं...ये सुनकर नर्स की आंखें फिर गीली हो गईं और धीमे शब्दों में जवाब दिया...उनकी आंखों में रौशनी नहीं थी और वो तो इस खाली दीवार तक को नहीं देख सकते थे...


स्लॉग चिंतन




खुद जैसे भी मुश्किल हालात से गुज़र रहे हो लेकिन दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने में ही जीवन का असली आनंद है...

दुख बांटो तो आधा हो जाता है, लेकिन खुशी बांटों तो दुगनी हो जाती है...

अगर सही में अमीर बनना चाहते हो तो उन चीज़ों को गिनो जिन्हें पैसे से खरीदा नहीं जा सकता...

आज (TODAY) सबसे बड़ा तोहफ़ा (GIFT) है, इसीलिए तो ये प्रेज़ेंट (PRESENT) है...

38 टिप्‍पणियां:

  1. kayi rupo mei iss kahani ko padha hein, aj phir se padhna bahut acha laga....slog chintan bahut pyara hein

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  2. "ये पढ़िए, सोच बदल जाएगी...खुशदीप "

    बदल जाएगी नहीं...बदल गयी भाई....आप तो बस ऐसे ही लिखा करें....आपका यही अंदाज तो दिल को भाता है....

    स्लॉग चिंतन-उम्दा

    जय हिंद

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  3. khushdeep ji,
    yah kahaani pahle bhi padhi hui hai..aaj fir padhakar achchha laga!

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  4. यह बोध कथा बहुत पहले पढ़ी थी। शायद आचार्य रजनीश के यहाँ ... इसे दुबारा पढ़वाने के लिए आभार।

    स्लॉग चिंतन - उत्कृष्ट

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  5. याद नहीं आ रहा , कहाँ पढ़ा था इसे ।
    बहरहाल, सार्थक और तर्कसंगत लेख।
    वर्तमान में जीना ही असली जीना है।

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  6. वाह खुशदीप भाई कहानी पढ़ कर तो आँखे भर आई..बिना आँखों के बाहर का नज़ारा इतनी बढ़िया ढंग से वो इसलिए बताता रहा ताकि उसके मित्र को खुशी मिल सके...और यही है एक बेहतरीन जीवन का सार की दूसरों को खुशी दो तुहारे हिस्से में चाहे जो भी हो....एक बेहतरीन कहानी..बहुत धन्यवाद भाई

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  7. वाकई सभी को अपनी सोच बदलना चाहिये...।

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  8. खुशदीप भईया ये कहानी दिल को छु गयी , आपका बहुत-बहुत आभार इस पोस्ट को हम तक पहुचाने के लिए।

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  9. इसको पढ़ते ही दोस्त की याद आ गई। उसने भी अपने ब्लॉग पर बहुत शानदार ढंग़ से लिखकर डाली थी, लेकिन बहुत बहुत है। और अच्छी चीजों का दोहराव बुरा नहीं होता। बहुत शानदार है।

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  10. Dil hil gaya bhaia... sach me soch badal di aapki is ullekhit rachna ne...
    Girijesh ji jaankar khushi hui ki aap bhi OSHO ke darshn ko pasand karte hain..
    Jai Hind... Jai Bundelkhand...

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  11. bahut khoobsurati se aapne is katha ko likha hai.....sach hai soch badal gayi hai....shukriya

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  12. ये ऐसी कथा है कि पहले भी, और जब भी पढ़ा...खुद में त्वरित परिवर्तन पाया..


    बहुत आभार आज फिर पढ़वाने का.

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  13. मेने यह कहानी बहुत पहले भारत मै ही पढी थी, बहुत सुंदर कहानी, काश हम सब इस से कुछ सीख लेते
    धन्यवाद

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  14. अपुन का भी यही फंडा है...खुशियाँ बांटते चलो

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  15. प्यार बाँटते चलो...!!

    क्या बात है खुशदीप जी ..आपने बहुत ही हृदयस्पर्शी कहानी सुना दी....और सच है पढ़ कर हृदय परिवर्तन होना ही है...

    आपकी बातों में लोगों को बदलने क्षमता है....आपको पढ़ कर लोग बदल रहे हैं...आपकी बातें लोग सुनते हैं...बस आप ऐसे ही लिखते रहिये...बहुत कुछ बदल जाएगा...अटूट विश्वास है...!!

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  16. यह कथा पहले भी कई बार पढ़ चुकी हूँ ...और कोई शक नहीं कि इस तरह की बोध कथाएं जिन्दगी की दिशा बदल देती हैं ....
    एशियन मेंटालिटी है कि लोग अपनी खुशियों से इतना खुश नहीं होते जितना दूसरों की ख़ुशी से दुखी ..
    सुख, दुःख और आनंद बाहर की वस्तु नहीं है ...वह सब हमारे अपने भीतर मौजूद है ....बस हम आँख खोल कर देख भर लें ...प्यार और हंसी एक संक्रामक रोग की तरह है ...बाँटोगे तो तेजी से फैलेगा ....दबाओगे तो रुक जाए मगर साइड इफेक्ट कर के रहेगा ...जब से यह दर्शन अपनाया है ...जिंदगी बदल गयी है ...

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  17. बहुत ही सुन्दर एवं शिक्षप्रद कथा!

    अपने लिये जिये तो क्या जिये ...

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  18. ीआज तो सच मे सोच बदल दी। प्रेरक सार्गर्भित कथा है। हम तो पहले भी उस अन्धे आदमी की तरह ही जी रहे हैं । मगर अब लगता है कि सही जी रहे हैं धन्यवाद खुशदीप मेरी आस्था को मजबूत करने के लिये ।अशीर्वाद बस ऐसे ही खुशियाँ बाँटते रहो

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  19. इस कथा का सार यही है कि जीवन में हमेशा विधायक दृष्टि रखनी चाहिये. नकारात्मक सोच से बचना चाहिये. बहुत सामयिक है यह बोध कथा.

    रामराम.

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  20. खुशदीप भाई-कल की बैठकी के बाद अब पहुंचे है।
    अच्छी बोध कथा है। मैने पहले कहीं नही पढी यहीं पढी है।


    एक दुसरे का गम बांटते कट जाती है दुख की रात,
    जीवन भर के अनुभव बांट लेते है आपस मे साथ।

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  21. खुशदीप सहगल जी ,
    पिछली टिपण्णी में मैंने आपका नाम ''प्रदीप '' लिख दिया था इसके लिए मै शर्मसार हूँ /
    पुनश्च, बड़ी सुन्दर और सारगर्भित पोस्ट लिखी आपने , पढ़कर आंदोलित होना सहज बात थी , सवाल ये नहीं की आप किन हालत में साँसे ले रहे है बल्कि ये है की आप दूसरो की तवज्जो उनके सुभीसते पर कैसे कर दिलाते है और चाहे इन्शान क्यों नहीं किसी भी हालत में जी रहा हो / हाहाकारी हालात में मुत्वातर रहकर भी जो दूसरो के सुभिसते की राह बना जाये बिना-शक जीना उसी का है / प्रेरणाप्रद पोस्ट के लिए सहस्त्राकोटि धन्यवाद देता हूँ मै आपको / सच पूछे तो मै आपकी इस रचना से काफी मुतमुइन हुआ हूँ / थैंक्स /

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  22. bahut khub kahi apne khushdeepji...
    pata hai aise log ab kam hi milte hai jo dusaro ke kiye jeete ho...
    shubhkamnaye....jyoti

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  23. अपना भी आजकल यही फ़ंडा है,प्यार बांटते चलो।वो भी ब्लागजगत मे आने के बाद,वरना पहले तो सिवाय लड़ने-झगड़ने के लगता है कि कुछ किया ही नही।सुधार की प्रक्रिया जारी है और ऐसे मे आप मेरी मदद ही कर रहे हैं।

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  24. bahut hi khoobsurat kissa.....padh kar mann udhaas bhi ho gaya aur achha bhi laga

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  25. सच कहा है ,......... खुशियाँ बाँटिए ......... जीवन की दिशा बदल जाएगी ..........

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  26. स्लोग चिंतन अच्छा है दोस्त........बोध कथा वाकई आँखे खोलती है .

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  27. कहानी वाकई बहुत अच्छी है... पसंद आई शुक्रिया... उम्मीद है इस शिक्षा को याद १० दिन और इसपर अमल ७ दिन तो कर ही लूँगा...

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  28. uffffffffff...bahut hi marmsparshi katha...vakai soch badalne ka dam rakhti hai...bahut hi khubsurat..esi hi rachnayen likha karen khushdeep ji !

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  29. आप के ब्लाग पर शायद पहली बार ही आया हूँ पर पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा......एक उम्दा प्रस्तुति.....जीवन का वास्तविक आनन्द तो दूसरे का दूख दूर करने में ही है.......

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  30. बहुत अच्छी पोस्ट। इस दर्शन को जीवन में उतारना चाहिए।

    धन्यवाद।

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  31. सच है भैया..... खुशियाँ बांटने से ही बढती है.... इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है... बुरे में भी हमेशा अच्छा ही खोजना चाहिए.... प्यार ...प्यार से ही मिलता है.....

    बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट....


    जय हिंद....

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  32. वाह खुशदीप भाई सचमुच इस पोस्ट को पढ़ कर सोच बदल गयी. हृदय मे गहरी अनुभूति भर गयी. बहुत बहुत धन्यवाद.

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  33. सोचने पर मज़बूर कर दिया आपने..सच में...

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  34. Post padhke aankhen nam ho gayeen...!
    Gantantr diwas kee dhero shubhkamnayen!

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  35. अति भावपूर्ण लेख....वस्तुतः आपके ह्र्दय का प्रतिबिम्ब है....

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