गुरुवार, 7 जनवरी 2010

के भईया आल इज़ वैल...खुशदीप

हम सबसे बड़े इडियट्स हैं...हमने ये साबित कर दिया है...बेशक हम अपने को फन्नेखां माने लेकिन कोई भी हमारा पोपट बना सकता है...और हम खुशी खुशी बनते हैं...बनते ही नहीं है जेब से रकम भी खर्चते हैं...भले ही भलाई के काम के लिए फूटी कौड़ी हमारी अंटी से न निकले...लेकिन निकालने वाले को बस निकालना आना चाहिए...हम देंगे भी और हमारे चेहरे पर शिकन नहीं मुस्कान रहेगी...

ऐसा ही कुछ किया है आमिर ख़ान एंड कंपनी ने हमारे साथ...विधू विनोद चोपड़ा का बैनर...राज कुमार हिरानी का निर्देशन, आमिर-माधवन-शरमन की अभिनय त्रिमूर्ति और चेतन भगत की किताब ...फाइव पाइंट समवन...इन सब महारथियों ने कुनबा जोड़ा और हमारे लिए फिल्म पेश की...थ्री इडियट्स...जिस तरह की मार्केटिंग रणनीति इस फिल्म के लिए अपनाई गई, मुझे याद नहीं पड़ता बॉलीवुड के इतिहास में पहले कभी फिल्म को हिट कराने के लिए ऐसे फंडे अपनाए गए हों...नतीजा आपके सामने हैं...फिल्म रिलीज़ होने के पहले दो हफ्ते में 240 करोड़ की कमाई...भारत समेत पूरी दुनिया में हिंदी फिल्म की कमाई के मामले में सारे रिकॉर्ड्स तोड़ दिए...




आपने शायद गौर किया हो जैसे ही फिल्म की रिलीज की डेट पास आती गई, चेतन भगत की थ्री इडियट्स के निर्माता-निर्देशक से नाराज़गी बढ़ती गई...चेतन भगत का आरोप था कि जिस क्रेडिट के वो हकदार थे वो उन्हें फिल्म के टाइटल्स में नहीं दिया गया...दूसरी ओर फिल्म बनाने वालों का कहना था कि कॉन्ट्रैक्ट में चेतन भगत के साथ सारी शर्ते पहले ही तय कर ली गई थीं और तय मेहनताने की एक-एक पाई उन्हें चेक के ज़रिए चुकाई गई ...चेतन भगत पर ये आरोप भी लगाया गया कि वो स्क्रिप्ट राइटर अभिजात जोशी से हक़ छीनना चाहते हैं....ये दावा भी किया गया कि दर्शक फिल्म देख लें और साथ ही चेतन भगत की किताब पढ़ लें और खुद ही तय करें कि दोनों में कितनी समानता है...

नोएडा के एक मॉल में एक पत्रकार ने प्रेस मीट में इस विवाद के बारे में प्रश्न क्या पूछा कि फिल्म निर्माता विधू विनोद चोपड़ा आपे से बाहर हो गए और सवाल पूछने वाले को शट-अप तक कह गए...आमिर ख़ान और निर्देशक राज कुमार हिरानी दोनों ही विधू विनोद चोपड़ा से माइक ही छीनते रह गए...लेकिन विधू ने जो कहना था, कह कर ही दम लिया...नतीजा ये निकला कि देश भर के मीडिया में इस घटना को जमकर कवर किया गया...यानि तीर पूरी तरह निशाने पर बैठा...लाखों-करोड़ों खर्च कर भी फिल्म को जो पब्लिसिटी नहीं मिल सकती थी वो एक ही झटके में मिल गई....

ऐसा नही कि मैनेज्ड ड्रामे का लाभ सिर्फ फिल्म को ही बॉक्स आफिस पर मिला...चेतन भगत की किताब फाइव पाइंट समवन...जो चार साल पुरानी हो चली थी, भी दोबारा हॉट केक की तरह बिकने लगी...दिल्ली के खान मार्केट में किताबों के विक्रेता बाहरीसंस के रजनी बाहरी मल्होत्रा बताते हैं कि किताब की बिक्री में पिछले कुछ दिनों में ही साठ फीसदी की बढ़ोतरी हुई है...किताब के रीप्रिंट के ऑर्डर भी धड़ाधड़ दिए जा रहे हैं...

सब कुछ स्क्रिप्ट के मुताबिक होने के बाद...लड़ाई-लड़ाई माफ़ करो............साफ़ करो....वाली तर्ज पर चेतन भगत और फिल्म के प्रोडक्शन हाउस के बीच सारा टंटा भी खत्म हो गया...चेतन भगत ने दो दिन पहले फिल्म बनाने वालों से माफ़ी भी मांग ली...साथ ही आमिर ख़ान के लिए भी सम्मान का भाव जता दिया...शायद आगे की किसी फिल्म के लिए मार्केटिंग रणनीति अभी से बनने लगी हो...

वैसे थ्री इ़़डियट्स के प्रोडक्शन हाउस ने एक और शिगूफ़ा छोड़ा है...वो है फिल्म की स्क्रिप्ट को किताब की शक्ल में पेश करने का...ओम बुक्स इंटरनेशनल की ओर से प्रकाशित की जा रही तीन सौ पन्नों वाली इस किताब की तीन हज़ार प्रतियां जनवरी में ही रिलीज़ की जा रही है...यानि कमाई का यहां भी चोखा रंग सामने आएगा...

अब ये सब कुछ पढ़ने के बाद बताइए....कौन है जीनियस और कौन हैं इडियट्स....अपुन राम तो यही गाए जा रहे हैं...के भईया आल इज़ वैल...



स्लॉग ओवर

पति-पत्नी गोरे थे...बच्चा काला भुजंग पैदा हुआ...देखने वालों ने आश्चर्य जताया...पति ने सफ़ाई दी...अरे यार किसी का कसूर नहीं है...ये मेरी प्राण प्यारी जो कुछ भी बनाती है, ऐसे ही जला-भुना देती है...

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आप कितने स्मार्ट हैं...

जानना है, आइए मेरे अंग्रेज़ी ब्लॉग Mr Laughter पर...

25 टिप्‍पणियां:

  1. के भईया आल इज़ वैल... चेतन भगत की अगली किताब का विचार हो सकता है कि सफलता के लिए पैसे मत खर्चों, विवाद करो यानि पब्लिस्टिटी स्टंट मल्लिका शेरावत से राखी सावंत हिट हुई बतौर पब्लिसिटी स्टंट। सच कहत है भाई कुलवंत

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  2. काश ब्लागजगत ही कुछ सीखता इससे ....

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  3. तभी हम कहें कि गाढ़ा धुआं छोड़ते-छोड़ते बवाल अचानक थम सा क्यों गया है ?

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  4. इतना ही कह सकते है कि आल इज़ वैल..फिल्म तो अच्छी लगी.


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    स्लॉग ओवर...मस्त!

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  5. पूंजी के नित नये प्रदर्शन,मल्टीनेशनल्स के द्वारा की जा रही नई नई रणनीति और हमारे फिल्म व कला जगत में इलीट्स के वर्चस्व के बीच जनता ही मूर्ख साबित होती है ..लेकिन अंतत: जनता की बुद्धिमानी की ही जीत होती है ।

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  6. परदे के पीछे क्या हुआ ये तो वही लोग जाने लेकिन फिल्म बहुत अच्छी लगी...
    यहाँ कनाडा में भी हाउस फुल थी...टिकेट मिली ही नहीं हमें दूसरे दिन जाना पड़ा....किसी भी प्रोडक्ट की सफलता उस प्रोडक्ट की मार्केटिंग पर बहुत हद तक निर्भर करती है.....और आज कल वैसे भी नेगटिव पब्लिसिटी का ज़माना है..और ये काम भी करता है.....हमारे यहाँ एक बैनर रोड में उल्टा लगा हुआ है...देखने में अजीब लगता है लेकिन उस बैनर ने उस प्रोडक्ट की छाप ऐसी छोड़ी की मरते दम तक वो याद रहेगा....और देखिये कितना सिम्पल था बस होर्डिंग उल्टा लगाना..
    अब कोई ई बतावे कि इस फिल्म में आमिर खान मुझे पिछली फिल्म से यंग दिख रहा था (कृपया मेरे इस कथन को अन्यथा न लें...सीरियसली ) ...ऐसा सच-मुच था या मेरी आखें बिलकुल काम से गयी...

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  7. अगर हम लोग ईडियट न होते तो क्या ये फिल्म इन्डुस्ट्री इतनी तरक्की कर सकती थी। अब तो इन लोगों ने साबित भी कर दिया है कि हम निश्चित ही ईडियट्स हैं सलाग ओवर मस्त है शुभकामनायें।,अशीर्वाद्

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  8. आआआअल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल इज वेल्ल्ल्ल्ल्ल ।

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  9. आपकी पोस्ट की बात बाद में करेंगे
    पहले अरविन्द जी से निपट लिया जाए

    वे कह रहें हैं कि
    "काश ब्लागजगत ही कुछ सीखता इससे ...."

    बताईए, अब हुए ना अरविंद जी भी ...

    बी एस पाबला

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  10. हम तो चुप ही रहूंगा, यहां सल्तने सलटाने की बाते हो रही हैं.:)

    रामराम.

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  11. सही कह रहे भैय्या आल इज वेळ ... जो जिसको पसंद आ जाए .

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  12. खुशदीप जी! हम तो कई सालों से फिल्में देखना ही छोड़ चुके हैं इसलिये नई फिल्मों में विषय में हमारे काला अक्षर भैंस बराबर है।

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  13. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  14. ये दावा भी किया गया कि दर्शक फिल्म देख लें और साथ ही चेतन भगत की किताब पढ़ लें और खुद ही तय करें कि दोनों में कितनी समानता है...
    यहाँ भी तो अपनी दूकान हैं... दरअसल यह सारे टाई वाले लोग बोलने में माहिर होते हैं... तभी इन पर लिखी किताबें भी खूब बिकते हैं....

    स्पष्ट बोलने के कतराते हैं... बात-बात की सफाई देनी पड़ती है... दरअसल इनके दिल में प्यार कम होता है... बात तारीफ से शुरू करेंगे और अनपी असलियत पर आ जायेंगे...

    आमिर खान भी फिल्म रिलीज़ होने से पहले दिल के बड़े अच्छे बन जाते हैं... माफ़ी मांगने लगते हैं... आज कल ये लोग भी नेता बन गए हैं...

    "टाइम टाइम की बात है प्यारे मैं रगडा या तू रगडा... "

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  15. ऐसा नहीं है...अब जनसाधारण भी काफी समझदार हो गया हैं...इनलोगों के मार्केटिंग प्रपंच सबकी समझ में आ रहें थे...पर अपने उबाऊ दिनचर्या से निजात पाने को और कोई साधन है क्या?...हमारे यहाँ पिकनिक,पार्टी का इतना प्रचलन नहीं है..ले दे कर फिल्म के बहाने ही एक आउटिंग मिल जाती है...और ये सारी पब्लिसिटी धरी रह जाती,अगर फिल्म अच्छी नहीं होती...लोग इसलिए देख रहें हैं कि फिल्म मनोरंजक है...और किताब भी अच्छी है..इसलिए ही बिक रही है...और इन सबकी पब्लिसिटी बस icing on the cake hi hai..cake is delicious..no doubt...icing has jst made it more attractive

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  16. हमेशा जनता मुर्ख नही बनती
    कभी कभी शिकारी ही शिकार हो जाता है

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  17. खुशदीप भाई, मैं आप से सहमत नहीं हूँ। मैंने तो चेतन भगत या उसकी किताब का नाम भी नहीं सुना था। फिर भी फिल्म बहुत पसंद आई। अब भले ही उसकी किताब की सेल में थोड़ी बढ़ोतरी हो गई हो, लेकिन हमें इससे क्या लेना। फिल्म देखो और आनंद लो। नाम पर मत जाओ। नाम कुछ और भी होता तो भी पसंद तो आती।

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  18. bhai hamen to pustak bhi achchi lagi thi or film bhi bahut achchi lagi...baki ham janta to hamesha se idiot hai :)

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  19. हम ने तो भाजी अभी देखी भी नही, लेकिन ऎसे हटकंडे अच्छे नही... वेसे सब कह रहे है तो अच्छी ही होगी, देख लेगे हम भी

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  20. सब मार्केटिंग के नए नए फंडे हैं....फायदा फिल्म का भी हुआ और चेतन का का भी.... सब प्लांड है...

    जय हिंद...

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  21. मैंने ये कहां कहा है कि फिल्म बढ़िया नहीं है...राज कुमार हिरानी मझे हुए निर्देशक है...ज़िंदगी से जुड़े सच्चे पहलुओं
    को सिल्वर स्क्रीन पर पेश करने में उन्हें महारथ हासिल है...इसलिए थ्री इडियट्स में आमिर ख़ान जैसा सुलझा हुआ
    अदाकार भी राज कुमार हिरानी की सोच को ही मू्र्त रूप देता नज़र आता है...मैं सिर्फ ये कहना चाह रहा था कि ये मार्केटिंग ही है जो आमिर ख़ान को बनारस जाकर पहचान छुपाने का गिमिक्स करने को प्रेरित करती है...सोची समझी रणनीति के तहत विवाद को जन्म दिया जाता है और फिर मतलब निकल जाने पर चेतन भगत माफी भी मांग लेते हैं...राखी सावंत को बेशक सीरियसली न लिया जाए लेकिन एक बात उन्होंने पीछे बड़े पते की कीथी...राखी ने कहा था कि बड़े स्टार्स को सिर्फ अपनी फिल्म की रिलीज पर ही चैरिटी करने की याद क्यों आती है...राखी के
    शब्द थे...क्यों ये सांप फिल्म रिलीज होते ही अचानक बिल से बाहर आ जाते हैं और फिर उल्लू सीधा करने के बाद सब भूल जाते हैं...

    जय हिंद...

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  22. फिल्म बहुत अच्छी और मनोरंजक लगी, इसलिये कह सकते है कि आल इज़ वैल!!!!!!!!!!!!!

    चेतन भगत या उसकी किताब का नाम भी पहले कभी नहीं सुना था।

    जय हिंद।

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  23. चेतन भगत को उम्मीद नही थी की उनके लिखे उपन्यास पर बनी फ़िल्म हिट हो सकती है पहले हैलो क हाल तो खराब हो ही गय था . इसीलिये थ्री इडियट से पहले ही पैसे ले लिये थे अब हिट हो गयी तो पैसे कम लगने लगे होगे

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