गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

बहू की ताकत...खुशदीप

बहुओं की ताकत अपरम्पार है...सियासी ख़ानदान भी इससे अलग नहीं है...पति के लिए वोट जुटाने को दिन-रात एक करती पत्नियों को आपने देखा होगा...खुद सियासत में न भी हो लेकिन हमेशा उसी माहौल में उठने-बैठने से नेतागीरी का हर दांव-पेंच उन्हें बखूबी आ जाता है...लेकिन देश के जितने बड़े सियासी कुनबे हैं, वहां महिलाएं भी सत्ता पर अपनी दावेदारी ठोकने लगी हैं...नई मिसाल बाल ठाकरे की बहू स्मिता ठाकरे की है..स्मिता की अपने पति जयदेव से नहीं बनी लेकिन जयदेव के बाल ठाकरे के घर मातोश्री से अलग रहने पर भी स्मिता ने मातोश्री का साथ नहीं छोड़ा...स्मिता बेशक अपने दो बेटों के साथ जुहू में रहती हों लेकिन मातोश्री में भी उन्होंने अपनी रिहाइश की जगह बरकरार रखी...

लेकिन अब उन्हीं स्मिता ठाकरे के तेवरों से बाल ठाकरे के दरकते किले की एक और दीवार ढह गई...उम्र के इस पड़ाव पर बाल ठाकरे को ये मलाल ज़रूर होगा कि चोट इस बार भी बाहर से नहीं, घर के अंदर से ही हुई...इस बार बग़ावत का झंडा मझले बेटे जयदेव की पत्नी स्मिता ठाकरे ने उठाया...भतीजे राज ठाकरे की तरह बहू स्मिता ने अलग पार्टी तो नहीं बनाई बल्कि उससे भी आगे का एक कदम उठा लिया....बाल ठाकरे का जिस कांग्रेस के साथ शुरू से छत्तीस का आकंड़ा रहा है, स्मिता ने उसी कांग्रेस के हाथ का साथ थामने के लिए ठाकरे खानदान से बाहर कदम बढ़ा दिए...


ये किसी से छुपा नहीं है कि नब्बे के दशक के मध्य शिवसेना बीजेपी के साथ महाराष्ट्र की सत्ता में आई थी तो उस वक्त स्मिता की तूती बोलती थी...बड़े बड़े नेता, अधिकारी, कारोबारी स्मिता के दरवाज़े के बाहर लाइन लगाए रखा करते थे...शिवसेना के हर फैसले पर स्मिता से सहमति की मुहर ली जाती थी...फिर वही स्मिता हाशिए पर कैसे चली गईं...दरअसल, बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे और बेटे उद्धव का कद राजनीति में जैसे जैसे बढ़ता गया, स्मिता की पूछ वैसे वैसे घटती गई...हाशिए पर समेट देने का यही गम स्मिता को अंदर से खाए जा रहा था...स्मिता को राज्यसभा की टिकट देने का वादा शिवसेना सुप्रीमो की ओर से पूरा नहीं हुआ...स्मिता ने शिवसेना के मुखपत्र सामना में छपने के लिए लेख भेजा तो उसे बाल ठाकरे की ओर से फाड़ कर फेंक दिया गया...यही नही स्मिता की एक पहचान बॉलीवुड की फिल्म निर्माता की भी है...स्मिता के अनुसार शिवसेना से ही कुछ लोगों ने बॉलीवुड में भी उनके रास्ते में कांटे बिछाने की कोशिश की...स्मिता का बेटा राहुल ठाकरे टोरंटो से फिल्म निर्माण की ट्रेनिंग लेकर आया हुआ है...ख़बर है कि स्मिता बिपाशा बसु को लेकर एक इंटरनेशनल फिल्म प्रोजेक्ट भी शुरू करना चाहती हैं...स्मिता की इस पहचान पर भी चोट हुई तो उनके भीतर गुस्सा बढ़ता गया...

स्मिता की छटपटाहट ने पहली बार तूल तब पकड़ा था जब उन्होंने बिना बाल ठाकरे से अनुमति लिए राज ठाकरे से जाकर मुलाकात की थी...लेकिन स्मिता अच्छी तरह जानती हैं कि अगर वो राज की पार्टी एमएनएस से जुड़तीं तो वहां राज का कद इतना बड़ा है कि उन्हें छाया में ही रहना पड़ेगा...यही स्मिता ने मास्टरस्ट्रोक चलने का फैसला किया...कांग्रेस के साथ अपनी तकदीर को जोड़ने का...स्मिता ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी की शान में कसीदे पिछले महीने ही पढ़ दिए थे...स्मिता को उम्मीद थी कि बाल ठाकरे के ख़िलाफ़ बग़ावती तेवरों को देखते हुए कांग्रेस उन्हें हाथोंहाथ ले लेगी...लेकिन कांग्रेस आलाकमान इस मामले में ज़ल्दबाज़ी में कोई फैसला नहीं लेना चाहता...उसे पता है कि स्मिता को पार्टी में लेने पर उनके कद का कोई पद भी देना पड़ेगा...लेकिन महाराष्ट्र में कांग्रेस की राजनीति को जो समझते हैं, उन्हें पता है कि अशोक चव्हाण, विलासराव देशमुख, सुशील कुमार शिंदे जैसे कई दिग्गजों के होते हुए स्मिता को समायोजित करना मुश्किल होगा...

अब ये देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस किस तरह स्मिता ठाकरे को महाराष्ट्र की राजनीति में इस्तेमाल करती है...कहने वाले ये भी कहते हैं कि राज ठाकरे आज जो इतने ताकतवर नज़र आते हैं, असल में वो ताकत कांग्रेस की ही दी हुई है...कांग्रेस जानती है कि राज जितने मज़बूत होंगे, बाल ठाकरे उतने ही कमज़ोर होंगे...मराठी मानुस की राजनीति पर शिवसेना की दावेदारी घटेगी तो कांग्रेस के लिए सत्ता का रास्ता निकालना उतना ही आसान बना रहेगा...इस साल लोकसभा और विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इसी रणनीति ने जमकर फायदा पहुंचाया...शिवसेना और राज की सेना मी मराठी के नाम पर लोगों को बांट कर सत्ता के सिहांसन तक पहुंचना चाहते हैं...वहीं कांग्रेस ने ठाकरे खानदान को ही बांट कर सत्ता की राह तैयार कर ली...अब स्मिता ठाकरे भी कांग्रेस के साथ आ खड़ी होती हैं तो शिवसेना को काटने के लिए कांग्रेस के हाथ दोधारी तलवार खुद-ब-खुद लग जाएगी...बहरहाल अभी तो यही कहा जा सकता है कि तेल देखो, तेल की धार देखो...


स्लॉग ओवर

संता को काम के सिलसिले में लंबे अर्से के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा...लेकिन वो बंता को ताकीद कर गया कि घर पर नज़र रखना और कुछ भी रूटीन से अलग दिखाई दे तो फौरन इत्तला करना...एक महीने तक तो कुछ नहीं हुआ...एक महीने बाद अचानक संता को बंता का एसएमएस आया...संता पापे, पिछले एक महीने से एक आदमी रोज़ तेरे घर  आता था और चार-पांच घंटे तक भरजाई (भाभी) के साथ रहता था, वो आज नहीं आया...

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पिछले कई सालों से एक ही शख्स महिला भी, पुरुष भी

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

अच्छी पत्नियां कहां मिलती हैं...खुशदीप

बताऊंगा, बताऊंगा...इतनी जल्दी भी क्या है...जिसे जल्दी है वो पोस्ट के आखिर में स्लॉग ओवर में अच्छी पत्नियों को ढूंढ सकता है...अब ढूंढते ही रह जाओ तो भइया मेरा कोई कसूर नहीं है...लेकिन पहले थोड़ी गंभीर बात कर ली जाए...बात एक बार फिर रुचिका की...क्या रुचिका के गुनहगार को सज़ा दिलाना इतना आसान है जितना कि शोर मच रहा है...

रुचिका गिरहोत्रा केस में घटनाक्रम तेज़ी से होने लगा है...उन्नीस साल तक जांच में जो नहीं हुआ वो पिछले नौ दिन से हो रहा है...देश के केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली कह रहे हैं कि रुचिका के गुनहगार को फांसी या उम्र कैद भी हो सकती है...लेकिन क्या ये इतना आसान है...अदालतें हमारी-आपकी सोच से नहीं चलतीं...अदालतों को ठोस सबूत चाहिए होता है....



आज रुचिका केस में दो अहम बातें हुईं...पहली, वीरप्पा मोइली का बयान और दूसरा, पंचकूला पुलिस ने रुचिका के परिवार की शिकायत पर दो एफआईआर दर्ज की हैं...रुचिका के परिवार को धमकाने की और रुचिका के भाई आशु को अवैध हिरासत में रखने और प्रताड़ित करने की...साथ ही सबूत मिटाने की भी धारा है...इनमें कोई भी धारा वो नहीं है जिस पर राठौर पर रुचिका को आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला बन सके...

आईपीसी की धारा 305 और 306 में खुदकुशी के लिए उकसाने की सज़ा का प्रावधान किया गया है...धारा 305 नाबालिग को खुदकुशी के लिए उकसाने पर लगती है...इसके तहत जुर्म साबित होने पर फांसी या उम्रकैद हो सकती है...वहीं 306 बालिग को खुदकुशी के लिए उकसाने पर लगती है...धारा 306 में दस साल की सज़ा हो सकती है...देश के कानून मंत्री का कहना है कि निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील में जाकर रुचिका को इंसाफ़ दिलाया जा सकता है...

अब यहां जनभावना से अलग हट कर तकनीकी तौर पर विशुद्ध कानूनी बात की जाए...रुचिका के गुनहगार राठौर को बचाने के लिए उनके क्या-क्या तरीके निकल सकते हैं...पहली बात तो राठौर को जिस धारा 354 में छह महीने की सज़ा और एक हज़ार रुपये जुर्माना सुनाया गया था वो छे़ड़छाड़ के अपराध से जुड़ी है...इस फैसले के खिलाफ ही अपील की जाए तो राठौर की सज़ा अगर बढ़ेगी तो मामूली तौर पर ही बढ़ेगी...अदालत के हाथ यहां बंधे हुए हैं...हां, अगर राठौर के ख़िलाफ़ नए सिरे से कड़ी सज़ा के प्रावधान वाली धाराओं के तहत मामला दर्ज होता है तो राठौर के लिए फांसी, उम्रकैद जैसी सज़ा भी मुमकिन है...लेकिन यहां जिस बात का राठौर सबसे ज़्यादा फायदा उठा सकता है वो है अपराध को हुए बहुत अर्सा बीत जाना...रुचिका के परिवार या राठौर के खिलाफ गवाही देने आने वाले दिलेर लोगों से पूछा जा सकता है कि वो इतने साल ख़ामोश क्यों रहे...मान लीजिए अगर राठौर को दस साल की भी सज़ा मिलती है तो अपराध को उन्नीस साल हो गए हैं...इसलिए केस कालातीत होने की वजह से राठौर को सज़ा नहीं दी जा सकेगी...हां, राठौर एक ही सूरत में अपने अंजाम तक पहुंच सकता है...वो है नाबालिग को खुदकुशी के लिए उकसाने का आरोप अदालत में धारा 305 के तहत साबित हो जाए...यानि सज़ा फांसी या उम्रकैद हो...

और जहां तक अपराध को हुए लंबा समय हो जाने की बात है तो रुचिका का परिवार ये तर्क दे सकता है कि पहले वो डरा हुआ था...धमकियां मिलने की वजह से उन्हें अपनी जान जाने का ख़तरा था...अब हालात बदल गए हैं...इसीलिए इंसाफ़ पाने के लिए उनमे नए सिरे से हिम्मत जुटी है....सिर्फ इसी तर्क के आधार पर केस के कालातीत होने वाले पेंच को खारिज किया जा सकता है...

ये प्रश्न तो तब का है जब जांच करने वाले उन्नीस साल पुराने मामले में ईमानदारी और तत्परता से पुख्ता सबूत जुटा कर राठौर के खिलाफ चार्जशीट दायर करें और दिन-प्रतिदिन की सुनवाई के ज़रिए फास्ट ट्रैक कोर्ट रूचिका के गुनहगार को अंज़ाम तक पहुंचाए...यहां एक सवाल ये भी है कि अभियोजन को चार्जशीट दाखिल करने के लिए भी तीन या छह महीने की समयसीमा होती है...अगर तब तक चार्जशीट नहीं दाखिल हो पाती तो ये राठौर को क़ानून के शिकंजे से बचने के लिए सेफ पैसेज देने के समान होगा...

चलिए देखिए आगे आगे होता क्या है...जांच अधिकारियों ने लचर सबूत पेश किए तो अदालत में पहली सुनवाई में ही राठौर के खिलाफ मामला फुस साबित हो जाएगा...आपके जैसे मेरे भी मन में यही सवाल उमड़ रहा है कि कई दिग्गज वकीलों की सेवाएं लेकर राठौर बच तो नहीं निकलेगा...या फिर वाकई 16 साल से तड़प रही रुचिका की रूह को पूरा इंसाफ़ मिलेगा...

चलिए....उम्मीद पर दुनिया कायम है...दुनिया का ज़िक्र आया तो चलिए छोटे से क्यूट स्लॉग ओवर पर....


स्लॉग ओवर

अच्छी पत्नियां दुनिया के हर कोने (कॉर्नर) में पाई जानी चाहिएं...लेकिन करें तो करें क्या जनाब...बदकिस्मती से धरती पर कोई कॉर्नर ही नहीं है...दुनिया गोल जो ठहरी...
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पति-पत्नी की नई पोज़ीशन

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख....खुशदीप

नब्बे के दशक में एक फिल्म आई थी- दामिनी...फिल्म में सनी देओल वकील की भूमिका में थे...सनी देओल का फिल्म में एक डॉयलॉग बड़ा हिट हुआ था...मी लॉर्ड, मुवक्किल को अदालत के चक्कर काट-काट कर भी मिलता क्या है...तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख...लेकिन इंसाफ़ नहीं मिलता...ख़ैर ये तो फिल्म की बात थी...लेकिन हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था का कड़वा सच भी यही है..रुचिका गिरहोत्रा के केस में ही सबने देखा...दस साल बाद मुकदमा दर्ज हुआ...नौ साल मुकदमा चलने के बाद नतीजा आया...गुनहगार को 6 महीने कैद और एक हज़ार रुपये जुर्माना...

क़ानून के आसरे इंसाफ़ के लिए सबसे ज़्यादा उम्मीद अदालत से ही होती है...लेकिन इंसाफ़ के लिए बरसों से इंतज़ार करते करते आंखें पथरा जाएं तो इंसाफ़ के मायने ही क्या रह जाते हैं...केंद्रीय क़ानून मंत्री वीरप्पा मोइली के मुताबिक इस वक्त देश की अदालतों में तीन करोड़ ग्यारह लाख उनतालीस हज़ार पांच सौ बाइस मुकदमे लंबित हैं...औसतन देश की आबादी में हर 40 नागरिकों पर एक केस फ़ैसले के इंतज़ार मे लटका हुआ है...

अगर देश की सर्वोच्च अदालत यानि सुप्रीम कोर्ट की बात की जाए तो वहां चौवन हज़ार एक सौ छह केस पेंडिंग हैं...अगर देश के सभी हाईकोर्ट की बात की जाए तो वहां चालीस  लाख से ज़्यादा मामलों में फ़ैसले का इंतज़ार है...और अगर निचली अदालतों के आंकड़ों को देखा जाए तो वहां दो  करोड़ सत्तर लाख से ज़्यादा मामले लंबित हैं...एक अनुमान के अनुसार ये मान लिया जाए कि आज के बाद कोई मुकदमा देश की किसी भी अदालत में नहीं आएगा तो भी लंबित मुकदमों को पूरी तरह निपटाने में 124 साल लग जाएंगे...ये हालत तब है जब फास्ट ट्रैक अदालतों को तीस लाख मुकदमे सौंपे गए थे जिसमें 25 लाख पर फ़ैसला आ चुका है...

अदालतों के पिछले एक दशक के रिकॉर्ड पर नज़र दौड़ाई जाए तो लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है...पिछले दस साल में सुप्रीम कोर्ट में लंबित मुकदमों की संख्या में 139 फीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है...देश के सभी हाईकोर्ट में 46 और निचली अदालतों में 32 फीसदी लंबित मुकदमों की संख्या बढ़ी है....साल-दर-साल मुकदमे लटके रहने की बात की जाए तो देश के हाई कोर्टों में ही लंबित मुकदमों में से 25 फ़ीसदी ऐसे हैं जो दस साल से ज़्यादा पुराने हैं...स्थिति कितनी गंभीर है ये इसी से पता चलता है कि देश की जेलों में जितने कैदी बंद हैं उनमें 70 फीसदी से ज़्यादा विचाराधीन कैदी है...

सरकार के दावों के मुताबिक कोशिश की जा रही है कि किसी भी केस में फैसले के लिए तीन साल से ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़े..सरकार के नए मसौदे में देश की सभी अदालतों को कंप्यूटर, इंटरनेट और प्रिंटर से लैस करने का प्रावधान है...देश में करीब 16 हज़ार जजों के पद हैं जिनमें से फिलहाल तीन हज़ार खाली है...देश में औसतन बीस लाख लोगों पर 27 जज हैं जबकि अमेरिका में बीस लाख लोगों पर 214 जज काम कर रहे हैं...अमेरिका में आबादी के अनुपात के हिसाब से भारत के मुकाबले आठ गुना ज़्यादा जज हैं...

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के जी बालाकृष्णन ने हाल ही में कहा है कि देश में 35 हज़ार जजों की दरकार है...न्यायिक प्रक्रिया में सरकार तत्काल सुधार नहीं लाती तो देश में मुकदमों का अंबार घटने की जगह बढ़ता ही जाएगा...ऐसे हालात में जल्दी इंसाफ़ के लिए आम आदमी अदालत के साथ भगवान की चौखट पर भी गुहार न लगाए तो क्या करे...


स्लॉग ओवर

मक्खन एक बार मक्खनी से लड़ने के बाद गुस्से में भुनभुनाता हुआ कैमिस्ट की दुकान पर पहुंचा...मक्खन ने छूटते ही कहा...मुझे ज़हर चाहिए...कैमिस्ट ने खेद जताते हुए कहा कि वो मक्खन को ज़हर नहीं बेच सकता...इस पर मक्खन ने पर्स निकाल कर पत्नी मक्खनी का फोटो कैमिस्ट को दिखाया...कैमिस्ट ने फोटो देखने के बाद मक्खन से माफ़ी मांगते हुए कहा...ओह, मुझे नहीं पता था कि आपने प्रेस्क्रिप्शन साथ रखा हुआ है...-

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संता भी सोचता है...

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

आओ राजनीति सिखा दूं...खुशदीप

कौन कहता है राजनीति सीखना बड़ा मुश्किल है...बरसों पापड़ बेलने के बाद राजनीति में पहुंची चीज़ बनने के दिन गए...इंस्टेंट ज़माना है...तो इंस्टेंट ही रिज़ल्ट चाहिए...लीजिए जनाब आज एक ऐसा रामबाण नुस्खा पेश कर रहा हूं कि राजनीति का पूरा पेंच आपको एक ही झटके में समझ आ जाएगा...बस नीचे लिखे एक-एक वाक्य को ज़रा गौर से पढ़िएगा...

जॉर्ज बुश अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो एक स्कूल में गए...बच्चों से अनौपचारिक परिचय के बाद बुश ने कहा कि अगर वो कोई सवाल पूछना चाहते हैं तो पूछ सकते हैं...

एक बच्चे ने अपना हाथ उठाया और सवाल पूछने के लिए खड़ा हो गया...

बुश ने बच्चे से कहा... पहले अपना नाम बताओ...

बच्चा... जॉन

बुश...सवाल क्या है...

जॉन...सर, मेरे तीन सवाल हैं...

1) अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र की अनुमति के बिना इराक पर हमला क्यों किया...

2) ओसामा कहां है...

3) अमेरिका पाकिस्तान पर इतना फ़िदा क्यों है...इतनी मदद क्यों करता है...

बुश... तुम बुद्धिमान छात्र हो, जॉन...(तभी स्कूल की आधी छुट्टी की घंटी बज जाती है)...ओह, हम इंटरवल के बाद बातचीत जारी रखेंगे...

आधी छुट्टी के बाद...

बुश...हां तो बच्चों हम कहां थे...कोई किसी तरह का सवाल पूछना चाहता है...

छात्र पीटर अपना हाथ खड़ा करता है..

बुश...बच्चे, नाम क्या है...

पीटर...सर, मेरे पांच सवाल हैं...



1) अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र की अनुमति के बिना इराक पर हमला क्यों किया ?

2) ओसामा कहां है ?

3) अमेरिका पाकिस्तान पर इतना फ़िदा क्यों है...इतनी मदद क्यों करता है ?

4) आधी छुट्टी की घंटी निर्धारित वक्त से  20 मिनट पहले ही कैसे बज गई ?

5) जॉन कहां हैं ?



यही राजनीति है...!!



स्लॉग ओवर

एक बार मक्खन पानी पी रहा था...

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अब मक्खन पानी भी नहीं पी सकता क्या...

उसमें भी हंसी-ठठा चाहिए...

जान ले लो मक्खन की...

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पुरुषों को आकर्षित करने का सुपरहिट फंडा...

रविवार, 27 दिसंबर 2009

मक्खनी का बदला...खुशदीप

स्लॉग ओवर में आज मक्खनी का मक्खन से बदला...लेकिन पहले कुछ गंभीर बात...कौन कहता है इस देश का कुछ नहीं हो सकता...हो सकता है जनाब...जब कोने कोने से अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठती है तो ज़रूर कुछ होता है...सिस्टम पर दबाव बनता है...राजनीति नैतिकता की दुहाई देने लगती है...पुलिस और सीबीआई को गुनहगारों के खिलाफ सबूत मिलने लगते हैं...ज़ाहिर है सबूत मिलने लगते हैं तो अदालतों के फ़ैसले भी बदलने लगते हैं...

लेकिन जब दबाव नहीं होता...जनता शोर नहीं मचाती...लोकतंत्र का चौथा खंभा वॉचमैन की भूमिका सही ढंग से नहीं निभाता तो न जाने कितनी रुचिकाएं नाइंसाफ़ी की चक्की में पिस कर बेवक्त दम तोड़ती रहती हैं...समाज और देश के गुनहगारों की आंखों पर बेशर्मी का पर्दा गिरा रहता है, शरीर पर बेहयाई की चर्बी और मोटी होती रहती है...जिस तरह बिल्ली चोरी पकड़ी जाने पर आंखें बंद कर ये भ्रम पाल ले लेती है कि उसे कोई देख नहीं रहा...वैसा ही भ्रम नेता-पुलिस-नौकरशाह-अपराधी-धन्नासेठों के क़ातिल गठजोड़ को भी रहता है, लेकिन पाप का घड़ा कभी तो भरना ही होता है...

अब रुचिका गिरहोत्रा का केस ही लीजिए...एकसुर में हर तरफ से न्याय के लिए आवाज़ उठी...सीबीआई रुचिका केस को दोबारा खोलने पर विचार कर रही है...केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली और हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा रुचिका के परिवार को इंसाफ़ दिलाने की बात करने लगे हैं...गृह मंत्रालय ने पूछा है कि क्यों न गुनहगार पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर के पुलिस मेडल वापस ले लिए जाएं और पेंशन भी घटा दी जाए...

रुचिका का मामला पहला नहीं है जब लोगों के आक्रोश के बाद सरकारी मशीनरी की हरकत तेज़ हुई है...इससे पहले मॉडल जेसिका लाल और लॉ स्टूडेंट प्रियदर्शिनी मट्टू के मामलों में भी ये देखा जा चुका है...पहले उन दोनों केस में भी आरोपियों को निचली अदालत ने बरी कर दिया...लेकिन दबाव बढ़ा तो पुलिस और सीबीआई दोनों को ही फाइल दोबारा खोलनी पड़ी...

एक नज़र में जेसिका, प्रियदर्शिनी और रुचिका के केस....

जेसिका लाल

मॉडल



29 अप्रैल 1999- बार में गोली मार कर हत्या

आरोपी- मनु शर्मा

21 फरवरी 2006- निचली अदालत से मनु शर्मा बरी...पुलिस हत्या का हथियार यानि पिस्टल नहीं पेश कर सकी

मनु शर्मा के बरी होने के बाद जनाक्रोश

मनु शर्मा को बरी करने के फैसले के ख़िलाफ़ दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती

20 दिसंबर 2006

दिल्ली हाई कोर्ट ने मनु शर्मा को उम्र कैद सुनाई

फिलहाल मनु शर्मा की अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित

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प्रियदर्शिनी मट्टू

क़ानून की छात्रा



23 जनवरी 1996- बलात्कार के बाद हत्या

आरोपी- संतोष कुमार

1999- निचली अदालत ने आरोपी संतोष कुमार को सबूतों के अभाव में बरी किया

जनाक्रोश के बाद सीबीआई की फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती

30 अक्टूबर 2006

दिल्लीं हाईकोर्ट ने संतोष कुमार को सज़ा-ए-मौत सुनाई

फिलहाल संतोष की अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित

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और अब रुचिका को इंसाफ़ का इंतज़ार

रुचिका गिरहोत्रा

टेनिस खिलाड़ी


छेड़छाड़ की घटना- 12 अगस्त 1990

आरोपी- पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़

28 दिसंबर 1993- रुचिका ने खुदकुशी की

21 दिसंबर 2009- सीबीआई कोर्ट ने  6 महीने की सज़ा और 1000 रुपये जुर्माना

राठौर दस मिनट बाद ही ज़मानत पर रिहा...

फिलहाल जनाक्रोश जारी

ये तो रही तीन हाई प्रोफाइल मामलों की बात...दो दिल्ली से और एक चंडीगढ़ से...ये अच्छी बात है कि जेसिका और प्रियदर्शिनी मट्टू मामलों में बरी आरोपियों को फिर सलाखों के पीछे जाना पड़ा...और रुचिका केस में भी अब केंद्र और हरियाणा सरकार की ओर से हरकत होती नज़र आ रही है...मेरा एक सवाल और भी है...ये तीनों केस हाई प्रोफाइल थे इसलिेए जल्दी सुर्खियों में आ गए....लेकिन एक नज़र डालिए देश के दूर-दराज के गांवों-कस्बों पर...क्या वहां ऐसे अपराध नहीं होते होंगे...क्या वहां नेक्सस काम नहीं करते होंगे...करते होंगे जनाब बिल्कुल करते होंगे...लेकिन उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है...क्यों...क्योंकि वो केस दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई या अन्य किसी महानगर में नहीं होते....ऐसे ही कुछ सच्चे वाकयों का ज़िक्र मैं कुछ शोध के बाद सोमवार की पोस्ट पर करूंगा....

रुचिका की याद में ये गीत देखिए-सुनिए

चिट्ठी न कोई संदेस
जाने वो कौन सा देस
जहां तुम चले गए...

मेरे पास ई-मेल और टिप्पणियों के ज़रिेए शिकायत आई हैं कि मैं स्लॉग ओवर ज़रूर दिया करूं...लेकिन मैं सीरियस पोस्ट लिखने के बाद दुविधा में पड़ जाता हूं कि स्लॉग ओवर दूं या नहीं...लेकिन फिर सोचता हूं कि जीवन के नौ रस में करुणा, हास्य, रौद्र समेत तमाम रस साथ-साथ चलते हैं...इसलिए गंभीर पोस्ट के बाद भी हास्य रस चखा जा सकता है...

स्लॉग ओवर

मक्खन बड़े अच्छे मूड में था...मक्खनी से बोला...मैं तुझसे इतने गुस्से में बोलता हूं...दारू पीकर लड़ता हूं पर तू मुझे कभी उस अंदाज़ में जवाब नहीं देती...कितनी अच्छी पत्नी है तू....वैसे गुस्से पर काबू करने का तेरा राज़ क्या है...

मक्खनी...मैं बस टॉयलट दी सीट साफ़ कर देनी वां...(मैं बस टॉयलट की सीट साफ़ कर देती हूं...)

मक्खन...टॉयलट सीट...गुस्से पर काबू....भला ये कौन सा कनेक्शन हुआ...

मक्खनी...ओ जी, टॉयलट सीट त्वाडे टूथ-ब्रश नाल साफ़ करदी हां न...(ओ जी, टॉयलट सीट तुम्हारे टूथ-ब्रश से साफ़ करती हूं न...)

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ख़त के साथ खुद को भी भेजना...

आदर्श पति क्या होता है..

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शनिवार, 26 दिसंबर 2009

एक थी रुचिका, एक है राठौर...खुशदीप

मैं रुचिका हूं...आज मैं आपके बीच होती तो 33 साल की होती...अपना घर बसा चुकी होती...शायद स्कूल जाने वाले दो बच्चे भी होते...लेकिन मुझे इस दुनिया को छोड़े सोलह साल हो चुके हैं...मेरे पापा, मेरा भाई ज़िंदा तो हैं लेकिन गम़ का जो पहाड़ उनके सीने में दफ़न है वो किसी भी इंसान को जीती-जागती लाश बना देने के लिए काफ़ी है...मुझे याद है टेनिस खेलने का बड़ा शौक था...लेकिन मुझे क्या पता था कि यही शौक मेरा बचपन, मेरी खुशियां, मेरा चहचहाना एक झटके में मुझसे छीन लेगा...


मैं

मेरे छोटे होते ही मां बेशक दुनिया छोड़ गई थी...लेकिन मेरे पापा ने मुझे और मेरे भाई को कभी मां की कमी महसूस नहीं होने दी..लेकिन उस 12 अगस्त 1990 की एक मनहूस तारीख ने ही हमारी दुनिया बदल दी....मेरे हंसते-खेलते परिवार को कब्रस्तान की मुर्दनी में बदल डाला...14 साल की उम्र में मुझे क्या पता था कि अंकल की शक्ल में एक अधेड़ एसपीएस राठौर मेरे साथ वो हरकत करेगा जिसके बारे मे मैंने कभी सुना भी नहीं था...मैं तो उन्हें ऐसा अंकल मानती थी जो मेरे टेनिस के करियर को संवार देंगे...मुझे क्या पता था कि वो अधेड़ इंसान की खाल में भेड़िया निकलेगा...

मुझे कई दिन लग गए अपने को संभालने में...लेकिन फिर मैंने हिम्मत करके पापा को सब कुछ बताया...पापा का खून खौल उठा...फिर किसी की बेटी के साथ वो भेड़िया ऐसी हरकत न करे, मेरे पापा ने आवाज़ उठाने का फैसला किया...लेकिन शिकायत करें तो किससे करें...वो अधेड़ तो खुद पुलिस में आईजी रैंक का अफ़सर था...ऊपर से सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों का चहेता...उसका भला कौन बाल-बांका कर सकता था...आवाज़ उठाने पर कोई कार्रवाई की जगह मेरे परिवार को ही धमकियां दी जाने लगीं...मेरे भाई आशु पर एक साल में ही ग्यारह मुकदमे ठोक दिए गए...थाने बुलाकर उसे टॉर्चर किया जाता रहा...हर बार यही कहा जाता रहा कि हम सब अपने होंठ सी लें...नहीं तो इस दुनिया में रहना मुश्किल कर दिया जाएगा...


मेरा गुनहगार राठौर

मेरे पापा इंसाफ़ के लिए दर-दर भटकते रहे लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिली...हां मेरी प्यारी सहेली आराधना का परिवार ज़रूर चट्टान की तरह हमारे साथ डटा रहा...लेकिन भाई और पिता की हालत देखकर मैं टूटती चली गई...कहीं न कहीं परिवार की खुशियां छीन जाने के लिए खुद को ही कसूरवार मानने लगी...एक दिन मेरा सब्र का बांध टूट गया और सत्रह साल की उम्र में मैंने दुनिया को छोड़ने का फैसला किया...ये वो उम्र होती है जब सपनों को पंख लगते हैं...और मैंने 28 दिसंबर 1993  को इस बेरहम दुनिया से ही हमेशा के लिेए उड़ान भर ली....

मैंने सोचा था मेरी मौत से मेरे परिवार का गम कम हो जाएगा...लेकिन पिछले सोलह साल से शायद ही एक दिन भी ऐसा आया होगा जब मेरे पापा और भाई ने चैन की नींद ली हो...आखिर चैन आता भी कहां से...उनकी लाडली को छीनने का सबब बनने वाला खूसट पुलिस अधिकारी छूट्टा जो घूम रहा था...सज़ा तो दूर तरक्की दर तरक्की पाता हुआ सूबे में पुलिस की सबसे ऊंची पोस्ट तक पहुंच गया...पुलिस सेवा मेडल तक पा गया...उन्नीस साल में हरियाणा में कई सरकारें बदलीं...कई मुख्यमंत्री आए और गए लेकिन मेरे गुनहगार पर चींटी सा भी असर नहीं हुआ...नेताओं के सब सफेद-काले धंधों में मदद जो किया करता था...

मेरे पिता को अदालत से फिर भी इंसाफ़ का भरोसा था...दस साल ऐडियां रगड़ने के बाद मुकदमा दर्ज हुआ...नौ साल अदालत जा-जा कर कई जोड़ी जूते घिसने के बाद फैसला आया....एसपीएस राठौर को छह महीने की सज़ा और एक हज़ार रुपये जुर्माना...फैसले के दस मिनट बाद ही राठौर को ज़मानत भी मिल गई...अदालत और कर भी क्या सकती थी...उसके हाथ जो बंधे हुए थे...जो लचर सबूत उसके सामने रखे जाएंगे वो उसी पर तो अपना फैसला सुनाएगी...सबूत मज़बूत होते भी कहां से ....पुलिस तो गुनहगार की खुद मातहत थी...अपने सबसे आला अधिकारी को बचाने के लिए वो क्यों न क़ानून का गला घोंटती...

और सियासतदां उनकी तो बात ही न की जाए...ये सफेद झक कपड़े बेशक कितने पहन लें, लेकिन इनके अंदर का जो अंधेरा है वो सड़कों पर जलने वाली मोमबत्तियों से कभी दूर नहीं हो सकता...पांच दिन पहले अदालत के फैसले के बाद राठौर का शैतानी हंसी हंसता चेहरा टीवी के कैमरों के ज़रिए पूरी दुनिया ने देखा...उन्नीस साल के इंतज़ार के बावजूद इंसाफ़ का ये हश्र देखकर मेरे पापा और भाई बिल्कुल टूट गए हैं...उन्हें इस वक्त आप सबकी ज़रूरत है...आप ही उनके आंसू पोंछ सकते हैं...मैं चाह कर भी ये काम नहीं कर सकती...आप उनकी आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ इतनी ज़ोर से मिलाएं कि चंडीगढ़ और दिल्ली में बैठे बहरे कानों में भी झनझनाहट हो जाए...

याद रखिए जब तक मेरा गुनहगार अपने अंजाम तक नहीं पहुंचेगा...मेरी रूह को चैन नहीं मिलेगा...बस अब खत्म करती हूं...खुशदीप अंकल मेरी कहानी कल भी आपको सुनाएंगे...अब मुझे इस वादे के साथ इजाज़त दीजिए कि आप मेरा चेहरा याद रखेंगे और मेरे पापा को क़ानून की देवी से इंसाफ़ दिला कर ही दम लेंगे...

आपकी बिटिया
रुचिका


शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

पुरुष नर्स को नर्सा क्यों नहीं कहते...खुशदीप

जी हां, कल डॉक्टर अरविंद मिश्र की पोस्ट बड़ी चर्चित रही....जैसे अदाकारा ,शायरा वैसे ब्लागरा/चिट्ठाकारा क्यों नहीं?...ब्लॉगर बिरादरी ने खुल कर इस पर अपनी राय रखी...डॉक्टर साहब के मुताबिक एक मोहतरमा ने उनसे ये सवाल पूछा था...न जाने क्यों मोहतरमा के इस सवाल में मुझे गंभीरता कम मौज ज़्यादा दिखाई दी...अब कोई इन मोहतरमा से ही पूछे...उर्दू में महिला को सम्मान देना हो तो मोहतरमा कहते हैं, इसी तरह पुरुष को जनाब कहा जाता है...अब कोई ये सवाल करने लगे जिस तरह मोहतरमा होता है, उस तरह पुरुष को मोहतर क्यों नहीं कहा जाता....मोहतर...सुनने में ही कितना बुरा लगता है...

मोहतर भी छोड़िए, नर्स का काम आजकल पुरुष भी करते हैं...तो क्या उन्हें नर्सा कहना शुरू कर दिया जाएं...आप कहेंगे... आ की मात्रा तो स्त्रीलिंग के साथ ज़्यादातर लगाई जाती है...बकौल मोहतरमा जैसे अदाकारा, शायरा, ब्लॉगरा, चिट्ठाकारा....इस लिहाज से नर्सिंग का काम करने वाले पुरुष को नर्स और महिला को नर्सा कहना चाहिए...खैर, ये तो निश्चित है कि जिसे भी नर्सा कहा जाएगा, उसे बुरा ही लगेगा...





अब हमारे डॉ अरविंद मिश्र जी हैं सीधे इंसान...इसलिए मोहतरमा के चक्कर में पड़ गए...और अदाकारा, शायरा का हवाला देकर ब्लॉगरा, चिट्ठाकारा का सवाल पूछ बैठे...शायरा कहते हैं या नहीं ये तो शायर ही बता सकते हैं...जहां तक अदाकारा का सवाल है तो अंग्रेज़ी में भी आजकल महिला और पुरुष के लिए एक ही शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा है और वो है एक्टर...हमने भी पुरुष अदाकार के लिए एक्टर और महिला अदाकार के लिए एक्ट्रैस शब्द पढ़े थे ....लेकिन नए ज़माने में ये भेद मिट गया है...सब बराबर यानि एक्टर सिर्फ एक्टर...एक्टर ही क्यों...फिल्म निर्देशक भी पुरुष हो या महिला, निर्देशक ही रहता है निर्देशिका नहीं बन जाता...अंग्रेज़ी में भी निर्देशक के लिए एक ही शब्द है- डायरेक्टर....महिला निर्देशकों के लिए डायरेक्ट्रेस नहीं बन जाता...

आपने प्रचलन में तो ये भी देखा होगा...खन्ना की पत्नी को खन्नी, शर्मा की पत्नी को शर्मी कह कर भी बुलाया जाता है...अब ज़रा चड्डा, गुप्ता, मेहरा की पत्नियों को भी इस तरह बुला कर देखिए...क्या निकल कर आता है....भला कोई अपने लिए पसंद करेगा इस तरह के संबोधन को...मैंने डॉक्टर साहब को उनकी पोस्ट पर जो टिप्पणी भेजी थी वहीं यहां दोहरा रहा हूं...

डॉक्टर साहब,
जहां तक मैं जानता हूं अदाकारा, शायरा जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल गलत है...महिलाएं भी अदाकार और शायर ही होती हैं....प्रचलन में शिक्षिका, अध्यापिका भी कह दिया जाता है, वो भी गलत है...महिला विधायक को अगर विधायिका कहा जाए तो उसका बिल्कुल अलग ही मतलब है...बाकी अजित वडनेरकर जी की बात को इस विषय पर अंतिम माना जाना चाहिए...

जय हिंद...

शब्दों के असली विद्वान अजित वडनेरकर जी हैं...मैं कल डॉक्टर साहब की पोस्ट पर  अजित जी को ही ढूंढता रहा...लेकिन उनकी टिप्पणी नहीं मिली...मैं मानता हूं, इस विषय पर भी वो दूध का दूध और पानी का पानी कर देंगे...आखिर में एक बार फिर कहना चाहूंगा...जो जैसा है, वैसा ही रहने दो...अध्यापक, शिक्षक, विधायक शब्दों को जिस तरह महिला के लिए बिगाड़ दिया जाता है...वैसा ही अनर्थ ब्लॉगर शब्द के साथ न किया जाए...

बाकी जो ब्लॉगिंग के सर्व-परमेश्वरों की राय...

नोट- आज मुझे रुचिका गिरहोत्रा केस में हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर को सुनाई गई छह महीने की मामूली सज़ा पर गंभीर बातें आपके साथ बांटनी थी लेकिन ब्लॉगर-ब्लॉगरा के चक्कर में ऐसा उलझा कि वो पोस्ट कल तक के लिए टालनी पड़ गई....धन्य हो मोहतरमा...

स्लॉग ओवर

गुल्ली स्कूल से आकर मक्खन से बोला....डैडी जी, डैडी जी स्कूल वाले स्विमिंग पूल के लिए डोनेशन मांग रहे हैं...सुबह क्या ले जाऊं...

मक्खन...डोनेशन देना ज़रूरी है तो एक लोटा पानी ले जाना...
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  आज मेरे अंग्रेज़ी ब्लॉग Mr Laughter  पर है...

छुट्टी के लिए शमशान जाकर वापस न आना....
बीमार हूं... पूरे संस्थान की आज छुट्टी करो...
सिरदर्द देने वाला स्कूल...
सिरदर्द भी दुखता है...

गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

हाथी की सवारी गांठती चींटी...खुशदीप

जी हां, स्लॉग ओवर में आज आपकी मुलाकात हाथी पर रौब गांठती चींटी से कराऊंगा...लेकिन पहले आपको मेरे एक सवाल का जवाब देना होगा...बताइए कि इस मंहगाई के दौर में देश में कहां किस ढाबे में एक रुपये की चाय मिलती है...क्या कहा...नहीं पता...तो लीजिए मैं बताता हूं...जानकर आपको ताज्जुब होगा कि हमारे माननीय सांसदों को कितनी तंगहाली मे जीना पड़ रहा है...बेचारे चाय के लिए एक रूपये से ज़्यादा खर्च ही नहीं कर सकते....संसद की हाउस कैंटीन में उन्हें एक रुपये की ही चाय मिलती है...

आपके लिए कभी-कभार घर से बाहर जाकर होटल का खाना चखना बेशक अब सपना बनता जा रहा हो लेकिन सांसदों के लिए ऐसी कोई दिक्कत नहीं है...उन्हें संसद की कैंटीन में ही बढ़िया और लज़ीज़ खाना कौड़ियों के दाम मिल जाता है....अब आप देखिए संसद की कैंटीन, मध्यम वर्ग के ठीक-ठाक रेस्तरां और पांचसितारा होटल में मिलने वाले खाने के कम से कम रेट....


...................खाना किसका, ख़ज़ाना किसका.............

..........संसद कैंटीन........मध्यम वर्ग का होटल....पांचसितारा होटल

चाय.....................1.............................17.................45

सूप......................5.50........................65................135

दाल की कटोरी.......1.50....................... 40..............95

वेज थाली..............12.50......................85..............410

नॉनवेज थाली...........22........................145............630

बटर चिकन..............27........................170...........550

फिश करी-चावल.......13..........................145..........630

फिश फ्राई................17..........................90..............330

चपाती.....................1.............................8.................31

चावल की प्लेट.........2............................45.............210

डोसा........................4........................ 55...................290

खीर की कटोरी........5.50........................55..............350

फ्रूट सलाद.................7.........................45................190


...............सभी रेट रुपये में...................................



आपको ये भी बताता चलूं कि संसद की हाउस कैंटीन को चलाने के लिए संसद ने इस वित्तीय वर्ष में पांच करोड़ तीस लाख रुपये का बजट जारी किया है...इसमें लोकसभा की हिस्सेदारी तीन करोड़ पचपन लाख और राज्यसभा के ज़िम्मे एक करोड़ सत्ततर लाख  रुपये आया है...और ये पैसा कोई सांसदों के वेतन से नहीं काटा जाता...ये पैसा आप और हम जैसे टैक्स देने वाले जो टैक्स सरकार के ख़ज़ाने में देते हैं, वहीं से आता है....

संसद की कैंटीन में खाने-पीने के सामान के जो दाम हैं वो पिछले पांच साल से जस के तस हैं...यानि महंगाई का सांसदों के खाने पर कोई असर नहीं पड़ा....और आम इंसान के लिए महंगाई के चलते घर पर दो जून की रोटी का जुगाड़ करना भी भारी हो गया है....

स्लॉग ओवर

एक हाथी स्विमिंग पूल में फिसल कर गिर गया...स्विमिंग पूल में जितनी चींटिया थी बाहर भागने लगी...लेकिन एक दिलेर चींटी हाथी के ऊपर ही चढ़ गई...उसकी सहेली ने देखा तो चिल्ला कर बोली...डुबो...डुबो साले को पानी में...स्विमिंग पूल में घुस कर लड़कियों को छेड़ता है....
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ज़मीन के साथ पत्नी बेचने वाला आदमी


बच्चे का सिर उड़ाने का इरादा रखने वाला शख्स


बेटी के साथ शादी की तैयारी में पिता


सास की मौत का ज़िम्मेदार दामाद....


अगर आप इन सभी से मिलना चाहते हैं तो आइए मेरे अंग्रेज़ी ब्लॉग Mr Laughter पर......

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

मिलिए मल्लू आंटी से...खुशदीप

आज स्लॉग ओवर में मैं आपको एक मल्लू यानि मलयाली आंटी से मिलवाऊंगा...कैसे आंटी ने सेक्रेट्री के जॉब के लिए इंटरव्यू का सामना किया...लेकिन उससे पहले कुछ गंभीर बात...कल राजनीति पर मेरी पोस्ट....क्या आप टीना फैक्टर जानते हैं...पर टिप्पणियों के माध्यम से जो विमर्श हुआ उसमें कुछ बड़े अच्छे विचार सामने आए...एक बार फिर भाई प्रवीण शाह ने मेरे मुंह की बात पहले ही छिन ली...

प्रवीण जी जैसे ही मेरा भी मानना है कि चुनाव कोई भी हो उसमें यही व्यवस्था होनी चाहिए कि किसी भी प्रत्याशी को बिना 51 प्रतिशत वोट हासिल किए विजयी घोषित नहीं किया जाना चाहिए...आप कहेंगे बहुदलीय व्यवस्था में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि किसी प्रत्याशी को कुल डलने वाले वोटों में से 51 फीसदी या ज़्यादा वोट मिलते हैं...फिर 51 फीसदी वोट वाली शर्त का मतलब...ये कैसे मुमकिन है...इसका भी इलाज है...चुनाव में अगर किसी प्रत्याशी को सीधे-सीधे 51 फीसदी या उससे ज़्यादा वोट मिल जाते हैं तो उसे बिना किसी हील-हवाले तत्काल विजयी घोषित कर दिया जाना चाहिेए...

अगर नंबर एक पर आने वाले प्रत्याशी को कुल डाले गए वोटों में से 50 फीसदी से कम वोट मिलते हैं तो उसे विजयी घोषित नहीं किया जाना चाहिए...ऐसी स्थिति में पूरा मतदान दोबारा होना चाहिए...लेकिन इस बार मैदान में सिर्फ नंबर एक और दो पर आए दो उम्मीदवारों के बीच ही मुकाबला कराया जाए...यानि इस स्थिति में ये सुनिश्चित हो जाएगा कि एक उम्मीदवार को 51 फीसदी या उससे ज़्यादा मत मिलेंगे ही...यानि जीतने वाला उम्मीदवार अपने इलाके की बहुमत से ही नुमाइंदगी करेगा...इस काम में थोड़ा खर्च ज़रूर बढ़ेगा...लेकिन लोकतंत्र में जनता की सच्ची नुमाइंदगी के लिए प्रयोग के तौर पर ये बलिदान भी किया जाए तो महंगा सौदा नहीं रहेगा...

अब बाकी जो ब्लॉग के सर्व-परमेश्वरों की राय...


स्लॉग ओवर

केरल की एक मल्लू आंटी सेक्रेट्री के जॉब के लिए इंटरव्यू देने गई...मैनेजर ने आंटी के रंगबिरंगे परिधान, सोने के गहने और तेल से सजे संवरे बालों को देखा तो तभी समझ लिया कि जॉब के लिए आंटी उपयुक्त नहीं है...मैनेजर ने फिर भी सोचा कि इंटरव्यू तो लेना ही पड़ेगा...उसने टालने के लिए कहा...मैं आपको अंग्रेज़ी के कुछ शब्द देता हूं, अगर आप उन सब को मिला कर वाक्य बना देंगी तो मैं आपको जॉब पर रख लूंगा...

आंटी ने पूछा...कौन से शब्द हैं...

मैनेजर ने बताया...ग्रीन, पिंक, यैलो, ब्लू, व्हाईट, पर्पल और ब्लैक...

उत्साही आंटी ने कुछ पल के लिए सोचा...फिर जवाब दिया...मैंने फोन की रिंग सुनी...ग्रीन, ग्रीन, ग्रीन...उसके बाद मैंने फोन पिंक किया...मैंने कहा यैलो...ब्लू इज़ दैट..व्हाईट डिड यू से...डोंट डिस्टर्ब परपर्ली एंड डोंट कॉल मी ब्लैक...

मैनेजर ने इतना सुना और गश खाकर गिर गया...


(अगर आपने इस मल्लू आंटी से मिलना है तो मेरे अंग्रेज़ी ब्लॉग Mr Laughter पर आइए...)

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

क्या आप टीना फैक्टर जानते हैं...खुशदीप

सब चलता है...बस अपना काम चलाओ, प्रभु के गुण गाओ...कमोवेश यही मनोस्थिति हम सब की है...हम झल्लाते हैं, गरियाते हैं, गुस्साते हैं, दांत भींचते हैं...फिर ये कह कर शांत हो जाते हैं कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता...लेकिन क्या हमने कभी ये सवाल अपने से किया कि क्या हम बदलते हैं...उपदेश झाड़ना आसान है, लेकिन उस पर अमल करना बहुत मुश्किल...इस देश के सिस्टम को हम कोसते रहते हैं लेकिन क्या हम इस सिस्टम के हिस्सा नहीं है...

आज ब्लॉग के ज़रिए मैं एक संवाद शुरू करना चाहता हूं...पूरी ब्ल़ॉगर बिरादरी से मेरा आग्रह है इस संवाद में खुल कर अपने विचार रखें...मंथन होगा तो शायद हम विष को अलग कर अमृतपान की दिशा में आगे बढ़ सकें...मैं कोशिश करूंगा कि एक-एक करके ऐसे मुद्दे उठाऊं जो मेरे, आपके, हम सबके जीवन पर प्रभाव डालते हैं, समाज का चाल और चरित्र तय करते हैं...इस कड़ी में सबसे पहले बात राजनीति की...




गांधी, पटेल, सुभाष, नेहरू, अंबेडकर के देश में ऐसी स्थिति क्यों आ गई....ये क्यों कहा जाने लगा कि जिस में कोई नीति नहीं, वही राजनीति है...हमारे देश की यही बदकिस्मती है कि यहां द्विदलीय व्यवस्था नहीं है...इस व्यवस्था में विपक्ष हमेशा मज़बूत रहता है...सतर्क विपक्ष जहां चौकीदार की भूमिका निभाता है वहीं सत्ता पक्ष पर अंकुश रहता है..सत्ता पक्ष को डर रहता है कि विपक्ष की उस पर पैनी नज़र है...गलत काम किया तो चुनाव में जनता छुट्टी कर विपक्ष को मौका दे देगी...लेकिन जब विपक्ष मज़बूत नहीं होता तो सत्ता पक्ष आत्ममुग्ध होकर मदमस्त हो जाता है...ये स्थिति जनता के लिए सबसे खराब होती है...यहां मैं भाई प्रवीण शाह की एक टिप्पणी यथावत पेश करना चाहता हूं...ये टिप्पणी कल मेरी गडकरी वाली पोस्ट पर आई थी...

खुशदीप जी,
किसी भी लोकतंत्र को सही से चलने के लिये सशक्त विपक्ष की भी जरूरत होती है..."गडकरी को बीजेपी के कायापलट के लिए नागपुर ने जो तीन सूत्री एजेंडा सौंपा है...उसमें आम आदमी के हित की बात करना सबसे ऊपर है...फिर विकास उन्मुख राजनीति और अनुशासन..."अगर यह बात सही है तो फिर अच्छे की ही उम्मीद रखनी चाहिये... तीनों बातें आज की जरूरत हैं... पर क्या धन्ना सेठों और पूंजीवादियों के चंगुल से इतनी आसानी से बाहर निकल पायेगी पार्टी... इतना हौसला और इच्छाशक्ति बची है कर्णधारों में अब तक ...यह एक यक्षप्रश्न होगा...

भाई प्रवीण शाह का प्रश्न वाकई ही यक्ष है...विपक्ष अगर कमज़ोर है तो जनता को झक मार कर फिर उन्हें ही चुनना पड़ेगा जो सत्ता में बैठे हैं...वो सत्ता में बैठे हैं, इसलिए नहीं कि जनता उन्हें चाहती है बल्कि वो इसलिए बैठे हैं कि लोगों के पास और कोई मज़बूत विकल्प नहीं है... (There Is No Alternative). यही T...I...N...A... यानि टीना फैक्टर है जिसका कांग्रेस और एनसीपी ने हाल में महाराष्ट्र में फायदा उठाया...क्योंकि महाराष्ट्र में शिवसेना, बीजेपी या  राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का जो विकल्प दिख रहा था वो कांग्रेस और एनसीपी से भी खतरनाक था...मरता क्या न करता वाली तर्ज पर लोगों को कांग्रेस और एनसीपी की सत्ता पर ही लगातार तीसरी बार मुहर लगानी पड़ी....

क्या आपने कभी गौर किया कि आपके क्षेत्र का एमपी या एमएलए वाकई आपके क्षेत्र की पूरी तरह नुमाइंदगी करता है...पूरी तरह तो छोड़ क्या बहुमत का भी प्रतिनिधित्व करता है...बहुमत से मेरा तात्पर्य है कि चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार को उस क्षेत्र के 51 प्रतिशत वोट मिले हों...दरअसल हमारे यहां इतनी पार्टियां हो गई हैं कि वोट कई जगह छितरा जाते हैं...बीस फीसदी वोट हासिल करने वाले तक चुनाव जीत जाते हैं...क्यों जीत जाते हैं...क्योंकि दूसरे किसी उम्मीदवार को बीस फीसदी तक वोट नहीं मिले होते...ऐसे में जीतने वाले के पक्ष में सिर्फ बीस फीसदी लोग हैं...जबकि क्षेत्र के अस्सी फीसदी वोटर उस उम्मीदवार के खिलाफ हैं...क्या इस व्यवस्था में बदलाव नहीं होना चाहिए...अगर आप के पास कुछ सुझाव हैं तो दीजिए...मैं इस मुद्दे पर सबकी राय जानने के बाद कल अपना मत रखूंगा...


स्लॉग ओवर
एक प्रदेश में चुनाव के बाद त्रिशंकु विधानसभा आई...जोड़-तोड़ से सरकार बनाने के अलावा कोई चारा नहीं था...भानुमति का कुनबा जोड़ा कि तर्ज़ पर खुद की पार्टी, सहयोगी दल, समर्थन देने वाले दलबदलू, निर्दलीय हर कोई मंत्री बनने का दावा करने लगा...लेकिन मुख्यमंत्री करे तो क्या...एक अनार, सौ बीमार...विभाग 60 और मंत्री बनने की चाहत रखने वाले 61 सारी कांट-छांट के बावजूद समीकरण ऐसे कि 61 के 61 को मंत्री बनाना जरूरी...एक भी बिदका तो विरोधी दल तख्ता खींचने के लिए पूरी तरह तैयार...ऐसे में मुख्यमंत्री की मदद के लिए ताऊ नाम से मशहूर घिसा हुआ नेता ही काम आया...ताऊ बोला...अरे बुरबकों...इसमें कौन परेशानी...क्यों हलकान होवो सब...खेल-कूद का महकमा हैण लाग रिया न...दो हिस्सों में तोड़ एक को खेल थमावो और दूसरे के ज़िम्मे कूद लगा दिओ...यो भी खुश...वो भी खुश...

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

गडकरी आ गएओ, रंग चोखा आवे न आवे, बीजेपी को भी कोनी पता...खुशदीप

बीजेपी की जो हालत है, उसे देखकर एक बार फिर अपना एक पुराना हरियाणवी किस्सा सुनाने का मन कर रहा है...हरियाणा में एक लड़की छत से गिर गई...भीड़ इकट्ठी हो गई...कोई कहने लगा डॉक्टर के पास ले जाओ...कोई हल्दी दूध पिलाने की सलाह देने लगा...सभी के पास अपने-अपने नुस्खे...लड़की बेचारी दर्द से कराह रही थी...तभी सरपंच जी आ गए...आते ही लड़की को दर्द से छटपटाते देखा...सरपंच जी ने तपाक से कहा...भई वीरभानी को दर्द तो घणा हो ही रिया से...इके नाक-कान और छिदवा दयो...बड़े दर्द में छोटे दर्द का पता कोई न लागे सू...

कुछ ऐसी ही हालत आज बीजेपी की है...लोकसभा चुनाव में बंटाधार, राजस्थान से सफाया, महाराष्ट्र में मात, यूपी उपचुनाव में एक-दो जगह छोड़ सभी जगह ज़मानत ज़ब्त...यानि ढहती दीवार को थामने के लिए संघ ने नितिन गडकरी जैसी भारी-भरकम हस्ती की ज़िम्मेदारी लगाई है...कल इरफान भाई ने बड़ा जो़रदार कार्टून पोस्ट पर लगाया था...कार्टून में बीजेपी की ढहती दीवार नितिन गडकरी को थमा राजनाथ सिंह भजते नज़र आ रहे थे...




52 साल के नितिन गडकरी वजन में ही भारी हैं...रही बात ज़मीन से जु़ड़ी होने कि तो जनाब ने आज तक जनता के बीच जाकर एक भी चुनाव नहीं जीता है...बैक डोर से महाराष्ट्र विधान परिषद में जरूर 1989 से एंट्री मारते आ रहे हैं...नब्बे के दशक के मध्य में ज़रूर छींका टूटा था...महाराष्ट्र में शिवसेना-बीजेपी सरकार में पीडब्लूडी मंत्री बनाए गए...नागपुर में संघ मुख्यालय के पास इतना विकास कराया कि अब संघ ने बीजेपी का विकास करने का ही बीड़ा थमा दिया...

सरसंघचालक मोहन भागवत ने मराठी मानुस नितिन गडकरी को सिर्फ उनकी नागपुर की पृष्ठभूमि की वजह से ही बीजेपी की कमान नहीं सौंपी है...इस बार भागवत गडकरी के ज़रिए कई प्रयोग एक साथ करना चाहते हैं...भागवत की चिंता बीजेपी से ज़्यादा संघ को मज़बूत होता देखने की है...संघ के संस्थापकों ने संघ की परिकल्पना सामाजिक संगठन के तौर पर की थी...भागवत इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं...बीजेपी को भी वो गठजोड़ की मज़बूरी वाली एनडीए की प्रेतछाया से निकाल कर एक बार फिर...जो कहते हैं, वो करके दिखाते हैं...वाले दौर में ले जाना चाहते हैं...यानि अब हिंदुत्व को लेकर कहीं कोई समझौता नहीं होगा...गडकरी को बीजेपी के कायापलट के लिए नागपुर ने जो तीन सूत्री एजेंडा सौंपा है...उसमें आम आदमी के हित की बात करना सबसे ऊपर है...फिर विकास उन्मुख राजनीति और अनुशासन...अब गडकरी इन्ही तीन बिंदुओं पर डंडा हांकते नज़र आ सकते हैं...अटल-आडवाणी युग के सिपहसालार भागवत के दूत के तौर पर गडकरी की कुनैन की गोलियों को कितना हजम कर पाते हैं, देखना दिलचस्प होगा...

वैसे सुषमा स्वराज को भी आडवाणी के उत्तराधिकारी के तौर पर लोकसभा में नेता विपक्ष देखना भी कम दिलचस्प नहीं होगा...मनमोहन सिंह के मुकाबले आडवाणी के दांव पर बीजेपी को पिछले लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पटखनी खानी पड़ी...अब सोनिया के मुकाबले सुषमा का तीर कितना सही बैठता है ये आने वाला वक्त ही बताएगा...सुषमा अच्छी वक्ता हैं, इस पर किसी को शक-ओ-सुबह नहीं...दलील देने में उनकी काबलियत का तभी पता चल गया था जब उन्होंने सत्तर के दशक में जॉर्ज फर्नाँडिज़ के लिए बड़ौदा डायनामाइट केस में दिग्गज वकील राम जेठमलानी की सहायक के तौर पर पैरवी की थी...सुषमा का वो विलाप देश आज तक नहीं भूला है जब उन्होंने 2004 में धमकी दी थी कि सोनिया देश की प्रधानमंत्री बनीं तो वो अपना सिर मुंड़वा लेंगी...2004 के लोकसभा चुनाव में ही सुषमा ने बेल्लारी में सोनिया के खिलाफ चुनाव लड़ा था...सुषमा चुनाव हार ज़रूर गई थीं लेकिन बेल्लारी में कन्नड बोल-बोल कर मतदाताओं का दिल ज़रूर जीत लिया था...

अब देखना ये है कि बीजेपी में चाहे मुखौटे बदल कर गडकरी और सुषमा स्वराज के आ गए हो, क्या ये भागवत युग बीजेपी में नए प्राण फूंक सकेगा या नेताओं का आपसी कलह कमल का पूरी तरह दम निकाल कर ही दम लेगा...

रविवार, 20 दिसंबर 2009

अपुन गधे ही भले...खुशदीप

एक दिन पहले मैंने स्लॉग ओवर में ललित शर्मा भाई की ओर से गधे को लेकर किए गए मास्टरस्ट्रोक का ज़िक्र किया था...उसी पोस्ट पर मुझे महफूज़ अली की टिप्पणी मिली थी कि कभी किसी गधे को ध्यान से देखिएगा...कितना भोला लगता है...इत्तेफ़ाक से मैं अपनी बॉलकनी के लिए कल कुछ गमले लेने गया...वहां कुम्हार के पास गधा खड़ा दिख गया...मुझे महफूज़ की बात याद आ गई...मैंने गौर से गधे को देखा...वाकई उसके जैसा भोला, शरीफ़ और दीनहीन आपको और कोई प्राणी नहीं दिखेगा...घर वापस आकर तैयार होते वक्त शीशे पर मेरी नज़ऱ पड़ी...क्या मैं भी...




अब इसी गधा-गाथा पर चार लाइनें दिमाग में आ गईं, वही आपके लिए पेश कर रहा हूं...अब इन्हें पढ़ने के बाद मुझे वही मत कहने लगिएगा, जिस प्राणी को मैं ये समर्पित कर रहा हूं...


अपुन गधे ही भले


कभी गधे को गौर से देखो
मासूम, ज़माने से डरा चेहरा
मक्कारी का नामोनिशान नहीं
शायद इसीलिए वो इंसान नहीं
गधा कभी प्रैक्टीकल नहीं होता
कोई कुछ कहे रिएक्ट नहीं करता
गधा उम्र भर गधा ही रहता है
काश वो अक्ल के घोड़े दौड़ा पाता
इंसान को इंसान से भिड़ा जाता
फिर कोई उसे गधा क्यों कहता


सोच रहा हूं खुद तन्हा बैठा
लोग मुझे गधा क्यों कहते हैं...



स्लॉग गीत
नॉन-प्रैक्टीकल होते हुए भी कैसे जिया जा सकता है, इसके लिए सुनिए दोस्त फिल्म का ये गीत...

आ बता दे ये तुझे कैसे जिया जाता है

गाना देखने के लिए यू ट्यूब का लिंक...

पहन कर पांव में ज़ंज़ीर भी रक्स किया जाता है...


आखिर में आज स्लॉग ओवर नहीं स्लॉग प्रेयर...


स्लॉग प्रेयर

बॉस का सताया एक बंदा ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है...


हे प्रभु,
मुझे इतनी बुद्धि दो,
मैं बॉस के दिमाग को पढ़ सकूं...

मुझे इतना संयम दो,
मैं बॉस के हुक्म झेल सकूं...


पर प्रभु,
मुझे ताकत कभी मत देना,
वरना बॉस मारा जाएगा
कत्ल मेरे सिर आएगा...

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

ब्लॉगिंग का फीलगुड...खुशदीप

मुझे महसूस हो रहा है...शायद आपको भी हो रहा हो...न जाने क्यों मुझे लग रहा आने वाला साल हिंदी ब्ल़ॉगिंग के लिए कई खुशियां लेकर आने वाला है...इसकी सुगबुगाहट शुरू भी हो चुकी है...मुझे ब्ल़़ॉगिंग में आए चार महीने हो चुके हैं...मैं नोट कर रहा हूं, चार महीने पहले जो स्थिति थी, उसमें और आज में काफ़ी फर्क आ चुका है...

ब्लॉगिंग से कमाई को लेकर बहुत कुछ लिखा जाता रहा है...बेशक हिंदी के लिए एडसेंस अब भी दूर की कौड़ी बना हुआ है...लेकिन जिस तरह गूगल बाबा हिंदी में स्तरीय लेखन को बढ़ावा देने के लिए प्रतियोगिता करा रहा है...'है बातों में दम?'...वो संकेत देता है कि आज नहीं तो कल हिंदी को भी एड मिलना शुरू हो जाएंगे...ज्यादा दिन तक हिंदी को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता...ऐसी भी खबर है कि गूगल अभी एड का स्टॉक जमा कर रहा है...जिससे हिंदी में एड शुरू करने पर निर्बाध रूप से उन्हें जारी किया जाता रहे...वैसे इस मुद्दे पर जी के अवधिया जी और बी एस पाबला जी की पैनी नज़र है...वो वक्त-वक्त पर एडसेंस की हर हलचल से हमें अवगत भी कराते रहते हैं...

जहां तक मेरा सवाल है मेरे ब्लॉग पर एड तो एक भी नहीं है लेकिन मैं पिछले चार दिन से ढाई मिनट एड देखकर बीस रुपये रोज कमा रहा हूं...अभी तक सौ रुपये जमा हो चुके हैं...और ये मुमकिन हुआ है कल्पतरू वाले विवेक रस्तौगी भाई की बदौलत...उन्होंने ही अपनी एक पोस्ट में लिंक दिया था...चलिए ऊंट के मुंह में जीरा ही सही...खाता तो खुला...बड़ा आसान काम है...आप सब भी इससे वंचित न रहे, इसके लिए यहां मैं भी एड देखकर कमाई करने वाला लिंक दे रहा हूं...

कल संजीव तिवारी भाई ने भी एक अच्छी खबर दी थी कि रायपुर में एक सरकारी संस्थान ने नियमित रूप से ब्लॉग लिखवाने के लिए हिंदी ब्लॉगर की सेवाएं लेना शुरू कर दिया है...ये बड़ी अच्छी खबर है...ये सब आने वाले दिनों में हिंदी ब्लॉगिंग को स्वावलंबन की दिशा में ले जाने की उम्मीद जगाता है...खैर उम्मीद पर ही दुनिया कायम है...

ये तो रही ब्लॉगिंग के अर्थशास्त्र की बातें...आपने नोट किया हो इससे भी ज़्यादा सुखद और अच्छा पिछले कुछ महीनों में ब्लॉगिंग के साथ हुआ है...मैंने जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था तो देखता था-सबसे ज़्यादा पसंद वाले कॉलम में ऊपर की पांच छह पोस्ट सिर्फ धर्म को लेकर एक-दूसरे पर निशाना साधने वाली ही होती थीं...या फिर किसी पोस्ट में किसी ब्ल़ॉगर का नाम लेकर ही उसे ललकारा जाता रहता था...ये सब बिल्कुल बंद तो नहीं हुआ है, पहले से कम ज़रूर हो गया है...अब अलग-अलग मुद्दों पर जमकर लिखा जा रहा है...ये बड़ा सकारात्मक बदलाव है...हमें अपने ब्लॉग्स के लिए पाठक तभी ज़्यादा मिलेंगे जब उन्हें हमारे लिखे में विभिन्नता और गुणवत्ता मिलेगी...

एक और खुशगवार हवा का झोंका छत्तीसगढ़ से आया है...ये सच है कि ब्लॉगिंग को लेकर जितनी जागरूकता छत्तीसगढ़ में है, उतनी शायद किसी और राज्य में नहीं है...छत्तीसगढ़ के ब्लॉगर भाइयों ने एक मंच बनाकर अच्छी शुरुआत की है...कंट्रोल्ड डिमॉलिशन के तहत लोकाचार और ब्लॉगिंग के हित में एक के बाद एक सीरियल ब्लॉस्ट किए जा रहे हैं...इस ब्रिगेड से भी यही खबरें मिल रही है कि हिंदी ब्लॉगिंग को एक साथ बहुत कुछ अच्छा सुनने को मिलने वाला है....मेरा छत्तीसगढ़ के ब्लॉगर भाइयों से एक ही अनुरोध है कि सबको साथ लेकर चलें..

एक और निवेदन करना चाहता हूं कि ब्लॉगिंग में ऐसी मौज से किसी को परहेज नहीं होना चाहिए जो किसी दूसरे का दिल न दुखाती हो...सेंस ऑफ ह्यूमर सबसे बड़ी नेमत है...वरना गम और जद्दोजहद तो वैसे ही ज़िंदगी में भरे रहते हैं...किसी को रूलाना बहुत आसान होता है और किसी के चेहरे पर छोटी सी मुस्कान लाना बहुत मुश्किल...इसलिए अगर किसी पर आप चुटकी लो तो आपमें इतना माद्दा भी होना चाहिए कि दूसरों की अपने पर चुटकी को भी स्पोर्ट्समैनशिप की तरह ही लें...ब्लॉगिंग में भी गुटबाज़ी होने लगी तो फिर इसमें और राजनीति में फर्क ही क्या रह जाएगा...मन में विद्वेष या बदले की भावना क्या कहर ढहा सकती है, ये तो हम राजनीति में देखते ही रहते हैं...हम सब ब्लॉगर्स को इस गाने को अपना सूत्रवाक्य बना लेना चाहिए...साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, मिलकर हाथ बढ़ाना...

ब्लॉगिंग के फीलगुड पर पोस्ट है, इसलिए आज स्लॉग ओवर नहीं ब्लॉग ओवर-


ब्लॉग ओवर

एक सयाने की जिन्न से दोस्ती थी...एक बार जिन्न कुछ दिन तक सयाने से मिलने नहीं आया...सयाने को फिक्र हो गई...उसने किसी तरह जतन कर जिन्न को बुलाया...जिन्न आया तो लेकिन बदहवास हालत में...चेहरे से हवाइयां उड़ रही थीं...इस तरह जिस तरह किसी टार्चर रूम से बड़ी मुश्किल से निकल कर आया हो...सयाने ने पूछा...क्या हुआ जिन्न भाई, तुम दुनिया के होश उड़ाते हो तुम्हारी ये हालत किसने बना दी...जिन्न बोला....क्या बताऊं सयाने भाई...इस बार मुझे खुद ही मुझसे भी बड़ा जिन्न चिमड़ गया था...बड़ी मुश्किल से उसकी सौ-डेढ़ सौ पोस्ट पढ़ने के बाद जान छुड़ाकर आया हूं...बस डर यही है कि वो ब्लॉगर जिन्न और ताजा पोस्ट लेकर पीछे-पीछे यहां भी न आ धमके...

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

अपने तो अपने होते हैं...खुशदीप

ब्लॉगिंग का फीलगुड पोस्ट पाइपलाइन में पड़ी हैं...एक दिन पहले ब्रॉडबैंड महाराज की वजह से उस पोस्ट का बैंड बज गया था...सोच रहा हूं शनिवार को छुट्टी है...इसलिेए कल देर रात तक आराम से लिखूंगा...फिर आज क्या...तो वहीं अपना थ्री इन वन फॉर्मूला...यानि स्लॉग चिंतन भी है, स्लॉग गीत भी और स्लॉग ओवर भी...स्लॉग ओवर में आज अपने ललित शर्मा भाई भी आपसे मुलाकात करेंगे...


स्लॉग चिंतन

अपनी ज़िंदगी में जो अपने हैं उनके लिए किसी भी तरह कुछ वक्त निकालिए...


क्योंकि एक दिन ऐसा भी आएगा जब आपके पास वक्त होगा लेकिन शायद अपने साथ नहीं होंगे....






स्लॉग गीत

ब्लॉगर बिरादरी में सब अपने हैं...यहां ज़रा  कोई परेशानी ज़ाहिर करता है...हर तरफ़ से मदद के हाथ आगे आ जाते हैं...ठीक ही कहा है...अपने तो अपने होते हैं...सुनिए और देखिए अपने फिल्म का ही गीत...

बाकी सब सपने होते हैं
अपने तो अपने होते हैं
अपने तो अपने होते हैं

मुझसे तेरा मोह ना छूटे, दिल ने बनाये कितने बहाने
दूजा कोई क्या पहचाने, जो तन लागे सो तन जाने
बीते गुज़रे लम्हों की सारी बातें तड़पाती हैं
दिल की सुर्ख दीवारों पे बस यादें ही रह जाती हैं
बाकी सब सपने होते हैं
अपने तो अपने होते हैं
अपने तो अपने होते हैं
चना वे जा के जल्दी चले आना
जानेवाले तैनू बिनतिया, गलियां पुकारेंगी
जानेवाले तैनू बागां विच कलियां पुकारेंगी
तेरे संग लाड लडावां वे, तेरे संग लाड लडावां
तेरे संग प्यार निभावा वे, तेरे संग प्यार निभावा
तेरे संग लाड लडावां वे. तेरे संग लाड लडावां
तेरे संग प्यार निभावा वे. तेरे संग प्यार निभावा

तुझसे बयां चाहे मैने न किया है
पर एक लम्हा न तेरे बिन जिया है
जाना मैंने जाना ये दिल आजमाने से
कभी न छुपे रबा प्यार छिपाने से
तेरे संग लाड लडावां वे, तेरे संग लाड लडावां
तेरे संग प्यार निभावा वे, तेरे संग प्यार निभावा
तेरे संग लाड लडावां वे. तेरे संग लाड लडावां
तेरे संग प्यार निभावा वे. तेरे संग प्यार निभावा
बीते गुज़रे लम्हों की सारी बातें तड़पाती हैं
दिल की सुर्ख दीवारों पे बस यादें ही रह जाती हैं
बाकी सब सपने होते हैं
अपने तो अपने होते हैं
अपने तो अपने होते हैं


तेरी मेरी राहों में चाहे दूरिया हैं
इन फ़ासलों में भी नज़दीकियां हैं
सारी रंजिशों को तू पल में मिटा ले
आजा आ भी जा मुझको गले से लगा ले
तेरे संग लाड लडावां वे, तेरे संग लाड लडावां
तेरे संग प्यार निभावा वे, तेरे संग प्यार निभावा
तेरे संग लाड लडावां वे, तेरे संग लाड लडावां
तेरे संग प्यार निभावा वे, तेरे संग प्यार निभावा
बीते गुज़रे लम्हों की सारी बातें तड़पाती हैं
दिल की सुर्ख दीवारों पे बस यादें ही रह जाती हैं
बाकी सब सपने होते हैं
अपने तो अपने होते हैं
अपने तो अपने होते हैं
अपने तो अपने होते हैं
अपने तो अपने होते हैं

फिल्म- अपने (2007), गीतकार- समीर, गायक- सोनू निगम, जयेश गांधी, जसपिंदर नरूला, संगीतकार-हिमेश रेशमिया


स्लॉग ओवर

एक बार ललित शर्मा भाई मॉर्निंग वॉक पर निकले...किसी सिरफिरे ने सड़क पर केले का छिलका फेंक रखा था...ललित भाई को छिलका दिखा नहीं और जा फिसले...पार्क के पास ही एक गधे महाराज घास पर हाथ साफ कर रहे थे...ललित भाई का बैलेंस बना नहीं और वो गधे के पैरों के पास जा गिरे...वहीं एक सुंदर सी मैडम खड़ी थी...मैडम से हंसी रोकी नहीं गई और चुटकी लेते हुए ललित भाई से बोली...क्यों सुबह-सुबह बड़े भाई के पैर छू रहे हो क्या...ललित भाई भी ठहरे ललित भाई...कपड़े झाड़ते हुए उठ कर मैडम से बड़े अदब से बोले...जी भाभी जी...

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

"हम क्यों नहीं मरते"...खुशदीप

संसद से सड़क तक महंगाई का शोर है...एक दिन पहले...कांटा लगा, हाय लगा...में मैंने कोशिश की थी ये बताने कि महंगाई की जड़ कहां है...आज उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए बताता हूं कि महंगाई आखिर है किसके लिए...नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन जब पांच साल के थे तो उन्हें एक सवाल ने वो अर्थशास्त्री बना दिया, जिनका लोहा पूरी दुनिया मानती है...दरअसल जब अमर्त्य सेन छोटे थे तो उसी वक्त बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था...हज़ारों हज़ार लोग बेवक्त काल के मुंह में समा गए थे...गांवों से लोग अन्न की तलाश में पलायन कर रहे थे...कई लोग सड़कों पर ही दम तोड़ रहे थे...ये देखकर नन्हे अमर्त्य सेन अपने घर वालों से सवाल पूछा करते थे कि अकाल से लोग मर रहे हैं तो हमारे घर पर कोई क्यों नहीं मर रहा...ज़ाहिर है अमर्त्य सेन का परिवार खुशहाल था...अकाल के बावजूद घर में धन-धान की कोई कमी नहीं थी...बस इसी फर्क से अमर्त्य सेन को अपना जवाब मिल गया...मौतें अकाल से नहीं अनाज के असमान बंटवारे की वजह से हो रही हैं...जिनके पास पैसा है उन्होंने ज़रूरत से ज़्यादा अनाज घर में भर रखा है...और जिनके पास पैसा नहीं है, उनके घर में खाने को अन्न का दाना तक नहीं है...ये तो रही सात दशक पहले की बात..

अब आता हूं आज पर...विपक्ष के सांसदों ने संसद में सरकार को घेरते हुए कहा कि आम आदमी महंगाई से मरा जा रहा है और सरकार उसे राहत दिलाने के लिए कुछ नहीं कर रही है...कमाल देखिए जिस वक्त दिल्ली में कांग्रेस को घेरा जा रहा था ठीक उसी वक्त दिग्विजय सिंह और रीता बहुगुणा जोशी की अगुआई में कांग्रेसी लखनऊ में मायावती सरकार के खिलाफ नारे लगाकर-लगाकर ज़मीन आसमान एक कर रहे थे...मुद्दा यहां भी महंगाई था...लेकिन ये किसानों को महंगाई से राहत दिलाने के लिए मायावती सरकार से गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग कर रहे थे...इन दो उदाहरणों से मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूं कि विपक्ष दिल्ली में केंद्र को घेरता है तो वही केंद्र लखनऊ जाकर ऐसे विरोधी दल को घेरता है जिसकी यूपी में सरकार है...ज़ाहिर है इस चूहे-बिल्ली के खेल का मकसद अपने-अपने राजनीतिक हितों को साधना है...आम आदमी या किसान को तो इस खेल में बस एक ज़रिेए की तरह ही इस्तेमाल किया जाता है...अगर सच में ऐसे नहीं होता तो लोकसभा में करोड़पति सांसदों की भरमार नहीं होती...


(साभार- सुभानी)



खास और आम का फर्क

2004 में लोकसभा में 29 फीसदी यानि कुल 156 सांसद करोड़पति थे...2009 में करोड़पति सांसदों की संख्या 305 यानि सदन के कुल सांसदों की 59 फीसदी हो गई...दूसरी ओर देश में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोग 2004 में 31 फीसदी थे जो 2009 में बढ़कर 37 फीसदी हो गए...


2004 में सांसदों की औसत संपत्ति 1.86 करोड़ थी जो 2009 में बढ़कर 5.33 करोड़ हो गई...दूसरी ओर देश में 2004 में प्रति व्यक्ति आय 2475 रुपये थी जो 2009 में बढ़कर 2962 रुपये के स्तर पर ही पहुंची...


97 फीसदी सांसदों की संपत्ति दस लाख या ज्यादा है, वहीं देश की 77 फीसदी आबादी 20 रुपये दिहाड़ी पर गुज़ारा करती है...

उत्तर प्रदेश पिछड़ा हुआ राज्य माना जाता है इसलिए यहां महंगाई का असर घर-घर में देखा जा रहा है...लेकिन त्रासदी देखिए कि लोकसभा में सबसे ज़्यादा 52 करोड़पति सांसद यूपी से ही आते हैं...

महाराष्ट्र में दुनिया के सबसे ज़्यादा शहरी गरीब हैं लेकिन महाराष्ट्र के 75 फीसदी सांसद यानि 48 में से 38 करोडपति हैं...

हरियाणा के नब्बे फीसदी लोकसभा सांसद यानि नौ सांसद और पंजाब के 100 फीसदी यानि 13 के 13 लोकसभा सांसद करोड़पति हैं...दिल्ली के भी सातों सांसद करोड़पति हैं...


अब थोड़ी पार्टियों की भी बात कर ली जाए...कांग्रेस आम आदमी का नारा पूरी ताकत से बुलंद करती है...लोकसभा में कांग्रेस के 146 सांसद करोडपति हैं...

बात-बात पर नैतिकता की दुहाई देने वाले सबसे बड़े विरोधी दल बीजेपी के 59 सांसद लोकसभा में करोड़पति हैं..

लोहिया की सादगी के मंत्र का जाप करने वाली समाजवादी पार्टी के लोकसभा में 14 सांसद करोड़पति हैं

दलितों की मसीहा कहलाने में फख्र करने वाली बीएसपी के लोकसभा में 13 सांसद करोड़पति हैं...

डॉ अमर्त्य सेन ने बचपन में घर वालों से सवाल पूछा था कि अकाल से उनके घर में मौत क्यों नहीं होती...आज मैं अमर्त्य सेन जी से फिर सवाल करना चाहता हूं कि महंगाई का असर हमारे माननीय सांसदों पर क्यों नहीं होता..क्यों महंगाई सिर्फ गरीबों के लिए ही अकाल बन कर आती है...रहा आम आदमी...वो तो अधर में लटका हुआ है...न पूरी तरह मर रहा है और न ही जी पा रहा है...


स्लॉग ओवर

एक कंजूस व्यापारी के दादाजी की मौत हो गई...वो अखबार में शोक विज्ञापन देने के लिए गया...उसने विज्ञापन दिया...दादाजी खत्म....अखबार के स्टॉफ ने कहा...इतना छोटा विज्ञापन हम स्वीकार नहीं करते, कम से कम पांच शब्द विज्ञापन में होने चाहिए...कंजूस व्यापारी ने बिना एक मिनट गंवाए कहा...दादाजी खत्म, व्हील चेयर बिकाऊ...

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

इंसान का सर्प धर्म...खुशदीप

मैं आज ब्लॉगिंग के फील गुड पर पोस्ट लिख रहा था...बस फाइनल टच दे रहा था कि ब्रॉडबैंड ने धोखा दे दिया और जो लिखा था वो सेव न होने की वजह से सब उड़ गया...बड़ी कोफ्त हुई...फिलहाल वो सब कुछ दोबारा लिख सकने की मनोस्थिति में नहीं हूं...कल फिर से लिखने की कोशिश करूंगा...

फिलहाल बात करता हूं इंसान के सर्प धर्म की...एक दिन पहले मैंने आपको ट्रक के पीछे लिखा वाक्य बताया था...

इंसान इंसान को डस रहा है,
सांप साइड में खड़ा हंस रहा है...

अब पता नहीं ये कौन सी शक्ति है जो मुझे कह रही है इन पक्तियों को थोड़ा विस्तार दूं...जहां तक कविता से मेरा वास्ता है तो ये कुछ वैसा ही होगा जैसे कि किसी नेता से ईमानदारी की बात की जाए......मैं नहीं जानता कि इन दो पक्तियों को जो विस्तार मैं देने जा रहा हूं वो क्या है...कविता है, तुकबंदी है या कुछ और...लेकिन ये ज़रूर जानता हूं कि ऐसा प्रयोग मैंने अपने लेखन में पहले कभी नहीं किया...इसलिए आपसे अनुरोध है कि इसे एक नौसिखिए की कोशिश के तौर पर ही लीजिएगा, अन्यथा नहीं..हो सकता है कि ट्रक की पक्तियों के लिए मेरे विस्तार को देखने के बाद आपको मुझे ही ट्रक के नीचे नहीं बल्कि बुलडोजर के नीचे देने का मन करे....लेकिन कलेजे पर पत्थर रख कर बर्दाश्त कर लीजिएगा...

इंसान का सर्प धर्म

इंसान इंसान को डस रहा है
सांप साइड में खड़ा हंस रहा है...

सांप को अब एहसास है,
ज़हर में इंसान मात दे गया है
सांप गर पहले किसी को नहीं डसता था
अपराध-बोध में दिन-रात तड़पता था-
सर्प धर्म निभाने में चूक हो गई
सांप को अब दिल से तसल्ली है
इंसान की केंचुली में सांप बस गया है
अपनों को काटना इंसान का धर्म हो गया है...

इंसान इंसान को डस रहा है
सांप साइड में खड़ा हंस रहा है...


स्लॉग ओवर

मक्खन,मक्खनी और गुल्ली जिम कार्बेट पार्क में पिकनिक मनाने गए...रात को थक कर कैंप में सो रहे थे कि गुल्ली की अचानक आंख खुल गई...गुल्ली ने देखा कि एक सांप मां मक्खनी को डसने ही वाला था...गुल्ली के उठने से खटका हुआ और सांप कैंप से बाहर भाग गया...गुल्ली ने घबरा कर मक्खन को उठा दिया और सांप के आने की बात बताई...मक्खन ने कहा...ओ सो जा पुतर...कोई बात नहीं...वो सांप के ज़हर का स्टॉक खत्म हो गया होगा...तेरी मां से रीफिल कराने के लिए आया होगा...

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

कांटा लगा, हाय लगा...खुशदीप

आज बात उस कांटे की जो इन दिनों भारत के हर आम आदमी को लगा हुआ है..ये है महंगाई का कांटा...हमको भी महंगाई ने मारा...तुमको भी महंगाई ने मारा...इस महंगाई को मार डालो...मनमोहन सिंह जी लाख भरोसा दिलाएं कि भारत पर मंदी का ज़्यादा असर नहीं पड़ा...लेकिन भईया अपने लिए तो सब मंदा ही मंदा है...महीने की 12-13 तारीख आते न आते पहली तारीख का इंतज़ार होने लगता है...

अब तो अपना डेबिट कार्ड भी ताक पर रख दिया है....डेबिट कार्ड जेब में हो तो आदमी अपने को किसी शहंशाह से कम नहीं समझता...ऐसे खरीददारी करता है जैसे सब बाप का माल हो और कभी भुगतान करना ही नहीं पड़ेगा...और इन एमएनसी और माल की बॉय वन, गेट वन फ्री ऑफर के चलते जेब में कितना बड़ा सुराख होता है, इसका अहसास तब होता है जब चिड़िया खेत चुग गई होती है...अब तो जेब में जितने पैसे होते है, उतनी ही खरीददारी करते हैं...कैश से भुगतान करते वक्त आदमी बस ज़रूरत की ही चीज़ें खरीदता है...

सवाल है कि समस्या हैं कहां...देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अर्थशास्त्र की समझ पर कौन ऊंगली उठा सकता है...वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी हो या गृह मंत्री पी चिदंबरम ( पूर्व वित्त मंत्री) या फिर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया...सभी जानेमाने अर्थशास्त्री...इन सभी पर सरकार की ओर से देश के नागरिकों को राहत पहुंचाने की ज़िम्मेदारी है...लेकिन अजीब तो तब लगता है जब यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को चिट्ठी लिखकर कहना पड़ता है कि महंगाई से आम आदमी त्रस्त है और हालात पर काबू पाने के लिए ज़रूरी कदम उठाए जाने चाहिए...


(साभार- राजेंद्र पुरी)


ज़ाहिर है मनमोहन सिंह के कंधों पर सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी हैं और सोनिया और राहुल को कांग्रेस की राजनीतिक ज़मीन को देखना है...कांग्रेस आम आदमी के बढ़ते कदम, हर कदम पर भारत बुलंद के नारे के साथ लगातार दूसरी बार दिल्ली की गद्दी तक पहुंची है...सोनिया की प्रधानमंत्री को चिट्ठी का मतलब क्या है...क्या सरकार और कांग्रेस अलग-अलग हैं...या सोनिया कहना चाहती हैं जो गलती है वो सरकार के पार्ट पर है कांग्रेस तो दूध की धुली है...

सवाल उठ सकता है कि महंगाई को लेकर सरकार के हाथ इस तरह बंधे क्यों है...सही पूछो तो सरकार के पास कीमतों के बारे में जो भी जानकारी आती है वो थोक बाज़ार या होलसेल इंडेक्स पर ही टिकी होती है...यानि रीटेल कीमतों की सही स्थिति जानने के लिए सरकार के पास सिस्टम ही नहीं है...और आपका-हमारा थोक से नहीं सिर्फ रीटेल कीमतों से ही वास्ता होता है...इस थोक और रीटेल के बीच ही महंगाई की सारी जड़ छुपी हुई है...सरकार की आर्थिक नीतियां आम आदमी की ज़रूरत से नहीं बाज़ार के मुनाफ़े-घाटे से प्रभावित होती हैं...यानि आम आदमी यहां भी बाज़ार से ही मात खाता है...

अर्थशास्त्र की मान्यता है कि कीमतें बाज़ार में डिमांड और सप्लाई के सिद्धांत से तय होती हैं..लेकिन देश में महंगाई का जो दौर चल रहा है वो किसी दूसरे खेल की ओर ही इशारा करता है...बाज़ार में स्टोर खाने-पीने या रोज़ाना इस्तेमाल की ज़रूरी चीज़ों से अटे पड़े हैं...पर खरीददार गायब हैं...अगर हैं भी तो उनकी जेब में पर्याप्त माल नहीं है...यानि बाज़ार में ज़रूरी सामान की सप्लाई तो बदस्तूर जारी हैं....अगर किल्लत नहीं है तो फिर कीमतें बढ़ती जाने की असली वजह क्या है...ऐसी बात नहीं कि मानसून अच्छा नहीं होने की वजह से फसलें बिल्कुल चौपट हो गई हैं...आज ही खबर आई है कि हरियाणा में धान की बंपर फसल हुई है...

फिर कौन सी ताकतें है, इस खेल के पीछे...बाज़ार खोलने की उदार नीति का दोनों हाथों से फायदा उठाकर क्या ये ताकतें आज इतनी निरंकुश हो चुकी हैं कि सरकार भी इनके आगे खुद को बेबस महसूस कर रही है...ये किसी से छुपा नहीं है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में विश्व की अर्थव्यवस्था है...अंधाधुंध मुनाफा कमाने की गरज से ये कंपनियां कीमतों में लगातार इज़ाफ़ा करती रहती हैं...एक सोची समझी रणनीति के तहत ये बहुराष्ट्रीय कंपनिया देश के पूरे रीटेल बाज़ार को अपने कब्ज़े में लेना चाहती है...ये आर्थिक उपनिवेशवाद ठीक उसी तरह है जिस तरह ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में आकर धीरे-धीरे पूरे देश को गुलाम बना लिया था...

सरकार की ओर से ये भी तर्क दिया जाता है कि कीमतें बढ़ना आज सिर्फ भारत की नहीं, दुनिया के तमाम देशों की समस्या है...लेकिन भारत जैसे कृषि प्रधान देश में आज आम आदमी को खाने के लिए रोटी ही नहीं नसीब हो पा रही है...मुझे देश के इस हालात में आने की सबसे बड़ी वजह जो नज़र आती है...वो है आर्थिक सुधारों के दो दशकों में राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को बहुराष्ट्रीय कंपनियो की कठपुतली बना दिया गया है...महंगाई पर काबू पाने के लिए आज किसी रॉकेट साइंस की नहीं बल्कि ठेठ देसी नुस्खों की ज़रूरत है...

सोमवार, 14 दिसंबर 2009

सांप हंस रहा है...खुशदीप

ट्रकों के पीछे गोल्डन वाक्य लिखे तो आपने भी कभी न कभार ज़रूर देखे होंगे...अक्षय कुमार को उनकी सुपरहिट फिल्म सिंह इज़ किंग का टाइटल भी एक ट्रक के पीछे लिखा हुआ ही दिखा था...आज मैं ऐसा ही एक स्लॉग ट्रकर आपको सुना रहा हूं...

स्लॉग ट्रकर

इंसान इंसान को डस रहा है,
सांप साइड में बैठ कर हंस रहा है...

(सौजन्य जेपी सिंह काका, भोपाल)




स्लॉग गीत
आज मैं अपना एक और बहुत पंसदीदा गीत सुनाना चाहता हूं...किशोर दा की दिल में उतर जाने वाली आवाज़, राजेश रोशन का मधुर संगीत...1977 में आई फिल्म स्वामी का ये गाना उस सिचुएशन पर है जहां शबाना आज़मी की शादी गिरीश कर्नाड से हो जाती है लेकिन शबाना आजमी का प्रेम विक्रम से रहा होता है....डोली के वक्त प्रेमी, सखियां, फूल, नदी, अपनों को याद करते हुए शबाना की दुविधा को दर्शाता गीत...बस अब आप खुद ही सुनिए-

यादों में वो, सपनों में है,
जाएं कहां, धड़कन का बंधन तो धड़कन से है,
सांसों से हूं मैं कैसे जुदा, अपनों को दूं मैं कैसे भुला,
यादों में वो, सपनों में है,
जाएं कहां, धड़कन का बंधन तो धड़कन से है...


ये फूल, ये कलियां सभी रोक रहीं राहें मेरी,
ये मीत, ये सखियां सभी ढ़ूढ रहीं निगाहें मेरी,
हर मोड़ पर एक सपना खड़ा, जाना है मुश्किल मेरा,
यादों में वो, सपनों में है,
जाएं कहां, धड़कन का बंधन तो धड़कन से है...


नैना मेरे असुंअन भरे, पूछ रहे चली है कहां,
बहती नदी, कहने लगी, तेरा तो है येही जहां,
हर मोड़ पर कोई अपना खड़ा, देखूं मैं मुड़ के जहां,
यादों में वो, सपनों में है,
जाएं कहां, धड़कन का बंधन तो धड़कन से है,


सांसों से हूं मैं कैसे जुदा, अपनों को दूं मैं कैसे भुला,
यादों में वो, सपनों में है,
जाएं कहां, धड़कन का बंधन तो धड़कन से है...


स्लॉग ओवर
मक्खन दौड़ा दौड़ा घर आया...चेहरा खुशी के मारे 440 वोल्ट के करंट से चमक रहा था...आते ही मक्खनी को खुशखबरी सुनाई....अरे...आज मैंने कलेक्ट्रेट वालों को बेवकूफ़ बना दिया...

मक्खनी बोली...भला, वो कैसे...

मक्खन...अरे मैंने उन्हें अपनी छाती के सफ़ेद बाल दिखाकर भरोसा दिला दिया कि मैं सीनियर सिटीजन हूं और उन्होंने मेरी वृद्धावस्था पेंशन को मंजूरी दे दी...देखा मैं अभी सिर्फ 45 साल का ही हूं और 15 साल पहले ही उन्हें गोली दे दी...

मक्खनी ठंडी सांस लेकर बोली....काश वो अफसर कुछ और भी देख लेते तो विकलांगता पेंशन भी मिल जाती...

(डिस्कलेमर:  मक्खनी का आशय मक्खन के दिमाग से था...)

रविवार, 13 दिसंबर 2009

मेरी परेशानी दूर कीजिए...खुशदीप

आज मैं ये माइक्रो पोस्ट अपनी एक परेशानी दूर करने के लिए लिख रहा हूं...ये छोटा सा सवाल कई बार मेरे सामने आता रहता है...और ऐसा एक बार भी नहीं हुआ जब मैंने विवाद का सामना नहीं किया...इसलिए इस दुविधा को हमेशा-हमेशा के लिए दूर करने की खातिर आपके दरबार में इसे पहुंचा रहा हूं....



ये दुविधा जन्मदिन की है...घबराइए नहीं मेरा जन्मदिन नहीं है...मैं सबके जन्मदिन की बात कर रहा हूं...बड़ी हस्तियों के जन्मदिन, आपका जन्मदिन, हम सबका जन्मदिन...मेरा सवाल है कि पहला जन्मदिन किसे माना जाए...उस दिन को जब इंसान दुनिया में आता है यानि जिस दिन जन्म लेता है...या उस दिन को जब इंसान एक साल का हो जाता है...

आपने नोट किया होगा कि कई बार एक ही इंसान के जन्मदिन को अलग-अलग प्रचार माध्यमों में अलग-अलग बताया जाता है...जैसे अभी दो दिन पहले दिलीप कुमार साहब का जन्मदिन आया था...दिलीप साहब का जन्म 11 दिसंबर 1922 को हुआ था...इस हिसाब से उनका दो दिन पहले यानि 11 दिसंबर 2009 को कौन सा जन्मदिन मनाया गया...87वां या 88वां...अगर 11 दिसंबर 1922 को जन्म वाले दिन दिलीप साहब का पहला जन्मदिन माना जाए तो ये 88वां जन्मदिन था...और अगर 11 दिसंबर 1923 को दिलीप साहब का पहला जन्मदिन माना जाए तो हमने इस साल उनका 87वां जन्मदिन मनाया...

मेरा अपना मानना है कि इंसान के जन्म वाले दिन को ही पहला जन्मदिन माना जाना चाहिए न कि तब जब एक साल का हो जाता है...इस लिहाज से इस साल दिलीप साहब का 88वां जन्मदिन ही मनाया गया....इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि दिलीप साहब ने 87वर्ष पूरे कर लिए हैं इसलिए उन्हें शब्दों में ...87 के दिलीप कुमार... कहना सही होगा लेकिन जन्मदिन 88वां ही कहना चाहिए...कृपया अब आप मुझे बताइए कि क्या सही है और क्या गलत...


स्लॉग ओवर

पेज थ्री टाइप फैशन डिजाइनर एक मोहतरमा मेकअप से सराबोर होकर रियल्टी टीवी के एक चैट शो में पहुंची...साथ में जवान बेटी...शो की होस्ट ने एक सवाल में फैशन डिजाइनर मोहतरमा की उम्र पूछ ली...अब पूरा देश शो देख रहा था...सही उम्र कैसे बता दी जाए 45...नो नो...इट्स 40...एक्चुअली 35 है...वन मोर करेक्शन 30...फाइनली 25...

तभी साथ जवान बेटी ने धीरे से मां के कान में कहा...मॉम, उम्र जितनी मर्जी कम बताओ, बस अपनी और मेरी उम्र के बीच नौ महीने का फ़र्क ज़रूर रख लेना...

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

टेढ़ा है पर मेरा है...खुशदीप

बुधवार से मन बड़ा खराब चल रहा है...वजह है हमारा बजाज...टेढ़े बजाज का खटारा खटराग...लोगबाग बेशक उसे स्कूटर कहने की गुस्ताखी करते हैं लेकिन हमारे लिए तो वो अश्वराज चेतक से कम नहीं...पिछले 18 साल से जब भी ये चेतक महाराज मुझे सवारी कराते रहे हैं, मुझे यही लगता है कि राणा प्रताप की आत्मा मेरे अंदर आ गई है...वो तो मूंछे नहीं रखी हुई, नहीं तो चेतक की हर उड़ान पर कलफ की तरह ही कड़क हो जाया करती और गाना गाया करती...हमरी ना मानो तो बजजवा से पूछो...(सुन रहे हैं न ललित शर्मा भाई...)

आप पूछेंगे कि ये सुबह-सुबह कौन सा वीत-राग ले बैठा...ओ बजाज जी, तेरे ऐलान ने बड़ा दुख दीना...अब आप कहेंगे...कौन बजाज...अरे वही बजाज जो कल तक बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर दिखाते रहते थे...हमारा बजाज, हमारा बजाज करते रहते थे...इन बजाजों ने बुधवार को ऐलान कर दिया कि स्कूटर कारोबार को पूरी तरह राम-राम करने जा रहे हैं....अब इन बजजवों को कौन याद दिलाए इनके एड के वो जिंगल, जिनमें कस्मे-वादे किए जाते थे कि बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर आज भी और कल भी हमारे साथ रहेगी... देश की दो पीढ़ियां इस जिंगल को गुनगुनाते हुए ही जवानी से सठियाने की दहलीज पर आ गईं और अचानक ये अलविदा-अलविदा के सुर छेड़ने लगे (लगता है इन्हें भी ब्लॉगरी के ताजा जिन्न ने जकड़ लिया है)...

तो जनाब ये बजाज वाले कह रहे हैं कि उनके स्कूटर के सभी जाने-माने मॉडलों पर परदा गिरने की घड़ी आ गई है..कंपनी ने तीन साल पहले ही चेतक मॉडल बनाना बंद कर दिया था...बजाज ऑटो के मैनेजिंग डायरेक्टर राजीव बजाज के मुताबिक इस कारोबारी साल के अंत तक कंपनी क्रिस्टल सीरीज के स्कूटर का उत्पादन भी बंद कर देगी...1980 के दशक में 'हमारा बजाज' कर्मशियल्स बनाने वाली ऐड एजेंसी लोवे इंडिया के चेयरमैन आर बाल्की कहते हैं, 'कभी घोड़ागाड़ी का वक्त था, अब मोटरसाइकिल का दौर है... 'भारत बदल रहा है, बुलंद बदल रहा है और बजाज भी...' यानि ये सुसर बाइकवा ज्यादा माइलेज देने के चक्कर में स्कूटर पर भारी पड़ गईं...

अब इन मैनेजमेंट गुरुओं को कौन समझाए, स्कूटर जैसा सुख हम पाएंगे कहां...इन हवा-हवाई बाइकों की गद्दी पर खुद ही अपनी उन (बाइक पर ज्यादातर पीछे वो...ही बैठती हैं) के साथ समा जाएं वो ही बड़ी बात है...बाकी सामान रखने की तो सोचो हीं नहीं...और स्कूटर...जनाब पीछे पत्नी (स्कूटर पर पीछे पत्नियां ही बैठती हैं... वो...नहीं)...बीच में एक बच्चा...आगे हैंडल को पकड़े एक बच्चा...आगे का स्टैंड और डिक्की सामान से ठसाठस...चलाने वाले की टांगों के नीचे दोनों तरफ लटकते सब्जियों के बड़े-बड़े थैले...हम इसी अंदाज़ में अपने चेतक महाराज को 18 साल से दौड़ा रहे हैं...कभी तो रतन टाटा की नज़र हमारे पर भी पड़ेगी...शायद तरस खाकर एक अदद नैनो रानी ही तोहफे में हमें भिजवा दें...अब भले ही बाद में एड में अपनी इस दरियादिली को कितना भी कैश कर ले, हमें कोई ऐतराज नहीं होगा...कसम उड़ानझल्ले की....स्टांप पर लिख कर देने को भी अपुन तैयार है...

हां तो लौटता हूं अपने बजाज पर...नंबर यू पी 15...9743...बच्चे इतने बड़े हो गए हैं कि स्कूटर पर हमारे साथ बैठना छोड़ दिया है...बैठना क्या छोड़ दिया, आगे हैंडल के साथ जब बिटिया खड़ी होती थी तो हमें स्कूटर चलाते हुए सिर्फ उसकी चोटी ही नज़र आती थी...सड़क नहीं...बार-बार यही कहते रहते थे....बेटी सिर थोड़ा नीचे...सिर थोड़ा नीचे...एक दिन झक मार के बिटिया ने ऐलान कर दिया लो अब मैं स्कूटर पर कभी चढ़ूंगी ही नहीं...तो जनाब अब मैं और मेरा बजाज...अक्सर ये बाते किया करते हैं...बाते क्या करते हैं स्कूटर ही मुझे संघर्ष फिल्म के दिलीप कुमार की तरह ताने दिया करता है....एक एक करके सब तो आपका साथ छोड़ कर चले गए...एक मैं ही हूं जो साथ दिेए जा रहा हूं....



ये मेरा स्कूटर नहीं है, नेट से ली गई फोटो है...लेकिन कसम से मेरे वाला भी कंपीटिशन में
इस स्कूटर की हालत से कम नहीं है

साथ भी कितना गजब का दिया है साहब...पत्नी लाख हमें मार्निंग वॉक के फायदे समझाती रहती है लेकिन मजाल है कि हम ब्लॉगिंग का परम सुख छोड़कर सुबह कभी सैर पर निकल जाए...लेकिन ये स्कूटर महाराज...इनके आगे हमारा बस भी नहीं चलता...पहले तो ये स्टार्ट होने का नाम ही नहीं लेते...लाख टेढ़ा-मेढ़ा कर लो पर ये इंजन का मधुर राग तभी सुनाएंगे जब इनकी मर्जी हो...अक्सर हम किक मार-मार कर हलकान होते रहते हैं पर चिकने घड़े की तरह स्कूटर जी पर कोई असर नहीं पड़ता...किक मारते मारते जब तक मुंह से हमारी जीभ को बाहर आए निकला न देख ले...ये शुरू नहीं होते...जीभ देखकर जब इन्हें तसल्ली हो जाती है कि हमने ब्रश के साथ टंग-क्लीनर का भी इस्तेमाल किया है, तभी ये अपने ऊपर हमें सवारी गांठने का मौका देते हैं....हां, पत्नी को पता चले न चले लेकिन हमारे स्कूटर महाराज को हमारे वजन से तड़ाक पता चल जाता है कि आज हमने बाज़ार में कुछ पेट फुलाऊ खाने की चीज़ों पर हाथ साफ किया है....रास्ते में चलते-चलते बंद हो जाते हैं....फिर हमें इन्हें कई किलोमीटर खींचना पड़ता है...और जब स्कूटर महाराज जी को ये भरोसा हो जाता है कि हमने जो खाने में एक्स्ट्रा कलरी हड़पी थीं वो सब हजम हो गई हैं तब अचानक झट से स्टार्ट हो जाते हैं...देखा मेरी सेहत का कितना ख्याल...

एक फायदा और सुनिए...अपने राम कभी स्कूटर में ताला नहीं लगाते...(लगाए कहां से चाबी ही पिछले कई सालों से खोई हुई है)...और दावा है कि स्कूटर को कहीं भी खड़ा कर दे, मजाल है कि कोई चोर उसकी तरफ बुरी नज़र उठा कर देखे...हमारे स्कूटर जी माशाअल्लाह है ही इतनी सुंदर हालत में...इतनी बढ़िया कंडीशन में कि चोर भी आएगा तो स्कूटर पर सौ का नोट इस नोट के साथ रखकर चला जाएगा...अबे साले कभी तो सर्विस करा लिया कर...

तो जनाब ऐसा है मेरा बजाज...बेशक स्कूटर की बॉ़डी टेढ़ी हो गई है...स्टैंड वक्त के थपे़ड़ों को सहते-सहते गल कर गिरने को तैयार है...लेकिन टेढ़ा है तो क्या...है तो मेरा है...अब बजाज खुद ही एंटीक के तौर पर मेरे बजाज के लिए लाखों रुपये भी देने को तैयार हो तो क्या, मैं अपने इस जिगर के टुकड़े को बेचना तो दूर इसकी तस्वीर भी कोई न दूं...


स्लॉग ओवर
एक बार नासा (नशा नहीं अमेरिका का स्पेस शटल उड़ाने वाला नासा) वाले परेशान हो गए...कोलंबिया स्पेस शटल उड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था...साइंसदानों ने अक्ल के लाख घोड़े दौड़ा लिए पर कोलंबिया टस से मस होने को तैयार नहीं...झक मार कर दुनिया भर के अखबारों में ऐलान कर दिया कि जो भी इस काम में मदद करेगा उसे लाखों डॉलर ईनाम में दिए जाएंगे...इस ऐलान पर अपने मक्खन की भी नज़र पड़ गई...झट से एंबेसी वालों को फोन लगा दिया...मैं उड़ा सकता हूं कोलंबिया...

लो जी...आनन फानन में सारे अरेंजमेट कर मक्खन जी को फ्लोरिडा में नासा के हेडक्वार्टर पहुचा दिया गया...साइंसदान मक्खन को कोलंबिया के मुआयने के लिए ले गए...मक्खन ने इंस्पेक्शन के बाद इंस्ट्र्क्शन दी....कोलंबिया को थोड़ा बाईं और झुकाओ...फिर कहा...अब इसे दाईं ओर झुकाओ...बस अब सीधा खड़ा कर दो और स्टार्ट करो....

कंट्रोल रूम ने मक्खन के आदेश का पालन किया...ये क्या...कोलंबिया स्टार्ट हुआ और आसमान में ये जा और वो जा....हर तरफ तालियां गूंज उठी....मक्खन जी हीरो बन गए..व्हाइट हाउस में डिनर के लिए मक्खन जी को बुलाया गया...वहां अमेरिकी प्रेसीडेंट ने पूछ ही लिया...मक्खन जी हमारी पूरी साइंस फेल हो गई...आखिर आपने कैसे कोलंबिया को उड़ा दिया....मक्खन का जवाब था...ओ नहीं जी कमाल-वमाल कुछ नहीं...मेरा बीस साल पुराना लैम्ब्रेटा स्कूटर है...जब स्टार्ट नहीं होता तो ऐसा ही उसे टेढ़ा करता हूं...और फिर वो स्टार्ट हो जाता है....

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

दिलीप साहब जिओ हज़ारों साल...खुशदीप

आज दिलीप कुमार साहब का 88 वां जन्मदिन है...मैंने कोशिश की है कि दिलीप साहब के बारे में कुछ ऐसी बातें बताऊं जो आपने पहले न सुनी हो...कलाकार या स्टार आते-जाते रहते हैं लेकिन सदियों में अदाकार-ए-आज़म एक बार ही आता है....दिलीप कुमार अभिनेता के साथ-साथ अभिनय की यूनिवर्सिटी भी है...जिनकी फिल्में देख देख कर ही कई बड़े सितारों ने एक्टिंग सीखी...




यूसुफ़ ख़ान के तौर पर पेशावर के फल-कारोबारी गुलाम सरवर खॉन के यहां 11 दिसंबर 1922 को जन्मे दिलीप कुमार छह भाइयों और छह बहनों में तीसरे नंबर की संतान है...

पेशावर के साथ-साथ दिलीप कुमार के पिता के महाराष्ट्र के देवलाली में भी फलों के बागीचे थे...मुंबई से 200 किलोमीटर दूर देवलाली कैंट स्टेशन में स्कूली पढ़ाई के दौरान दिलीप कुमार का पहला प्रेम फिल्में नहीं फुटबॉल था...देवलाली में दिलीप कुमार आठ साल रहे और इस दौरान उन्होंने एक भी फिल्म नहीं देखी...

देवलाली से पढ़ाई पूरी करने के बाद बोरी बंदर के अंजुमन-ए-इस्लाम हाई स्कूल में दाखिला किया...स्कूली किताबों से ज़्यादा दिलचस्पी फुटबॉल, क्रिकेट और हॉकी में रही...हर इम्तिहान से पहले दिलीप कुमार का एक सहपाठी उन्हें टिप्स दिया करता था जिससे उनकी नैया पार लग जाती...दिलीप साहब आज तक इस राज़ का पता नहीं लगा सके है कि वो सहपाठी कहां से उन टिप्स का जुगाड़ करता था...

मैट्रिक करने के बाद दिलीप कुमार ने विल्सन कॉलेज से आगे की पढ़ाई की...कॉलेज की पूरी पढ़ाई के दौरान उनकी एक भी गर्ल-फ्रैंड नहीं थी...और यही दिलीप कुमार आगे चलकर मैटिनी आइडल बना...

कॉलेज के टाइम दिलीप कुमार फुटबॉल के अलावा अंग्रेजी में बेहतरीन निबंध लिखने के लिए भी जाने जाते थे...1941 में एक बार क्रिसमस पर निबंध में उन्होंने लिखा...क्रिसमस पर विशेष फिल्मों का आकर्षण किसी की जे़ब से बची-खुची रकम भी झटक लेता है...दिलीप साहब के इस निबंध को उनके एक दोस्त ने आज तक संभाल कर रखा है...

कालेज के दिनों से आज तक दिलीप कुमार ने अपना हेयर-स्टाइल नहीं बदला...माथे पर झूलते पफ में सात दशक बाद भी कोई फर्क नहीं आया है...

दिलीप साहब को कालेज के दिनों में अंग्रेज़ी फिल्में देखने का बड़ा शौक था,..सिनेमा हाल के लेफ्ट में सबसे कार्नर वाली सीट को दिलीप साहब फिल्म देखने के लिेए सबसे बढ़िया एंगल मानते हैं

विल्सन कॉलेज और फिर खालसा कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद दिलीप साहब ने पुश्तैनी धंधा अपनाने की जगह खुद की पहचान बनाने का फैसला किया...उस वक्त तक फिल्में दिलीप कुमार के ज़ेहन में दूर-दूर तक नहीं थी...

दिलीप कुमार ने मुंबई से पुणे आकर ब्रिटिश आर्मी में कैंटीन मैनेजर की नौकरी कर ली...इस नौकरी के लिए दिलीप कुमार को 35 रुपये वेतन मिलता था...जल्दी ही दिलीप कुमार को आर्मी मेस में रिफ्रेशमेंट रूम चलाने का ठेका मिल गया...धंधा चल निकला और आमदनी 800 रुपये हर महीने से ऊपर जा पहुंची...उस वक्त 800 रुपये बहुत मोटी रकम मानी जाती थी...

अच्छा खासा बैंक बेलेंस जमा करने के बाद दिलीप कुमार मुंबई वापस आए....उन दिनों बॉम्बे टॉकीज सबसे बड़ा प्रोडक्शन हाउस हुआ करता था...बॉम्बे टॉकीज को सुंदर और अच्छी कद काठी वाले युवा चेहरों की तलाश थी...प्रोडक्शन हाउस के लोगों ने ही बॉम्बे टॉकीज की कर्ता-धर्ता देविका रानी से दिलीप कुमार की मुलाकात कराई...देविका रानी दिलीप कुमार की शख्सीयत और बोलने के अंदाज़ से इतनी प्रभावित हुईं कि बिना स्क्रीन टेस्ट ही उन्हें ज्वार भाटा (1944)के लिए साइन कर लिया...दिलीप कुमार की पहली हीरोइन मृदुला थीं...

तब तक दिलीप कुमार यूसुफ़ ख़ान ही थे...देविका रानी ने ही उनके स्क्रीन के लिए तीन नाम सुझाए थे...जंहागीर, वासुदेव और दिलीप कुमार....युसूफ़ खान को दिलीप कुमार तीनो नामों में सबसे कम पसंद था...लेकिन देविका रानी को यही नाम सबसे ज़्यादा पसंद आया...

ज्वार भाटा रिलीज़ होने के बाद दिलीप कुमार की मोतीलाल जैसे दिग्गज कलाकार ने तारीफ की थी और कहा था कि यही तेवर बनाए रखना, हिंदी सिनेमा तुम्हे सिर-आंखों पर बिठाएगा...बॉम्बे टाकीज से दिलीप कुमार का 625 रूपये महीने पर दो साल का कांन्ट्रेक्ट था,,,

1947-48 में आई मेला और जुगनू ने दिलीप कुमार को स्टार बना दिया...महबूब खान की फिल्म अंदाज (1949) से दिलीप कुमार को ट्रेजिडी कुमार का नाम मिला..अंदाज में दिलीप कुमार के साथ राजकपूर और नर्गिस सह-कलाकार थे...1961 में दिलीप कुमार ने भाई नासिर खान के साथ फिल्म गंगा जमुना का निर्माण किया..फिल्म हिट भी रही लेकिन उसके बाद दिलीप कुमार ने किसी फिल्म का निर्माण नहीं किया...


दुर्लभ चित्र में दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ


1962 में ब्रिटिश निर्देशक डेविड लीन ने लॉरेंस ऑफ अरेबिया में अहम रोल ऑफर किया था जिसे दिलीप कुमार ने स्वीकार नहीं किया...बाद में यही रोल ओमर शरीफ ने किया...
फिल्म ने रिकॉर्डतोड़ सफलता अर्जित की थी...

1966 में सायरा बानू से शादी के वक्त दिलीप कुमार 44 और सायरा बानू 22 साल की थीं...शादी के बाद दिलीप कुमार की एक संतान भी हुई लेकिन जीवित नहीं रह सकी...उसके बाद उनकी कोई संतान नहीं हुई...

1998 में आई किला दिलीप कुमार की आखिरी रिलीज फिल्म थी...1994 में मुगले-आजम और 1997 में नया दौर को कलर करने के बाद दोबारा रिलीज किया था...

धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन समेत तमाम कलाकारो के दिलीप कुमार रोल मॉडल रहे हैं...


दिलीप कुमार की नसीहत

करीब साढ़े पांच दशक के एक्टिव करियर मे दिलीप कुमार ने सिर्फ 61 फिल्मों में काम किया... दिलीप कुमार का हमेशा मानना रहा है कि कलाकार को गुलाब की पंखुड़ियों की तरह एक-एक करके खिलना चाहिए...ये नहीं कि एक ही बार में अपना सब कुछ दिखा दिया...यही वजह है कि दिलीप कुमार ने क्वाटिंटी से ज़्यादा क्वालिटी पर ध्यान दिया...लेकिन कलाकारों की आजकल की पीढ़ी के लिए पैसा ही ईमान है...पैसा मिले तो इन्हें शादियों में नाचने से भी गुरेज नहीं...

स्लॉग गीत

नैन लड़ गई रे मनवा मा कसक भई करी
प्रेम का छुटवत पटाखा धमक होई न करी
(फिल्म गंगा जमुना, गायक-मोहम्मद रफ़ी)

गाना देखने-सुनने के लिए यू-ट्यूब लिंक

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

हो सके तो भूल जाना...खुशदीप

जी हां...अब आपका साथ छोड़ कर जाने का वक्त आ गया है...इस साथ में खट्टे मीठे कई तरह के लम्हे आए...कभी-कभार मौका मिले तो बस हल्की सी याद कर लीजिएगा...यही दस्तूर है...कोई कर भी क्या सकता है...आना-जाना सब कुछ तय होता है...एक सेकंड भी कम या ज़्यादा नहीं...बस अब आप जाने वाले को बीता वक्त समझ कर भूल जाइएगा और आने वाले का दिल खोल कर स्वागत कीजिए...मुझे तो आप लाख कोशिश करें, अब नहीं रोक सकते...वक्त आते ही अंपायर की उंगली उठने का इंतेजार किए बिना ही पवेलियन लौट जाना है...बिना कोई विरोध...नेताओं जैसे बिना कोई नाज़-नखरे दिखाए...विदा तो विदा...हमेशा-हमेशा के लिए...कोई कितना भी बुलाए, मुड़ कर फिर वापस नहीं आ सकता...यही पूर्वजों से सीखा है...

तो जनाब 22 दिन और...फिर बस मैं इतिहास की तारीख हूंगा...मेरा दावा है आप सब नए मेहमान के आने की खुशी में इतने मस्त हो जाएंगे कि मेरी बस हल्की सी याद आ जाए तो वही बड़ी बात होगी...बस यही कोशिश है कि जितने दिन बाकी बचे हैं, आपका ज़्यादा से ज़्यादा प्यार बटोर लूं...

आपका अपना
वर्ष 2009

(हा...हा...हा...मैं पहला शख्स हूंगा जो आपको नववर्ष की शुभकामनाएं दे रहा हूं...वर्ष 2010 आप सब के लिए मंगलमयी हो...ये साल आपके लिए बस खुशियां ही खुशियां लाए, यही प्रार्थना है)

तो साहिबान-मेहरबान जिस तरह मदारी डुगडुगी बजाकर अपने तमाशे के लिए सब को बुलाता है...ठीक वैसे ही मैंने ये सारा नाटक आपको पोस्ट के अंदर लाने के लिए रचा...दरअसल नौ दिसंबर को हिंदी कविता की महान विभूति रघुवीर सहाय जी की 80वीं जयंती थी....बस रघुवीर जी की ही एक कविता आपको पढ़ाना चाहता था...कविता क्या पूरी नसीहत है कि हंसने के वक्त क्या-क्या सावधानी बरतनी चाहिए...वैसे अगर ऊपर नववर्ष की भूमिका नहीं बांधता और पोस्ट का शीर्षक लगा देता...रघुवीर सहाय की एक कविता....तो सिवाय रघुवीर जी के अनन्य भक्तों के शायद ही
कोई और इस पोस्ट के अंदर झांकने के लिए आता...

रघुवीर जी की कविता पर जितनी गहरी पकड़ थी, लघु कथा पर भी उतना ही अधिकार था....पत्रकारिता का ये उनका हुनर ही था कि वो 1969 से 1982 तक दिनमान के संपादक रहे....रघुवीर जी को 1984 में कालजयी रचना...लोग भूल गए हैं...के लिए साहित्य अकादमी अवार्ड मिला...30 दिसंबर 1990 को रघुवीर जी ने 61 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहा...


रघुवीर सहाय 1929-1990

अब आपको और ज़्यादा घुमाए बिना सीधे आता हूं रघुवीर जी की उस कविता पर जिसके लिए मैंने ये पोस्ट लिखी...

हँसो हँसो जल्दी हँसो

हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही है


हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगी


और तुम मारे जाओगे


ऐसे हँसो कि बहुत खुश न मालूम हो


वरना शक होगा कि यह शख्स शर्म में शामिल नहीं


और मारे जाओगे



हँसते हँसते किसी को जानने मत दो किस पर हँसते हो


सब को मानने दो कि तुम सब की तरह परास्त होकर


एक अपनापे की हँसी हँसते हो


जैसे सब हँसते हैं बोलने के बजाए



जितनी देर ऊंचा गोल गुंबद गूंजता रहे, उतनी देर


तुम बोल सकते हो अपने से


गूंज थमते थमते फिर हँसना


क्योंकि तुम चुप मिले तो प्रतिवाद के जुर्म में फंसे


अंत में हँसे तो तुम पर सब हँसेंगे और तुम बच जाओगे



हँसो पर चुटकलों से बचो


उनमें शब्द हैं


कहीं उनमें अर्थ न हो जो किसी ने सौ साल साल पहले दिए हों



बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हँसो


ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे


और ऐसे मौकों पर हँसो


जो कि अनिवार्य हों


जैसे ग़रीब पर किसी ताक़तवर की मार


जहां कोई कुछ कर नहीं सकता


उस ग़रीब के सिवाय


और वह भी अकसर हँसता है



हँसो हँसो जल्दी हँसो


इसके पहले कि वह चले जाएं


उनसे हाथ मिलाते हुए


नज़रें नीची किए


उसको याद दिलाते हुए हँसो


कि तुम कल भी हँसे थे !

—————- रघुवीर सहाय



स्लॉग ओवर

मक्खन के घर एक दिन कॉकरोच का पाउडर बेचने वाला आया...सेल्समैन ने पाउडर की शान में कसीदे पढ़ते हुए मक्खन से कहा कि एक बार इसे ले लेंगे तो हमेशा याद रखेंगे...

मक्खन ने कहा कि नहीं बाबा नहीं उन्हें काकरोच के लिए पाउडर-वाउडर नहीं चाहिए...

अब जो ढीठ नहीं वो सेल्समैन ही कहां...उसने फिर मक्खन से कहा...आपको ऐसा मौका फिर कभी नहीं मिलेगा...एक बार पाउडर लेकर तो देखिए....

इस पर मक्खन का जवाब था...नहीं कह दिया तो मतलब नहीं...हम अपने काकरोच की आदत नहीं बिगाड़ना चाहते...आज पाउडर मिला और कल वो डिओ की डिमांड करने लगे तो...