शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

समाज को बदल डालो...खुशदीप

अच्छा लगा कि सबने महावीर और जानकी के हवाले से समाज के एक अपवाद पर शिद्दत के साथ विमर्श में हिस्सा लिया...बिना किसी कटुता सबने खुल कर अपनी बात कही...लेकिन मेरी इस चर्चा को शुरू करने के पीछे ये मंशा कतई नहीं थी कि 22 साल के महावीर और 60 साल की जानकी देवी के पति-पत्नी बनने को हाईलाइट करूं...ये शादी बेमेल है, ये मैं भी मानता हूं...सेक्स के नज़रिए से तो ये शादी हर्गिज कामयाब नहीं हो सकती..ये मैं भी जानता हूं...लेकिन यहां सिर्फ एक व्यवस्था को शादी का नाम दिया गया है...यहां शादी की सफलता की बात करना ही बेमानी है...लेकिन मेरा ये सवाल उठाने का मकसद उम्र के फर्क को दर्शाना नहीं था...मेरा आग्रह था कि बूढ़ी और विधवा मां को घर में उसके बेटों ने प्रताड़ित किया...काम न करने पर खाने तक को मोहताज कर दिया...घर से बाहर निकाल फेंका...ऐसे में जानकी ने महावीर में सहारा ढूंढ लिया तो क्या गलत किया...


अब मैं आपसे पूछता हूं कि हमारे समाज में कोई घऱ वालों की उपेक्षा और तिरस्कार के चलते भूखा मर रहा होता है तो हम उसकी क्या मदद करते हैं...कहीं कहीं ये डर भी हमें मदद करने से रोक सकता है कि दूसरे के लफड़े में हम क्यों टांग अड़ाएं...फिर पीड़ित के घर वालों से दुश्मनी मोल लेने का खतरा अलग...पीड़ित के घर वाले तो झूठे अंहकार के चलते चाहेंगे कि बुजुर्ग घर में पीसते रहें और उफ भी न करें...मेरा कहना है कि ऐसे समाज को ही बदल डालो...

हमारे समाज में ऐसे दुबले-कुचले भी है जब भूख हद से बाहर हो जाती है तो वो धर्म परिवर्तन तक कर लेते हैं...ये सच है कि जो धर्म परिवर्तन कराता है, उसका अपना स्वार्थ होता है...और जब जिंदा रहने के लिए कोई अपना धर्म तक छोड़ने के लिए मजबूर हो जाता है...तो उसके समाज को उसकी याद आती है...नैतिकता की दुहाई देनी शुरू हो जाती है...यही सुध तब क्यों नहीं आती जब वो भूख से मर रहा होता है...

खैर ये पहलू चर्चा को अलग ट्रैक पर ले जा सकता है...आता हूं फिर उसी मुद्दे पर...परिवेश के मुद्दे पर...जो महावीर और जानकी देवी की कहानी का असली खलनायक है...कल मैंने मिडिल क्लास के परिवेश पर बनी फिल्म का हवाला दिया था...मेरी पिछली पोस्ट पर राज भाटिया जी की ये टिप्पणी भी आई कि कहीं चर्चा का रुख फिल्मों की तरफ न मुड़ जाए...राज जी, मैं यहां विषयवस्तु से जुड़ी फिल्मों के जरिए ही अपनी बात कहने की कोशिश कर रहा हूं...जिस फिल्म का भी मैं उल्लेख कर रहा हूं...वो उसके परिवेश को हाईलाइट करने के लिए ही कर रहा हूं...साथ ही ये बताने का प्रयास भी है कि उम्र के फर्क के बावजूद नारी और पुरुष का नजदीक आना हर परिवेश में देखा जा सकता है...

तो आज राजसी ठाठबाट और विदेश के मिलेजुले हाईक्लास परिवेश पर बनी फिल्म लम्हे की कहानी का जिक्र करता हूं...1991 में आई लम्हे को यश चोपड़ा ने अपने प्रोडक्शन में ही निर्देशित किया था...कहानी का सार इस प्रकार है...

वीरेन (अनिल कपूर) लंदन का युवा व्यवसायी है...लेकिन उसकी जड़े राजस्थान की राजपूतानी आन-बान-शान मे हैं..वो अपनी गवर्नेस दाईजा (वहीदा रहमान) के साथ राजस्थान आता है तो उसकी मुलाकात उम्र में बड़ी पल्लवी (श्रीदेवी) से होती है...उम्र का फर्क ये ज़्यादा नहीं है...वीरेन मन ही मन पल्लवी को चाहने लगता है...लेकिन पल्लवी की चाहत वीरेन नहीं कोई और होता है...वीरेन को ये पता नहीं होता...लेकिन अचानक पल्लवी के पिता की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो जाती है...वहीं पहली बार वीरेन का सामना विनोद से होता है...विनोद यानी पल्लवी की चाहत...मरने से पहले पल्लवी का पिता वीरेन से पल्लवी और विनोद की शादी कराने का वादा लेता है...वीरेन का दिल टूट चुका होता है लेकिन वो पल्लवी और विनोद की शादी कराने के बाद लंदन लौट जाता है...एक साल बाद पल्लवी और विनोद की सड़क हादसे में मौत हो जाती है...लेकिन मरने से पहले पल्लवी एक बेटी को जन्म दे जाती है...इस बेटी का नाम पूजा रखा जाता है...पूजा हर वक्त दाईजा से वीरेन की बातें सुन-सुन कर ही बड़ी होती है...उसकी शक्ल भी मां (पल्लवी)से हूबहू मिलती है...वीरेन कई साल बाद राजस्थान आता है तो पूजा को देख कर हैरान रह जाता है...इतने सालों में भी वीरेन पल्लवी की याद को दिल से जुदा नहीं कर पाया होता...पूजा में ही पल्लवी का चेहरा देखकर वीरेन परेशान हो जाता है...उधर पूजा की नजर में वीरेन उसके कुंवर साहब है जिसके सपने वो बचपन से जागते-उठते देखती आई है...वीरेन को बूढ़ी दाईजा की हालत को देखते हुए उन्हें लंदन ले जाने का फैसला करना पड़ता है...दाईजा को पूजा को भी साथ ले जाना पड़ता है...लंदन में वीरेन की एक दोस्त है अनीता...पूजा लंदन में भी हर वक्त वीरेन को कुंवर साहब, कुंवर साहब कहते कहते उसके पीछे पड़ी रहती है...अनीता को पूजा का ये व्यवहार पसंद नहीं आता...लंदन में ही वीरेन के कमरे में पल्लवी की पेंटिग देखकर पूजा को गलतफहमी हो जाती है कि वीरेन भी उसे पसंद करता है....एक बार अनीता की पूजा से तकरार भी हो जाती है...अनीता पूजा से पूछती है कि वो किस रिश्ते से वीरेन पर इतना हक जताती है...वीरेन उसका लगता ही क्या है...इसका जवाब पूजा ये कह कर देती है कि जैसे वीरेन उसका कुछ नहीं लगता वैसे ही वो अनीता का भी कुछ नहीं लगता...वीरेन पूजा की ये हरकते देखकर अनीता से शादी करने का फैसला कर लेता है...वीरेन पूजा से भी साफ कह देता है कि वो उससे नहीं उसकी मां पल्लवी से प्यार करता था...वीरेन दाईजा से भी कहता है कि राजस्थान जाकर पूजा के लिए कोई अच्छा सा लड़का ढूंढकर उसकी भी शादी कर दे...पूजा राजस्थान वापस आ जाती है...पूजा का दिल टूटा होता है..राजस्थान मे लोकसंगीत के जरिए पूजा अपनी बात कह रही होती है...कि भीड़ में उसे वीरेन दिखता है...वीरेन को भी लंदन से पूजा जाने के बाद अहसास होता है कि पहले पल्लवी की जो जगह उसके दिल में थी, वहां अब पूजा आ चुकी है...दोनों के मिलने के साथ ही फिल्म का अंत हो जाता है...यानी वीरेन ने एक लिहाज से अपनी बेटी की उम्र बराबर पूजा का ही जीवनसाथी बनना कबूल कर लिया...फिल्म का ये अंत दर्शक पचा नहीं पाए और फिल्म बुरी तरह फ्लाप हो गई...

कहते हैं फिल्में समाज का आईना होती हैं और समाज में बदलाव का भी...लेकिन लीक से हटकर कोई भी बात होती है तो उसे समाज बर्दाश्त नहीं कर पाता... रियल लाईफ में भी रील लाइफ में भी...परिवेश चाहे कोई भी हो समाज की सोच में ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता...इसीलिए महावीर और जानकी की कहानी के साथ फिल्मों का मैं जिक्र कर रहा हूं....आशा है मेरा पाइंट ऑफ व्यू आप तक पहुंच गया हो गया...

बस अब असली परिवेश यानी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म की बात रह गई है...उसका जिक्र वैसे तो मैं कल ही करता लेकिन एक बेहद जरूरी निजी प्रायोजन की वजह से मुझे दो दिन के लिए शहर से बाहर जाना पड़ रहा है...इसलिए आपसे आग्रह है कि आप दो दिन के लिए मुझे छुट्टी देंगे...बाकी मिलते हैं ब्रेक के बाद...

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009

महिमा मंडन नहीं डूब कर मर जाने का मन...खुशदीप

महावीर और जानकी देवी के बेमेल जोड़ पर जमकर विमर्श हुआ...कोई गलत नहीं है...हर किसी की अपनी राय है...और हर राय का सम्मान किया जाना चाहिए...कुछ टिप्पणियां ऐसी भी आईं कि उन्हें विमर्श के निचोड़ का इंतज़ार है...निर्णय का इंतज़ार है...पहली बात तो ये कि यहां कोई पंचायत नहीं लगी थी जो फैसला सुनाए...और वैसे भी मैं और मसूर की दाल...मेरी हैसियत ही क्या जो फैसला सुनाऊं...

कल जो मैंने  3 फिल्मों के ज़रिए आप से अपनी बात कहने का वादा किया था, उस पर आने से पहले दो-तीन बातें साफ़ कर दूं...

पहली बात-

ये महावीर और जानकी देवी के वाकये की जो महिमा-मंडन की बात की जा रही है...वो महिमा मंडन नहीं बल्कि हमारे समाज में ऐसे वाकये होते हैं...ये जान कर डूब कर मर जाने वाली बात है...ये महावीर-जानकी की कहानी का सेलिब्रेशन नहीं बल्कि समाज का सफोकेशन है...जहां तक महावीर को प्रचार देना है तो उस बेचारे को तो पता भी नहीं होगा कि ब्लॉग के ज़रिए उसकी कहानी पर इतनी ज्वलंत बहस हो रही है...

दूसरी बात-

अगर महावीर बेटा बनकर जानकी देवी के साथ रहने लगता तो क्या सड़े-गले दिमाग वाले उनके खिलाफ उलटी-सीधी बातें करना बंद कर देते...वो भी खासकर उस परिवेश में जिस में महावीर और जानकी रहते हैं...

ये सब मानते हैं कि इस कहानी का असली खलनायक परिवेश है.. महावीर और जानकी देवी के फैसले को पूरी तरह गलत बताने वाले भी मानते हैं कि हालात ने उन्हें ऐसे मोड़ पर ला दिया जहां उन्हें पति-पत्नी बनना ही सबसे बेहतर विकल्प नज़र आया...

हां तो यहां परिवेश सबसे बड़ा दुश्मन है, इसलिए मैंने तीन अलग-अलग काल की अलग-अलग परिवेश की तीन फिल्मों को चुना है...

एक परिवेश गांव का है...एक परिवेश हम शहर में रहने वाले या मिडल क्लास का है...एक परिवेश राजसी के साथ विदेश से भी जुड़ी हाईक्लास का है...तीनों ही फिल्मों में नायक और नायिका या नायिका और नायक की उम्र में काफी अंतर है...एक पोस्ट में एक ही फिल्म का जिक्र ढंग से कर पाऊंगा, इसलिए विमर्श को मुझे दो दिन और बढ़ाना पड़ेगा...

पहले उस परिवेश की फिल्म पर आता हूं जो हमारे शहरी या मिडिल क्लास जीवन से सबसे ज़्यादा मेल खाती है...ये फिल्म थी 1977 में आई- दूसरा आदमी...रोमानी रिश्तों में महारत रखने वाले यश चोपड़ा ने इस फिल्म का निर्माण किया था...और रमेश तलवार ने निर्देशन...

फिल्म का सार कुछ इस तरह है...निशा (राखी गुलजार) एक सफल आर्किटेक्ट है...अपनी पहचान है...निशा का एक हमउम्र प्यारा सा दोस्त भी है शशि सहगल (शशि कपूर)...खुशदिल और दूसरों को हरदम हंसाने वाला इंसान...लेकिन एक हादसे में शशि की मौत हो जाती है...ये हादसा निशा को अंदर से तोड़ कर रख देता है...तभी निशा की मुलाकात अपने से उम्र में कहीं छोटे और जवांदिल करन सक्सेना (ऋषि कपूर) से होती है...करन की घर में सुंदर सी पत्नी टिम्सी (नीतू सिंह) भी है...दूसरों की मदद को हर दम तैयार रहने वाला करन निशा को अपनी कंपनी में नौकरी दे देता है...निशा को करन के हर अंदाज़ में शशि नज़र आने लगता है...करन भी निशा की ओर खिंचा चला जाता है...दोनों को ही एक-दूसरे का साथ अच्छा लगने लगता है...काम के दौरान साथ रहने का उन्हें वक्त भी काफी मिल जाता है...लेकिन दोनों मर्यादा की हद कभी नहीं लांघते...लेकिन इस नज़दीकी की वजह से करन अपनी पत्नी टिम्सी से दूर होने लगता है...टिम्सी के कोई सवाल पूछने पर करन अक्सर झल्लाहट का इज़हार करने लगता है...

करन की निशा के लिए दीवानगी इतनी बढ़ जाती है कि वो बीच की सारी दूरियां मिटाने के लिए बेताब हो जाता है...यहां फिल्म में निशा और करन पर फिल्माए एक गाने का ज़िक्र करना बहुत ज़रूरी है...

क्या मौसम है दीवाने दिल,
अरे चल कहीं दूर निकल जाए...
कोई हमदम है, चाहत के काबिल,
तो किस लिए हम संभल जाएं...
इतने करीब आएं कि एक हो जाएं हम
एक हो जाएं हम,
कि दुनिया को नज़र नहीं आए हम...

निशा और करन के बीच सारी दीवार टूटने वाली ही होती हैं और करन गा रहा होता है किस लिए हम संभल जाएं...तभी निशा का विवेक जाग जाता है और वो करन को ये कह कर रोकती है...

अच्छा है, संभल जाएं हम...

यानी यहां आधुनिक होते हुए भी निशा ने समाज के उसूलों का मान रखा और जो उचित भी था, करन को अपनी पत्नी टिम्सी के पास वापस लौटना पड़ा...

कल मैं राजसी और विदेश की पृष्ठभूमि वाली, साथ ही नायक और नायिका की उम्र मे फर्क वाली फिल्म का जिक्र करूंगा...और परसों महावीर और जानकी से जो परिवेश सबसे ज़्यादा मिलता है यानि की गांव का, उस परिवेश में बनी फिल्म के उल्लेख के साथ इस विमर्श की इतिश्री करूंगा...

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2009

वो पढ़ा तो इसे भी पढ़ लीजिए...खुशदीप

महावीर और जानकी देवी की कहानी पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली...
इस पोस्ट को न पढ़ें...खुशदीप
कुछ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महावीर और जानकी देवी को उम्र का फर्क देखते हुए शादी नहीं करनी चाहिए थी...समाज का दस्तूर इसे मान्यता नहीं देता...कुछ ने कहा कि महावीर दत्तक पुत्र बनने जैसा कोई रास्ता निकाल सकता था...एनजीओ की मदद ले सकता था...शासन को शिकायत कर सकता था...कुछ ने महावीर के कदम को सही बताया...कुछ ने कहा जिस परिवेश में महावीर और जानकी देवी रहते हैं उसे समझे बिना कुछ कहना उचित नहीं होगा...कुछ अनिर्णय की स्थिति में दिखे...यानि कह नहीं सकते थे कि 22 साल के महावीर और 60 साल की जानकी देवी ने पति-पत्नी बनकर सही किया या नहीं...एक-आध टिप्पणी तो ऐसी भी आई...पहले महावीर के कदम को सही ठहराया...फिर उसे बदलते हुए महावीर के कदम को अगली टिप्पणी में गलत ठहरा दिया गया...यानि महावीर और जानकी को लेकर बंटी हुई राय सामने आईं...

इन सारी टिप्पणियों को पहली बात विवाद के तौर पर न देखा जाए..मेरी नज़र में ये संवाद है...समाज को उद्वेलित करने वाले मुद्दों पर इसी तरह खुल कर विमर्श होना चाहिए...इसी सिलसिले को आगे बढ़ा रहा हूं......पहली बात तो ये हम सब नेट का इस्तेमाल करते हुए ब्लॉगिंग कर रहे हैं...इसलिए दो जून की रोटी और सिर पर छत का जुगाड़ करना हमारी चिंता नहीं है...हम पढ़े-लिखे हैं...हमारी चिंता बौद्धिक खुराक की है...ज़िंदगी में मिली सभी सुविधाओं के बीच हमारे लिए कोई राय कायम कर लेना आसान है...नैतिकता पर लैक्चर पिला देना आसान है...लेकिन महावीर और जानकी देवी का माहौल हमसे बिल्कुल अलग है...जैसा हम सोच सकते हैं, इस तरह की शिक्षा का सौभाग्य महावीर-जानकी को नहीं मिला है...हम जीने के लिए हर तरह की सुविधाएं चाहते हैं...लेकिन महावीर और जानकी के लिए तो जीना ही सबसे बड़ी सुविधा है...मेरा ये सब लिखने का मकसद महावीर और जानकी की वकालत करना नहीं है...ये भी कहा गया जो भी हो महावीर और जानकी ने जो किया उसे अनुकरणीय नहीं कहा जा सकता...सोलह आने सच बात है...किसी को भी इसका अनुकरण नहीं करना चाहिए...लेकिन कम से कम ये तो सोचा जाए कि किन हालात में जीते हुए आखिरी विकल्प के तौर पर महावीर और जानकी देवी को पति-पत्नी बनने का फैसला लेना पड़ा...जाहिर है हम उस परिवेश में जा नहीं सकते...इसलिए उस मानसिक स्थिति से भी नहीं गुजर सकते जिससे महावीर और जानकी देवी को दो-चार होना पड़ा...
 
मुझे यहां एक बात और खटकी...महावीर और जानकी के रिश्ते को सिर्फ सेक्स के नज़रिए से ही क्यों देखा गया...हाई क्लास सोसायटी में लिव इन रिलेशन को मान्यता मिल सकती है...पेज थ्री पार्टियों की चकाचौंध के पीछे वर्जनाओं के टूटने के अंधेरे का नज़रअंदाज किया जा सकता है...लेकिन समाज में निचली पायदान पर खड़ा कोई महावीर या कोई जानकी इस तरह का कदम उठता है तो हम सबको ये नितांत गलत नज़र आने लगता है...
 
विमर्श जारी रखिए...कल मैं तीन अलग-अलग कालों में उम्र के फर्क की पृष्टभूमि में औरत और मर्द के संबधों को लेकर बनी तीन फिल्मों के ज़रिए इस बहस को निर्णायक मोड़ तक पहुंचाने की कोशिश करूंगा...
 
(इस तरह के विमर्श के साथ स्लॉग ओवर बेमेल नज़र आता है...इसलिए स्लॉग ओवर दो दिन के ब्रेक पर...) 
 

बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

इस पोस्ट को न पढ़ें...खुशदीप

अगर आप चटखारे वाला कुछ पढ़ना चाहते हैं तो इस पोस्ट को न पढ़ें...ये पोस्ट जिन दो लोगों के बारे में हैं उनके कोई मायने नहीं हैं...न सरकार के लिए, न समाज के लिए...उनके दुनिया में होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता...लेकिन और किसी को फर्क पड़े न पड़े उन दोनों को एक-दूसरे के दर्द से पड़ता है...

मैं जिन दो लोगों की बात कर रहा हूं न तो वो किसी महानगर से हैं...न ही उनके चिकने-चुपड़े चेहरे हैं...फिर उनकी दास्तान खबर बने भी तो क्यों बने...उनकी कहानी से आपका कोई वास्ता बेशक हो न हो लेकिन वो किसी दूसरी दुनिया से नहीं है...हमारे जैसे ही हाड-मांस के बने इंसान है...मैं बात कर रहा हूं महावीर और जानकी की...उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले के सकारन गांव में रहने वाले 22 वर्षीय महावीर ने 60 साल की विधवा जानकी देवी की मांग में सिंदूर भरा है...बाकायदा अपनी पत्नी मान लिया है...दादी की उम्र वाली पत्नी...महावीर ने ये दौलत-जायदाद के लालच में नहीं किया है...न ही जानकी देवी पर लट्टू हो कर मुहब्ब्त वाला कोई किस्सा है...फिर उम्र के इतने फर्क के बावजूद शादी का फैसला क्यों...महावीर ने जानकी देवी की मांग में सिंदूर भर कर पत्नी तब बनाया जब जानकी देवी को उनके बेटों ने घर के बाहर निकाल दिया...

जानकी देवी के पति की तीन साल पहले मौत हो गई थी...तभी से वो अपने बेटों के साथ रह रही थीं...लेकिन बेटों ने जानकी को साफ कर दिया था कि उसे खुद काम करके अपना पेट पालना होगा...जानकी देवी को इस उम्र में मजदूरी कर दो जून की रोटी का इंतज़ाम करना पड़ता था...महावीर से उनकी मुलाकात भी एक इमारत के लिए मजदूरी करने के दौरान ही हुई...जानकी देवी ने काम के दौरान ही महावीर को बताया कि घर पर अपने कैसा बुरा बर्ताव करते है...नरम दिल महावीर को जानकी देवी का दुखड़ा सुनकर हमदर्दी हो गई...

महावीर से जो थोड़ा बहुत बन पाता था पैसे से कभी कभी जानकी देवी की मदद कर देता था...लेकिन एक दिन साइकिल से महावीर जानकी देवी को उनके घर छोड़ने के लिए पहुंचा तो वहां का नजारा देखकर दंग रह गया...जानकी देवी के बेटों ने बुरा-भला कहते हुए घर में घुसने नहीं दिया...साथ ही अपने लिए रहने का कहीं और ठिकाना ढूंढने का फरमान सुना दिया...

महावीर ने उसी वक्त जानकी देवी को पत्नी बनाने का फैसला कर लिया...जानकी देवी की मांग में महावीर के सिंदूर भरने के बाद तो जैसे पूरे गांव में ही तूफान आ गया...नैतिकता की दुहाई देते हुए हर कोई महावीर और जानकी देवी का दुश्मन बन गया...जान से मारने की धमकियां दी जाने लगीं तो दोनों ने पुलिस का दरवाजा खटखटाया...

महावीर और जानकी देवी दोनों बालिग है और कानूनन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नही की जा सकती...इलाके के थानेदार का कहना है कि महावीर और जानकी देवी की शादी से सबसे ज़्यादा परेशानी उनके घर वालों को है...दोनों की जान को खतरा देखते हुए पुलिस ने हर मुमकिन मदद का वादा किया है...लेकिन पुलिस क्या 24 घंटे सुरक्षा दे पाएगी...ये अपने आप में बड़ा सवाल है...

(स्कैनिंग की सुविधा न होने की वजह से मैं महावीर का जानकी देवी की मांग में सिंदूर भरने वाला फोटो लोड नहीं कर पा रहा हूं...)

स्लॉग ओवर
एक डॉक्टर के क्लीनिक पर एक सज्ज्न पुरुष शाम को पहुंचे...एक घंटा क्लीनिक के रिसेप्शन पर बैठ कर वापस चले गए...यही सिलसिला चार-पांच दिन तक चलता रहा...न वो डॉक्टर को दिखाते और न ही रिसेप्शनिस्ट से एपांइटमेंट के लिए कोई बात करते...एक दिन रिसेप्शनिस्ट से रहा नहीं गया और उसने डॉक्टर से शिकायत कर दी...डॉक्टर ने कहा कि अब जो वो कभी आए तो मुझे बताना...

सज्जन पुरुष फिर पहुंचे तो डॉक्टर ने रिसेप्शनिस्ट से अपने केबिन में भेजने के लिए कहा....डॉक्टर ने पूछा कहिए मिस्टर क्या परेशानी है......रोज आते हो एक घंटा बैठकर चले जाते हो, ...क्या किसी को दिखाना है...

सज्जन पुरुष बोले...नहीं डॉक्टर साहब, मैं दिखाने नहीं मैं तो खुद देखने आता हूं...आप ही ने बाहर बोर्ड लगा रखा है न...महिलाओं को देखने का समय...शाम 5 से 6 बजे तक...

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

आपके बच्चों का रोल मॉडल कौन...खुशदीप

क्या आपको पता है आपके बच्चे क्या बनना चाहते हैं...कौन है जो आपके बच्चों को सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है...कौन है वो जिसके हर काम से बच्चे अपने को जोड़ कर देखते हैं...शाहरुख ख़ान, कैटरीना कैफ़, सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी, सानिया मिर्जा या राहुल गांधी...जी नहीं, इनमें से किसी भी शख्सीयत में वो दम नहीं कि आपके बच्चों पर असर डाल सके...

ये मैं नहीं कह रहा...दिल्ली में पब्लिक स्कूलों के बच्चों पर किए गए एक सर्वे से चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं...इस सर्वे में 13 से 18 साल की उम्र के 500 बच्चों से सवाल पूछे गए...आम धारणा यही है कि बच्चे क्रिकेटर्स और फिल्म स्टॉर्स से सबसे ज़्यादा प्रभावित रहते हैं...जी नहीं सर्वे बताता है कि आदर्शवादी स्वतंत्रता सेनानियों, इतिहास पुरुषों या लैब में काम करने वाले धीर गंभीर वैज्ञानिकों को क्रिकेटर्स या फिल्म स्टार्स के मुकाबले ज़्यादा पसंद मिलीं...और सबसे ऊंचा आंकड़ा रहा बच्चों के खुद मां-बाप का...जी हां...सर्वे में बच्चों ने सबसे ज़्यादा राय अपने मां-बाप जैसा ही बनने की जाहिर की...नीचे पसंद के क्रम के अनुसार फेहरिस्त में वो नाम हैं जिन्हें बच्चों ने अपना रोल मॉडल बनाना चाहा...

माता-पिता 30%
स्वतंत्रता सेनानी इतिहास पुरुष 13%
शिक्षक 13%
वैज्ञानिक सामाजिक कार्यकर्ता 10%
बिज़नेसमैन 9%
मीडिया 7%
खिलाड़ी 6%
राजनेता 2%

मैक्स हेल्थकेयर हॉस्पिटल चेन के सलाहकार और जानेमाने मनोवैज्ञानिक डॉ समीर पारिख की अगुवाई वाली टीम की ओर से जारी किए नतीजों के मुताबिक सर्वे में हिस्सा लेने वाले 500 बच्चों में से सिर्फ 10 ने ही राजनेताओं को अपना रोल मॉडल बताया...

सर्व के नतीजों को देखते हुए विज्ञापन तैयार करने वाले एडगुरु भी मार्केटिंग की रणनीति में बदलाव करने की सोच रहे हैं...रियल्टी चैनल की तरह अब विज्ञापनों में भी मां-बाप ज्यादा से ज्यादा प्रोडक्ट्स की तारीफ करते नज़र आएं तो कोई बड़ी बात नहीं...बच्चों से अगर माता-पिता कुछ कहते हैं तो उसके मायने धोनी या शाहरुख़ की कही गई बात से ज़्यादा होंगे...

वैसे भी आपने देखा होगा कि माता-पिता में से जो भी कामकाजी है, उसके आचरण का बच्चों पर सीधा असर पड़ता है...इसे ऐसे समझा जा सकता है कि कोई पुलिस इंस्पेक्टर का बेटा है...और इंस्पेक्टर का सारा ध्यान हमेशा ऊपर की कमाई पर लगा रहता है...तो बेटा भी कहीं न कहीं आसान कमाई का रास्ता ढूंढने की कोशिश करेगा...और अगर इंस्पेक्टर ईमानदार है तो बेटा भी ऐसा ही करियर बनाना चाहेगा जहां भ्रष्टाचार या बेईमानी की कोई गुंजाइश न हो...

अब आप भी हमेशा याद रखें कि घर में बच्चों की आप पर नज़र है.. क्या सोच रहे हैं...बस शुरू हो जाएं बच्चों को इम्प्रेस करने के लिए...

स्लॉग ओवर
ये कलयुग नहीं तो और क्या है बच्चे ब्लू फिल्म देख रहे हैं...

मां-बाप उन्हें रोकने की जगह और खुश हो रहे हैं...

कुछ मां-बाप खुश तो क्या बच्चों से फिल्म के सीन्स पर डिस्कशन भी कर रहे हैं...

( अरे जनाब मैं अक्षय कुमार की ताजा रिलीज फिल्म ब्लू की बात कर रहा हूं...आप क्या समझे थे...आप भी न बस...)
(साभार- विवेक रस्तोगी, कल्पतरू)

रविवार, 25 अक्तूबर 2009

अर्थ का अनर्थ...खुशदीप

कहने को सिर्फ पूर्ण विराम है...लेकिन ये छोटा सा पूर्ण विराम अगर सही जगह पर न रहे तो गजब ढा सकता है...क्या गजब ढा सकता है आज अपनी माइक्रोपोस्ट में यही आपको बताने जा रहा हूं...इस पोस्ट के साथ एक और सिलसिला शुरू हो रहा है...आज पहली बार स्लॉग ओवर भाई शिवम मिश्रा के सौजन्य से है...मेरे आग्रह पर उन्होंने ये मज़ेदार किस्सा भेजा है...

स्लॉग ओवर
एक गांव की सीधी-साधी महिला की एक शहरी बाबू से शादी हो गई । उसके पति शहर में किसी संस्थान में कार्यरत थे। महिला पति को चिट्टी लिखना चाहती थी पर अल्पशिक्षित होने के कारण उसे यह पता नहीं था कि पूर्णविराम कहां लगेगा । इसीलिये उसका जहां मन करा, वहीं चिट्ठी में पूर्ण विराम लगा दिया। उसने चिट्ठी में अर्थ का क्या अनर्थ किया, आप खुद ही पढ़िए...

मेरे प्यारे जीवनसाथी मेरा प्रणाम आपके चरणो मे । आप ने अभी तक चिट्टी नहीं लिखी मेरी सहेली कॊ । नोकरी मिल गयी है हमारी गाय को । बछडा दिया है दादाजी ने । शराब की लत लगा ली है मैने । तुमको बहुत खत लिखे पर तुम नहीं आये कुत्ते के बच्चे । भेड़िया खा गया दो महीने का राशन । छुट्टी पर आते समय ले आना एक खूबसूरत औरत । मेरी सहेली बन गई है । और इस समय टीवी पर गाना गा रही है हमारी बकरी । बेच दी गयी है तुम्हारी मां । तुमको बहुत याद कर रही है एक पड़ोसन । हमें बहुत तंग करती है तुम्हारी बहन । सिर दर्द मे लेटी है तुम्हारी पत्नी...

(साभार...शिवम मिश्रा, मैनपुरी)

शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

इलाहाबाद ब्लॉग ओवर...खुशदीप

ब्लागरों के लड़ने झगड़ने की आदत यहां भी नहीं गयी
http://visfot.com/blog/archives/876
‍‍इलाहाबाद से लौट कर :कुछ खरी कुछ खोटी और कुछ खटकती बातें !
इलाहाबाद ही क्यों , अहमदाबाद या हैदराबाद क्यों नहीं ?
ब्‍लागरों की ब्‍ला-ब्‍ला
ये चारो लिंक इलाहाबाद मे ब्लॉगर जमावड़े से लौट कर लिखी गई कुछ रिपोर्ट के हैं...आज का ब्लॉग ओवर भी इसी से प्रेरित है...स्लॉग ओवर नहीं...इसे ब्लॉग ओवर कहना ज़्यादा बेहतर रहेगा...
 
ब्लॉग ओवर
 
जहां एक ब्लॉगर मौजूद... आवाज़ देकर हमें तुम बुलाओ
 
जहां दो बलॉगर मौजूद... ब्लॉगर मीट
 
जहां तीन ब्लॉगर मौजूद... रौला-रप्पा
 
जहां चार ब्लॉगर मौजूद... तेरी ये...तेरी वो...तेरा फलाना...तेरा ढिमकाना...
 
जहां चार से ज़्यादा ब्लॉगर मौजूद... शांति...बीच-बीच में कराहने की आवाज़ें...एंबुलेस में सारे ढोए जा रहे हैं...


(रौला रप्पा पंजाबी में शोर-शराबे या हो-हुल्लड़ को कहते हैं)

ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है...खुशदीप

क्या कहूं...क्या लिखूं...कहां से शुरू करूं...शायद पहली बार हो रहा है कि लिखने के लिए शब्द मेरा साथ नहीं दे रहे हैं...कल अदा जी वाली मेरी पोस्ट पर आपने जो बेशुमार प्यार दिया..जिस अ्पनेपन, जिस हक से मुझे गाने के लिए कहा...उसे देखते हुए जी तो बस यही कर रहा है कि अभी ही जोर-जोर से गाना शुरू कर दूं...

कोई रोको न...दीवाने को,
मन मचल रहा कुछ गाने को...


लेकिन क्या करूं मजबूर हूं...एक तो Karaoke पर मुझे गाने का बिल्कुल ज्ञान नहीं है...दूसरा मेरा ब्लॉग भी अभी इतना techno-savy नहीं है...अब सोच रहा हूं किसी वेब-एक्सपर्ट से अपने ब्लॉग को सजा-संवार ही लूं...ये काम हो जाने के बाद आपसे वादा करता हूं कि आपने जो हुक्म दिया है, उसे पूरा ज़रूर करूंगा...तब तक मेरा साथ दीजिए...आखिर में बस इतना ही कहूंगा...

एहसान मेंरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तो,
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तो..

हां, जब अपना बना ही लिया है तो एक गुज़ारिश और...वैसे तो स्लॉग ओवर का स्टॉक मेरे पास बहुत है...लेकिन मुझे लगता है कि आप भी इस काम में मेरी मदद कर सकते हैं...अगर आप कोई नई मस्त बात सुनते हैं ( चुटकुला, मैसेज, एसएमएस, सलाह, कुछ भी) और आपको लगता है कि वो स्लॉग ओवर लायक है तो मुझे मेरे ई-मेल sehgalkd@gmail.com या फोन नंबर 09873819075 पर एसएमएस कर दीजिएगा...कोशिश करूंगा कि कुछ नए अंदाज़ के साथ आपकी बात को ब्लॉग जगत के सामने पेश करूं...यकीनन आपकी क्रेडिट लाइन के साथ....
 
स्लॉग ओवर
मक्खन ने दीवाली से पहले घर पर सफ़ाई-पुताई कराई...पुताई वाला ज़्यादा उम्र का नहीं था...उसने बड़ी मेहनत से काम किया...घर को चमका दिया...काम खत्म हुआ तो मक्खन ने खुश होकर तय मेहनताने के अलावा 200 रुपये और ईनाम के तौर पर दिए और कहा... जाओ ऐश करो...शाम को बीवी को पिक्चर-विक्चर दिखा लाना...

शाम को पांच बजे मक्खन के घर की कॉल-बेल बजी...मक्खन ने दरवाजा खोला तो पुताई वाला ही खड़ा था...सुबह से बिल्कुल अलग ही हुलिया...टिप-टॉप, बाल-वाल शैम्पू किए हुए..परफ्यूम लगाया हुआ...मक्खन ने पूछा...क्या बात है... कुछ रह गया था क्या...

लड़का शर्माते हुए बोला...नहीं...बस मैडम को भेज दीजिए...आपने ही सुबह कहा था न कि शाम को बीवी को पिक्चर-विक्चर दिखा लाना...

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2009

अदा जी ने पुकारा और हम चले आए...खुशदीप

अदा जी ने अपनी ताजा पोस्ट पर मेरी पसंद का गीत सुनाया और साथ ही ये फरमाइश भी कर डाली कि मैं भी कोई गीत सुनाऊं...उन्हें न जाने कैसे इल्म हो गया कि मैं गाता भी हूंगा...जहेनसीब मेरे कि अदा जी ने एक ज़र्रे को ताड़ पर चढ़ा दिया...

http://swapnamanjusha.blogspot.com/2009/10/blog-post_22.html
शायद अदा जी ने ये तो नहीं समझ लिया कि मेरे नाम के साथ सहगल जुड़ा है इसलिए मैं कहीं मरहूम कुंदन लाल सहगल साहब का कोई वशंज ही न हूं...वही के एल सहगल साहब जिनकी आवाज़ की नकल मुहम्मद रफ़ी, मुकेश और किशोर कुमार भी कभी न कभी कर चुके हैं...खैर मेरा सहगल साहब से दूर-दूर का भी कोई रिश्ता नहीं है...रही बात गाने की तो...

रोजी रोटी की फिक्र ने गालिब निकम्मा बना दिया,
वरना गवैये थे हम भी कभी काम के...
 
अब कुछ सुनाने का हुक्म हुआ है तो नाफरमानी तो नहीं की जा सकती...सुना तो नहीं सकता, हां अपना सबसे पसंदीदा गीत यहां आपसे ज़रूर शेयर कर रहा हूं...
http://www.hummaa.com/music/song/Raakh+Ke+Dher+Ne/9319

कोई गेसू, कोई आंचल हमें आवाज़ न दे,
अब किसी आंख का काजल हमें आवाज़ न दे...

हम हैं खामोश तो खामोश ही रहने दो हमें,
कोई आहट, कोई हलचल हमें आवाज़ न दे...

हमने तन्हाई को महबूब बना रखा है,
राख़ के ढेर में शोलों को दबा रखा है...

फिर पुकारा है मुहब्बत ने हमें क्या कीजे,
दी सदा हुस्न की जन्नत ने हमें क्या कीजे...

जिस के साए से भी अक्सर हमें डर लगता था,
छू लिया आखिर उसी हसरत ने क्या कीजे...

हमने जज़्बात के दामन को बचा रखा है,
राख़ के ढेर में शोलों को दबा रखा है...

रास आए न कभी प्यार के हालात हमें,
दिल के इस खेल मे हर बार हुई मात हमें...

क्या करेंगे कहा जाएंगे किधर जाएंगे,
दे गई जब भी दग़ा ये मुलाकात हमें...

बस इसी सोच ने हमें दीवाना बना रखा है,
राख़ के ढेर में शोलों को दबा रखा है...
(फिल्म- एक बार कहो 1980, आवाज़- जगजीत सिंह, गीतकार- महेंद्र देहलवी, संगीत- भप्पी लहरी) 

लिंक वगैरहा देने के मामले में अनाड़ी हूं...इसलिए अगर इस गीत को न सुना हो तो इस लिंक पर जाकर सुनिएगा ज़रूर...
 
स्लॉग ओवर
भारतीय सिनेमा के गीत-संगीत की तरक्की का सफ़र...
 
के एल सहगल के...गम दिए मुस्तकिल...से शुरू हुआ था...
 
और बाबा सहगल के...रैप...तक पहुंच गया...

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2009

सुख और दुख का फर्क...खुशदीप

हर आदमी सुख की तलाश में मारा-मारा फिरता है...यही चाहता है कि दुख का उस पर या उसके परिवार पर साया भी नहीं पड़े...लेकिन सुख और दुख में बड़ा महीन फर्क होता है...अगर उस फर्क को कोई समझ ले तो पूरी ज़िंदगी सुख के साथ बिता सकता है...

सुख को दुख से अलग करने वाला ये फर्क है सिर्फ एक रुपये का...जी हां...सिर्फ एक रुपये का...आप कहेंगे कि एक रुपये में आता ही क्या है...जो ये हमें सुखी बना देगा...मेरा कहना है बना सकता है ये आपको सुखी या दुखी...

बस इसका इतना सा फलसफा है कि मानिए अगर आपकी महीने की आमदनी 100 रुपए (सिर्फ मानिए) है और आपका खर्च 99 रुपए है तो आप ज़िंदगी भर सुखी रहेंगे...लेकिन अगर आपकी आमदनी 100 रुपए ही रहती है और आपका खर्च 101 रुपए होता है तो आप जीवन में हमेशा दुखी रहेंगे...है न सिर्फ एक रुपये का फर्क...अब ये हमारे हाथ में ही है अपने को सुखी या दुखी रखना...

स्लॉग ओवर
शहर के माचो लड़कों की क्या ख्वाहिश होती है...
220 सीसी पल्सर
या
225 सीसी करिज्मा
या
350 सीसी रायल एनफील्ड्स
या
1300 सीसी हायाबूसा ब्रैंड की सुपरबाइक खरीदना...

जानते हैं क्यों...
सिर्फ एक 80 सीसी की स्कूटी का पीछा करने के लिए...

बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

कोई काला टीका तो लाओ...खुशदीप

दीवाली का और कोई फायदा हो या न हो, एक फायदा ज़रूर होता है घर हो या दफ्तर, गंदगी और कूड़े-करकट से ज़रूर छुटकारा मिल जाता है...आलस्य और दलिद्र को घर से विदा कर नए जोश के साथ सब अपने-अपने काम में जुट जाते हैं...

प्रकृति का भी नियम है जिस चीज की अति हो जाती है, उसका अंत भी सुनिश्चित हो जाता है...डार्विन का प्राकृतिक चयन का सिद्धांत भी यही कहता है...इस सिद्धांत को ऐसे समझा जा सकता है जब हज़ारों हज़ार साल पहले डॉयनासोर धरती पर सब पर भारी पड़ने लगे तो फिर उनकी एकाएक धरती से विदाई पर भी मुहर लग गई...

ऐसा ही कुछ पिछले कई अरसे से ब्लॉगिंग जगत में भी हो रहा था...जिन्होंने पूरे माहौल को कलुषित कर रखा था, वो अब हाशिए पर होते जा रहे हैं...ज़रूरत है बस अब उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए तड़ी पार करने की...भौतिकी का एक बड़ा सरल सा नियम है गेंद को जितना ज़ोर से ज़मीन पर मारो...वो उतना ही सिर पर चढ़कर उछलती है...ज़रूरत है नफ़रत के ज़हर से भरी इन गेंदों को बस यूहीं ज़मीन पर पड़े रहने देने की...बस वहीं से धीरे-धीरे पैर की ठोकर से घर से बाहर कर देने की...आखिर एक-दूसरे को लड़वाने वालों की ब्लॉगिंग में ज़रूरत ही क्या है...

धर्म के नाम पर इंसान से इंसान को लड़ाने के लिए तो हमारी राजनीति ही काफी है...जब ऐसी राजनीति भी देश में बार-बार मुंह की खा रही है...फिर ब्लॉगिंग को इसके वायरस से क्यों ग्रस्त होने दिया जाए...

राजनीति में भी देखा जाता है कि चाहे कोई कितना भी बड़ा बाहुबली चुनाव में खड़ा हो जाए...लेकिन अगर जनता उसे हराने की ठान ले तो पैसा, हथियार, लालच, धमकियां कोई आड़े नहीं आ सकती.. ऐसे ही ब्लॉग जगत में अब घर को साफ करने की हवा चल निकली है...आवश्यकता है इसे अब बस आंधी बनाने की...जो बचे-खुचे कीड़े-मकोड़ों को भी उड़ा कर ले जाए...इंसान को इंसान समझने वाले बस हाथ से हाथ पकड़ कर कतार बनाते चलें...कारवां अपने आप बढ़ता चलेगा...आखिर में बस इतना ही कहूंगा...कोई काला टीका तो लाओ...ब्लॉगिंग के इस नए दौर को बुरी नज़र से बचाओ...
 
स्लॉग ओवर
मक्खनी सहेली से...अपने पति मक्खन की क्या बताऊं, वो ओलम्पिक लव पर यकीन करते हैं...

सहेली....तू तो बड़ी खुशकिस्मत है, तेरे पति तुझे ओलम्पिक जैसा विशाल प्यार करते हैं...
 
मक्खनी....खाक किस्मत है...ये प्यार ओलम्पिक की तरह ही चार साल में एक बार आता है...और उसमें भी प्रदर्शन भारत की तरह ही रहता है...

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

पाकिस्तान में पप्पी क्यों ली...खुशदीप

पाकिस्तान में हालात विस्फोटक हैं...तहरीक-ए-तालिबान के हमलों के डर से मुल्क भर में स्कूल और कॉलेज एक हफ्ते के लिए बंद कर दिए गए हैं...दक्षिणी वजीरिस्तान में तालिबान और अल कायदा के आतंकवादियों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन राहत-ए-निजात शुरू किया है...ज़मीन पर मोर्चाबंदी के साथ आसमान से भी लड़ाकू विमानों से जबरदस्त बमबारी की जा रही है...इन हालात में पूरे इलाके से हज़ारों नागरिक पलायन कर सुरक्षित ठिकानों की ओर जा रहे हैं...एक तरफ पाकिस्तान में इतना खून-खराबा...दूसरी और लाहौर यूनिर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज़ (LUMS) में किसी और मुद्दे पर ही घमासान छिड़ा हुआ है...ये मुद्दा है एक किस यानि पप्पी का...

दरअसल LUMS की एक सीनियर छात्रा तजवार अवान ने कैम्पस में छात्र-छात्रा के एक जोड़े को किस करते देख लिया था...ये अवान को इतना नागवार गुज़रा कि बस इसके खिलाफ मुहिम ही छेड़ दी...सबसे पहले अवान ने यूनिवर्सिटी के कॉमन ई-मेल अड्रैस पर नैतिकता का लंबा-चौड़ा पाठ पिलाया...अवान ने साथ ही किस के पक्के सबूत (शायद फोटोग्राफ या मोबाइल से लिया गया वीडियो) भी यूनिवर्सिटी प्रशासन को मुहैया करा दिए...यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अवान को भरोसा दिलाया है कि जल्द ही छात्र-छात्राओं के लिए कैंपस की आचार-संहिता का ऐलान किया जाएगा...

मैनजमेंट जैसे हाई-प्रोफाइल विषय को पढ़ने वालों को काफी खुले विचारों वाला माना जाता है...लेकिन अवान के ई-मेल ने तो जैसे तूफान मचा दिया है...इस पर इतना बावेला चल रहा है कि ट्विटर्स और ब्लॉग जगत में भी गर्मागर्म बहस छिड़ गई है...यहां भी खेमेबंदी साफ नज़र आने लगी है...पाकिस्तान के ट्विटर्स में काफी मशहूर खावेर सिद्दीकी ने अपने दोस्तों को ट्विटर के माध्यम से संदेश दिया है...हा...हा...हा...तो अब पप्पी लेना भी गुनाह है...अलिसा हैरिस ने अपने संदेश में कहा है कि शुक्र है, मैं पाकिस्तान मे नहीं रहती हूं...एक और छात्र ने कहा है कि जिस किस पर इतना टंटा खड़ा किया जा रहा है वो किस किस न होकर गाल पर बस पैक (होठों का हल्का सा स्पर्श) ही था...इसी मुद्दे पर LUMS के ही छात्र इमरान बलूच ने अपने ब्लॉग में कहा है कि मैं ये सुनकर दुखी हूं कि देश का टॉपमोस्ट संस्थान छात्रों के निजी अधिकारों का दमन करने जा रहा है...सामाजिक तौर पर देखूं तो मेरे ऐसे कई दोस्त हैं जो हाथ मिलाना पसंद नहीं करते...दूसरी ओर कई महिला मित्र हैं जो हाथ मिलाने के साथ गाल पर पैक (क्षणिक किस)देना पसंद करती हैं...ये अपनी-अपनी पसंद और सुविधा का मामला है...किसी को भी ये फरमान जारी करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि क्या गलत है और क्या सही...मैं समझता हूं यूनिवर्सिटी प्रशासन अपने प्रस्तावित फैसले (प्यार के सार्वजनिक इज़हार पर रोक) पर पुनर्विचार करेगा...अन्यथा छात्र संगठनों को इसे चुनौती देने के लिए सभी विकल्पों को आजमाना होगा...

एक और छात्र ने कटाक्ष के लहजे में ई-मेल किया है...मैंने गुनाह किया है...मैंने हफ्ते में दो बार दाढ़ी बनाई...मेरे पौंचे (पैंट का निचला हिस्सा) ऐडियों से बाहर जाते हैं...मुझे गले मे टाई बांधने का शौक है जो इसाइयों के क्रॉस से मेल खाती है...

बहरहाल बहस जारी है और पाकिस्तान में गालों पर एक छोटी सी पप्पी का किस्सा हर ज़ुबान पर है...
 
स्लॉग ओवर
ये पाकिस्तान के उस दौर की बात है जब वहां सैनिक हुकूमत के चलते फौजी अफसरों में भ्रष्टाचार चरम पर था...मुशर्रफ के सर्वेसर्वा रहते नागरिक प्रशासन में भी सेना का पूरा दखल था...इसलिए अफसर भी जमकर चांदी कूट रहे थे...उन्हीं दिनों में पाकिस्तान सरकार के पास अमेरिका से एफ-16 लड़ाकू विमान की बिक्री का प्रस्ताव आया...एफ-16 के गुण-दोषों पर चर्चा के लिए एक दिन मुशर्रफ़ ने जनरलों की बैठक बुलाई...मुशर्रफ ने पाकिस्तान की रक्षा ज़रूरतों पर लेक्चर पिलाना शुरू किया...सारे जनरल थोड़ी देर में ही उकता गए...सबसे कोने में बैठे लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने तो ऊंघना शुरू कर दिया....कि अचानक मुशर्रफ की आवाज गूंजी...हां तो जनरल नियाजी आप बताओ एफ-16 खरीदें या नहीं...अपना नाम सुनकर नियाजी की तंद्रा टूटी और तपाक से बोले...सर अगर कार्नर का है तो आंख मूंद कर सौदा कर लो...बाद में अच्छा रिटर्न दे जाएगा...

(दरअसल लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी के दिमाग में उस वक्त भी सस्ते से सस्ते में प्रॉपर्टी खरीदने का ख्याल ही उमड़ रहा था...एफ-16 सुनते ही नियाजी को लगा कि किसी प्लॉट का नंबर है, तभी तड़ से मुशर्रफ को एफ-16 खरीदने की सलाह दे डाली...)

सोमवार, 19 अक्तूबर 2009

गंदा है पर धंधा है ये...खुशदीप

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जल्द ही शुरू होने वाली वन डे सीरीज के लिए भारतीय टीम चुन ली गई है...बताया जाता है कि कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के कहने पर राहुल द्रविड़ को बाहर का रास्ता दिखाया गया...लेकिन लाख जोर लगाने पर भी धोनी अपने चहेते आर पी सिंह को टीम में जगह न दिला सके...यानि धोनी और सेलेक्टर्स के बीच टीम के चयन को लेकर मतभेद खुल कर सामने आ गए...

इस खींचतान से पहले क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के चीफ ए़डमिनिस्ट्रेटिव आफिसर रत्नाकर शेट्टी नए खिलाड़ियों के व्यवहार को लेकर इतने क्षुब्ध नजर आए कि बोल ही पड़े...नए खिलाड़ी इतने बड़े हो गए हैं कि उन पर काबू रखना मुश्किल हो रहा है...ये खिला़ड़ी घरेलू क्रिकेट खेलना ही नहीं चाहते...

बस जहां पैसे, मीडिया, ग्लैमर की चमक दमक हो ये खिलाड़ी वहीं दिखना चाहते हैं...इनके लिए क्रिकेट की प्रैक्टिस से ज्यादा विज्ञापन फिल्मों की शूटिंग के लिए रिहर्सल अहम हो गई है...धोनी इस साल पचास करोड़ रुपये से ज़्यादा कमाने जा रहे हैं...इसमें क्रिकेट से होने वाली कमाई सिर्फ 20 फीसदी है...अस्सी फीसदी से ज़्यादा कमाई ब्रैंड एंडोर्समेंट (विज्ञापन) से ही होगी...धोनी दुनिया में सबसे ज़्यादा कमाई वाले क्रिकेटर तो है हीं देश में भी शाहरुख खान को छोड़कर बड़े से बड़ा फिल्म स्टार भी धोनी के मुकाबले विज्ञापन से होने वाली कमाई के मामले में कही नहीं टिकता...

अब हर युवा क्रिकेटर के लिए भी देश से खेलने से ज्यादा बड़ा सपना धोनी की तरह एड फिल्मों से कमाई हो गया है...लेकिन ये सपना देखने वाले भूलते जा रहे हैं कि क्रिकेट है तो इन खिलाड़ियों का वजूद है...अगर क्रिकेट ही नहीं होगा तो इन्हें कौन पूछने वाला होगा...आज क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड टीम के लिेए खिलाड़ियों के स्तर के हिसाब से चार ग्रेड के मुताबिक खिलाड़ियों को सालाना मेहनताना देता है...अब खिलाड़ी खेले या न खेले उसे ग्रेड के हिसाब से सवा लाख रूपये से पांच लाख रुपये हर महीने बोर्ड से मिलना तय है...यानी ग्रेड प्राप्त जूनियर से जूनियर खिलाड़ी को भी देश के वरिष्टतम नौकरशाह से भी ज्यादा वेतन मिलता है...

आखिर क्रिकेट मैच देखते हुए हमारे मन में वैसा रोमांच क्यों नहीं होता जैसा कि दो दशक पहले होता था...जसदेव सिंह, सुशील दोषी, मुरली मनोहर मंजुल की रेडियो पर कमेंट्री सुनते हुए दिल की धड़कने ऊपर-नीचे होती रहती थीं...खिलाड़ियों और क्रिकेट प्रेमियों में एक ही जज़्बा रहता था भारत की जीत का...सुनील गावस्कर, कपिल देव, विश्वनाथ, मोहिंदर अमरनाथ...एक से बढ़कर एक नाम...देश के लिए अपना सब कुछ झोंक देने को तैयार...

लेकिन अब क्रिकेट से भी ज्यादा अहम क्रिकेट का तामझाम हो गया है...रात के अंधेरे को चौंधियाती रोशनी में उजाला कर रंगीनी में डूबे स्टेडियम, टीवी प्रसारण अधिकार, एक से बढ़कर कैमरे...चीयर्स लीडर्स के मादक डांस...यानि वो सब कुछ जो क्रिकेट को खेल से ज़्यादा पैसा बनाने का जरिया बनाता है...

क्रिकेट का नया गणित भी यहीं से शुरू होता है...आज बेशक हम 15 दिन पहले हुई सीरीज को भूल जाएं, हमें ये भी याद न रहे भारत ने इस साल कितने मैच खेले हैं...लेकिन क्रिकेट से खेल जारी है...मैदान में चीयर्सलीडर तो है चीयर्स नहीं...दर्शकों में वो जुनून नहीं जो क्रिकेट को धर्म और खिलाड़ियों को भगवान का दर्जा दिला देता था...ऐसे में यही कहना पड़ेगा...दिस इज़ नॉट क्रिकेट...पर क्या करें...गंदा है पर धंधा है ये...
 
स्लॉग ओवर
नर्सिंग होम में स्वीपर का काम करने वाली कमला दनदनाती हुई चेयरमैन और प्रबंधक ड़ॉक्टर के केबिन में घुस गई...जाते ही दहाड़ते हुए बोली...डॉक्टर साहब ये तो कोई बात नहीं हुई...शीला को आपने प्रैग्नेंट किया...रेखा को आपने प्रैग्नेंट किया...सुनीता, विमला किस-किस का नाम गिनाऊं...आखिर मुझमें क्या कमी है...हमें भी काम करते साल से ज़्यादा हो गया...हमें तो किसी ने प्रैग्नेंट नहीं किया...आज तो मैं जवाब ले कर ही जाऊंगी कि आखिर कब करोगे प्रैग्नेंट....

(दरअसल कमला का कहने का मतलब था परमानेंट...अंग्रेजी बोलने के चक्कर में परमानेंट का प्रेग्नेंट हो गया था)

शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

गोपू बना 'हनुमान'...खुशदीप

भगवान श्रीराम अयोध्या लौट चुके हैं...उनके स्वागत में घर-घर दीप जलाए जा रहे हैं...यही प्रार्थना है कि हमारे अंदर के राम भी हमारे अंतर्मन के अंधकार को दूर करें...अगर ये राम हमें मिल गए तो दीप से दीप जलते हुए दुनिया का अंधकार अपने आप ही दूर हो जाएगा...इसी कामना के साथ सभी ब्लॉगर भाई-बहनों को दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएं...साथ ही पिछले दो महीने में ब्लॉग जगत में मुझे जो प्यार मिला...उसके लिए शब्दों में क्या कहूं...बस दिल की बात दिल से ही समझ लीजिए...

खैर अब आता हूं गोपू महाराज पर...यथा नाम तथा गुण...नाम के अनुरूप ही गोल-मटोल...गोपू जी बेहद सीधे-साधे, दिल के सच्चे इंसान है लेकिन किस्मत का न जाने कौन सा छत्तीस का आंकड़ा है कि हमेशा रूठी ही रहती है...उनकी शक्ल देखते ही लगता है कि ऊपर वाले ने कौन से जन्म का बदला लिया है बेचारे से, जो इस बेरहम दुनिया में उतार दिया...गोपू जी एक सांध्य दैनिक में प्लेट-मेकिंग, डिजाइन के ब्रोमाइड बनाने से आजीविका कमाते रहे हैं..साथ ही स्क्रीन प्रिंटिंग के डिजाइन बनाकर भी थोड़ा-बहुत कमा लेते हैं..लेकिन बदकिस्मती से अखबार बंद हो गया...गोपू जी को घर चलाना मुश्किल हो गया...यदा कदा जो मुझसे बन पड़ता था गोपू की मदद कर देता था...लेकिन गोपू की परेशानियों का ये हल नहीं था...

गोपू जब भी मिलता हर बार कोई काम दिलाने की गुजारिश करता...एक दिन गोपू मेरे पास आया...कुछ हिचकते...कुछ अटकते बोला...भाई जी... दरअसल स्क्रीन प्रिटिंग की दुकान वाले मुरली ने मुझे कहा है कि आजकल काम मंदा है, तू एक काम कर...हापुड़ में मेरे मामा रामलीला मंडली के अध्यक्ष हैं...उनकी रामलीला में बरसों से जो हनुमान का रोल करता आ रहा था, उसे टायफाइड ने जकड़ लिया है...मामा ने कहा है कि अगर मेरठ में कोई रंगमंच का कलाकार हनुमान के रोल के लिेए तैयार हो तो मेरे पास भेज दो...15 दिन के लिए करीब 250 रुपये रोज के हिसाब से 4000 रुपये मिलेंगे...साथ ही तीनो टाइम खाना और रहने का भी बढ़िया इंतज़ाम...गोपू यहां तू भी खाली बैठा है...तू 15 दिन के लिए यही काम क्यों नहीं कर लेता...तेरी शक्ल भी हनुमान जैसी लगती है...तू दो-तीन दिन पहले ही हापुड़ चला जा...मैं मामा से कह दूंगा वो डायरेक्टर को बोल कर तुझे ट्रेंड कर देंगे...

अब गोपू जी के खानदान में दूर-दूर तक एक्टिंग से किसी का कोई वास्ता नहीं रहा था...गोपू तैयार हो भी तो कैसे ...लेकिन चार हजार की रकम भी कम नहीं थी...कंगाली में कई काम संवर जाते...गोपू ने मुझसे सलाह मांगी...मैंने कहा...देख ले ये काम तेरे बस का भी है...सोच समझ कर फैसला लेना...गोपू बोला...भाई जी यहां भी कौन से तीर मार रहा हूं...15 दिन हवा-पानी बदलने से ही शायद दिन बदल जाएं...

आखिरकार गोपू ने हनुमान बनने का फैसला ले ही लिया...रामलीला शुरू होने से तीन दिन पहले ही गोपू हापुड़ पहुंच गया...रामलीला मंडली के अध्यक्ष मुरली के मामा को मुरली का हवाला दिया तो उन्होंने चेले-चपाटों को गोपू का खास ध्यान रखने का आदेश दे दिया...गोपू जी की तो जैसे निकल पकड़ी...मेरठ में कहां खाने को वांदे...और कहां रामलीला में तीनों टाइम देसी घी से तर खाना...

एक दिन डायरेक्टर साहब ने गोपू को बुलाकर ताकीद किया कि हनुमान का रोल बेहद अहम है...लेकिन तुम्हारा काम रामलीला शुरू होने के तीन-चार दिन बाद ही आएगा...इसलिए अभी से जमकर अपने डायलाग याद कर लो...बाकी अगर कोई डायलाग कभी भूले भी तो स्टेज के पीछे से याद दिला दिया जाएगा...इसलिए घबराने की कोई बात नहीं है...अब गोपू बेचारे के लिए एक जुमला बोलना भी बेहद भारी...डायलाग की तो बात ही छोड़ दो...खैर मरता क्या न करता...दिन-रात अपनी स्क्रिप्ट बोलने की प्रैक्टिस शुरू कर दी...जैसे जैसे हनुमान के रोल वाला दिन नजदीक आने लगा गोपू जी की हवा शंट होने लगी...फिर भी हौसला बनाए रखा...

आखिर कयामत का दिन आ ही गया...गलती से गोपू जी स्टेज के पीछे के उस हिस्से तक पहुंच गए जहां उसको तो रामलीला देखने आए दर्शक नहीं देख सकते थे, लेकिन भीड़ को गोपू साफ देख सकता था...गोपू जी की जैसे ही भीड़ पर नज़र पड़ी...सिट्टी-पिट्टी गुम...भीड़ में जबरदस्त शोर...कोई कलाकारों को हूट कर रहा है...कोई सीटी बजा रहा है...कोई खड़ा होकर जोर-जोर से चिल्ला रहा है...गोपू जी ने मंच की आड़ से कोई तीन-चार मिनट ये नज़ारा देखा...और फिर जो गोपू महाराज की हालत हुई, बस पूछो नहीं....गुलाबी ठंड में भी उनके माथे से पसीना झर-झर बहने लगा...हाथ-पैर जैसे सुन्न पड़ गए...दिमाग ने काम करना बंद कर दिया...मुंह से शब्द निकलने बंद हो गए...गोपू जी झट से अपने कमरे में आकर बैठ गए...ये किस फट्टे में जान फंसा ली...यहां तो भीड़ को देखते ही गले की घिग्गी बंध गई...लंबे चौड़े डायलाग मुंह से खाक निकलेंगे...

अब गोपू जी इस टंटे से बच निकलने की तरकीब सोचने लगे...लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा था...इतने में ही डायरेक्टर साहब की कड़कदार आवाज गूंजी...हनुमान कहां हो, चलो तुम्हारी एंट्री आने वाली है...

गोपू को काटो तो खून नहीं...ब़ड़ी हिम्मत जुटा कर बोला...उस्ताद जी, मैं स्टेज पर नहीं जाऊंगा...

क्या...क्या कहा...डायरेक्टर साहब को गोपू की बात सुनकर जैसे कानों पर भरोसा ही न रहा हो...

गोपू फिर बोला...उस्ताद जी किसी और को हनुमान बना दो, मुझसे ये काम नहीं होगा...

डायरेक्टर... अबे पागल हो गया है क्या...ये भीड़ देख रहा है न, तेरे समेत हम सबके कपड़े फाड़ डालेगी, अगर स्टेज पर हनुमान न दिखा तो...हम इस वक्त नया हनुमान कहां से तैयार करेंगे...और तू दामाद समझ कर चार-पांच दिन से यहां माल-पानी उड़ा रहा था...पहले दिन ही मना नहीं कर सकता था क्या...अब यहां बवाल कराएगा क्या...

गोपू... उस्ताद जी आप कुछ भी कह लो, मैं स्टेज पर नहीं जाऊंगा..ये मेरे बस का ही नहीं है..

डायरेक्टर साहब बोले...तो तू आसानी से स्टेज पर नहीं जाएगा...

गोपू...नहीं...किसी हाल में नहीं...

डायरेक्टर ने अपने चेलों को आदेश दिया...ये ऐसे नहीं मानेगा, इसे उठाकर स्टेज पर धक्का दो...एकाध डायलाग बोलेगा...फिर अपने आप ठीक हो जाएगा....

चेलों ने उस्ताद की बात मानी...हनुमान के गैट-अप वाले गदाधारी गोपू को स्टेज पर पटक दिया...गोपू भी कच्ची गोलियां कोई खेला था....मंच के बायीं ओर से धकेला गया था...झट से उठा...गदा समेत ही दायीं ओर से ज़मीन पर छलांग लगा दी...उठा और मैदान में 100 मीटर फर्राटा की तरह शूट लगा दी....मैदान के गेट पर पहुंचने के बाद दीवार पर चढ़ा और सीधे सड़क पर...ये जा और वो जा....अब सड़क पर जिसने भी रात को गदाधारी हनुमान को यूं सरपट भागते देखा, मामला उसकी समझ में नहीं आया...खैर गोपू सीधे बस अड़्डे आ गया...और मेरठ वाली बस में बैठ गया...गदा, पूंछ वगैरहा गोपू इसलिए नहीं फेंक रहा था कि उसका सामान रामलीला वालों के पास पड़ा था...अगर गदा, पूंछ न मिली तो कहीं कपड़ों समेत उसका सामान ही वापस करने को मना न कर दें...खैर गोपू जी हनुमान बने बस में बैठे थे और बस की सारी सवारियां, कंडक्टर-ड्राइवर उन्हें देख-देख कर निहाल हो रहे थे...कडंक्टर बोला...धन्य हो गई बस हमारी, आज इसे हनुमान जी की सवारी बनने का मौका मिला...अब ये तो बेचारा गोपू ही जानता था कि वो हनुमान बनने के चक्कर में खुद कितना धन्य हो गया....

हनुमान बने गोपू जी खुदा..न..खास्ता किसी तरह मेरठ पहुंच गए...बस अड्डे पर उतरते ही रिक्शा रोका...रिक्शा वाला भी गोपू को ऐसे देख रहा था जैसे दुनिया का आठवां अजूबा देख लिया...गोपू ने रिक्शा वाले को मुरली के घर का पता बताकर वहां ले चलने को कहा...मुरली वही जिसने गोपू को रामलीला के काम के बारे में बताया था...गोपू की सोच यही थी कि ये हनुमान जी की गदा, पूंछ और दूसरा सामान मुरली को दे दूंगा..तो वो उनकी कपड़ों वाली संदूकची हापुड़ से मंगा देगा...मुरली के घर पहुंचते-पहुंचते गोपू को रात के 12 बज गए...गोपू ने मुरली का किवाड़ खटखटाया और धीरे से आवाज देना शुरू कर दिया...मुरली....मुरली....

खटखटाहट सुनकर पहली मंजिल पर रहने वाले मुरली की पत्नी की नींद खुल गई...छज्जे से नीचे झांक कर देखा तो आंखें फटी की फटी रह गईं...टिमटिमाती रोशनी में गदाधारी हनुमान जो खड़े नज़र आ रहे थे....वो भी पतिदेव मुरली को आवाज देते...मुरली की पत्नी ठहरी धर्म-कर्म को बहुत मानने वाली...सुबह शाम पूजा-पाठ करने वाली...फौरन मुरली को जगाते बोली...ऐ जी, सुनते हो रामजी ने खुश होकर आज साक्षात हनुमान जी को हमारे द्वार पर भेजा है...

खैर...मुरली को तो गोपू को देखते ही सारा किस्सा समझ आ ही गया...
 
मुरली ने दो दिन बाद गोपू के साथ हुआ ये सारा वाकया मुझे सुनाया...मेरी समझ नहीं आया कि मैं हंसू या गोपू की इस दशा पर रामजी से शिकवा करूं कि उसका नसीब ऐसा क्यों लिखा...

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

पॉपुलर लेखन गुनाह है क्या...खुशदीप

गंभीर लेखन बनाम पॉपुलर लेखन को मुद्दा बनाते हुए मैंने कल पोस्ट लिखी थी...टीआरपी कैसे बढ़ाई जाए...इस पर सागर ने मुझे टिप्पणी भेजी... इससे पहले भी मुझे सागर ने टिप्पणी भेजी थी कि मैंने बहुत दिनों बाद अपने ब्लॉग के नाम के अनुरूप कोई पोस्ट लिखी थी...(सबसे पहले देश)...अन्यथा मेरी दूसरी पोस्टों के लिए तो ब्लॉगनामा नाम ज्यादा सटीक बैठ रहा था...
 
सागर ने जो नई टिप्पणी भेजी... पहले वो अक्षरक्ष...

अब जब आपको मेरा कल का कहा सत्य लगा तो दो कदम आगे आ कर और कहता हूँ... यह तल्खी से कहना की "यहाँ सब ज्ञानी हैं " उचित नहीं हैं... मेरे जैसे कुछ लोग अज्ञानी है यह सत्य है... पर सभी अज्ञानी नहीं हैं यह भी उतना ही सत्य है... बात उठती है की आपका ज्ञान और अज्ञान नापने का स्केल क्या है ? अगर मैं अपनी बात करूँ तो मुझे साहित्यिक भूख है, समाचारों की भूख है... विवेचना की भूख है, कुछ सीखने की भूख है...ऐसे में मैं वोही तलाशूंगा... जो जैसे पसंद रखता है वहां खोज कर पहुँच ही जाता है... साथ ही यह भी गलत मानता हूँ की अच्छे लेख पढ़े नहीं जाते, जाते हैं... निर्भर करता है की वहां कितने उस टाइप की लोग पहुंचे हैं... यहाँ फिर स्केल काम करता है... कुछ ब्लॉग मैं आपको बताता हूं...अजदक- प्रमोद सिंह, सबद- अनुराग वत्स, मल्तीदा और ...- शायदा, फुरसतिया - अनूप शुक्ल (शुक्र है इनकी लेखनी बोलचाल की है )...और भी कई जो मैं नहीं जानता लेकिन बात जब रातों रात लेखक और कवि बानने की आती है को ब्लोग्गेर्स को धैर्य रखना ही होगा... पढने वाले और पसंद करने वाले दोनों वहां पहुंचेंगे ऐसे लोगों को कभी विज्ञापन नहीं करना पड़ता... इन्हें अपनी योग्यता पर भरोसा होता है... या फिर यह इसके बारे में भी नहीं सोचते... टारगेट साफ़ है आपको लिखना है या कमेन्ट पाना है... कमेन्ट से लेख का स्तर नहीं होता... मन की बात कहने से होता है... ऐसे कई स्तरहीन ब्लॉग में जानता हूँ (इनमें हो सकता है मेरा भी शामिल हो ) जो आलतू- फालतू और घटिया लेख लिखते है जो कहीं न कहीं पढ़े होते हैं... फिर भी वो अच्छे कहलाना चाहते हैं....मैंने पहले भी कहा था हिंदी वाले आकादमी हो या पत्रिका, या फिर ब्लॉग....हमेशा लड़ते और खुद को दिल ही दिल में बेहतर समझते हैं... ऊपर से विनम्रता का लेबल चस्पा देते हैं... (यह सबकी बात नहीं है)...असल मुद्दा आनंदित करने का है, विवेकपूर्ण होकर ब्लॉग जगत को कुछ देने का है... टुच्चे विज्ञापन से कुछ नहीं मिलेगा...

सागर को अब मैं एक-एक करके जवाब देने की कोशिश करूंगा..अगर आपको साहित्य,समाचार,विवेचना और सीखने की भूख है तो भाई मेरे तुम्हें कौन इस भूख को मिटाने से रोक रहा है...आप जिस लेखक को पसंद करते हैं, सौ बार उसे पढ़ें,किसी दूसरे को उस पर क्या ऐतराज हो सकता है...और जो नाम आपने गिनाए हैं, कौन उन्हें नहीं जानता...खास तौर पर प्रमोद सिंह और अनूप शुक्ल को...आपने खुद ही लिखा है शुक्र है अनूप शुक्ल की लेखनी बोलचाल की है...यहां शुक्र है का मतलब मैं समझ नहीं पाया...क्या दूसरे लेखकों से आप सहज नहीं रह पाते जो अनूप जी के लिए शुक्र है जुमले का इस्तेमाल किया...और आपने खुद ही अनूपजी के लिए वो लिख दिया जो मैं अपनी टीआरपी वाली पोस्ट के ज़रिए कहने की कोशिश कर रहा था...अनूप जी की लिखने की बोलचाल (आप ही के शब्दों में) वाली जो खांटी शैली है, उसी ने उन्हें इतना लोकप्रिय और ब्लॉग जगत में इतना सम्मान दिलाया है...वो जो कहते हैं लोगों से सीधा संवाद कायम हो जाता है...अगर गौर से मेरी पोस्ट सागर ने पढ़ी होती तो उसमें भी उन्हें यही मिलता कि अगर आपने कोई गंभीर संदेश देना है तो वो उपदेश वाले स्टाइल में नहीं लोगों की पसंद वाली जुबान में देना होगा...चार बातें वो कहनी होगी जो दूसरे सुनना चाहते हैं...इ्न्हीं चार बातों में एक बात अपनी भी जोड़ दो जिसका कि आप संदेश देना चाहते हैं...इस स्टाइल को तो ग्राह्य कर लिया जाएगा लेकिन अगर आपने सिर्फ अपनी हांकते रहने का ट्रैक पकड़ा तो आपको परेशानी आ सकती है...

दोपहर को सागर का कमेंट मिलने के बाद मैंने कमेंट के जरिए ही कहा था कि रात को मैं सागर की जिज्ञासाएं शांत करने की कोशिश करूंगा...साथ ही ये भी कहा था कि ये ढूंढने की कोशिश करना गुरुदत्त को लोगों ने मरने के बाद ही क्यों जाना कि गुरुदत्त वास्तव में क्या थे...

इस पर फिर सागर ने टिप्पणी भेजी...आप जो सवाल कर रहे हैं अपनी बात करूँ तो जायज़ नहीं है... और जहाँ से यह सन्दर्भ लिया है वहां यह कहने का मतलब था की की प्यासा फिल्म में गुरुदत्त के खास शायर का किरदार.... पर इतना खोल कर नहीं लिखा सोचा लोग समझ जायेंगे... मैं और भी लिखने वाला था की पुराणी दिल्ली की गलियों में दारु पी के डोलता रहता... हाँ इससे सहमत हूँ की कुछ आर्टिस्ट अंतर्मुखी होने के कारण गलत समझे जाते हैं या फिर देर से समझे जाते हैं... आर्टिस्टों से साथ ऐसा ज्यादा होता है उनकी सबसे बड़ी शिकायत यही होती है की मुझे या मेरे विचार कोई समझ नही रहा... अगर मैं उनका समकालीन होता तो कभी गलत नहीं समझता... क्यों की फिर वोही स्केल काम करता है... अभी अनुराग कश्यप अच्छी फिल्म बना रहे हैं तारीफ़ मिल रही है पर पैसा नहीं ... फिर भी मैं उनका कायल हूँ... सिर्फ उनका ही नहीं, मैंने गाँधी को नहीं मारा, या फिर एक लड़का जो लोयला से टॉप करता है और पारिवारिक तनाव में पागल हो जाता है, दिन में तम्बाकू बेचता है, गन्दी गालियाँ देता है, और लंच में पुस्तकालय आकर रोज़ हिन्दू का सम्पादकीय पढता है.... उसे धमकाकर पूछो, कलाई तोड़ कर पूछो तो पढाई छोड़ने के १४ साल बाद भी ग्लूकोज़ का अणुसूत्र याद रहता है... मैं उसका कायल हूँ... अपने दफ्तर में पोछा लगाने वाले कुमार भैया का भी हूँ जो रोज़ की परेशानियों से बाहर निकलना जानते हैं...हाशिये पर के लोगों को पहले रखें मैं उनके साथ मिलूँगा... यह अपनी तारीफ नहीं है यह मजबूरी है, कमजोरी भी खुदा जाने ताकत भी... हाँ, सागर कहिये सिर्फ... कुछ हक़ आप अपने ब्लॉग के शुरूआती दिनों से ही दे चुके हैं..दिवाली की शुभकामनाएं आपको भी...आप अगर आधी जीत कह रहे है में आपकी पूरी जीत की दुआ करता हूँ इसमें शामिल रहने की भी कोशिश करता हूँ जीत मिले हमें "आमीन"

सागर की ये दूसरी टिप्पणी पढ़ कर तो मैं भी चकरा गया कि वास्तव में वो कहना क्या चाहते हैं...लेकिन मैं जो समझा हूं, उसी के अनुरूप फिल्मों के माध्यम से ही अपनी बात कहने की कोशिश करता हूं...गुरुदत्त की कहानी क्यों ट्रेजिडी बन गई...कागज के फूल में गुरुदत्त ने अपना सब कुछ झोंक दिया था...लेकिन फिल्म फ्लाप हो गई...गुरुदत्त ऐसा टूटे कि फिर उठ न सके...गुरुदत्त की मौत के बाद ज़रूर सभी ने गुरुदत्त के कसीदे पढ़ना शुरू कर दिया..टाइम मैगजीन ने कुछ साल पहले गुरुदत्त की प्यासा को विश्व की कालजयी 100 फिल्मों में शुमार किया था...गुरुदत्त जीते जी जिस सम्मान को तरस गए, मरने के बाद वो उन पर भरपूर लुटाया गया..
गुरुदत्त की भी छोड़ो, मैं करता हूं सत्तर के दशक की बात...उसी दौर में अमिताभ बच्चन पॉपुलर सिनेमा की पहचान बन गए थे...उन्हें वनमैन इंडस्ट्री कहा जाने लगा था...लेकिन ये भी इतेफाक ही है कि उन्हीं दिनों में अंकुर, निशांत, मंथन, चक्र जैसी समांतर सिनेमा या आम भाषा में कहे तो आर्ट फिल्मों का बनना शुरू हुआ...आर्ट फिल्मों को प्रबुद्ध दर्शक मिले और अमिताभ की फिल्मों को समाज के हर वर्ग का दर्शक...लेकिन उसी दौर में एक धारा और भी बही...मध्य धारा...आर्ट और पापुलर सिनेमा के बीच की धारा...इसे बहाया ऋषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी, गुलजार जैसे निर्देशकों ने...गुड्डी, मेरे अपने, आनंद, सत्यकाम, बावर्ची,चुपके चुपके, मिली, जुर्माना, खूबसूरत, गोलमाल, दिल्लगी, बातो बातो में, रजनीगंधा न जाने कितनी बेहतरीन फिल्मों ने...जिन्हें आर्ट के दर्शक भी मिले और पापुलर सिनेमा के भी...यही मैं ब्लॉगिंग के लिए भी कह रहा हूं कि बीच का रास्ता निकालना चाहिए...एक बात और, क्या कोई बता सकता है कि अब आर्ट फिल्में क्यों नहीं बनती...क्यों उन्होंने पापुलर सिनेमा के सामने दम तोड़ दिया...और जो तुमने अनुराग कश्यप का जिक्र किया है, अच्छी सोच वाले निर्देशक हैं...लेकिन उन्हें अपनी टेलेंट पर इतना ही भरोसा है तो वो अपनी फिल्में बेचने के लिए सेक्स की ओवरडोज़ का सहारा क्यों लेते हैं....

सागर भाई, राजकपूर भी किसी महान या गंभीर फिल्मकार से एक इंच भी कम नहीं थे...लेकिन उन्होंने कलात्मक होते हुए भी पापुलर स्ट्रीम ही पकड़ी...मेरा नाम जोकर में उनकी क्लास चरम पर थी, लेकिन नतीजा क्या हुआ फिल्म फ्लाप हो गई..कर्जा चढ़ गया...उसी के बाद राजकपूर ने कहा था कि अब जो दर्शक चाहते हैं, वहीं मैं उन्हे दूंगा...फिर राजकपूर ने बॉबी बनाई और सफलता का नया इतिहास रच दिया...राजकपूर खुद चार्ली चैपलिन को अपना आदर्श मानते हैं...कि एक जोकर को दिल में चाहे जितना भी दर्द क्यों न हो जमाने को खुशियां ही बांटनी चाहिए...

आखिरी बात दाल को तड़का न लगाया जाए तो वो बेमज़ा होती है और अगर सिर्फ तड़का ही तड़का हो तो हाजमा खराब हो जाता है...जरूरत है सही दाल में वाजिब तड़का लगाने की...

स्लॉग ओवर
मक्खन दोपहर के 3 बजे बड़ी तेज़ी से घर आया...चेहरा खुशी से चमक रहा था...आते ही मक्खनी को आवाज दी...मक्खनी किचन में थी...मक्खन ने आदेशItalic दिया...सब काम छोड़कर बेडरूम में आए...मक्खनी बेचारी गैस वगैरहा बंद करके आई...तब तक मक्खन खिड़कियां वगैरहा सब बंद करके कमरे में अंधेरा कर चुका था...बेड पर लेटे मक्खन ने मक्खनी को भी बेड पर आने के लिए कहा...मक्खनी बेचारी ने वैसा ही किया...मक्खनी के आते ही मक्खन ने दोनों के ऊपर रज़ाई खींच ली...

फिर मक्खनी से बोला...देख..मेरी रेडियम की नई घड़ी...अंधेरे में कितना चमकती है...

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

अपनी टीआरपी कैसे बढ़ाएं...खुशदीप

कल मेरी पोस्ट...देश सबसे पहले...पर सागर की टिप्पणी आई थी कि यह हुआ सच्चा देशनामा... पिछले कुछ दिनों से ब्लोग्नामा बना हुआ था...सागर का ये तर्क मुझे अच्छा लगा...कि आखिर लिखा क्या जाए...ये कुंभ का मेला तो है नहीं जो छह या 12 साल बाद आएगा...यहां तो रोज़ ही कुंआ खोदना है...सागर ने जो प्रश्न किया वो अच्छे आलेख बनाम लोकप्रिय लेख में से क्या लिखा जाए, उसका सवाल उठाता है...

मेरे साथ आपने भी देखा होगा कि कई बहुत अच्छे और गंभीर लेख ब्लॉग पर आते हैं...लेकिन न तो वहां पाठक दिखते हैं और न ही टिप्पणियां...ये स्थिति बड़ी दुखद है...साथ ही ये लेखक के हौसले पर भी चोट करता है...मेरे साथ खुद भी ऐसा हुआ है कि जिस पोस्ट को मैंने गंभीर विषय मानते हुए बड़ी संजीदगी के साथ लिखा, वहां अपेक्षाकृत कम पाठक मिले...और जो पोस्ट मैंने हल्के-फुल्के अंदाज़ में लिखीं, वहां गजब का रिस्पांस मिला...अपनी पोस्ट को मनचाहा रिस्पांस नहीं मिलता तो स्वाभाविक है हमारी नज़र उन पोस्ट पर जाती है जो सबसे ज़्यादा पढ़ी जा रही हैं या जहां सबसे ज़्यादा टिप्पणियां आ रही हैं...फिर हम अपने लेखन को लोकप्रियता की तराजू पर तौलना भी शुरू करते हैं...आखिर कमी कहां हैं...कमी कहीं नहीं है...कमी है बस एप्रोच की...मैंने जहां तक लोकप्रियता या टीआरपी के शास्त्र को समझा है तो जो चीज सबसे ज़्यादा नापसंद की जाती है वो है किसी चीज पर आपका उपदेश देना...यहां मुझे ताऊ रामपुरिया का प्रोफाइल में लिखा वो वाक्य फिर याद आ जाता है...यहां ज्ञान मत बधारिए, यहां सब ज्ञानी है...ऐसे में कोई कह सकता है कि ये तो बड़ी विचित्र स्थिति है...कोई गंभीर लेखन कर ही नहीं सकता क्या...यहां मेरा मानना है कि गंभीर लेखन भी लोकप्रिय हो सकता है, बस थोड़ा सा अपना स्टाइल बदलना होगा...

पहली बात तो गंभीर लेखन पर हमें अखबार और ब्लॉग का फर्क समझना चाहिए...अखबार सिर्फ पढ़ा जाता है...लेकिन ब्लॉग में लेखक और पढ़ने वाले का टिप्पणियों के माध्यम से सीधा संवाद होता है...अखबार में संवाद हो तो सकता है लेकिन वो बड़ा समय-खपाऊ और पत्रों के जरिए लंबा रास्ता होता है...ब्लॉग की सबसे बड़ी खूबी इसका इंटर-एक्टिव होना ही है...हाथों-हाथ रिस्पांस मिल जाता है...ऐसे में लेखन के वक्त हमें ध्यान रखना चाहिए कि हमें सिर्फ अपने मन की बात ही नहीं कहते जाना...हमारे अंदर वो संयम और माद्दा भी होना चाहिए कि हम दूसरों को सुन भी सकें...अगर हम अपनी ही गाथा गाते रहेंगे तो ये इसी कहावत को चरित्रार्थ करेगा- पर उपदेश, कुशल बहुतेरे...

आपने देखा होगा रेडियो पर भी फाइन ट्यूनिंग होने पर ही स्टेशन पकड़ा जाता है और प्रसारण की आवाज साफ सुनी जाती है...अगर ट्यूनिंग नहीं होगी तो खरड़-खरड़ ही सुनाई देता रहेगा...मेरा ये सब लिखने का तात्पर्य यही है कि सबसे पहले आपको अपने पाठकों के साथ ट्यूनिंग बनानी होगी...उनकी वेवलैंथ को समझना होगा...तभी तो आप फ्रीक्वेंसी को पकड़ पाएंगे...अब मैं इसी बात को आपको सीधे और सरल शब्दों में बताता हूं...फरीदाबाद ब्लॉगर्स मीट में ब्लागिंग को बहुत गंभीरता और संजीदगी से लिए जाने के मुद्दे पर मैंने भी अपना पक्ष रखा था...मैंने वहां भी यही कहा था कि अगर आप कुछ कहना चाहते हैं तो साथ में आपको इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि लोग सुनना या पढ़ना क्या चाहते हैं...आपका लेखन तभी सार्थक हो पाएगा जब लोग आपको पढ़े...इसके लिए आपको चार बातें वो लिखनी होंगी जो लोग पसंद करते हैं...इन चार बातों के बीच आप अपनी एक बात भी रख सकते हैं, जिसका कि संदेश आप देना चाहते हैं...इस तरह आपका मकसद भी पूरा हो जाएगा और लोगों को भी वो डोज़ मिल जायेगी जिसकी वो अपेक्षा रखते हैं...

यहां स्टोरी-टैलर या किस्सागो (किस्से सुनाने वालों) को अपना आदर्श बनाया जा सकता है...मुझे याद है मैं बचपन में मेरठ में अपनी दुकान पर कभी-कभी बैठा करता था...बुधवार को हमारी दुकान खुलती थी लेकिन पूरा बाजार बंद रहता था...ऐसे में हमारी साथ वाली दुकान के बाहर थड़े पर एक जड़ी-बूटियां बेचने वाला डेरा लगा लेता था...पहलवान टाइप के उस शख्स को मैं अपनी दुकान से ही देखता रहता था...लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए वो सबसे पहले कमीज उतार कर पहलवान की तरह अपने बाजुओं पर हाथ मारना शुरू कर देता था...राह चलते लोगों का ध्यान अपने आप उसकी तरफ जाना शुरू हो जाता था...फिर वो पहलवान दो तीन मजेदार किस्से सुनाकर चार-पांच लोग इकट्ठे कर ही लेता था...फिर देखते ही देखते मजमा बढ़ने लग जाता था...उसका ज़ड़ी-बूटियां (कथित शक्तिवर्धक) बेचने का तरीका भी बड़ा दिलचस्प होता था...वो भीड़ मे से ही अपने ग्राहक ताड़ लेता था...फिर अकेले में उनसे बात करते हुए न जाने कौन सा मंत्र मारता था कि वो झट से जड़ी-बूटियां खरीदने के लिए तैयार हो जाते थे...उसे देखते हुए मैं यही समझता कि कितना बढ़िया सेल्समैन है और अपना माल बेचने के लिए क्या-क्या पापड़ नहीं बेलता...

लगता है जो मैं कहना चाहता था, वो आप तक पहुंच गया होगा...

स्लॉग ओवर
मक्खन बाहर से घर आया...मक्खनी के पास बैठा ही था कि मक्खनी ने कहा...क्या बाज़ार से मूली का परांठा खाकर आए हो...मक्खन ने कहा...नहीं... नहीं...सैंडविच खाया था...मक्खनी ने कहा...रहने दो...रहने दो...आदमी होठों से ही झूठ बोल सकता है और कहीं से नहीं...

बुधवार, 14 अक्तूबर 2009

देश सबसे पहले...खुशदीप

कभी कभी बहुत थोड़े में भी अपनी बात कहने की कोशिश करनी चाहिए...वहीं आज मैं कर रहा हूं...देश सबसे पहले है...और धर्म वो आंतरिक शक्ति देता है जिससे कि इंसानियत के पैगाम को सही अर्थों में समझा जा सके...
HINDU...I...SM
JAI...N...ISM
BUD...D...HISM
SIKH...I...SM
ISL...A...M
CHRISTA...N...ITY

(देश के सभी धर्मों से ही निकल रहा है...INDIAN...का संदेश)

पाबला जी...मैं...महफूज़ भाई...पीटर और देश को सबसे पहले समझने वाली सोच के सभी भाई-बहन
दीवाली के दीप साथ जलाएंगे
ईद की खुशियां मिल कर बांटेंगे
गुरपूरब पर साथ गुरु का प्रसाद छकेंगे
क्रिसमस पर साथ केक काटेंगे

( अगर नफ़रत के सौदागर अब भी भाईचारे के संदेश को नहीं समझते हैं तो हम सिर्फ उन पर तरस खाने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते...)

स्लॉग ओवर
जापान में प्राइमरी के बच्चों को एक पाठ पढ़ाया जाता है...बच्चों तुम सबसे ज़्यादा सम्मान किसका करते हो...जवाब मिलता है...महात्मा बुद्ध का...दूसरा सवाल...बच्चों अगर कोई महात्मा बुद्ध को बुरा-भला कहे तो तुम क्या करोगे...जवाब...हम उसे ऐसा करने से रोकेंगे...तीसरा सवाल...अगर महात्मा बुद्ध ही तुम्हारे देश पर हमला कर दे तो क्या करोगे...जवाब आता है...उन्हीं का सिर काट देंगे...
 
 

सोमवार, 12 अक्तूबर 2009

"गब्बर" मरा नहीं, फटा था...खुशदीप

भाइयों अब फुर्सत में आया हूं...इस शोले पुराण को जिन्होंने भी हिट बनाया...पहले तो उन सभी का आभार...सवालों के सही जवाबों तक पहुंचने के लिए खास तौर पर अदा जी, उड़न तश्तरी वाले गुरुदेव, अवधिया जी, आशीष श्रीवास्तव, राजीव तनेजा जी, नीरज रोहिल्ला, सतिंद्र जी, यूसुफ अंसारी का शुक्रिया...और हमारे महफूज़ भाई तो इतने मासूम है कि शोले डीवीडी पर देखे भी जा रहे थे, फिर भी एक भी सवाल का सही जवाब नहीं दे पाए...और ताऊ रामपुरिया...पहले तै मुझे लठ्ठ लेकर ढूंढे सा, अब मै तैणे ढूंढ रहा हू...सारे विजेता इनाम के पीछे जो पड़े हैं...

अब 3-4 जानकारियां मेरे पास और है जो सवालों के जवाबों मे नहीं आ सकी, वो आपके साथ बांटना चाहता हूं...

अमजद खान के पिता जयंत भी गजब के एक्टर थे...पठान का रोल तो उन पर ऐसा फबता था कि पूछो मत...अवधिया जी ने सही बताया कि उनका असली नाम ज़कारिया खान ही था...

अमजद खान के भाई इम्तियाज... अमजद से पहले ही फिल्मों में स्थापित हो गए थे...कई फिल्मों में उन्होंने विलेन और चरित्र अभिेनेता के रोल किए...

अमजद खान ने भी अब दिल्ली दूर नहीं में बाल कलाकार की भूमिका निभाई थी...वयस्क के तौर पर उनकी पहली फिल्म थी हिंदुस्तान की कसम

अमजद खान ने दो फिल्मों चोर पुलिस...अमीर आदमी, गरीब आदमी का निर्देशन भी किया था...

अमजद खान के बेटे शादाब खान... रानी मुखर्जी की पहली फिल्म राजा की आएगी बारात के हीरो थे...लेकिन उसके बाद उनकी दाल फिल्मों में गली नहीं...
Italic

एक सवाल जिसका जवाब शोले पुराण मे नहीं मिल पाया कि अमजद खान को सबसे ज़्यादा शौक किस चीज़ का था...तो जनाब वो शौक था चाय का...बताते हैं कि सेट पर स्पाट बॉयस को ये ताकीद रहती थी कि जैसे ही चाय का प्याला खाली हो, नया प्याला हाजिर हो जाना चाहिए...और ये शौक ही शायद अमजद खान को हमसे इतनी जल्दी दूर ले गया...आखिरी सालों में वो इतने फूल गए थे कि आसानी से चल भी नहीं पाते थे...मुझे याद है जब उनकी मौत हुई थी तो मैंने एक दोस्त को इस बारे में बताया था...मेरे दोस्त का जवाब था...अमजद मरे नहीं बल्कि फट गए...शुगर जैसी बीमारियों और मोटापे ने ही इतने बेहतरीन अभिनेता का इतनी जल्दी अंत कर दिया...

खैर अमजद खान की बातें तो काफी हो गईं...अब आते हैं जय यानि अमिताभ बच्चन के शोले में किरदार पर...ये सच है कि जय के रोल के लिेए जी पी सिप्पी और रमेश सिप्पी की पहली पसंद शत्रुघ्न सिन्हा ही थे...लेकिन बात बनी नहीं थी...तब अमिताभ को इस रोल के बारे में पता चला तो उन्होंने धर्मेंद्र से संपर्क किया और रमेश सिप्पी से बात करने का आग्रह किया...धर्मेंद्र के कहने पर ही अमिताभ को जय का रोल मिला...जहां तक वीरू के रोल की बात है तो उस वक्त धर्मंद्र की हीमैन के तौर पर बॉलीवुड में तूती बोलती थी...और धर्मेंद्र ही वीरू के लिए एकमात्र पसंद थे....

जहां तक शोले के रिकार्ड का सवाल है तो शोले 15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई थी...मुंबई के मिनर्वा सिनेमा में शोले लगातार 265 हफ्ते तक चलती रही थी...2001 में दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे ने मुंबई के मराठा मंदिर में शोले का रिकॉर्ड तोड़ा...दिल वाले दुल्हिनया ले जाएंगे, इस साल मार्च तक 700 हफ्ते लगातार चलने का रिकॉर्ड कायम कर चुकी थी...ये फिल्म क्या अब भी मराठा मंदिर में चल रही है, मुंबई निवासी कोई ब्लॉगर भाई ही इस पर सही जानकारी दे सकता है...

इति शोले पुराण...

स्लॉग ओवर
मक्खन का पुत्र गुल्ली मैथ्स में फेल हो गया...मक्खन घर आया तो मक्खनी ने शिकायत की...मक्खन के लिए तो खुद मैथ्स बचपन में जान का सबसे बड़ा दुश्मन था...फिर भी मक्खनी के सामने उसने पिता धर्म निभाते हुए पूछा...गुल्ली पुतर...मैथ्स में नंबर क्यों नहीं आए...गुल्ली भी ठहरा मक्खन का पुतर...बोला...पापाजी...ये हमारी मैथ्स की मैडम भी न कुछ नहीं जानती...कभी मुझे कहती है 6 और 2...8 होते हैं...कभी कहती है 4 और 4...8 होते हैं...कभी कहती है 5 और 3...8 होते हैं...अब बताओ मैं कौन सी बात मानूं...

आशीष श्रीवास्तव पड़े उड़न तश्तरी पर भारी

पहले तो माफी चाहूंगा, वादे के मुताबिक ठीक 12 बजे पोस्ट लेकर हाजिर नहीं हो पाया...क्यों नहीं हो पाया...क्योंकि और भी मजबूरियां हैं ज़माने में शोले के सिवा...तो खैर अब आता हूं सीधे काम की बात पर...

जैसे कि मैंने कहा था कि उड़न तश्तरी फिल्मों के पुराने पापी लगते हैं...मेरे पोस्ट करने के ठीक एक घंटे बाद ही कल रात 12.48 पर दूसरे और तीसरे सवाल का सही जवाब लेकर आ गए थे...जीतेंद्र और जीनत अमान की रोमांटिक जोड़ी फिल्म यह देश (1984) और अमिताभ-माला सिन्हा की फिल्म संजोग (1971)...लेकिन पहले और अहम सवाल.. शोले में रियल मर्डर...को लेकर उड़न तश्तरी वाले गुरुदेव कुछ ऊहापोह में दिखे...इसलिए उन्होंने ठोस और सटीक जवाब के लिए ताऊ रामपुरिया की राम प्यारी की शरण में जाना ही बेहतर समझा...इसके बाद रात 1.43 पर डॉ अमर कुमार आए...अटल बिहारी वाजपेयी के छायावाद स्टाईल में उन्होंने एक बहुत बड़ा क्लू दिया...महबूबा वाले गाने से पहले बकरे का मर्डर का जिक्र कर...अब इसके बाद सुबह होते ही 8.34 पर अदा आईं...दूसरे और तीसरे सवाल का सही जवाब लेकर...सम्राट और संजोग...सच बताऊं जीतेंद्र और जीनत अमान की रोमांटिक जोड़ी वाली फिल्म का सही जवाब मेरा भी सम्राट था...लेकिन उड़न तश्तरी ने पहले ही... यह देश ...जवाब देकर मेरे ज्ञान में और वृद्धि कर दी...
हां, ये बात अलग है कि यह देश में एक हीरो कमल हासन भी थे...लेकिन उम्र के हिसाब से फिल्म में जीतेंद्र की जोड़ी जीनत अमान के साथ ही होगी...तो अब दूसरे और तीसरे सवाल के सही जवाब तो मिल गए थे...लेकिन पहले सवाल का जवाब अब भी नदारद था...सुबह 9.41 पर फिर उड़न तश्तरी आए...डॉक्टर अमर कुमार के क्लू का हवाला देते हुए कहा कि बकरा तो कटते हुए हम भी देखे थे लेकिन जब तक जवाब पर राम प्यारी की मुहर नहीं लग जाएगी, पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकते...मुझे ये समझ नहीं आ रहा था राम प्यारी सटीक उत्तर देने में इतना देर क्यों लगा रही थी...क्या वो भी गूगल देवता को छान रही थी....

खैर दोपहर हो गई...सही जवाब नहीं आया...दोपहर बीत जाने के बाद 3.59 पर वो जवाब आया जिसकी मैं शिद्धत के साथ तलाश कर रहा था...जवाब देने वाले सूरमा थे आशीष श्रीवास्तव...जनाब ने शोले 27 बार देख रखी थी...भला इनसे गलती कहां होने वाली थी...जवाब दिया....हत्यारा था गब्बर सिंह और मृतक था श्रीमान चिंटा सिंह...बिल्कुल ठीक चोट की आशीष भाई ने...अब आप पूछेंगे कि चिंटा सिंह कौन...ये चिंटा सिंह थे चींटा या दूसरी जुबान में कीड़ा...महबूबा वाले गाने के दौरान ही एक कीड़ा गब्बर बने अमजद की बाजू पर दौड़ रहा होता है और अमजद दूसरे हाथ से वहीं उसका काम तमाम कर देते हैं...था न रियल मर्डर...अब आप ये जवाब सुनकर खोदा पहाड़, निकला कीड़ा का राग मत अलापना शुरू कर देना...क्यों मर्डर सिर्फ क्या इंसानों का ही होता है...कीड़ों में जान नहीं होती क्या...और अब तो इंसानों ने ही कीड़ों वाले काम करना शुरू कर दिया है...फिर कीड़े के मर्डर पर सवाल क्यों न उठाया जाए...

इस तरह तीनों सही जवाब मुझे मिल गए थे...लेकिन शाम 6.59 पर उड़न तश्तरी फिर दनदनाते हुए आए...राम प्यारी से सही जवाब की घुट्टी लेकर...गब्बर ने चींटे को मसल कर मारा था...और उड़न तश्तरी ने हाथों-हाथ ईनाम की फरमाईश कर दी...लेकिन तब तक तो आशीष श्रीवास्तव बाजी मार गए थे...आशीष ने सबसे अहम सवाल का तो सही जवाब दिया लेकिन दूसरे और तीसरे सवाल का जवाब नहीं दिया...उड़न तश्तरी टुकड़ों में तीनों सही जवाब तक पहुंचे...और अदा ने सम्राट जवाब देकर मेरे दूसरे सवाल के जवाब से सही मिलान किया...इसलिए क्रम के अनुसार विजेता भी ये तीनों हैं

1. आशीष श्रीवास्तव
2. उड़न तश्तरी
3. अदा

अब इन तीनों विजेताओं का ताऊ रामपुरिया सम्मान करेगा...ताऊ तो बड़ा उस्ताद निकला...आज मेरी पोस्ट की तरफ झांक कर भी नहीं देखा...लेकिन अब ताऊ विजेताओं का सम्मान करने से नहीं बच सकता...

चलो विजेता तो मिल गए लेकिन इस पोस्ट से कुछ गजब के फायदे भी हुए...वो क्या क्या...
1 महफूज़ अली भाई ने अब तक शोले नहीं देखी थी...खास तौर पर डीवीडी मंगा कर देख ली...
2. अनिल पुसदकर ने पढ़ाई के वक्त क्या-क्या गुल खिलाए थे, सभी ब्लॉगर भाईयों को पता चल गया...
3. उड़न तश्तरी और डॉ टी एस दराल का मूड बदल गया
(वैसे दोनों ने मूड बनाने पर भी कोई सांठगांठ कर ली लगती है...नहीं तो उड़न तश्तरी वाले गुरुदेव डॉ दराल से ईनाम न लेने की बात करते )

हां एक बात तो बताना भूल ही गया था रात 11.34 पर राजीव तनेजा भी तीनों सही सवालों का जवाब लेकर आए......ठीक उसी अंदाज़ में कारवां निकल गया, हम गुबार पीटते रहे...

स्लॉग ओवर
शोले की मेरी पहेली के जवाब में यूसुफ अंसारी भाई ने ऐसे दो सवाल दागे हैं कि मेरा दिमाग भी चकरा गया है...लाख कोशिश करने पर भी इन सवालों का मैं जवाब नही दे पाया...आपको पता हो तो ज़रूर बताएं...नहीं तो सही जवाबों के लिए मुझे कल यूसुफ भाई को ही पकड़ना होगा...

पहलाः- क्या शोले के दीवाने बताएंगे कि गब्बर सिंह के बाप का क्या नाम था ?
दूसराः- शोले फिल्म में किसका डबल रोल था ?

शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

आपने शोले कितनी बार देखी है...खुशदीप

ताऊ रामपुरिया से भी मेरा यही सवाल है कि उसने शोले कितनी बार देखी है...ताऊ, राम प्यारी... अपनी पहेलियों से फिल्मों के ज्ञान की घणी परीक्षा लेवे से...तो आज मैं ताऊ को कोने छोड़ूं...जो पूछने जा रहा हूं, अगर दूसरे ब्लॉगर भाइयों को इसका जवाब मालूम हो तो वो भी बताएं...अगर ताऊ ने इस सवाल का जवाब न दिया और किसी दूसरे ब्लॉगर भाई ने दिया तो ताऊ तुझे ही विजेता का पगड़ी पहनाकर मान बढाना होए से...

अब कच्ची गोलियां मैं भी न खेला...शोले वाले सवाल के साथ दो और सवाल भी रखूंगा, वो भी फिल्मों पर ही...चक्रव्यूह सजाऊंगा तो पूरा ही सजाऊंगा...वैसे शोले वाला जो सवाल है उसे लेकर रमेश सिप्पिवा मेरे पीछे न पड़ जाए...कि 34 साल से जो राज उसने दबाया हुआ था वो मैंने खोल दिया...हो सकता है 34 साल से इस मामले में दबी पुलिस फाइल फिर खुल जाए...लेकिन सच तो सच ही है, इक दिन सामने आना ही होता है...चलो अब जो भी अंजाम हो...मैं तो आपसे अपने तीन सवाल पूछता हूं...

सवाल नंबर 1
शोले में परदे पर आपने बड़ा खून-खराबा देखा होगा...लेकिन शूटिंग के दौरान सच में ही एक कत्ल या मर्डर हुआ था...उस कत्ल के शाट को एडीटिंग के दौरान काटा भी नहीं गया...इसलिए फिल्म देखने वालों को एक जगह उस कत्ल की झलक भी मिलती है...आप बता सकते हैं कि वो सीन फिल्म में कहां था...मरने वाला कौन था और मारने वाला कौन था...

सवाल नंबर 2
जीतेंद्र और जीनत अमान ने किस फिल्म में रोमांटिक पेयर के रोल किए थे...यहां बताता चलूं धर्मवीर में जीनत अमान की जोड़ी धर्मेंद्र के साथ थी...

सवाल नंबर 3
अमिताभ बच्चन की किस फिल्म में माला सिन्हा उनकी हीरोइन थीं...वैसे इस फिल्म में अमिताभ की पत्नी की भूमिका अरुणा ईरानी ने निभाई थी...

चलिए अब फटाफट जवाब भेजिए...सही जवाब कल रात 12 बजे अपनी अगली पोस्ट पर आपको बताऊंगा...

स्लॉग ओवर
अब तो लिव इन रिलेशनशिप (रोमांटिक दोस्ती से थोड़ा ज्यादा और शादी से थोड़ा कम वाला रिश्ता) का रिवाज भारत के महानगरों में भी देखा जाने लगा है...लेकिन पश्चिम के देशों में बरसों से ये प्रचलन में है...ऐसे ही विदेश में एक जोड़ा बिना शादी किए ही साथ-साथ रहता था...एक दिन पुरुष पार्टनर (अब पति तो कह नहीं सकता) बॉथरूम में नहा रहा था...महिला पार्टनर (ये भी पत्नी नहीं) किचन में नाश्ता तैयार कर रही थी कि घर की डोर-बेल बजी...

महिला ने दरवाजा खोला...सामने एक टिपटॉप गबरू जवान खड़ा था...आते ही पूछा कि मिस्टर....कहां हैं...महिला ने जवाब दिया...बाथरूम में हैं, उन्हें थोड़ा टाइम लगेगा, आप काम बताइए...जवान बोला...कोई...कोई नहीं... दरअसल मुझे आपसे ही काम था...मैं एक मल्टीनेशन कंपनी में काम करता हूं...हमारी कंपनी ने एक लव प्रमोशन स्कीम चलाई हुई है...आप इसके तहत 1000 डॉलर कमा सकती हैं...

महिला ने भी सोचा मंदी का ज़माना है...1000 डॉलर कमा लिए जाए तो क्या बुराई है...महिला ने पूछा...इसके लिए मुझे क्या करना होगा...जवान बोला...कुछ नहीं बस आपको मुझे दो मिनट का एक किस देना होगा...महिला अचकचाई लेकिन फिर 1000 डॉलर के लालच में शर्त मानने को तैयार हो गई...

थोड़ी देर बाद पुरुष पार्टनर बाथरूम से बाहर निकला तो महिला बड़ी खुश दिखाई दी...पूछा... क्या बात है...महिला ने कहा...मैंने आज सुबह सुबह घर बैठे ही 1000 हज़ार डॉलर कमा लिए...ये सुनकर पुरुष पार्टनर बोला...आज तो वाकई बड़ा अच्छा दिन है...मेरे आफिस के एक साथी ने मुझसे दो महीने पहले 1000 डॉलर उधार लिए थे और उसने वादा कर रखा है कि आज सुबह ही वो घर पर आकर उधार चुका जाएगा...

यहां सब ज्ञानी हैं...खुशदीप

किसी पोस्ट पर ही पढ़ा था, लेकिन लिखने वाले ब्लॉगर भाई का नाम याद नहीं आ रहा...इसलिए क्षमा चाहता हूं...पढ़ा ये था कि एक पान वाला शाम को दुकान पर वक्त से कुश्ती लड़ने वाले ठलुओं के जमघट से परेशान हो गया...लेना एक नहीं और हर ठलुआ मुफ्त में बिन मांगे लगता ज्ञान बधारने...दूसरे ठलुए भी कम घिसे हुए थोड़े ही होते...एक से एक लंबी छोड़ी जाती...मां-बहन एक करने पर आते तो ओबामा तक की खाट खड़ी कर दी जाती...पान वाला भी सुनते-सुनते कुछ ज्ञानी तो हो ही गया था...उसने ठलुओं को भगाने की गरज से दुकान पर बड़ी सी तख्ती टांग दी...जिस पर लिखा था...यहां ज्ञान मत बधारिए....यहां सब ज्ञानी हैं...

वैसे ज्ञानी भी किस्म-किस्म के होते हैं...ज्ञानियों की सबसे खतरनाक नस्ल वो होती है जो अपने सोचे...कहे...लिखे...पढ़े को ही ब्रह्मा का वाक्य मानती है...ज़रा सा कोई आइना दिखा दे तो तर्क-कुतर्क के ऐसे-ऐसे फंडे कि चेताने वाला ही हाथ जोड़ ले...भईया जग में तू अकेला ज्ञानी, बाकी सब कूप-मंडूक...बस हमें माफ़ कर...
आज स्लॉग ओवर में ऐसे ही एक ज्ञानी का किस्सा

स्लॉग ओवर
एक राजा की बड़ी सुंदर राजकुमारी थी...बिटिया ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो राजा को उसके हाथ पीले करने का फिक्र हुआ...लेकिन दामाद भी तो राजकुमारी की टक्कर का ही चाहिए...ऊपर से राजकुमारी का और फरमान...शादी करेगी तो सिर्फ सर्वगुण संपन्न लड़के से जिसमें 100 के 100 गुण हों...अगर एक भी गुण कम हुआ तो शादी नहीं करेगी...राजा ने बिटिया की इच्छा को देखते हुए पूरे राज्य में मुनादी करा दी कि जिसमें भी 100 गुण होंगे, उससे वो बिटिया की शादी कर देगा साथ ही एक जागीर का मालिक भी बना देगा...

लेकिन अब सर्वगुण संपन्न, 100 कलाओं को जानने वाला लड़का मिले तो मिले कहां से...किसी में 30 गुण तो किसी में 40... ज़्यादा से ज़्यादा राजा की नज़र में 60 गुण वाला लड़का ही आ सका...लेकिन राजकुमारी कहां शादी के लिए तैयार होने वाली...ऐसे ही मनचाहा लड़का मिल नहीं पा रहा था...और वक्त गुज़रता जा रहा था...राजा की परेशानी भी बढ़ती जा रही थी...राजकुमारी भी टस से मस होने को तैयार नहीं...

उसी राज्य में एक ताऊ रहता था...उसे राजा की परेशानी का पता चल गया...उसने अपने निखट्टू छोरे से कहा...चल भई चल, जैसे हर कुत्ते का दिन आता है, ऐसे ही तेरा भी आ गया है...तेरी शादी होगी राजकुमारी से...बस अब जैसे जैसे मैं कहता जाऊं, तू करता जाइओ...बस तुझे बोलना एक शब्द नहीं है...जो बोलूंगा मैं ही बोलूंगा...ये समझाने के बाद ताऊ छोरे को लेकर राजा के दरबार में जा धमका...

ताऊ राजा से सीधे लठ्ठमार लहजे में ही बोला...देख भई राजा...मैं झूठ तो बोलूं ना...तू कभी फेर कहे कि ताऊ ने झूठ बोल्या...मेरे छोरे में 98 गुण हैं...बस दो गुण नहीं है...अब इसमें तेरी लल्ली का मिज़ान बनता हो तो देख ले...98 गुण की बात सुनकर राजा की आंखों में चमक आ गई...बेचारा हर जगह की खाक जो छान चुका था...राजा ने ताऊ और छोरे को मेहमानखाने में ले जाकर तगड़ी खातिरदारी करने का हुक्म दिया और खुद बिटिया के कक्ष में जा पहुंचा...राजा ने बेटी को समझाया...बिटिया 98 से ज़्यादा गुण वाला लड़का नहीं मिल सकता...मैं ढूंढ ढूंढ कर हार चुका हूं...अब तेरी भलाई इसी में है कि तू इस लड़के से शादी कर ले...और मैं भी कन्यादान के फर्ज से मुक्ति पाऊं...राजकुमारी को भी पिता पर तरस आ गया और उसने शादी के लिए हां कर दी...धूमधाम से शादी हो गई...जागीर भी मिल गई...

शादी के बाद राजा के महल से बिटिया की विदाई का वक्त आया तो राजा ने ताऊ को अपने पास बुला कर कहा कि अब तो मेरी बिटिया आपकी हो गई है...अब बस मुझे वो दो गुणों के बारे में बता दो जो तुम्हारे बेटे में नहीं हैं...भई मेरी बिटिया भी समझदार है, पढ़ी लिखी है...हो सकता है कि वो ही उन दो गुणों के लिए तुम्हारे बेटे को तैयार कर दे...राजा की बात सुनकर ताऊ बोला...देख भई राजा... वैसे तो मैं अपने बेटे की दो कमजोरियों के बारे में किसी को बताता नहीं...अब तू इतना कह रहा है तो बता देता हूं...पहली बात...ये छोरा कुछ जाणता नहीं...और दूसरी बात...कोई इसे समझाने की कोशिश करे तो ये माणता नहीं...इब लगा ले तेरी बेटी कितना भी ज़ोर...

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

ब्लॉगिंग में सब अच्छा हो रहा है...

हिंदी ब्लॉगिंग जगत में गंदगी घुस आई है...जो हो रहा है, वो अच्छा नहीं हो रहा...धर्म को लेकर क्रिया-प्रतिक्रिया में आस्तीनें चढ़ी ही रहती हैं...नाक के सवाल पर एक-दूसरे के मान-मर्दन तक की नौबत...ये क्या हो रहा है...भाई ये क्या हो रहा है...इसी स्थिति से खिन्न होकर कल्पतरू वाले विवेक रस्तोगी जी ने एक हफ्ते तक पोस्ट न लिखने का ऐलान कर दिया...
 
धर्म प्रचार पर हंगामा हो रहा है हमारी ब्लॉग दुनिया में, इसे दूर करें !!!!! विरोध में सात दिन ब्लॉग पर पोस्ट पब्लिश नहीं करुँगा…
 
उड़न तश्तरी वाले गुरुदेव समीर लाल जी समीर ने भी कहा-

ये क्या हो रहा है?
आज कल जो हालात हुए हैं, मजहब के नाम पर जो दंगल मचा है, उसे देख कुछ कहने को मन है:
किसको खुदा औ’ भगवान की जरुरत है, आज हमको यहाँ, इंसान की जरुरत है..
-समीर लाल ’समीर’


ये तो रही विवेक भाई और समीर जी की बात...लेकिन मैं इससे ठीक उलटा सोच रहा हूं...अपनी बात साफ करने के लिए आज मैं स्लॉग ओवर में कोई गुदगुदाने वाली बात नहीं कहने जा रहा...बल्कि एक महान हस्ती के साथ पेश आया वाकया सुनाने जा रहा हूं...महान हस्ती कौन थीं, जानकर उनका नाम नहीं बता रहा..क्योंकि हर बात को मज़हब के चश्मे से देखने वाले उनके नाम को लेकर ही कोई टंटा न खड़ा कर दें, ये मैं नहीं चाहता...एक बात और संत या सूफी किसी मज़हब या कौम के नहीं होते बल्कि पूरी इंसानियत के लिए होते हैं...
 
स्लॉग ओवर
कई सदियों पहले की बात है...एक सिद्ध पुरुष अपने चेले के साथ भ्रमण पर निकले हुए थे...घूमते-घूमते एक गांव में पहुंचे...वहां पूरा गांव सिद्ध पुरूष की सेवा में जुट गया...कोई एक से बढ़ कर एक पकवान ले आया...कोई हाथ से पंखा झलने लगा...कोई पैर दबाने लगा...किसी ने नरम और सुंदर बिस्तर तैयार कर दिया...सुबह उठे तो फिर वही सेवाभाव...सिद्ध पुरुष का गांव से विदाई लेने का वक्त आ गया...गांव का हर-छोटा बड़ा उन्हें विदा करने के लिए मौजूद था...सिद्ध पुरुष ने गांव वालों के लिए कहा...जाओ तुम सब उजड़ जाओ...यहां से तुम्हारा दाना-पानी उठ जाए...
सिद्ध पुरुष के मुंह से ये बोल सुनकर उनके चेले को बड़ा आश्चर्य हुआ...ये महाराज ने गांव वालों की सज्जनता का कैसा ईनाम दिया लेकिन चेला चुप रहा...गुरु और चेला, दोनों ने फिर चलना शुरू कर दिया...शाम होने से पहले वो एक और गांव में पहुंच गए...
ये गांव क्या था साक्षात नरक था...कोई शराब के नशे में पत्नी को पीट रहा है...कोई जुआ खेलने में लगा है...कोई गालियां बक रहा है...यानि बुराई के मामले में हर कोई सवा सेर...सिद्ध पुरुष को देखकर कुछ गांव वालों ने फब्तियां कसना शुरू कर दिया...ढोंगी महाराज आ गया...सेवा तो दूर किसी ने गांव में पानी तक नहीं पूछा...खैर गांव के पीपल के नीचे ही किसी तरह सिद्ध पुरुष और चेले ने रात बिताई...विदा लेते वक्त सिद्ध पुरुष ने गांव वालों को आशीर्वाद दिया...गांव में तुम सब फूलो-फलो...यहीं दिन दूनी, रात चौगुनी तरक्की करो...यहीं तुम्हे जीवन की सारी खुशियां मिलें...
चेला वहां तो चुप रहा लेकिन गांव की सीमा से बाहर आते-आते अपने को रोक नहीं पाया...बोला...महाराज ये कहां का इंसाफ है...जिन गांव वालो ने सेवा में दिन-रात
एक कर दिया, उन्हें तो आपने उजड़ने की बद-दुआ दी और जो गांव वाले दुष्टता की सारी हदें पार कर गए, उन्हें आपने वहीं फलने-फूलने और खुशहाल ढंग से बसे रहने का आशीर्वाद दे दिया...

ये सुनने के बाद सिद्ध-पुरुष मुस्कुरा कर बोले...सज्जनों में से हर कोई जहां भी उज़ड़ कर जाएगा, वो उसी जगह को चमन बना देगा...और इन दुर्जनों में से कोई भी स्वर्ग जैसी जगह भी पहुंचेगा तो उसे नरक बना देगा...इसलिए अच्छा यही है कि वो जहां है, वहीं बसे रहे...इससे और दूसरी जगह तो बर्बाद होने से बची रहेंगी...

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

उड़न तश्तरी...गलती अब भी जारी है

उड़न तश्तरी वाले गुरुदेव समीर लाल समीर जी...क्षमा कीजिएगा...मैं अपने सिद्धांत के खिलाफ जाकर अपनी पोस्ट के शीर्षक में आपके नाम का इस्तेमाल कर रहा हूं...लेकिन यहां ऐसा करना किसी सोचे समझे प्रायोजन के तहत नहीं बल्कि मेरी विवशता है...ज़्यादा बात को घुमाने की जगह मैं सीधे विषय पर आता हूं...

देश के नामचीन कार्टूनिस्ट इरफान भाई से एक गलती हुई...6 अक्टूबर शाम 7.49 पर उन्होंने अपनी कार्टून आधारित पोस्ट का शीर्षक दिया...उड़न तश्तरी के मुंह पर भी थूक दिया क्रिकेट ने...निश्चित तौर पर शीर्षक हम ब्लॉगर्स के लिए बड़ा झटका देने वाला था...पोस्ट को जिसने भी खोला, उसे समझ आ गया कि माज़रा क्या है...दरअसल इरफान भाई प्रसिद्ध धाविका पी टी उषा के लिए उड़नपरी की जगह उड़नतश्तरी का इस्तेमाल कर गए थे...मैं नहीं समझता कि इरफ़ान भाई ने जान-बूझ कर ये गलती की होगी...उन जैसे नामी कार्टूनिस्ट को ऐसा हथकंडा अपनाने की ज़रूरत नहीं थी...निश्चित तौर पर भूल से उनसे ऐसा हुआ...और इसका पता भी चल गया जब दो तीन सुधी ब्लागर्स ने टिप्पणियों के ज़रिए इरफान जी से भूल सुधारने को कहा...और उन्होंने पता चलते ही भूल सुधार कर अपनी पोस्ट पर उड़नतश्तरी की जगह उड़नपरी कर दिया...खुद समीर जी ने अपने स्वभाव के अनुसार इरफान भाई की पोस्ट पर बड़ी सयंत टिप्पणी में उड़नतश्तरी की जगह उड़नपरी होने पर राहत जताई...
अब जा के बेचैन दिल को करार आया. हमें लगा कि जाने कहाँ इरफान भाई की शान में गुस्ताखी हो गई हमसे. :)

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हो गई...ये ठीक है इरफ़ान भाई ने अपनी पोस्ट में शीर्षक बदल दिया...लेकिन ब्लॉगवाणी के लिंक में... पसंद, टिप्पणी, ज़्यादा पढ़े गए... वाले कॉलमों में वही आपत्तिजनक शीर्षक पूरे 24 घंटे चलता रहा... दरअसल ऐसी व्यवस्था ही नहीं है कि कोई ब्लॉगर गलती पाए जाने पर अपने शीर्षक या पोस्ट के पहले पैराग्राफ में कोई सुधार करता है तो वही सुधार लिंक पर भी दिखाई देने लगे...ब्लॉगर की पोस्ट में तो गलती सही हो जाती है, लेकिन एग्रीगेटर के लिंक पर वो गलती बनी रहती है...ये गलती हफ्ते, महीने, साल में ज्यादा पढ़े गए वाले कॉलम के हिसाब से देखे तो कितनी लंबी चल सकती है, इसका खुद ही अंदाज लगाया जा सकता है...

अनजाने में इरफ़ान भाई से गलती हुई...गलती वाला शीर्षक एग्रीगेटर के लिंक पर दिन भर चलता रहा...इरफ़ान जी की इस पोस्ट को रात पौने एक बजे तक एग्रीगेटर पर 77 पाठकों के साथ 5 पसंद मिली थी...जबकि इरफान जी की इससे पहले की 10 पोस्ट को क्रमश 18,19,26,20,71,21,14,9,12,6 ही पाठक मिले थे...इन दस पोस्ट में 1 अक्टूबर को उनकी की गई पोस्ट... चीन के मुंह पर एक तमाचा... को ही 71 पाठक मिले, बाकी ज्यादा से ज्यादा का आंकड़ा 26 तक ही गया...ज़ाहिर है गलत शीर्षक वाली उनकी पोस्ट को 76 पाठक मिले तो इसमें बड़ा हाथ उ़ड़नतश्तरी नाम का शीर्षक में होना रहा...ये ठीक है इरफान जी के ब्लॉग पर उड़नपरी हो चुका था लेकिन लिंक पर उड़नतश्तरी वाला शीर्षक बदस्तूर जारी रहने की वजह से जो भी नया पाठक उस शीर्षक को पढ़ता कौतुहलवश पोस्ट पर ज़रूर जाता...

कहने वाले कह सकते हैं कि ये कोई बड़ा मुददा नहीं है...जब खुद समीर जी राहत जता चुके हैं और इरफान भाई गलती सुधार चुके हैं तो बात वहीं खत्म हो जानी चाहिए थी...लेकिन मेरा सवाल ये है कि ब्लॉगवाणी के लिंक पर वो गलती अब भी मौजूद है...उसे सुधारने के लिए क्या किया जा सकता है...आज समीर जी के साथ ये हुआ है, कल किसी दूसरे ब्ल़ॉगर के साथ भी हो सकता है...एक छोटी सी शिकायत मुझे इरफान भाई से भी है...उन्होंने गलती तो सुधार ली लेकिन कहीं भी समीर जी से खेद नहीं जताया...अगर इरफान भाई अपनी पोस्ट पर ही टिप्पणी के ज़रिए ऐसा कर देते अपनी गलती की भरपाई कर देते...समीर जी तो ठहरे समीर जी... सागर की तरह शांत और गहरे...वो तो अपने मुंह से कोई शिकायत करने से रहे...लेकिन मुझ जैसे ब्ल़ॉगर के लिए तो वो हिंदी ब्लॉग जगत के सचिन तेंदुलकर से कम नहीं है...और मेरी इस बात का समर्थन करने वाले बहुत से साथी मुझे मिल जाएंगे...अब मेरी ब्लॉगवाणी से कोई शिकायत नहीं है...बस एक अनुरोध है क्या कोई ऐसा विकल्प नहीं तलाशा जा सकता कि अगर कोई ब्लॉगर अपनी पोस्ट के शीर्षक या लेख में एडिट के ज़रिए सुधार करता है तो वो ब्लॉगवाणी के लिंक पर भी स्वत हो जाए...मैं जानता हूं कि इतनी सारी पोस्ट रोज़ पब्लिश होने की वजह से आपके लिए ऐसा करना मुश्किल होगा...लेकिन मुझे एक रास्ता नज़र आता है जो ब्लॉगर अपनी पोस्ट में सुधार करता है वो ब्लॉगवाणी को फोन या ई-मेल के ज़रिए सूचित कर दे, जिससे लिंक पर भी गलती जल्दी से जल्दी सुधर जाए...आशा है मेरी बात को अन्यथा नहीं लिया जाएगा...लेकिन ऐसा करने से फिर उस असहज स्थिति से तो बचा जा सकेगा॥जैसे कि उड़नतश्तरी वाले इरफान जी के पोस्ट के शीर्षक को लेकर समीर जी को भुगतनी पड़ी..

अब भले ही लोग कहते रहे हैं कि मैं इसमें कोई पक्ष न होते हुए भी कैसे टांग अड़ाने लगा...लेकिन जो मुझे सही लगा वो मैंने लिख दिया...वैसे जो पाठक मेरी पोस्ट शुरू से पढ़ते आ रहे हैं, वो शायद जानते होंगे कि समीर जी को मैंने ब्लॉगिंग में गुरुदेव मान रखा है...और गुरुदेव भी मेरी इस भावना को शायद समझते हों...चाहे अनजाने में ही समीर जी के लिए कोई असहज बात लिखी गई...कम से कम मैं तो उस पर आंखों पर पट्टी बांधे नहीं रह सकता था...और ऐसा ही मैंने किया...

खैर छोड़िए, आइए स्ल़ॉग ओवर पर....

स्लॉग ओवर
15 साल का पप्पू और 6 साल का चप्पू एक ही स्कूल में दाखिला लेने गए...दाखिला लेने वाले टीचर को पप्पू ने बताया कि चप्पू रिश्ते में उसका दूर का भाई लगता है...टीचर ने पप्पू से पिता का नाम पूछा...जवाब मिला..गप्पू...
टीचर ने चप्पू से सवाल किया, तुम्हारे पिता का नाम...जवाब मिला...गप्पू...
टीचर थोड़ा हैरान हुआ..फिर दोनों से पता पूछा तो जवाब मिला...मकान नंबर 117, गली नंबर 6, प्रेम नगर...
टीचर ने फिर पप्पू से कहा कि जब तुम्हारे पिता का नाम एक, रहते एक मकान में ही हो तो फिर चप्पू तुम्हारा दूर का भाई कैसे हुआ....पप्पू ने जवाब दिया...मास्टर जी मैंने ये कब कहा कि चप्पू मेरा सगा भाई नहीं है...दरअसल उसके और मेरे बीच सात भाई-बहन और भी हैं...इस लिहाज से हुआ न वो दूर का भाई...

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

मक्खन, करवा चौथ और "सयापा"

आज करवा चौथ है...लेकिन मक्खन ने सुहागिनों के इस दिन पर ही पंगा ले लिया...वो भी मक्खनी से...अब 440 वोल्ट के करंट में हाथ देगा, ज़ोर का झटका तो ज़ोर से लगेगा ही...मक्खन का हाल देखकर मैं भी चौकस हो गया हूं...पत्नीश्री के व्रत के दौरान उनका पूरा ध्यान रखना है, इसलिए आज लंबी पोस्ट नहीं...बस माइक्रो पोस्ट...यानि सिर्फ स्लॉग ओवर में करवा चौथ पर मक्खन की आपबीती से से ही काम चलाइए...और हां, ज़रा खुद भी आज पति-धर्म निभाइए...

स्लॉग ओवर
त्यौहारों का मौसम है...दीवाली से पहले मक्खन के गैरेज पर भी खूब काम आ रहा है...कोई खटारा गाड़ियों को दुरूस्त करा रहा है...तो कोई अच्छी भली चमचमाती गाड़ी को ही नई लुक देने पर तुला है...लिहाजा हमारे मक्खन महाराज को रात देर तक जाग कर कर्म ही पूजा है का मंत्र निभाना पड़ रहा है...ऐसे ही करवा चौथ से पहले की सरगी की रात को मक्खन को गैरेज पर ही रात के 2 बज गए...मक्खन घर आकर तीन बजे तक सोया ही था...कि कुछ मिनटों बाद खटपट-खटपट की आवाजों से मक्खन की नींद खुल गई...देखा पत्नी मक्खनी सरगी (करवा चौथ के व्रत से पहले तड़के खाया जाने वाला आहार) की तैयारी कर रही थी...इसी चक्कर में कुछ बर्तन खड़कने से शोर हुआ और मक्खन की कच्ची नींद हवा हो गई...थका-हारा मक्खन इस पर हत्थे से उख़ड़ गया...लगा मक्खनी को सुनाने....कुछ मेरा ख्याल भी है या नहीं...16 घंटे तक गैरेज में खप कर आ रहा हूं...मुश्किल से नींद आई ही थी कि तेरी इस खटपट-खटपट ने जगा दिया...वैसे वैसे आज तुझे ये क्या शौक चर्राया है...आधी रात को उठकर किचन में बर्तन पटक रही है...

मक्खनी भी आखिर कहां तक सुनती...फट पड़ी...बस हो गया तेरा...ये जो मैं सब कर रही हूं न...वो तेरा ही "सयापा" है...

(पंजाबी में सयापा किसी के मर जाने पर औरतो के रोने-धोने को कहते हैं...यहां मक्खनी का यही मतलब था कि मक्खन की लंबी उम्र का व्रत रखने के लिए उसे ये सब कुछ करना पड़ रहा है)

तलाश है एक अदद एंग्री यंगमैन की...

अमिताभ बच्चन को बिग बॉस के रूप में देखना बड़ा दयनीय है...क्या बिग बॉस सत्तर के दशक का वही एंग्री यंगमैन विजय है जिसने पूरे देश को अपना मुरीद बना लिया था...ठीक है उम्र असर दिखाने लगी है...लेकिन उम्र के इस पड़ाव में क्या पैसे के लिए हर ऑफर स्वीकार कर ली जाए...सिस्टम से लड़ने वाला विजय सीनियर सिटीजन बनने के बाद सिस्टम से समझौते क्यों करने लगा...क्यों आज हमारा एंग्री यंगमैन कहीं खो गया लगता है...वो एंग्री यंगमैन जिसे परदे पर राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, धर्मेंद्र, शशि कपूर, शत्रुघ्न सिन्हा, संजीव कुमार जैसे दिग्गजों का साथ मिलता था तो उसका हुनर और निखर कर सामने आता था...आज वही हमारा विजय चॉकलेट, च्वयनप्राश, पेन, सीमेंट, सूटिंग्स और न जाने क्या-क्या विज्ञापनों में बेचते-बेचते हर कदम पर समझौते करता नज़र आता है...

ऐसे में हमे एक नए विजय की तलाश है...नए एंग्री यंगमैन की...क्यों है तलाश...क्योंकि देश भले ही 62 साल पहले आज़ाद हो चुका है, लेकिन गुलामी के जीन्स हमें विरासत में मिले हैं...ये हममें इतने रचे-बसे हैं कि चाह कर भी उनसे हम अलग नहीं हो सकते...हम दमनकारी व्यवस्था का खुद विरोध नहीं कर सकते...लेकिन चाहते हैं कि कोई राबिनहुड आए और हमारी लड़ाई लड़े...अब बेशक उसका व्यवस्था से लड़ने का तरीका हीरो सरीखा न होकर एंटी हीरो सरीखा हो...अब ये एंटी हीरो पर्दे पर सिस्टम से लड़े या असल जिंदगी में हम उसके लिए तालियां पीटते हैं...

1973 में ज़ंजीर से अमिताभ के एंग्री यंगमैन का उदय 1975 में दीवार तक आते आते चरम पर पहुंच गया...ये ठीक वही दौर था जब लोकनायक जेपी इंदिरा-संजय के निरंकुश सिस्टम के खिलाफ अलख जगा रहे थे...लोगों को असल जिंदगी में जेपी और पर्दे पर अमिताभ के विजय में ही सारी उम्मीदें नज़र आईं...लेकिन आज 35 साल बाद लोगों को 68 साल के अमिताभ में विजय नहीं अशक्त बिग बॉस ही नज़र आता है...जो व्यवस्था से लड़ नहीं सकता बल्कि व्यवस्था का खुद हिस्सा ही बना नज़र आता है...

ऐसे में अगर कोई एंग्री यंगमैन की तलाश में निकलता है तो उसे राज ठाकरे ही सबसे मुफीद लगता है...वो राज ठाकरे जो सिस्टम से लड़ता नहीं बल्कि खुद ही सिस्टम बनाता है...करन जौहर को एक धमकी मिलती है तो पुलिस के पास नहीं राज ठाकरे की चौखट पर नाक रगड़ने पहुंच जाते हैं...शायद इसीलिए कहा जाता है कि खुद "गब्बर" से भी बड़ा होता है "गब्बर" का खौफ़...और आज लोगों की मजबूरी है कि उन्हें राज ठाकरे के "गब्बर" में ही अपना खोया विजय नज़र आ रहा है...

स्लॉग ओवर
कर्मचारी फुटबॉल की बात करते हैं...
मैनेजर्स क्रिकेट की बात करते हैं...
बॉस टेनिस की बात करते हैं...
सीईओ गोल्फ की बात करते हैं...
(ये पोस्ट बढ़ने के साथ गेम की बॉल छोटी क्यों होती जाती है...)

सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

अब कोई जय हिंद क्यों नहीं कहता...

नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं...
बोलो मेरे साथ जय हिंद, जय हिंद, जय हिंद...
साठ के दशक के शुरू में निर्देशक महबूब खान की बनाई फिल्म सन ऑफ इंडिया का ये गीत एक वक्त देश के हर बच्चे की ज़ुबान पर था...कल ये जय हिंद का उद्घोष मेरी पोस्ट पर लखनऊ के महफूज़ अली भाई ने शिद्दत के साथ याद दिला दिया...दरअसल मैंने अपनी पोस्ट में हैलो शब्द के बारे में जिज्ञासा जताते हुए पूछा था कि क्या हम सवा अरब भारतीय हैलो की जगह फोन पर कोई ऐसा ठेठ देसी शब्द नहीं इस्तेमाल कर सकते जिसमें भारतीयता की झलक दिखाई दे...अगर हम सब उस शब्द को बोलने लगे तो वो कितनी जल्दी पूरी दुनिया पर छा जाएगा...इसी प्रश्न के जवाब में महफूज़ भाई ने ये प्रतिक्रिया भेजी...

हैलो बोलने की बजाय हम हिंदुस्तानी "हरि ओम" शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं...अगर मुस्लिम हैं हरि ओम बोलने में दिक्कत है तो "असल्लाम वालेकुम" का इस्तेमाल कर सकते हैं...अगर ईसाई हैं तो "हैलो" ही चलेगा...और अगर सिख हैं तो "सत श्री अकाल"...पर अगर धर्म से ऊपर उठना है तो "जय हिंद" से अच्छा कुछ नहीं है...ये सबके लिए यूनिवर्सल है...
महफूज़ भाई की टिप्पणी के बाद ही कनाडा की अदा ने और भी दिल खुश कर देने वाली टिप्पणी भेजी...

मुझे महफूज़ जी की 'जय हिंद' वाली बात बहुत ज्यादा भायी है... महफूज़ साहब बहुत बहुत शुक्रिया .....आज से ही जब भी भारत कॉल करुँगी पक्की बात है 'जय हिंद' ही कहूँगी...कनाडा में रहती हूँ इसलिए सबसे तो नहीं कह पाउंगी लेकिन अपनी इंडियन कम्युनिटी में यह बात बताने की ज़रूर कोशिश करुँगी....Italic

इन दोनों की बात पढ़ने के बाद एक प्रण मैंने भी अपने साथ किया...अब मैं अपनी हर टिप्पणी में "जय हिंद" का इस्तेमाल ज़रूर करूंगा...साथ ही अभिवादन के लिए, फोन पर हो या साक्षात, ज़्यादा से ज्यादा "जय हिंद" का प्रयोग करने की कोशिश करूंगा...इस हद तक कि ये मेरी आदत ही बन जाए... 
मुझे एक बात और याद आ रही है...दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जब भी कहीं भाषण देती थीं, तो अंत तीन बार ज़ोर ज़ोर से "जय हिंद" के नारे से ही करती थीं...और सुनने वाले भी ये नारा लगाने में गले की पूरी ताकत के साथ देते थे...

क्या वजह है कि आज "जय हिंद" कहना बिल्कुल ही गायब हो गया है...पहले बच्चों से "जय हिंद" का गीत गवाने में माता-पिता अपनी शान समझते थे...उनकी ख्वाहिश भी ये होती थी कि ...नन्हा मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं... गीत गाने वाला बच्चा बड़ा होकर भी सेना में शामिल होकर देश की सेवा करेगा...लेकिन आज ऐसे अभिभावक बहुत कम ही होंगे जो अपने लाडलों को मातृभूमि की रक्षा के लिए सेना में भेजने की सोचते हैं...अगर ऐसा नहीं होता तो हमारी सेना को आज अफसरों की कमी का सामना नहीं करना पड़ता...एनडीए और आईएमए जैसी संस्थाओं में सीटें खाली पड़ी नहीं रह जातीं...दरअसल आर्थिक सुधारों ने देश को विकास की धार तो दी लेकिन साथ ही ज़्यादा से ज़्यादा पैसे कमाने को ही ब्रह्म-वाक्य बना दिया...सेना की जगह आईआईएम से एमबीए करना ज़्यादा बड़ा ख्वाब हो गया है...ठीक है आप जिस फील्ड को भी करियर बनाएं लेकिन "जय हिंद" कहना तो नहीं भूलें...
 
स्लॉग ओवर
"राखी के स्वयंवर"
के बाद नया रियल्टी शो आने वाला है "राखी का हनीमून"...शो के निर्माताओं ने इसके प्रचार के लिए प्रोमो बनाया...जो कोई इस शो में हिस्सा लेने के इच्छुक हैं...जल्दी आवेदन करें...क्योंकि बेड्स सीमित संख्या में ही उपलब्ध हैं...

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

...क्या कोई मुझे बताएगा


मेरे कुछ सवाल हैं...अरे घबराइए नहीं...पोस्ट छोड़ कर मत जाइए...ब्लॉगिंग या पसंद से इन सवालों का कोई लेना-देना नहीं है...ये वो सवाल हैं जिनसे हमारा रोज़ पाला पड़ता है...हम इनका धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं...लेकिन इनका सही मतलब हमारे में से शायद बहुत थोड़े ही जानते होंगे...इसलिए मैं अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए आपकी मदद चाहता हूं...इस पर खास तौर पर महफूज़ अली भाई की तवज्जो चाहूंगा...क्योंकि उन्होंने टाटा शब्द पर बड़ी रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी दी थी...

सवाल नंबर 1
हम फोन पर अभिवादन के लिए पहला शब्द बोलते हैं...हैलो...ये तो मुझे पता है कि ग्राहम बैल ने टेलीफोन का आविष्कार किया था...लेकिन हैलो शब्द कहने का रिवाज कब और कहां से शुरू हुआ...इसी संदर्भ में क्या हम भारतवंशी कोई अपना ठेठ देसी शब्द प्रचलन में नहीं ला सकते...जिससे भारतीयता को बढ़ावा मिले...सवा अरब तो हम भारत में ही हैं.. दुनिया की आबादी का पांचवां हिस्सा...अगर हम सब उस शब्द को बोलने लगे तो वो कितनी जल्दी पूरी दुनिया पर छा जाएगा...

सवाल नंबर 2
किसी बात पर हां में भरने के लिए हम कहते हैं ओ.के.(O.K.)...इसका शाब्दिक अर्थ क्या होता है...इसका प्रचलन भी कब और कैसे शुरू हुआ...

सवाल नंबर 3
शादियों के कार्ड पर आर.एस.वी.पी. (rsvp) लिखा होता है...इसका पूरा अर्थ क्या है...

सवाल नंबर 4
अंग्रेजी भाषा में अक्सर उदाहरण के लिए ie. या eg.का प्रयोग किया जाता है...इनकी पूरी फॉर्म क्या है...

सवाल नंबर 5
पांचवां सवाल मक्खन का है...क्या सवाल है वो आपको स्लॉग ओवर में मिलेगा...

स्लॉग ओवर
मक्खन आज बड़ा भुन्नाया हुआ है...बार-बार एक ही सवाल कर रहा है कि आखिर उसका कसूर क्या है...दरअसल मक्खन महाराज ने अमेरिकी एम्बेसी में वीज़ा के लिए एप्लीकेशन लगाई थी...वो एप्लीकेशन रिजेक्ट होकर आ गई है...मक्खन का मूड तो खराब होना ही था...अमेरिकी एम्बेसी ने रिजेक्शन का जो कारण दिया है...वो ये है...कृपया जिस केटेगरी के लिए आपने वीज़ा एप्लाई किया है, ऐसी कोई केटेगरी हमारे कानून में नहीं है...इसके लिए आपको बस घर के नज़दीक ही सुअरों के बाड़े में जाना होगा और ऊपर वाले ने चाहा तो आपकी मनमुताबिक वायरस से ग्रस्त होने की तमन्ना पूरी हो जाएगी...(दरअसल मक्खन ने H1N1 के लिए एप्लाई किया था)...