मंगलवार, 29 सितंबर 2009

पाबलाजी और मैं 'अमिताभ' हो गए...

(ये व्यंग्य मैं दोबारा पोस्ट कर रहा हूं...क्योंकि ब्लॉगवाणी के ब्लैक आउट के दौरान स्वाभाविक है, हर किसी का ध्यान ब्लॉगवाणी के दोबारा शुरू होने पर ही था...इसलिए किसी विषय पर ध्यान दे पाना सभी के लिेए मुश्किल था...खास तौर पर व्यंग्य पर...लेकिन मैं वादा कर चुका था, इसलिए मुझे ब्लैक आउट के दौरान ही इस पोस्ट को...लो जी बम फट गया...के नाम से ब्लॉग पर डालना पड़ा था...अब ब्लॉगवाणी के वापस आने से दीवाली से पहले ही दीवाली का माहौल है...ऐसे में इस व्यंग्य की सार्थकता और बढ़ जाती है....)
सपने में देखा एक सपना...
वो जो है अमिताभ अपना...
मार्केट से आउट हुआ...
लोगों को डाउट हुआ...
मैं अमिताभ हो गया...हो गया...
करीब तीन दशक पहले ऋषिकेश दा ने फिल्म बनाई थी गोल-माल...उसी फिल्म में अमोल पालेकर सपना देखते हुए ये गाना गाते हैं और अमिताभ बच्चन स्टू़डियो के बाहर स्टूल पर चपरासी की तरह बैठे नज़र आते हैं...कुछ ऐसा ही सपना मैंने भी देखा है...लेकिन यहां दिक्कत ये है कि यहां शेखचिल्ली के हसीन सपने में मैं अकेला ही अमिताभ नहीं हुआ मेरे साथ बी एस पाबला जी भी हैं..."बीएसपी (बी एस पाबला) एंड केडीएस (खुशदीप सहगल) फ्री स्माइल्स कंपनी" के सीनियर पार्टनर...सपना ये है कि बिज़नेस में हमारी कंपनी ने रिलायंस को भी पीछे छोड़ दिया है...क्या कहा...कौन सी रिलायंस...बड़े भाई वाली या छोटे भाई वाली...अजी हमारा कहना है दोनों भाइयों की कंपनियां भी मिला लीजिए, फिर भी हमारी "बीएसपी एंड के़डीएस फ्री स्माइल्स कंपनी" पर लोगों को ज़्यादा रिलायंस होगा...वो क्यों...एक तो हर ची़ज़ को हम मुनाफे की तराजू पर नहीं तौलते..दूसरी बात मुस्कुराहटें बांटने का जो धंधा हमने सोचा है वो... आई मौज फ़कीर की, दिया झोंप़ड़ा फूंक... की तर्ज पर होगा...ग्राहक को हमारी कंपनी की सेवाएं लेने के बदले धेला नहीं खर्च करना होगा...बल्कि उसका चाय-पानी से स्वागत और किया जाएगा...मेरी हैसियत तो कंपनी में कंपाऊडर जैसी होगी लेकिन ये मैं यकीन के साथ कहता हूं कि लाफ्टर के डॉक्टर बीएस पाबला गुदगुदी का ऐसा इंजेक्शन लगाएंगे कि ग्राहक सोते हुए भी उठ-उठ कर ठहाके मारेगा...
अब आप कहेंगे कि ये कौन सा धंधा हुआ जिसमें दुकानदार का अपना कोई फायदा ही न हो...है भईया है... फायदा है...बस जो हमारी कंपनी में आएगा, उसे हम दोनों की सिर्फ 100-100 पोस्ट को पढ़ना होगा...है न, एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले, वाली तर्ज का धंधा...ऐसा हुआ तो बकौल अवधिया जी हमें दूसरों को लेकर शिकायत भी नहीं रहेगी कि अपनी पोस्ट तो पढ़वा ली और जब हमारी पोस्ट पढ़ने की बारी आई तो खुद भाग गये...
देखी, हमारी अर्थशास्त्र की समझ...खैर हमारी दुकान का मुहूर्त भी हो गया...पाबलाजी और मैं दोनों अपनी-अपनी सीटों पर जम गए...इंतज़ार होने लगा ग्राहक का...दो घंटे बाद एक खाकी वर्दीधारी दुकान की तरफ बढ़ता दिखाई दिया...हमने सोचा बेचारा पुलिसवाला हर वक्त चोर-चोरियों, अपराध-अपराधियों और अंडर द टेबल डीलिंग का हिसाब लगाते-लगाते चकराया रहता है, इसलिए शायद मानसिक तनाव से राहत पाने और खुद को तरोताजा करने के लिए हमारी सेवाएं लेना चाहता है...पाबलाजी ने दूर से ही ताड़ लिया और मुझे आदेश दिया...पुलिस रिलेटे़ड जितना जितना भी लाफ्टर मैटीरियल है, सब की फाइल्स खोल लो...जो हुक्म मेरे आका वाले अंदाज़ में मैंने आदेश का तत्काल प्रभाव से पालन करना शुरू कर दिया...
कांस्टेबल के चरण-कमल दुकान में पड़ते ही पाबलाजी ने कहा...आइए दारोगा जी, क्या पसंद करेंगे...कांस्टेबल खुद के लिए दारोगा का संबोधन सुन कर वैसे ही चौड़ा हो गया...मूंछ पर ताव देकर बोला...पसंद-वसंद कुछ नहीं, इंस्पेक्टर साब ने तुम दोनों को थाने पर बुलाया है...हम दोनों ने एक दूसरे को देखा, आखिर माजरा क्या है...सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय के मंत्र के साथ हम दोनों ने सोचा कि कांस्टेबल नहीं इंस्पेक्टर साब फ्री स्माइल्स सेवाएं लेना चाहते हैं...आखिर इंस्पेक्टर हैं...पूरे एरिया में लॉ एंड ऑर्डर संभालना पड़ता है, मुंशी की तरह हिसाब रखो अलग कहां कहां से हफ्ता आया और कहां कहां रह गया...ऊपर से ऊपर वाले अफसरान को हर वक्त खुश रखने की जेहमत और...पाबलाजी और मैंने अपने-अपने लैपटॉप लिए और कांस्टेबल के पीछे हो लिए...थाने में जैसे इस्पेक्टर साब हमारे ही इंतज़ार में पलक-पावड़े बिछाए बैठे थे...हमें देखते ही गब्बर सिंह के अंदाज़ में बोले....आओ, आओ महारथी...आज आए हैं दो-दो ऊंट पहाड़ के नीचे...हमने सोचा इंस्पेक्टर साहब हमसे भी बड़े लाफ्टर चैंपियन हैं...हम भी खीं॥खीं..खीं। खीं कर हंस दिए...ऐसी बेबस हंसी हमने शायद ज़िंदगी में पहली बार हंसी थी...तभी इंस्पेक्टर की कड़कदार आवाज गूंजी....खामोश...अबे हम तो अच्छे अच्छे फन्ने खानों को रूला-रूला कर उनकी जेब ढीली कर लेते हैं...और तुम दोनों लोगों को फ्री में गुदगुदा कर खुद को बड़ा तीसमारखां समझ बैठे हो...क्या समझ कर ये धंधा शुरू किया था...सरदार बहुत खुश होगा...शाबाशी देगा...क्यों ....अबे तुम दोनों के चक्कर में ऊपर मैडम तक मेरे इलाके की रिपोर्ट चली गई...मेरी जान को टंटा करा दिया...बहनजी का आदेश आया है कि ये तुम दोनों ने अपनी कंपनी में बीएसपी कैसे जोड़ लिया...क्या बीएसपी का नाम लेकर भवसागर तरना चाहते हो...सच-सच बताओ कौन सी पार्टी ने तुम्हें प्लांट किया है बहनजी के खिलाफ...इस धोखे में मत रहना कि सेंटर या सीबीआई तुम्हें बचा लेगी...ऐसे-ऐसे एक्ट लगाएंगे जाएंगे तुम्हारे खिलाफ कि लोगों को हंसाना तो क्या खुद भी आधी इंच मुस्कान के लिए तरस जाओगे....
इंस्पेक्टर के सदवचन सुनकर मामला थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगा था...ये नाम के चक्कर में किस फट्टे में जान फंसा ली...पाबला जी ने सफाई देनी चाहिए...हुजूर, बीएसपी पार्टी का जब जन्म हुआ था उससे तो कई साल पहले मेरा नाम बीएस पाबला यानि बीएसपी रख दिया गया था...इस नाते तो मेरा इस नाम पर पहले हक बनता है...और हमें पार्टी पर केस कर देना चाहिए कि ये नाम कैसे रख लिया...इसके बाद इंस्पेक्टर का कहा सिर्फ एक ही वाक्य याद रह गया...हमें कानून सिखाते हो, हमें...जो हाथी को चूहा बना दे और चूहे को हाथी...गजोधर ज़रा ले चल तो इन्हें लॉक-अप के अंदर...इसके बाद धूम-धड़ाके की आवाजें बढ़ती ही गईं...और अचानक मेरी नींद खुल गई...
मैंने पहला काम बीएस पाबला जी को ई-मेल करने का किया...अगर अपनी खुद की स्माइल्स बरकरार रखनी है तो "बीएसपी एंड केडीएस फ्री स्माइल्स कंपनी" खोलने का इरादा कैंसिल...

स्लॉग ओवर
ढक्कन...मेरे दादाजी की उम्र 98 साल की है...और उनकी आंखे बेहद तेज़ हैं...कभी उन्होंने ग्लासेस का इस्तेमाल नहीं किया...
मक्खन...यार ढक्कन, ये तो मैंने सुना था कि कई लोग बिना ग्लास का इस्तेमाल किए सीधे बॉटल से ही खींच जाते हैं...लेकिन इस तरह दारू पीने से आंखे तेज़ हो जाती हैं, ये मैंने पहली बार आज तुझसे सुना...

सोमवार, 28 सितंबर 2009

...ताकि फिर कोई उंगली न उठाए

ब्लॉगवाणी के विराम लेने से पहले आपने गौर किया होगा कि ब्लॉगवाणी के साइड लिंक्स में ये सूचनाएं चलती रहती थीं कि ब्लॉगवाणी को बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं...मैं उम्मीद करता हूं कि ब्लॉगवाणी ने शायद इसी उद्देश्य से ब्रेक लिया हो..
जो हो रहा है, वो हमारे बस का नहीं है...जो हमारे बस का ही नहीं तो उस पर मलाल कैसा...कहते हैं हर मुश्किल घड़ी में कोई न कोई अच्छाई छिपी होती है...शायद ये सब वैसे ही सफाई के लिए हो रहा हो, जैसे दीवाली से पहले हम अपने घरों की सफाई करते हैं...वैसे आपने गौर किया हो तो पिछले एक-दो हफ्ते में मुझे ऐसा महसूस हुआ था कि बिना किसी पूर्व सूचना के ब्लॉगवाणी दिखना बंद हो गया था...कुछ घंटे बाद ही ब्लॉगवाणी फिर शुरू हो गया...इस बार लगता है मध्यांतर कुछ घंटों का नहीं कुछ दिनों का है...उम्मीद पर दुनिया कायम है...
वैसे आजकल बिना मांगे सुझाव देने का ज़माना नहीं है फिर भी एग्रीगेटर को किस तरह सर्वग्राह्य बनाया जा सकता है जिससे फिर कोई उस पर ऊंगली उठाने की जुर्रत ही न कर सके...मेरे कुछ सुझाव हैं...ये सिर्फ सुझाव हैं, ढूंढने वाले इनसे भी कोई अन्य मतलब न निकालने लगें...ये ठीक वैसे ही जैसे चुनाव के दौरान चुनाव आयोग हर उम्मीदवार को समान स्तर का प्ले-फील्ड देने की कोशिश करता है...और अगर कोई फाउल करने की कोशिश करता है तो उसके लिए दंड का भी प्रावधान होता है...
सुझाव नंबर 1...
पसंद, ज़्यादा पढ़े गए और अधिक टिप्पणियां सार्वजनिक तौर पर दिखाने वाले कॉलम ही पूरी तरह बंद कर दिए जाएं...ऐसा इंतज़ाम किया जाए कि सिर्फ ब्लॉगर विशेष को ही पता रहे कि उसकी पोस्ट को कितनी बार पढ़ा गया या कितनों ने उसे पसंद किया...
सुझाव नंबर 2
इन सब कॉलम की जगह एक ऐसा कॉलम बनाया जाए जहां 100 पोस्ट (संख्या कुछ और भी रखी जा सकती है) के शीर्षक और उसे लिखने वाले ब्लॉगर का नाम प्रदर्शित हो...इस कॉलम में रोटेशन के आधार पर हर घंटे बाद दूसरी पोस्ट के शीर्षक और ब्लॉगर के नाम आते रहें...ये क्रम बिना किसी भेदभाव के अपने आप बदलता रहे...जैसे-जैसे नई पोस्ट आती जाए, उन्हें रोटेशन कॉलम में डाला जाता रहे...इस तरह किसी भी पोस्ट को कम से कम एक हफ्ते तक कॉलम में रखा जाए और हफ्ता पूरा होते ही हटा दिया जाए...इससे नई पोस्ट लिखने वालों के लिए भी लगातार जगह खाली होती रहेगी...
सुझाव नंबर 3
हर ब्लॉगर के लिए नई पोस्ट डालने के लिए समय-सीमा निर्धारित की जाए...जैसे दो पोस्टों के बीच कम से कम दो या तीन दिन का अंतराल अवश्य हो...
सुझाव नंबर 4
किसी दूसरे ब्लॉगर का नाम लेकर पोस्ट लिखने पर पाबंदी हो...अगर किसी को दूसरे की पोस्ट विशेष से शिकायत हो तो वो जाकर उसी पोस्ट पर कमेंट के रूप में अपनी बात कहे...अगर मोडरेशन के ज़रिए उसकी बात नहीं छपने दी जाती तो फिर एग्रीगेटर द्वारा प्रदत्त शिकायतनामा जैसे किसी दैनिक कॉमन में जाकर अपनी बात रखे...
सुझाव नंबर 5
अगर कोई ब्लॉगर किसी दूसरे ब्लॉगर का नाम लेकर व्यंग्य या कोई और रचना लिखना चाहता है तो पहले वो उस ब्लॉगर विशेष से ई-मेल या फोन के ज़रिए पूर्व अनुमति ले...इस मामले में पूरी पोस्ट का ड्राफ्ट पोस्ट करने से पहले दूसरे ब्लॉगर को दिखाना ज़रूरी हो...
बस अपने दिल मे जो घुमड़ रहा था, वो यहां उकेर दिया...आगे सभी ब्लॉगर भाई ज्ञानी-ध्यानी है...जो ठीक समझें वो इस पोस्ट पर अपनी बात कह सकते हैं...

स्लॉग ओवर
मक्खन और मक्खनी माल में शॉपिंग करने गए हुए थे...वहां मक्खनी बार-बार मक्खन से कहती जा रही थी...ऐ जी सुनते हो ये भी ले लो...ऐ जी ज़रा इसका रेट पूछना है...ऐ जी ज़रा ट्राली लाना...ऐ जी ज़रा सब्ज़ियां-फल तुलवाना...ऐ जी बिल की लाइन में खड़े हो जाओ नहीं तो देर लगेगी...मक्खन ये सब सुनते-सुनते उकता गया...झल्ला कर बोला...ये क्या ऐ जी, ऐ जी लगा रखी है...बात-बात पर ऐ जी, ऐ जी...मक्खनी बोली...तो फिर क्या हर बार तुम्हें... अबे गधे (Abe Gadhe) सुनना ज़्यादा अच्छा लगेगा...

रविवार, 27 सितंबर 2009

...लो जी बम फट गया

मैंने 12 बजे रात को बम फोड़ने का वादा कर रखा था...लेकिन ब्लॉगवाणी वालों ने पहले ही बम फोड़ दिया...मेरा बम तो सुतली बम होता लेकिन ब्लॉगवाणी ने असल में ही धमाका कर दिया...मुझे पता चला कि किसी ने मेरे नाम के कंधे पर ही तोप रखकर पक्षपात के आरोप का गोला ब्लॉगवाणी पर दाग दिया...और ब्लॉगवाणी ने भी त्वरित प्रतिक्रिया में सेवाएं बंद कर दीं...भईया जब मुझे ही शिकायत नहीं थी, तो फिर मेरे लिए दूसरे किसी भाई को क्यों शिकायत हुई...ये पसंद बढ़ने न बढ़ने से दुनिया कोई चलती है...हां एक प्लेटफॉर्म जरूर बंद हो गया, जहां सभी ब्लॉगर्स आसानी से मिलते थे...

खैर अब आता हूं उस वादे पर जो कल आपसे किया था...मुझे पता नहीं आप इसे ठीक से पढ़ भी पाते हैं या नहीं, फिर भी पोस्ट कर रहा हूं...

सपने में देखा एक सपना...
वो जो है अमिताभ अपना...
मार्केट से आउट हुआ...
लोगों को डाउट हुआ...
मैं अमिताभ हो गया...हो गया...


करीब तीन दशक पहले ऋषिकेश दा ने फिल्म बनाई थी गोल-माल...उसी फिल्म में अमोल पालेकर सपना देखते हुए ये गाना गाते हैं और अमिताभ बच्चन स्टू़डियो के बाहर स्टूल पर चपरासी की तरह बैठे नज़र आते हैं...कुछ ऐसा ही सपना मैंने भी देखा है...लेकिन यहां दिक्कत ये है कि यहां शेखचिल्ली के हसीन सपने में मैं अकेला ही अमिताभ नहीं हुआ मेरे साथ बी एस पाबला जी भी हैं..."बीएसपी (बी एस पाबला) एंड केडीएस (खुशदीप सहगल) फ्री स्माइल्स कंपनी" के सीनियर पार्टनर...
सपना ये है कि बिज़नेस में हमारी कंपनी ने रिलायंस को भी पीछे छोड़ दिया है...क्या कहा...कौन सी रिलायंस...बड़े भाई वाली या छोटे भाई वाली...अजी हमारा कहना है दोनों भाइयों की कंपनियां भी मिला लीजिए, फिर भी हमारी "बीएसपी एंड के़डीएस फ्री स्माइल्स कंपनी" पर लोगों को ज़्यादा रिलायंस होगा...वो क्यों...एक तो हर ची़ज़ को हम मुनाफे की तराजू पर नहीं तौलते..दूसरी बात मुस्कुराहटें बांटने का जो धंधा हमने सोचा है वो... आई मौज फ़कीर की, दिया झोंप़ड़ा फूंक... की तर्ज पर होगा...ग्राहक को हमारी कंपनी की सेवाएं लेने के बदले धेला नहीं खर्च करना होगा...बल्कि उसका चाय-पानी से स्वागत और किया जाएगा...मेरी हैसियत तो कंपनी में कंपाऊडर जैसी होगी लेकिन ये मैं यकीन के साथ कहता हूं कि लाफ्टर के डॉक्टर बीएस पाबला गुदगुदी का ऐसा इंजेक्शन लगाएंगे कि ग्राहक सोते हुए भी उठ-उठ कर ठहाके मारेगा...अब आप कहेंगे कि ये कौन सा धंधा हुआ जिसमें दुकानदार का अपना कोई फायदा ही न हो...है भईया है... फायदा है...बस जो हमारी कंपनी में आएगा, उसे हम दोनों की सिर्फ 100-100 पोस्ट को पढ़ना होगा...है न, एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले, वाली तर्ज का धंधा...ऐसा हुआ तो बकौल अवधिया जी हमें दूसरों को लेकर शिकायत भी नहीं रहेगी कि अपनी पोस्ट तो पढ़वा ली और जब हमारी पोस्ट पढ़ने की बारी आई तो खुद भाग गये...
देखी, हमारी अर्थशास्त्र की समझ...खैर हमारी दुकान का मुहूर्त भी हो गया...पाबलाजी और मैं दोनों अपनी-अपनी सीटों पर जम गए...इंतज़ार होने लगा ग्राहक का...दो घंटे बाद एक खाकी वर्दीधारी दुकान की तरफ बढ़ता दिखाई दिया...हमने सोचा बेचारा पुलिसवाला हर वक्त चोर-चोरियों, अपराध-अपराधियों और अंडर द टेबल डीलिंग का हिसाब लगाते-लगाते चकराया रहता है, इसलिए शायद मानसिक तनाव से राहत पाने और खुद को तरोताजा करनेItalic के लिए हमारी सेवाएं लेना चाहता है...पाबलाजी ने दूर से ही ताड़ लिया और मुझे आदेश दिया...पुलिस रिलेटे़ड जितना जितना भी लाफ्टर मैटीरियल है, सब की फाइल्स खोल लो...जो हुक्म मेरे आका वाले अंदाज़ में मैंने आदेश का तत्काल प्रभाव से पालन करना शुरू कर दिया...
कांस्टेबल के चरण-कमल दुकान में पड़ते ही पाबलाजी ने कहा...आइए दारोगा जी, क्या पसंद करेंगे...कांस्टेबल खुद के लिए दारोगा का संबोधन सुन कर वैसे ही चौड़ा हो गया...मूंछ पर ताव देकर बोला...पसंद-वसंद कुछ नहीं, इंस्पेक्टर साब ने तुम दोनों को थाने पर बुलाया है...हम दोनों ने एक दूसरे को देखा, आखिर माजरा क्या है...सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय के मंत्र के साथ हम दोनों ने सोचा कि कांस्टेबल नहीं इंस्पेक्टर साब फ्री स्माइल्स सेवाएं लेना चाहते हैं...आखिर इंस्पेक्टर हैं...पूरे एरिया में लॉ एंड ऑर्डर संभालना पड़ता है, मुंशी की तरह हिसाब रखो अलग कहां कहां से हफ्ता आया और कहां कहां रह गया...ऊपर से ऊपर वाले अफसरान को हर वक्त खुश रखने की जेहमत और...पाबलाजी और मैंने अपने-अपने लैपटॉप लिए और कांस्टेबल के पीछे हो लिए...
थाने में जैसे इस्पेक्टर साब हमारे ही इंतज़ार में पलक-पावड़े बिछाए बैठे थे...हमें देखते ही गब्बर सिंह के अंदाज़ में बोले....आओ, आओ महारथी...आज आए हैं दो-दो ऊंट पहाड़ के नीचे...हमने सोचा इंस्पेक्टर साहब हमसे भी बड़े लाफ्टर चैंपियन हैं...हम भी खीं..खीं..खीं. खीं कर हंस दिए...ऐसी बेबस हंसी हमने शायद ज़िंदगी में पहली बार हंसी थी...तभी इंस्पेक्टर की कड़कदार आवाज गूंजी....खामोश...अबे हम तो अच्छे अच्छे फन्ने खानों को रूला-रूला कर उनकी जेब ढीली कर लेते हैं...और तुम दोनों लोगों को फ्री में गुदगुदा कर खुद को बड़ा तीसमारखां समझ बैठे हो...क्या समझ कर ये धंधा शुरू किया था...सरदार बहुत खुश होगा...शाबाशी देगा...क्यों ....अबे तुम दोनों के चक्कर में ऊपर मैडम तक मेरे इलाके की रिपोर्ट चली गई...मेरी जान को टंटा करा दिया...बहनजी का आदेश आया है कि ये तुम दोनों ने अपनी कंपनी में बीएसपी कैसे जोड़ लिया...क्या बीएसपी का नाम लेकर भवसागर तरना चाहते हो...सच-सच बताओ कौन सी पार्टी ने तुम्हें प्लांट किया है बहनजी के खिलाफ...इस धोखे में मत रहना कि सेंटर या सीबीआई तुम्हें बचा लेगी...ऐसे-ऐसे एक्ट लगाएंगे जाएंगे तुम्हारे खिलाफ कि लोगों को हंसाना तो क्या खुद भी आधी इंच मुस्कान के लिए तरस जाओगे....
इंस्पेक्टर के सदवचन सुनकर मामला थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगा था...ये नाम के चक्कर में किस फट्टे में जान फंसा ली...पाबला जी ने सफाई देनी चाहिए...हुजूर, बीएसपी पार्टी का जब जन्म हुआ था उससे तो कई साल पहले मेरा नाम बीएस पाबला यानि बीएसपी रख दिया गया था...इस नाते तो मेरा इस नाम पर पहले हक बनता है...और हमें पार्टी पर केस कर देना चाहिए कि ये नाम कैसे रख लिया...इसके बाद इंस्पेक्टर का कहा सिर्फ एक ही वाक्य याद रह गया...हमें कानून सिखाते हो, हमें...जो हाथी को चूहा बना दे और चूहे को हाथी...गजोधर ज़रा ले चल तो इन्हें लॉक-अप के अंदर...इसके बाद धूम-धड़ाके की आवाजें बढ़ती ही गईं...और अचानक मेरी नींद खुल गई...
मैंने पहला काम बीएस पाबला जी को ई-मेल करने का किया...अगर अपनी खुद की स्माइल्स बरकरार रखनी है तो "बीएसपी एंड केडीएस फ्री स्माइल्स कंपनी" खोलने का इरादा कैंसिल...

स्लॉग ओवर
ढक्कन...मेरे दादाजी की उम्र 98 साल की है...और उनकी आंखे बेहद तेज़ हैं...कभी उन्होंने ग्लासेस का इस्तेमाल नहीं किया..
Italicमक्खन...यार ढक्कन, ये तो मैंने सुना था कि कई लोग बिना ग्लास का इस्तेमाल किए सीधे बॉटल से ही खींच जाते हैं...लेकिन इस तरह दारू पीने से आंखे तेज़ हो जाती हैं, ये मैंने पहली बार आज तुझसे सुना...

शनिवार, 26 सितंबर 2009

कल का दिल थामकर इंतज़ार कीजिए...

अभी जख्‍म ताजा हैं...जब पास्‍ट हो जाएंगे...खुश पोस्‍ट तब ही लिखी जाएगी...तब ही भरपूर हिम्‍मत आएगी...ये टिप्पणी अविनाश वाचस्पति जी ने मेरी पोस्ट...इक दिन चलणा...पर भेजी...अविनाश जी समेत जिनकी भी प्रतिक्रियाएं मेरी पोस्ट पर आईं या जिन्होंने भी उस पोस्ट को पढ़ा, मुझे ऐसा ही लगा कि मेरे दर्द में हर कोई शरीक है...यही वो जज़्बात हैं जो एक मुर्दे में भी जान फूंक सकते हैं...और फिर मैं तो जीताItalic-जागता इंसान हूं...
ये सही है जो अपना चला गया, उसकी याद ता-उम्र बनी रहेगी...लेकिन हमारी दूसरों के लिए भी ज़िम्मेदारियां हैं...जाने वाले को भी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उसके जीवन के मूल्यों को मैं आत्मसात करूं...साथ ही जितनी जल्दी हो सके नार्मल रूटीन में वापस लौटूं..ऐसा करके ही दूसरे अपनों को भी नार्मल कर सकूंगा...ना जाने क्यों इस वक्त राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर के क्लाइमेक्स का एक डॉयलाग याद आ रहा है...

जाइएगा नहीं, जाइएगा नहीं...
जोकर का तमाशा अभी खत्म नहीं हुआ है...
अभी खत्म नहीं हुआ है, जोकर का तमाशा...
जाइएगा नहीं...जाइएगा नहीं...

शो मस्ट गो ऑन...यही राजकपूर का संदेश था...यही राजकपूर के आइ़डियल चार्ली चैपलिन का भी संदेश था...अपने अंदर कितना भी दर्द क्यों न छुपा हो, ज़माने को खुशियों का खजाना ही बांटना चाहिए....क्योंकि...

जीवन चलने का नाम
चलते रहो सुबह-ओ-शाम
जो जीवन से हार मान गया
उसका हो गया छुट्टी
नाक चढ़ा कर कहे ज़िंदगी
तेरा मेरा हो गया कुट्टी
तू सबको अपना यार बना मित्रा
जग से कहता जा मित्रा
जीवन चलने का नाम
चलते रहो सुबह-ओ-शाम


ये तो थी कुछ दिल की बातें...अब आता हूं इस पोस्ट के टाइटल पर...कल का दिल थामकर इंतज़ार कीजिए...दरअसल कल 27 सितंबर की रात ठीक 12 बजे जो मैं पोस्ट डालूंगा...उसमे कुछ खास बातें होंगी...ये पोस्ट मैं लखनऊ से दुखद समाचार आने से पहले ही तैयार कर चुका था...इस पोस्ट में आपको "आपबीती" बताने जा रहा हूं...

1. पाबलाजी और मुझसे पुलिस ने थाने में बुलाकर क्यों और क्या पूछताछ की...
2. हमारे पास बिज़नेस का ऐसा कौन सा सीक्रेट है जो रिलायंस को भी पीछे छोड़ सकता है...
3. एक राजनीतिक षडयंत्र में मैं और पाबलाजी जाने-अनजाने कैसे शामिल हो गए...
4. क्यों सेंटर और सीबीआई तक मामला जाने की नौबत आ गई
...
5. अमिताभ बच्चन का इस पूरे इपिसोड से क्या कनेक्शन है...

अगर इन पांचों सवालों का जवाब जानना है तो बस कल रात बारह बजे तक दशहरे के साथ-साथ मेरी पोस्ट का भी इंतज़ार कीजिए...
स्लॉग ओवर भी कल ही मिलेगा...

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

इक दिन चलणा...

जिंद मेरिए मिट्टी दी ए ढेरिए, इक दिन चलणा...(जीवन माटी की एक ढेरी है, एक दिन चलना है)....ये शबद मेरे कानों में गूंज रहा है...साथ ही ये सवाल मेरे ज़ेहन में, कि हम है क्या...हमारा दुनिया में आने का मकसद क्या..
सब कुछ अपनी रफ्तार से चल रहा था...बुधवार की सुबह मुझे फोन पर ख़बर मिली कि लखनऊ में कोई अपना बेहद करीबी हमेशा के लिए चला गया...थोड़ी देर के लिए जहां था, वहीं जड़ हो गया...दिमाग ने जैसे शरीर का साथ देना छोड़ दिया...थोड़ा संभला..अब बस एक ही सोच...कैसे आंख बंद करूं और लखनऊ अपनों के बीच पहुंच जाऊं..उन अपनों के बीच जिनमें से एक अपने को अब रब ने अपना बना लिया...लेकिन इंसान के सोचने से ही सब कुछ नहीं हो जाता...शाम से पहले किसी ट्रेन में "तत्काल" से भी रिज़़र्वेशन नहीं था...बड़ी मशक्कत के बाद रात की ट्रेन मिली...बृहस्पंतिवार पौ फटते ही लखनऊ पहुंच गया...अब ये अंतर्द्वंद कि अपनों का सामना कैसे कर पाऊंगा...लेकिन सामना हुआ...कुछ बोले बिना ही सब कुछ कहा गया...मौन भी कितना बोल सकता है...शायद पहली बार इतनी शिद्दत के साथ महसूस कर रहा था...
दोपहर को वो घ़ड़ी भी आ गई जब वो अपना भी देखने को मिल गया जो अब दूसरी दुनिया का अपना हो गया था...शांत...एक लाल गठरी में...फूलों के बीच अस्थियों की शक्ल में...फूल प्रवाह करने की रस्म पूरी करनी थी...लखनऊ में तो गोमती ही मोक्षदायिनी है...दो गाड़ियों में मेरे समेत कुछ अपने, जुदा हुए एक अपने को, हमेशा हमेशा के विदाई देने गोमती के तट पर पहुंच गए...वहां जाकर देखा...कुछ चिताएं जलती हुईं...कुछ जलने के लिए तैयार...इसी माहौल के बीच सीढ़ियों से गोमती के पानी तक उतरे...किनारों पर काई इतनी कि पानी और ज़मीन का भेद मिटाती हुई...ऐसे छिछले पानी में कैसे उस अपने को मोक्ष मिलेगा...पानी के नज़दीक सबसे आखिरी सीढ़ी पर खड़ा मैं यही सोच रहा था...

क्या सोच रहे बाबू...अस्थियां बहानी है का...अचानक इस सवाल ने मेरी तंद्रा तोड़ी...सामने एक अधेड़ और एक युवक मैले-कुचैले कुर्ता-पाजामा पहने खड़े थे...चार कदम के फासले पर 7-8 बच्चे भी एकटक हमारी ओर देखे जा रहे थे...हमारे में से किसी ने पूछा...भईया ये अस्थियां क्या यहीं प्रवाह की जाती है...यहां तो साफ पानी है नहीं...अस्थियां आगे बहेंगी कैसे...
अधेड़ से जवाब मिला...हमारे होत आप चिंता काहे करत...रे गणेसी...उतर तो ज़रा पानी में...ये सुनते ही गणेसी काई पर ऐसे चलने लगा जैसे तेज़ चाल कंपीटिशन में हिस्सा ले रहा हो...गणेशी वहीं से लाल गठरी को गोमती में डालने के लिेए ऐसी मुद्रा में आ गया जैसे मछुआरा नदी में मछलियों को फांसने के लिए जाल फेंकते वक्त आता है...हमारे बीच से फिर किसी ने टोका...लाल गठरी खोल कर फूल और अस्थियां प्रवाहित करो...अब गणेसी ने ऐसा ही किया...तब तक हमारे साथ गईं एक बुज़ुर्ग महिला ने 21 रुपये मुझे पकड़ाए...क्योंकि मैं ही आखिरी सीढ़ी पर खड़ा था...मैंने वो 21 रुपये गणेसी के अधेड़ साथी को पकड़ाने चाहे...उसने 21 रुपये देखते ही मुझे ऐसे घूरा कि मैंने हत्या जैसा कोई अपराध कर दिया हो...21 रुपये मेरे हाथ में ही रह गए...तब तक मेरे साथ खड़े सज्जन माजरा समझ गए ....उन्होंने कहा कि ले लो, अभी दक्षिणा अलग से मिलेगी...ये सुनते ही अधेड़ और गणेसी के चेहरे ऐसे खिल गए जैसे काई में कमल...मनमुताबिक दक्षिणा मिलते ही अधेड़ और गणेसी दिवंगत की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने लगे...तब तक अस्थियां आधी बह गईं थीं और आधी अब भी वहीं टिकी हुई थीं जहां गणेसी ने उन्हें डाला था...थके कदमों से हम सब मुड़े तो वहां खड़े सातों-आठों बच्चे भी हमारे पीछे हो लिए...उन बच्चों ने नोटों की वो गड्डी अच्छी तरह देखी थी जिसमें निकाल कर कुछ नोट दक्षिणा के तौर पर अधेड़ और गणेसी को दिेए गए थे...
बच्चों को पीछा करते हमारे बीच से ही एक कड़कदार आवाज़ गूंजी...शर्म नहीं आती ये काम करते...इस उम्र में ही ये सब सीख लिया...ज़िंदगी भर कुछ काम नहीं कर सकोगे...ये सुनकर बच्चों के कदम ठिठक गए...
अब घर आ चुके हैं...शब्द चल रहा है...जिंद मेरिये, मिट्टी दी ए ढेरिए...इक दिन चलणा...मैं सिर झुकाए बैठा हूं...यही सोचता...इक दिन सभी को चलना है, तो फिर जीते-जी ये आपाधापी क्यों...क्या हमारी इस अंधी दौड़ की भी आखिरी मंज़िल वही नहीं, जहां इक दिन सभी को पहुंचना है....

(अभी नियमित पोस्ट लिखने की मानसिक स्थिति में आने में मुझे तीन-चार दिन लगेंगे...आशा है आप सभी मेरी व्यथा को समझेंगे)

बुधवार, 23 सितंबर 2009

चाणक्य की राजनीति का पहला पाठ...

राजनीति के आदिगुरु चाणक्य ने करीब दो हजार साल पहले अपने शिष्य चंद्रगुप्त को राजनीति का पहला पाठ पढाया था तो खीर भरी थाली का सहारा लिया...पाठ ये था कि थाली के बीचोंबीच मुंह मारने की जगह पहले किनारों से खाना रणनीतिक दृष्टि से श्रेयस्कर होता है...यानी पहले अपनी बाहरी किलेबंदी को मज़बूत करो, फिर केंद्र में आओ...

2000 साल बाद...

आज की राजनीति का पहला पाठ...

देश की राजनीति का आज सबसे बड़ा सच क्या है...हर नेता को चिंता है कि जीते-जी खुद सत्ता-सुख उसकी चेरी बना रहे..और रिटायरमेंट लेने से पहले ही अपने वारिसों को राजनीति की विरासत के साथ स्थापित होते देख लिया जाए...लेकिन एक नेता जी ने अपनी राजनीतिक पारी कुछ लंबी ही खेल ली... 70 पार जाने के बाद भी उनका रिटायरमेंट जैसा कोई इरादा नहीं बन रहा था...ये देख-देख कर नेताजी का बेटा व्याकुल होने लगा...एक दिन उसने पिता को घेर ही लिया...अब आप बस भी करिए...बहुत कर ली आपने राजनीति...अब तो आराम से घर बैठिए और राजनीति करने के लिए...मैं हूं ना...बस अब आपके पास जो भी गुर हैं, वो मुझे सिखा दीजिए...नेताजी ने बेटे की अधीरता देखी... कहा...चलो घर की छत पर चलते हैं...छत पर जाकर नेताजी ने बेटे से कहा... अब यहां से नीचे छलांग लगा दो...बेटा अचकचाया...पिता ने दोहराया...जैसा मैं कह रहा हूं, वैसा ही करो... मरता क्या न करता, राजनीति में जो आना था, सो बेटे ने छलांग लगा दी..नीचे गिरने पर बेटे की टांग टूट गई...फ्रैक्चर हो गया...थोड़ा होश आया तो बेटे ने नेताजी से कहा...ये कौन सा बदला लिया...मैंने आपसे राजनीति सिखाने को कहा और आपने मेरा ये हाल कर दिया...इस पर नेताजी का जवाब था...यही राजनीति का पहला पाठ है...अपने बाप की भी बात पर भरोसा न करो...

स्लॉग ओवर
मक्खन एक पार्टी में यार-दोस्तों के साथ ज़्यादा ही टल्ली हो गया...झूमता...लड़खड़ाता घर आया...मक्खनी ने दरवाजा खोला...मक्खन ने आधी बंद आंखों से ही देखा और बोला...सॉरी मैडम...लगता है गलत कॉल बेल बजा दी...
मक्खनी पहले से ही भरी बैठी थी...फट पड़ी...बस यही नौबत आनी रह गई थी...नशे में इतनी अक्ल मारी गई कि पत्नी को भी भूल गए...
मक्खन...माफ़ करना बहन, नशा आदमी को बड़े से बड़ा गम भुला देता है...

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

ब्लॉगिंग को महेश नहीं, ब्रह्मा-विष्णु चाहिएं

देवा रे देवा...यहां भी राजनीति...ब्लॉगिंग के शैशव-काल में ही कदम-कदम पर उखाड़-पछाड़ की शतरंज...मोहरे चलाने वाले परदे के पीछे...और मोहरे हैं कि कारतूस की तरह दगे जा रहे हैं...ठीक वैसे ही जैसे कस्बे-गांवों के मेलों में बंदूकों से गुड़िया, मोमबत्ती, सिक्का पर निशाना लगाया जाता है...100 में 99 शाट्स या तो खाली जाते हैं या पीछे चादर की दीवार पर लगे गुब्बारों को शहीद कर आते हैं...

अभी कांग्रेस के सर्वज्ञानी पंडित जयराम रमेश को दिव्यज्ञान हुआ था कि वो गांधी में ब्रह्मा, नेहरू में विष्णु और जिन्ना में महेश को देखते हैं...जयराम रमेश के मुंह से ये निकला ही था कि हर कोई लठ्ठ लेकर उनके पीछे पड़ गया...आखिर ये कहा कैसे...जयराम की सोच थी कि गांधी ने देश का निर्माण किया, इसलिए सृष्टि के रचयिता की तरह वो ब्रह्मा हुए...नेहरू आधुनिक भारत के निर्माता यानि पालनहार तो उन्हें विष्णु का दर्जा दिया...और जिन्ना ने देश का विभाजन कराया, इसलिए संहारक की तरह वो महेश हुए...

ये जयराम रमेश का विज़न था...उन्हें नागरिक की हैसियत से अपना विज़न रखने का उतना ही अधिकार है जितना कि हमें और आपको...खैर ये तो राजनीति की बातें हैं...जिसमें कोई नीति न हो, वो राजनीति...

लेकिन ब्लॉगिंग में राजनीति क्यों...हिंदी ब्लॉगिंग ने तो अभी चलना ही सीखा है...दौड़ने के लिए रफ्तार पकड़ने से पहले ही एक-दूसरे की टांग खिंचाई क्यों...क्यों कुछ को महेश बनना पसंद आ रहा है...वो ब्रह्मा-विष्णु बनकर हिंदी ब्लॉगिंग को उस मुकाम तक क्यों नहीं ले जाते, जिसकी वो हकदार है...ताकि फिर कोई विदेशी एडसेंस वेंस अंग्रेजी से लाडली और हिंदी से सौतेली जैसा व्यवहार करने की जुर्रत न कर सके...

बड़ों को जैसा करते देखते हैं, बच्चे भी वैसा सीखते हैं...ब्लॉगिंग के हम रंगरूट भी अपनी ऊर्जा को रचनात्मक दिशा देने की जगह विध्वंस में ही मौज ढूंढने लगेंगे...छोटा मुंह बड़ी बात होगी...ज़्यादा कुछ नहीं कहूंगा, लेकिन फरियाद पर गौर ज़रूर किया जाए मी-लॉर्ड...

स्लॉग ओवर
विदेश में किसी जगह तमाम देशों से क्रैब (केकड़े) मंगाकर प्रोसेस किए जा रहे थे...सभी देशों के क्रैब डब्बों में बंद होकर आए थे...लेकिन जो क्रैब भारत से आए थे उनके डब्बों के ढक्कन ही नहीं थे...ये देखकर सुपरवाइजर बड़ा हैरान हुआ...शिकायत करने यूनिट इंचार्ज के पास पहुंचा...कहा, ये भारत की कंपनी ने क्रैब के डब्बे खुले ही क्यों भेज दिए...अगर ये निकल कर भाग जाते तो...यूनिट इंचार्ज ने पूछा...क्या कोई क्रैब भागा...सुपरवाइजर ने कहा...नहीं, सर...
यूनिट इंचार्ज ने कहा... तो फिर तू क्यों हलकान हुए जा रहा है...अरे बेवकूफ ये भारत के केकड़े हैं...ये बाहर नहीं निकल सकते...एक निकलने की कोशिश करेगा...तो बाकी के दस इसकी टांग खींचकर फिर नीचे ले जाएंगे...

सोमवार, 21 सितंबर 2009

यूरेका...यूरेका...एलियंस मिल गए

रहिओअइउउउउफऱऱखथछठठ ऩ
जिसे खोजने के लिए इंसान न जाने कब से मरा जा रहा था...जिसे अमेरिका जैसी स्पेस सुपरपॉवर सारे घोड़े (सॉरी स्पेस शटल) दौड़ाने के बाद भी नहीं ढूंढ सकी, उसे निशांत मिश्र और मैंने खोज लिया...लेकिन उस ज़मीन पर पहला कदम निशांत मिश्र ने अपनी टिप्पणी (?) के ज़रिए रखा... इसलिए निशांत आज से नील आर्मस्ट्रांग (चांद पर पैर रखना भी इस खोज के आगे ऐसे है जैसे ऊंट के मुंह में जीरा) हो गए....और एलिंयस की ज़मीन पर दूसरा कदम रखने वाला मैं... यानि खुशदीप सहगल (ये निशांत बच्चू यहां भी आगे निकल गया)...वैसे चांद पर कदम रखने वाला दूसरा कौन था एड्रिन..उम्म...खैर छोड़ो जो भी था अब मेरा और निशांत का नाम तो अमर होने वाला ही है, अब हमें जनरल नॉलेज से क्या लेना देना...अब इस लिंक को गौर से देखिए-
रहिओअइउउउउफऱऱखथछठठ ऩ
इस पोस्ट को आगे पढ़ने से पहले इस लिंक पर होकर आइए...
 
हो आए लिंक से...क्या कहा चकराए हुए हैं...ठीक ऐसा ही हुआ था निशांत के साथ जो पहली बार वहां पहुंचा था...निशांत जैसे ही एलियंस की ज़मीन पर पहुंचा था, गश खाकर गिर पड़ा और सिर्फ (?) का निशान ही वहां छोड़ सका...मैंने ऐसा होते देख लिया था, इसलिए अंदर ही अपना संदेश लिखा.... ये कौन सी जगह है दोस्तों, ये कौन से एलिंयस का दयार है...झट से एलियंस की ज़मीन पर छोड़ा और निशांत को लेकर फौरन उलटी फ्लाइट से वापस आ गया...
और भारत के लिए खुश होने की बात एक और है...एलियंस यानि दूसरे ग्रह के प्राणियों की भाषा भी देवनागरी यानि हिंदी है...पूरे हिंदी ब्लॉग जगत के लिए गर्व करने का विषय है...
अभी सिर्फ एलियंस ने अपनी कूट भाषा में कोई पहला संदेश भेजा है...ब्लॉगवाणी मुझे नहीं पता था कि आपकी टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस है कि एलियंस का भी संदेश झट से पकड़ लिया...ठीक वैसे ही जैसे... कोई मिल गया...फिल्म में राकेश रोशन के कंप्यूटर ने एलियंस का ओम का संदेश पकड़ा था...
मेरा सभी ब्लॉगर भाइयों से अनुरोध है कि अगर एलियंस का संदेश देखना है तो ज़रा भी देर न करे...जो ऊपर मैंने लिंक दे रखा है वहां फौरन जाकर एलियंस का हिंदी में भेजा संदेश देखकर पुण्य कमाएं...अगर देर की तो संदेश गायब भी हो सकता है...फिर मत कहिएगा, खुशदीप सहगल ने बताया नहीं...
एक अनुरोध और, सब को एलिंयस का संदेश अगर कुछ समझ में आता है तो उस ज़मीन पर टिप्पणी के रूप मे छोड़ आए...इससे आगे शोधकर्ताओं को बड़ी मदद मिलेगी...ठीक वैसे ही जैसे समसामयिक घटनाओं के कैप्सयूल ज़मीन में गाड़ दिए जाते हैं..
(देर रात को खबर आई कि ललित शर्मा भी उस ज़मीन तक पहुंच गए थे...उन्हें तो पता नहीं क्या हो गया वहां...)
रहिओअइउउउउफऱऱखथछठठ ऩ

आज स्लॉग ओवर, व्लॉग ओवर कुछ नहीं...ये पोस्ट तो खुद ही स्लॉग ओवर की बाप है...

रविवार, 20 सितंबर 2009

ऊं..ऊं..मैं नहीं बस...मैं नहीं मानता

आओ...आओ...देखो निशांत ने मेरा नाम चोरी कर लिया...ऊं...ऊं..ऊं..ऊं...मैं नहीं बस...मैं नहीं...मैं नहीं मानता...पहले सारे निशांत को डांटो... कुश-बबली-खुशदीप-अनूप-रचना प्रकरण से उठते सवाल टाइटल देकर अपनी पोस्ट हिट करा ली...मेरे फंडे इस्तेमाल किए और मुझे कुछ भी नहीं दिया...द्विवेदी सर आप पनिश करो इस निशांत को...निर्मला कपिला मैम आप लगाओ... इस निशांत की अक्ल ठिकाने...देखो कितना चालाक है...अपने ब्लॉग पर प्रोफाइल भी नहीं लगा रखा है...लगाया भी होगा तो बस ढूंढते रह जाओगे वाले स्टाइल में...किसी को पता ही नहीं चले निशांत है या निशांतम..
 
ठीक ऐसे ही टीचर्स से दूसरे बच्चों की शिकायत लगाता था जब मैं केजी या फर्स्ट क्लास में था...पहली बात, अब बच्चा तो रहा नहीं...अब तो हालत ये है कि वानप्रस्थ दे दे कर आवाज मुझे हर घड़ी बुलाए...और मै सरकार की तरह सब कुछ सुनकर भी वानप्रस्थ की आवाज़ अनसुनी कर रहा हूं...
 
खैर अब क्या करूं इन निशांतों का...सोच रहा हूं अपने फंडे ओबामा द ग्रेट के पास जाकर व्हाईट हाउस की मार्फत पेटेंट करा लूं...फिर देखूंगा बच्चू... कैसे इस्तेमाल करोगे मेरे नाम और मेरे फंडों का...

अभी तो मेरी हालत व्हॉट एन आइडिया सरजी वाली एड की है...जिसमें डॉक्टर अभिषेक बच्चन बड़ी शान के साथ वॉक एंड टाक, टाक एंड वाक का मंत्र लोगों को देते हैं...और फिर ऐसी स्टेज आती है कि अपने ही क्लीनिक में मक्खियां मारनी पड़ती है...एड में अभिषेक के पास कंपाउडर तो था ये कहने के लिए व्हॉट एन आइडिया सरजी, मेरे पास तो ब्लॉग चलाने के लिए कोई कंपाउडर भी नहीं है....

वैसे निशांत महाराज मेरे आइडियाज़ को लिफ्ट करने में इतने रम गए कि 1 से 5 की गिनती भी भूल गए...वो तो भला हो विवेक रस्तोगी भाई का जिन्होंने निशांत की पोस्ट पर जाकर याद दिलाया..भई 1 से 5 की गिनती में 4 भी कहीं आता है...विवेक जी के ध्यान दिलाने से पहले निशांत तो यही सोच सोच कर फूल के कुप्पा हो रहे थे कि सोचे तो पांच फंडे थे, छठा खुशकर ऊपरवाले ने बोनस की तरह पोस्ट पर लगा दिया....

निशांत जी अभी तो इब्तदाए (पता नहीं ठीक भी लिखा है या नहीं) इश्क है आगे आगे देखिए होता है क्या...वैसे पोस्ट में सिर्फ तड़के से ही काम नहीं चलता...दाल में तड़का लगाया जाए तो ठीक लेकिन अगर सिर्फ तड़के में दाल लगा दी जाएगी तो पढ़ने वालों का जो होगा सो होगा, अपना हाजमा ज़रूर बिगड़ जाएगा...

आखिर में हंसते रहो, हंसाते रहो वाले राजीव तनेजा भाई की आपकी पोस्ट पर आई टिप्पणी को ज़रूर रिपीट करना चाहूंगा...
"खोदा पहाड़ निकला चूहा...ऊँची दुकान...फीका पकवान..नाम बड़े और दर्शन छोटे....इनमें से मैँ कुछ भी आपकी इस पोस्ट के लिए नहीं कहना चाहता लेकिन क्या करूँ?...दिल है कि मानता नहीं... :-)मित्र, इसे बस एक मज़ाक ही समझें...दरअसल क्या है कि मैँ आपकी पोस्ट का शीर्षक देख के ये सोच रहा था कि इसके अन्दर कुछ तीखा... करारा एवं मसालेदार पढने को मिलेगा...लेकिन आप तो यार अपुन के जैसे ही सीधे-साधे निकले खैर कोई बात नहीं...अगली बार मिलते है ब्रेक के बाद"

{राजीव भाई, अब आप मुझे ताऊ रामपुरिया की तरह लठ्ठ लेकर ढूंढने मत निकल पड़िएगा कि मैंने बिना पूछे आपकी टिप्पणी क्यों उठा ली...(इस उठाईगीरी पर नज़र रखने के लिए कुश दारोगा बाबू पहले ही दूरबीन लेकर बैठे हुए हैं...)}

स्लॉग ओवर
शादी की तीन स्टेज :
पहली- "मैड फॉर इच अदर"
दूसरी- "मेड फॉर इच अदर"
तीसरी- "मैड बिकॉज़ ऑफ इच अदर"
(आप कौन सी स्टेज में हैं, बताइएगा ज़रूर)

शनिवार, 19 सितंबर 2009

हां, मैं हूं बबली जी का वकील...

पहली बात तो मैं ये साफ़ कर दूं कि ये पोस्ट मुझे कल ही लिखनी थी लेकिन कल किसी समारोह में जाने की वजह से ये मेरे लिए संभव नहीं हो सका...मैं ये भी इंतज़ार कर रहा था कि बबली जी शायद खुद ही कुश की अदालत में अपने खिलाफ चले स्वयंभू मुकदमे की चार्जशीट पर सफाई दे दें...लेकिन बबली जी अपनी अगली पोस्टों के लिए स्नैप्स और शेरो-शायरी ढूंढने में इतनी व्यस्त हैं कि उन्हें ऐसे छोटे मोटे मुकदमों की कोई परवाह नहीं..वैसे भी ये मुकदमा ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में कोई चल रहा है, ये मुकदमा तो चल रहा है जयपुर के कुश के ज़रिए ब्लॉगर्स की अदालत में...
ठीक वैसे ही जैसे नया सीरियल चल रहा है...ये चंदा कानून है...इस अदालत में फैसला पहले सुनाया जाता है, सफाई के लिेए मौका बाद में दिया जाता है...भईया खबर की दुनिया का भी पहला सिद्धांत है कि कोई रिपोर्ट फाइल की जाए तो संबंधित सभी पक्षों का वर्जन भी जान लिया जाए...पर ब्लागर्स के मंच पर खुला खेल फर्रूखाबादी है...न खाता, न बही, जो कुश महाराज कहें, वो सही...मौज को ही मुद्दा बना दें...मुद्दों की मौज बनाने की फिक्र कौन करे...
किसी ने बबली जी वाली कुश जी की पोस्ट पर कमेंट किया है कुशाग्र बुद्धि,आइडिया के खान हो सचमुच...मैं भी इससे पूरी तरह सहमत हूं...कुश जी की इंस्पेक्टर ईगल वाली बुद्धि को मेरा भी लमस्कार (उन्हीं की तर्ज पर)...बबली जी की प्रोफाइल की पंक्ति निकाली...उनका फोटो जू....म किया...फिर 36 कमेंटस (वैसे उस पोस्ट पर और भी ज़्यादा कमेंट्स आए थे) में से... चुन चुन कर मारूंगा वाली... तर्ज पर सिर्फ 14 नाम छांटे...उन महारथियों में एक गरीब मैं भी था...ब्लॉग-शास्त्र में नया रंगरूट होने की वजह से अनजान था कि किसी दूसरी पोस्ट पर कमेंट करने के लिए जाने से पहले कुशजी की अनुमति लेनी होती है...अब खुश कमेंट करने के लिए कुश से अनुमति नहीं लेगा तो और किससे लेगा...ठीक वैसे ही जैसे कालेज में नया दाखिला लेने पर दादा भाइयों से डर कर रहना पडता है...
तो कुश भाई, पहली बात तो ये मैंने आपकी समझ के अनुसार बबली जी की पोस्ट पर जाकर टिप्पणी करने का गुनाह किया...क्या गुनाह किया था... बगैर बबली जी की तारीफ किए फोटो के भाव को देखते हुए पुरानी फिल्म सीमा में रफी साहब के गाए गाने की दो पंक्तियां लिख दी थीं
जब भी ये दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है
(अब ये मत कह देना कि मैंने भी उन पंक्तियों में गीतकार का नाम नहीं दिया तो मैंने भी वो गाना चोरी कर लिया, इसलिए मैं भी बंटी हो गया)
रही बात जिन 14 टिप्पणीकारों का आपने चिट्ठे में जिक्र किया, उन्होंने क्यों नहीं अपने-अपने घरों में गीत-गजलों के संग्रह रखे हुए, कहीं कमेंट देना है तो पहले उनसे कन्सल्ट करो...ठोक बजा कर देख लो कि जो पंक्तियां पढी है वो कहीं मरहूम गालिब चचा तो ही नहीं लिख गए...वैसे कुश जी फिर दाद दूंगा आपके सिक्स्थ सेंस को...वाजिदा तब्बसुम जी की पंक्तियों को ऐसे प्रचारित किया जैसे गोया वो गायक जगजीत सिंह ने खुद ही लिखी हो...ये तो भला हो पल्लवी त्रिवेदी जी का जिन्होंने सच बता दिया कि आखिर वो पंक्तियां किसकी थीं...नहीं हमें तो कुश जी ने ये मनवा ही दिया था कि ये पंक्तियां जगजीत सिंह की ही थी...
अब रही बात जिन्होंने बबली जी की पोस्ट पर कमेंट किए वो अपनी बात पर टिके क्यों नहीं ...सफाई की मुद्रा में आपको साक्षात दंडवत क्यों नहीं करें...जैसे एक टिप्पणीकार ने लिखा है बड़े-बड़े बबली जी की पोस्ट पर जाकर साक्षात दंडवत करते दिखाई देते हैं...समीर लाल जी समीर ने शालीन तरीके से अपने कमेंट्स के जरिए समझाने की कोशिश भी कि "एक साथ ३६ लोग आँख नहीं मूंदते. कतई आवश्यक नहीं कि हर रचना के रचनाकार को आप जाने ही या उसे सुना ही हो तो यह भूल अति स्वभाविक है अगर आप किसी के उत्साहवर्धन करने के लिए आगे आते हैं. वरना अपने आप में तो यूँ भी मुदित रहा जा सकता है." समीर जी आंख की मर्यादा रखना जानते हैं, इसलिए उन्होंने उसी तरीके से रिएक्ट किया...
मैंने ब्लॉगवाणी पर और छानने की कोशिश की शायद कोई और जांबाज़ नज़र आ जाए जिसने इस सेंसेटिव मुद्दे पर अपना पक्ष रखने की कोशिश की हो...ऐसे में सिर्फ एक ही दिलेर मिला, हाथ में लठ्ठ लिए अपना ताऊ रामपुरिया...ताऊ ने अपनी पोस्ट में कुछ गजब के सवाल किेए हैं....उन्हें ताऊ की अनुमति से मैं फिर यहां रिपीट करना चाहूंगा...
सवाल न.1... क्या नये लोगों के बारे मे पूरी जानकारी किये बिना उनके चिठ्ठों पर टिप्पणियां नही की जाना चाहिये? जब तक की उनके बारे में पक्की खबर नही लग जाये कि यह आदमी इधर उधर का माल नही ला रहा है? अथवा उनके द्वारा सेल्फ़ डिसकलेमर पोस्ट के नीचे लगाया जाना चाहिये कि यह माल सौ प्रतिशत शुद्ध उनका ही है, यानि खांटी माल है, सिर्फ़ ऐसी ही डिसकलेमर लगी चिठ्ठा पोस्टों पर टिपियाया जाना अलाऊ होगा?
 
सवाल न.2... जो जिस क्षेत्र का ब्लागर है उसे उसी क्षेत्र मे टिप्पणी करनी चाहिये, मसलन कविता, गजल/शायरी का जानकार ही गजल/शायरी की पोस्ट पर कमेंट कर सकता है. इसी तरह गद्य के जानकार गद्य पोस्टों पर करें?
 
इसका फ़ायदा यह होगा कि भविष्य मे इस तरह की कवायद करने की जरुरत ही नही पडॆगी. कारण कि हर आदमी के लिये हर क्षेत्र का जानकार होना जरुरी नही है. तो फ़टे मे पांव नही घुसेडने की आदत से बचा जा सकेगा.
 
सवाल न. 3... क्या आप सोचते हैं कि शादी का लिफ़ाफ़ा नही लौटाना चाहिये? अब आप कहोगे कि ऐसे लोगों को शादी का निमंत्रण ही क्यो देते हो? बात आपकी ठीक है पर यह ऐसी सरकारी शादी है कि सामने वाला बिना बताये आगे से निमंत्रण पत्र (टिप्पणी) डाल जाता है तो उसको क्या करें? क्या ऐसी आई हुई टिप्पणी को लौटा देना (डिलिट) चाहिये?
 
जिस तरह से यहां टिप्पणी करने वालों की छीछालेदर हुई है उससे तो अब कहीं टिप्पणी भी करने की इच्छा नही हो रही है. क्योंकि वहां टिपियाने वाले अधिकांश टिप्पणीकर्ता गजल/शायरी की विधा से वाकिफ़ भी नही थे और जो इसके जानकार भी थे तो जरुरी नही है कि वो ये जानते ही हों की यह किसकी रचना है? जिन्होने भी टिपण्णीयां की वो एक तरह से प्रोत्साहनात्मक कार्य ही था.
 
 
सवाल न. 4... क्या आप समझते हैं कि वरिष्ठों की एक स्क्रींनिग कमेटी होनी चाहिये जिनके पास पोस्ट जमा करा दी जाये और वहां से ओके सर्टीफ़िकेट मिलने के बाद ही पोस्ट पबलिश करने की अनुमति दी जानी चाहिये?
यानि एक स्वयंभू मठाधीशों और स्ट्रिंगरों की कमेटी बना दी जाये जो यह तय करे कि यह माल मौलिक है या नही और इसके बाद ही इसको निर्बाध कमेंट करने की अनुमति दी जाये?
 
 
सवाल न. 5... अनसेंसर्ड चिठ्ठों यानि जो आपकी स्क्रिनिंग कमेटी से होकर नही आये उन पर टिप्पणी करने की रोक होनी चाहिये जिससे कि ऐसे चिठ्ठों पर टिप्पणी करके भविष्य मे होने वाली छीछालेदर से बचा जा सके.
 
सवाल न. 6...क्योंकि अब टिप्पणियां सिर्फ़ स्क्रिनींग कमेटी द्वारा पारित चिठ्ठों पर ही होंगी तो इसे देखते हुये..उडनतश्तरी, सारथी और चिठ्ठाजगत को यह हिदायत दी जाये कि वो लोगों को ज्यादा से ज्यादा टिप्पणियां देकर नये लोगों को उत्साह वर्धन करने की भ्रामक अपील करना बंद करें, वर्ना उन पर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जायेगी?
 
सवाल न. 7...क्या किसी की छीछालेदर करने का अधिकार कुछ विशेष व्यक्तियों और उनके चेले चपाटों के पास सीमित कर दिया जाना चाहिये? और मौज लेने का अधिकार भी कंडिका ४ वाली कमेटी के पास सीमित कर दिया जाये? इस अधिकार के चलते कमेटी के अध्यक्ष का निर्धारण भी आसानी से हो जायेगा और सदस्य का आना भी कमेटी पर तय ही रहेगा.
 
सवाल न. 8...क्या इस व्यवस्था से हम मातृभाषा की ज्यादा और आसानी से सेवा कर पायेंगे?
ये तो रही ताऊ रामपुरिया की बात...

अनूप शुक्ल जी ने कुश जी की ही पोस्ट पर ये बड़ी सार्थक टिप्पणी की है..
"अरे भाई, बबलीजी ने ये थोड़ी कहा कि अपने ब्लाग पर जो कवितायें, शेर शायरी उन्होंने पोस्ट की उनको उन्होंने लिखा भी है... यह तो इसी तरह हुआ जैसे कि सड़क किनारे किसी कार के पास मैं खड़ा हो जाऊं या फ़िर कोई कार चलाता दिखूं तो आप कहो कि मैं उस कार को अपनी बता रहा था... बाद में साबित कर दो कि मैं झूठ बोल रहा था और कार को अपनी बता रहा था...बबलीजी ने रचनायें पोस्ट कीं यह तो कहा नहीं कि वे उनकी हैं...जिन लोगों ने बबलीजी के ब्लाग पर कमेंट किये उन्होंने भी कोई गलत नहीं कहा... पढ़कर अच्छा लगा, बहुत खूब, सुन्दर लिखा है, क्या खूब लिखा है... इससे यह तो नहीं जाहिर होता कि उन्होंने यह मान लिया है कि वे शेर/गजल बबली ने लिखी हैं... इससे सिर्फ़ और सिर्फ़ यह साबित होता है कि पोस्ट बबली ने किया है और लिखने वाले ने अच्छा लिखा है... लिखने वाला कोई भी हो सकता है... किसी दूसरे की गजल बबलीजी ने अपने नाम से लिख दी कहकर उनकी बुराई करना उसी तरह है जिस तरह इंस्पेक्टर मातादीन ने चांद पर अपराधी पकड़े थे..."

मेरा भी यही मानना है कि बबली जी ने कहीं भी अपनी पोस्ट पर ये नहीं कहा कि ये पंक्तियां मेरी हैं...उन्होंने ये भी नहीं कहा कि जो स्नैप उन्होंने पोस्ट पर दिया है उसकी छायाकार वहीं हैं...हां, एक गुनाह बबली जी ने ज़रूर किया है कि पल्लवी त्रिवेदी जी के सच्चाई बताने पर जानबूझ कर उनका कमेंट डिलीट कर दिया...ऐसा उन्होंने क्यूं किया मैं नही जानता...इस पर वो खुद ही सफाई दे दें तो बेहतर...अगर वो खुद सफाई नहीं देतीं तो उन्हें गुनहगार मान लिया जाएगा...चलिए वो गुनहगार हो भी गईं तो क्या उनका कसूर इतना बडा है कि उन्हें सरे पंचायत रूसवा किया जाए...एक नारी के साथ ऐसा बर्ताव हुआ और मातृशक्ति भी चुप रही...क्या मौज की खातिर कहीं तक भी लिबर्टी ले लेना जायज है...मैं जानता हूं कि इस पोस्ट पर मुझे फूल कम पत्थर बहुत ज्यादा आने वाले हैं...लेकिन मैं जिस बात पर स्टैंड ले लेता हूं तो फिर उस पर टिका रहता हूं...मैं वादा करता हं कि मैं अपनी इस पोस्ट से भी कोई टिप्पणी डिलीट नहीं करूंगा बशर्ते कि वो मर्यादा की सीमा न लांघे...
आखिर में कुश भाई आपसे एक निवेदन और...मेरी इस पोस्ट को किसी पोस्ट विशेष पर अपने भाव समझ कर ही लेना...व्यक्तिगत रूप से आप मेरे लिए उतने ही सम्मानित है जितना कि भारत का हर नागरिक...मुद्दों पर बहस होनी चाहिए, मुद्दों को खुन्नस की वजह नहीं बना लेना चाहिए...
कुश भाई बिना मांगे अगले स्टिंग आपरेशन के लिए आइडिया और दे देता हूं...अब उन्हें पकड़ो जिनकी पोस्ट पर जाकर बबली जी ने टिप्पणियां दी है...शुरुआत मुझसे ही करो क्योंकि मेरी कई पोस्ट पर बबली जी की टिप्पणियां आई हुई हैं...

पहले कुश ने कहा, खुश ने सुना
अब खुश ने कहा, ये कुश की मर्जी है वो सुने या न सुने ...
लेकिन जब फिर कुश कहेगा, तो खुश उसे ज़रूर सुनेगा...

उफ...इतनी लंबी पोस्ट...देख कर मैं खुद ही डर गया...नहीं जानता कि आप इसे कैसे झेलेंगे...अरे बाबा इतने पंच्स के बाद भी स्लॉग ओवर की कसर है क्या...नहीं, नहीं मानते तो लो भईया छोटा सा...
 
स्लॉग ओवर
दिल तो है दिल किसी पर भी आ सकता है...तो जनाब एक मुर्गी और सुअर के नैन लड़े...आंखों ही आंखों में इशारा हुआ...बात किस तक आ गई...दोनों ने किस लिया...किस लेते ही दोनों दुनिया को अलविदा कह गए...मुर्गी स्वाइन फ्लू से मर गई और सुअर बर्ड फ्लू से....(इसे कहते हैं किस ऑफ डेथ)

 

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

बापू की डेड बॉडी...

आज किसी निजी काम में अति व्यस्त रहने की वजह से बहुत थका हुआ हूं..इसलिए पोस्ट से ब्रेक...इतने दिन बाद ब्रेक तो बनता है न बॉस...इसलिए आज बस स्लॉग ओवर से ही काम चला लीजिए...

स्लॉग ओवर
एक एनआरआई साहब भारत से अपने बापू और बेबे (मां) को भी उसी मुल्क में साथ ले गए, जहां उनका बसेरा था...बापू जी की परदेस में मौत हो गई...अब एनआरआई साहब ने बापू के पार्थिव शरीर को फ्लाईट से भारत भेजा...साथ ही भारत में अपने गांव में एक ई-मेल भी कर दिया...
बापू चला गया...हमें किसके आसरे छोड़ गया...अब किस काम का हमारा जीना...मैं बापू की डेड बॉडी फ्लां फ्लां...फ्लाईट से भारत भेज रहा हूं...
साथ में वो गिफ्ट हैं जो तुमने मुझे भेजने को कहा था...बापू की डेड बॉडी के नीचे 12 पैक चाकलेट, 10 पैक बबल गम, 8 पैक ड्राई फ्रूट्स हैं...बापू ने जो नाइकी जूते पहने हैं वो हैप्पी के लिए हैं...जो बेसबाल हैट पहना है, वो पिंकी के लिए है...बापू के दोनों हाथों में प्रीतो, बिल्लो के लिए हैंडबैग हैं...बापू ने बच्चों की 6 शर्ट पहनी हुई हैं...बाएं हाथ में हरमीत की अंगूठी है...दोनों कलाइयों पर शम्मी और रम्मी की घड़ियां हैं...अगर कुछ और भेजना है तो बब्बी और रब्बी से पूछ लो... यहां बेबे (मां) की भी तबीयत बहुत खराब है...
 

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

पोस्ट हिट कराने के पांच फंडे

इस पोस्ट को मैं क्या नाम दूं...पोस्ट का नाम धांसू है तो आधी फतेह तो वहीं हो गई...अब बड़े-बड़े माल्स वाले हिले हुए थोड़े होते हैं जो शो-विंडो पर इतना पैसा खर्च करते हैं...ग्राहक एक बार आए तो सही दुकान के अंदर, फिर तो मीठी-चुपड़ी बोलकर फंसा ही लेंगे...माल्स ही क्यों आजकल तो फिल्मों वाले भी बड़े समझदार हो गए...पता है मल्टीप्लेक्स में फिल्म दो दिन भी हाउस फुल ले गई तो प्रोड्यूसर, डिस्ट्रीब्यूटर, एक्जीबिटर और स्टार सभी गंगा तर जाएंगे...इसलिए फिल्म चाहे डिब्बा हो लेकिन प्रोमो बड़े जानदार बनाए जाते हैं...याद है न...चांदनी चौक टू चाइना...नाम ही सुनकर कोई भी टिकट कटा ले...ये बात और है कि फिल्म देखने के बाद फिल्म बनाने वालों को साइकाइ्ट्रिस्ट के पास भेजने के लिए खुद अपने खर्चे पर पर्ची कटा कर देने का मन करे....तो ऐसी होती है नाम की महिमा...अब आपको मुफ्त में ही बताता हू पोस्ट को हिट कराने के लिए उसके नामकरण के हिट फंडे...

1. पोस्ट चाहे जिस विषय पर, टाइटल में ब्लॉग या ब्लॉग से जुड़ा कोई शब्द ज़रूर घुसेड़ दो...
2. किसी फलाने जी का नाम लेते हुए ललकारो, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई...
3. दूसरे के मज़हब से जुड़ी कोई तीखी बात मिर्च मसाला लगा कर टाइटल पेश करो...
4.
सेक्स, पोर्न, टॉपलेस, अश्लील, वल्गर...ऐसे ही कोई टनटनाते शब्द टाइटल में डाल दिए जाएं
5. मैंने ऐसे पैसा कमाया, आप भी कमा सकते हो...इस तरह का कोई लॉलीपॉप टाइटल में फिट कर दो...

क्या कहा, आप अपने ब्लॉग पर ऐसा-वैसा कुछ नहीं कर सकते...तो फिर महान ब्लागर बनने का ख्याल भी दिल से निकाल दो...चलो अब सोचो अपनी नई पोस्ट का कोई फड़कता हुआ नाम...मैंने तो सोच लिया...पोस्ट हिट कराने के पांच फंडे
फिर स्ल़ॉग ओवर...अब रोज़-रोज़ कहां से लाऊं...क्या कहा, जहां से मर्जी लाओ, हमें नहीं पता...अब तो भईया लाना ही प़ड़ेगा...लीजिए झेलिए...

स्ल़ॉग ओवर
मक्खनी को पहली डिलीवरी होनी थी...मक्खन दिल्ली में था...मक्खन ने मक्खनी का हाल जानने के लिए मेट्रनिटी होम फोन मिलाया...लेकिन गलती से लाइन क्रिकेट स्टेडियम में मिल गई...
मक्खन ने पूछा...क्या हाल है...
दूसरी तरफ से जो जवाब मिला, उसे सुनकर मक्खन खुद गश खाकर गिर गया...
दरअसल जवाब मिला... 7 आउट हो गए हैं...उम्मीद है कि लंच तक कुछ और आउट हो जाएंगे...जो पहला आउट हुआ वो डक था...
(साभार-डॉ दिव्या सिकेरा, मुंबई)

बुधवार, 16 सितंबर 2009

वहां कौन है तेरा...मुसाफिर जाएगा कहां

ब्लॉग पर पहली पोस्ट को डाले मुझे आज पूरा एक महीना हो गया है...मेरा जिस शहर में जन्म हुआ, वहीं से 1857 में आज़ादी की लड़ाई का पहला बिगुल बजा था...मैं मेरठ की बात कर रहा हूं...इस शहर का मिजाज़ ठेठ और अक्खड़ है...लोगों का बात करने का अंदाज़ बेशक लट्ठमार है लेकिन कमोवेश अंदर से होते ज़्यादातर सीधे और दिल के सच्चे ही हैं...अपने शहर और वहां के बाशिंदों से मुझे बड़ी मुहब्बत है...लेकिन अफसोस 7-8 साल पहले शहर से मेरा आबो-दाना उठ गया...वजूद की जंग मुझे नोएडा ले आई...
शुरू-शुरू में ऐसा लगा कि मैंने ऊपर वाले का क्या बिगाड़ा था, जो मुझे अपनी ज़मीन से उखाड़ कर बेमुरव्वत, पत्थरदिल इंसानों की बस्ती में भेज दिया...पड़ोस वाले को पड़ोस का पता नहीं कि जी रहा है या मर रहा है...मेरठ की गलियां-कूचे, कंपनी बाग की ठंडी हवा, माल रोड की मटरगश्ती, आबू-लेन पर राधे की चाट, दोस्तों के साथ रोज़ शाम को बाज़ार का एक राउंड...सब एक गुम सपने की तरह पीछे छूट गया...मरता क्या न करता की तर्ज पर किसी तरह धीरे-धीरे नए शहर में एडजस्ट करना शुरू किया...
दिल्ली जैसे बड़े शहर से सटे होने की वजह से नोएडा में भी लोगों का जीने का अंदाज रोबोट सरीखा ही है...हर कोई भाग रहा है...बिना रूके...और, और, और...और की अंधी दौड़ में...कोई कहने वाला नहीं...वहां कौन है तेरा...मुसाफिर जाएगा कहां...दम ले ले घड़ी भर, ये आराम पाएगा कहां...शायद कभी नहीं...या फिर शायद तभी जब खुद के लिए और, और... करना कुछ मायने नहीं रखेगा...जिन अपनों के लिए जीवन होम कर दिया...एक दिन वो ही इंतज़ार करने लगेंगे कि हम कितने पल इस दुनिया में और...और...
इंसानों की शक्ल में खुदगर्ज पत्थरों के बीच-बीच रहते-रहते खुद भी पत्थर होता जा रहा था...लेकिन फिर आज़ादी के दिन ही चमत्कार हुआ...न जाने कौन सी शक्ति ने ब्लॉग पर पहली पोस्ट...कलाम से सीखो शाहरुख...लिखने को प्रेरित किया...सच बताऊं तो मेरे एक जूनियर साथी ने ब्लॉग स्पॉट पर मेरे लिए देशनामा नाम का ब्लॉग इस साल फरवरी में ही बना दिया था...लेकिन वक्त जैसे इंतज़ार करता रहा...मेरा कुछ लिखने का जी नहीं किया...देशनामा भी बेचारा मेंढक की हाइबरनेशन स्लीप की तरह चुपचाप पड़ा रहा...बिना मुझे तंग किए...फिर आज़ादी के दिन न जाने क्या हुआ...कंप्यूटर पर फोनेटिक फोंट न होने के बावजूद मैंने आनलाइन ही फोनेटिक टूल खोलकर लिखना शुरू किया...उसी दिन शाहरुख का अमेरिका के नेवार्क में माय नेम इज़ खान वाला पंगा हुआ था...मेरी उंगलिया खुद-ब-खुद चलती रही और पहली पोस्ट तैयार हो गई...पब्लिश कर दी..थोड़ा बहुत रिस्पांस मिला...लेकिन अच्छा लगा...फिर पहले दो दिन में एक पोस्ट और फिर लगातार रोज़ एक पोस्ट...न जाने कौन है जो मुझे ऐसा करने की शक्ति दिए जा रहा था...चाहे कितना भी थका क्यों न हूं लेकिन लैपटॉप सामने आते ही तरोताजा हो जाता...पोस्ट डालते रहने का सिलसिला आज पूरे एक महीने का हो गया ...इस दौरान मैंने जैसे फिर मेरठ में अपने खोए हुए जहां को दोबारा पा लिया...
इंसानों से जो भरोसा उठता जा रहा था, वो मेरे ब्लॉगर परिवार ने मुझे गलत साबित कर दिया...मेरे पास ऐसा कोई हिसाब नहीं कि मैंने एक महीने में कितनी पोस्ट लिखी, कितनी उन्हें पसंद मिलीं, कितनों ने उन्हें पढ़ा, कितने कमेंट्स आए...तराजू लेकर कभी मैं ऐसा गुणा-भाग करने नहीं बैठा...मैं बस इतना जानता हूं कि ब्लॉगिंग के ज़रिए मुझे बेशुमार प्यार मिला...शायद अपनों से भी ज़्यादा...अब यही मेरा सरमाया है...यही मेरी पहचान है..और क्या कहूं...शुक्रिया तो हर्गिज नहीं...क्योंकि ये शब्द परायों से बोला जाता है...क्या यहां है कोई मेरा पराया...

स्लॉग ओवर से आज भी छुट्टी नहीं मिलेगी क्या...नहीं...तो...(है...बाबा..नीचे है...)
 
स्लॉग ओवर
मैं घर में बैठा था कि मक्खन बड़े उखड़े अंदाज़ में मेरे पास आया...चेहरे से दुनिया-जहां का दर्द टपक रहा था...आते ही बोला...ओफ्फो...सात साल में कितनी दुनिया बदल गई...
मक्खन को दार्शनिक की तरह बात करते देख मेरा माथा ठनका...मैंने पूछा...ऐसा क्या हो गया मक्खन प्यारे...
मक्खन...क्या हो गया....ये पूछो कि क्या नहीं हो गया...
मैंने कहा...जब बताओगे, तब तो मुझे पता चलेगा कि कौन सा आसमान टूट पड़ा...
मक्खन... अब क्या बताऊं दोस्त...सात साल पहले मैं घर आता था तो मेरी मक्खनी दरवाजे से घुसते ही किस से मेरा वेलकम करती थी और मेरा पपी मुझ पर गुर्राता था...
इसके बाद मक्खन ने ठंडी सांस ली चुप हो कर बैठ गया..

तब तक मेरी जिज्ञासा भी बढ़ गई, मैंने कहा...तो अब ऐसा क्या हो गया...
मक्खन ...अब उन दोनों ने रोल बदल लिए हैं...

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

हां, वो मेरे आइकन हैं...

मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए, मुझे आइकन बनने से रोक लो...
स्व. मुकेश जी
के गीत की तर्ज पर ये पंक्तियां किसने मुझे भेजी हैं, उनके बारे में इस पोस्ट में आपको आगे स्पष्ट हो जाएगा...लेकिन जिन्होंने ये पंक्तियां मुझे भेजी हैं, ...उन्ही के गीत की शैली में मैं कहूंगा...मुझे आपसे बहुत कुछ चाहिए, मुझे उससे वंचित ना करो...खैर अब आता हूं अपनी पोस्ट... हिंदी ब्लॉगिंग के टॉप टेन आइकन...को लेकर अगर कुछ गलतफहमी है तो उसे दूर करने के विषय पर...अगर मेरे किसी कृत्य को लेकर उंगली उठी है तो उसका जवाब देकर दूध का दूध और पानी का पानी करना भी मेरा फर्ज है...अन्यथा मर्ज़ को अगर यूहीं छो़ड़ दिया जाए तो ग्रंथि बनी रहती है...मेरी आइकन्स वाली पोस्ट को लेकर हर तरह की प्रतिक्रियाएं आईं...फूल भी मिले, पत्थर भी...सबसे पहले मुझे लगता है कि कुछ बंधुओं ने शायद आइकन्स का मतलब ही गलत लगा लिया है...आइकन्स का मतलब होता है रोल मॉडल, प्रेरणास्रोत...आइकन्स का ये मतलब नहीं होता कि किसी फील्ड विशेष में अच्छा काम करने वाले (मसलन अच्छे ब्लॉग लिखने वाले)...इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि राजनीति में सभी दलों में अच्छे नेता हो सकते हैं...लेकिन जब आइकन्स की बात आती हैं तो नेहरू, इंदिरा, जेपी, वाजपेयी और राम मनोहर लोहिया जैसे लीडर्स के नाम सामने आते हैं...कलाम देश के आइकन हैं, किसी को इस पर ऐतराज़ हो सकता है क्या...सचिन क्रिकेटर्स के रोल मॉडल हैं, क्या कोई इस हकीकत को झुठला सकता है...इसी तरह ब्लॉगिंग में मैंने अपने लिए भी आइकन चुने....ये विशुद्ध रूप से मेरी अपनी पसंद है...ऐसे ही हर ब्लॉगर भाई की अपनी-अपनी पसंद हो सकती है...जिस तरह मैं अपनी बात किसी पर थोप नहीं सकता...इसी तरह कोई मेरे ऊपर भी अपनी मनमानी नहीं चला सकता...मुझे अपनी निजी पसंद रखने का उतना ही अधिकार है जितना हर किसी को...मैं यहां ये भी निवेदन करना चाहूंगा कि मैंने अपनी पोस्ट में बिल्कुल साफ शब्दों में लिखा था कि मैंने अपने लीडर उन्हीं पोस्ट से चुने जिन्हें मैं 25 दिन में पढ़ सका...एक बार फिर मैं अपनी उन पक्तियों को यहां अक्षरक्ष दोहरा देता हूं-
मैंने 25 दिन में दूसरों की जितनी भी पोस्ट पढ़ीं, उनमें से मैंने अपने टेन आइकन चुने हैं...यहां मैं साफ कर दूं कि दूसरी सारी पोस्ट न तो मैं पढ़ सका हूं और न ही मेरे में इतना सामर्थ्य है...हां जितना पढ़ा उसी में से मैंने अपने लीडर चुन लिए..ये मुमकिन है कई दूसरे ब्लॉगर भाई भी बहुत अच्छा लिखते हो, जिन्हें पढ़ने का मुझे सौभाग्य ही प्राप्त नहीं हुआ...लेकिन जो भी मैं नाम लेने जा रहा हूं, उन पर शायद ही किसी को ऐतराज हो..ये चुनाव ज़्यादा पढ़ी जाने वाली, ज़्यादा पसंद वाली, ज़्यादा टिप्पणियों वाली पोस्ट के आधार पर नहीं है...ये चुनाव है सिर्फ एक शब्द पढ़ कर ही ये अंदाज लगा लेने का कि लिखने वाले की सोच की कितनी गहराई है...इंसान के नाते उसके कद की कितनी ऊंचाई है...मेरे इस चुनाव को लोकप्रियता के पैमाने से न लिया जाए, बल्कि इस आधार पर लिया जाए कि ब्लॉगर्स परिवार में इन आइकन का कितना सम्मान है...
अब मैं अपनी पोस्ट पर आई कुछ प्रतिक्रियाओं के ज़रिए ही अपनी बात स्पष्ट करने की कोशिश करता हूं...मैं आभारी हूं, दिनेशराय द्विवेदी जी का जिन्होंने बड़ी साफगोई से जो उनके दिल मे था, अपनी प्रतिक्रिया में व्यक्त किया...पहले उनकी बात...आप की आइकॉन सूची आप की अपनी पसंद हो सकती है... लेकिन ब्लागरों को इस तरीके से तौलना मुझे रुचिकर नहीं लगा...बहुत से ब्लागर हैं जो बहुत बहुत अच्छा काम कर रहे हैं और कर गए हैं...बहुत से हैं जिन में बहुत बहुत संभावनाएँ भरी पड़ी हैं और समय आने पर बहुत बड़े-बड़े काम कर जाएंगे... मेरा मानना है कि अधिकांश ब्लागर इस दुनिया और मानव समाज को खूबसूरत प्यार भरी दुनिया और समाज के रूप में देखना चाहते हैं...उन के नजरिए भिन्न भिन्न हैं... लेकिन वे अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार बने रहें तो मंजिल पर पहुँचने के पहले सब एक ही सड़क पर खड़े होंगे... सब अपना अपना काम कर रहे हैं... कोई टायर का तो कोई स्टेयरिंग का तो कोई हॉर्न का .....सफर इन में से किसी भी एक के बिना पूरा नहीं होने का...
द्विवेदी जी जैसी ही सटीक प्रतिक्रिया डॉक्टर अमर कुमार जी ने भी भेजी-भाई मेरे, ( बतर्ज़ स्व। मुकेश जी ) मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिये॥ मुझे आइकन बनने से रोक लो.. बस तुम रोक लो ...जहाँ कुछ गलत दिखता है, मैं इंगित अवश्य कर देता हूँ ...यह मेरा व्यक्तिदोष है ...यही मैं अपने लिये भी चाहता हूँ ...यह तो हर कोई मानेगा कि, भले ही एक अपरिचित मनुष्य गड्ढे में पैर डालने जा रहा हो...आप हठात ही उसे रोक लेते हैं, क्यों ? तो.. यह तय रहा कि, " मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिये.. मुझे आइकन बनने से रोक लो.. बस तुम रोक लो " पर आप अमल करने जा रहे हैं ...असीम शुभकामनायें !
इन दोनों टिप्पणियों से ही साफ़ है कि मैं क्यों इन्हें अपना आइकन मानता हूं...ये मेरे आइकन हैं और आगे भी रहेंगे...क्षमा कीजिएगा द्विवेदी सर और डॉक्टर साहब, मेरी इस सोच को कोई नहीं बदल सकता...यहां तक कि आप भी नहीं...
रही बात और प्रतिक्रियाओं कि तो ये मैं मानता हूं कि कई बड़े और नाम अजित वडनेरकर जी, रवि रतलामी जी, अनीता जी, प्रमोद कुमार जी, रवीश कुमार जी, डॉ रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी, अनिल पुस्दकर जी (मेरी अज्ञानता के कारण और भी कई बड़े नाम छूट रहे होंगे..), वैसी ही गहरी सोच और सम्मान रखते हैं जैसे कि मेरी आइकन्स वाली फेहरिस्त की हस्तियां...ये सब भी मेरे लिए उतने ही सम्मानित हैं जितने कि मेरे आइकन्स...और फिर मैं फोर्ब्स पत्रिका की तरह तो सोच-समझ कर या किसी प्रायोजन के तहत कोई सूची बनाने बैठा नहीं था...बस जो मेरे दिल में था वो सबके साथ शेयर कर दिया...अब कोई माने या न माने ये हर ब्लॉगर भाई का अपना अधिकार है...भला मैं कौन होता हूं उन पर अपनी बात थोपने वाला....
मेरी इस पोस्ट पर एक बंधु ने यहां तक कहा कि मैंने प्रतिकूल टिप्पणी को हटाया क्यों नहीं...देखिए भाई...यही तो लोकतंत्र की खूबी है...हर एक को अपनी बात ऱखने का पूरा अधिकार है...अगर कोई आपकी आलोचना करता है तो उसे भी संयम के साथ सुनना चाहिए...अगर मीठा-मीठा गप गप और कड़वा-कड़वा थू-थू करेंगे तो ये अपने आपको ही धोखा देना होगा...ये हो सकता है कि मैं ही कहीं अपनी बात को ठीक तरह से रखने में चूक गया हूं...इसीलिए तो मैं कहता हूं कि दिनेशराय द्विवेदी जैसी हस्तियां मेरे लिए आइकन हैं...ऐसे सद्जन ठीक वैसी डाल के समान होते हैं जिनके जितने फल लगते है वो उतना ही झुकती हैं...वो अगर आपको कोई नसीहत देते हैं तो उसमें आपके लिए ही कोई भलाई छिपी होगी...ठीक वैसे ही जैसे घर के बड़े-बुज़ुर्ग हक के साथ आपसे कोई बात कहते हैं...रही बात टिप्पणी हटाने की तो मैं तब तक सेंसर के पक्ष में नहीं हूं जब तक कोई मर्यादा की सीमा न लांघे...बाकी फूलों के साथ आपके पत्थर भी मुझे बर्दाश्त हैं...
चलिए बहुत सफाई दे दी, अब स्लॉग ओवर हो जाए...

स्लॉग ओवर
टीचर...बच्चों क्या तुम जानते हो कयामत किस दिन आएगी...
एक स्टूडेंट...यस मैम, जब वेलेन्टाइन्स डे और रक्षा बंधन एक ही दिन होंगे...
 

रविवार, 13 सितंबर 2009

ब्लॉगर्स मीट में ये भी हुआ...

त्वरित रिपोर्ट पर त्वरित ही प्रतिक्रियाओं के लिए सभी का दिल से आभार...दिनेशराय द्विवेदी सर की पारखी आंखों ने बड़ी सही चीज़ पकड़ी है कि कवि सम्मेलन की रिपोर्ट तो अच्छी रही, लेकिन ब्लॉगर्स मीट की रिपोर्ट का इंतज़ार रहेगा...मैं आपका आशय अच्छी तरह समझ गया हूं, सर...लेकिन दुविधा ये है कि ब्लॉगर्स मीट के नाम पर इतना ही कुछ हुआ जितना कि मैंने रिपोर्ट किया..साहित्य शिल्पी का वार्षिकोत्सव था...इसलिए उस कार्यक्रम के लिए जितना वक्त दिया गया वो वाज़िब भी था...हां, कवि सम्मेलन ज़रूर ज़्यादा समय ले गया...इस वजह से ब्लॉगर्स के परिचय तक आते-आते वक्त बहुत कम रह गया था...मैंने जो रिपोर्ट किया है उसमें सिर्फ उस अंश को जान-बूझ कर छोड़ दिया था जो मैंने ब्लॉगर्स मीट पर अपना परिचय देते हुए कहा ...दरअसल पोस्ट लंबी हो रही थी इसलिए पोस्ट को कतरते हुए कैंची मैंने अपने ऊपर ही चलाई...अब द्विवेदी सर का आदेश है तो जो हिस्सा यानि कि मेरा कथन रिपोर्ट में आने से रह गया था, उसे यहां बता देता हूं..
दरअसल वहां संस्कृति यानि कल्चर की बातें हो रही थी...तो मैंने पहला वाक्य ये ही कहा कि जिस शहर (मेरठ) का मैं मूल निवासी हूं, वहां कल्चर के नाम पर सिर्फ एग्रीकल्चर होती है...समारोह में एक ब्लॉगर भाई ने ये मुद्दा उठाया था कि ब्लॉग के माध्यम को बड़ा सीरियसली लिया जाना चाहिए...सिर्फ टाइम पास या मनोरजंन के नज़रिए से ही नहीं लिया जाना चाहिए...जिन मुद्दों को प्रिंट या इलैक्ट्रॉनिक मीडिया टाइम नहीं देते, ब्लॉग के माध्यम से सब तक पहुंचाना चाहिए...मैं इन ब्लॉगर बंधु की बात से पूरी तरह सहमत हूं...लेकिन मैंने ये निवेदन किया कि इन मुद्दों को ब्लॉग पर रखते हुए सबसे ज़रूरी है कि आप किस अंदाज़ में इन्हें पेश करते हैं...अगर आप सिर्फ उपदेश की शैली में अपनी बात थोपते चले जाएंगे तो कोई भाव देने वाला नहीं मिलेगा...आपको ये भांपने का हुनर आना चाहिए कि पाठक क्या सुनना चाहते हैं...ऐसे में चार बातें वो कहें जो सभी सुनना चाहते हैं, और बीच में दो बातें वो जिन्हें आप उठाने चाहते हैं, रोचक अंदाज़ में पेश कर दें...आपका संदेश भी चला जाएगा और पढ़ने वालों को वो भी मिल जाएगा जो कि उन्हें पसंद है...ये सभी के लिए विन-विन वाली स्थिति रहेगी...शुरू में आपको अपनी शैली में थोड़ा बहुत बदलाव करने में दिक्कत हो सकती है, लेकिन बाद में अनुभव बढ़ते जाने के साथ इसके अच्छे नतीजे आने भी दिखने लगेंगे...
रही बात ब्लॉगर्स मीट जैसे आयोजनों को सार्थकता देने की, तो इस मुद्दे पर मेरी अविनाश वाचस्पति जी और अजय कुमार झा जी के साथ बात हुई...फरीदाबाद में हमने जो थोड़ा-बहुत पाया, उसे शुरुआत मान सकते हैं...ऐसे आयोजनों में जो खामियां रह जाती हैं, उनसे हमें सबक मिलता है कि आगे के कार्यक्रमों में वो खामियां न दिखें...ब्लॉगर्स मीट हो तो विशुद्ध रूप से वो ब्लॉगर मीट ही रहे तो ज़्यादा अच्छी बात है...लेकिन इस सब के लिए वालंटियर और सभी ब्लॉगर बंधुओं का सहयोग बहुत ज़रूरी है...और एक बात कहूंगा कि ब्लॉगिंग जगत के कुछ आइकन्स का ऐसे मौकों पर मौजूद रहना पहले से ही सुनिश्चित कर लिया जाए तो एक कार्यक्रम का कद बढ़ेगा और हम जैसे नए ब्लॉगर्स को उनके साक्षात सानिध्य से कुछ अच्छा करने की प्रेरणा भी मिलेगी...
अरे ब्लॉगर्स मीट की रिपोर्टिंग को विस्तार देने के चक्कर में मैं ये तो भूल ही गया कि कल मैंने आइकन वाली पोस्ट पर गलतफहमी दूर करने के लिए आज फिर से अपनी बात रखने का वादा किया था...लेकिन ये फिर कल के लिए टल गया...

स्लॉग ओवर
एक कवि-सम्मेलन में एक कवि महोदय को बड़े दिनों बाद मंच के ज़रिए क्रांति लाने का मौका मिला था...सो हुजूर आ गए फॉर्म में..दो घंटे तक उन्होंने कविता के नाम पर अपनी थोथी तुकबंदियों से श्रोताओं को अच्छी तरह पका दिया तो एक बुज़ुर्गवार मंच के पास आकर लाठी ठकठकाते हुए इधर से उधर घूमने लगे...मंच से कवि महोदय को ये देखकर बेचैनी हुई...पूछा...बड़े मियां, क्या कोई परेशानी है...बड़े मियां का जवाब था...नहीं जनाब, तुमसे क्या परेशानी...तुम तो हमारे मेहमान हो, इसलिए चालू रहो....मैं तो उसे ढूंढ रहा हूं जिसने तुम्हें यहां आने के लिए न्योता भेजा था...
(साभार दीपक गुप्ता)
 
 
 

शनिवार, 12 सितंबर 2009

ब्लॉगर्स मीट से लौट कर...

फरीदाबाद में ब्लॉगर्स मीट से लौट कर सबसे पहला काम पोस्ट पर टिप्पणियां देखने का किया...सोचा था आते ही सबसे पहले आपको ब्लॉगर्स मीट का आंखो देखा हाल सुनाऊंगा...लेकिन कुछ टिप्पणियां देखने के बाद मन कर रहा है पहले आइकन वाली पोस्ट को लेकर अगर कुछ गलतफहमी हैं, उन्हें दूर कर दूं...जहां तक ब्लॉगर्स मीट का सवाल है, वहां इतना कुछ हुआ, उसे एक पोस्ट में समेटना बड़ा मुश्किल काम है, फिर भी कोशिश करूंगा..अब धर्मसंकट में हूं पहले अपनी पिछली पोस्ट पर स्थिति साफ करूं या ब्लॉगर्स मीट का हाल सुनाने का आपसे किया गया वादा पूरा करूं...आखिर में इसी नतीजे पर पहुंचा कि आइकन पोस्ट पर दोबारा अपनी बात कहने का मसला कल तक टाल दूं, पहले आपको वहीं पढ़ाऊं, जिसका आप बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं....चलिए लीजिए पेश है ब्लॉगर्स मीट की आंखो देखी कहानी...

रात को देर से सोने के बावजूद सुबह जल्दी उठ गया...पत्नीश्री के बाज़ार के बताए कुछ काम थे...वो भी जल्दी-जल्दी पूरे कर दिए ताकि कोई शिकायत का मौका न बचे...तैयार हो गए, समस्या ये कि फरीदाबाद जाया कैसे जाए...हम तो चेतक की सवारी करते हैं (राणा प्रताप वाले चेतक नहीं बजाज वाले चेतक)...अब स्कूटर तो स्कूटर है...बदरपुर बार्डर पर जो जाम लगता है, उसे सोचकर अभी से पसीने आ रहे थे...तभी देवदूत की आवाज़ बन पत्नीश्री ने सुझाव दिया...आप ऐसा क्यों नहीं करते, पड़ोस वाले देशवालजी को आज आगरा जाना है...वो रास्ते में आपको फरीदाबाद उतार देंगे...बात जच गई..और आधे घंटे बाद हम देशवालजी के साथ कार मे हवा से बातें कर रहे थे...तब तक बारीश की हल्की फुहार भी पड़नी शुरू हो गई थीं...ब्लॉगर्स भाइयों से जल्दी ही साक्षात भेंट होने की बात सोच-सोच कर दिल गार्डन-गार्डन हो रहा था...अविनाश वाचस्पति जी ने सुबह साढ़े दस बजे का टाइम दिया था...लेकिन जाम से निकलते-निकलते साढ़े ग्यारह फरीदाबाद के मेन हाइवे तक ही पहुंचने में लग गए...मैंने हाइवे से ही देशवाल जी को आगरा के लिेए विदा किया और रिक्शा लेकर मार्डन स्कूल की तरफ बढ़ चला...स्कूल तक पहुंचते-पहुंचते 12 बज गए..स्कूल चल रहा था...मैंने स्कूल के एक सज्जन से साहित्य शिल्पी और ब्लॉगर्स मीट के बारे में पूछा तो उन्होंने एक हाल तक पहुंचा दिया...उस वक्त राजीव रंजन जी साहित्य शिल्पी के कार्यकलापों के बारे में स्लाइड शो के ज़रिए विस्तार से बता रहे थे...मैंने गेट के पास ही कोने की सीट पकड़ना बेहतर समझा...बहुत ढूंढने की कोशिश करता रहा कि कोई जाना-पहचाना चेहरा दिख जाए, लेकिन नाकामी हाथ लगी...दरअसल अविनाशजी से भी मुझे पहली बार मिलना था...बस उनके ब्लॉग पर फोटो ही देखी थी...लेकिन सिर्फ फोटो के सहारे ही किसी को पहचान लेना कितना मुश्किल होता है, ये आज पता चल रहा था...खैर राजीव रंजन की चर्चा में ही दिल लगाने की कोशिश की...लेकिन गूढ़ साहित्य की बातें अपने छोटे से भेजे में मुश्किल से ही घुसती हैं...तब तक राजीव जी मुख्य अतिथि- प्रसिद्ध लेखक और व्यंग्यकार ड़ॉ प्रेम जनमेजय जी को दो शब्द कहने के लिेए बुला चुके थे...प्रेम जी ने बड़े रचनात्मक ढंग से साहित्य शिल्पी की पहली वर्षगांठ को बाहर हो रही वर्षा के साथ जोड़ा...प्रेम जी ने कहा कि वर्षा की एक-एक बूंद साहित्य की सेवा में साहित्य-शिल्पी की ओर से किए जा रहे श्रम की एक-एक बूंद की प्रतीक है...प्रेमजी के बाद कार्यक्रम के सूत्रधार की ज़िम्मेदारी प्रसिद्ध व्यंग्य कवि दीपक गुप्ता ने संभाली...दीपक जी ने अपनी चुटकियों से उपस्थित जनों को खूब गुदगुदाया..दीपक जी ने बताया कि अब वो कुछ कवियों को आमंत्रित करेंगे, लेकिन इस अनुरोध के साथ कि कविता-पाठ को टेस्ट मैच न समझ कर वनडे या 20-20 की तरह लिया जाए...दीपक जी ने ये भी साफ किया कि कविता-पाठ के बाद ब्लॉगर्स भाइयों से मिलाया जाएगा...वैसे तब तक कुछ ब्लॉगर्स के चेहरों पर बेचैनी झलकने लगी थी...
ये बॉय वन, गेट थ्री वाला मामला जो होता जा रहा था..ब्लॉगर्स मीट के साथ साहित्य चर्चा और कवि सम्मेलन मुफ्त में...कुछ कवियों की दो-एक अच्छी पंक्तियां याद रही, पेश हैं आपके लिए...
डॉ सुभाष कक्कड़
वोट दूंगा, अवश्य दंगा
पहले गधे को घोड़ा तो हो जाने दो
 
पवन चंदन
एक प्रश्न है मेरा,
क्या तुमने कभी देखा है अंधेरा

योगेश समदर्शी
आप लाए थे तूफां से कश्ती निकाल के,
फिर ये विघटन की प्रक्रिया कहां से आई
आपके रहते महोदय, ये विकृतियां कहां से आईं
 
अनिल बेताब
दिल सभी का फूल की मानिंद खिलना चाहिए
जख्म हो चाहे किसी का दोस्त, सिलना चाहिए

मीनाक्षी
मां की अपेक्षा दुनिया
मेरे लिए छोटा सा रहस्य है

नमिता राकेश
कैसे-कैसे गुल खिलाता जा रहा है आदमी
आदमी से दूर होता जा रहा है आदमी

वेद व्यथित
नज़र बचा कर निकलना है, निकल जाओ
मैं आईना हूं, मेरी तो ज़िम्मेदारी है

अब्दुल रहमान मंसूर
हम शोहरत न खजाने के लिए लिखते हैं
सिर्फ तहज़ीब बचाने के लिए लिखते हैं

बंदिशें जब भी लगी उड़ानों पर
हम नज़र आए आसमानों पर

वीरेंद्र कंवर
इत्र कितना भी छिड़क लो गुलदानों पर
तितलियां नहीं आएंगी कागज़ के फूलों पर


आखिर में प्रसिद्ध कवि दिनेश रघुवंशी सस्वर कविता सुनाकर समारोह की जान बन गए...
मेरे दिल में सभी के लिए मुहब्बत है
तेरे अलावा ये जाना किसने

गीत तुम्हारे तुमको सौंप सकूं शायद
बस्ती-बस्ती गीत लिए फिरता हूं

प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, ब्लॉगर योगेंद्र मुदगल जी ने भी कविता सुनाई, लेकिन तब पॉवर कट होने की वजह से ठीक से सुन नहीं सका...

इसके बाद शुरू हुआ ब्लॉगर्स का दो दो शब्द कहने का सिलसिला...टाइम ज़्यादा हो रहा था...इसलिए भोजन भी साथ शुरू करा दिया गया...सबसे पहले गाहे-बगाहे के विनीत कुमार ने मंच संभाला...विनीत कुमार के मुताबिक ब्लॉग सिर्फ टाइम पास या मनोरंजन के लिए ही नहीं लिखा जा रहा...धीरे-धीरे अब इसमें मैच्युरिटी आ रही है...बेशक अभी संख्या कम है लेकिन आने वाले वक्त में ब्लॉगिंग जन-संप्रेषण का सबसे सशक्त माध्यम बनकर उबरेगा...मीडिया मंत्र के पुष्कर ने भी जोर देकर कहा कि ब्लॉगिंग को सिर्फ टाइम पास के साधन के तौर पर ही न लिया जाए...सार्थक सृजन के सुरेश यादव ने कहा कि हर ब्लॉगर को अपनी भूमिका किसी जिम्मेदार पत्रिका के संपादक के तौर पर देखनी चाहिए...नमिता राकेश ने फरीदाबाद की होने के नाते खुद को मेजबान बताते हुए बाहर से आए सभी ब्लॉगर्स का आभार जताया...सुलभ सतरंगी ने हिंदी के अधिक से अधिक प्रयोग पर ज़ोर दिया..लखनऊ से आए युवा कवि और ब्लॉगर अमन दलाल ने कविता के ज़रिेए अपने विचार व्यक्त किए...व्यंग्यकार और हंसते रहो के ब्लॉगर राजीव तनेजा ने हीरो शीर्षक से अपनी बात रखी...हल्द्वानी से आई शैफाली पांडे ने स्वाइन फ्लू और अरहर की दाल को जोड़ते हुए बेहतरीन व्यंग्य रचना सुनाई जो आज देश के हालात पर तीखा कटाक्ष था...इरशादनामा के इरशाद अली, विनोद कुमार पांडेय और तन्हा सागर ने भी इस मौके पर दो-दो शब्द कहे...अविनाश वाचस्पति और अजय कुमार झा जी का ध्यान हर वक्त व्यवस्था संभालने और बाहर से आए मेहमानों की आव-भगत में ही लगा रहा...कार्यक्रम को सफल बनाने में मार्डन स्कूल की हिंदी प्राध्यपिका और कवियत्री शोभा महेंद्रू और स्कूल के बच्चों के अथक योगदान को भुलाया नहीं जा सकता...प्रसिद्ध कवि पवन चंदन ने ब्लॉगिंग के महत्व को समझते हुए कहा कि वो जल्द ही दिल्ली में फिर ऐसे ही कार्यक्रम का आयोजन करेंगे...जो ब्लॉगर बंधु फरीदाबाद का कार्यक्रम मिस कर गए, वो अभी से दिल्ली मीट की तैयारी शुरू कर दें...कार्यक्रम का समापन डॉ प्रेम जनमेजय जी के मास्टर स्ट्रोक के साथ हुआ...दरअसल एक ब्लॉगर भाई कविता सुनाने की इजाज़त मांग रहे थे...तब प्रेम जी ने कहा कि जब और नहीं रूके, तो तुम क्यों रूको...आज के स्लॉग ओवर में समारोह में दीपक गुप्ता की कुछ चुटकियां...

स्लॉग ओवर
एक कवियत्री के बारे में दीपक गुप्ता ने कहा कि वो फरीदाबाद आईं तो उन्होंने यहां के किसी अच्छे मॉल से पति के लिए शर्ट खरीदने की इच्छा जताई...दीपक जी उन्हें स्टोर में ले गए...सेल्समैन ने कवियत्री से पूछा कि पति के कॉलर का नाप क्या है...कवियत्री ने कहा नाप तो नहीं पता लेकिन मेरे दोनों हाथों में उनकी गर्दन आ जाती है...
---------------
मार्डन बच्चे से पूछो कि उसकी फेवरिट बुक कौन सी है...
जवाब होगा- पिताश्री की चेक-बुक और पास-बुक
------------------------------------
एक पत्रकार को दुविधा थी कि प्रेमिका से प्रणय-सूत्र में बंधने के लिए कौन से धारदार शब्दों का इस्तेमाल करे जो लीक से पूरी तरह हट कर हों...कई दिनों की कोशिश के बाद पत्रकार महोदय ने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया वो ये थे...प्रिय, क्या तुम मुझे अपनी चिता में आग लगाने का अधिकार दोगी...

हिंदी ब्लॉगिंग के टॉप टेन आइकन

चलो इस बात की तसल्ली है कि भारतीय क्रिकेट टीम ने बड़ी उपलब्धि हासिल की, वो भी उस दिन जिस दिन भारतीय क्रिकेट की महान विभूति लाला अमरनाथ की 98वीं जयंती थी. वही लाला अमरनाथ जिन्होंने भारत को 1933 में उसका पहला टेस्ट शतक दिया...वही लाला अमरनाथ जिनकी कप्तानी में भारत को 1953 में पहली टेस्ट सीरीज जीत हासिल हुई...वही लाला अमरनाथ जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को मोहिंदर अमरनाथ जैसा हीरा दिया.
खैर ये तो हो गई क्रिकेट की बात...अब आता हूं, असली मुद्दे पर...कल सुबह अविनाश वाचस्पति जी के आदेश पर ब्लॉगर्स मीट में हिस्सा लेने फरीदाबाद जाना है......लेकिन ब्लॉगर्स मीट में जाने से पहले मैं अपनी समझ (जो थोड़ी-बहुत है) के अनुसार हिंदी ब्लॉगिंग के टॉप टेन आइकन का जिक्र जरूर करना चाहूंगा...दरअसल इनकी कल ब्लॉगर्स मीट में कमी बहुत खलेगी...इसलिए चाहता हूं कि इस पोस्ट के ज़रिए ही इन सभी आइकन का आशीर्वाद ब्लॉगर्स मीट के साथ रहे...दरअसल मुझे 25 दिन हो गए ब्लॉगियाते हुए...लेकिन पत्रकारिता का मेरा 15 साल का अनुभव है...उसके आधार पर आस-पास जो कुछ भी होता है, उसे थोड़ा-बहुत ऑब्सर्व करना तो सीख ही गया हूं...उसी तजुर्बे के आधार पर मैंने 25 दिन में दूसरों की जितनी भी पोस्ट पढ़ीं, उनमें से मैंने अपने टेन आइकन चुने हैं..यहां मैं साफ कर दूं कि दूसरी सारी पोस्ट न तो मैं पढ़ सका हं और न ही मेरे में इतना सामर्थ्य है...हां जितना पढ़ा उसी में से मैंने अपने लीडर चुन लिए..ये मुमकिन है कई दूसरे ब्लॉगर भाई भी बहुत अच्छा लिखते हो, जिन्हें पढ़ने का मुझे सौभाग्य ही प्राप्त नहीं हुआ...लेकिन जो भी मैं नाम लेने जा रहा हूं, उन पर शायद ही किसी को ऐतराज हो..ये चुनाव ज़्यादा पढ़ी जाने वाली, ज़्यादा पसंद वाली, ज़्यादा टिप्पणियों वाली पोस्ट के आधार पर नहीं है...ये चुनाव है सिर्फ एक शब्द पढ़ कर ही ये अंदाज लगा लेने का कि लिखने वाले की सोच की कितनी गहराई है...इंसान के नाते उसके कद की कितनी ऊंचाई है...मेरे इस चुनाव को लोकप्रियता के पैमाने से न लिया जाए, बल्कि इस आधार पर लिया जाए कि ब्लॉगर्स परिवार में इन आइकन का कितना सम्मान है...कैसे ये आइकन... परिवार में कोई नया सदस्य आता है तो उसका हौसला बढ़ाते हैं...ऊंच-नीच समझाते हैं....लिस्ट बताने के बाद मैं एक-दो उदाहरणों से अपनी बात स्पष्ट भी करूंगा...हां, एक बात और इस लिस्ट को 1 से 10 नंबर के पैमाने पर भी न आंका जाए...क्योंकि ये सभी नंबर वन है...बस नाम लिखने हैं तो किसी का नाम पहले-बाद में आएगा ही...

डॉ अमर कुमार जी
ज्ञानदत्त पाण्डेय जी
दिनेशराय द्विवेदी जी
संगीता गुप्ता जी
निर्मला कपिला जी
रंजना जी (संवेदना संसार)
अनूप शुक्ल जी
जी के अवधिया जी
शरद कोकास जी
और समीर लाल जी समीर
(गुरुदेव क्लासेस और मासेस दोनों में ही एक जितने लोकप्रिय हैं)

हां तो मैं बात कर रहा था एक-दो उदाहरण दूंगा...जैसे आज ही मेरी पोस्ट पर संजय तिवारी सँजू जी की टिप्पणी आई...लेखनी प्रभावित करती है...डॉ अमर कुमार ने इसे पढ़कर अलग से मेरी पोस्ट पर टिप्पणी दी...सँजू जी, आज सुबह से यह तीसरी जगह आपको लेखनी से प्रभावित होते देखना अच्छा लग रहा है...दरअसल सँजू भाई ने आज तीन-चार अलग-अलग ब्लॉगर्स भाइयों की पोस्ट पर यही टिप्पणी- लेखनी प्रभावित करती है...भेज दी थी...इसमें सँजू भाई का कोई कसूर नहीं ...दरअसल हममें से कई के साथ ऐसा होता है...समय कम हो, और कुछ पोस्ट अच्छी लगे तो हम जल्दी में एक जैसे ही शब्द या मिलते जुलते शब्द टिप्पणी में भेज देते हैं... सँजू भाई, इसे अन्यथा न लेकर डॉक्टर साहब के प्यार भरे आशीर्वाद के रूप में ले...ज़रिया आप बने और डॉक्टर साहब ने कितने शालीन शब्दों के साथ हम सब ब्लॉगर्स को नसीहत दे दी कि टिप्पणी देते समय हमें क्या ध्यान रखना चाहिए..
ये जितने भी आइकन का जिक्र मैंने ऊपर किया है, उनका हर शब्द, हर कृत्य हमारे लिए प्रेरणा-स्रोत है...हां, इस मामले में गुरुदेव का ज़िक्र अलग से ज़रूर करना चाहूंगा...कोई भी नया ब्लॉगर अपनी पारी की शुरुआत करता है तो सबसे पहले उसका हौसला बढ़ाने के लिेए सर्र से उड़न तश्तरी से गुरुदेव ही पहुंचते हैं...
अब मैं नाम लेना चाहूंगा, हिंदी ब्लॉगिंग के कुछ सिपाहियों का...सेना के जवान जिस तरह निस्वार्थ भाव से कड़ाके की ठंड हो या झुलसाने वाली गर्मी, देश की सेवा करते हैं, उसी तरह ये सिपाही भी ब्लॉगिंग जगत और ब्लॉगर्स की मदद करने में जुटे रहते हैं...ये नाम हैं- पीएस पाबला, अजय कुमार झा, विनोद पांडेय और अविनाश वाचस्पति...अभी एक भाई ने अजय भाई पर ही चर्चा में अपना नाम न होने को लेकर उंगली उठा दी थी...उस भाई को मेरा जवाब है...न तो मेरा अजय भाई से पहले कोई संपर्क रहा है, और न ही मेरी उनसे कभी ईमेल, फोन या किसी दूसरे माध्यम से बात हुई है...मुझे जुम्मा-जुम्मा 20-21 दिन ही ब्लॉगिंग में हुए हैं...लेकिन मुझे अजय जी ने एक से ज़्यादा बार चर्चा में जगह दी...आरोप लगाने वाले भाई की भावना को मैं समझ सकता हूं...कभी भावावेश या नासमझी में हम ऐसी कोई बात कह जाते हैं जिसका कोई आधार नहीं होता...लेकिन हम ऐसा करके जिस पर आरोप लगा रहे हैं, उसका कद कम नहीं करते, बल्कि गलत साबित होने पर खुद ही बौने हो जाते हैं. ऐसा ही नहीं कि पाबलाजी या अजयजी को अपने कोई काम नहीं हो...वो भी अपने रूटीन में उतने ही बिज़ी है जितने कि हम और आप...लेकिन वो फिर भी हमारे लिेए टाइम निकालते हैं...मैं फिर कहूंगा कि दोबारा मत पूछना कि हम क्लोरोमिंट क्यों खाते हैं...
बस बहुत हो गया, सुबह जल्दी उठना है, नहीं तो अविनाश वाचस्पति जी को कान पकड़ने का अधिकार तो है ही...क्या कहा स्लॉग ओवर, अब वो कैसे भूल सकता हूं...

स्लॉग ओवर
एक बार जंगल में शेर महाराज सभी जानवरों को इकठ्ठा कर हेकड़ी जता रहे थे...हा...हा...हा...मैं कौन, इस जंगल का राजा...जब मैं दहाड़ता हूं तो पूरा जंगल थर्र-थर्र कांपने लगता है...तभी एक बारीक सी आवाज आई....ओए, शेर, ज़्यादा चौड़ा मत हो, तू क्या खाकर मेरा मुकाबला करेगा...मैं ज़रा सी छींक भी मारता हूं...जंगल तो क्या पूरी दुनिया सर पर पांव रखकर दौड़ने लगती है...(बारीक आवाज सुअर के बच्चे यानि मिनी स्वाइन की थी)

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

ब्लॉगिंग के इतने करीब कि सबसे दूर हो गए...

ब्लॉगिंग हमें ड्राइव कर रही हैं या हम ब्लॉगिंग को ड्राइव कर रहे हैं...ब्ल़ॉगिंग ही क्यों, क्या कभी हमने सोचा है इंटरनेट ने हमें कैसे अपने जाल में जकड़ लिया है...इस मुद्दे पर बीबीसी के राजेश प्रियदर्शी ने अपने ब्लॉग में बड़ी अच्छी बहस छेड़ी कि वर्चुअल वर्ल्ड में हम रियली अकेले होते जा रहे हैं...राजेश प्रियदर्शी के मुताबिक सिर्फ़ रात को सोने के बाद और सुबह उठने से पहले इंटरनेट की ज़रूरत नहीं रहती. दिन भर दफ़्तर में, सुबह-शाम घर में, और रास्ते में मोबाइल फ़ोन पर...इंटरनेट जब से ख़ुद तारों के बंधन से मुक्त हुआ है तबसे उसने हमें और कसकर जकड़ लिया है.
इसी बहस को मैनें आगे बढ़ाते हुए राजेशजी को भेजी अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि ये वर्चुअल वर्ल्ड इंसान का ही बनाया हुआ है. वर्चुअल वर्ल्ड ने इंसान को नहीं बनाया है. ये ठीक है कि इंटरनेट ने आज दुनिया को एक गांव बना दिया है. पलक झपकते ही दुनिया के किसी कोने में भी आप संपर्क कर सकते हैं. ब्लॉगर और न्यूज़ चैनल प्रोड्यूसर होने के नाते मेरे लिए बिना इंटरनेट सब सून वाली स्थिति है. लेकिन कभी-कभी लगता है कि इंटरनेट के अत्यधिक प्रयोग की वजह से मैं सोशल सर्किल से कटता जा रहा हूँ. इसके लिए मुझे लताजी का एक पुराना गीत भी याद आ रहा है- किसी के तुम इतने क़रीब हो कि सबसे दूर हो गए...वैसे कभी-कभी मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट, इन सब की क़ैद से दूर ऋषिकेश में गंगा किनारे पानी में पांव डालकर बैठना देवलोक जैसा आनंद देता है...यकीन नहीं आए तो कभी ट्राई करके देखिए.
राजेश प्रियदर्शी के मुताबिक लंदन के अख़बारों में ख़बर छपी है कि पति ने पत्नी को मार डाला क्योंकि वह फेसबुक जैसी वेबसाइटों पर बहुत ज्यादा समय बिताती थी.शायद असली वजह कुछ और रही होगी. अगर कंप्यूटर पर अधिक समय बिताना क़त्ल किए जाने की असली वजह होता तो हमारे जैसे कितने ही लोग अपनी जान गँवा चुके होते.
ये बात सच है कि कभी-कभी ब्लॉगिंग में हम इतना रम जाते हैं कि घर में क्या हो रहा है, वो भी हमें पता नहीं चलता...दुनिया जहां का हाल पूछते-पूछते हमें यही ख्याल नहीं रह पाता कि पत्नीश्री ने बाज़ार से कुछ ज़रूरी सामान लाने के लिए फरमा रखा है...बच्चों के स्कूल में पेरेट-टीचर मीटिंग में हिस्सा लेने भी जाना है...
राजेश प्रियदर्शी ये भी कहते हैं कि रियल वर्ल्ड और वर्चुअल वर्ल्ड में संतुलन बनाने की ज़रूरत है. कई बार तो लगता है कि इंटरनेट कनेक्शन ड्रॉप होना और बिजली का जाना उतनी बुरी चीज़ नहीं है जितनी लगती है...अकेलेपन के मर्ज़ की दवा हम इंटरनेट से माँग रहे हैं, यह अपनी ही परछाईं को पकड़ने की नाकाम सी कोशिश नहीं लगती? अपने कमरे में बैठकर आप पूरी दुनिया से जुड़ जाते हैं और अपने ही घर से कट जाते हैं.
इसी मुदुदे पर होशियारपुर, पंजाब के बलवंत सिंह जी ने अपनी राय में कहा कि यह कहना ग़लत न होगा कि वर्चुअल वर्ल्ड के नशे के आगे सोमरस का नशा भी फींका सा लगता है. ज़िंदगी के हर रंग का अहसास और आनंद लेना चाहिए, लेकिन इतना भी किसी रंग में डूबने का क्या फ़ायदा कि ख़ुद की पहचान ही ख़त्म हो जाए. आज विज्ञान, तकनीक की हर जगह ज़रूरत है. सोशल नेटवर्किंग, फ़ेसबुक, इंटरनेट चैटिंग में कोई बुराई नहीं बशर्ते ये हमारे कंधों पर सवार न हो जाए ताकि सीधे खड़े ही न हो पाएँ. दीन-दुनिया से कटे सो अलग. अति तो फिर अति ही होती है. यह सब जानते हैं कि इसके जनक देश अपने नागरिकों को इस रोग से छुटकारा पाने के हेतु मनोरोग विशेषज्ञों का सहारा लेने की सलाह दे रहे हैं. इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का रास्ता स्वयं ही खोजना होगा.
इस मुद्दे पर ब्लॉगर्स बिरादरी क्या राय रखती है, मुझे ज़रूर अवगत कराए...फिलहाल आज स्ल़ॉग ओवर में मक्खन जी के ब्रेक पर होने की वजह से कहानी खरगोश और कछुए की...

स्लॉग ओवर
खरगोश के बारहवीं में 85 % और कछुए के 70 % नंबर आए. लेकिन दिल्ली यूनिवर्सिटी में कॉलेज में खरगोश को नहीं कछुए को एडमिशन मिला...
पूछो क्यों...
अरे भई स्पोटर्स कोटा भी कोई चीज होती है न... भूल गए बचपन मे कछुए ने खरगोश से रेस जीती थी...

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

आप भारतीय हैं या इंडियन...


सवाल अजीब है न...ये कोई बात हुई भारतीय हैं या इंडियन...अरे भई, चाहे भारत कहो या इंडिया...है तो एक ही देश न..फिर इस सवाल के मायने...आज मैं सिर्फ दस लाइनों में ही आपको ये मायने बताता हूं...एक देश...या एक देश में दो देश...
1. भारत में रहने वाले लोगों की औसतन प्रति व्यक्ति आय 32 हज़ार रुपये सालाना है...वहीं इंडिया में रहने वाले और राजनीति से जुड़े नेताओं की औसत आय है...9 लाख रुपये सालाना.
2. भारत के 70 करोड़ लोग रोज़ 20 रुपये से नीचे गुज़ारा करते हैं यानी उनकी सालाना आय है 7200 रुपये...दूसरी ओर इंडिया में 30 करोड़ लोगों की औसतन आय पौने दो लाख रुपये सालाना है.
3. भारत में 39 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं... इंडिया में 24 लोग बिलियनयेर (धन-कुबेर) हैं.
4. भारत में 59 करोड़ लोगों को दो जून की रोटी नसीब नहीं होती...इंडिया में एक लाख, 75 हज़ार करोड़पति हैं.
5. भारत में 30 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं है...इंडिया में 8 करोड़ लोग हर महीने हेल्थ-केयर पर औसतन 12 लाख रुपये महीना खर्च करते हैं.
6. भारत में 60 करोड़ लोगों को पीने का साफ़ पानी मयस्सर नहीं है...इंडिया में 15 करोड़ लोग बोतलबंद पानी पर 50 करोड़ रुपये खर्च करते हैं.
7. भारत में 35 करोड़ प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं...इंडिया में 12 करोड़ लोग शिक्षा पर सालाना 5 लाख औसतन खर्च करते हैं.
8. भारत में 62 करोड़ लोगों के पास खुद का घर नहीं है. इंडिया में 7 करोड़ ऐसे हैं, जिनके पास एक से ज़्यादा आशियाने हैं.
9. भारत में 20 करोड़ लोगों का रोज़ शहरों के फुटपाथ पर बसेरा होता है, इंडिया में सवा करोड़ लोग ऐसे हैं जिनका ज़्यादातर होटल में डेरा रहता है...(अपने विदेश मंत्री एस एम कृष्णा और विदेश राज्य मंत्री शशी थरूर याद आए न...)
10. भारत की विकास नीति- 15 करोड़ लोग कर्ज माफी या दूसरे मुआवजे पर टिके... इंडिया की विकास नीति- 15 लाख करोड़पति हो गए...

अब आप बताए, आप कहां रहते हैं...कंप्यूटर पर इंटरनटिया रहे हैं, इसलिए पहले वाली कैटेगरी में तो हैं नहीं..रही इंडिया वाली कैटेगरी तो वो भी हम में से ज़्यादातर के लिेए दूर की कौड़ी लगती है..तो फिर भईया, हम कहां आते हैं...न भारत में...न इंडिया में...तो क्या फिर बीच हवा में लटके हैं...जी हां...कहा नहीं जाता, हमें मिडिल क्लास...सांस हैं नहीं फिर भी बनी हुई है आस...खैर ये सब सोचना छोड़ो...बेचारे मक्खन की सोचो...

स्लॉग ओवर
मक्खन जी को शेरो-शायरी की एबीसी नहीं पता लेकिन एक बार जिद पकड़ ली कि शहर में हो रहा मुशायरा हर हाल में सुनेंगे...बड़ा समझाया कि तुम्हारी सोच का दायरा बड़ा है...ये मुशायरे-वुशायरे उस सोच में फिट नहीं बैठते...लेकिन मक्खन ने सोच लिया तो सोच लिया...नो इफ़, नो बट...ओनली जट..पहुंच गए जी मुशायरा सुनने...मुशायरे में जैसा होता है नामी-गिरामी शायरों के कलाम से पहले लोकल स्वयंभू शायरों को माइक पर मुंह साफ करने का मौका दिया जा रहा था...ऐसे ही एक फन्ने मेरठी ने मोर्चा संभाला और बोलना शुरू किया...कुर्सी पे बैठा एक कुत्ता....पूरे हॉल में खामोशी लेकिन अपने मक्खन जी ने दाद दी...वाह, सुभानअल्ला...आस-प़ड़ोस वालों ने ऐसे देखा जैसे कोई एलियन आसमां से उनके बीच टपक पड़ा हो...उधर फन्ने मेरठी ने अगली लाइन पढ़ी ...कुर्सी पे बैठा कुत्ता, उसके ऊपर एक और कुत्ता...हाल में अब भी खामोशी थी लेकिन मक्खन जी अपनी सीट से खड़े हो चुके थे और कहने लगे...भई वाह, वाह, वाह क्या बात है, बहुत खूब..अब तक आस-पास वालों ने मक्खन जी को हिराकत की नज़रों से देखना शुरू कर दिया था...फन्ने मेरठी आगे शुरू...कुर्सी पे कुत्ता, उसके ऊपर कुत्ता, उसके ऊपर एक और कुत्ता...ये सुनते ही मक्खनजी तो अपनी सीट पर ही खड़े हो गए और उछलते हुए तब तक वाह-वाह करते रहे जब तक साथ वालों ने हाथ खींचकर नीचे नहीं गिरा दिया...फन्ने मेरठी का कलाम जारी था...कुर्सी पे कुत्ता, उस पर कुत्ता, कुत्ते पर कुत्ता, उसके ऊपर एक और कुत्ता...अब तक तो मक्खन जी ने फर्श पर लोट लगाना शुरू कर दिया था...इतनी मस्ती कि मुंह से वाह के शब्द बाहर आने भी मुश्किल हो रहे थे......एक जनाब से आखिर रहा नहीं गया...उन्होंने मक्खन से कड़क अंदाज में कहा... ये किस बात की वाह-वाह लगा रखी है... हैं..मियां ज़रा भी शऊर नहीं है क्या...इतने वाहिआत शेर पर खुद को हलकान कर रखा है...मक्खन ने उसी अंदाज में जवाब दिया...ओए...तू शेर को मार गोली...बस कुत्तों का बैलेंस देख, बैलेंस ,...
 

बुधवार, 9 सितंबर 2009

शुक्र है ब्लॉगर्स रिटायर नहीं होते...

जी हां जब तक दम में दम है, चिठ्ठे ठेलना जारी रहे... ये कामना हर ब्लॉगर साथी के लिए है...वैसे ब्लॉगर कभी रिटायर होने की सोचे भी क्यों...ये पोस्ट ऑफ प्रोफिट का मामला थोड़े ही है जो कालातीत में सोनिया गांधी और जया बच्चन की तरह संसद की सदस्यता पर ही बन आए...ये तो विशुद्ध पोस्ट ऑफ सेल्फ सेटिस्फेक्शन का मामला है...अब ये ठहरा छपास रोग...भईया इसे मिटाना भी तो है...ये न्यूजपेपर वाले बिना सेटिंग के घास डालते नहीं...जो अपना लेख छपा देखकर तीनों लोक का आनंद आ जाए...ये जालिम अखबार वाले, हींग लगे न फिटकरी रंग भी आए चोखा, इसी तर्ज पर ब्लॉग सीधे लिफ्ट भी करते हैं तो ये एहसान जताते हुए कि देखा बड़ी मुश्किल से एकोमोडेट किया है...तो भईया अपना छज्जू का चौबारा ही ठीक...जब मन आया चिठ्ठा ठेल दिया...रवा रवा अपना चिठ्ठा देखा नहीं कि लगता है जैसे पानीपत का मैदान मार लिया...अब कोई पढ़ने या टिपियाने नहीं आता तो क्या गम...अपनी आंखे और उंगलियां तो हैं...जितनी बार चाहे क्लिक करो, जितनी बार चाहे नैन-सुख लो...अपने लेख पर वारि-वारि जाओ, अपनी सोच पर बलिहारी जाओ...कोई रोक सके तो रोक ले...
तो भईया ऐसा परम आनंद चला-चली की बेला तक मिलता रहे और लता ताई का गीत नेपथ्य में बजता रहे...आज फिर जीने की तमन्ना है...आज फिर मरने (अपने लेख पर) का इरादा है...हो गया न धरती मैया पर आना सफल...अब भले ही ब्लॉगिंग के बाज़ार में भाव हल्का चल रहा हो, यही कह कर अपने मन-मयूरा को समझाओ, हमारी सोच क्लासेस के लिए है मासेस के लिए नहीं..अब हम पापुलर सिनेमा थोड़े ही हैं जो बिकता है वही लिखता है का राग अलापने लगेंगे...अब जनाब आर्ट फिल्में भी बनती है न...भले ही हॉल में उल्लू बोले लेकिन अवॉर्ड तो ले ही आती है न...अब ये राज मत खुलवाईए कि ये अवॉर्ड देने वाले कौन होते हैं...
हां तो मै कह रहा था कि ब्लॉगर्स कभी रिटायर नहीं होते...आखिर क्यों हो रिटायर..82 पार के आडवाणी संघ के तमाम घोड़े खोल लेने के बाद भी कुर्सी से चिपके बैठे हैं...फेविकोल के विज्ञापन याद हैं न...इस देश में आम आदमी जिस उम्र में नौकरी से रिटायर होता है, उस उम्र वालों को राजनीति में मुन्ना माना जाता है...मंत्री बनाया भी जाता है तो राज्य या डिप्टी का झुनझुना ही थमाया जाता है... राजनीति में असली बहार तो सत्तर पार करने के बाद ही आती है...नेता ही क्यों नौकरशाह ही ले लो...रिटायरमेंट की उम्र तक शान से नौकरी...उसके बाद जितनी तगड़ी सैटिंग उतनी ही बार एक्सटेंशन...और कुछ नही तो अंबानी जैसे पालनहार तो बैठे ही हैं...पहले सरकार की नौकरी करो फिर सरकार के सारे राज़ अंबानियों को बता दो...और अपनी कई पीढि़यों का उद्धार कर लो...अब सरकार नौकरशाहों पर रोक थोड़े ही लगाने जा रही है कि रिटायरमेंट के बाद प्राइवेट सेक्टर की जय-जयकार नहीं कर सकते...
ये तो रही राजनेताओं और नौकरशाहों की बात...अपने खिलाड़ी भी इस मामले मे कम खिलाड़ी थोड़े ही हैं...अब अपने सचिन बाबा को ही ले लो..तेंदुलकर जी ने सुझाव दिया है कि 50-50 ओवर के वनडे मैच 25-25 ओवर की चार पारियों के फॉर्मेट में खेले जाएं...सचिन का सुझाव दुरूस्त है. सचिन 2011 का वर्ल्ड कप खेलने की बात पहले ही कर चुके है. अगर तीन-तीन मध्यांतर के साथ 25-25 ओवर की दो-दो पारियां होती हैं तो हमारे सचिन बाबा को ज़्यादा थकान भी नहीं होगी और उनका एक और वर्ल्ड कप (शायद ज़्यादा भी) खेलने का सपना भी पूरा हो जाएगा. अब सचिन शेन वार्न, मैक्ग्रा या फ्लिंटॉफ थोड़े ही हैं जो टॉप में रहते ही रिटायरमेंट ले लें...हमारे देश में क्रिकेटर तब तक रिटायर होते कहां हैं, जब तक लोग ही महेंद्र कपूर का गाना न शुरू कर दे...और नहीं, बस और नहीं...गम के प्याले और नहीं..
जब और माई के लाल आसानी से रिटायर होने को तैयार नहीं होते तो ब्लॉगर्स़ क्यों लाए मन में ऐसी बात...आखिर टाइम पास का टाइम पास...जितना बढ़िया टिप्पणी-संपर्क, उतना रहे मन झकास...खैर टाइम की बात आई तो फिर अपना मक्खन याद आ गया...फिर देर किस बात की, आइए स्ल़ॉग ओवर में...

स्लॉग ओवर
मक्खन गली के नुक्कड़ पर बैठा दो घंटे से मक्खियां मार रहा था..तभी ढक्कन आ गया...ढक्कन ने नसीहत के अंदाज़ में कहा कि क्यों टाइम बर्बाद कर रहा है...मक्खन ने तपाक से जवाब दिया..ओए, मुझे ऐसा-वैसा न समझ...मैं बदला ले रहा हूं बदला...ढक्कन ने पूछा...भई वो कैसे...मक्खन बोला...मुझे पहले वक्त ने बर्बाद किया, अब मैं वक्त को बर्बाद कर रहा हूं...

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

...लो जी मिलो मेरे 'मक्खन' से

शुक्र है ब्लागर्स कभी रिटायर नहीं होते...पहले सोच रहा था कि आज पोस्ट इसी विषय पर लिखूंगा...लेकिन फिर अपनी पिछली पोस्ट पर आई टिप्पणियों पर गौर किया तो लगा सभी बड़े बेचैन हैं- मेरे गैरेज वाले दोस्त मक्खन से मिलने के लिए...तो आज मैंने जो पोस्ट लिखनी थी वो कल के लिए टाल दी है...आज मक्खन से आप को अच्छी तरह मिलवा ही दूं...चलिए फिर सीधे स्लॉग ओवर में...

स्लॉग ओवर
मक्खन जी पढ़ाई छूटने के बाद पिता के गैरेज पर बैठ तो गए लेकिन उनका दिल कहां लगे...अब कहां स्कूल में ढक्कन, चंगू, मंगू... जैसे हमदिमाग, हमप्याला, हमनिवाला दोस्तों के साथ मस्ती की पाठशाला...और कहां टूटी गाड़ियों की पिताश्री की कार्यशाला...मक्खन बेचारे का दिल लगे तो लगे कैसे...एक तो छोटा शहर, ऊपर से बात-बात पर पिताश्री के नश्तर की तरह चुभते ताने...मक्खन सपनों की उड़ान भरे तो कैसे भरे...खैर सपने तो सपने हैं, ऐसे कोई मानेंगे...मक्खन ने भी सोचा कि छोटे शहर में गैरेज से बात बनने वाली नहीं...अगर गैरेज को ही ज़िंदगी बनाना है तो इसे छोटे नहीं दिल्ली जैसे बड़े शहर में खोला जाए...फिर सोचा कि बड़े शहर में अकेला जान कोई भी पोपट बना लेगा...क्यों न चार यार मिलकर ही दिल्ली चले...अब स्कूल वाली वाली मंडली किस दिन काम आती...मक्खन ने दी आवाज़ और ढक्कन, चंगू, मंगू दौड़े चले आए...आखिर बेताब का गाना जो सुन रखा था....तुम ने दी आवाज़, लो हम आ गए...अब मक्खन ने पिताश्री के गैरेज में ही अपने वफ़ादार साथियों के साथ वार-रूम मीटिंग की...रिसोल्यूशन पास हुआ कि अपना गैरेज तो दिल्ली में ही खुलेगा और दुनिया चाहे इधर से उधर हो जाए, नए शहर में जाकर एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होना...चाहे दुनिया वाले...गे,गे,गे,गे.. करते रहें..
खैर जी आ गए मक्खन द ग्रेट अपनी ब्रिगेड के साथ दिल्ली...किसी सयाने से पूछ कर कि कौन सी मार्केट सही रहेगी, मार्केट भी चुन ली और गैरेज भी खोल लिया...अब चारों इंतज़ार करने लगे ग्राहक का...एक दिन-दो दिन-तीन दिन...हफ्ता-दो हफ्ते...महीना-दो महीने-चार महीने, बीत गए...मक्खन एंड कंपनी के गैरेज की ओर एक भी ग्राहक ने मुंह करके नहीं देखा...मक्खन समेत चारों दोस्त बड़े परेशान...क्या सोच कर दिल्ली आए थे और क्या हो गया...अब मक्खन के परम सखा ढक्कन ने सलाह दी...चलो उन्हीं सयाने जी के पास, जिनके पास पहले भी गए थे...पूछेंगे कि आखिर हमारी खता क्या है...हमारा गैरेज चल क्यों नहीं रहा...चार महीने में एक भी गाड़ी ठीक होने नहीं आई..सयाने जी से पूछा तो उनका जवाब था...गैरेज चलेगा तो ज़रूर लेकिन तुमने उसे पांचवीं मंज़िल पर क्यों खोल रखा है...सयाने जी की बात सुनकर चारों दोस्त बाहर आ गए...मूड तो पहले ही उखड़ा हुआ था, रही सही कसर सयाने जी ने पूरी कर दी...फिर हुई वार-रुम मीटिंग...अब तय हुआ ...छोड़ो यार ये गैरेज का चक्कर-वक्कर...कुछ नहीं धरा इस धंधे में...दिल्ली में रेंट-ए-कार (टैक्सी सर्विस) बड़ा वाह-वाह बिजनेस है...क्यों न उसी में किस्मत आजमाई जाए...लो जी... ये ले और वो ले... हाथों-हाथ गैरेज का तिया-पांचा कर दिया... चमचमाती कार टैक्सी-सर्विस के लिए खरीद ली...स्टैंड पर जाकर खड़ी भी कर दी...फिर इंतज़ार होने लगा कस्टमर का...घंटा-दो घंटे, दिन-दो दिन, हफ्ता-दो हफ्ते, महीना-दो महीने...फिर वही गैरेज वाली कहानी...चारों के कान सुनने को तरस गए कि क्यों भईया टैक्सी खाली है क्या, लेकिन किसी कस्टमर को दया नहीं आई...चारों के सामने बाबा आदम के ज़माने की टैक्सियों को भी ग्राहक मिल जाते लेकिन इनकी चमचमाती कार... टैक्सी बनने के लिए तड़पती ही रह गई...अब करें तो करें क्या...चलो भई फिर उसी सयाने जी के पास...सयाने जी से पूछा कि हमारी टैक्सी ने किसी का क्या बिगाड़ा है...मुहूर्त के लिए भी तरस गई है...सयाने जी ने कहा... टैक्सी तो तुम्हारी चलेगी, लेकिन तुम हर वक्त दो आगे, और दो पीछे की सीट पर क्यों बैठे रहते हो...
सयाने जी की बात सुनी...थोड़ी देर सोचते (?) रहे, फिर मक्खन महाराज ही बोले...जो धंधा हम चारों को एक दूसरे से जुदा कराए,उसे एक मिनट के लिए भी नहीं करना...टैक्सी को वापस करके आते हैं...लेकिन ये क्या...एक और मुसीबत...अब टैक्सी टस से मस होने का नाम ही न ले...लो, अब ये कौन सी कहानी हो गई...बड़े अक्ल के घोड़े दौड़ाए...लेकिन कोई फायदा नहीं...टैक्सी को न हिलना था, न हिली...मरते क्या न करते...चलो जी फिर सयाने जी के पास...पूछा...अब ये टैक्सी क्यों नहीं हिलती...सयाने जी ने कहा...ओ रब दे बंदों, टैक्सी तो तुम्हारी हिलेगी, लेकिन तुम दो पीछे से...और दो आगे से धक्का क्यों लगा रहे हो...

रविवार, 6 सितंबर 2009

बस अब अपने राम को पता रहे...

आपको पता ही क्या है...लेकिन हमें तो पता है...बस अब अपने राम को पता कराना है...हर आदमी के भीतर एक राम होता है, और एक रावण...विवेक राम के रूप में हमसे मर्यादा का पालन कराता है...लेकिन कभी-कभी हमारे अंदर का रावण विवेक को हर कर हमसे अमर्यादित आचरण करा देता है...अपने बड़े-बूढ़ों को ही हम कटु वचन सुना डालते हैं...अपने अंदर के राम को हम जगाए रखें तो ऐसी अप्रिय स्थिति से बचा जा सकता है...राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है...यानि मर्यादा का पालन करने वाले पुरुषों में उत्तम राम...रिश्तों की मर्यादा को सबसे ज़्यादा मान देने वाले राम...राम का यही पक्ष इतना मज़बूत है कि उन्हें पुरुष से उठा कर भगवान बना देता है...हर रिश्ते की मर्यादा को राम ने खूब निभाया...कहने वाले कह सकते हैं कि एक धोबी के कहने पर राम ने सीता के साथ अन्याय किया...लेकिन जो ऐसा कहते हैं वो राम के व्यक्तित्व की विराटता को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं समझते...राम ने सीता को कभी अपने अस्तित्व से अलग नहीं समझा...राम खुद हर दुख, हर कष्ट सह सकते थे लेकिन मर्यादा के पालन की राह में कोई आंच नहीं आते देख सकते थे...इसलिए सीता ने जब दुख सहा तो उससे कहीं ज़्यादा टीस राम ने सही...क्योंकि राम और सीता के शरीर भले दो थे लेकिन आत्मा एक ही थे...
बस राम के इसी आदर्श को पकड़ कर हम चाहें तो अपने घर को स्वर्ग बना सकते हैं...अन्यथा घर को नरक बनाने के लिए हमारे अंदर रावण तो है ही...यहां ये राम-कथा सुनाने का तात्पर्य यही है कि बड़ों के आगे झुक जाने से हम छोटे नहीं हो जाते...यकीन मानिए हम तरक्की करते हैं तो हमसे भी ज़्यादा खुशी हमारे बुज़ुर्गों को होती है...जैसा हम आज बोएंगे, वैसा ही कल हमें सूद समेत हमारे बच्चे लौटाने वाले हैं...इसलिए हमें अपने आने वाले कल को सुधारना है तो आज थोड़ा बहुत कष्ट भी सहना पड़े तो खुशी-खुशी सह लेना चाहिए...वैसे किसी ने बहुत सोच-समझ कर ही कहा है- बच्चा-बूढ़ा एक समान...जब हम अपने बच्चों की खुशी के लिए चांद-तारे तक तोड़ कर लाने को तैयार रहते हैं तो फिर बुज़ुर्गों के सांध्य-काल में उनके चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए क्या अपने को थोड़ा बदल नहीं सकते...
मैं जानता हूं कि जड़त्व के नियम वाली इस दुनिया में किसी के लिए खुद को बदलना बड़ा मुश्किल होता है, लेकिन एक बार कोशिश कर के तो देखिए...आप के बस दो मीठे बोल ही बुज़ुर्गों के लिए ऐसी संजीवनी का काम करेंगे जो दुनिया का बड़े से बड़ा डॉक्टर भी नहीं कर सकता.
इस संदर्भ में, आज से 20-25 साल पहले एक फिल्म आई थी-संसार, उसका ज़िक्र ज़रूर करना चाहूंगा...अनुपम खेर, रेखा और राज बब्बर के मुख्य पात्रों वाली फिल्म संसार में दिए गए संदेश को हम पकड़े तो हमारे परिवारों में रिश्तों की तनातनी को खत्म नहीं तो कम ज़रूर किया जा सकता है...संसार में अनुपम खेर पिता बने हैं और राज बब्बर बेटे...रेखा ने राज की पत्नी का रोल किया...फिल्म में राज के और भाई-बहन भी हैं...अनुपम खेर रिटायर्ड हो चुके हैं और घर को चलाने में राज की कमाई पर दारोमदार टिका है...यही बात धीरे-धीरे राज में झल्लाहट भरती जाती है...रेखा के समझाने पर भी राज बब्बर अपने स्वभाव को नहीं बदल पाते...हालात इतने खराब हो जाते हैं कि घर में ही लकीर खिंच जाती है...यहां तक कि राज अपनी पत्नी (रेखा) और बच्चे को लेकर किराए के घर में रहने चले जाते हैं..लेकिन रेखा रिश्तों में तनाव कम करने की कोशिश नहीं छोड़तीं...और एक दिन ऐसा आता है सभी को अपनी गलतियों का अहसास होने लगता है...फिर सब साथ रहने को तैयार हो जाते हैं...लेकिन यहां रेखा एक और ही रास्ता निकालती हैं...रहेंगे अलग-अलग ही...लेकिन हफ्ते में एक दिन घर के सभी सदस्य मिलेंगे...उस दिन साथ हंसेंगे, साथ बोलेंगे, साथ खाएंगे, एक-दूसरे का सुख-दुख जानेंगे...ऐसा करेंगे तो फिर हफ्ते भर उस दिन का शिद्दत के साथ इंतज़ार रहेगा, जिस दिन सबको मिलना है... ये तो रही खैर फिल्म की बात...(वैसे जिन्होंने ये फिल्म न देखी हो वो कहीं से सीडी मंगाकर देखें जरूर, ऐसा मेरा निवेदन है)
अब आते हैं बड़े-बुज़ुर्गों के रोल पर...कहते हैं न...क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात...बच्चे गलतियां करते हैं, बड़ों का बड़प्पन इसी में है कि उन्हें क्षमा करें...बुज़ुर्ग भी नए ज़माने की दिक्कतों को समझें...अपनी तरफ़ से कोई योगदान दे सकते हैं तो ज़रूर पहल करें..लेकिन यहां प्रश्न आएगा कि हमारी सलाह लेता कौन है...हमें पूछता ही कौन है...इसके लिए भी एक रास्ता मेरी समझ में आता है...ये रास्ता छोटे शहरों-कस्बों में आसानी से अपनाया जा सकता है...मान लीजिए एक कॉलोनी में दस बुज़ुर्ग रहते हैं...उसी कॉलोनी में कुछ ऐसे बच्चे भी अवश्य होंगे जो पढ़ाई कर रहे होंगे...ट्यूशन पढ़ना उनकी मजबूरी होगी...आस-पड़ोस में कुछ ऐसे बच्चे भी होंगे जो ट्यूशन का खर्च उठा ही नहीं सकते...ऐसे में कॉलोनी के बुज़ुर्ग एक जगह बैठकर उन बच्चों को पढ़ाएं...बच्चों को मुफ्त में पढ़ाई के साथ संस्कार मिलेंगे...बुज़ुर्गों का भी अच्छा टाइम पास हो जाएगा...उन्हें ये महसूस होगा कि उनकी रिटायरमेंट के बाद भी कुछ अहमियत है...ये स्थिति सभी के लिए विन-विन वाली होगी...महानगरों में ऐसे फॉर्मूले पर चलने में ज़रूर दिक्कत आ सकती है...क्योंकि यहां हर आदमी खुद को सबसे ज़्यादा समझदार मानता है...बुजुर्गों को लेकर ऐसी कोई पहल करेगा तो उसे दीवाना मान लिया जाएगा...लेकिन हर अच्छी पहल करने वाले को शुरू में ऐसे ही कड़वी बातों का सामना करना पड़ता है...मगर वो अपना रास्ता नहीं छोड़ता.. एक दिन ऐसा आता है, काफ़िला उसके पीछे जुड़ने लगता है...बस अब इस मुद्दे पर बहस खत्म...अब ज़रूरत है हम सबको कहने की....मुझे मिल गए अपने अंदर ही राम...
आखिर में इस बहस को सार्थक बनाने के लिए जिन्होंने भी नैतिक समर्थन दिया, उनका बहुत-बहुत आभार...आशा है समाज के मुंह-बाए खड़े मुद्दों पर ब्लॉगर्स फोरम में आगे भी ऐसे ही विचार होता रहेगा...खैर ये बहस तो यहीं खत्म हुई, उपदेश भी बहुत झाड़ लिए गए, आइए अब स्लॉग ओवर में मिलवाता हूं मक्खन से....

स्लॉग ओवर
मेरा एक दोस्त है मक्खन...पिता गैरेज चलाते हैं...अब मक्खन ठहरा मक्खन...रब का बंदा...पढ़ाई मे ढक्कन रहा...कह-कहवा कर नवीं तक तो गाड़ी निकल गई...दसवीं में बोर्ड था तो गाड़ी अटक गई...तीन चार साल झटके खाए...पिता ने भी मान लिया कि मक्खन की गा़ड़ी गैरेज में ही जाकर पार्क होगी...सो अब हमारा मक्खन गैरेज चलाता है...आज तो सिर्फ मक्खन का परिचय दे रहा हूं...उसके किस्से आपको आगे स्लॉग ओवर में सुनने को मिलते रहेंगे...मक्खन की अक्सर बड़ी मासूम सी समस्याएं होती हैं...जैसे कि कोई फॉर्म ओनली कैपिटल में भरना हो तो मक्खन पूछता है... फॉर्म क्या दिल्ली जाकर भरना होगा...मक्खन बेचारा दिल्ली का एसटीडी कोड (011) भी नहीं मिला पाता...क्यों नहीं मिला पाता...मक्खन जी को फोन पर 0 का बटन तो मिल जाता है 11 का बटन कहीं ढूंढे से भी नहीं मिलता...मक्खन को कहीं फैक्स करना हो तो कहता है कि इस पर पोस्टल स्टैम्प लगा दूं...रास्ते में कहीं खोने का रिस्क नहीं रहेगा...ऐसा है हमारा मक्खन...

...लेकिन हमें तो पता है

"शर्मिंदा हूँ कि कुछ जुमलों का प्रयोग चंद बरस पहले मैंने भी किया था... पर अब ऐसा नहीं है... वो ज़मीन भी है... आसमान भी ...और उनके बीच का वायुमंडल भी..."
ये टिप्पणी मेरी पोस्ट पर सागर ने भेजी है...जिस दिन से मैंने अपना ब्लॉग शुरू किया है, 24 साल का सागर लगातार कमेंट्स भेजकर मेरा हौसला बढ़ा रहा है... सागर ये कबूल करता है कि उसके मुंह से कभी झल्लाहट में बुज़र्गों को तकलीफ़ देने वाले शब्द निकले हैं...साथ ही वो उसके लिए शर्मिंदगी भी महसूस करता है...ये अच्छी बात है कि अब वो सब कुछ अपने पास होने की बात कह रहा है...सागर की इस साफ़गोई से मुझे लगता है कि हमारी बहस सही दिशा में रही है... एक व्यक्ति की सोच भी बदलती है तो हमारा प्रयास सार्थक है...वैसे अगर गहराई से सोचा जाए और रिश्तों मे ज़रा सा बैलेंस बनाकर चला जाए तो ज़मीन भी आपके पास रह सकती है, आसमान भी आपका हो सकता है...और बीच की हवा भी...
सागर जैसा दृष्टिकोण ही हम सबको अपनाने की ज़रूरत है...हम भी इंसान है...और इंसान को गलतियों का पुतला यूहीं नहीं कहा जाता...उससे बड़ा कोई नहीं जो अपनी गलती मानता है और दोबारा उसे न दोहराने का प्रण करता है...अब आता हूं संगीता पुरी जी के ज्वलंत प्रश्न पर जो उन्होंने मेरी पोस्ट पर अपनी टिप्पणी के ज़रिेए उठाया...पहले उनकी बात जस की तस-
"क्‍या दोष सिर्फ बच्‍चों का ही है ?क्‍या दोष उन माता पिता का नहीं .. जो अपनी महत्‍वाकांक्षा के कारण बच्‍चों को अत्‍यधिक मेहनत का आदि बना देते हैं ?
क्‍या दोष आज के सामाजिक माहौल का नहीं .. जहां कोई भी व्‍यक्ति अपने स्‍वार्थ के कारण ही किसी से जुड़ना चाहता है ?क्‍या दोष आज के कैरियर का नहीं .. जो लोगों को महानगरों में रहने को मजबूर कर देता है ?क्‍या दोष आज के ऑफिशियल माहौल का नहीं .. जहां थोड़ी सी असावधानी से आपको नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है ?क्‍या दोष उस व्‍यवस्‍था का नहीं .. जहां कितना भी कमाओ पैसे कम पड़ जाते हैं ?सारा माहौल ही अस्‍त व्‍यस्‍त है .. और अभी तो वह पीढ़ी भी आनेवाली है .. जिसके माता पिता नौकरी में व्‍यस्‍त रहा करते हैं .. और वो नौकरों के भरोसे पले हैं..."
संगीता जी ने जो कहा वो सोलह आने सही है...माता पिता को भी ये समझना चाहिए कि आज के गलाकाट प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में वजूद बनाए रखने की लड़ाई लड़ना कितना मुश्किल है...इसलिए कभी उन्हें भी ये सोचकर देखना चाहिए कि अगर वो खुद ऐसा जीवन जीते तो कितना मुश्किल होता...और आज की पीढ़ी को भी सोचना चाहिए कि वो पूरे दिन में सिर्फ दो-चार मिनट निकालकर बुज़ुर्गों का हाल पूछ ले, उनसे हंस-बोल ले तो मैं यकीन से कहता हूं बुज़ुर्गों का आधा दर्द तो यूहीं उडन-छू हो जाएगा. कल इस बहस को निचोड़ के साथ अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करुंगा...आप इस विषय पर अपने विचारों, राय, अनुभव से ज़रूर अवगत कराएं.. शायद उसी अमृत से किसी की समस्या का समाधान निकल आए...
(शुक्रगुज़ार हूं गुरुदेव, पाबलाजी, बबलीजी, अवधिया जी, दराल सर, पंकज मिश्रा जी, अल्पना वर्मा जी, फिरदौस ख़ान भाई, राज भाटिया जी, शरद कोकास जी, दिनेशराय द्विवेदी सर, विवेक रस्तोगी भाई, अनिल पुस्दकर जी, निशाचर भाई, दीप्ति जी, विवेक सिंह जी, निर्मला कपिला जी, आशा जोगलेकर जी और मेरी पोस्ट को पढ़ने वाले आप सभी का जिन्होंने बुज़ुर्गों की अनदेखी जैसे गंभीर विषय पर बहस को इतना जीवंत बनाया.)

स्लॉग ओवर
आज बस "टीचर्स" डे है...
(व्हिस्की के और सब ब्रांड्स आज के लिए बैन हैं)