सोमवार, 31 अगस्त 2009

हिंदी ब्लॉगिंग-जब पेज पाया गया था, तभी पसंद किया गया था

हम क्लोरोमिंट क्यो खाते हैं..ये विज्ञापन आपने अक्सर टीवी पर देखा होगा..जब ये सवाल पूछा जाता है तो एक ही जवाब आता है- दोबारा मत पूछना...सतिंदरजी की ये टिप्पणी कल जी के अवधिया साहब के ब्लॉग धान के देश में- उस लेख के जवाब में छपी है जिसमें उन्होंने लिखा था कि ...हिंदी ब्लोगिंग- जो पेज पाया ही नहीं गया, उसे भी तीन लोगों ने पसंद किया...दरअसल अवधियाजी जिस पेज का ज़िक्र कर रहे थे, वो मेरे ही पोस्ट- नेहरू और पामेला माउंटबेटन...के बारे में था. इस पर कुछ सुधी ब्लॉगर्स ने अवधियाजी के ब्लॉग पर दी गई टिप्पणियों में चिंता भी व्यक्त थी...अजय कुमार झा जी ने बड़ा रोचक कॉमेंट किया था कि पोस्ट एक बार नेहरू ने पसंद किया होगा और एक बार लेडी माउंटबेटन ने, बस तीसरे का पता चलते ही अवधिया जी की समस्या का समाधान हो जाएगा...पोस्ट मेरा था, इसीलिए मैंने 30 अगस्त को रात 11.45 पर अवधिया जी के पोस्ट पर जाकर सारी स्थिति स्पष्ट कर दी थी...सभी ब्लॉगर्स बंधु के सामने रिकॉर्ड साफ रखने के लिए मैंने कैसे स्थिति स्पष्ट की थी, उसे जस की तस यहां रिपीट कर रहा हूं-
अवधिया जी, पहले तो मैं आपकी विद्वता और महानता दोनों को नमन करता हूं. नेहरू और पामेला माउंटबेटन लेख मैंने लिखा था, इसलिए आपकी जिज्ञासा को शांत करना भी मेरा ही पहला कर्तव्य बनता है. दरअसल ये लेख मैंने पोस्ट कर दिया था. लेकिन एक घंटे बाद मैंने दोबारा इसे देखा तो मुझे नेहरू और एडविना माउंटबेटन नजदीकी के किस्से तो आपने गाहे-बगाहे वाली पंक्ति से की गायब दिखा. मैंने लेख को संपादित करने का फैसला किया. मैंने जब लेख को दुरूस्त करना शुरू किया तब तक उसे तीन पसंद मिल चुकी थी और कई ब्लॉगर बंधु उसे पढ़ भी चुके थे. मुझे ब्लॉगिंग की दुनिया में जुम्मा-जुम्मा आए दो हफ्ते ही हुए हैं. इसलिए पूरा नौसिखिया ठहरा. संपादन की कोशिश की तो पूरा लेख ही ब्लॉग से हट गया. तब तक एक ब्लॉगर फौजिया रियाज की टिप्पणी भी लेख पर आ चुकी थी. वो टिप्पणी भी हट गई. लेख को दुरूस्त करने के बाद मुझे नए सिरे से पोस्ट करना पड़ा. आपने देखा होगा कि अधिक पसंद किए जाने वाली पोस्ट में नेहरू और माउंटबेटन दो बार दिख रहा था. जैसा आपने खुद देखा कि एक पोस्ट खुलती थी और एक पोस्ट डिलीट हो जाने के कारण नहीं खुलती थी. मुझे टिप्पणी हटने के लिए फौजियाजी को इ-मेल कर खेद भी जताना पड़ा. ये उनकी सदाशयता है कि उन्होंने नई पोस्ट पर दोबारा भी टिप्पणी भेज दी. आशा है कि आपकी सारी शंका का निवारण हो गया होगा. बस आपसे एक ही निवेदन है अवधियाजी आप खुद ही एक छोटी सी पोस्ट लिखकर ब्लॉगर भाइयों के समक्ष स्थिति स्पष्ट कर दें.-साभार

अवधियाजी की पोस्ट पर नरेश सिंह राठौड़ जी ने भी अपनी टिप्पणी मे लिखा है कि जो पेज मिला नहीं, वो डिलीट कर दिया गया है, केवल उसका लिंक मौजूद है. जब मैंने अपनी टिप्पणी से अवधियाजी की शंकाओं का निवारण करने की कोशिश की..उसी के बाद अवधियाजी के पोस्ट पर सतिंदरजी की ये टिप्पणी आई- हम क्लोरोमिंट क्यों खाते हैं, दोबारा मत पूछना..आशा है कि अब अवधियाजी या वैसे ही शंका रखने वाले अगर कोई दूसरे सज्जन भी हैं तो उनकी शंका का निवारण हो गया होगा..अब भी कोई सवाल रहता है तो मुझसे सीधा संपर्क किया जा सकता है-- sehgalkd@gmail.com
 
 
 

रविवार, 30 अगस्त 2009

नेहरू और पामेला मांउटबेटन

आपने जवाहरलाल नेहरू और एडविना माउंटबेटन की नज़दीकी के किस्से तो गाहे-बगाहे सुने होंगे, लेकिन यहां बात पामेला माउंटबेटन की होगी- भारत में ब्रिटिश हुकूमत के आखिरी वाइसराय और आज़ाद भारत के पहले गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन और एडविना माउंटबेटन की बेटी पामेला माउंटबेटन. भारत के आज़ाद होने के वक्त पामेला सिर्फ 17 साल की थीं. पामेला खुद अपनी किताब India remembered : A personal account of Mountbatten में मान चुकी हैं कि उनकी मां एडविना और नेहरू के बीच प्यार का रिश्ता था। लेकिन ये लगाव जिस्मानी ना होकर रूहानी किस्म का था. लेकिन यहां कोई प्यार-मुहब्बत की दास्तान नहीं लिखी जा रही, बल्कि ज़िक्र नेहरू की शख्सीयत से जुड़े एक और पहलू का होगा.
जसवंत सिंह की जिन्ना पर लिखी किताब के बाद जिन्ना के साथ-साथ गांधी, नेहरू भी बहस के केंद्र में आ गए हैं. सर्च लाइट लेकर इन शख्सीयतों के प्लस-माइनस ढूंढे जाने लगे हैं. गांधी, नेहरू और जिन्ना तीनों ने ही विदेश में शिक्षा हासिल की. लेकिन जहां नेहरू और जिन्ना की सोच पाश्चात्य रंग-ढंग में ढली थी वहीं गांधी कभी भारतीयता से अलग नहीं हुए. अब असली विषय नेहरू और पामेला पर लौटते हैं. इनसे जुड़ी 15 अगस्त 1947 की एक घटना है जो नेहरू के व्यक्तित्व को लेकर कुछ सोचने को मजबूर करती है. लैरी कोलिंस और डोमनिक लैपियरे ने अपनी किताब Freedom at midnight में इस घटना का बारीकी से उल्लेख किया है. 15 अगस्त 1947 को शाम पांच बजे इंडिया गेट पर तिरंगा फहराया जाना था. लॉर्ड माउंटबेटन को उम्मीद थी कि इंडिया गेट पर तीस हज़ार लोग जुट सकते हैं. लेकिन लार्ड माउंटबेटन का अंदाज़ सिर्फ पांच-साढ़े पांच लाख गलत निकला. दिल्ली की सड़कों पर जहां देखो लोगों का सैलाब इंडिया गेट की ओर बढ़ा जा रहा था. व्यवस्था बनाए रखने के लिए जो बांस-बल्लियां और बैरीकेडिंग लगाई गई थीं, वो भीड़ के दबाव के आगे धरी की धरी रह गईं.समारोह के लिेए जो बैंड वाले बुलाए गए थे वो भीड़ के बीच पता ही नहीं चला कहां गुम हो गए. ऐसे में लार्ड माउंटबेटन की बेटी भी निजी स्टॉफ के दो सदस्यों के साथ समारोह की गवाह बनने वहां पहुंच गईं. लेकिन वो मंच तक पहुंचे तो पहुंचे कैसे. जहां देखो वहां सिर ही सिर. लोग ऐसे सट कर बैठे हुए थे कि उनके बीच से हवा तक का गुज़रना मुश्किल था. पामेला ने खुद अपनी किताब में ज़िक्र किया है कि कुछ महिलाओं की गोद मे बच्चे थे. भीड़ का दबाव इतना था कि महिलाएं बच्चों को बार-बार हवा में उछाल रही थीं. सिर्फ इसलिए कि कहीं बच्चों का भीड़ में दम ना घुट जाए. पामेला के मुताबिक एक साथ कई बच्चों को हवा में उछलते देखना विस्मयकारी था. ऐसी हालत में पामेला ने सोच लिया कि उनका आगे बढ़ना नामुमकिन है. वो वापस जाने की सोच ही रही थीं कि मंच से नेहरू ने उन्हें देख लिया. पामेला की हिचकिचाहट नेहरू समझ गए. नेहरू ने वहीं से आवाज दी...पामेला लोगों के सिरों पर ही चलती हुई मंच तक आ जाओ... नफ़ासतपसंद पामेला भला कहां ऐसी अभद्रता के बारे में सोच सकती थीं.. उन्होंने इशारे से ही मना कर दिया... इस पर नेहरू ने फिर चिल्लाकर कहा कि नादानों जैसी बात मत करो, जैसा मैं कह रहा हूं, वैसा ही करो...आखिर नेहरू की बात मान पामेला ने अपनी ऊंची एड़ी वाले सैंडल उतार कर हाथ में लिए और लोगों के सिरों से ही जगह बनाते हुए आगे बढ़ना शुरू किया। भीड़ में जिस के सिर पर पामेला का पैर पड़ जाता वो खुश हो जाता...पामेला लड़खड़ाने लगतीं तो लोग ही उन्हें संभाल लेते...कोई पामेला के ऊंची एड़ी के सैंडलों को देखकर खुश होता...सब सीधे-साधे, लाग-लपेट से कोसो दूर लोग। किसी तरह पामेला मंच तक पहुंच गईं। उधर गाड़ी से आए लार्ड माउंटबेटन तो भीड़ को देखकर गाड़ी से उतरने की भी हिम्मत भी नहीं कर पाए. उन्होंने गाड़ी से ही तिरंगा फहराने का इशारा किया...सवाल यहां ये है कि नेहरू ने क्यों पामेला को अपने लोगों के सिरों पर से चलकर मंच तक पहुंचने के लिए कहा...
हो सकता है कि नेहरू अपने लोगों के निश्चल स्वभाव को जानते हों और भारतीयता के उस संस्कार का पालन कर रहे हों जिसमें अतिथि को सिर-आंखों पर बैठा लिया जाता है...लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि वो आज़ादी का पहला दिन था...क्या नेहरू उसी दिन जानते थे कि आम भारतीयों की अहमियत इतनी ही है कि एक विदेशी को उनके सिरों पर पैर रखकर चलने के लिए भी कहा जा सकता है...और वो फिर भी अपने नेता को सम्मान देते हुए उनकी बात का बुरा नहीं मानेगे. नेहरू ने जाने-अनजाने जो भी कहा, वो उनके सोचने के अंदाज़ पर सवालिया निशान ज़रूर लगाता है. देखने वाले यहीं से गांधी और नेहरू की सोच के बुनियादी अंतर को भी देख सकते हैं...गांधी जहां गांव से ही भारत का भविष्य खड़ा करना चाहते थे वहीं नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण के लिए औद्योगिकीकरण की विदेशी लीक पकड़ी॥कौन सही था, कौन गलत, ये एक देश में दो देश के उस फर्क से समझा जा सकता है जिस पर आज़ादी के 62 साल बाद भी आज राहुल गांधी को शिद्दत के साथ ज़ोर देना पड़ रहा है.

स्लॉग ओवर
उम्मीद की हद...99 साल की एक दादी अम्मा अपने मोबाइल के लिए लाइफ़टाइम री-चार्ज कराने पहुंची.

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

पत्नीश्री की मददग़ार

आप सोच रहे होंगे कि मैं किस मददग़ार की बात कर रहा हूं. जनाब माया नाम की ये वो मोहतरमा है जो एक दिन घर में अपने चरण ना डालें तो घर में भूचाल-सा आ जाता है. अपना तो घर में बैठना तक दूभर हो जाता है. पत्नीश्री के मुखारबिन्दु से बार-बार ये उदगार निकलते रहते हैं- यहां मत बैठो, वहां मत बैठो. एक तो ये मेरी जान का दुश्मन लैप-टॉप. मैं सुबह से घर में खप रही हूं. इन्हें है कोई फिक्र. पत्नीश्री का ये रूप देखकर अपुन फौरन समझ जाते हैं, आज माया घर को सुशोभित करने नहीं आने वाली है.
तो जनाब ऐसी है माया की माया. वैसे तो ये मायाएं हर घर में आती हैं लेकिन इन्हें नाम से इनके मुंह पर ही बुलाया जाता है. जब ये सामने नहीं होती तो इनके लिए नौकरानी, आया, बाई, माई, कामवाली और ज़्यादा मॉड घर हों तो मेड जैसे संवेदनाहीन शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है. जैसे इंसान की कोई पहचान ही न हो. किटी पार्टी हो या कोई और ऐसा मौका जहां दो या दो से ज़्यादा महिलाओं की गपशप चल रही हो, वहां ये सुनने को मिल ही जाता है- इन कामवालियों ने तो नाक में दम कर रखा है. जितना मर्जी इनके साथ कर लो, लेकिन ये सुधरने वाली नहीं.
तो जनाब मैं अपनी पत्नीश्री की मददगार माया की बात कर रहा था. माया की तीन साल की एक बेटी है-लक्ष्मी और पति ढाबे पर काम करता है. काम क्या करता है, बस जो मेहनताना मिलता है, ज़्यादातर ढाबे पर ही दारू में उड़ा आता है. माया और उसके पति को यहां नोएडा में एक कोठी में रहने के लिए उसकी मालकिन ने एक छोटा सा टीन की छत वाला कमरा दे रखा है. अब ये भी सुन लीजिए कि ये मालकिन इस दयादृष्टि की माया से कीमत क्या वसूल करती है. कोठी की सफ़ाई, घास की कटाई, पेड़-पौधों में पानी देना, मालकिन के कहीं जाने पर कोठी की चौकीदारी करना और न जाने क्या-क्या. ज़रा सी चूक हुई नहीं कि बोरिया-बिस्तर उठा कर सड़क पर फेंक देने की धमकी. ठीक उसी अंदाज में जिस तरह कभी अमेरिका में गुलामी के दौर में अफ्रीकियों के साथ बर्ताव किया जाता था. ऐसी दासप्रथा नोएडा की कई कोठियों में आपको देखने को मिल जाएगी.
ऐसे हालात में माया को जब भी मैंने घर पर काम के लिए आते-जाते देखा, ऐसे ही लगा जैसे कि किसी तेज़ रफ्तार से चलने के कंपीटिशन में हिस्सा ले रही हो. अब जो मां काम पर आने के लिए छोटी बच्ची को कमरे में अकेली बंद करके आई हो, उसकी हालत का अंदाज़ लगाया जा सकता है. ऐसे में मेरी पत्नीश्री ने भी गोल्डन रूल बना लिया है जो भी दान-पुण्य करना है वो माया पर ही करना है. हां, एक बार पत्नीश्री ज़रूर धर्मसंकट में पड़ी थीं- पहले देवों के देव महादेव या फिर अपनी माया. दरअसल पत्नीश्री हर सोमवार को मंदिर में शिवलिंग पर दूध का एक पैकेट चढ़ाती थीं. दूध से शिवलिंग का स्नान होता और वो मंदिर के बाहर ही नाले में जा गिरता. सोमवार को इतना दूध चढ़ता है कि नाले का पानी भी दूधिया नज़र आने लगता. एक सोमवार मैंने बस पत्नीश्री को मंदिर से बाहर ले जाकर वो नाला दिखा दिया. पत्नीश्री अब भी हर सोमवार मंदिर जाती हैं...अब शिवलिंग का दूध से नहीं जल से अभिषेक करती हैं... और दूध का पैकेट माया के घर उसकी बेटी लक्ष्मी के लिए जाता है.. आखिर लक्ष्मी भी तो देवी ही है ना.
लक्ष्मी की बात आई तो एक बात और याद आई. मेरी दस साल की बिटिया है. पांच-छह साल पहले उसके लिए एक फैंसी साइकिल खरीदी थी. अब बिटिया लंबी हो गई तो पैर लंबे होने की वजह से साइकिल चला नहीं पाती थी... साइकिल घर में बेकार पड़ी थी तो पत्नीश्री ने वो साइकिल लक्ष्मी को खुश करने के लिए माया को दे दी. लेकिन बाल-मन तो बाल-मन ही होता है...हमारी बिटिया रानी को ये बात खटक गई...भले ही साइकिल जंग खा रही थी लेकिन कभी बिटिया की जान उसमें बसती थी..वो कैसे बर्दाश्त करे कि उसकी प्यारी साइकिल किसी और को दे दी जाए...वो लक्ष्मी को दुश्मन मानने लगी.. लाख समझाने पर आखिर बिटिया के कुछ बात समझ आई. दरअसल ये मेरी बिटिया का भी कसूर नहीं है. पब्लिक स्कूलों में एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज़, फ्रेंच-जर्मन भाषाएं न जाने क्या-क्या सिखाने पर ज़ोर दिया जाता है लेकिन ये छोटी सी बात कोई नहीं बताता कि एक इंसान का दिल दूसरे इंसान के दर्द को देखकर पिघलना चाहिए. हम भी बच्चों को एमबीए, सीए, डॉक्टर, इंजीनियर बनाने के लिए तो कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते लेकिन ये कम ही ध्यान देते हैं कि हमारे नौनिहाल कुछ भी बनने से पहले अच्छे इंसान बने.
चलिए अब माया की गाथा यहीं निपटाता हूं. 10 बज गए हैं, माया अभी तक नहीं आई है और पत्नीश्री का पारा धीरे-धीरे चढ़ना शुरू हो रहा है..इससे पहले कि अपने लैपटॉप बॉस को पत्नीश्री के अपशब्द सुनने पड़ें, सीधे स्लॉग ओवर पर आता हूं.

स्लॉग ओवर
हरियाणा में एक चौधरी साहब बड़े मजे से साइकिल पर कप्तान बने हवा-हवाई हुए जा रहे थे.. सामने से एक ताई आ गई..चौधरी साहब से कंट्रोल हुआ नहीं और साइकिल ताई पर जा दे मारी...अब ताई ने जो चौधरी की खबर लेनी शुरू की... तेरियां इतनी बड़ी-बड़ी मूच्छां, तैणे शर्म ना आवे से...चौधरी साहब तपाक से बोले- ताई, पहला मैणे इक बात बता...मेरिया मूच्छां में क्या ब्रेक लाग रे से...

बुधवार, 26 अगस्त 2009

बीजेपी या मंदिर का घंटा

बीजेपी को पहले जसवंत सिंह का जिन्ना झटका और अब अरुण शौरी का 440 वोल्ट शॉक, वैसे टीवी पर एक विज्ञापन सभी ने देखा होगा...शॉक लगा... शॉक लगा...शॉक लगा... जिसमें एक घर के इलैक्ट्रिक स्विच ख़राब होने की वजह से घर के सभी सदस्यों को बिजली के झटके लगते रहते हैं. इसके चलते सब के सिर के बाल भी हमेशा खड़े रहते हैं. कुछ-कुछ वैसी ही हालत इस वक़्त बीजेपी की है. बेचारी पार्टी ना हो गयी, मंदिर का घंटा हो गयी. जिसे देखो मुंह उठा कर चला आ रहा है और बजाये जा रहा है. लोक सभा चुनाव की हार कम थी क्या, जो पार्टी पर रोज अपने ही सितम पर सितम ढहा रहे हैं.
82 पार आडवानी जी क्या-क्या झेलें. चुनाव के वक़्त तो अहमदाबाद में डम्बल (वर्जिश वाले गोले) उठा-उठा कर कांग्रेस को चेताया था- अभी तो में जवान हूँ...अभी तो मैं जवान हूँ ...वो तो वोटर ही बेदर्द निकले जो यूथ फॉर आडवाणी कैम्पेन पर कान तक नहीं धरा. अब बेचारे आडवानी जी संकट के इस दौर में अपनी पार्टी वालों को तो डम्बल भी नहीं दिखा सकते.
खैर जसवंत तो जिन्ना के कसीदे पढने की वजह से पहले ही नाप दिए गए हैं, सुधींदर कुलकर्णी अपने आप ही बाय-बाय बोल गए। शौरी को लेकर पार्टी दो-फाड़ है लेकिन शौरी पर गाज गिरनी तय है। बीजेपी का संकट यही ख़त्म नहीं हो जाता. अपने सभी पदों को छोड़ ज्वालामुखी बने बैठे यशवंत सिन्हा कब बीजेपी की मेट्रो का एक और पिलर गिरा दें, कोई भरोसा नहीं.
बीजेपी की हालत अंधी गली में फंसने जैसी है. संघ ने बीजेपी के फट्टे में हाथ डालने से मना कर दिया है, रही बात अटलजी की तो बीजेपी उनके लिए ये भी नहीं कह सकती - फिर से आओ अटल बिहारी, करा दो नैया पार हमारी. यह अटलजी ही थे जिनकी बात बीजेपी ही नहीं पूरा एनडीए सुनता था. अब तो शरद यादव भी बात-बात पर बीजेपी को आए दिन झिड़कते रहते हैं. बीजेपी को राम तो मिले नहीं, घर के भेदी लंका और ढहाने पर तुल गए हैं. अब ऐसे में बीजेपी में हर शख्स के होंठों पर आतिफ असलम का यह गाना हो तो कोई बड़ी बात नहीं- हम किस गली जा रहें हैं अपना कोई ठिकाना नहीं.

स्लॉग ओवर
सुबह सुबह एक मुर्गी बेकरी वाले की दुकान पर पहुँच गयी. दुकानदार को 30 रुपये दिए और बोली 6 अंडे दे दो. दुकानदार हैरान-परेशान. फिर हिम्मत करके बोला- मुर्गी बहन तुम तो खुद पूरी दुनिया को अंडे देती हो, फिर तुम्हे अंडे खरीदने की नौबत क्यों आ गयी. ये सुनकर मुर्गी थोडा लज्जाई-शर्माई, फिर बोली- वो दरअसल मेरे मुर्गेजी ने कहा है- क्या तीस रुपये के पीछे अपनी फिगर ख़राब करेगी, जा अंडे खरीद ही ला.
 

सोमवार, 24 अगस्त 2009

सपनों की रोटी

सपनों की रोटी
राहुल गांधी एक देश में दो देश के फर्क को मिटाना चाहते हैं। गरीबों को इज्ज़त के साथ जिंदगी का हक़ दिलाना चाहते हैं। जब भी मौका मिलता है दलितों-आदिवासियों-किसानों का हाल जानने के लिए उनके घरों में चले जाते हैं। चुनाव में इस काम में ज़्यादा ही थक गए। सुस्ताने के लिए ज़रूर 19 जून को अपने 39वें जन्मदिन पर लंदन(जी हां लंदन) चले गए थे। दलील ये कि यहां रहते तो कुछ कांग्रेसी जन्मदिन के जोश में आसमां सिर पर उठाए रखते। कौन न मर जाए इस मासूमियत पर।
अब सुनिए बुदेलखंड का हाल, जिसके लिए राहुल गांधी अलग प्राधिकरण बनाना चाहते हैं। वहां पहले से ही हालात बदतर थे। सूखे ने रही सही कसर और पूरी कर दी है। वहां से ऐसी रिपोर्ट भी आईं कि भूख से बिलबिलाते बच्चों को उनकी माएं घास की रोटियां बना-बना कर देती रहीं। अब ज़रा सोचिए, ऐसी हालत में गुज़र करने वालों के ख्वाबों में क्या आता है। सपनों की रोटी। अब गौर कीजिए शहरों में रहने वाले हम और आप ख्वाबों में क्या देखते है। अच्छी नौकरी, गाड़ी, बंगला, समाज में रुतबा। और इन्हीं ख्वाबों को पूरा करने के लिए ता-उम्र रोबोट बने घूमते रहते हैं। लेकिन मृगतृ्ष्णा कभी खत्म नहीं होती। अब हमारे ख्वाबों की सार्थकता है या उस बच्चे की मां की जो गर्मागर्म रोटी का सपना दिखला कर जिगर के टुकड़े को इस गीत से बहला रही है।
 
सूरज ज़रा, आ पास आ
आज सपनों की रोटी पकाएंगे हम
ए आसमां तू बड़ा मेहरबां
आज तुझको भी दावत खिलाएंगे हम
सूरज ज़रा, आ पास आ
 
चूल्हा है ठंडा पड़ा
और पेट में आग़ है
गर्मागर्म रोटियां
कितना हसीं ख्वाब है
सूरज ज़रा, आ पास आ
आज सपनों की रोटी पकाएंगे हम
ए आसमां तू बड़ा मेहरबां
आज तुझको भी दावत खिलाएंगे हम
सूरज ज़रा, आ पास आ

आलू टमाटर का साग
इमली की चटनी बने
रोटी करारी सिके
घी उसमें असली लगे
सूरज ज़रा, आ पास आ
आज सपनों की रोटी पकाएंगे हम
ए आसमां तू बड़ा मेहरबां
आज तुझको भी दावत खिलाएंगे हम
सूरज ज़रा, आ पास आ
 
बैठे कहीं छांव में
आ आज पिकनिक सही
ऐसे ही दिन की सदा
हमको तमन्ना रही
सूरज ज़रा, आ पास आ
आज सपनों की रोटी पकाएंगे हम
ए आसमां तू बड़ा मेहरबां
आज तुझको भी दावत खिलाएंगे हम
सूरज ज़रा, आ पास आ
-शैलेन्द्र
(1959 में आई फिल्म उजाला के इस गीत के दर्द को पूरी तरह महसूस करना है तो इसे मन्ना डे साहब की आवाज़ में सुने। इसके लिए youtube पर जाकर song suraj zara aa paas टाइप करें- )
इस रिपोर्ट को पोस्ट करते वक्त आपको गुदगुदाने वाला स्लॉग ओवर देने का मन नहीं कर रहा। इसके लिए क्षमा चाहता हूं। अगले पोस्ट का इंतज़ार कीजिए। निराश नहीं करूंगा।

शनिवार, 22 अगस्त 2009

मार्केटिंग के दो गुरु

मार्केटिंग के दो गुरु
यह आपके मार्केटिंग हुनर का कमाल है कि आप चाहे तो गंजों के घर में कंघे बेच दें , अंधों कि बस्ती में आइने बेच दें. बस आपके चेहरे पर मासूमियत हमेशा टपकती रहनी चाहिए. खुदा ना खास्ता आप पहले से ही नाम वाले हैं तो कहना ही क्या. आप जो कहेंगे- झूठ-सच पत्थर की लकीर माना जाने लगेगा. अब किसी को मिर्ची लगे तो आप क्या करें. नकद-नारायण की कृपा-दृष्टि आप पर बनी रहनी चाहिए. अब शाहरुख़ बेचारे क्या करें, लंदन समेत दुनिया के तमाम बड़े शहरों में आशियाने बनाने का ख़्वाब भारत के दर्शकों के भरोसे बैठे-बैठे ही कोई पूरा हो जाएगा. सुन रहे हो ना अमरीका वालों- .'माई नेम इज़ ख़ान' . अब रही बात जसवंत जी की तो भैया राज्य-सभा में विपक्ष के नेता की कुर्सी तो पहले ही जा चुकी है, व्हिस्की की बोतल पर ख़ुद जसवंत जी लोकसभा में प्रणब बाबू से शिकायत कर चुके हैं कि हज़ार रुपए से कम की नहीं आती. यह कमल-कमंडल वालों के चक्कर में रहते तो भैया कहीं के ना रहते, भला हो जिन्ना का... किताब के ज़रिए बैंक-बैलेंस का तो अच्छा इंतजाम कर दिया है, रही बात राजनीति की तो पिक्चर अभी बाकी है दोस्त. दार्जिलिंग में अपने नए गोरखा दोस्त हैं ना. (बीबीसी ब्लॉग पर मेरी राय)

जिन्ना का गमला
एक बहुत पुराना गीत था मंडुए तले गरीब के दो फूल खिल रहे. ऐसी ही कुछ कहानी जिन्ना के गमले में दो फूल खिलने की है. एक फूल खिलाया था आडवाणी ने 4 जून 2005 को पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जाकर उन्हें सरोजिनी नायडू के हवाले से हिन्दू-मुस्लिम एकता का महान राजदूत करार देकर. वहीँ दूसरा फूल खिलाया जसवंत सिंह ने 17 अगस्त 2009 को अपनी किताब में जिन्ना के कसीदे पढ़कर. जसवंत के जिन्ना नायक है और नेहरु-पटेल खलनायक. आडवाणी संघ के तीर सहने के बाद भी पार्टी में नंबर एक बने रहे. वहीँ संघ को खुश रखने के लिए जसवंत पर आँख झपकते ही अनुशासन का डंडा चला दिया गया. कभी party with difference का नारा देने वाली बीजेपी आज party with differences बन चुकी है. इन दोहरे मानदंडो में ही बीजेपी की हर समस्या छिपी है या यूं कहिये समाधान भी. (बीबीसी ब्लॉग पर मेरी राय)

वाह...छोटे सरदार वाह
बोलने की आज़ादी भारतीय लोकतंत्र की पहचान है. यही वो गहना है जिसकी वजह से दुनिया में हमें माना जाता है. वरना हमारी हालत भी पाकिस्तान जैसी होती. संघ को खुश करने के लिए बीजेपी ने जसवंत सिंह को स्ट्म्प किया, वहीं नरेंद्र मोदी ने जसवंत की किताब पर ही रोक लगा दी. भला सरदार पटेल की शान में गुस्ताख़ी कैसे बर्दाश्त होती. अब कोई मोदी से पूछे कि पटेल ने ही पहले गृहमंत्री के नाते संघ पर रोक लगाई थी. मोदी जी अगर रोक ही समाधान होती तो बापू के गुजरात में नशाबंदी के बावजूद ज़हरीली शराब जैसे कांड क्यों होते. (बीबीसी ब्लॉग पर मेरी राय)

स्लॉग ओवर
राहुल गाँधी जब भी एक देश में दो देश का फर्क मिटाने की बात करते हैं, मुझे न जाने क्यों एक पाकिस्तानी पत्रकार दोस्त का सुनाया किस्सा याद आ जाता है. एक बार एक दीन-हीन किसान सूखे की मार से गाँव में परेशान हो गया. खाने तक के लाले हो गए तो किसी सयाने ने शहर जाकर मजदूरी करने की सलाह दी. बेचारा शहर आ गया. शरीर पर पहनने को सिर्फ एक लंगोटी थी. शहर में पहुँचते ही उसने एक बड़ी सी मिल देखी, नाम था अब्दुल्ला राइस मिल. थोडी दूर और चला तो दिखाई दिया अब्दुल्ला कोल्ड स्टोर. फिर आगे चला तो देखा- अब्दुल्ला काम्प्लेक्स. पचास कदम बाद फिर आलीशान कोठी- अब्दुल्ला महल. तब तक चौपला आ गया था. किसान ने वहां ठंडी सी सांस भरी और अपनी लंगोटी भी उतार कर हवा में उछाल दी, साथ ही आसमान में देखते हुए कहा- जब तूने देना ही सब अब्दुल्ला को है, तो यह भी अब्दुल्ला को ही दे दे.
 
 

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

सुनो भई साधो...

बीबीसी ब्लॉग पर मेरी कुछ राय

बीजेपी के बुरे दिन
जिस तरह बीजेपी ने खुद को बुरे दौर में फंसा लिया है, उस पर हरियाणा का एक किस्सा याद आ रहा है। एक बार एक लड़की छत से गिर गयी, लड़की दर्द से बुरी तरह छटपटा रही थी, उसे कोई घरेलु नुस्खे बता रहा था तो कोई डॉक्टर को बुलाने की सलाह दे रहा था, तभी सरपंच जी भी वहां आ गए. उन्होंने हिंग लगे न फिटकरी वाली तर्ज़ पर सुझाया कि लड़की को दर्द तो हो ही रहा है लगे हाथ इसके नाक-कान भी छिदवा दो, बड़े दर्द में बच्ची को इस दर्द का पता भी नहीं चलेगा, वही हाल बीजेपी का है. चुनाव के बाद से इतने झटके लग रहे है कि इससे ज्यादा बुरे दौर कि और क्या सोची जा सकती है. ऐसे में पार्टी कि शायद यही मानसिकता हो गयी है कि जो भी सितम ढहने है वो अभी ही ढह जायें, कल तो फिर उठना ही उठना है. आखिर उम्मीद पर दुनिया कायम है.

भारत-पाकिस्तान रिश्ते
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.आम भारतीय का दिल शीशे की तरह साफ़ होता है.अगर कोई उसे प्यार से देखता है, वो तपाक से हाथ बढ़ा देता है.अगर कोई हाथ बढ़ाता है, वो उसे गले लगा लेता है.अगर कोई गले लगाता है तो वो उसे दिल में बसा लेता है.इसी आदत की वजह से कभी करगिल तो कभी 26-11 की शक्ल में धोखा खाता है लेकिन जिस तरह संत की प्रकृति होती है, वो तमाम दुष्कारियों के बावजूद परोपकार नहीं छोड़ता, वैसे ही भारत पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिश नहीं छोड़ेगा.ज़रूरत है पाकिस्तान भी दिल से एक बार इस भावना को तो दिखाए..
2. जहां तक सियासतदानों की बात हैं तो इनकी कोशिश तो बस यही है कि दोनों जगह अवाम की आंखों पर पट्टी बंधी रहे और इनकी हांडी बार-बार पकती रहे। गुरबत, फिरकापरस्ती, भुखमरी, बेरोज़गारी, बे-तालीमी, करप्शन से जंग लड़ने की जगह एक-दूसरे मुल्क को ही दुश्मन नंबर एक बताते हुए लड़ने-मरने की बातें की जाती रहे। बाकी जो इंसान है वो चाहे सरहद के इस पार है या उस पार, वो यही सोचते हैं- पंछी, नदियां, पवन के झोंके, कोई सरहद ना इनको रोके। फिर सोचो तो क्या मिला हमको इंसान होके।
3. ताक़त छीनने के लिए फूट डालना हमेशा बड़ा हथियार रहा है. क्या मुग़ल और क्या ब्रिटिश सिर्फ इसलिए भारत में पैर जमा सके क्योंकि हमारी रियासतें एक दूसरे के खिलाफ़ षडयंत्र में लगी रहती थीं. आज खतरा दूसरा है. शीत-युद्घ के बाद अमेरिका खुद को चुनोती देने वाली कोई सामरिक, बौधिक या आर्थिक शक्ति उभरने नहीं देना चाहता, उसका हित इसी में है कि भारत-पाकिस्तान आपस में लड़ते रहें. गरीबी-कुरीतियों से लडाई की चिंता छोड़ हम घर-फूँक तमाशे की तर्ज़ पर अपने एटमी हथियारों के बढते ज़खीरे पर ही इतराते रहें.हम एक हो गए तो ग्लोबल पुलिस-मेन को पूछेगा कौन. यह हमारी बदकिस्मती है कि हमारे पास जर्मनी की तरह सोचने वाले स्टेटस-मेन नहीं है. बँटवारे ने ना जाने कितने परिवारों को अपनी माटी से उखड़ने को मजबूर कर दिया. अपनी जड़ वाली ज़मीन को मरने से पहले सिर्फ एक बार देखने की हसरत दिल में ही लिए ना जाने कितने बुजुर्ग दुनिया को अलविदा कह गए. लेकिन हम जाग कर भी सोये रहे. क्या कोई ऐसी सूरत नहीं निकल सकती कि... चलो विरासत की ओर,,,के नाम से दोनों मुल्को में ऐसी मुहिम चले जिसमे लोगों को सरहद के इस-उस पार जाकर टूटे धागों को फिर जोड़ने का मौका मिले. यह सिलसिला अगर चल निकले तो दावा है कि एक साल में ही वो सब मुमकिन हो जायेगा जो शर्म-अल-शेख जैसी मुलाकातें सालों-साल तक नहीं कर सकती, बस जरूरत है तबियत से एक पत्थर उछालने की, देखते है आसमान में सूराख कैसे नहीं होता.
 
अफगानिस्तान का हाल
रेणुजी, आपका लेख पढ़ कर ना जाने क्यों काबुलीवाला फिल्म का गीत याद आ गया- ए मेरे प्यारे वतन, ए मेरे बिछुडे चमन, तुझ पे दिल कुर्बान . आप काबुल में है तो आप खुद ही देख रही होंगी की चमन की क्या हालत हो गयी है. अगर काबुल का यह हाल है तो बाकी अफगानिस्तान का क्या हाल होगा. अमेरिका के भरपूर समर्थन के बावजूद करजई सिर्फ काबुल के ही राष्ट्रपति बन सके, अफगानिस्तान के नहीं. कभी तालिबान को रूस के खिलाफ़ खडा करने वाला अमेरिका नौ साल तक पूरी ताकत झोंकने के बाद भी ओसामा बिन लादेन या मुल्ला उमर की हवा तक भी नहीं पकड़ पाया. अमेरिका खुद ही सोचे कि तालिबान जैसे दरिंदो से मुक्ति पाने के बाद भी आम अफगानी क्यों अमेरिका से खुश नहीं है. ज़ाहिर है गुलामी में महलों में रहने से भी कई बेहतर है झोंपडे में ही आज़ादी की हवा में सांस ली जाए.

मान गए शाहरुख़
मान गए शाहरुख, आपके प्रोफेशनल सेंस को.आपकी फिल्म माई नेम इज़ ख़ान रिलीज़ को तैयार हैऔऱ ख़ान नाम जुड़ा होने की वजह से नेवार्क हवाई अड्डे पर आपकी तलाशी. यानि नस्ली भेदभाव.याद कीजिए बिग ब्रदर का जेड गुडी-शिल्पा शेट्टी विवाद. शाहरुख आप आइकन होने की वजह से नाराज है.आइकन कलाम भी हैं. नियमों को देखते हुए, अपने ही मुल्क में तलाशी होने पर भी कलाम साहब ने हाय-तौबा नहीं मचाई.ठीक भी है कलाम आपकी तरह दुनिया के हर बड़े शहर में अपने मकान का नहीं बल्कि भारत के विकसित होने का सपना देखते हैं. कलाम से सीखो.
 

सोमवार, 17 अगस्त 2009

कलाम से सीखो शाहरुख़

करीब 32 साल पहले देव आनंद की फिल्म आई थी- देस परदेस. उस में टीना मुनीम भारत से लन्दन पहुँचती है, वेस्टर्न ड्रेस पहनने में शर्मा रही होती है तो देव आनंद समझाने के लिए गाते है- अरे जैसा देस वैसा भेस, फिर क्या डरना. शाहरुख़ खान का भी आजकल एक पैर अमेरिका में और दूसरा भारत में होता है. अपनी फिल्म के अर्थ-शास्त्र के लिए शाहरुख़ की पहली चिंता अब झुमरी तलैया के दर्शक नहीं डॉलर की बरसात करने वाले एनआरआई, ओवरसीज़ मार्केट या मल्टी-प्लेक्स की मोटी टिकट लेने वाले दर्शक होते हैं. ज्यादातर फिल्मों की शूटिंग शाहरुख़ अमेरिका में ही करना पसंद करते हैं. रहन-सहन, बोल-चाल में भी शाहरुख़ भारतीय कम वेस्टर्न स्टार की तरह ही ज्यादा नज़र आते हैं. बादशाह की तर्ज़ पर वो अपना मुकाबला भी किसी इंडियन स्टार से नहीं हॉलीवुड के टॉम क्रूज़ से मानते है. कभी दिल्ली के राजिंदर नगर में किराये के मकानमें बचपन गुजारने वाले शाहरुख़ अब दुनिया के हर बड़े शहर में अपने परिवार के लिए आशियाना बनाना चाहते हैं. लेकिन जब शाहरुख़ खान की नेवार्क हवाई अड्डे पर तलाशी होती है तो वो तमतमा जाते हैं ऐसा नसीब भला हम कितने भारतीयों को हासिल है.
कलाम साहिब के अपमान के मामले में भी देश को जानने में दो महीने का वक़्त लग गया था, लेकिन शाहरुख़ की तलाशी के चंद घंटे बाद ही मानो भूचाल आ गया . बलिहारी मीडिया आपके, जिसके लिए शाहरुख़ के अपमान से बढ़िया चारा और क्या हो सकता था. शाहरुख़ को सिर्फ भारत का ही नहीं ग्लोबल आइकन बताया जाने लगा. भला कोई यह बताये कि शाहरुख़ ने फिल्मों या IPL की एक टीम का मालिक होने के अलावा और कौन सा तीर मारा है जिससे कि उन्हें देश के नौनिहाल अपना रोल मॉडल माने. शाहरुख़ आज बॉलीवुड के सरताज हैं, कल कोई और होगा, जैसे कि शाहरुख़ से पहले अमिताभ, राजेश खन्ना थे, लेकिन कलाम वो हस्ती हैं जिन्होंने मिसाइल-मेन के नाते देश की सुरक्षा को धार दी, राष्ट्रपति पद पर रहते हुए देश को 2020 तक विकसित होने का विज़न दिया. कभी अपने बारे में नहीं बस देश और देशवासिओं की बेहतरी के बारे में ही सोचा.ऐसे होते हैं नेशनल हीरो जिन पर तारीख सदिओं-सदिओं गर्व करती हैं, फिर भी निर्मलता इतनी कि अपने देश में ही तलाशी का कड़वा घूँट पीने के बाद भी जुबान से सी तक नहीं की. दूसरे देश के नियमों को सम्मान देते हुए मौजे तक उतार कर तलाशी देदी और बात का बतंगड़ ना बने इसलिए सरकार को भी बताने से परहेज़ किया. किसी ने सच ही कहा है कि जिस डाली को जितना फल लगता है वो उतना ही झुकती है.
लेकिन शाहरुख़ की सोच अपने लिए जिए तो क्या जिए वाली नहीं बल्कि ये दिल मांगे मोर वाली है. किस्मत के ऐसे धनी कि संकट को भी भुनाने का पूरा पूरा मौका मिल जाता है. कौन जाने एक रूटीन कारवाई को ही तिल का ताड़ बना दिया हो, आखिर सखा करन जोहर के साथ फिल्म...माय नेम इज खान..की मार्केटिंग की सारी रणनीति ही अमेरिका में ही जो तय की जा रही है. अगर ये सच है तो मान गए शाहरुख, आपके प्रोफेशनल सेंस को. ख़ान नाम जुड़ा होने की वजह से नेवार्क हवाई अड्डे पर तलाशी. यानि नस्ली भेदभाव.आपकी आने वाली फिल्म का प्लाट भी तो यही है. याद कीजिए बिग ब्रदर का जेड गुडी-शिल्पा शेट्टी विवाद. शिल्पा एक ही झटके में ब्रिटेन मे शोहरत के सातवें आसमान पर पहुँच गयीं. शाहरुख़, दुनिया में भारतीय कहीं भी रहते हो पब्लिसिटी के मोहताज़ बेशक ना हो, लेकिन वो अब अपना दायरा गैर-भारतीयों में भी बढाना चाहते हैं. माय नेम इज खान ग्लोबल औडिएंस के लिए अच्छा पैड साबित हो सकती है.
जहाँ तक सवाल अमेरिका में नियमों कि सख्ती का है तो इसी कि बदौलत 9 /11 के बाद वहां नौ साल में एक भी आतंक की बड़ी वारदात नहीं होने दी गयी है. जहाँ सख्ती की ज़रुरत हो वहां सख्ती बरती ही जानी चाहिए. अमेरिका ही क्यों, चीन ने भी HINI फ्लू के मामले में दिखा दिया है कि इस तरह के खतरे से कैसे निपटा जाता है. वहां बाहर से आने वाली किसी भी उडान में कोई भी संदिग्ध दिखा उसे फ़ौरन आइसोलेशन में ले जाया गया, न्यू ओरलेंस के मेयर और उनकी पत्नी तक को नहीं बख्शा गया. कोई राजनयिक पहुँच नहीं. खाने की थाली बस आइसोलेशन रूम के बाहर रख दी जाती थी. नतीजा यह कि HINI के तीन हज़ार केस के बावजूद चीन में एक भी मौत नहीं हुई. कोई बात समाज की भलाई के लिए हो तो तूफ़ान नहीं खडा किया जाना चाहिए. यह बात शाहरुख़ भी समझे और मीडिया भी.
आखिर में एक बात बस और. सचिन तेंदुलकर ने ना जाने कितने सालों से एक NGO के लिए दो सौ बच्चों की पढाई का खर्चा उठाया हुआ है लेकिन NGO की संचालिका से बात की जाये तो वो कुछ भी बताने से कन्नी काटती हैं. क्यों ...अगर सचिन को पता चल गया तो वो नाराज़ हो जायेंगे. क्या ऐसे नहीं होने चाहिए आइकन, शाहरुख़.