मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख....खुशदीप

नब्बे के दशक में एक फिल्म आई थी- दामिनी...फिल्म में सनी देओल वकील की भूमिका में थे...सनी देओल का फिल्म में एक डॉयलॉग बड़ा हिट हुआ था...मी लॉर्ड, मुवक्किल को अदालत के चक्कर काट-काट कर भी मिलता क्या है...तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख...लेकिन इंसाफ़ नहीं मिलता...ख़ैर ये तो फिल्म की बात थी...लेकिन हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था का कड़वा सच भी यही है..रुचिका गिरहोत्रा के केस में ही सबने देखा...दस साल बाद मुकदमा दर्ज हुआ...नौ साल मुकदमा चलने के बाद नतीजा आया...गुनहगार को 6 महीने कैद और एक हज़ार रुपये जुर्माना...

क़ानून के आसरे इंसाफ़ के लिए सबसे ज़्यादा उम्मीद अदालत से ही होती है...लेकिन इंसाफ़ के लिए बरसों से इंतज़ार करते करते आंखें पथरा जाएं तो इंसाफ़ के मायने ही क्या रह जाते हैं...केंद्रीय क़ानून मंत्री वीरप्पा मोइली के मुताबिक इस वक्त देश की अदालतों में तीन करोड़ ग्यारह लाख उनतालीस हज़ार पांच सौ बाइस मुकदमे लंबित हैं...औसतन देश की आबादी में हर 40 नागरिकों पर एक केस फ़ैसले के इंतज़ार मे लटका हुआ है...

अगर देश की सर्वोच्च अदालत यानि सुप्रीम कोर्ट की बात की जाए तो वहां चौवन हज़ार एक सौ छह केस पेंडिंग हैं...अगर देश के सभी हाईकोर्ट की बात की जाए तो वहां चालीस  लाख से ज़्यादा मामलों में फ़ैसले का इंतज़ार है...और अगर निचली अदालतों के आंकड़ों को देखा जाए तो वहां दो  करोड़ सत्तर लाख से ज़्यादा मामले लंबित हैं...एक अनुमान के अनुसार ये मान लिया जाए कि आज के बाद कोई मुकदमा देश की किसी भी अदालत में नहीं आएगा तो भी लंबित मुकदमों को पूरी तरह निपटाने में 124 साल लग जाएंगे...ये हालत तब है जब फास्ट ट्रैक अदालतों को तीस लाख मुकदमे सौंपे गए थे जिसमें 25 लाख पर फ़ैसला आ चुका है...

अदालतों के पिछले एक दशक के रिकॉर्ड पर नज़र दौड़ाई जाए तो लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है...पिछले दस साल में सुप्रीम कोर्ट में लंबित मुकदमों की संख्या में 139 फीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है...देश के सभी हाईकोर्ट में 46 और निचली अदालतों में 32 फीसदी लंबित मुकदमों की संख्या बढ़ी है....साल-दर-साल मुकदमे लटके रहने की बात की जाए तो देश के हाई कोर्टों में ही लंबित मुकदमों में से 25 फ़ीसदी ऐसे हैं जो दस साल से ज़्यादा पुराने हैं...स्थिति कितनी गंभीर है ये इसी से पता चलता है कि देश की जेलों में जितने कैदी बंद हैं उनमें 70 फीसदी से ज़्यादा विचाराधीन कैदी है...

सरकार के दावों के मुताबिक कोशिश की जा रही है कि किसी भी केस में फैसले के लिए तीन साल से ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़े..सरकार के नए मसौदे में देश की सभी अदालतों को कंप्यूटर, इंटरनेट और प्रिंटर से लैस करने का प्रावधान है...देश में करीब 16 हज़ार जजों के पद हैं जिनमें से फिलहाल तीन हज़ार खाली है...देश में औसतन बीस लाख लोगों पर 27 जज हैं जबकि अमेरिका में बीस लाख लोगों पर 214 जज काम कर रहे हैं...अमेरिका में आबादी के अनुपात के हिसाब से भारत के मुकाबले आठ गुना ज़्यादा जज हैं...

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के जी बालाकृष्णन ने हाल ही में कहा है कि देश में 35 हज़ार जजों की दरकार है...न्यायिक प्रक्रिया में सरकार तत्काल सुधार नहीं लाती तो देश में मुकदमों का अंबार घटने की जगह बढ़ता ही जाएगा...ऐसे हालात में जल्दी इंसाफ़ के लिए आम आदमी अदालत के साथ भगवान की चौखट पर भी गुहार न लगाए तो क्या करे...


स्लॉग ओवर

मक्खन एक बार मक्खनी से लड़ने के बाद गुस्से में भुनभुनाता हुआ कैमिस्ट की दुकान पर पहुंचा...मक्खन ने छूटते ही कहा...मुझे ज़हर चाहिए...कैमिस्ट ने खेद जताते हुए कहा कि वो मक्खन को ज़हर नहीं बेच सकता...इस पर मक्खन ने पर्स निकाल कर पत्नी मक्खनी का फोटो कैमिस्ट को दिखाया...कैमिस्ट ने फोटो देखने के बाद मक्खन से माफ़ी मांगते हुए कहा...ओह, मुझे नहीं पता था कि आपने प्रेस्क्रिप्शन साथ रखा हुआ है...-

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आज मेरे अंग्रेज़ी ब्लॉग Mr Laughter पर है...

संता भी सोचता है...

24 टिप्‍पणियां:

  1. ज़्यादा जज होने से मुकद्दमे समय से निपटने लगे तो नेता लोगों का बार-बार चुना जाना बहुत मुश्किल हो जाएग न भई.
    स्लाग आवर तो बल्ले-बल्ले..

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  2. अदालतों में मुकदमों की हालत चिन्तनीय है. आमूलचूर परिवर्तन की दरकार है.

    ---मख्खन का प्रिस्क्रिप्शन बेहतरीन रहा.

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    यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

    निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

    आपका साधुवाद!!

    शुभकामनाएँ!

    समीर लाल
    उड़न तश्तरी

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  3. जब इन्साफ और कानून खुद अपने वजूद के लिए झख मार रहे हैं तो देश का विकास ठेंगे से होगा....जब तक न्यायप्रणाली व्यवस्थित नहीं होती एक सामान्य मनुष्य का सामान्य सा जीवन ही मुश्किल है....विकास की बात तो बहुत बाद में है....

    स्लोग ओवर...

    ओय होय....!!
    क्या बात है मक्खन मियां प्रेस्क्रिप्शन साथ लेकर चलते हैं.....वो भी बायीं जेब में.. ???
    बहुत याराना लगता है ...क्यूँ !!!
    ऐ...साबास !!

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  4. हमारे यहाँ अदालतों की ऐसी शोचनीय दशा देख के लगता है कि आम आदमी अपने आपसी विवादों को जहाँ तक संभव हो सके..अदालत के बाहर ही सुलझा ले... यही उसके लिए बेहतर है....

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  5. किसी भी मामले को सुलझाना नहीं चाहते हो ...अटकाना हो वर्षों के लिए तो इसका सीधा सच्चा सा रास्ता है ...अदालत में जाना ..केस दर्ज करवाना और फिर चादर तान कर सोना ....

    मक्खनी के होते हुए मक्खन को केमिस्ट के पास आना पड़ा ...फिर तो प्रेस्क्रिप्शन की जरुरत मक्खनी को है ...!!

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  6. कहा ही गया है की जस्टिस डिलेड इस जस्टिस ड़ीनायड-केमिस्ट ने जहर दे दिया क्या ? फिर क्या मक्खन ने जहर खा लिया ? वो जिन्दा रहा या पिघल कर टपक गया ? इन सवालों को मन में कौन्धाती अच्छी रचना !

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  7. गंभीर मुद्दे पर विचारोत्तेजक पोस्ट

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  8. काश न्यायपालिका में भी तय समय और बजट के अंदर सारे मामलों पर फ़ैसला आ जाये, पता नहीं यह वक्त हमारी भारतीय न्यायपालिका कब देख पायेगी।

    केमिस्ट भी भुक्तभोगी लगता था तभी इतनी जल्दी पर्चे को पहचान गया।

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  9. बहुत आच्छी रचना। बहुत-बहुत धन्यवाद
    आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  10. आपका आंकड़ों सहित आना और भी अच्छा लग रहा है। और मक्खन की प्रक्र्पिशन भी शानदार है।

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  11. न्याय मिलने की बात बेमानी हो गयी, गरीब आदमी न्याय की गुहार लिए उपर चला जाता, एक बार कोर्ट पहुंच जाए बस गिद्ध एक साथ हमला करते हैं, बस,बस, बस, अब और नही
    मक्खन वाला प्रेस्क्रिप्शन तलाशी पर कईयों की जेब मे मिलेगा।

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  12. khushdip bhai aaj kal nyay bas tarikh hi hai desh ke chote mote ganv aur shahar se highcourt aur suprimcourt ke chakkar lagate hajaro log roj mayush hokar baith jate hai aur bas unhe har tarikh par bas tarikh hi milati hai nyan milata hi nahi aur kabhi adha adhura nyan bhi milata hai tab tak itana der ho chuka rahata hai ki us nyan ka aanad wo lene se vanchit rah jate hai aur tarikh ke chakkar me lakho rupaye kharch ho jate hai..nyan prnali me sudhar ki jarurat hai..bahut hi sarthak charcha..dhanywaad bhai

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  13. हरियाणा के पूर्व दरिन्दे डीसीपी राठोर के पीछे तो मीडिया हाथ धो कर पड़ गया, लेकिन इस बात का जिक्र कोई नहीं करता की आखिर इतनी मामूली सजा उसे दी किस जज ने ? हम लोग भ्रष्टाचार के पौधे को तो खूब हिला लेते है लेकिन उसकी जड़ो को नहीं खंगालते ! आज वास्तविकता में भर्ष्टाचार की मूल जड़ न्यायपालिका है !

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  14. भैया ...बहुत सही आलेख..... खुद मेरे साथ भी ऐसा ही है..... मैं इस वक़्त छह मुक़दमे लड़ रहा हूँ..... मेरे पड़दादा ३ मुक़दमे लड़ रहे थे.... फिर वो मुकदमा मेरे दादा जी के नाम ट्रान्सफर हुआ .....फिर मेरे पिताजी पर..... ऐसे ही दादा ३ मुक़दमे लड़ रहे थे.... टोटल छह हो गए.... अब पिताजी के जाने के बाद ....मेरे ऊपर ट्रान्सफर हो गए..... पिछले ७० सालों से कोई फैसला नहीं हुआ..... अब वो अपोजीशन वाले भी मुझ से सुलह करने पर तैयार हो गए... हैं.... बताइए...क्या फायदा हुआ मुकदमा लड़ने का..... जब सुलह ही करना था..... यह हमारी न्यायिक प्रक्रिया ही ऐसी है..... कि आम आदमी पिस कर रह जाये...... लेजिस्लेशन पर यकीन करना बेमानी है.........

    जय हिंद......

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  15. खुशदीप जी,
    आप ने मेरी टिप्पणी को बहुत गंभीरता से लिया। यदि यही गंभीरता सरकारें और राजनैतिक दल दिखाएँ तो बात कुछ बने। केंद्र सरकार ने फिर भी कुछ कदम पिछले दो वर्षों में उठाए हैं जो नाकाफी हैं। यह दायित्व राज्य सरकारों का है कि राज्यों में अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या बढ़ाए। लेकिन राज्य सरकारें इस के लिए कतई तैयार नहीं दिखती हैं। यदि यही हालात रहे तो कुछ ही बरसों में यह विचार भी उठ सकता है कि न्याय को केंद्रीय विषय बनाया जाए।
    मेरी अपनी सोच यह है कि जब तक न्याय के लिए कोई बड़ा जनान्दोलन नहीं खड़ा होगा तब तक सरकारों को अक्ल नहीं आएगी। इस महत्वपूर्ण विषय को मीडिया ने कभी चंद बाइट्स से अधिक तरजीह नहीं दी। मैं ने कभी अदालतों की संख्या पर कोई परिचर्चा किसी समाचार चैनल में नहीं देखी। क्या मीडिया को इस गंभीर समस्या पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

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  16. खुशदीप जी इस देश मे सज़ा सिर्फ़ गरीबों को या बदनसीबों को ही मिलती है।ताक़तवर या रसूख वाले लोग तो ज़मानत पर रिहा हो जाते हैं और फ़िर शुरू हो जाता है तारीख पर तारीख।एक बात और मैं बहुत समय से सोच रहा था इस पर लिखूं मगर लिख नही पाया,आप ही बताईये कि सज़ा सुनते ही अमीर ही क्यों बीमार होकर अस्पताल मे भर्ती होता है।क्या आपने कभी जेल वालों को किसी गरीब को अस्पताल मे भेजते देखा है?

    खैर जान दिजीये,आप तो ये बताईये कि अगर मुझे उस केमिस्ट से ज़हर लेना हो तो मैं कैसे लूं?प्रिस्क्रिप्शन तो है नही मेरे पास्।हा हा हा हा हा।
    आज तक़ मीठी चीज़ों के भीतर छीपी कड़वी दवा ही खाई है,पहली बार कड़वी चीज़ मे छीपी मीठी दवा खा रहे हैं।

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  17. खुश दीप भाई,आप की बात से सहमत हुं, कहते है जिसे बर्वाद करना हो उसे इन चक्करो मै डाल दो, मकखन जी का प्रिस्क्रिप्शन :) अच्छा लगा

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  18. Ekdam sahi kaha aapne....sateek sarthak vivechna ki hai is lekh me aapne...

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  19. अच्छा अच्छा,हमारी अनुपस्थिति में आपने हमारे ही कार्यक्षेत्र में धावा बोल दिया ...चलिए जाईये आप भी छुट्टी पर हम फ़टाक से मीडिया पर कुछ लिखेंगे ....वो तो हमें उडते उडते खबर लगी कि भाई मियां कुछ लिखे हैं ....झा जी जल्दी पहुंचिये ..हम हाजिर हो गये । सबसे सही बात आप कह चुके हैं बांकी का द्विवेदी जी । वैसे इस दिशा में अब खुद अदालत भी कई प्रयास कर रही है एक महात्वाकांक्षी योजना zero pendency नाम की हाल ही में शुरू की गई है..वैसे हालात तो चिंताजनक हैं ही ।जहर खरीदने का prescription आज ही पता चला । पहली हाजिरी आप के यहां लगी है छुट्टी के बाद ......बस अब शुरू हो जाते हैं ॥

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  20. तारीख लेते लेते बहुत से लोग तारीख हो गये . आप भी कई बार मिलने की कह चुके है लेकिन तारीख नही दे रहे है .
    और ब्रेकिग न्यूज .... अभी पता चला है मक्खन नोयडा मे एक टी वी चैनल मे काम करता है .

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  21. पता चला है कि मक्कन को दिया ज़हर डूप्लिकेट निकला और उसने केमिस्ट पर दावा ठोक दिया। अब उसे मिल रही है तारीक पर तारीक, तारीक पर तारीक, तारीक पर तारीक....

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  22. सार्थक लेख.....कहते हैं किसी से दुशमनी निभानी हो तो उसे मुकद्दमा लड़ने के लिये उकसा दो।

    उड़न तश्तरी जी के इस कथन से पूर्णतः सहमत:

    "यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं."

    स्लौग ओवर तो बस क्या कहें!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

    जय हिंद

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  23. कई बार हैरानी होती है कि इन सबके बावजूद अपना ये विशाल लोकतंत्र कितनी सहजता से चल भी रहा है।खुद अपने ही गांव-घर में देख रहा हूं...कितने ही विवाद जो वर्षों से अदालत में लटके पड़े बस फाइल नंबर बने पड़े हैं।

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