शनिवार, 26 दिसंबर 2009

एक थी रुचिका, एक है राठौर...खुशदीप

मैं रुचिका हूं...आज मैं आपके बीच होती तो 33 साल की होती...अपना घर बसा चुकी होती...शायद स्कूल जाने वाले दो बच्चे भी होते...लेकिन मुझे इस दुनिया को छोड़े सोलह साल हो चुके हैं...मेरे पापा, मेरा भाई ज़िंदा तो हैं लेकिन गम़ का जो पहाड़ उनके सीने में दफ़न है वो किसी भी इंसान को जीती-जागती लाश बना देने के लिए काफ़ी है...मुझे याद है टेनिस खेलने का बड़ा शौक था...लेकिन मुझे क्या पता था कि यही शौक मेरा बचपन, मेरी खुशियां, मेरा चहचहाना एक झटके में मुझसे छीन लेगा...


मैं

मेरे छोटे होते ही मां बेशक दुनिया छोड़ गई थी...लेकिन मेरे पापा ने मुझे और मेरे भाई को कभी मां की कमी महसूस नहीं होने दी..लेकिन उस 12 अगस्त 1990 की एक मनहूस तारीख ने ही हमारी दुनिया बदल दी....मेरे हंसते-खेलते परिवार को कब्रस्तान की मुर्दनी में बदल डाला...14 साल की उम्र में मुझे क्या पता था कि अंकल की शक्ल में एक अधेड़ एसपीएस राठौर मेरे साथ वो हरकत करेगा जिसके बारे मे मैंने कभी सुना भी नहीं था...मैं तो उन्हें ऐसा अंकल मानती थी जो मेरे टेनिस के करियर को संवार देंगे...मुझे क्या पता था कि वो अधेड़ इंसान की खाल में भेड़िया निकलेगा...

मुझे कई दिन लग गए अपने को संभालने में...लेकिन फिर मैंने हिम्मत करके पापा को सब कुछ बताया...पापा का खून खौल उठा...फिर किसी की बेटी के साथ वो भेड़िया ऐसी हरकत न करे, मेरे पापा ने आवाज़ उठाने का फैसला किया...लेकिन शिकायत करें तो किससे करें...वो अधेड़ तो खुद पुलिस में आईजी रैंक का अफ़सर था...ऊपर से सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों का चहेता...उसका भला कौन बाल-बांका कर सकता था...आवाज़ उठाने पर कोई कार्रवाई की जगह मेरे परिवार को ही धमकियां दी जाने लगीं...मेरे भाई आशु पर एक साल में ही ग्यारह मुकदमे ठोक दिए गए...थाने बुलाकर उसे टॉर्चर किया जाता रहा...हर बार यही कहा जाता रहा कि हम सब अपने होंठ सी लें...नहीं तो इस दुनिया में रहना मुश्किल कर दिया जाएगा...


मेरा गुनहगार राठौर

मेरे पापा इंसाफ़ के लिए दर-दर भटकते रहे लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिली...हां मेरी प्यारी सहेली आराधना का परिवार ज़रूर चट्टान की तरह हमारे साथ डटा रहा...लेकिन भाई और पिता की हालत देखकर मैं टूटती चली गई...कहीं न कहीं परिवार की खुशियां छीन जाने के लिए खुद को ही कसूरवार मानने लगी...एक दिन मेरा सब्र का बांध टूट गया और सत्रह साल की उम्र में मैंने दुनिया को छोड़ने का फैसला किया...ये वो उम्र होती है जब सपनों को पंख लगते हैं...और मैंने 28 दिसंबर 1993  को इस बेरहम दुनिया से ही हमेशा के लिेए उड़ान भर ली....

मैंने सोचा था मेरी मौत से मेरे परिवार का गम कम हो जाएगा...लेकिन पिछले सोलह साल से शायद ही एक दिन भी ऐसा आया होगा जब मेरे पापा और भाई ने चैन की नींद ली हो...आखिर चैन आता भी कहां से...उनकी लाडली को छीनने का सबब बनने वाला खूसट पुलिस अधिकारी छूट्टा जो घूम रहा था...सज़ा तो दूर तरक्की दर तरक्की पाता हुआ सूबे में पुलिस की सबसे ऊंची पोस्ट तक पहुंच गया...पुलिस सेवा मेडल तक पा गया...उन्नीस साल में हरियाणा में कई सरकारें बदलीं...कई मुख्यमंत्री आए और गए लेकिन मेरे गुनहगार पर चींटी सा भी असर नहीं हुआ...नेताओं के सब सफेद-काले धंधों में मदद जो किया करता था...

मेरे पिता को अदालत से फिर भी इंसाफ़ का भरोसा था...दस साल ऐडियां रगड़ने के बाद मुकदमा दर्ज हुआ...नौ साल अदालत जा-जा कर कई जोड़ी जूते घिसने के बाद फैसला आया....एसपीएस राठौर को छह महीने की सज़ा और एक हज़ार रुपये जुर्माना...फैसले के दस मिनट बाद ही राठौर को ज़मानत भी मिल गई...अदालत और कर भी क्या सकती थी...उसके हाथ जो बंधे हुए थे...जो लचर सबूत उसके सामने रखे जाएंगे वो उसी पर तो अपना फैसला सुनाएगी...सबूत मज़बूत होते भी कहां से ....पुलिस तो गुनहगार की खुद मातहत थी...अपने सबसे आला अधिकारी को बचाने के लिए वो क्यों न क़ानून का गला घोंटती...

और सियासतदां उनकी तो बात ही न की जाए...ये सफेद झक कपड़े बेशक कितने पहन लें, लेकिन इनके अंदर का जो अंधेरा है वो सड़कों पर जलने वाली मोमबत्तियों से कभी दूर नहीं हो सकता...पांच दिन पहले अदालत के फैसले के बाद राठौर का शैतानी हंसी हंसता चेहरा टीवी के कैमरों के ज़रिए पूरी दुनिया ने देखा...उन्नीस साल के इंतज़ार के बावजूद इंसाफ़ का ये हश्र देखकर मेरे पापा और भाई बिल्कुल टूट गए हैं...उन्हें इस वक्त आप सबकी ज़रूरत है...आप ही उनके आंसू पोंछ सकते हैं...मैं चाह कर भी ये काम नहीं कर सकती...आप उनकी आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ इतनी ज़ोर से मिलाएं कि चंडीगढ़ और दिल्ली में बैठे बहरे कानों में भी झनझनाहट हो जाए...

याद रखिए जब तक मेरा गुनहगार अपने अंजाम तक नहीं पहुंचेगा...मेरी रूह को चैन नहीं मिलेगा...बस अब खत्म करती हूं...खुशदीप अंकल मेरी कहानी कल भी आपको सुनाएंगे...अब मुझे इस वादे के साथ इजाज़त दीजिए कि आप मेरा चेहरा याद रखेंगे और मेरे पापा को क़ानून की देवी से इंसाफ़ दिला कर ही दम लेंगे...

आपकी बिटिया
रुचिका


24 टिप्‍पणियां:

  1. खुश दीप भाई, अब इस देश मै डर सा लगने लगा है एक सचा ओर इमान दार आदमी इज्जत से रह भी नही सकता, रुचिका बिटिया जहां भी हो शांति से रहो, अगर सच मै कोई भगवान है तो वो इस राक्षको खुद सजा देगा

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  2. यहीं आकर कितना मजबूर हो जाता है एक आम आदमी. ये भेड़िये खुले आम घूमते हैं और कानून तक इनकी रखवाली करता है. घृणा होने लगती है ऐसे सब कृत्य देख सुन कर पूरे सिस्टम से.

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  3. जो मैं लिखना चाहता था वो आपने कह दिया खुशदीप भाई। इस मामले पर आत्मा तब भी सुलगी थी और अब तो और भी ज्यादा। इसमें न्यायपालिका के प्रति क्रोध भी शामिल है। उन लोगों को जीने का हक नहीं है जो भेड़ियों की खाल में इन्सानों के बीच रहते हैं। हमें इन्हें पहचानना होगा और अपने तरीके से सजा देनी होगी।

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  4. इस देश की संपूर्ण व्यवस्था ही ऐसी बन चुकी है जहाँ सबल को संरक्षण व निर्बल को यातना मिलती है । मीडिया भी हर एक छोटी-बड़ी घटना को नमकमिर्च लगा कर परोसती है कि कई वास्तविक व अक्षम्य अपराधों की खबरें भी लोगों तक उतनी शिद्दत से नहीं पंहुचती जितनी की पहुंचनी चाहिए। खुशदीप सहगल जैसे लोगों के लेख भी नक्कार खाने में तूती की आवाज ही साबित होते हैं। इन सब वास्तविकताओं के बावजूद भी ऐसी घटना का हर जिंदा व्यक्ति द्वारा विरोध किया जाना चाहिए। विरोध का परिणाम कम से कम इतना तो होगा कि मानवीय संवेदना अभी जीवित है

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  5. न्‍यानपालिका की इसी लाचारी से तो अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं .. और किसी भी अपराध को अंजाम देने में उन्‍हें नाममात्र को भी भय नहीं होता .. सामाजिक राजनीतिक हालातें पर कु सोंचने को विवश करता आलेख !!

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  6. लोकतंत्र में लाचार न्यायपालिका का यह किस्सा पहला नहीं है ..
    बहुत दुखद ....!!

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  7. ऐसे अनेक गुमनाम किस्से और भी होंगे जिनके लिये कभी किसी ने आवाज उठाने की हिम्मत ही न की हो।

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  8. अपनी ताकत और पोजीशन का गलत फ़ायदा उठाने वाले हर पिशाच को उसके कुकर्मों की पूरी सज़ा मिलनी ही चाहिए!

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  9. वास्तविकताओं के बावजूद भी ऐसी घटना का हर जिंदा व्यक्ति द्वारा विरोध किया जाना चाहिए

    Agree

    (Sorry, am on non-Hindi PC)

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  10. जाने क्या बनेगा अपने इस मुल्क का...!

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  11. फौजी कह रहे है ऐसी बात ! नहीं मैं भूल कर रहा हूँ... इस वक़्त वो एक लेखक हैं, पाठक हैं...

    तहलका के शून्यकाल में एनडीटीवी के समाचार संपादक प्रियदर्शन का आलेख भी कुछ ऐसा ही है...

    ब्रेख्त की लाइन है ...

    "हमारे हाथों में दे दिए गए हैं छोटे - छोटे न्याय
    ताकि
    बड़े अन्यायों पर पर्दा पड़ा रहे "

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  12. jab tak insaan khud apne hathon mein satta ki bagdor nhi lega tab tak aise hi gunahgaar hum par raaj karte rahege aur kanoon ko thagte rahenge.........is ghinone kritya ke liye aise insaan ko aisi sazaa milni chahiye jo kabhi kisi ne dekhi ho na suni ho...........bahgwan ruchika ki aatma ko shanti de..........kis par insaan bharosa kare jab kanoon ki aad mein hi kanoon tode jayein.
    jab tak desh aise logon ke hathon ki kathputli bana rahega tab tak yahan nyaay ki ummeed karna bemani hai.

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  13. ये अदालतें भले ही उसे छोड़ दें लेकिन जो दुनिया का सबसे बड़ा न्यायाधीश है उसके दंड से उसे कौन बचाएगा? उसकी लाठी की मार बेआवाज होती है।

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  14. रुचिका का नाम लेते ही आँखें नम हो जाती हैं। मगर उन बेशर्मों का हम कुछ नहीं बिगाड पाते जो ऐसे कलियाँ मसल डालते हैं। न जाने कितनी रुचिकाओं की आत्मा तडप रही है इन्साफ के लिये मगर कानून खामोश है। इन्साफ की देवी भी लाचार है आदमी के इन कृ्त्य पर । राठौर जौसे बेशर्मों को शरेआम गोली से उदा देना चाहिये। मगर पता नहीं वो दिन कब आयेगा। धन्यवाद और शुभकामनायें

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  15. अगर १६ साल पहले यह चिट्ठी पढने को मिलती तो कुछ और हो सकता था जो आज नही हुआ . रुचिका का दर्द हमे पहले नही सुनने को मिला . आज हम उसके लिये चिन्तित है यदि हम लोग आगे कोई रुचिका ना बने और कोई राठोर न पनपे इस बारे मे सोचना चहिये .

    और अपने अन्दर के तेज़ाब को इस तरह ना बहाये कि गोली मार दो .कुछ सार्थक कदम उठे जिससे आने वाली रुचिकाये रुचिका ना बने

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  16. हद्द है....!!!
    आज मैंने पहली बार ये सुना...
    इस तरह ..न्यायपालिका..समाज. सिस्टम को दोष देने से काम चलेगा क्या....???
    अगर हम सब ये सोच कर सिर्फ बैठे और पोस्ट लिखें तो काम नहीं चलेगा.....
    पूरे ब्लॉग जगत से हस्ताक्षर लीजिये.....प्रधानमन्त्री को प्रेषित कीजिये ......ऊँचे से ऊँचे कुर्सी तक जाइए.....हम सब मिलकर कुछ कर सकते हैं...कुछ कीजिये खुशदीप जी...
    आप तो मिडिया में हैं.....शोर मचना चाहिए......शोरSSSSS.....इतना कि सब सोचने को मजबूर हो जाएँ....
    चुप मत बैठिये....
    अरे कुछ तो कीजिये......

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  17. सागर भैया,
    ये देश जो बचा हुआ है न, ये सिर्फ गौतम राजरिशी जैसे जांबाज़ों की वजह से ही है...हम सिर्फ बड़ी बड़ी बातें कर सकते हैं कि आतंकवादियों को गोली से उड़ा दो...लेकिन हम में कितने हैं जिन्होंने बंदूक कभी हाथ में उठा कर देखी है...शून्य से कई डिग्री नीचे की सर्दी हो या जलता रेगिस्तान, हमारे जवान ही चौबीस घंटे इस लिए मुस्तैद रहते हैं कि हम घरों में चैन से सो सकें...आतंकवादियों से लोहा लेते वक्त उनकी गोलियां भी सीने पर खाते हैं लेकिन कभी पीठ नहीं दिखाते....लेकिन इनसान हमारे फौजी भाई भी है....देश की ये हालत देखकर उनका कलेजा भी फटता है...लेकिन अनुशासन उनके लिए सर्वोपरि होता है...और हमारा देश जिन नेताओं के भरोसे रहता है वो तो मौका मिलने पर शहीदों के ताबूतों में भी कमीशन खा जाते हैं....

    जय हिंद...

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  18. अदा जी,
    मैं कभी चुप नहीं बैठता...गलत बात जहां भी दिखती है, विरोध ज़रूर करता हूं.. मेरा जितना सामर्थ्य है, जितनी मेरी शक्ति है, मैं उन मुद्दों को ज़रूर उठाने की कोशिश करता हूं जिनका सरोकार आम आदमी, खास तौर पर गरीब-गुरबों से होता है...आप उस मुद्दे पर एक बार भी सोचते हैं तो मेरा उद्देश्य सार्थक हो जाता है...मीडिया ने
    शोर मचाया तो किसे-किसे इंसाफ़ मिला, ये मैं आज की पोस्ट में बताऊंगा..किसे किसे नहीं मिला, वो भी बताऊंगा....और समाज और देश को बेहतर बनाने के लिए हम जहां बैठे हैं वहीं से योगदान दे सकते हैं...आप बस जितने लोगों को जानते हैं...रिश्तेदार और मित्र...सबको अन्याय के बारे में ज़रूर बताया करें...इसी तरह एक-एक कर हमारी सबकी सोच ऐसी होने लगी तो तस्वीर ज़रूर बदलेगी...ये मुझे उम्मीद नहीं यकीन है....

    जय हिंद...

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  19. khne ko kanoon bahut se aur vkil bhut se hain
    shahr 2 men nyayaly bhi kitne khoob bhut se hain
    fir bhi kb ruchika jaisi in knyaon ko nyay mila
    hai kis liye desh ka shasn neta khoob bhut se hain

    snvidhan bhi rota hoga apni is mjboori pr
    jn 2 se jo door ho gya apni is mjboori pr
    khan surkshit laj kisi ki ruchika ek udahrn hai
    kyon kanoon nhi rota hai jnta ki mjboori pr
    dr.vedvyathit@gmail.com

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  20. देश के जनता के रक्षक देश की रक्षा करें ये तो दूर की बात रही आज वो अपने ही रिश्तों के विश्वास का गला घोंट रहे है.. कितना गिरा हुआ कृत्य ..समाज के यह ठेकेदार कब सज़ा पाएँगे..और कब एक आम आदमी चैन से अपने घरों में अपने परिवार के साथ रह पाएगा आज यह सब प्रश्न बन गये है जिसका उत्तर किसी के पास नही है..आख़िर यह सब कब तक चलेगा आदमी के आदमी पर से विश्वास उठ गया है आख़िर सब जाए तो कहाँ न्यान की तलाश में..भाई खुशदीप जी मैं कायल हूँ आपके इस मुहिम का इंसानियत को बेपर्दा करने वालों को इस तरह बेनकाब करने की मुहिम सफल हो और भगवान करें रुचिका के परिवार को उचित न्याय मिल सके...धन्यवाद भाई

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  21. इस राठौर को तो तभी गोली मार दी जानी चाहिए थी....

    नेता... गुण्डे और पुलिस...सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैँ...

    इन जैसों की ही वजह से आम आवाम परेशान है..इसीलिए तो मेरा भारत महान है

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  22. निर्मला कपिला जी व राजीव तनेजा जी से सहमत।

    जय हिंद...

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