गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

"हम क्यों नहीं मरते"...खुशदीप

संसद से सड़क तक महंगाई का शोर है...एक दिन पहले...कांटा लगा, हाय लगा...में मैंने कोशिश की थी ये बताने कि महंगाई की जड़ कहां है...आज उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए बताता हूं कि महंगाई आखिर है किसके लिए...नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन जब पांच साल के थे तो उन्हें एक सवाल ने वो अर्थशास्त्री बना दिया, जिनका लोहा पूरी दुनिया मानती है...दरअसल जब अमर्त्य सेन छोटे थे तो उसी वक्त बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था...हज़ारों हज़ार लोग बेवक्त काल के मुंह में समा गए थे...गांवों से लोग अन्न की तलाश में पलायन कर रहे थे...कई लोग सड़कों पर ही दम तोड़ रहे थे...ये देखकर नन्हे अमर्त्य सेन अपने घर वालों से सवाल पूछा करते थे कि अकाल से लोग मर रहे हैं तो हमारे घर पर कोई क्यों नहीं मर रहा...ज़ाहिर है अमर्त्य सेन का परिवार खुशहाल था...अकाल के बावजूद घर में धन-धान की कोई कमी नहीं थी...बस इसी फर्क से अमर्त्य सेन को अपना जवाब मिल गया...मौतें अकाल से नहीं अनाज के असमान बंटवारे की वजह से हो रही हैं...जिनके पास पैसा है उन्होंने ज़रूरत से ज़्यादा अनाज घर में भर रखा है...और जिनके पास पैसा नहीं है, उनके घर में खाने को अन्न का दाना तक नहीं है...ये तो रही सात दशक पहले की बात..

अब आता हूं आज पर...विपक्ष के सांसदों ने संसद में सरकार को घेरते हुए कहा कि आम आदमी महंगाई से मरा जा रहा है और सरकार उसे राहत दिलाने के लिए कुछ नहीं कर रही है...कमाल देखिए जिस वक्त दिल्ली में कांग्रेस को घेरा जा रहा था ठीक उसी वक्त दिग्विजय सिंह और रीता बहुगुणा जोशी की अगुआई में कांग्रेसी लखनऊ में मायावती सरकार के खिलाफ नारे लगाकर-लगाकर ज़मीन आसमान एक कर रहे थे...मुद्दा यहां भी महंगाई था...लेकिन ये किसानों को महंगाई से राहत दिलाने के लिए मायावती सरकार से गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग कर रहे थे...इन दो उदाहरणों से मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूं कि विपक्ष दिल्ली में केंद्र को घेरता है तो वही केंद्र लखनऊ जाकर ऐसे विरोधी दल को घेरता है जिसकी यूपी में सरकार है...ज़ाहिर है इस चूहे-बिल्ली के खेल का मकसद अपने-अपने राजनीतिक हितों को साधना है...आम आदमी या किसान को तो इस खेल में बस एक ज़रिेए की तरह ही इस्तेमाल किया जाता है...अगर सच में ऐसे नहीं होता तो लोकसभा में करोड़पति सांसदों की भरमार नहीं होती...


(साभार- सुभानी)



खास और आम का फर्क

2004 में लोकसभा में 29 फीसदी यानि कुल 156 सांसद करोड़पति थे...2009 में करोड़पति सांसदों की संख्या 305 यानि सदन के कुल सांसदों की 59 फीसदी हो गई...दूसरी ओर देश में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोग 2004 में 31 फीसदी थे जो 2009 में बढ़कर 37 फीसदी हो गए...


2004 में सांसदों की औसत संपत्ति 1.86 करोड़ थी जो 2009 में बढ़कर 5.33 करोड़ हो गई...दूसरी ओर देश में 2004 में प्रति व्यक्ति आय 2475 रुपये थी जो 2009 में बढ़कर 2962 रुपये के स्तर पर ही पहुंची...


97 फीसदी सांसदों की संपत्ति दस लाख या ज्यादा है, वहीं देश की 77 फीसदी आबादी 20 रुपये दिहाड़ी पर गुज़ारा करती है...

उत्तर प्रदेश पिछड़ा हुआ राज्य माना जाता है इसलिए यहां महंगाई का असर घर-घर में देखा जा रहा है...लेकिन त्रासदी देखिए कि लोकसभा में सबसे ज़्यादा 52 करोड़पति सांसद यूपी से ही आते हैं...

महाराष्ट्र में दुनिया के सबसे ज़्यादा शहरी गरीब हैं लेकिन महाराष्ट्र के 75 फीसदी सांसद यानि 48 में से 38 करोडपति हैं...

हरियाणा के नब्बे फीसदी लोकसभा सांसद यानि नौ सांसद और पंजाब के 100 फीसदी यानि 13 के 13 लोकसभा सांसद करोड़पति हैं...दिल्ली के भी सातों सांसद करोड़पति हैं...


अब थोड़ी पार्टियों की भी बात कर ली जाए...कांग्रेस आम आदमी का नारा पूरी ताकत से बुलंद करती है...लोकसभा में कांग्रेस के 146 सांसद करोडपति हैं...

बात-बात पर नैतिकता की दुहाई देने वाले सबसे बड़े विरोधी दल बीजेपी के 59 सांसद लोकसभा में करोड़पति हैं..

लोहिया की सादगी के मंत्र का जाप करने वाली समाजवादी पार्टी के लोकसभा में 14 सांसद करोड़पति हैं

दलितों की मसीहा कहलाने में फख्र करने वाली बीएसपी के लोकसभा में 13 सांसद करोड़पति हैं...

डॉ अमर्त्य सेन ने बचपन में घर वालों से सवाल पूछा था कि अकाल से उनके घर में मौत क्यों नहीं होती...आज मैं अमर्त्य सेन जी से फिर सवाल करना चाहता हूं कि महंगाई का असर हमारे माननीय सांसदों पर क्यों नहीं होता..क्यों महंगाई सिर्फ गरीबों के लिए ही अकाल बन कर आती है...रहा आम आदमी...वो तो अधर में लटका हुआ है...न पूरी तरह मर रहा है और न ही जी पा रहा है...


स्लॉग ओवर

एक कंजूस व्यापारी के दादाजी की मौत हो गई...वो अखबार में शोक विज्ञापन देने के लिए गया...उसने विज्ञापन दिया...दादाजी खत्म....अखबार के स्टॉफ ने कहा...इतना छोटा विज्ञापन हम स्वीकार नहीं करते, कम से कम पांच शब्द विज्ञापन में होने चाहिए...कंजूस व्यापारी ने बिना एक मिनट गंवाए कहा...दादाजी खत्म, व्हील चेयर बिकाऊ...

28 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल सही विष्लेषण। उत्पादन के असमान वितरण को दुरुस्त करने की युक्ति तलाश करनी होगी।

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  2. आज के दिन की शुरुआत ही आर्थिक असमानता पर सोचते हुए हुई थी। इसे दूर करने के लिए कुछ शेखचिल्ली जैसे विचार दिमाग आए थे। सोचा लिखूं, पर लगा कि कोई फायदा नहीं, बेहतर होगा कि शेखचिल्ली पर लिखूं तो ज्यादा फायदा होगा।
    बहुत अच्छी पोस्ट है। कुछ वक्त पहले ही दफ्तर से लौटा हूं। खबर लगाई है कि चंडीगढ़ में प्रतिव्यक्ति औसत आय एक लाख रूपए से ऊपर है। फिर गोवा, फिर दिल्ली में शायद पिचहत्तर हजार है। बिहार में यह बारह हजार पर पहुंचती है। शहरी लोगों की आय की तुलना ग्रामीणों से की जाए। औसत कहां ठहरता है, वो आपने बता ही दिया है। हालांकि इसमें कुछ गड़बड़ी है। बीते सालों में यह चार हजार तक जा पहुंचा था। असलियत क्या है? जो भी हो, है तो बहुत कम।

    बेशर्म लोग हैं हम। बातें अच्छी करते हैं। बड़ी मेहनत से जो लोग नेता बनते हैं, मौका मिलते ही उनकी ओर सवाल उछाल देते हैं। हम खुद तो चाकरी में मगन हैं।

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  3. अच्छा और सशक्त विश्लेषण किया है आपने. मंहगाई, अकाल, बाढ, सूखा सब कुछ एक वर्ग़ के लिये ही है. बाकी तो अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं

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  4. इस चूहे-बिल्ली के खेल का मकसद अपने-अपने राजनीतिक हितों को साधना है..बिल्कुल सही. बढ़िया विश्लेषण!!


    -बेहतरीन स्लॉग ओवर!! :)

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  5. खुशदीप जी,
    आपका नाम बहुत सोच समझ कर रखा गया है...हमेशा आप खुश ही कर देते हैं...और एक हमारा नाम ...कभी औकात में आते ही नहीं है हम ....हां नहीं तो...
    जब भी आप कुछ लिखते हैं पुख्ता...और डाटा के साथ...
    अब इतने करोडपति देखकर कैसा लगेगा...आपसे कब से कहा है चलिए पोलिटिक्स ज्वाइन करते हैं लेकिन आप माने तब न...
    एक और जबरदस्त आलेख ...सामान्यज्ञान में अच्छा खासा इजाफा करता हुआ..
    बधाई आपको...
    -बेहतरीन स्लॉग ओवर!! :)

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  6. खुशदी्प भाई-- ये नेता खत्म,मंहगाई खत्म, चेयर बिकाऊ...
    चेयर मीन सिंहासन लुट्टिसी।
    ये सु्बह कभी तो आएगी?

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  7. मंहगाई का अच्छा विश्लेषण किया है।
    हमारी प्रोब्लम यही है की हमारी अर्थ व्यवस्था , एक रेखा की तरह है।
    यानि दोनों दिशाओं में बढ़ रही है।
    और हम बिंदु पर खड़े खड़े बस देख रहे हैं।

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  8. काश कि हम भी नेता बन पाते कम से कम ये तो देख लेते कि करोड की रकम कओसे सम्भाली जाती है। आपकी पोस्ट का शीर्शक देख कर तो कई बार डर ही जाती हूँ भाई हमे नहीं मरना अभी चाहे कितनी भी भुखमरी हो इतना भार इसी लिये तो बढाया है भुखमरी मे कुछ कम भी हो गया तो क्या फर्क पडता है। वैसे आपके आँकडे देख कर लगता है अगले चुनाव तक सभी नेता करोडपति बन जायेंगे। पता नहीं इन लोगों को शर्म क्यों नहीं आती कि उन की करतूतों से लोग भूखे मर रहे हैं ये विकास का पैसा ही तो है जो इन के बैंकों मे जमा होता है । गरीबों के नाम पर लूट मचा रखी है इन लोगों ने। क्या कोई विकल्प है? हर पार्टी हर नेता एक जैसे ही हैं। हे राम इन सब को उठा ले। सुबह सुबह ये कहना भी कितना मुश्किल लगता है। धन्यवाद्

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  9. "...ज़ाहिर है इस चूहे-बिल्ली के खेल का मकसद अपने-अपने राजनीतिक हितों को साधना है..."


    राजनीति हित?

    नहीं जी सिर्फ स्वार्थ साधना है।

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  10. सहगल साहब, लिखना तो लेख चाह रहा था किन्तु उसी से सम्बंधित आपका लेख देखा तो सोचा टिप्पणी ही डाल देता हूँ ! सच में देश के अन्दुरूनी हालत बहुत भयावह है, प्रशाशन और जबाब देह नाम की कोई चीज ही नहीं रह गई इस देश में ! आजकल इन केंद्र में बैठे पिट्ठालूओ ने बस एक राग अलापना सीख लिया है कि हम तो राज्य सरकारों को कहते है मगर कोई सहयोग ही नहीं करता ! इन्हें कौन पूछे कि अब अगर सब कुछ तुमने राज्य सरकारों के ऊपर ही डालना है तो तुम्हारी केंद्र में जरुरत क्या है खाम खा देश के पैसे को बट्टे खाते में डाल रहे हो ? दूसरी तरफ क्या यह इनकी नाकाबिलियत को नहीं उजागर करता ? पर बात वही है कि इन्होने शर्म तो बेच खाई है ! पिछले छह दशकों से लाल किले की प्राचीर से लेकर जिला मुख्यालयों में शासन-प्रशासन की ओर से जनहित में तकरीरे गूंजती रहीं, कल्याणकारी घोषणाएं होती रहीं, ग्रामीण क्षेत्रों की बड़ी आबादी आज भी भय, भूख और भ्रष्टाचार की बेड़ी में जकड़ी हुई है! सरकारी योजनाओं पर ठेकेदारों-बिचौलियों का राज है! नतीजतन मजदूर नरेगा जैसी योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण पलायन को विवश हो रहे है, तो वन्य जीवन जी रहे पहाड़िया जैसी आदिम जनजाति विलुप्त होने के कगार पर है! और बहरहाल विकास की लंबी छलांगें मारने वाले इंडिया की चमक को खोखला साबित किये दे रही है! लूट-खसोट की बह रही बयार में जब आम लोगों के हक छीने जा रहे हों तो देश के ग्रामीण अन्दुरूनी इलाको में विकास की किरणें पहुंचने की कल्पना कैसे की जाय? इनके नाम पर चलायी जा रही योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है! और भय, भूख भ्रष्टाचार और जल, जंगल, जन, जीमीन का राग अलापने वाले रहनुमाओं की संवेदनाएं सिर्फ चुनावी हथकंडा मात्र रह गई है ! सरकारी स्कूलों में ताले लगे है, स्वास्थ्य केन्द्रों उपकेन्द्रों पर चिकित्सक या चिकित्सा कर्मी नदारद रहते है, आंगनबाड़ी केन्द्रों में कागज पर पोषाहार वितरण हो रहा है! नतीजतन न ज्ञान के दीये जल पा रहे और न कुपोषण से मुक्ति मिल पा रही है! और ये सफ़ेद हाथी सरकारी तिजोरियों के ऊपर बैठ चूहे बिल्ली का खेल खेल रहे है ! देश दयनीय स्थिति में पहुँच गया है !

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  11. सही और सटीक विश्लेषण, स्लाग ओवर तो गजब का है.

    रामराम.

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  12. बिलकुल सही विष्लेषण। बढ़िया पोस्ट।

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  13. "आम आदमी महंगाई से मरा जा रहा है"

    खुशदीप और खुशहाल ऐसे कारणों से नहीं मरते :)

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  14. खुशदीप भाई,
    आज भी जब गांव जाता हूं तो देखता हूं कि बहुत से परिवारों की स्थिति बिल्कुल वैसी ही है जैसी मैं उन्हें पिछले उतने समय से देखता आ रहा हूं जब से होश संभाला है जबकि दिल्ली में मेट्रो और भारत के चांद पर पहुंचने की धूम सारी दुनिया में सुनाई दे रही है । सोचता हूं कि यदि उसे बता भी दूं कि देखो हम चांद पर पहुंच गए हैं तो क्या उसके पेट की भूख को थोडी सी भी राहत मिलेगी या वो यही सोचेगा कि झाजी आज पागलों की तरह क्यों बतिया रहे हैं । जब तक गांव में ये स्थिति बनी रहेगी ..मुझे कभी इन करोडपतियों का डाटा अच्छा नहीं लगेगा ....रही बात महंगाई की तो उसका असर भी देखना हो तो वहीं चला जाए ॥आपका आलेख बहुत अच्छा है हमेशा की तरह ..और स्लौग ओवर भी एक सच के करीब ....

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  15. जय हो स्लोग ओवर की...बाकि की पोस्ट तो खैर लाजवाब थी ही...
    नीरज

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  16. सही कहूं, तो अच्छा विश्लेषण..

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  17. अमर्त्य सेन का सवाल आज भी प्रासंगिक है।
    -अच्छा विश्लेषण।

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  18. स्लॉग ओवर लाजवाब था, बहुत उम्दा

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  19. मरे हुए दुबारा नही मरते . और क्या भुखे नंगे सांसद हमारा भला कर सकते है .

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  20. देश की विकास की गति का क्या आकड़ा प्रस्तुत किया आपने..कमाल खुशदीप जी..
    यह सब जनता के लिए है इस पर बड़े लोगों की नज़र ही नही पड़ती हैं...बढ़िया चर्चा..धन्यवाद

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  21. मेरा भारत महान!!!!!!

    वाह!क्या विकास की गति है।

    बेह्तरीन लेख पूरे सटीक आंकड़ों के साथ। आप की खूबी यही है जो भी कहते हैं शान से कहते हैं यानी फ़ुलप्रूफ़।

    ईश्वर करे इन् बेशर्म सांसदों और सरकार के कानों पर जूं रेंग ही जाये...सिर्फ अपना स्वार्थ साधना बन्द करें और कुछ जनता के बारे में सोचना शुरू करें.....इसी उम्मीद पर.....

    तुआढ़े स्लाग ओवर दा ते जवाब ही नहीं!

    जय हिन्द

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  22. अच्छा विवरण दिया। वो व्हील चेयर बिकी कि बची?

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  23. महागुरुदेव अनूप शुक्ल जी,

    वो व्हील चेयर तो इलाहाबाद वाले खरीद कर ले गए थे...ब्लॉगर सम्मेलन के बाद ज़रूरत पड़ी थी न...

    जय हिंद...

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  24. यह बात तो सही है कि समाज में wealth का distribution even नहीं है.....


    स्लोग ओवर हमेशा कि तरह ज़बरदस्त.....

    जय हिंद....

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  25. इन नेताओं को तो चौराहे पे खड़ा कर के..... ढिच्चकियाऊँ....ढिच्चकियाऊँ...
    लेकिन इससे भी क्या होगा?... इनकी नई पौध फिर सर उठा के खड़ी हो जाएगी...
    :-(
    इनका समूल नाश कर देश की राजनीति और यहाँ के कानूनों में आमूल-चूल परिवर्तन करने पड़ेगे...तभी कुछ फर्क पड़ेगा और वो दिखाई भी देगा क्योंकि अभी तो यहाँ किसी को कानून का कोई डर ही नहीं है

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  26. अरे!...ये क्या?...आपके स्लॉग ओवर की बात करना तो मैँ भूल ही गया...


    मस्त..... :-)

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