शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

1957 और 2009 का फ़र्क...खुशदीप

आते है लोग, जाते है लोग, पानी में जैसे रेले,
जाने के बाद, आते हैं याद, गुज़रे हुए वो मेले...
यादें मिटा रही है. यादें बना रही है,
गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है,
चलना ही ज़िंदगी है, चलती ही जा रही है...
देखो वो आ रही है...देखो वो जा रही है...

गाड़ी बुला रही है...
(इस गाने को ज़रूर लिंक पर सुनिए-देखिए)

ये गाना है सत्तर के दशक में आई धर्मेंद्र की फिल्म दोस्त का.. क्या हमारे जीवन का सार भी इसी गाने में नहीं छिपा है...एक रिले रेस की तरह जीवन की इस दौड़ में हम भाग रहे हैं...अपना चक्कर पूरा हो जाएगा तो हम हाथ में पकड़ा बेटन अगली पीढ़ी को थमा कर अलग हो जाएंगे...फिर वो पीढ़ी दौड़ेगी...इसी क्रम को दोहराने के लिए...ये सिलसिला चलता रहता है...अनवरत..

फिल्म इंडस्ट्री में भी न जाने कितने कलाकार आए...और कितने चले गए...सूरज की तरह चमके और फिर वक्त की धुंध में खो गए...संसार की हर शह का इतना ही फ़साना है, इक धुंध से आना है, इक धुंध में जाना है...लेकिन जीवन के इस शाश्वत सच में भी कुछ ऐसे नाम है जो वक्त गुज़रने के साथ पुरानी शराब की तरह हमारे दिलो-दिमाग पर और गहराते गए...ऐसा ही एक नाम है गुरुदत्त का...गुरुदत्त को दुनिया को अलविदा कहे साढ़े चार दशक से ज़्यादा बीत गए हैं...लेकिन उनका ऑरा विलुप्त नहीं हुआ...

आज इस पोस्ट में सिर्फ दो तस्वीरों से 1957 और 2009 के फ़र्क को समझिए...अगर कुछ पकड़ में आए तो मुझे बताइएगा ज़रूर...

                          पहला दृश्य...


1957


                            दूसरा दृश्य


2009

एक ही पोज़...बस तस्वीरों में 1957 में रिलीज़ प्यासा के गुरुदत्त और वहीदा रहमान की जगह 2009 के आमिर खान और कैटरीना कैफ़ के चेहरे आ गए हैं...लेकिन क्या 2009 के मार्केटिंग के दौर की पहचान आमिर खान और कैटरीना कैफ की तस्वीर में वो सच्चाई, वो पाकीज़गी, वो इंटेन्सिटी है जो 1957 के गुरुदत्त और वहीदा रहमान में दिखती है...

आमिर और कैटरीना ने ये पोज़ सिने ब्लिटज मैगजीन की गोल्डन जुबली होने पर कवर के लिए खास तौर पर दिया...या यूं कहे कि इस पोज़ को गढ़ा गया...आमिर की प्रतिभा पर किसी को शक नहीं है...लेकिन मार्केट के लिए गढ़ा जाना आमिर की मजबूरी है...और गुरुदत्त जो करते थे वो खुद ही लोगों के दिल में गढ़ गया...बिना मल्टीप्लेक्स के अर्थशास्त्र के...

गुरुदत्त पर गंभीर स्लॉग ओवर

ज़माने ने मारे जवां कैसे-कैसे,
ज़मीं खा गई, आसमां कैसे कैसे...

25 टिप्‍पणियां:

  1. ज़माने ने मारे जवां कैसे-कैसे,
    ज़मीं खा गई, आसमां कैसे कैसे..

    ये पंक्तियां दिल को छु गयी, असर रहेगा देर तक्,

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  2. खुशदीप जी इस फर्क के बारे मे इतना ही कह सकते हैं कि तब प्यार इबादत हुया करता था आज ये कम्भख्त, कमीना हो गया है। इन लोगों की बात ही अलग थी अम्दाज़ ही अलग था।दोनो तस्वीरों के चेहरे की मासूमियत और सच्चाई मे फर्क है । एक बात है आपको गीत बहुत याद रहते हैं आप कई ब्लाग्स पर कमेन्ट मे भी अच्छे अच्छे गात लिखते हैं आज की पोस्ट बहुत अच्छी लगी बधाई

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  3. रंग भर गए..नजाकत खत्म हो गई..

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  4. आप बना सकते हैं तस्वीर भी और मूरत भी
    ज्यादा जवाँ और ज्यादा खूबसूरत भी
    पर जो दिल है,
    जो जाँ है,
    कहाँ से लाएँगे

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  5. मेरी तुच्छ बुद्धि के अनुसार तो यह आज के लोगों का मानसिक दिवालियापन ही है। कुछ नया कर पाने लायक कल्पनाशक्ति नहीं रह गई है आज इसलिये पुराने से चोरी कर लेने की आदत बन गई है।

    एक डाकू क्या करता है? केवल दूसरों की संपत्ति को लूट खसोट कर अपना करार देने के सिवाय वो कुछ कर ही नहीं सकता क्योंकि उसके पास इतनी बुद्धि और योग्याता होती ही नहीं है कि कुछ ऐसा बनाने के लिये कि जिसे वह अपना कह सके। आज पुराने लोगों की थीम्स को चुराने वाला, पुराने गानों का रीमिक्स बनाने वाला भी लुटेरों की श्रेणी का ही व्यक्ति है। उसके भीतर इतनी कल्पनाशीलता तो होती ही नहीं है कि कोई नई यादगार वस्तु का निर्माण कर सके, हाँ, उसके पास शक्ति अवश्य इतनी होती है कि दूसरों की चीजों को लूट ले। और रीमिक्स के मामले में दूसरों की रचना को विकृत भी कर देता है।

    जरा ध्यान से सोचिये, पुराने लोकप्रिय गीतों की रचना का श्रेय किसी एक व्यक्ति ने कभी भी नहीं लिया क्योंकि वे गीत सामूहिक परिश्रम के परिणाम थे। आज भी यदि आप में से किसी के पास पुराने गीतों के रेकार्ड (लाख या प्लास्टिक का तवा) तो आप उस पर छपे हुये विवरण में पढ़ सकते हैं कि गायक/गायिका - अबस, संगीत निर्देशक - कखग, गीतकार - क्षत्रज्ञ आदि आदि इत्यादि। मेरे कहने का मंतव्य यह है कि एक फिल्मी गीत की संरचना किसी एक व्यक्तिविशेष की नहीं होती।

    फिर इतने लोगों के परिश्रम से बनी संरचना को मनमाने रूप में बदल देने का अधिकार किसी को कैसे प्राप्त हो सकता है?

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  6. खुशदीप जी,
    इन दोनों तस्वीरों में बस इतना ही फर्क है....जो ओरिजिनल certificate और फोटोकॉपी में होता है...
    और बात रही आपकी पोस्ट की तो....आप पता कहाँ कहाँ ऐसे ideas लाते हैं ....एक हम हैं की ले-दे के अपनी कविताओं में ही मगज मारी करते रहते हैं...आज की पोस्ट बहुत ही रेफ्रेशिंग लगी....मुबारकाँ....!!!

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  7. और हाँ जाना तो सबको है...अगर जो कहीं हम फुर्ती से कभी निकल लिए तो कह देते हैं.......
    नाम गुम जाएगा, चेहरा नज़र नहीं आएगा.....पर मेरी कई पोस्ट पर मेरी आवाज़ है ....गर याद रहे.....:)

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  8. एक प्यार का नगमा है मौजों की रवानी है , दूसरे के बारे में पता नहीं

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  9. कटरीना में तो नहीं ... आमिर में जरूर दिख रही है... मैं तो कहूँगा आमिर केमेस्ट्री ज्यादा बिठाने की कोशिश कर रहे हैं.

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  10. .
    .
    .
    "आते है लोग, जाते है लोग, पानी में जैसे रेले,
    जाने के बाद, आते हैं याद, गुज़रे हुए वो मेले...
    यादें मिटा रही है. यादें बना रही है,
    गाड़ी बुला रही है, सीटी बजा रही है,
    चलना ही ज़िंदगी है, चलती ही जा रही है...
    देखो वो आ रही है...देखो वो जा रही है..."

    खुशदीप जी,

    चलना ही ज़िंदगी है, चलती ही जा रही है...
    यही सत्य है।

    रही बात नॉस्टेल्जिया की... तो २०५९ में फिर कोई खुशदीप अपने ब्लॉग में कर रहा होगा यह सवाल:-

    लेकिन क्या 2059 के मार्केटिंग के दौर की पहचान 'भविष्य दत्त' और 'आगामी रहमान' की तस्वीर में वो सच्चाई, वो पाकीज़गी, वो इंटेन्सिटी है जो 2009 के आमिर खान और कैटरीना कैफ में दिखती है...???

    और मेरे जैसे फिर वही जवाब देंगे... जो मैं आज दे रहा हूँ... कैमरा एंगल, लाईट-शेड का संयोजन, फोकस, स्टाइलिंग और कलर आदि के बारे में पूछो तो कुछ कहा भी जाये, पर पाकीजगी, सच्चाई और इन्टेन्सिटी जैसी चीजें एक फोटो में कैसे देखी जा सकती हैं?

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  11. तब होठ सिले थे
    अब होठ खुले हैं

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  12. तू औरत है, वो महबूबा
    तू सब कुछ है, वो कुछ भी नही

    शायद यही फर्क होता है, ओरिजिनल और डुप्लीकेट में।

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  13. अगर आज गुरुदत्तजी होते, तो कहते क्या इसी के लिए मैं आत्महत्या कर रहा था :)

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  14. गुरुदत्त जैसे शक्स हमेशा याद आते रहेंगे जी सादगी और संजीदगी उनके अभिनय में दिखाई देती थी वा बड़ा ही मुश्किल है वैसे भी सबका अपना अपना अंदाज होता है....

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  15. दोनो चित्रो मै यही फ़र्क है कि गुरु दत्त जी का चित्र किसी की नकल नही उन के अपने दिमाग की खोज है ओर आज कल के काला कार सिर्फ़ ओर सिर्फ़ नकल करते है या पुरानी चीजो को खराब करते है जेसे पुराने सदा बहार गीत उस मै भीअपनी नालायकी घुसेड देते है, क्यो कि इन काला गारो के पास दिमाग तो है नही जो बुजुर्गो की चीज को समभल कर रख सके.
    जिन लोगो को मै दिल से पसंद करताहुं उन मै से एक है गुरु दत्त जी.
    धन्यवाद

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  16. Q-क्या 2009 के मार्केटिंग के दौर की पहचान आमिर खान और कैटरीना कैफ की तस्वीर में वो सच्चाई, वो पाकीज़गी, वो इंटेन्सिटी है जो 1957 के गुरुदत्त और वहीदा रहमान में दिखती है?
    jawab--nahin dikhayee deti.

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  17. उस समय के प्यार में ...जो मोहब्बत...जो शिद्दत झलकती थी ...वो आजकल कहाँ?

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  18. ……………………के खूश्बू आ नही सकती बनावट के फ़ुलों से।

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  19. उत्सुक्ता तो है ही इस नये प्रयास को देखने की..हालांकि सब जानते हैं..फिर भी उत्सुक्तावश ही इनका काम तो हो ही जायेगा.

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  20. तस्वीरें एक सी वो सादगी और पाकिज़ी कहाँ से लायेंगी ...
    बहुत ही दार्शनिक पोस्ट लिखी है आज ...वैसे ही वैराग्य का भूत चढ़ा है लोगो पर ...छोटी सी उमर में ही लग गया रोग ...!!

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  21. जो गढ़ा गया है वह तो नज़र आता है लेकिन जो अनगढ है वह भी गढ़ा गया है इसीलिये तो यह कला है अभिनय कला ।

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  22. Khus rahne wale sahgal ji......Ek Bada fark hai......
    gurudutt ke samne unka pyar hai....

    amir ke samne Salman ka......

    Nakal to khar hogi hi......

    bandar hamare purvaj they akhir........

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  23. waqt ke sath sath cheejein badal jaati hain aur ham aksar badlaav ko sweekaar nahi kar paate... agar koi sonu nigam kisi rafi ki tarah gata hai to ham use nakal batate hain aur nahi gaata to kahte hain ki usmein wo baat nahi hai... kaise hogi? aadmi alag hai to baat bhi alag hogi... aaj ham agar ye kahte hain ki "JAANE WO KAISE LOG THE" to kal ham hi kahenge, "BAHTI HAWA SA THA WOH"... har nayi cheej buri ho, jaruri nahi... kala ko samman dein...

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