शनिवार, 14 नवंबर 2009

ब्लॉगिंग की 'काला पत्थर'...खुशदीप

जब दो बड़े बात करते हैं तो छोटों को चुप रहना चाहिए...संस्कार ने हमें यही सिखाया है...यकीन मानिए यही मेरी दुविधा है...और शायद आज की पोस्ट लिखनी जितनी मेरे लिए मुश्किल है, उतनी जटिल स्थिति में अपने को लिखते हुए कभी नहीं पाया...फिर भी कोशिश कर रहा हूं...अपनी तरफ से पूरा प्रयास है कि शब्दों का चयन सम्मान के तराजू में पूरी तरह तौल कर करूं...फिर भी कहीं कोई गुस्ताखी हो जाए तो नादान समझ कर माफ कर दीजिएगा...आखिर मुझे ये लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ी, इसके लिए जिन ब्लॉगर भाई-बहनों ने कल की मेरी पोस्ट नहीं पढ़ी, उसका लिंक यहां दे रहा हूं...

आज मैं चुप रहूंगा...खुशदीप
http://deshnama.blogspot.com/2009/11/blog-post_14.html

अब आता हूं उस पर जो मन में उमड़-घुमड़ रहा है...बस उसी को पूरी ईमानदारी के साथ आप तक पहुंचा रहा हूं...मैंने इस साल 16 अगस्त से ब्लॉग पर लिखना शुरू किया ..कुछ ही दिन बाद ये पोस्ट लिखी ...

हिंदी ब्लॉगिंग के टॉप टेन आइकन
http://deshnama.blogspot.com/2009/09/blog-post_11.html

हां, वो मेरे आइकन हैं...
http://deshnama.blogspot.com/2009/09/blog-post_14.html

मेरी उस फेहरिस्त में अनूप शुक्ल जी भी हैं और गुरुदेव समीर लाल जी समीर भी...ये मेरी अपनी पसंद है...ये मेरे अपने आइकन है....मैंने एक प्रण लिया...जिस तरह का स्तरीय और लोकाचारी लेखन मेरे आइकन करते हैं...उसी रास्ते पर खुद को चलाने की कोशिश करूंगा...अगर एक फीसदी भी पकड़ पाया तो अपने को धन्य समझूंगा...धीरे-धीरे ब्लॉगिंग करते-करते मुझे तीन महीने हो गए...इस दौरान दूसरी पोस्ट और टिप्पणियों को भी मुझे पढ़ने का काफी मौका मिला...जितना पढ़ा अनूप शुक्ल जी और गुरुदेव समीर के लिए मन में सम्मान और बढ़ता गया...लेकिन एक बात खटकती रही कि दोनों में आपस में तनाव क्यों झलकता है...या वो सिर्फ मौज के लिए इसे झलकते दिखाना चाहते हैं....क्या ये तनाव ठीक वैसा ही है जैसा कि चुंबक के दो सजातीय ध्रुवों के पास आने पर होता है...जितना इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की, मेरे लिए उतनी ही ये रूबिक के पज्जल की तरह विकट होती गई...जैसा पता चलता है कि समीर जी भी शुरुआत में चिट्ठा चर्चा मंडल के साथ जुड़े रहे....किसी वक्त इतनी नजदीकी फिर दूरी में क्यो बदलती गई...

बीच में बबली जी की पोस्ट को लेकर एक विवाद भी हुआ...पता नहीं ये नियति थी या क्या, उस प्रकरण में बबली जी की पोस्ट पर टिप्पणियां देने वालों में मुझे भी कटघरे में खड़ा होना पड़ा...उसी प्रकरण में मैंने अपनी पोस्ट पर गुरुदेव समीर जी को अपनी टिप्पणी में पहली बार खुलकर दिल की बात कहते देखा...

हां, मैं हूं बबली जी का वकील...
http://deshnama.blogspot.com/2009/09/blog-post_18.html

ये प्रकृति का नियम है कि दो पत्थर भी टकराते हैं तो चिंगारी निकलती है...फिर जब दो पहाड़ टकराए तो ज़लज़ला आने से कैसे रोका जा सकता है....हो सकता है ये तनाव की बात मेरा भ्रम हो...जैसा कि कल कि मेरी पोस्ट पर सागर, अनिल पुसदकर जी और सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी ने मुझे आगाह भी किया कि ये दोनों दिग्गज लंबे अरसे से मौज के लिए एक दूसरे की टांग खींचते रहे हैं लेकिन आपस में दोनों एक दूसरे के लिए अपार स्नेह रखते हैं...अगर ये बात सही है तो ऐसा कहने वालों के मुंह में घी-शक्कर...भगवान करे मेरा भ्रम पूरी तरह गलत निकले...

दीपक मशाल भाई ने मुझे अपनी टिप्पणी में लिखा कि मैं तो ऐसा न था...मैं मुद्दे उठाने की जगह ये विवाद को तूल कैसे देने लगा...मैं जानता हूं दीपक मुझे दिल से अपने करीब मानता है...मैं गलतफहमी में ऐसा कुछ न लिख दूं...जिससे मुझे नुकसान उठाना पड़े...बस इसी से रोकने के लिए उसने मुझे ऐसा लिखा...समीर जी और अनूप जी की टिप्पणियां सिर्फ निर्मल हास्य के चलते थी...इसके लिए दीपक ने समीर जी की इस टिप्पणी का हवाला भी दिया...

अरे अरे, भई उ त मजाक किये थे...काहे एतन गंभीर हो गये!!

मैं जानता हूं समीर जी ने बड़े सहज और निश्चल भाव से मेरे लिए अपनी पोस्ट में ये टिप्पणी की थी...बहुत सही पकड़ा खुशदीप...यही तो वजह है कि तुम... :)

ये भाव ठीक वैसा ही था जैसा कि गुरु और शिष्य के बीच होता है....समीर जी की इसी टिप्पणी पर अनूप शुक्ल जी ने उसी पोस्ट पर टिप्पणी की और फिर अपनी पोस्ट...

मन पछितैहै अवसर बीते
http://chitthacharcha.blogspot.com/2009/11/blog-post_12.html में लिखा-


समीरलाल आजकल घणे आध्यात्मिक होते जा रहे हैं। उनके लेखन का स्तर ऊंचा हो गया है और वे अब इशारों में बात करने लगे हैं। आज देखिये उन्होंने क्या पता-कल हो न हो!!-एक लघु कथा के माध्यम से सीख दी कि -जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता-कल हो न हो!!


इस समीर संदेश को पकड़ा खुशदीप सहगल ने और कहा


कल क्या होगा, किसको पता


अभी ज़िंदगी का ले ले मज़ा...


गुरुदेव, बड़ा गूढ़ दर्शन दे दिया....क्या ये पेड़ उन मां-बाप के बिम्ब नहीं है जिनके बच्चे दूर कहीं बसेरा बना लेते हैं....साल-दो साल में एक बार घर लौटते हैं तो मां-बाप उन पलों को भरपूर जी लेना चाहते हैं,,,,


समीरलालजी ने खुशदीप की बात को सही करार दिया और कहा- बहुत सही पकड़ा खुशदीप...यही तो वजह है कि तुम... :) अब इस पकड़म-पकड़ाई में हम यह समझ नहीं पा रहे हैं कि तुम और इस्माइली के बीच क्या है? इसे कौन पकड़ेगा? क्या यह अबूझा ही रह जायेगा?

अनूप जी की इस पोस्ट पर समीर जी की टिप्पणी थी-

हा हा!! बहुत सही टिप्पणी पकड़ लाये यही तो वजह है कि आप...:)


बेहतरीन चर्चा

ये समीर जी की वही शैली थी, जैसी कि उन्होंने मुझे त्वरित टिप्पणी में दिखाई थी...

लेकिन मेरे लिए सबसे अहम और ज़रूरी था, अनूप शुक्ल जी मेरी आज की पोस्ट में क्या कहते हैं...और मैं उनके बड़प्पन की जितनी तारीफ करूं, उतनी कम हैं....उन्होंने ये टिप्पणी भेजी...

खुशदीप जी, यह टिप्पणी मैंने समीरलालजी की टिप्पणी पर की थी। कारण कुछ-कुछ इस चर्चा और इस चर्चा में दिया है! मुझे न इस बारे में कोई शंका है न कोई सवाल। हां आपकी पोस्ट का इंतजार है।

अब अनूप जी ने खुद कहा है कि उन्हें मेरी पोस्ट का इंतज़ार है...ठीक वैसे ही जैसे और ब्लॉगर भाई-बहनों को भी इंतज़ार है....पहली बात तो ये मेरा कल और आज ये पोस्ट लिखने का मकसद कोई हंगामा खड़ा करना नहीं है...मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि अनूप जी और समीर जी हिंदी ब्लॉगिंग के दो शिखर हैं...इन्हें आपस में टकराने की जगह अपने बीच से हिंदी ब्लॉगिंग की बहती धारा को विशाल सागर का रूप देना है...ऐसे मकाम पर ले जाना है कि फिर कोई अंग्रेजी वाला हिंदी ब्लॉगर्स को कमतर आंकने की जुर्रत न कर सके...ये जैसा रास्ता दिखाएंगे, हम नौसीखिए वैसा ही अनुसरण करेंगे...चिट्ठा चर्चाओं के ज़रिए उछाड़-पछाड़ के खेल से हिंदी ब्लॉगिंग में राजनीति के बीजों को पनपने ही क्यों दिया जाए...राजनीति किस तरह बर्बाद करती है ये तो हम पिछले 62 साल से देश के नेताओं को करते देखते ही आ रहे हैं..

और हां दीपक मशाल भाई, क्या हिंदी ब्लॉगिंग की स्वस्थ दिशा और दशा पर सोचना क्या कोई मुद्दा नहीं है...जब अपना घर दुरूस्त होगा तभी तो हम बाहर के मुद्दों पर बात करने की कोई नैतिक हैसियत रखेंगे...ये सब कुछ मैंने इसलिए लिखा क्योंकि टिप्पणी में मेरा नाम आया था...वरना मैं भी शायद चुप ही रहता...

अरे हां याद आया कि मैंने इस पोस्ट का शीर्षक हिंदी ब्लॉगिंग की काला पत्थर क्यों रखा है...दरअसल फिल्मों के जरिए बात कहने में मुझे थोड़ी आसानी हो जाती है...सत्तर के दशक के आखिर में यश चोपड़ा ने एक फिल्म बनाई थी....काला पत्थर...उसमें अमिताभ बच्चन नेवी से बर्खास्त अधिकारी बने थे जो कोयला खदान में आकर काम करने लगते हैं...उसी फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा भी थे जो कोयला खदान के मज़दूर के रूप में खांटी वर्ग की नुमाइंदगी करते थे...अमिताभ और शत्रु दोनों ही जबरदस्त अभिनेता...पूरी फिल्म में दर्शक यही इंतजार करते रहे कि कब अमिताभ और शत्रु आपस में टकराएंगे....मुझे उस सीन पर गूंजने वाली तालियां आज तक याद है जब एक ट्रक पर शत्रु पहले से चढ़े होते हैं...अमिताभ अनजाने में ही उस ट्रक पर चढ़ जाते हैं...शत्रु को पहले से ही पता था कि अमिताभ ट्रक पर चढने वाले हैं और फिर शुरू होती है वही फाइट जिसका दर्शक दम रोक कर इंतज़ार कर रहे थे...ये तो खैर फिल्मी बात थी...लेकिन मुझे अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा दोनों पसंद हैं....मैं यही चाहता हूं कि फिर किसी फिल्म में दोनों साथ-साथ दिखें...मैं यहां ये क्यों कह रहा हूं....क्या ये बताने की ज़रूरत है....

चलो भाई बड़ा अंट-शंट कह दिया...माहौल कुछ सीरियस हो गया है...इसे हल्का करने की भी तो मेरी ज़िम्मेदारी है...तो भईया अपना स्लॉग ओवर किस दिन काम आएगा...

स्लॉग ओवर
एक पति-पत्नी हमेशा आपस में लड़ते झगड़ते रहते थे....इसलिए मैं उनके घर जाने से भी बचा करता था...लेकिन एक दिन बहुत ज़रूरी काम के चलते उनके घर जाना पड़ गया...मैंने देखा वहां शीतयुद्ध के बाद की शांति जैसा माहौल था...मैं चकराया...ये दुनिया का आठवां आश्चर्य कैसे हो गया....मुझसे रहा नहीं गया और मैंने पति महोदय से पूछ ही लिया...आखिर ये क्या जादू हुआ है....पति बोला...जादू वादू कुछ नहीं, हमने सुखी जीवन का फॉर्मूला ढूंढ लिया है...अब हम दोनों हफ्ते में दो बार जोड़े के तौर पर आउटिंग पर जाते हैं....किसी अच्छे रेस्तरां में धीमे-धीमे संगीत और कैंडल-लाइट में डिनर करते हैं...मैं भी खुश और पत्नी भी खुश...मैं मंगलवार को जाता हूं और वो शनिवार को...

26 टिप्‍पणियां:

  1. ये भाई खुशदीप, यहां दोनों अमिताभ हैं और कुछ शत्रुघ्न गुटबाज़ी का चश्मा लगा कर गुट बनाने में तुले हैं। अच्छा हो, कि ब्लागर सभी एक-दूसरे की बात को समझें, सेंस आफ़ ह्यूमर का दामन न छोडें, क्योंकि यहां केवल पढा जाता है, चेहरा सामने न होने से भाव समझने में चूक हो सकती है। दोनों दिग्गजों ने यह बात साफ़ अपनी टिप्पणी में कही ही है। बात को यहीं विराम देना अच्छा रहेगा॥

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  2. Ha ha ha ha ha ha haha........

    aapke slog over ki baat hi alag hoti hai....

    Bhaiya...ek nayi post likhi hai....plz dekhiyega zaroor.....

    JAI HIND,
    JAI HINDI,
    JAI BHARAT..

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  3. खुशदीप भाई, क्यों इतना इमोशनल हो रहे हो.
    ज़रा सोचो, इस इमोशनल होने के चक्कर में कहीं devotional अत्याचार तो नहीं कर रहे.

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  4. खुशदीप भाई-प्रत्येक मनुष्य के जीवन मे ही इतने झंझावात हैं जिससे उसके जीवन से हंसी उल्लास लगभग गायब हो गया है, जब वह ब्लाग पर आता है तो यहां पर भी वही गंभीर-गंभीर बातें और मगज खपाऊ काम। इसलिए मै तो आपके स्लागओवर के साथ ही जीना पसंद करुगा, बाकि .मैं भी खुश और पत्नी भी खुश...मैं मंगलवार को जाता हूं और वो शनिवार को. ये बहुत बढिया रहा "मध्यम मार्ग" बधाई-आभार

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  5. खुशदीप जी,
    हम तो बस और कहीं जाएँ या न जाएँ यहाँ जरूर आते हैं....
    पता है क्यूँ ....ठहाका लगाने....
    वैसे आज तो शनिवार था न?
    हा हा हाहा

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. अमां मियां, क्यों इमोशनल हो रहे हो?
    वैसे मैं दावे से कह सकता हूं कि तुम्हारी हथेली में सांसारिक मोहमाया त्यागने की लकीर बनी है। यह गाढ़ी नहीं है, वर्ना अभी तक तो हज़रत अली खुशदीपशाह मेरठी का पता पूछते हुए लोग कसौली, रानीखेत या उससे भी ऊपर पहुंच रहे होते।

    यूं सूफ़ी न बनों। कभी रवि और मेरे बीच बैठो। अनूपजी और समीर भाई में क्या रखा है? क्यों जान देने पर तुले हो?

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  8. खुशदीप भाई माफ़ी मांगता हूँ, मैं ही पूरी बात को समझा नहीं की आप किस तरह सोच कर लिखने वाले हैं :) विश्वास है की आप माफ़ करेंगे, वैसे आपने जो समझा की मैंने सिर्फ इसलिए लिखा की आप विवादों में अपनी ऊर्जा ना नष्ट करें वो आप बिलकुल सही समझे, आप और आप जैसे चंद गिने चुने लोग ही हैं जो ब्लॉगजगत की गरिमा को बनाए हुए हैं.. और मैं अपने आप को ऐसे लोगों के करीब ही रखना चाहता हूँ.. आपका अनुज
    जय हिंद

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  9. खुश ------ दीप



    चलो पति पत्नी को राह तो मिला

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  10. हम तो आपके स्लोग ऑवर पर कोई टिपण्णी नहीं करेंगे ...भेजाविहीन होने का इल्जाम सर पर आएगा ...वैसे मानते तो हम अपने आप को यही हैं ...मगर सब से कहलवाना अच्छा थोडी ना लगता है ...
    हाँ ब्लॉग के दो महाराथिओं पर काला पत्थर पार्ट २ बनाने का आईडिया अच्छा है ...स्क्रिप्ट आप ही लिख डाले ...कुछ भूमिका तो इस पोस्ट पर तैयार है ही ...शुभकामनाएं ...!!

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  11. कोई हमको भी बताये कि माजरा क्या है ?
    हमारे भेजे में कुछ आया नहीं?
    अनूप शुक्ल <------> समीर लाल
    या
    फुरसतिया <-------> उड़नतश्तरी

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  12. आपकी अगली पोस्ट का इंतजार है।

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  13. .
    .
    .
    खुशदीप जी,

    ब्लॉगिंग को जैसा मैं समझ पाया हूँ उसके अनुसार यह अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है जिसमें आप को अपनी टिप्पणियों में वही लिखना चाहिये जो पोस्ट पढ़ने के बाद तुरंत आता है आपके मन में...यह एक तरह का लाइव थियेटर है...पसंद आया तो तालियां बजा दीं...नहीं आया तो मुँह फाड़ कर उबासी ले बैठे...बेकार लगा तो हूट कर दिया... ज्यादा अझेल हो गया तो निकल भागे थियेटर (पोस्ट) के बाहर...

    समस्या तब होती है जब हम लोगों ने ब्लॉग परिवार बना लिये हैं... आइकान, गुरू, अग्रज, अनुज, दादा, दादी, ताऊ, ताई, चाचा, चाची, बेटा, बहू, बहन, भाई, दीदी, शिखरपुरुष, गर्तपुरुष, वाइरस, बहिष्कृत द्वय आदि आदि तमाम रिश्ते बना लिये हैं हम ने... और निभाये जा रहे हैं... तालियों पे तालियां बजाकर... बिना देखे कि कोई ताली का हकदार है या नहीं... कभी तो सिर्फ इसलिये ताली बजाते हैं कि सामने वाले ने भी बजाई थी, जब मैं स्टेज पर था... बहुत सा समय यह विचारने में लगाया जाता है कि अगले ने बांये हाथ से क्यों बजाई... धीरे क्यों बजाई... कह तो रहा है बजाई पर आवाज तो नहीं आई... आदि आदि...

    धीरे धीरे ब्लॉगजगत भी हिन्दी साहित्यजगत सा होता जा रहा है... ब्लॉगिंग स्वान्त सुखाय: है और रहनी चाहिये... बेहतर है कि हम नये रिश्ते न बनायें... अनाम रहें... और अपने मन की कहें... अपने आप को धोखा देना और हमेशा पोलिटिकली करेक्ट रहना साहित्य हो सकता है... पर ब्लॉगिंग कतई नहीं!

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  14. खुशदिल भाई खुद भी खुश रहो और हर दिल को खुश रखो।जियो और जीने दो,हंसो और हंसने दो।

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  15. चलो, अच्छा किया तुमने ही यह मुद्दा उठा लिया जो शायद बहुतों के मन में काफी दिनों से हलचल मचा रहा है.

    कुछ भी जानने या कहने से पहले बता दूँ कि मैं जब ब्लॉगजगत में आया तो उसके पूर्व ईकविता मंच पर और कुछ पत्रिकाओं में कविताएँ लिखा करता था. ब्लॉग में आने के बाद अनूप जी ही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने मुझे गद्य लिखने के लिए प्रोत्साहित किया. कुछ शुरुवाती कमेंट में देखेंगे तो वो दिख जायेगा. शुरु में बहुत समय तक मैं लिखकर उनकी सलाह लेकर ही पोस्ट करने की हिम्मत जुटा पाता था.

    उनको गद्य में हमेशा से अपना गुरु मानता आया और आज भी वही मानता हूँ बिना किसी प्रतिशत कटौती के.

    हाँ, यह तो शुरु के दौर से ही चल रहा है कि हम दोनों ने एक दूसरे की बहुत खिंचाई की है लेखन में किन्तु मात्र लेखन में और उसके बाद भी उनका स्नेह वही रहा है और मेरे मन में उनके प्रति सम्मान भी वही.

    मुझे याद है कि २००७ के इंडी ब्लॉगीज चयन में मेरे सामने अनूप जी थे और उन्होंने बिना किसी प्रचार के चुपचाप बैठ मुझे यूँ ही जीत जाने दिया और रेजल्ट घोषित होने के पहले ही बधाई भी दे गये.

    यह भी हुआ कि उन्हें कई बार मेरी कुछ बात पसंद नहीं आई और मुझे उनकी. मैने जब भी इस ओर इंगित किया, पाया कि उन्होंने तत्काल उसका निराकरण किया और यहाँ तक कि पोस्ट कर देने के बाद पोस्ट बदल दी. यही उनकी महानता का परिचायक है.

    जब मैं ब्लॉगजगत में आया तो भी वो सर्वश्रेष्ट थे और आज भी. हर वक्त एक तमन्ना है कि एक बार उनसा लिख पाऊँ. वही तमन्ना पाले कई बार गुरु को हमारे गुड़ हो जाने का बताने को लालायित हुए कुछ विरोधी कमेंट भी दर्ज कर जाते हैं और गुरुदेव अपनी अगली पोस्ट में आकर हमें वापस धरती दिखा जाते हैं, और हम अपनी औकत में वापस और लोगों की नजरों में वो द्वंद सा हो जाता है हमारे बीच.

    हमारी अपने आपको चेला से गुड़ होने का झूठा अहसास जाहिर करने की लालसा जायेगी नहीं और उनकी मुस्कराते हुए हमें धरती पर टिकाये रखने की आदत..तो ऐसे लेखनीय द्वंद तो दिखते ही रहेंगे, उनसे परेशान होने की जरुरत नहीं. हम भी परेशान नहीं होते बल्कि मौज किया करते हैं कि अगली बार पूर्व हौसले और जोश खरोश से सिद्ध लरेंगे. :)

    अनूप जी के साथ लेखन से बाहर भी हमारे परिवारिक सबंध हैं, उसकी गहराई यहाँ बताना तो आवश्यक नहीं किन्तु उनके प्रति जो मेरे मन में सम्मान है और जो उनका मेरी प्रति स्नेह है, वो इन सब छोटी छोटी मौज मस्तियों से कभी खत्म नहीं होगा. मैं इस बात से हमेशा ही आश्वस्त रहा हूँ. इसीलिए यह सब लिखना भी संभव होता है वरना तो काठ की हांडी, एक बार चढ़ती और स्वाहा!!

    उस कमेंट में ...इसलिए तुम....:) के बीच तुम मेरे प्रिय होने के भाव थे और अनूप जी को दिये कमेंट में इसीलिए आप...:) में आप मेरे प्रिय और सम्मानीय होने के ही भाव थे.

    अनूप जी की मौज को अक्सर लोग समझ नहीं पाते या हम जैसे मूँह लगे समझ कर भी नासमझ बन मौजिया विवाद उठा लेते हैं तो निश्चित ही जो भाव तुम्हारे दिल में आये, वो औरों के भी आते होंगे.

    निश्चिंत रहिये और हाँ, इसे सुधार लो....दो पर्वत और बीच बहती नदी... एक पर्वत है बस!! अनूप जी...हम तो अदना से उसी पर्वत के बीच में कहीं गुफा बनाये धूनी रमाये बैठे हैं और ये जो नदी है न, इसमें से लोटा लोटा नहा लेते हैं, बस्सा!! पर्वत भगा दे, तो गुफा भी न बचे!!! :)


    -----

    हमारा स्लॉग ओवर (तुम्हारी स्टाईल उड़ा ली) :))

    -'ब्लॉगिंग की 'काला पत्थर'...' शीर्षक देखकर लगा कि आज सिर्फ मेरे बारे बात करोगे, अनूप जी बच निकले. :)

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  16. "जब दो बड़े आपस में बात कर रहे हो तो छोटे को चुप रहना चाहिये ..."
    खुशदीप जी, हम चुप रहे क्या ?
    वैसे तारीफेकाबिल मेहनत की आपने !

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  17. जब दो गुरु बात कर रहे हों तो उनका सार समझना चाहिये चुपचाप. हम तो वही कर रहे हैं.:)

    रामराम.

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  18. हम भी ताऊ रामपुरिया जी का अनुसरण कर रहे है |

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  19. हम तो मस्त मोला है जी....... सानू कि

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  20. गुरुदेव समीर जी,
    आप नहीं जानते आपने मेरे मन से कितना बड़ा बोझ उतार दिया...मैं भगवान से यही प्रार्थना कर रहा था कि मेरा भ्रम पूरी तरह से गलत साबित हो...और ऐसा ही हुआ...मुझे निमित्त मात्र बनना था और मैं बना...आपकी टिप्पणी से मेरी तरह जिस ब्लॉगर भाई के मन में भी कभी कोई शंका रही होगी वो दूर हो गई होगी...बस एक बात और कहूंगा...मेरे गुरुदेव समीर लाल जी समीर और उनके गुरुदेव अनूप शुक्ल....इसलिए आज से मेरे लिए अनूप जी आप से भी बड़ कर श्रद्धेय हो गए...यानि महागुरुदेव...

    महागुरुदेव अनूप शुक्ल जी,
    आज मुझे समझ में आया है कि अटल बिहारी वाजपेयी जी क्यों प्रतीकों के माध्यम से इतनी सटीक बात कह जाते रहे हैं कि सीधे उसी बात को कहने से उतना रस नहीं आता....आपका इस पोस्ट पर ये कहना...मेरी अगली पोस्ट का इंतज़ार रहेगा....मेरे लिए मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा कॉम्पलीमेंट है...

    अंत में...
    अनूप जी और समीर जी, मेरी किसी बात से अनजाने में भी आपका दिल दुखा हो तो नादान समझ कर मुझे माफ़ कर दीजिएगा...

    जय हिंद...

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  21. चलिए खुशदीप जी, आपको ज्ञान की प्राप्ति हो गयी यह अच्छी बात है। मैने तो आपको कल ही बता दिया था।

    बड़े लोगों को यूँ ही बड़ा नहीं माना जाता...! तेल निकल जाता है बड़ा बनने में :)

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  22. शहद में कितना गुड है, पर्वत में कितनी गहरी गुफ़ा है..... हम तो चकरा गए जी.... बस, खुशदीप की तरह खुशी के दीप जलाते हैं :)

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  23. :)...
    kala patthar..!

    aapki tarah ek geet ki panktiyan aap ki is post par-
    'khushiyan hi khushiyan ho daman mein jiske --kyun na khushi se wo diwana ho jaye!'

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  24. बड़े बड़े महान महान लोगों की बात ही निराली है...

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  25. भाई यहाँ और भी अमिताभ शत्रुघ्न है ..आपको सिर्फ दो ही नज़र आ रहे है ?

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  26. खिशदीप जी अच्छा हुया न मैं शाम को आयी तब तक सारी गुथी सुलझ चुकी थी। सच मे आप बहुत इमोशनल हैं मगर एक बात है एमोशन्ल लोग बहुत अच्छे इन्सान होते हैं। आप तभी छोटी छोटी बातों की बहुत परवाह करते हो। अच्छी बात है परिवार ली खुशी के लिये चिन्ता करना । अगर सभी ब्लागर्ज़ आपकी तरह सोचेंगी तो ये परिवार बहुत खुशहाल रहेगा। अब हम लोग तो कुछ दिन के महमान हैं । इसे बढते हुये फलते फूलते ही देखते जायें तो अच्छा है। अरे स्लागओवर तो कमाल है बस यूँ ही हंसते हंसाते रहिये। धन्यवाद और शुभकामनायें

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