शनिवार, 28 नवंबर 2009

क्या आप सिविल वॉर के लिए तैयार हैं...खुशदीप

पोस्ट का शीर्षक पढ़ कर चौंकिए मत...लेकिन आने वाले वक्त में ये हक़ीक़त बन सकता है...ये मैं नहीं कह रहा, ये स्टडी है यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के एक स्टडी ग्रुप की...स्टडी में कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में आकर कई देश सिविल वॉर या गृह युद्ध के हालात में पहुंच सकते हैं...जिस तरह धरती गर्म होती जा रही है उससे ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी चीज़ें इतनी महंगी हो जाएंगी कि उससे मारकाट जैसी नौबत आ सकती है...ये ख़तरा उन देशों को ज़्यादा है जिनकी अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर करती है...

भारत की 70 फीसदी आबादी का जीने का आधार भी खेत-खलिहान ही हैं...पिछले 10 साल में जहां समूची दुनिया से 7 फीसदी जंगल का सफाया हो गया वहीं भारत में दुनिया की औसत दर से ज़्यादा यानि 9 फीसदी जंगल पूरी तरह साफ़ हो गया...इसी दौर में 11 फीसदी खेती योग्य ज़मीन विकास और ऊर्जा की भेंट चढ़ गई... जितने स्पेशल इकोनामी जोन (एसईजेड) बनाने की दरख्वास्त सरकार के पास लगी हुई और उन्हें सब को मंजूरी मिल गई तो खेती की साढ़े चार फीसदी ज़मीन और कम हो जाएगी...ज़ाहिर है खेती का दायरा इसी तरह सिकुड़ता रहा तो अनाज और दूसरे कृषि उत्पादों की कीमतें आसमान छूने लगेंगी...और जैसे जैसे ये पहुंच से बाहर होती जाएंगी वैसे वैसे अराजकता की स्थिति बढ़ती जाएगी...

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की स्टडी के मुताबिक अगर धरती के तापमान में एक डिग्री का इज़ाफ़ा होता है तो अफ्रीका में 2030 तक सिविल वार होने का जोखिम 55 फीसदी बढ़ जाएगा...सब सहारा इलाके में ही युद्ध भड़कने से तीन लाख नब्बे हज़ार लोगों को मौत के मुंह में जाना पड़ सकता है...जाहिर है ग्लोबल वार्मिंग ने खतरे की घंटी बजा दी है...बस ज़रूरत है हमें नींद से जागने की...

पहले दो विश्व युद्ध इंसान की सनक के चलते ही हुए थे...तीसरे विश्व युद्ध का भी इंसान ही ज़रिया होगा...और उसने विकास की दौड़ में प्रकृति को ही दांव पर लगाकर विनाश की ओर बढ़ना भी शुरू कर दिया है...जब इंसान का वजूद ही मिट जाएगा तो फिर किसके लिए ये सारा विकास...

आज विश्व मंच पर भी ग्लोबल वार्मिंग सबसे गर्म मुद्दा है...अमेरिका ने ऐलान कर दिया है कि वो 2005 के लेवल को आधार मान कर 2020 तक कार्बन गैसों के उत्सर्जन में 17 फीसदी की कमी कर देगा...चीन भी साफ कर चुका है कि 2020 तक स्वेच्छा से 40 से 50 फीसदी प्रति यूनिट जीडीपी के हिसाब से ग्रीन हाउस गैसों में कटौती करेगा...

अमेरिका समेत तमाम विकसित चाहते हैं कि भारत और दूसरे विकासशील देश भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन मे कटौती की घोषणा करे...डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में 8 से 18 दिसंबर तक क्लाइमेट चेंज पर होने जा रहे सम्मेलन में ग्रीन हाउस गैसों में कटौती का मुद्दा ही छाए रहने की उम्मीद है...

आगे बढ़ने से पहले आप सोच रहे होंगे कि ये ग्रीन हाउस गैसें आखिर हैं किस आफ़त का नाम...इस पर डॉ टी एस दराल ने पिछले दिनों अपनी एक पोस्ट में बड़े आसान शब्दों में महत्वपूर्ण जानकारी दी थी...उसी को मैं यहां रिपीट कर रहा हूं....

ज़रा गौर कीजिये, कहीं आप ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा तो नही दे रहे ---

ग्रीन हाउस के बारे में आपने सुना ही होगा कि शीशे या प्लास्टिक के बने कमरे में पौधे उगाने के काम आते हैं ये...सूरज की किरणों से पैदा हुई गर्मी से ग्रीन हाउस के अंदर की हवा गर्म हो जाती है...और ये उष्मा ग्रीन हाउस के अंदर ही कैद रहती है...बाहर नहीं निकल पाती...इस प्रभाव को ही कहते हैं... ग्रीन हाउस इफैक्ट...कुछ इसी तरह का माहौल होता है , हमारी पृथ्वी पर...यानि पृथ्वी की सतह पर कुछ गैसों की एक परत सी होती है, जो सूर्य की किरणों से पैदा हुई गर्मी को वायु में जाने से रोकती हैं...इससे धरती का तापमान एक निश्चित स्तर पर बना रहता है...अगर ये गेसिज न होती तो हम आज भी हम आइस एज में रह रहे होते.


ग्रीन हाउस गेसिज : धरती की सतह पर जो गैस पाई जाती हैं, वे हैं ---वाटर वेपर, कार्बन डाई ओक्स्साइड, मीथेन ,नाइट्रस ओक्साइड, और फलुरोकार्बंस... अब इन गैसों की मात्रा बढ़ने से जो उष्मा ट्रैप्ड होती है, उससे धरती का तापमान धीरे धीरे बढ़ रहा है...इसी को कहते हैं, ग्लोबल वार्मिंग...

इन गैसों के बढ़ने के कारण हैं --सांस लेने से , कोयला, तेल और पेट्रोल के जलने से... पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से CO2 पैदा होती है...चावल की फसल उगाने से , पशु पालन से और लैंड फिल साइट्स से मीथेन गैस पैदा होती है...नाइट्रोजन युक्त खाद, सीवेज ट्रीटमेंट से और समुद्र से नाइट्रस ऑक्साइड गैस पैदा होती है...एयर कंडीशनर और रेफ्रीजेरेटर्स में क्लोरोफ्लुरोकार्बंस पैदा होते हैं, जो ओजोन डिप्लीशन करते हैं...


इस तरह आधुनिक युग की सुख सुविधाएँ और सम्पन्ताएं ही आज इंसान की दुश्मन बन गयी हैं...एक और समाचार से पता चला है की भारत की पर कैपिटा एमिशन रेट अमेरिका के मुकाबले बहुत ही कम है...यानि विकसित देश ही असली गुनाहगार हैं...

ऊपर से तुर्रा ये कि अमेरिका ही ग्रीन हाउस गैसों को मुद्दा बनाकर भारत के कान उमेड़ने में सबसे आगे हैं...अमेरिका और अन्य विकसित देशों का कहना है कि भारत जैसे विकासशील देश अपने-अपने खास फंड बनाएं जिसका इस्तेमाल सिर्फ ग्रीन हाउस गैसों में कटौती लाने के लिए किया जाए...दूसरी तरफ भारत की दलील है कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए अमेरिका और विकसित देश ही सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं...फिर उनके किए-धरे की सज़ा भारत जैसे देश क्यों भुगतें...अगर फंड बनाना ही है तो अमेरिका और विकसित देश अपने पैसे से ही उसका इंतज़ाम करे...बहरहाल इसी मुद्दे पर कोपेनहेगन में गर्मागर्म बहस छिड़ने के पूरे आसार हैं...अमेरिका अब चीन का हवाला देकर भारत पर दबाव बढ़ा सकता है कि जैसे उसने ग्रीन हाउस गैसों में कटौती का ऐलान किया है वैसे ही कदम भारत और अन्य विकासशील देश भी उठाएं...चीन की तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का झुकाव चौंकाने वाला है...भारत-पाकिस्तान संबंधों को सामान्य बनाने के लिए ओबामा बीजिंग जाकर चीन को कोतवाल पहले ही बना आए हैं...अब पर्यावरण को ढाल बनाकर भारत को घेरने की ये अमेरिका और चीन की नई रणनीति तो नहीं है...भारत को ऐसे हालात में बेहद सतर्क होकर चलने की ज़रूरत है...ये ठीक है कि ग्लोबल वार्मिंग पूरे विश्व के साथ भारत के लिए भी बड़ा खतरा है...लेकिन इस मामले में हमारी स्वतंत्र नीति होनी चाहिए...किसी दबाव में आकर हम कोई फैसला न लें...हां...हिमालय, ग्लेशियर, गंगा, यमुना भारत मां के गहने हैं...इन्हें बचाकर रखना हर भारतीय का कर्तव्य है...हम अपनी ओर से इन्हें जितना कम से कम दूषित करें, उतना ही हमारा अस्तित्व भी बचा रहेगा... ये लड़ाई हमारी अपनी है...हमें अपने आप ही लड़नी है...वाशिंगटन या बीजिंग से कोई टॉम, डिक, हैरी आकर न समझाए कि हमें क्या करना है....

स्लॉग ओवर

दिमाग शरीर का सबसे अहम हिस्सा होता है...

24 घंटे, 365 दिन ये एक्टिव रहता है...

इंसान के पैदा होते ही ये काम करना शुरू कर देता है...

और...

इंसान की शादी होने तक ये काम करता रहता है...

25 टिप्‍पणियां:

  1. ग्लोबल् वार्मिंग वाकई चिंतनीय स्थिति तक पहुंच गया है.
    अच्छी जानकारी - अच्छा विश्लेषण

    शादी के बाद किसका दिमाग काम कर देता है पति का या पत्नी का?
    स्पष्ट किया जाये

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुधार
    शादी के बाद किसका दिमाग काम करना बन्द कर देता है देता है पति का या पत्नी का?

    उत्तर देंहटाएं
  3. यह अवश्यम्भावी है क्योंकि इतिहास अपने-आप को दोहराता है।

    हालांकि इस मामले में हमारी स्वतंत्र नीति होनी चाहिए।

    बी एस पाबला

    उत्तर देंहटाएं
  4. वर्मा जी,
    अगर पतियों का दिमाग काम कर रहा होता तो न आप ये सवाल पूछ रहे होते और न ही मैं ये जवाब दे रहा होता...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाशिंगटन या बीजिंग से कोई टॉम, डिक, हैरी आकर न समझाए कि हमें क्या करना है....उनको वैसे खुद भी नहीं मालूम..सब हवा में तीर चला रहे हैं.


    -स्लॉगओवर मस्त रहा!

    उत्तर देंहटाएं
  6. ग्लोब्ल वार्मिंग की समझ दिमाग वालों को है और हमारा तो दिमाग 17 से बंद है, इसलिए हमे कोई चिंता नही पर एक बात समझ मे आती है जिस तरह खेती का रकबा कम हो रहा है और फ़सल उगाने के प्रति उदासीनता बढ़ रही है उस हिसाब से अनाज भी अब चुरण गोली के पाउच मे ही मिलेगा, जिसने अनाज की खेती करके अन्न उपजाया वही भरपेट खा पायेगा। बाकी.............

    उत्तर देंहटाएं
  7. ललित भाई,

    स्लॉग ओवर में दिमाग बंद होना तो शादी की तारीख से तय हुआ था...ये 17 तारीख से आपका दिमाग बंद होने
    का क्या राज़ है...वैसे मेरी शादी भी 17 तारीख को ही हुई थी...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  8. खुशदीप भाई- यह लिपकीय टंकण त्रुटि है इसे सुधार कर 17 साल पढा जाए। चलो इस गलती से पता चल गया कि आपका भी 17 से......

    उत्तर देंहटाएं
  9. ग्लोबल वार्मिंग के कारण तो सिविल वार हो न हो ....मगर जिस तरह से सांप्रदायिक कट्टरपन और भाषाई युद्ध और प्रांतीय बंटवारा हो रहा है ...सिविल वार ज्यादा दूर नहीं है ...

    शादी के बाद दिमाग बंद होता है पुरुषों का ...??
    पहले से दिमाग होता है ...आपको पूरा विश्वास है ..??

    उत्तर देंहटाएं
  10. सिविल वार तो होगा पर इन वाह्य कारणों /कारकों से नहीं बल्कि आंतरिक कारणों से !

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाणी जी,
    आप भी न...अगर दिमाग होता तो भला शादी के चक्कर में फंसते...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  12. आपने क्या लिखा है वह समझ नहीं पाया क्योंकि दिमाग काम नहीं कर रहा है!

    उत्तर देंहटाएं
  13. भइया, यहाँ तो वो हाल है की, जिसकी लाठी, उसकी भैंस।
    यानी ऐश तो हम करेंगे, और भुगतेंगे आप।
    कुछ ऐसा ही कर रहा है अमेरिका।
    ख़ुद सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गेसिज पैदा करके , कह रहा है --- इंडिया --तुम कम करो।

    मुझे तो लगता है ---शादी के बाद आदमी का दिमाग डबल काम करता है।
    क्योंकि --इन डी स्ट्रगल फॉर एक्सिस्तेंस ------

    उत्तर देंहटाएं
  14. खुशदीप जी,
    बहुत ही महत्वपूर्ण आलेख है, यह।
    ग्लोबल वार्मिंग पूरी दुनिया की समस्या है। पूरी दुनिया उस से निपट सकती है। लेकिन उस के लिए 'बड़ों' को लालच छोड़ना होगा। दुनिया के संपन्न देश नहीं सुधरते हैं तो उन के विरुद्ध एक होना पड़ेगा। इसी तरह देशों में संपन्न वर्ग नहीं समझते हैं तो बाकी लोगों को एक होना पड़ेगा।
    अब लगता है कि गुट निरपेक्षता के नाम पर विकासशील देशों की एकता की नीति सही थी वह समाप्त क्यों हो गई? विकासशील देशों को फिर एक होना होगा। इसी तरह विभिन्न देशों में भी उत्पादन और जीवन शैली की अराजकता को नियंत्रित करने के लिए प्रयत्न करने होंगे। जो भी उत्पादन की अराजकता और जीवनशैली की अराजकता के विरुद्ध हैं उन्हें एक होना पड़ेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  15. खुशदीप भाई,
    इस मुद्दे पर एक आलेख के लिए लिखते वक्त जब मैंने शोध किया था तो एक आश्चर्यजनक बात सामने आई थी । ग्लोबल वार्मिंग जिससे कमोबेश शहरी जीवन का हरेक व्यक्ति परिचित है ..और उतना ही उसकी उपेक्षा भी करता आ रहा है । मगर इसके उलट वे ग्रामीण जिन्हें नहीं पता कि ग्रीन हाऊस क्या होता है और ग्लोबल वार्मिंग क्या ..वे आज भी मन से खूब पेड पौधे लगाते हैं । औरों की छोडिये ..मैं खुद अपने हाथों से लगभग छ सौ पेड लगा चुका हूं । गांव जब भी जाना होता है ..तो उन बढते हुए पेडों को निहारना ..अपनी संतान को फ़लते फ़ूलते देखने जैसा एहसास कराता है । और यही एहसास सब कर सकें तो क्या बात हो ॥

    यार स्लौग ओवर पढ के समझ में आया कि ..पिछले सात सालों से ....ये उट्पटांग क्यों लिख रहा हूं .....?

    अजय कुमार झा

    उत्तर देंहटाएं
  16. अजय भाई,
    अच्छा लगा जानकर कि आप शहीद होने के सात साल बाद भी कुछ समझ पाने की स्थिति में हैं...मेरी और अवधिया जी की तरह औलिया नहीं हो गए हैं...

    जय हिंद....

    उत्तर देंहटाएं
  17. खुशदीप जी आपने तो चिन्ता मे डाल दिया है आज इतने गम्भीर क्यों हैं चलो स्लागोवर से कुछ मन हलका हुया। वैसे मुद्दा बहुत गम्भीर है। तो आज इसी बात पर एक पौधा हम भी लगा देते हैं। कई दिन से क्यारी सूनी पडी है । धन्यवद और शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  18. 'global warming'...gahan chinta ka vishay hai...iske prati,awareness ki sakht jaroorat hai...warna bhavishya ki bhayaavah tasweer saamne khadi hai

    उत्तर देंहटाएं
  19. चिंता किस बात की भाई खुशदीप.... २०१२ करीब ही तो है :)

    उत्तर देंहटाएं
  20. ग्लोबल वार्मिंग के बारे मै हमे यह अमेरिका क्या बतायेगा जो सब से ज्यादा गंदगी डाल रहा है, ओर फ़िर यह चीन जिस ने सारी दुनिया मै सस्ता सस्ता कर के सारा जहर फ़ेला दिया है, अगर हमे कुछ सीखना है तो युरोप से सीखे.... जहां फ़ेकट्रियो का धुआं भी पहले फ़िलटर होता है, वहां से निकलने वाला पानी भी पहले फ़िलटर होता है, यहा की नदियो को देखे तो पानी बिलकुल साफ़ है,
    ओर यह आप ने जो सिविल वार के बारे लिखा मै इस से सहमत हुं जब मै भारत आया था तो मेरे एक डाकटर मित्र ने एक दिन कहा कि राज तुम नही जानते भारत की हालात, कुछ सालो मै लोग यहां हाथो से समान खॊंसेंगे, यहां अमीर बहुत अमीर ओर गरीब बहुत गरीब होता जा रहा है, ओर पिस हम रहे है.

    ओर खुशदीप भाई आप तो शादी तक पहुच गये, जनाब किसी लडकी को देख कर ही लोगो का दिमाग काम करना बन्द कर देता है, यह हालात होती है जवानी मै... ओर शादी तक तो पुरा दिमाग ही खत्म, सोचे गा क्या खाक?

    उत्तर देंहटाएं
  21. जब इंसान का वजूद ही मिट जाएगा तो फिर किसके लिए ये सारा विकास...बिलकुल सही कहा आपने...

    हमें खुद...अपने प्रयासों से खुद जागरूकता लानी होगी...अमेरिका अपने चाबुक से हमें हांक लगाए...ऐसा नहीं चलेगा ...


    ओ तेरे की...तभी मैँ कहूँ कि शादी से पहले तो मैँ इतना बावला नहीं हुआ करता था

    उत्तर देंहटाएं
  22. हिमालय, ग्लेशियर, गंगा, यमुना भारत मां के गहने हैं...इन्हें बचाकर रखना हर भारतीय का कर्तव्य है...हम अपनी ओर से इन्हें जितना कम से कम दूषित करें, उतना ही हमारा अस्तित्व भी बचा रहेगा... भैया.... आपके लिखे जुए इन पंक्तियों ने दिल को छू लिया .....कहीं अन्दर तक उतर गयीं यह पंक्तियाँ.....

    और स्लोग ओवर के तो क्या कहने..... इसलिए सोच रहे हैं कि थोडा और रुक जाएँ .....हेहेहेहेहेहेहेहे ...

    जय हिंद ...

    उत्तर देंहटाएं
  23. खुशदीप जी आपने तो global वार्मिंग जैसे विषय पे अपना विश्लेषण लिख के मुझे सोते से जगा दिया ..मैं तो इन सब चीज़ों को बस बड़े देशों के चोंचले ही समझता था. पर अब अपनी जिम्मेदारी का एहसास हो रहा है. पर एक बात नहीं समझ में आती.. कि सरकार की तरफ से कभी हम जनता के साथ पार्टनरशिप कर के कोई प्रोग्राम क्यों नहीं चलाया जाता है. जैसे कि मैं बंगलोर में हूँ और पेड़ लगाना चाहता हूँ.... ठीक है.. मैं खरीदूंगा.. पर कहाँ जा के लगाऊँ.. क्या सरकार कुछ जगह इंगित नहीं कर सकती है? बस यूं ही.. एक सवाल मन में आ गया तो पूछ लिया..

    उत्तर देंहटाएं