गुरुवार, 12 नवंबर 2009

हम भैंस को माता क्यों नहीं कहते...खुशदीप

बचपन से सुनता आया हूं गऊ हमारी माता होती है...सीधा सा तर्क है कि हम गाय का दूध पीते हैं, इसलिए गाय हमारी माता होती है...लेकिन अब हम गाय का दूध कहां पीते हैं...हर जगह भैंस का ही दूध मिलता है...वैसे भी भैंस 15-20 लीटर दूध देती है और गाय सिर्फ 5-7 लीटर...फिर भैंस को हम माता क्यों नहीं कहते...गाय तो अब मिलती कहां हैं...गाय बस गौशालाओं में ही देखने की चीज रह गई है..,खास कर महानगरों में गाय के दर्शन ही दुर्लभ होते जा रहे हैं...

मेरी पत्नीश्री धर्मकर्म को मानने वाली है...किसी से उसने सुन लिया कि गाय को रोज़ रोटी खिलाने से पति पर कष्ट नहीं आता...अब उसे कौन समझाए कि पति पर कष्ट कहां से आएगा, पति तो रोज़-रोज़ खुद एक से एक पकाऊ पोस्ट डालकर ब्लॉगर बिरादरी को कष्ट देता है...लेकिन पत्नीश्री तो ठहरी पत्नीश्री...जो आसानी से मान जाए वो पत्नीश्री ही कहां...

खैर जी मरता क्या न करता, मैंने रोटी लेकर नोएडा शहर में गाय को ढूंढना शुरू किया...लेकिन गऊ माता कहीं नहीं दिखी...कहावत खामख्वाह ही कही जाती है कि ऐसे गायब जैसे गाय के सिर से सींग...यहां सींग तो क्या पूरी की पूरी गाय ही गायब हैं...गाय तो कहीं नहीं मिली हां हर चौपले, नुक्कड़ पर सांड और बैल ज़रूर विचरण करते नज़र आ गए...अब रोटी तो गाय को ही खिलानी है, इसलिए सांड और बैल महाराजों को दूर से ही हमने नमस्कार कर दिया...दो-तीन घंटे तक गाय की तलाश करने के बाद  टाएं बोल गई...घर वापस आ गया...

पत्नीश्री के सामने हाथ खड़े कर दिए...कहा...और कुछ करा लो...चांद-तारे तुड़वा लो...सूरज से आंखे मिलवा लो...लेकिन ये गाय को रोज़-रोज़ ढूंढ कर रोटी खिलाने का टंटा हमसे नहीं होगा...खाली टाइम में अपने लैपटॉप बॉस को छोड़कर गली-गली गऊ माता की तलाश में मारा-मारा फिरूं...ये अपने बस की बात नहीं...एक ही दिन में हलकान हो गया...रोज़ रोज़ ये करना पड़ा तो खुद ही ऐसी हालत में पहुंच जाऊंगा कि बस ढूंढते ही रह जाओगे...

तो जनाब पत्नी को तो मैंने किसी तरह मना लिया कि गली के कुत्तों को ही रोटी डालकर काम चला लिया जाए...लेकिन ये सवाल मुझे ज़रूर परेशान कर रहा है कि अब गाय क्यों नहीं दिखती...पुराण कहते हैं कि जिस दिन गाय दुनिया से खत्म हो जाएंगी उसी दिन सृष्टि का अंत हो जाएगा...तो क्या हमने सृष्टि के अंत की ओर ही बढ़ना शुरू कर दिया है....गाय के गायब हो जाने पर  मैं तथ्यों और आंकड़ों के साथ इस चर्चा को आगे बढ़ाऊंगा...तब तक आपके कुछ विचार हो तो मेरे साथ ज़रूर बांटिए...

49 टिप्‍पणियां:

  1. हमरे इहाँ तो बहुते गईयाँ दिखाई देती हैँ

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  2. महत्वपूर्ण प्रश्न है। वैसे हमारे कोटा में गाय बड़े आराम से मिल जाती है। एक तो है जो सुबह-सुबह मेरे घर के दरवाजे पर आ खड़ी होती है और रोटी मिलने तक वहीं डटी रहती है। सड़कों पर बैठी भी मिल जाती हैं। दिल्ली में गाय का संकट जरूर है। लेकिन वहाँ आदमी ही यातायात से कहाँ सुरक्षित है जो गैया मैया के लिए स्थान रहेगा? वैसे गौ-पालन अब घाटे का सौदा है, इसलिए गाय गायब हो रही है। एक जमाना था जब वह लाभ का सौदा थी तो उस के लिए युद्ध लड़े जाते थे। तब वह माता भी थी।

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  3. Gaay....gayab...???yah to wakayee samsya ho gayee...

    waise temporary solution to aap ko mil hi gaya hai.

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  4. खुश दीप भाई हमारे यहां बहुत गाये है, एक एक किसान के पास २०० २०० गाय है, यहा भेंस मोसी नही मिलती ओर गाय दुध भी ३०, ३५ लिटर देती है, ओर हमारे यहां दुध ००.५० पेसे का लिटर मिलता है, इस लिये बेफ़िक्र रहे गाय जमीन से कभी भी खत्म नही हो सकती, लेकिन यहा गाय को कोई भी हमारे सिवा माता कोई नही पुकारता

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  5. राज जी,
    यही तो मैं भी कहना चाह रहा हूं जिस देश की गोधन से पहचान रही है...वहीं गाय की बेकद्री क्यों...जर्मनी ही नहीं सभी विकसित देशों में गाय का दूध और उससे बने ही डेरी उत्पाद बिकते हैं...फिर हमारे देश में क्यों गाय सड़कों पर कूड़ा-करकट खाने को विवश है...एक बार गाय के पेट में पॉलीथीन की थैली पहुंच जाए तो उसकी पेट फूलने से मौत निश्चित है.. हम अपनी माताओं की फिक्र करते हैं तो फिर गाय के चारे के लिए गोशालाओं को थोड़ा दान क्यों नहीं दे सकते...द्विवेदी सर ने ठीक कहा है उनके शहर कोटा में गाय काफी देखने को मिल जाती हैं...कोटा राजस्थान में आता है....राजस्थान की परंपरा है पशुधन के लिए सिर तक कटा दिए जाते हैं...हिरण को भगवान की तरह पूजा जाता है....ऐसा भी सुना है कई जगह माताएं हिरणों को संतान मानते हुए अपना दूध तक पिलाती है....राजस्थान में सही मायने में गाय को भी मां की तरह ही पूजा जाता होगा...बाकी महानगरों में तो बस नाम के ही एनीमल वेलफेयर आर्गनाइजेशन बने हुए हैं....सब अनुदान झटकने का धंधा है...

    जय हिंद...

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    1. एक ओर हम गाय को गोमाता कहते नहीं अघातेओर दूसरी ओर दोहनीके बाद उसे पोलिथिनऔर कचरा खाने को सड़क पर छोड़ देते है. यह तो अत्याचार है .

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  6. खुशदीप भाई अब बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन थोड़ा जरुर समझाने की कोशिश करता हूँ कि क्यों गाय को माता कहा जाता है हमारे लिए । हमारे आहार विहार , योगक्षेम, धर्म, अर्थ मोक्ष का आधार गाय को माना गया है । वेदो मे कहा गया है कि जिस घर में गाय की पूजा नहीं होती, वह घर लक्ष्मीविहीन हो जाता है। इसलिए भाभी को रोकिए मत पूजा करने से। गाय इतनी महत्वपूर्ण है कि उसकी तुलना किसी अन्य से नहीं की जा सकती,। पुराणों में गाय को मुक्ति दिलाने वाली माना गया है। यह सभी पापों एंव तापों से शीघ्र छुटकारा दिलाती है। गौओं की प्रशंसा में हमारे शास्त्रो में अनेक श्लोक कह गये।

    गावः सुरभिगंधिन्यस्तथा गुग्गुलुगंधयः ।
    गावः प्रतिष्ठा भूतानां गावः स्वस्त्ययनं महत्।।

    गौवो के शरिर से अनेक प्रकार की मनोरम सुगंध निकलती है। बहुत सी गायें गुग्गुल के समान गंध वाली होती है। गौवे समस्त प्राणियों की प्रतिष्ठा का आधार है।

    गावो भगो गाव इन्द्रो म इच्छाद्
    गावः सोमस्य प्रथमस्य भक्षः।
    इमा या गावः स जनास इन्द्र
    इच्छामि ह्रदा मनसा चिदिन्द्रम् ।।

    परमात्मा ने जो गौएँ हमें प्रदान की है, वे ही हमारी धन संपत्ति और ऐश्वर्य हैं। गौओं का दूध और घी सभी सात्विक भोजनों में प्रथम एवं श्रेष्ठ है। हे मनुष्यो ये सभी गायें स्वयं इन्द्रं अर्थात ऐश्वर्य की भंडार है। गायों के अमृतरुपी दुग्ध का सेवन करके सारे ऐश्वर्य को प्राप्त किया जा सकता है।

    भारतीय चिकित्साशास्त्रो में गो दुग्ध को सभी प्राणियों को सुखी रखने वाला, शरीरों को स्वस्थ, रोगरहित करने वाला अमृत माना गया है। इसके दूधो का वर्णन करते हुए कहा गया है-------------

    गव्यं क्षीरं पथ्यमत्यनएतरुच्यं स्वादु
    स्त्रिग्ध वातपित्तामयघ्रम।
    कान्तिप्रज्ञामेधाग्ड़मुष्टि धत्ते
    स्पष्टं वीर्य वृद्धिं विधन्ते।।

    गाय का दूध सबके लिए सदैव सेवन करने योग्य है और सब अवस्थावों में हितकारी है। यह अत्यंत रुचिकर एंव सुस्वादु है। चिकना एंव रुक्षता को दूर करती है। कांती, तेज, सुंदरता, प्रज्ञा प्राप्त होती है। सभी अंगो को पुष्ट एंव बलिष्ठ बनाता है। बौद्धिक स्तर और शरीरिक ऐंव उन्नति होती है।
    अब जिसमें इतना गुण हो उसे माँ नहीं तो और क्या कहा जायेगा। शास्त्रो में कहा गया है कि जिस तरह से गाय अपने बछड़े से प्रेम करती है उसी प्रकार मनुष्यो को भी एकदूसरे से प्रेम करना चाहिए।

    अन्योSन्यमर्मिहर्यत वत्सं जातमिवाध्न्या।।

    शायद आपको कुछ समझ आया हो खुसदीप भाई कि क्यों कहा जाता है गाय कि माँ।

    गावो विश्वस्य मातरः।

    और गाये क्यो गायब हो रही है, कारण यहाँ है मेरे ब्लोग पर, लिक ये रहा इसका जवाब भी आपको मिल जायेगा।

    मेरा लेख पढ़े "गाय काटने वालो का क्यों ना सर कलम कर दिया जाये"
    http://mithileshdubey.blogspot.com/2009/11/blog-post_10.html

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  7. खुशदीप भाई, यहाँ आपको एसी कोई दिक्कत नहीं होगी ........आसपास काफी लोगो ने गाय पाल रखी है !

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  8. हमारे जबलपुर में तो दिख जाती है भाई...काम भर की.

    वैसे:

    जो आसानी से मान जाए वो पत्नीश्री ही कहां...

    ये सही है. :)

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  9. Khushdeep bhai ek baar fir kamaal kar gaye... chha gaye tussi..
    bas ek chhoti si chook hai ki muhawra 'gaay' ke sar se seeng nhin balki 'gadhe' ke sar se seeng gayab hona hota hai jiska tatparya hai aise gayab hona ki jaise kabhi tha hi nahin...
    Jai Hind...

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  10. भैंस के दूध में कैल्सियम गाय के दूध से कई गुना अधिक होता है ..मगर यह बादी कारक होता है...पाचन में भारी ...शरीर में आलस्य पैदा करता है ...शायद इसीलिए गाय के दूध को ज्यादा तरजीह दी जाती है ...
    यहाँ गाय यूं तो आसानी से मिल जाती है ...बस श्राद्ध पक्ष में इतनी अघाई होती हैं की रोटी को देखकर मुंह मोड़ कर चली जाती हैं ...!!

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  11. दीपक भाई,
    गधा तो खुद हूं न, इसलिए आइना नहीं देख पाया...वैसे अच्छी गलती पकड़ी है...ये गाय प्रेम था या रात की पिनक, शायद ज़्यादा ही जज़्बाती हो गया था....

    जय हिंद...

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  12. खुशदीप बेचारे..बिना सहारे..देखो ढूंढ ढूंढ कर हारे
    नॉएडा में कोई गाय नहीं मिली फिरते मारे-मारे
    गाय माता जल्दी आना.....
    एक रोटी खाते जाना
    ओ माताSSSS जल्दी आ जाओ न.....

    जय हिंद....

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  13. बहुत महत्वपूर्ण विषय है पर शायद हम इस पर चर्चा करने के अलावा कुछ ओर कर भी नहीं सकते हैं। और जो कर सकते हैं वे कुछ करते नहीं हैं।

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  14. .
    .
    .
    खुशदीप जी,

    एक जगह मैंने लिखा था,

    "-एक पशु विशेष को हम पूजते हैं, उसका गोबर और मूत्र भी हमें प्यारा है हरेक को इनका सेवन करना चाहिये, घर में गोबर लीपना चाहिये, वस्त्रों को शुद्ध करने के लिये मूत्र को उन पर छिड़क सकते हैं यह दीगर बात है कि इसी पशु के दूध देना बन्द कर देने पर हम इन्हें सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं (क्या आपने कभी सड़क पर घूमती आवारा भैंस देखी है?)"

    पशुपालक गाय की जगह भैंस पाल रहे हैं तो सीधा कारण अर्थशास्त्र से जुड़ा है, भैंस पालना गाय पालने से ज्यादा फायदे का सौदा है।



    @ मिथिलेश दुबे जी,

    कोई भी कथन महज इसलिये सत्य नहीं हो जाता कि उसकी रचना प्राचीन काल में हुई थी, वह संस्कृत में है तथा पद्य रूप में है...अपनी सहज बुद्धि लगाइऐ और विचार कीजिये कि पशु मानव की माता कैसे हो सकता है ? और रही बात आपकी पोस्ट की तो किस किस का सर कलम करवायेंगे आप... दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी 'बीफ' यानि गौमांस खाती है।

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  15. "हम गाय को माता क्यों नहीं कहते ..."

    अरे भाई हम "भैंस के आगे बीन बजे और भैंस लगे पगुराय" की जगह "गाय के आगे बीन बजे और गाय लगे पगुराय" भी तो नहीं कहते! :-)

    मिथिलेश जी ने बहुत अच्छी जानकारी दी है अपनी टिप्पणी में। गाय लक्ष्मी का रूप है इसलिये हम उसे माता कहते हैं। आयुर्वेद के अनुसार गाय का दूध ही सर्वोत्तम होता है।

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  16. जनाव, मौसी (पापा की साली) को माता जी कहकर पुकारने लगे तो पिताजी बिगड़ जायेंगे :)

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  17. पहली बात गाय भैस से ज्यादा दूध देती है . और जरुरी नही हर दूध देने वाली से रिश्ता जोडा जाये

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  18. @प्रवीण शाह जी गाय को हम क्यों माता कहते है उसके और भी कारण है।प्रवीण जी देखियेगा शायद आपको संतुष्टि मिल पाये। शुरआत करते है गाय के गोबर से , गोबर के जलन से वातावरण का तापमान संतुलित होता है और वायु के कीटाणुओं का नाश ।गोबर में विष, विकिरण और उष्मा के प्रतिरोध की क्षमता होती है । जब हम दीवारों पर गोबर पोतते हैं और फर्श को गोबर से साफ करते हैं तो रहनेवालों की रक्षा होती है । १९८४ में भोपाल में गैस लीक से २०,००० से अधिक लोग मरे । गोबर पुती दीवारों वाले घरों में रहने वालों पर असर नहीं हुआ । रूस और भारत के आणविक शक्ति केंद्रों में विकीरण के बचाव हेतु आज भी गोबर प्रयुक्त होता है ।गोबर से अफ्रीकी मरूभूमि को उपजाऊ बनाया गया । गाय गोबर के प्रयोग द्वारा हम पानी में तेजाब की मात्रा घटा सकते हैं ।

    जब हम संस्कार कर्मों में घी का प्रयोग करते है तो ओजोन की परत मजबूत होती है और पृथ्वी हानिकारक सौर विकिरण से बचती है ।जुताई करते समय गिरनेवाले गोबर और गोमूत्र से भूमि में स्वतः खाद डलती जाती है ।प्रकृति के ९९% कीट प्रणाली के लिये लाभ दायक हैं । गोमूत्र या खमीर हुए छाछ से बने कीटनाशक इन सहायक कीटों को प्रभावित नहीं करते ।
    एक गाय का गोबर ५ एकड़ भूमि को खाद और मूत्र १०० एकड़ भूमि की फसल को कीटों से बचा सकता है । विश्व स्वास्थ्य संगठन स्वास्थ्य को शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक पूर्णता का सम्मिश्रण मानता है । उसका यह भी अनुमान है कि २०२० तक जीवाणु (बैक्टीरिया) एंटीबायोटिक्स के प्रभाव से मुक्त हो जायेंगे । पर हमें इसका भय नहीं है । हम पंचगव्य दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर पर भरोसा कर सकते हैं । यह सब अलग-अलग और एक सम्मिश्रण के रूप में श्रेष्ठ औषधीय गुण रखते हैं, वह भी बिना किसी परावर्ती दुष्प्रभाव (साइड एफेक्ट) के । इसके अतिरिक्त यदि हम कोई अन्य औषधि ले रहे हैं तो पंचगव्य एक रासायनिक उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) का काम करता है ।

    प्रचीन आयुर्वेद शास्त्र बताते हैं कि गोमूत्र सेव्न से रोग प्रतिरोधक क्षमता १०४% तक बढ़ जाती है ।ध : चरक संहिता के अनुसार दूध सर्वश्रेष्ठ जीवन शक्तिदाता है । दूध में पाये जाने वाला केसिन प्रोटीन शिशुओं की वृद्धि में सहायता करता है, चूना (कैल्शियम) और गंधक (सल्फर) हमारी अस्थियों को मजबूत बनाते हैं । दूध विटमिन-डी और बी-कांपलेक्स से भरपूर होता है ।
    दही : पेचिश रोकता है, मोटापे का नियंत्रण करता है और कैंसर प्रतिरोधक है ।
    घी : बुद्धि और सौंदर्य को बढ़ाता है । नेत्र रोगों में उपयोगी होता है ।
    गोमूत्र अर्क : फ्लू, गठिया (अर्थराइटिस), जीवाणु जनित रोगों, विषाक्त भोजन के दुष्प्रभावों, अपच, एडीमा और कोढ़ के उपचार में लाभदायक है ।
    पंचगव्य मिश्रण : पंचगव्य घृत, अमृतसार, घनवटी, क्षारवटी, नेत्रसार आदि औषधियाँ आयुर्वेद में बहुमूल्य मानी जाती है ।
    गाय के दूध और दुग्ध पदार्थों से स्वास्थ्यकारी व्यंजन और खाद्य पदार्थ बनाये जाते हैं । गो पदार्थ, कैंसर, तनाव, उच्च रक्त चाप, मधुमेह, हृदय रोग, स्नायुरोग, मनोरोग, चर्मरोग, कान, नाक, दंत रोंगों, ज्वर, सर्दी, केश क्षरण के उपचार में प्रभावी होते हैं । इनका उपयोग साबुन, शैंपू और सौंदर्य प्रसाधनों और सामग्री में हो सकता है । यह कृषि में सहायक हैं और खाद तथा कीटनियंत्रक देते हैं । गोबर से हम रसोई गैस और बिजली बना सकते हैं ।गुजरात सरकार गोमूत्र ३ रू. और गोबर २ रू. प्रति किलोग्राम की दर से ख्ररीदती है।

    गाय को दैविक माना गया है ।दिन गाय की पूजा से शुरू होता है ।गाय को खिलाना और उसकी पूजा करना दैविक अनुष्ठान है ।पारिवारिक उत्सवों में गाय की प्रधानता है ।ऐसे अनेक त्योहार हैं जहाँ गाय प्रमुख होती है ।अनेक मंदिरों के प्रवेशद्वार पर गाय का छप्पर होता है जिससे पवित्रता की भावना बढ़ती है ।पंचगव्य से सफाई और शुद्धि की हमारी परंपरा है ।भगवान की मूर्तियों को दूध, दही और घी से स्नान कराते हैं ।पवित्र प्रदीप प्रज्जवलन हेतु हम घृत का प्रयोग करते हैं । देवताओं को भी घी का नैवेद्य चढ़ाते हैं ।भगवान के प्रसाद में घी और दूध डाला जाता है ।देवताओं के शृंगार में मक्खन का प्रयोग होता है ।

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  19. @प्रवीण शाह

    और गाय काटने वालो के लिए क्या कहा गया है ध्यान दीजिएगा

    यः पौरुषेण क्रविषा समंक्ते यो अश्वेन पशुना यातुधानः ।
    ये अघ्न्याये भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्चः ॥

    हे अग्निदेव ! अपनी लपटों से उन दानवों के सर जला दो, जो मनुष्यों और घोड़े और गाय जैसे प्राणियों का मांस भक्षण करते और गाय का दूध चूसते हैं ।

    गाय को किस तरह से सबसे श्रेष्ठ बताया गया है देखिएगा

    सा विश्वाय़ूः सा विश्वकर्मा सा विश्वधायाः।

    गायें यज्ञों में रत सभी ऋषियों और यज्ञों के आयोजकों के आयुष्य को बढ़ायें । गाय यज्ञ के सभी संस्कारों का समन्वय करती है । अपने दूध के नैवेद्य से गाय यज्ञ के सभी देवताओं को संतुष्ट करती है ।

    वशां देवा उपजीवंति वशां मनुष्या उप ।
    वशेदं सर्वं भवतु यावतु सूर्यो विपश्यति ॥

    देवता और मानव गो पदार्थों पर जीतें हैं । जब तक सूर्य चमकेगा, विश्व में गायें रहेंगी । सारा ब्रह्मांड गाय के संबल पर निर्भर है ।

    सा नो मंद्रेषमूर्जम् दुहाना ।
    धेनुर्वा गस्मानुष सुष्टुतैतु ॥

    वह है कामधेनु – हमारी आवश्यकताओं को पूर्ण करने वाली दिव्य गाय । उसका मुख स्त्री और शरीर गाय का है । जब सागर मंथन हुआ तो वह अमृत के पूर्व निकली । उसके केशों से सुगंध फैलता है । अपने थनों से वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की वृद्धि करती है । वह आत्म ज्ञान का घर है और सूर्य, चंद्र और अग्निदेव को शरण देती है । सब देवता और प्राणी उस पर निर्भर करते हैं । तनिक सी प्रार्थना पर वह हमें भोजन और परम ज्ञान देती है । वह हमारे निकट ही रहे ।

    गावो बंधुर्मनुष्याणां मनुष्याबांधवा गवाम् ।
    गौः यस्मिन् गृहेनास्ति तद्बंधुरहितं गृहम् ॥

    गायों में लक्ष्मी का निवास है । वे पापों से मुक्त हैं । मानव और गाय का संबंध अति सुंदर है । गौविहीन घर प्रियजनविहीन के समान है ।

    यन्न वेद्ध्वनिध्यांतं न च गोभिरलंकृतम् ।
    यन्नबालैः परिवृतं श्मशानमिव तद्गृहम् ॥

    वह घर श्मशान के समान है जहाँ वेदों का पाठ नहीं होता और जहाँ गायें और बालक नहीं दिखते ।

    गोमूत्रगोमयं सर्पि क्षीरं दधि च रोचना ।
    षदंगमेतत् परमं मांगल्यं सर्वदा गवाम् ॥
    गोमूत्र, गोबर, दूध, घी, दहीं और गोरोचन – यह ६ अत्यंत पवित्र पदार्थ हैं।।।

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  20. हमारे घर मे दो दो बहुयें है मगर गौ माता को रोटी खिलाने का काम आज भी आई यानी माता जी ही कर रही हैं।और यंहा गौमाता भी बहुत नज़र आती है।एक बात सही कही आपने गौमाता संकट मे ज़रूर है,इसका जवाब देने से पहले मैं सभी भाईयों-भाभियों से क्षमा मांगते हुये दे रहा हुं।गाय हमारी माता है, भैंस हमारी माता इसलिये नही क्योंकि वो गौमाता या माता को रिप्लेस करने वाली अपने बच्चों की माता है।किसी भी सज्जन या देवी को बुरा मानने की ज़रूरत नही है ये मैं सिर्फ़ गौमाता को गौशाला और भैंसो को शानदार फ़ार्म हाऊस और माताओं को वृद्धाश्रम मे और बहुओं को घर मे देख कर कह रहा हूं।सब ऐसे नही हैं।ज्यादा भी नही है लेकिन थोड़े बहुत तो हैं और ये उन्ही के लिये।जो ऐसे नही है वे सभी पूज्यनीय है जिनके लिये माता और गौमाता आज भी पूज्यनीय है।

    जय हिंद।

    खुशदीप भाई मरवाओगे एकाध दिन बहुत कठीन-कठीन टापिक सामने ला देते हो।

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  21. मिथिलेश भाई,
    ये संयोग ही है कि गाय वाला लेख लिखने से पहले मैंने तुम्हारा लेख नहीं पढ़ा...तुम्हारी टिप्पणी के बाद इसे पढ़ा...दोनों की मूल भावना वही है कि हमने गाय को सम्मान देना बंद कर दिया है...शास्त्र सम्मत बड़े अच्छे ढंग
    से तुमने अपनी बात रखी है...मैंने गौर से इसे भी पढ़ा और अपने लेख पर तुम्हारी विस्तृत टिप्पणियों को भी...मैं जिस चर्चा को आगे बढ़ाना चाहता था, जिन मुद्दों को रखना चाहता था, उन्हें तुमने सुंदर भाव देते हुए पहले ही उठा दिया है...साथ ही मेरा काम भी आसान कर दिया...अब बस मैं निष्कर्ष के तौर पर कुछ बिंदु ही अगली पोस्ट पर रखूंगा...
    जय हिंद...

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    1. बचपन में कभी सुना था पूरा याद नहीं हैं. वेदो के अनुसार माता के ३२ गुण होते है। ऋषि-मुनियो ने जिस भी सजीव-निर्जीव में इन में से कोई भी गुण पाया, उसे माता का दर्ज़ा दिया. गाय को उसके दुग्ध के कारण दिया, क़ि माँ के बाद शिशु के लिए गाय का दुग्ध सर्वोतम है. इसी प्रकार, नदी, धरती, तुलसी को इन के गुण (जो की माता के गुणों से मिलते है ) के कारण माता कहा। अन्य गुण याद नहीं (क्षमा सहित)

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  22. भैंस को माता इसलिये नहीं कहते कि झोटे को पिता कौन कहे...?

    बहरहाल
    आज के दौर में बहुत जरूरी है गऊ माता का पूजन-पोषण..

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  23. Main mithlesh se poori tarah sahmat hoon..... main gaay ki mahatta bahut achche se jaanta hoon..... Gorakhpur mein .... mera paitrik niwaas hai..... wahan hamare khet-khalihan hain.... humne wahan 4 bhains... aur 6 gaay paali huyi hain..... aur kai saare desi kutte rehte hain.....

    meri ek gaay hai..... jiska naam chhamiya hai..... jab wo choti thi to uske pairon mein humne paayal pehna di thi aise hi mazaak mazaak mein...tabse uska naam chhamiya pad gaya..... wo hamein har shagun-apshagun bata deti hai.... aur main jab uske paas rehta hoon to wo doodh zyada deti hai....

    ek baar mujhse ...kaha gaya tha ki kaale kutte aur gaay ko roti khilaane ke liye..... aisa karne se musibaten tal jaatin hain aur aapke bigde huye kaam ban jaate hain...... aur maine aisa hi kiya..... aur sab sahi hua...tabse main in saari baaton ko bahut maanta hoon....

    gaay ko maarne ka chalan bhi hindustan mein san 1940 se shuru hua..... jabki aap yeh dekhiye,..... ki usse pehle hindustan mein gaayon ka vadh nahi hota tha...yeh sab siyaasi khel tha.....

    gaay ko devi ka aur bhagwaan ka darja isiliye diya gaya..... kyunki wo hamare liye bahu upyogi hai..... aur ishwar ki tarah hamein kai jeevan daayini cheezen deti hai..... yeh scientifically proved bhi hai.....

    JAI HIND
    JAI HINDI
    JAI BHARAT....

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  24. Tabiyat kharaab hai.... abhi aur bhi views hain.... unko materialise karne mein tym lag raha hai..... jaise hi thodi tabiyat sambhalti hai.... phir aata hoon....

    JAI HIND
    JAI HINDI
    JAI BHARAT....

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  25. खुशदीप जी ! आपने बात तो सौ टके सही की हैं ,यदि गाय को माँ माने तो भैस को मौसी तो मान ही सकते हैं वैसे तो आज कल जेनेटिक साइंस के जमाने में यह आसान भी हैं ।


    मुझे लगता हैं कि गाय की दुध और गाय जैसे उपकारी पशु जो अर्थ तंत्र से भी जुड़ी हुई है ,गौ मूत्र ,गोबर ,दुध हमारे लिए सभी उपयोगी है । सुपाच्च होने के कारण बच्चे ,बुजुर्ग ,रोगी ,भोगीयों के लिए बहुत ही लाभदायक हैं ,मिथिलेश भाई ने तो इसे बहुत ही अच्छी तरह लिखा भी हैं ,मैं एक बात कहना चाहता हूँ कि गाय को गाय ही रहने दे तो बहुत अच्छा रहेगा ।

    गाय की दुध आज सपना बनता जा रहा हैं ,चाहे शहर हो या कस्बा, हर स्थान पर अधिकांशत: रसायनिक दुध ही उपलब्ध हैं, दुध के नाम पर जहर ही बिक रही हैं ,शहरों में जो स्थिति है आपने ठीक ही उदाहरण प्रस्तुत किया है ,

    जहॉं तक किसानों के पास 200 .200 गाय होने की बात राज भाटिया जी ने किया हैं यह हो सकता हैं परन्तु आज ट्क्टरों के चलते जब नंागलों का चलन कम होता जा रहा हैं तो अपेक्षाकृत गाय भी दूर्लभ होता जा रहा हैं ।

    राज भाटिया जी बड़ा भाग्यवान हैं


    आपने शहरों में गाय को रोटी खिलाने की उदाहरण से स्थिति की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहा हैं,गायों के पेट में पोलिथीनों का भण्डार और मौत दोनों अधिकता से देखा जा रहा हैं निश्चित रूप से गाय को बचाने के लिए हमें एक मुहिम चलाना ही पड़ेगा ।

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  26. खुशदीप जी हम्रे यहाँ बहुत गायें हैं ऐसा करते हैं कि आपके नाम पर रोज़ एक रोटी डाल दिया करूँगी कभी मिले तो हिसाब किताब कर लेंगे। उतनी ही रोटियाँ आपके यहाँ खा जायेंगे क्यों सही है न? शुभकामनायें

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  27. खुशदीप जी-अगर आपको गाय ना मिले तो रोटी सांड को ही खिला दिया करो, वो भी गाय का कुछ लगता है और कुछ ना भी लगे बिरादरी का तो है, गांव मे एक सांड छोड़ा जाता है उसकी इतनी इज्जत होती है कि यदि वह किसी के खेत मे घुस कर फ़सल खा रहा तो भी उसको खेत से बाहर नही निकाला जाता,आखिर सांड जो है। और रही भैंस की बात- इसके तो दुर्दिन उसी समय शुरु हो गये थे जिस दिन से यमराज ने इसके भैंसे की सेवा अपनी सवारी के रुप मे ली। लोग भैंस के दुध का उपयोग करते हैं बस उससे कोई रिश्तेदारी नही निकालते, कहीं भैंसा नाराज हो कर यमदुत ही ना भेज दे, इसलिए समझदारी का काम यही है कि भैंसा कुल से माता, बुआ, बहन आदि किसी तरह का संबंध न रखें तो ही भलाई है।

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  28. भाई आपने तो दिमाग की घंटी बजा दी. और हमको तो मालूम था कि एक दिन ये गाय को गायब कर देंगे सो हमने तो पहले ही भैंस पाल रखी है और यमराज जी से सीधी रिश्तेदारी कर रखी है, कोई चिंता नही.:)

    रामराम.

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  29. १७६० – राबर्ट क्लाइव ने कोलकाता में पहला कसाईखाना खोला ।
    १८६१ – रानी विक्टोरिया ने भारत के वाइसराय को लिख कर गायों के प्रति भारतीयों की भावनाओं को आहत करने को उकसाया ।
    १९४७ – स्वतंत्रता के समय भारत में ३०० से कुछ अधिक कल्लगाह थे । आज ३५,००० अधिकृत और लाखों अनधिकृत वधशालाएँ हैं ।
    गाय की प्रजातियाँ ७० से घटकर ३३ रह गई हैं । इनमें भी कुछ तो लुप्त होने के कगार पर हैं ।
    स्वतंत्रता के बाद गायों की संख्या में ८० प्रतिशत की गिरावट आई है ।
    १९९३-९४ भारत ने १,०१,६६८ टन गोमांस निर्यात किया । १९९४-९५ का लक्ष्य दो लाख टन था ।
    हम वैनिटी बैग और बेल्ट के लिये गाय का चमड़ा, मन्जन के लिये हड्डियों का चूर्ण, विटामिन की गोलियों के लिये रक्त और सोने-चांदी के वर्कों हेतु बछड़े की आंतें पाने के लिये गो हत्या करते हैं ।
    ऐसा समझा जाता है कि १९९३ में लातूर और १९९४ में बिहार जैसे भूकंपों के पीछे गो हत्या का कारण है ।

    रामायण में रघुवंश का आरंभ दिव्य गाय की आशिष से होता है ।
    महाभारत युग में श्री कृष्ण और उनके कुटुंबियों द्वारा गाय की अनुकरणीय सेवा की गई ।
    अद्वैत दर्शन की पुनर्स्थापना में आदि शंकराचार्य ने गाय को प्रमुख स्थान दिया ।
    गायों की देख-भाल, उनके लिये चरने योग्य भूमि, आहार, की सार संभाल के लिये चाणक्य के अर्थशास्त्र (मौर्य युग में) एक गो अध्यक्ष नामक राजकीय अधिकारी की नियुक्ति की जाती थी । (कौटिल्य अर्थशास्त्र – गो अध्यक्ष अध्याय)
    अशोक महान का विश्वास था कि राष्ट्र की समृद्धि और गौरव हेतु गायों का विकास आवश्यक है ।
    शातवाहन वंश ने गोपालन और गोदान को सर्वाधिक महत्व दिया ।
    गायों के लिये राजपूतों ने अपने प्राण दे दिये । कुटिल उद्देश्यों तहत मोहम्मद गोरी ने अपने सैनिकों के आगे गायें रखकर पृथ्वीराज पर आक्रमण किया । गायों की हत्या न करपाते हुए पृथ्वीराज ने हार मान ली ।
    शिवाजी ने १७ वर्ष की आयु में वधशाला के तरफ गाय को खींचकर ले जाते हुए कसाई का शिरच्छेद किया ।
    मुगलवंश के संस्थापक बाबर ने अपने पुत्र हुमायुं को गायों को कभी न मारने को लिखा ।
    अबुल फजल ने आईने अक्बरी में लिखा कि हिंदू प्रजा की भावनाओं का सम्मान करते हुए अकबर ने गोमांस भक्षण पर प्रतिबंध लगा दिया था ।
    अपने यात्रा विविरण में बर्नियर ने लिखा है कि जहांगीर के राज्य में गो हत्या प्रतिबंध सख्ती से पालन होता था ।
    विजयनगर राजय में बहु संख्यक लोग मांस भक्षण करते थे । पर गोमांस को कोई भी नहीं लेता था ।
    मैसूर राज्य के आयुक्त मार्क कबन ने राज्य प्रशासन को ९ भागों में विभक्त किया । इनमें से एक विभाग कर्नाटक के गौरव अमृत महल बैलों के नाम पर रखा गया और इसमें गो पालन का कार्य होता था ।
    सर्वोच्च न्यायालय के १९५८ के एक निर्णय में उल्लेख है कि १८वीं सदी में हैदर अली का आदेश था कि गोवधकर्ता के हाथ काट दिये जाने चाहिए ।

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  30. मैसूर राज्य में ४,१३,५३९ एकड़ भूमि पर २४० चरागाह मैदान थे । जो कि ‘बेण्णे चावड़ी’ प्रजाति की गायों के लिये थे । ये गायें १६१७ के वर्ष के आसपास राज्य संरक्षण में फल फूल रही थीं । टीपू सुल्तान के समय में इनका नाम अमृत महल रख दिया गया और इनके लिये सुरक्षित की गयी भूमि को अमृत महल सुरक्षित भूमि से सूचित किया गया ।
    पहला स्वतंत्रता संग्राम (१८५७) अंग्रेजों द्वारा कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी के प्रयोग के कारण हुआ ।
    अपने वंश में सर्वाधिक शक्तिशाली माधवराव पेश्वा ने गो हत्या पर प्रतिबंध लगाया । उनका विचार था कि गो भक्षकों को समस्त भारत से निकाल दिया जाये ।
    १८७२ में नामधारी सिखों के नेतृत्व में पंजाब में कल्लगाहों की स्थापना के विरुद्ध कुका आंदोलन हुआ ।
    वीर सावारकर, चंद्रशेखर आजाद, बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, वल्लभभाई पटेल और महात्मा गांधी जैसे प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों ने गो हत्या के विरोध में आवाज उठाई । यह वचन दिया गया कि स्वतंत्र भारत में गो हत्या पर रोक लगेगी ।
    संविधान की धारा १८ में गो हत्या पर प्रतिबंध लगाने की बात है ।
    १९६६ में गोवध विषेध हेतु लाखों लोगों ने संसद के विकट प्रदर्शन किया ।
    १९७९, १९८५, १९९०, १९९४, १९९९ और २००० में संसद में गो हत्या विषेध के लिये सदस्यों ने निजी प्रस्ताव प्रस्तुत किये ।
    तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने १९८२ में राज्य सरकारों से गोवध पर प्रतिबंध लगाने को लिखा ।
    १९४४ में गुजरात में और बाद में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में गो हत्या पर रोक लगा ।
    राष्ट्रीय मवेशी आयोग २००१ में स्थापित हुआ ।
    श्री दत्त शरणानंदजी महाराज के नेतृत्व में राजस्थान में पथमेडा में गोपाल गोवर्धन गोशाला के अंतर्गत एक लाख से भी अधिक गायों का पालन पोषण होता है ।

    क्यूबा में फिडेल कास्प्रो द्वारा बनाया हुआ गो हत्या विषेध कानून आज भी लागू है ।
    ईरान में गोहत्या पर कानूनी प्रतिबंध है ।
    इंडोनेशिया के नूपानिसद द्वीप में गोमांस भक्षण निषिद्ध है ।
    ब्राजील की ९८% गायें भारतीय ओंगोल प्रजाति कि हैं ।
    आस्ट्रेलिया आदि देशों ने भारतीय और स्थानीय गायों के संकर प्रजनन द्वारा ‘ब्राह्मण’ प्रजाति की गायें तय्यार की हैं ।
    दक्षिण अफ्रिका में दहेज में २० गायें देने की परंपरा है ।
    बर्मा में गो हत्यारों को फांसी दी जाती थी ।
    अफगानिस्तान में ११०वां अहल सुन्नत ने गो हत्या के विरुद्ध फतवा जारी किया है ।
    बेबिलोन और सुमेरु सभ्यताओं में गोवध निषिद्ध था ।

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  31. गाय पशुधन है... धन है इसलिए कुछ ज्‍यादा महतवपूर्ण मान ली गई वरना मूलत: पशु ही है। 'होली काऊ' दुनियाभर में भारतीयों की ठेठ अवैज्ञानिकता के वर्तमान तक चले आने के कारण उनके लिए उपहासात्मक कथन हो ही गया है... गाय का गोबर भेंस के गोबर से या गाय का दूध भैंस के दूधसे... आदि आदि की तुलना का ओचित्‍य ही क्‍या... और फिर इसी तर्क पर वे जो गौमांस खाते हैं उन्‍हें तो और अधिक पौष्टिकता मिलती होगा...गाय का सत्‍व उनके रक्‍त में मिल जाता है...गायभक्तों को इन लोगों की उपासना करनी चाहिए।

    गाय के मारे जाने से भूकंप आते हैं... होली काऊ

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  32. .
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    @मिथलेश दुबे जी,
    आपकी आस्था व विश्वासों पर तो कुछ नहीं कहूंगा, परन्तु अपने तर्क के पक्ष में आपने जो बहुत सी अतार्किक और अवैज्ञानिक बातें लिखी हैं उनका प्रतिवाद आवश्यक है...

    "१९८४ में भोपाल में गैस लीक से २०,००० से अधिक लोग मरे । गोबर पुती दीवारों वाले घरों में रहने वालों पर असर नहीं हुआ । रूस और भारत के आणविक शक्ति केंद्रों में विकीरण के बचाव हेतु आज भी गोबर प्रयुक्त होता है ।"

    एक भी विश्वस्त साक्ष्य या रिफरेन्स दे सकते हैं आप अपने उपरोक्त कथनों का?

    "एक गाय का गोबर ५ एकड़ भूमि को खाद और मूत्र १०० एकड़ भूमि की फसल को कीटों से बचा सकता है ।"

    किसी भी कृषि विश्वविद्यालय का इस कथन के समर्थन में शोध का रेफरेन्स दे सकते हैं आप? मैं यहाँ पर यह मानता हूँ कि गोबर व गोमुत्र से खाद बनाई जा सकती है परन्तु गाय या भैंस के गोबर व मूत्र में कोई विशेष अंतर नहीं है।

    "हम पंचगव्य दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर पर भरोसा कर सकते हैं । यह सब अलग-अलग और एक सम्मिश्रण के रूप में श्रेष्ठ औषधीय गुण रखते हैं, वह भी बिना किसी परावर्ती दुष्प्रभाव (साइड एफेक्ट) के । इसके अतिरिक्त यदि हम कोई अन्य औषधि ले रहे हैं तो पंचगव्य एक रासायनिक उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) का काम करता है ।"

    दूध ,दही और घी खाद्य हैं मेरा विरोध नहीं, पर गोबर और गाय का मूत्र निश्चित तौर पर अखाद्य और अपेय हैं किसी भी मेडिकल जर्नल का उल्लेख कर सकते हैं क्या आप अपनी उपरोक्त मान्यता के समर्थन में।

    "जब हम संस्कार कर्मों में घी का प्रयोग करते है तो ओजोन की परत मजबूत होती है और पृथ्वी हानिकारक सौर विकिरण से बचती है ।"
    "गोबर के जलन से वातावरण का तापमान संतुलित होता है और वायु के कीटाणुओं का नाश ।"

    कोई भी जानवर या पौधे से निकली (organic)चीज यदि जलाई जाती है तो उष्मा और कार्बन डाई ऑक्साइड निकलेगी, चाहे घी जले, गोबर जले या फिर लकड़ी, वातावरण को एक समान हानि/लाभ होंगे।

    यह cow fixation पूरी दुनिया के पास हमारे उपहास का बहाना हो गया है, मसिजीवी से सहमत, जितनी जल्दी हम इससे उबरें, उतना बेहतर होगा।

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  33. वैरी सिंपल सहगल साहब, माता एक ही होती है और वो गाय हो चुकी है और इसीलिये आजकल भैंस को हमने तो आँटी याने मौसी कहना शुरू कर दिया है, फ़ॉर युवर काइण्ड इंफ़ॉरमेशन। हा हा।
    उम्दा जानकारियों से युक्त लेख और टिप्पणियाँ। आभार।

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  34. @प्रवीण जी

    आप नें आस्था व विश्वास की बात की है तो आपको बताना चाहूँगा कि मैं उस घर से ताल्लुक रखता हूँ जहाँ रसोईं में बना खाने का भोग सबसे पहले गाय माता करती हैं तब घर वाले । और आपको मालुम होगा की मैं वाराणसी से हूँ जहाँ हर गली और नुक्कण पर गाय दिखती है, और खुद मेरे घर चार गाय है। कभी मिलियेगा तो गाय के दूध का शुद्ध घी खिलाऊंगा।

    उत्तराखंड गोसंव‌र्द्धन समिति के संरक्षण में चलने वाले स्वामी विषुदानंद महाराज के गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र के अलावा योग गुरु स्वामी रामदेव के पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में भी गोमूत्र के अर्क तथा जड़ी-बूटियों से कई रोगों की दवाइयां बनाई जाती हैं। स्वामी विषुदानंद ने बताया कि उनके केंद्र ने गोमूत्र के अर्क तथा जड़ी-बूटियों से हृदयरोग के लिए गोतीर्थ हृदयरक्षक, उच्च तथा निम्न रक्तचाप के लिए गोतीर्थ रक्तचाम नियंत्रक, मधुमेह के लिए गोतीर्थ मधुमेहहारि, शरीर के भीतरी तथा बाहरी अंगों की सूजन दूर करने के लिए गोतीर्थ शोधहर, मोटापा घटाने के लिए गोतीर्थ मेदोहर अर्क, जोड़ों के दर्द, गठिया, आर्थराइटिस के लिए गोतीर्थ पीडाहर, पेट के विकारों के लिए गोतीर्थ उदर रोग हर, खुजली और फोड़े, फुंसियों, दाद, रिंगवर्म तथा रक्त दोष जन्य विकारों के लिए गोतीर्थ अर्क, गुर्दो की कार्यप्रणाली तथा गुर्दे के रोगों के लिए गोतीर्थ लीवर टानिक, एड्स और यौन रोगों के लिए गोतीर्थ यौवन रक्षक अर्क एवं बवासीर के लिए गोतीर्थ बवासीर नाशक सहित लगभग 24 औषधियों का निर्माण किया है।

    स्वामी विषुदानंद ने दावा किया कि गोमूत्र अर्क तथा जड़ी-बूटी मिश्रित औषधियों के सेवन से असाध्य और लाईलाज बीमारियां ठीक हो जाती हैं तथा ये औषधियां काफी सस्ती भी हैं जिससे गरीब लोग भी इनसे उपचार कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि इन पवित्र औषधियों के सेवन से केवल शरीर की रक्षा ही नहीं होती बल्कि तन, मन, विचार, विकार तथा संस्कार सभी परिशुद्ध हो जाते हैं। लोगों में नई ऊर्जा का संचार होता है तथा मानसिक शांति की अनुभूति होती है। देशी गाय अपनी निश्रवास से आक्सीजन छोडती है। जो मनुष्य एवं पर्यावरन को स्वस्थ रखती है । वर्तमान में वायु, जल, ध्वनि के साथ खाघ -प्रदुषण चिन्तनिय है। क्रषि -रसायनो के दूरगामी परिणामो मे गर्भपात, विकलागता की भी चर्चा हो रही है। बालो का सफेद होना ,लेगिक असन्तुलन ,प्रजनन प्रणाली मे विक्रेति एव कैसर के पीछे कीटनाशको का अनियन्त्रित उपयोग है। रासायनिक खाद का मात्र ३० प्रतिशत ही मिट्टी मे घुल पाता हैं। बाकी पत्थर भाति यथावत् रहकर मिट्टी को बंजर बनाता है। विश्व की ५२ प्रतिशत सें ज्यादा भूमि बंजर हो चुकी हैं।




    गोमूत्र में फासफोरस, पोटाश, लवण, नाईट्रोजन, यूरिक अम्ल, हारमोन, साइटोकाइन्स तथा जीवाणु एवं विषाणु नाशक तत्व होते हैं। गव्य रसायन शास्त्र के मतानुसार गोमूत्र में नाईट्रोजन, गंधक, अमोनिया, तांबा, फास्फोरस, कार्बोलिक अम्ल, लेक्टोज, विटामिन ए, बी, सी, डी तथा ई, एन्जाइम, हिम्यूरिक अम्ल तथा क्रियेटिव तथा स्वर्णक्षार आदि तत्व पाए जाते हैं। दुधारू गाय के मूत्र में लेक्टोज भी मौजूद रहता है जो हृदय और मस्तिष्क के रोगों में बहुत लाभकारी है। आठ महीने की गाभन गाय के मूत्र में पाचक रस [हार्मोन्स] अधिक होते हैं।

    आयुर्वेद के अनुसार गोमूत्र, लघु अग्निदीपक, मेघाकारक, पित्ताकारक तथा कफ और बात नाशक है और अपच एवं कब्ज को दूर करता है। इसका उपयोग प्राकृतिक चिकित्सा में पंचकर्म क्रियाएं तथा विरेचनार्थ और निरूहवस्ती एवं विभिन्न प्रकार के लेपों में होता है। आयुर्वेद में में संजीवनी बूटी जैसी कई प्रकार की औषधियां गोमूत्र से बनाई जाती हैं। गौमूत्र के प्रमुख योग गोमूत्र क्षार चूर्ण कफ नाशक तथा नेदोहर अर्क मोटापा नाशक हैं।

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  35. ब्रिटेन के डा. सिमर्स के अनुसार गोमूत्र खून में मौजूद दूषित कीटाणुओं का नाश करता है तथा पुराने घावों बढ़ते हुए मवाद [पीब] को रोकता है और यह बालों के लिए एक कंडीशनर की तरह उपयोगी है। दिल संबंधित रोगों, टीबी, और पेट की बीमारियों तथा गुर्दे संबंधी खराबियों में गोमूत्र और गाय के गोबर का मिश्रित इस्तेमाल काफी लाभकारी है। गुर्दे में पथरी के लिए 21 दिनों तक लगातार गोमूत्र का सेवन बड़ा लाभकारी सिद्ध होता है। गाय के गोबर को जलाने से एक क्षेत्र विशेष का तापमान कभी एक सीमा से ऊपर नहीं जाने पाता। भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते। धुआं हवा में मौजूद विषाणुओं को नष्ट करता है। गाय के गोबर और मिट्टी का मिश्रण घरो के लिए एटीसेपटिक का कार्य करता है।गाय के गोबर की खाद से रासयिनक खाद और कीट नाशको से होने बाला प्रदूषण नष्ट किया जा सकता है।यह प्रभावी प्रदूषण नियन्त्रण है। गाय के गोबर से सौर विकिरण का प्रभाव नष्ट किया जा सकता है। गोबर का छिडकाव कूडा ढेर से बदबू भी हटा सकता है।


    प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य हरिओम शास्त्री के अनुसार गोमूत्र श्वांस, कास, शोध, कामला, पण्डु, प्लीहोदर, मल अवरोध, कुष्ठ रोग, चर्म विकार, कृमि, वायु विकार मूत्रावरोध, नेत्र रोग तथा खुजली में लाभदायक है। गुल्य, आनाह, विरेचन कर्म, आस्थापन तथा वस्ति व्याधियों में गोमूत्र का प्रयोग उत्तम रहता है। गोमूत्र अग्नि को प्रदीप्त करता है, क्षुधा [भूख] को बढ़ाता है, अन्न का पाचन करता है एवं मलबद्धता को दूर करता है। गोमूत्र से कुष्ठादि चर्म रोग भी दूर हो सकते हैं तथा कान में डालने से कर्णशूल रोग खत्म होता है और पाण्डु रोग को भी गोमूत्र समाप्त करने की क्षमता रखता है। इसके अलावा आयुर्वेदिक औषधियों का शोधन गोमूत्र में किया जाता है और अनेक प्रकार की औषधियों का सेवन गोमूत्र के साथ करने की सलाह दी जाती है। आयुर्वेद में स्वर्ण, लौह, धतूरा तथा कुचला जैसे द्रव्यों को गोमूत्र से शुद्ध करने का विधान है। गोमूत्र के द्वारा शुद्धीकरण होने पर ये द्रव्य दोषरहित होकर अधिक गुणशाली तथा शरीर के अनुकूल हो जाते हैं। रोगों के निवारण के लिए गोमूत्र का सेवन कई तरह की विधियों से किया जाता है जिनमें पान करना, मालिश करना, पट्टी रखना, एनीमा और गर्म सेंक प्रमुख हैं।

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  36. ब्रिटेन के डा. सिमर्स के अनुसार गोमूत्र खून में मौजूद दूषित कीटाणुओं का नाश करता है तथा पुराने घावों बढ़ते हुए मवाद [पीब] को रोकता है और यह बालों के लिए एक कंडीशनर की तरह उपयोगी है। दिल संबंधित रोगों, टीबी, और पेट की बीमारियों तथा गुर्दे संबंधी खराबियों में गोमूत्र और गाय के गोबर का मिश्रित इस्तेमाल काफी लाभकारी है। गुर्दे में पथरी के लिए 21 दिनों तक लगातार गोमूत्र का सेवन बड़ा लाभकारी सिद्ध होता है। गाय के गोबर को जलाने से एक क्षेत्र विशेष का तापमान कभी एक सीमा से ऊपर नहीं जाने पाता। भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते। धुआं हवा में मौजूद विषाणुओं को नष्ट करता है। गाय के गोबर और मिट्टी का मिश्रण घरो के लिए एटीसेपटिक का कार्य करता है।गाय के गोबर की खाद से रासयिनक खाद और कीट नाशको से होने बाला प्रदूषण नष्ट किया जा सकता है।यह प्रभावी प्रदूषण नियन्त्रण है। गाय के गोबर से सौर विकिरण का प्रभाव नष्ट किया जा सकता है। गोबर का छिडकाव कूडा ढेर से बदबू भी हटा सकता है।

    गोवर के कढे मे विषाणुनाशक तत्व होते है। यह प्लेग निवारक भी है। गोबर मे “एटिसेप्टिक तथा एटी''-रेडियोथर्मल गुण होता है। साथ ही १६ उपयोगी खनिज भी। कूढे -कचरे से खाद बनाने से लेकर सूखे तेल के कूये में पुनः तेल लाने के लिए गोबर का उपयोग किया जाता है। अगर देश के समस्त गोवंश के गोवर का वायोगैस मे सयत्र मे उपयोग किया जाए तो वर्तमान मे ईधन के रूप मे जलाई जा रही ६ करोड ८० लाख टन लकडी की बचत की जा सकती है। इससे वातावरण शुद्ध कर भू उर्वरता वढाता है। नीम से मिलकर जैव -कीटनाशक के रूप मे अत्यन्त फलदायी होता है।

    गाय के गोबर व मुत्र में जो पदार्थ पाये जाते हैं उनका एक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा हूँ।

    यूरिया: प्रोटीन चयापचय के उत्पाद. मजबूत रोगाणुरोधी एजेंट.
    यूरिक एसिड: microbail विरोधी गतिविधियों को कैंसर नियंत्रण में मदद करता है.
    नाइट्रोजन: मूत्रवर्धक, गुर्दे उत्तेजित करता है
    सल्फर: शुद्ध रक्त, आंतों peristalsis बढ़ता है
    बयान कॉपर: नियंत्रक वसा
    लौह: आरबीसी के खून में उत्पादन
    सोडियम: शुद्ध रक्त, चेक अम्लता यानि एसिडिटी
    पोटेशियम: क्षुधावर्धक, मांसपेशियों में थकान समाप्त
    अन्य लवण: जीवाणुरोधी, अल्पविराम और ketoacids रोकता है
    पांगविक एसिड: जीवाणुरोधी, गैस gangrenes रोकता है
    अमोनिया: शरीर के ऊतकों और रक्त की वफ़ादारी
    चीनी-लैक्टोज: हार्ट, प्यास, चक्कर
    , ई.पू. विटामिन ए, डी, ई: अत्यधिक प्यास रोकें, उत्साह को बढ़ावा वृद्धि शक्ति
    Creatinine: जीवाणुरोधी
    स्वर्ण Kshar: जीवाणुरोधी, (aurum हीड्राकसीड) प्रतिरोधक क्षमता में सुधार इलाज के रूप में कार्य
    एंजाइम-urokinase: खून का थक्का भंग, हृदय रोग, रक्त परिसंचरण में सुधार
    कॉलोनी उत्तेजक पहलू: कोशिका विभाजन और गुणा के लिए प्रभावी
    Erythropoietin उत्तेजक पहलू: RBCs का उत्पादन
    Gonadotropin: मासिक धर्म चक्र, शुक्राणु उत्पादन को बढ़ावा
    Kallikrein: विज्ञप्ति Kallidin जो परिधीय नसों फैलता है और रक्तचाप कम कर देता है.
    Allantoin: घाव भर देता है और ट्यूमर
    कैंसर विरोधी तत्व: कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि रोकता है
    Phenols: जीवाणुनाशक, ऐंटिफंगल

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  37. प्रवीण जी..........ये मिथिलेश दुबे जी को समझाना दीवार में सर मारने के बराबर है। ये हर वस्तु की महत्ता उसकी उपयोगिता और तथीकथित धर्मशास्त्रों के अनुसार लगाते हैं।
    तो आप क्यों बहस करके अपना खून जला रहे हैं।
    मिथिलेश जी तो आपने बताया कि गाय( जानवर ) के बहुत से उपयोग हैं। तो भई आपसे बङा स्वार्थी तो कोई हो ही नहीं सकता जो केवल फ़ायदे वाली वस्तुओं से ही खुश होते हैं। ऐसे तो हर वो जानवर बेकार है जो किसी काम नहीं आता।
    क्यों भई सिथिलेश जी ज़वाब दो।

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  38. अच्‍छा प्रश्‍न उठाया आपने .. कम से कम इसी बहाने मिथिलेश दूबे जी से इतना कुछ जानने को तो मिला .. उनकी टिप्‍पणियों से आपकी पोस्‍ट अधिक ज्ञानवर्द्धक हो गयी .. आपका और मिथिलेश दूबे जी को बहुत बहुत धन्‍यवाद !!

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  39. @अमृत पाल सिंह जी

    क्या कहूँ आपसे न पता आप क्या जाहिर करना चाहते है। जहाँ तक आप समझाने की बात कर रहे है तो तर्क के साथ समझाईये तो शायद समझ जाऊ, ये फालतु विरोध मात्र से तो मैं आपकी बात नहीं मान सकता । आप शास्त्रो को तथाकथित कह रहें है, आपकी सोच जानकर दुःख हुआ। खैर जाने दीजिए, एक बात साफ हो गयी है कि आप इस समय पुर्वाग्रह सर ग्रसित हैं । जरा इससे बाहर आईये और भी कुछ सोचिये, जो आकड़े या जो बाते मैंने अपनी टिप्पणी मे कही है उसका विरोध आप अपने तर्क से करिये ना, ये प्रवीण जी के हाँ में हाँ मिलाने से क्या होगा उन्होने जो कुछ भी पुछा उसके पिछे कुछ तर्क था, और आपके ? । मैंने गाय की उपयोगिता को बताया तो मैं स्वार्थी हो गया वाह जी क्या बात है। अगर गाय उपयोगी नहीं है तो आप उसको गलत ठहराईये अगर कुछ तर्क हों आपके पास। और गाय को हम ज्यादा महत्ता इसलिए भी देते है कि वह हमारे धर्म मे उच्चय स्थान पर है। और अगर आप ध्यान से देखेंगे तो इस पृथ्वी पर जन्म लेने वाला हर प्राणी चाहे वह मनुष्य हो या जानवर उसकी अपनी उपयोगिता होती है। मैंने जो भी बात कहीं है उपर वह बस शास्त्रो से ही तो नहीं है , फिर से पढ़िये मेरे कंमेन्ट।

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  40. Ap logo ki budhdhi ka bhi jawab nahi....gaaye ki bohot chinta ha apko jo prakarti ki ek rachna ha...aur baki ki rachnaye???kabi dekha ha us nanhe bacche ko sadak k kinare khade paise mangte hue...yakin ha mujhe dekha hoga...kabi rok kar use apne ghar laye aap???ya uska thikana pucha???1-2 rupye zaroor de diye honge vo b picha chutane k liye ua punya k lalach me....janab bohot kuch aisa ha jipar sochna..na sirf sochna kuch karna zada zaroori ha..
    aap sabse nivedan ha is bujhti aag ko hawa mat do...mat chidko mitti ka tail isme...chodo in bato ko..inka ant nahi ha...zindgi jiyo sukun se aur jine do sabko....chodo in baaato ko yahi...

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  41. .
    .
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    @ मिथिलेश दुबे,

    अमृतपाल जी यहाँ पर यह कहना चाहते हैं कि आपने मेरी दूसरी टिप्पणी में उठाये सवालों का जवाब तो दिया नहीं अपने जवाब में...गोबर और गोमूत्र महत्व-पुराण और लिख दिया है।

    गोबर और गोमूत्र के कम्पोजिशन का जो विश्लेशण आपने प्रस्तुत किया है वह BOVINE श्रेणी के सभी पशुओं यानी भैंस के गोबर और भैंस-मूत्र के लिये भी लागू होना चाहिये।

    सभी स्तन पायी पशुओं (मनुष्य शामिल) की PHYSIOLOGY कमोबेश समान ही होती है,मुत्र के रूप में जो कुछ भी शरीर के लिये अनुपयोगी/आवश्यकता से अधिक होता है वे मूत्र के रूप में उत्सर्जित करते हैं हो सकता है कि मूत्र के हजारों घटक हों पर मानव शरीर के लिये उसकी उपयोगिता संदेहास्पद ही रहेगी, वह तब जब इन फायदेमन्द तत्वों को लेने के बेहतर विकल्प मौजूद हैं।

    पशु के मल और मूत्र से इलाज करना और ढूंढना प्रागैतिहासिक मानव की आदिम प्रवृत्ति है...अब तो हम कंदराओं से बाहर आ गये हैं मित्र!

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  42. मिथिलेश....प्रवीण शाह...और अम्रत पाल सिंह जी की बहस पढी...

    ये सब पढने के बाद मैं मिथिलेश जी से एक सवाल करना चाहुंगा....

    आप जब अपनी "गौ माता" (जानवर) से इतना प्रेम करते है तो उनकी सेवा क्यौं नही करते है???

    अपना काम धंधा छोडकर कमज़ोर, अवारा, बीमार, गायों को इलाज क्यौं नही करते हो????

    तब आपका प्रेम कहां जाता है जब यही गाय सडक पर पालीथीन खाकर बीमार हो जाती है और आखिर में मर जाती है???

    अरे सर आस्था वगैरह सब खत्म हो गयी कुछ नही बची है आप क्या समझते है कितने हिन्दु मासांहारी नही है?? मैं आगरा के नाई की मण्डी श्रेत्र में रहता हूं यहां रोज़ 700-800 किलों सिर्फ़ बिरयानी बिकती है वो भी सिर्फ़ बीफ़ की....और दुसरे व्यंजनों की बात अलग है.....

    70% हिन्दु यहां खाना खाते है....सुबह 6 बजे से रात के 2 बजे तक...यहां हिन्दु दुकानदारों से खुद कहते है की गाय का गोश्त इस्तेमाल करों काफ़ी स्वादिष्ट होता है....

    ब्लाग पर लिखकर तारीफ़ बटोरना बहुत आसान काम है और इसके लिये वाकई में काम करना बहुत मुश्किल है...आज के वक्त में चालीस करोड भारतीयों को तो दो वक्त का ठीक से खाना मिल नही रहा है और आपको एक जानवर की इतनी फ़िक्र है...इसी विषय पर के लेख लिखा था चार पांच महीने पहले चाहे तो पढ सकते है

    http://hamarahindustaan.blogspot.com/2009/05/blog-post_05.html

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  43. gay ko us samay mata ke rup liya gaya jab sabhyata ke prarnbhik avastha me the. aj ham nischit rup se vaigyaink yug me ji rahe hai is karan ab hame adhik se adhik vaigyani tark jutana parega ki gay mata ke jada karib hai ya bhaish

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  44. गौ माता की जिसने भी सेवा की हो अर्थात् सप्रेम पालन किया है सिर्फ़ वही समझ सकता है कि गौ जब हम से प्रेम करती है तो उसे मां की ममता नज़र आती है। मैं ने स्वयं देखा है जब मेरे पिता जो प्रतिदिन गौ सेवा करते थे वेजफ कभी शहर से बाहर गये तो गाय ने चारा खाने में रुचि नहीं और दूध भी निकलवाने में परेशान किया गाय को देखकर ही लगता था कि वह उदास है। और जिस तरह से वह अपने फछडे को अपनी जिव्हा से चाटकरश् दुलार करती है वैसे ही हमें भी दुलार करती है। पिता के द्वारा नाम पुकारने पर आवाज़ देना और भागकर पास आ जाती थी। गाय के दूध गोबर और मूत्र की महिमा निराली है जो उपर की टिप्पडियो में बताया गया है जिसे विग्यान द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है। हमारे प्रभु श्री कृष्ण जी का नाम गोपाल भी इसी प्रेम और ममता के रहते हुआ ये सब बातें भैंस के साथ सम्भव नहीं हो सकती। हमारे छोटे बच्चे जिनकी मां को दूध नहीं निकलता उसकी पूर्ति गाय के ही दूध से होती है डॅाक्टर भी सलाह इसी की देते हैं। गाय ही माता का सम्मान पाने की अधिकारी है भैंस नहीं।

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  45. गौ माता की जिसने भी सेवा की हो अर्थात् सप्रेम पालन किया है सिर्फ़ वही समझ सकता है कि गौ जब हम से प्रेम करती है तो उसे मां की ममता नज़र आती है। मैं ने स्वयं देखा है जब मेरे पिता जो प्रतिदिन गौ सेवा करते थे वेजफ कभी शहर से बाहर गये तो गाय ने चारा खाने में रुचि नहीं और दूध भी निकलवाने में परेशान किया गाय को देखकर ही लगता था कि वह उदास है। और जिस तरह से वह अपने फछडे को अपनी जिव्हा से चाटकरश् दुलार करती है वैसे ही हमें भी दुलार करती है। पिता के द्वारा नाम पुकारने पर आवाज़ देना और भागकर पास आ जाती थी। गाय के दूध गोबर और मूत्र की महिमा निराली है जो उपर की टिप्पडियो में बताया गया है जिसे विग्यान द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है। हमारे प्रभु श्री कृष्ण जी का नाम गोपाल भी इसी प्रेम और ममता के रहते हुआ ये सब बातें भैंस के साथ सम्भव नहीं हो सकती। हमारे छोटे बच्चे जिनकी मां को दूध नहीं निकलता उसकी पूर्ति गाय के ही दूध से होती है डॅाक्टर भी सलाह इसी की देते हैं। गाय ही माता का सम्मान पाने की अधिकारी है भैंस नहीं।

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  46. सुनते सुनते उकता गया हूं कि गाय के गोबर, मूत्र में क्या क्या होता है। बहुत से लोग रिसर्च के नाम पर यही सब प्रकाशित करते रहते हैं क्योंकि उनके रिसर्च को इस से लोकप्रियता मिलती है। भैस, ऊंट, बकरी के दूध, मूत्र, और गोबर में क्या कुछ भी नहीं होता। आखिर जितनी गाय के ऊपर रिसर्च की जा रही है अन्य पशुओं पर क्यों नहीं करते। वैसे भी पढ़े लिखे समझे जाने वाले असल में बेवकूफ लोगों की कमी नहीं है देश विदेश में।
    सच बात तो यह है कि इस तरह के अतार्किक विचारों के कारण ही गाय इतनी दुर्गति को पहुंची है। क्योंकि गरीब आदमी ना तो बीमार गाय को ना तो कसाई को बेच सकेगा ना उसका पेट भर पायेगा। गाय के नस्ल की बात करें तो ज्यादातर नस्ले कम दूध देती हैं। दूध मूत्र और गोबर हर मामले में भैस बेहतर ही है। लेकिन रंग काला होता है बस इस कारण कोई भैस को पसंद नहीं करता।
    एक सज्जन कह रहे थे कि गाय गोबर बहुत उपयोगी होता है तो क्या भैस का गोबर नहीं होता, क्या भैस के गोबर से उपले नहीं बनाए जा सकते। मूत्र पीना है तो भैस का मूत्र पीजिये शायद ज्यादा गाढ़ा भी हो।


    माफ कीजिएगा, किसी का मजाक नहीं बना रहा हूं। समझा रहा हूं कि तार्किक सोंचिये और ये ना भी हो सके तो कम से कम अपने विचार दूसरों पर जबर्दस्ती मत लादिये।

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  47. सुनते सुनते उकता गया हूं कि गाय के गोबर, मूत्र में क्या क्या होता है। बहुत से लोग रिसर्च के नाम पर यही सब प्रकाशित करते रहते हैं क्योंकि उनके रिसर्च को इस से लोकप्रियता मिलती है। भैस, ऊंट, बकरी के दूध, मूत्र, और गोबर में क्या कुछ भी नहीं होता। आखिर जितनी गाय के ऊपर रिसर्च की जा रही है अन्य पशुओं पर क्यों नहीं करते। वैसे भी पढ़े लिखे समझे जाने वाले असल में बेवकूफ लोगों की कमी नहीं है देश विदेश में।
    सच बात तो यह है कि इस तरह के अतार्किक विचारों के कारण ही गाय इतनी दुर्गति को पहुंची है। क्योंकि गरीब आदमी ना तो बीमार गाय को ना तो कसाई को बेच सकेगा ना उसका पेट भर पायेगा। गाय के नस्ल की बात करें तो ज्यादातर नस्ले कम दूध देती हैं। दूध मूत्र और गोबर हर मामले में भैस बेहतर ही है। लेकिन रंग काला होता है बस इस कारण कोई भैस को पसंद नहीं करता।
    एक सज्जन कह रहे थे कि गाय गोबर बहुत उपयोगी होता है तो क्या भैस का गोबर नहीं होता, क्या भैस के गोबर से उपले नहीं बनाए जा सकते। मूत्र पीना है तो भैस का मूत्र पीजिये शायद ज्यादा गाढ़ा भी हो।


    माफ कीजिएगा, किसी का मजाक नहीं बना रहा हूं। समझा रहा हूं कि तार्किक सोंचिये और ये ना भी हो सके तो कम से कम अपने विचार दूसरों पर जबर्दस्ती मत लादिये।

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