शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

मैं शर्मसार हुआ, क्या आप नहीं हुए...खुशदीप

लिखना आज कुछ और चाहता था...लोकतंत्र की कीमत के मुद्दे पर...लेकिन कल मैं ब्ल़ॉगवाणी पर जाकर कई बार शर्मिंदा हुआ...शर्मसार हुआ एक पोस्ट के शीर्षक की वजह से...और वो शीर्षक सबसे ज़्यादा पढ़े गए वाले कॉलम में सबसे टॉप पर नज़र आ रहा था...जितनी बार भी मेरी नज़र उस शीर्षक पर पढ़ती मन में वितृष्णा और ग्लानि भर जाती थी...

अगर मुझे इतना बुरा लग रहा था तो मातृशक्ति का क्या हाल होगा...ये ठीक है इस तरह के शीर्षक देखते ही हम ऐसी पोस्ट को नमस्कार कह देते हैं...लेकिन एग्रीगेटर पर शीर्षक का क्या करे जो पूरा दिन मुंह चिढ़ाता रहा...ये मेरा मानना है कि ब्लॉगिंग के नाम पर गंदगी फैलाने वालों को किसी भी तरह का भाव नहीं देना चाहिए...

मैं खुद ही अपनी पोस्ट पर कहता रहा हूं कि गेंद को जितना ज़मीन पर मारो वो उतना ही सिर पर चढ़ कर उछलती है...इसलिए गेंद को ज़मीन पर पड़े रहने देना चाहिए...लेकिन इस शीर्षक को देखने के बाद मुझे लगता है कि गेंद उछलने के लिए खुद ही नंगा नाच करने लगे तो उसका कुछ इलाज किया ही जाना चाहिए...ये ठीक है हम ऐसी पोस्ट को नहीं पढ़ते... लेकिन ब्लॉगर के नाम पर कोई घर को गंदा करने लगता है तो क्या हमें चुपचाप बैठे रहना चाहिए...


मैं जिस शीर्षक की बात कर रहा हूं उस पोस्ट का न तो मैं यहां लिंक दूंगा और न ही पोस्ट को लिखने वाले महानुभाव के नाम का उल्लेख करूंगा...क्योंकि वो शीर्षक इतना अश्लील और भद्दा है कि उसे कोई भी सभ्य व्यक्ति रिपीट नहीं कर सकता है....इसलिए उस बेहूदी पोस्ट को मेरी पोस्ट के ज़रिए ज़रा सा भी भाव मिले मैं ये कतई नहीं चाहूंगा....और जिसने ये पोस्ट लिखी है उन्होंने तो लगता है कि ब्लॉगिंग को अपने प्रचार का ज़रिया बनाया हुआ है...इसे भी वो मंच की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं....लेकिन इन बेहूदी बातों पर स्टेज प्रोग्राम में बेशक तालियां मिल जाती हों लेकिन ब्लॉग जगत एक सार्वजनिक मंच है....मातृशक्ति, बुजुर्ग, किशोर सभी एग्रीगेटर पर आते हैं...ऐसे में खुद ही शब्दों के चयन पर बेहद संयम से काम लिया जाना चाहिए....

जिन महानुभाव ने ये शीर्षक दिए हैं वो पहले भी ऐसे ही और भी भद्दे शीर्षकों का इस्तेमाल कर चुके हैं...ऊपर से तु्र्रा ये है कि वो अपनी ताजा पोस्ट के जरिए पाठकों को ही हड़का रहे हैं कि श्रेष्ठ (जिसे उन्होंने खुद ही घोषित किया है) रचना पर ज़्यादा पाठक नहीं आते और जब ऐसा-वैसा शीर्षक लगाया तो पढ़ने वालों के सारे रिकॉर्ड टूट गए...यानि इसमें भी ब्लागर्स का ही कसूर है...वैसे कसूर तो है जो ऐसी घटिया सोच वाली पोस्ट को भी इतने पाठक मिल जाते हैं...लेकिन इसका मतलब क्या है अगर आपको अपनी पोस्ट पर पाठक न मिलने की इतनी छटपटाहट है तो इसका मतलब ये है कि आप चौराहे पर कपड़े उतार कर खड़े हो जाएं....जिससे कि लोग आपको देखें...अगर ये आपकी सोच है, फिर तो इतनी ही प्रार्थना की जा सकती है कि रामजी आपको सदबुद्धि दें...

अब आप ये प्रश्न कर सकते हैं कि मैं ही क्यों दूसरे के फट्टे में हाथ डाल रहा हूं....लेकिन क्या यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी नहीं है कि हम गलत चीज़ देखते हुए भी उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं...चुप बैठे रहते हैं...इससे गलती करने वाले का दुस्साहस और बढ़ता है....मेरा इस पोस्ट को लिखने का मकसद किसी विवाद को न्यौता देना नहीं है...बल्कि मैं चाहता हूं कि हिंदी ब्लॉगिंग स्वस्थ प्रतिमान स्थापित करते हुए आगे बढ़े....अगर कहीं गंदगी दिखे तो उसका प्रतिकार करें...उसे किसी भी तरह से बढ़ावा न दे जिससे कि आगे फिर उसकी कभी हमारा घर गंदा करने की जुर्रत न पड़े...मैंने किसी दूसरी पोस्ट के खिलाफ पहले सिर्फ एक बार आवाज उठाई थी...वो थी तब जब बबली जी को एक पोस्ट के ज़रिए शर्मसार करने की कोशिश की गई थी....आज फिर मुझे कुछ गलत लगा, और मैं चुप नहीं रह सका...मैं सही हूं या नहीं...अब ये आप मुझे बताएं...हां जिस शीर्षक से मैं इतना असहज हुआ, उसको लिखने वाले की मैं कोई परवाह नहीं करता...जिसे मर्यादा का ध्यान नहीं, उसका होना या न होना मेरे लिए एक बराबर है....

22 टिप्‍पणियां:

  1. हम भी हुए ...
    बहुत बहुत बहुत......शर्मसार....!!
    और सलाम करते हैं आपको .... आपने कहा तो सही.....!
    जय हिंद....

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  2. mainh aapse poornyah sahmat hoon

    ye gandgi khatm honi chaahiye..

    ye manch saaf suthraa rahega tabhi bhavishya me lambaa jee paayega varnaa kavi sammelanon ki bhanti ye bhi patit ho jaayega

    main is shubh kaary me aapke sath hoon

    -dhnyavaad

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  3. Hamen bhi sang le lo bade bhaiya kisi kaam to aa hi jayenge.. :)
    Jai Hind...

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  4. शीर्षक से शर्मसार तो सभी हुए ..पहला विरोधी कदम आपने उठाया आभार ..!!

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  5. पोस्ट लिखने के बाद उसे दोबारा पढ़ा जाए और ये देखा जाये कि इसे हमारे घर के बच्चे पढ़ सकते है या नहीं अगर नहीं तो फिर ये भी सोचना चाहिए कि यहाँ पर दुसरो के बच्चे भी है..

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  6. आपकी बात से सहमत हूं पर यहां टिप्पणियां पढकर हैरान हुं और सही मे कन्फ़्यूज्जिया गया हूं. खैर कम बुद्द्गि है अपनी तो. अब तो इशारा आपसे या आगे की टिप्पणियों मे आने के बाद ही समझ आयेगा.

    रामराम.

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  7. आपकी चिंता मेरे लिए हैरत है !

    यह सब तो देर सवेर होना ही था ! जब हर क्षेत्र के मूल्यों में जबरदस्त गिरावट आई है तो ब्लॉग जगत कब तक अछूता रहता !
    यहाँ तो यह सब बहुत पहले ही आना चाहिए था, क्योंकि यहाँ महज टिप्पणियों के आधार पर किसी पोस्ट का मूल्यांकन किया जाता है ! लोग यहाँ टिप्पणियों को पाने के लिए क्या-क्या नौटंकी कर रहे हैं ... क्या आप देख नहीं रहे हैं ?

    मुझे यह जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है कि आप किस ब्लॉगर और किस पोस्ट की बात कर रहे हैं ! आपने उनका नाम और लिंक ने देकर सराहनीय काम किया है ! आपकी इस पोस्ट ने सही मायने में मेरा दिल जीत लिया ! इतने दिनों से मैं सिर्फ यही बात कह रहा था कि ऐसे लोगों को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाए ! उनका जिक्र करके बेवजह उनको क्यूँ हाई लाईट किया जाए ?

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  8. खुशदीप भाई बिलकुल सही बात

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  9. बिल्कुल सही कह रहे हैं आप, सहमत हूँ।

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  10. बिल्कुल सही कह रहे हैं आप, सहमत हूँ

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  11. आप ने विरोध किया यही जीत है।खुशदीप भाई दो दिनो से थोड़ा मन खराब है इधर ज्यादा समय नही दे पा रहा हूं।आपने विरोध किया हमके आपका समर्थन करते है और आपसे पहले खामोश रहने के अपराधी हैं इस बात को भी स्वीकर करते हैं।वैसे एक बात कहूं आप कि चिंता जायज है लेकिन इतना तय है कचरा हमेशा हलका होता है और ज्यादा देर तक़ टिक नही पाता,समय उसे उड़ा ले जाता है।

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  12. खुशदीप भाई ..
    बात बस इतनी सी है कि हर किसी को एक सीमा रेखा खुद ही तय करनी चाहिये .."और ये सीमा रेखा कैसी , कितनी हो , यही तय करेगा आपकी लेखनी का भविष्य और शायद खुद आपका भी "
    ये बात कुछ समझ जाते हैम कुछ नहीं , कुछ समझाने के लिये नासमझ बन जाते हैं कुछ शायद वाकई नासमझ होते हैं ।
    खैर आपने बात को यहां रखा ..उससे भी तरीके की बात है कि बिल्कुल सही और सलीके से रखा ॥

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  13. हम जैसे अनाड़ियों का ख्याल करते हुआ लिंक देना चाहिए था... मैं क्या समझूँ... किस पोस्ट पर ऐसी बातें कही जा रही है... पहले जब भी विवाद हुआ तो सन्दर्भ दिया जाता रहा है... बिना सन्दर्भ कुछ नहीं कह सकता...

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  14. आपने बहुत सच्ची बात कही है कुछ लोग ब्लॉग्गिंग को अपने नाम के प्रचार का माध्यम मानते हैं और जो मन में आये उसे पाठकों के समक्ष परोस देते हैं...आपका इशारा स्पष्ट था लेकिन अगर कोई जान कर अनजान बन जाये तो क्या कीजियेगा...उन्हें नज़र अंदाज़ करदें ये ही सबसे कारगर तरीका है...
    नीरज

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  15. ब्लॉगिंग में भी सेल्फ कंट्रोल जब तक नहीं होगा, तब तक ऐसी आपत्तिजनक स्थितियां आती रहेंगी। ईश्वर हम सबको सदबुद्धि दे यही कामना है।
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    परा मनोविज्ञान- यानि की अलौकिक बातों का विज्ञान।
    ओबामा जी, 75 अरब डालर नहीं, सिर्फ 70 डॉलर में लादेन से निपटिए।

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  16. सहमत..पर हम सिर्फ अपने लिए जिम्मेवार है ..दूसरों का क्या कीजे ?

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    आपके विचारों से पूर्णतः सहमत।
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    जय हिंद।

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  18. ये तो हर एक के संयम और विवेक पर निर्भर है कि वो क्या परोस(पोस्ट कर)रहा है और क्या खा(पढ)रहा है?...
    खुद पर तो नियंत्रण रखा जा सकता है लेकिन किसी दूसरे पर कैसे?...

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