रविवार, 1 नवंबर 2009

किसकी चादर मैली...खुशदीप

आपने ब्रेक के बाद भी महावीर और जानकी देवी की कहानी पर विमर्श की आखिरी कड़ी लिखने के लिए प्रेरित किया...उसके लिए मैं आप सभी का आभारी हूं...महावीर और जानकी देवी का परिवेश गांव का है...इसलिए इस कड़ी में गांव की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ही सबसे अहम हो जाती है...आज उसी फिल्म के जिक्र के साथ मैं इस विमर्श की इतिश्री कर रहा हूं...

इस फिल्म का नाम है ...एक चादर मैली सी...ये फिल्म राजेंद्र सिंह बेदी के लिखे और 1965 के साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता नॉवल...एक चादर मैली सी...पर बनाई गई थी...बेदी साहब इस नॉवल पर 60 के दशक में गीता बाली और धर्मेंद्र को लेकर खुद फिल्म बनाना चाहते थे...लेकिन गीता बाली की मौत की वजह से बेदी साहब को अपना इरादा छोड़ना पड़ा...बेदी साहब के सपने को 1986 में निर्देशक सुखवंत ढढ्डा ने पूरा किया...फिल्म का सार इस प्रकार है...

पंजाब के गांव के परिवेश में बनी इस फिल्म में रानो (हेमा मालिनी) का पति त्रिलोक (कुलभूषण खऱबंदा) तांगा चला कर घर वालों का पेट भरता है...परिवार में त्रिलोक का बूढा अंधा बाप (ए के हंगल), मां (दीना पाठक), त्रिलोक के दो छोटे बच्चे और छोटा भाई मंगल (ऋषि कपूर) है...


त्रिलोक को शराब पीकर घर में गाली-गलौच करने की आदत है...वहीं त्रिलोक की मां हर वक्त रानो को कम दहेज लाने के लिए ताने देती रहती है...त्रिलोक सैडिस्ट किस्म का इंसान है और उसे पत्नी को ताने-उलाहनों से पीड़ा देने में मजा आता है...त्रिलोक पत्नी पर हाथ भी उठा देता है...ऐसे मौकों पर मंगल ही भाभी को बचाने आगे आता...मंगल मस्त खिलंदड़ा जवान है लेकिन काम के नाम पर कुछ नहीं करता...पूनम ढिल्लन से उसका नैन मट्टका भी चलता रहता है...उम्र में मंगल बहुत छोटा है इसलिए रानो भी उसे बेटे की तरह ही लाड दुलार देती है...


ऐसे ही परिवार चल रहा होता है कि त्रिलोक एक दिन रात को तांगे पर सवारी के तौर पर एक लड़की को धर्मशाला तक छोड़ता है...अगली सुबह धर्मशाला का मालिक त्रिलोक को बुलाकर उस लड़की की मौत के बारे में बताता है और कहता है कि तांगे पर लाश को ले जाकर अंतिम संस्कार कर दे...दरअसल उस लड़की की धर्मशाला में बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी...त्रिलोक तांगे में लड़की की लाश को ले जा रहा होता है तो लड़की का भाई उसे देख लेता है...लड़की का भाई यही समझता है कि त्रिलोक ही उसकी बहन की हत्या का ज़िम्मेदार है...दोनों में झगड़ा होता है और लड़की के भाई के हाथों त्रिलोक का कत्ल हो जाता है...इस बीच पुलिस लड़की के असली हत्यारे को भी पकड़ लेती है...लेकिन त्रिलोक की मौत के बाद रानो पर दुख का पहाड़ टूट पड़ता है...

रानो के कंधों पर ही घर चलाने की ज़िम्मेदारी आ जाती है...हर दम मस्तमौला रहने वाला रानो का देवर मंगल भी त्रिलोक की हत्या के बाद बुझ सा जाता है...परिवार के सामने दो जून की रोटी जुटाने का भी संकट आ जाता है...घर में रानो के साथ जवान देवर मंगल के रहने पर गांव के बड़े-बूढों को नैतिकता की फिक्र सताने लगती है...वो फरमान सुनाते हैं कि रानो या तो अपने दो बच्चों के साथ गांव छोड़ दे या अपने देवर मंगल के साथ शादी कर ले...उसी मंगल के साथ जिसे रानो ने हमेशा बेटे की तरह देखा...वो मंगल जो उम्र में 15 साल छोटा है...


आखिर रस्म के तहत रानो पर चादर डाल कर उसे मंगल की पत्नी घोषित कर दिया जाता है...इस तरह परिवेश और दस्तूर रानो और मंगल को ऐसा रिश्ता बनाने पर मजबूर कर देता है जिसका कि कभी उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था..फिल्म का सबसे जटिल, संवेदनशील (कहने वाले विवादित भी कह सकते हैं..) दृश्य वह था जिसमें पति-पत्नी बनने के बाद एक रात रानो और मंगल को वो रिश्ता बनाते दिखाया जाता है जिसमें आंखों की शर्म की सारी दीवारें टूट जाती है...

राजेंद्र सिंह बेदी जैसा रिश्तों के मर्म को समझने वाला इंसान ही इस कृति को जन्म दे सकता था...पंजाब में गांवों में ये प्रथा रही है कि भाई की मौत पर उसकी पत्नी की शादी छोटे भाई से करा दी जाती है...लेकिन उम्र में फर्क को लेकर जिस संवेदना के साथ बेदी साहब ने रानो और मंगल के रिश्ते को उकेरा...वो समाधान बेशक न देता हो...लेकिन हमें लाजवाब कर देता है...शायद यही दुविधा महावीर और जानकी देवी के रिश्ते को लेकर हमारी भी है...हम सब इतने विमर्श के बाद भी खुद को अंधी गली में पाते हैं...इसीलिए कुछ रिश्तों को अहसास ही रहने दिया जाए तो बेहतर है...उन्हें रिश्ते का नाम न दिया जाए...

17 टिप्‍पणियां:

  1. शायद यही दुविधा महावीर और जानकी देवी के रिश्ते को लेकर हमारी भी है...हम सब इतने विमर्श के बाद भी खुद को अंधी गली में पाते हैं...इसीलिए कुछ रिश्तों को अहसास ही रहने दिया जाए तो बेहतर है...उन्हें रिश्ते का नाम न दिया जाए

    सही कहा आपने खुशदीप भाई आपने

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  2. Khushdeep Sir........ Welcum back...... aaj aapne yeh post kaafi jalfi daal di? aur aapki yaatra kaisi rahi?

    aapne aate hi itni acchi post likhi ..... aapne yeh sahi kaha hai ki कुछ रिश्तों को अहसास ही रहने दिया जाए तो बेहतर है...उन्हें रिश्ते का नाम न दिया जाए...

    kai baar kai rishton ka naam nahin hota .....hum unhen sirf mehsoos kar sakte hain..... sirh mehsoos...


    JAI HIND

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  3. क्या रिश्तों को नाम देना जरूरी है? दुनिया में तो इंसान एक ही रिश्ता ले कर आया था। वह माँ और संतान का रिश्ता था। बाकी सब रिश्तों को तो इंसान ने खुद नाम दिया है।

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  4. मैं एक सत्य घटना का जिक्र करना चाहता हूँ ,घटना इस तरह है कि दुर्घटना में बड़े भाई का मृत्यु हो जाता है तीन बच्चे और विधवा भाभी को देखकर छोटे भाई जो अविवाहित था ,भाभी से ही विवाह करने का इरादा माता –पिता के सामने रखने पर माता -पिता एवं समाज से स्वीकृती मिलने से रीति रिवाज के साथ विवाह सम्पन्न होता है,आज भी सभी सुखी है । समाज भी इस घटना की भूरी -भूरी प्रशंसा ही नहीं की बल्कि दूसरों को भी ऐसा करने का प्ररणा भी दिया ............. अति संक्षेप में इस घटना की जानकारी देने के साथ यदि हम यह सोचे कि ऐसी क्यों करना चाहिए तो साफ हैं कि सामाजिक दाईत्व का निर्वाहन करने का यह एक तरिका हैं ।




    जागरूक समाज को समस्याओं का समाधान करना चाहिए ,समस्याओं से मूंह मोढने पर कई तरह की

    विकृतियॉं उत्पन्न होने के फलस्वरूप आज हम महावीर और जानकीदेवी जैसे रिस्तों को लेकर चिन्तित हैं ।

    जहॉं तक इस तरह की रिस्तों का नाम न देने की बातें हैं तो यह शायद ही सम्भव हो ,विवाह नाम की जो संस्था को समाज ने मान्यता दिया हैं उसका मूल उद्देश्य धर्म से जोड़ा गया है ,विवाह- धर्म सुरक्षा और सन्तानोपत्ति पर आधारित है ,सन्तानोपत्ति की भावना न होना, विवाह को गौण बना देती हैं । भावना तो है परन्तु कभी - कभी किसी कारण से सन्तान नहीं हो पाना भी एक समस्या होने के कारण अनेक समाज और कानून भी दूसरी विवाह करने का अधिकार देता है।




    मूल करण विशेष करके आर्थिक समस्या हैं ,यदि जानकी देवी के पास इतनी सम्पत्ति होती, जिससे कि स्वयं की भरण पोषण सूचारू रूप से हो सकें तो शायद इस तरह कही स्थिति निर्मित ही न होती ,पेंशन पाने वाले महिलाओं पर इस तरह की समस्या बहुत ही कम दिखने को मिलेगा ,विषमता भरी समाज को बदलना ही समस्या का समाधान हो सकता हैं । मेरे नजर में रिस्तों का नाम न देने की बात भी समस्याओं से मूह मोढने जैसे ही नहीं होगी ?

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  5. कुछ रिश्तों को अहसास ही रहने दिया जाए तो बेहतर है...उन्हें रिश्ते का नाम न दिया जाए...

    सोचने योग्य बात

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  6. खुशदीप जी,
    एक बार फ़िर कहना चाहूंगा आप के लेख के मूल भाव से सहमत हूं।

    आपके ब्लॉग पर कुछ न कुछ सीखने को ही मिलता है।

    और यह भी कहना सही ही होगा कि हम खोखले और आडम्बरपूर्ण समाज में जी रहे हैं, ऐसे समाज को तो बदलना ही होगा और यह काम बुद्धिजीवि वर्ग को ही करना होगा।

    जय हिंद।

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  7. भाई कल पढूंगा आप का लेख आज तो मेरा दिमाग घुमा हुआ है , इस नये पंगे से...
    धन्यवाद

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  8. hame aur logon se bhi aisi hi sarthak bahason ki darkar hai Khushdeep bhai, sath hi is disha me nyay ke liye prayas ki bhi... sirf likhne se jyada kuchh nahin hoga..

    Jai Hind

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  9. इस मुद्दे पर अच्छी खासी बहस हो चुकी है ...कोई निष्कर्ष निकलना मुश्किल है .. इसपर काफी वाद विवाद किया जा सकता था ....अब जब विमर्श की इतिश्री हो ही गयी है ..ऐसे रिश्तों को नाम नहीं देने वाले समर्थक काफी जुट गए हैं ...हमारी कोशिश सफल रही ...विचार विमर्श के लिए आभार..!!

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  10. खुशदीप जी,
    ओ जी तुसी ग्रेट हो...
    इक चद्दर मैली सी.....जी भोत वधिया फिलम हैगी जी...
    बट....रिश्ते दा नाम नई देने वाला मामला जी मैनू समझ नई आया.....
    ओ जी व्याह होयेगा...तो रिश्ते दा नाम अटोमटिक हो जांदा है, पति-पत्नी दा ....होर की नाम चायदा .....तुसी दसो....??
    चलो जी...जान छुटी.....जानकी ते महावीर राजी-खुसी रहे परमात्मा दी मेहर होवे.....
    बाकि सब जी वड्डा फस्ट किलास होया ....रब करे इस तरहां दी पोस्टां तुसी रोज लाया करो....
    भोत भोत धन्वाद ....

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  11. ॒ बी एस पाबल....



    बस उन्हीं को कोट करता हूँ...


    अंधी गली...बाकि सुबह उठकर और अध्यन करने के बाद कहेंगे.

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  12. यंहा भी चादर डालने की रस्म मैने देखी है,और जैसा कि एस के राय ने लिखा वे लोग बहुत खुश हैं।ये बहुत संवेदनशील मामला है खुशदीप भाई और रिश्तों की डोर की तरह नाज़ुक भी।इसे हर कोई पने नज़रिये से देखता है इसलिये इस पर एक राय बनेगी ही नही।इसके बावज़ूद आपने बेहद संवेदनशील मामले पर सार्थक बहस की शुरुआत की इसके लिये आप बधाई के पात्र हैं।आप की पोस्ट के मूल भाव को सब समझ रहे है यही इसी बहस की सफ़लता है।

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  13. चादर डालने की यह परम्परा औरतो के उसी दुविधा और असुरक्षा का प्रतीक नहीं है जो सर्वदा से औरतो को अपरोक्ष रूप से सामाजिक स्तर पर असहाय बनाए रखा है???

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  14. Dear Khushdip ji,
    Your mindboggling posts regarding Mahavir and Janaki and the examples you have quoted therin were very thought provoking.
    I could not comment on your previous 2 posts due to time constraints but I must say,
    "tussi great ho! Kathi baithange te shayad hor vi zyada maza aayega."
    I look forward to more issues being raised in your blog and a healthy debate in the aftermath would certainly contribute towards the betterment of our society.

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  15. kखुशदीप जी ान्धी गली? बहस किसी और बात पर चली थी मगर खत्म कहीं और हुइ बहस का मर्म कोई नहीं समझ सका बस एक मज़दूर के लिये कई बार शादी करना एक सपना रह जाता है और महवीर को एक तरह से पत्नि का विकल्प मिल गया इस से अधिक कुछ नही<ं वर्ना यहाँ बात उस की महानता को ले कर थी कि अगर सच मे उस पर उपकार करना चाहता था तो और बहुत रास्ते थे। खैर बात खत्म हुई आपका धन्यवाद और हम से कोई अपशब्द कहे गये हों तो बुरा मत मानियेगा शुभकामनायें। मेरे लिये दुया का बहुत बहुत धन्यवाद

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  16. राजेन्द्र सिंह बेदी का यह उपन्यास बहुत प्रसिद्ध हुआ था लेकिन इस पर बनी फिल्म नही चली । यही होता है साहित्यिक कृतियो पर बनी बहुत कम फिल्मे सफल होती है क्योंकि उपन्यास का पाठक वर्ग और फिल्म का दर्शक वर्ग अलग अलग होता है । साहित्यिक उपन्यासो का एक ईलीट पाठक होता है जब कि फिल्म का दर्शक एक आम आदमी जो इस तरह के रिश्तों को स्वीकार नही कर पाता न पर्दे पर न ही असल ज़िन्दगी में ।

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