सोमवार, 30 नवंबर 2009

जीते जी कंगाल, मर कर मालामाल...खुशदीप

आज बात करता हूं एम जे की...एम जे यानि माइकल जैक्सन की...माइकल जैक्सन को दुनिया को अलविदा कहे पांच महीने बीत चुके हैं...सब जानते हैं कि माइकल जैक्सन ने ड्रग्स ले लेकर जीते जी ही अपनी हालत कंकाल वाली बना ली थी...ऊपर से कर्ज इतना चढ़ गया था कि माइकल जैक्सन को वर्ल्ड टूर के लिए दिन-रात मेहनत करनी पड़ रही थी...काम के तनाव और कर्ज की फिक्र ने ही माइकल जैक्सन की जान ले ली...


29 अगस्त 1958-25 जून 2009

अब इसे विडम्बना ही कहेंगे कि माइकल जिंदा रहने पर जिस कर्ज को चुकाने के लिए फ़िक्र में घुले जा रहे थे, वो उनके मरने के बाद चुटकियों में ही उड़नछू हो गया...मौत के बाद देनदारों से पीछा छुड़ाने में माइकल जैक्सन को सिर्फ पांच महीने लगे... डेली स्टार अखबार के मुताबिक एम जे का जैक्सन इस्टेट जून से लेकर अब तक 50 करोड़ डॉलर से ज़्यादा की कमाई कर चुका है...बॉक्स आफिस पर माइकल जैक्सन पर बनी दिस इज़ हिट के रिकॉर्डतोड़ प्रदर्शन और म्यूजिक सीडी की बढ़ती मांग ने जैक्सन इस्टेट को मालामाल कर दिया है...

इसके अलावा माइकल जैक्सन की निजी वस्तुओं और स्मारिका की नीलामी से भी जैक्सन इस्टेट की तिजोरियां भरती जा रही हैं...माइकल जैक्सन के इस्टेट के पास बेशक कर्ज चुकाने से कहीं ज़्यादा पैसे इकट्ठे हो चुके हैं...लेकिन इसके प्रबंधक जॉन ब्रांका और जॉन मैक्कलेन अपने खिलाफ दर्ज छह मुकदमे नहीं निपटा सके हैं...इनमें न्यूजर्सी स्थित ऑलगुड एंटरटेन्मेंट कंपनी का केस भी शामिल है...इस कंपनी ने माइकल जैक्सन पर टेक्सस में अपने भाइयों से टीवी कंसर्ट का वादा तोड़ने का आरोप लगाया था...


माइकल जैक्सन को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी बेटी पेरिस जैक्सन ने कहा था- मेरे डैडी दुनिया के सबसे अच्छे डैडी थे...

ज़ाहिर है माइकल जैक्सन के रिश्तेदार और इस्टेट के प्रबंधक ज़्यादा से ज़्यादा माल अपनी अंटी में करना चाहते हैं...इस लिए कानूनी दांव-पेंचों की लड़ाई लंबी खिंचे तो कोई बड़ी बात नहीं...लेकिन मेरे जेहन में यहां एक ही सवाल आ रहा है कि जीते जी किसी शख्स को मुसीबतों से छुटकारा दिलाने कोई नहीं आता...मरने के बाद ही उसकी (या कहिए घर वालों की)  किस्मत क्यों खुल जाती है...


स्लॉग ओवर

माइकल जैक्सन के जीवित होने पर एक किस्सा बड़ा मशहूर था...



बच्चों को दो चीज़ो से बचाना चाहिए...
 
प्लास्टिक और प्लास्टिक के बने माइकल जैक्सन से....

रविवार, 29 नवंबर 2009

सनक का राजकुमार...खुशदीप

कल पूरा दिन ब्रॉडबैंड ठप रहने की वजह से दिमाग भन्नाया रहा...न पोस्ट डाल सका और न ही कमेंट कर सका.. आज बड़ी मिन्नत-खुशामद कर बीएसएनएल वाले भाईसाहबों को पकड़ कर लाया...बड़ी मुश्किल से ब्रॉडबैंड जी को मनाया जा सका और आप से मुखातिब होने की स्थिति में लौट सका हूं...

कल रात ब्लॉगिंग तो कर नहीं सकता था, इसलिए राजकुमार और दिलीप कुमार की पुरानी फिल्म पैगाम (1959) डीवीडी पर देखने बैठ गया...फिल्म देख कर ही सोचने को मजबूर हो गया कि राजकुमार में ऐसी क्या खासियत थी कि दिलीप कुमार जैसे दिग्गज कलाकार भी राजकुमार के सामने पानी भरते नज़र आते थे...राजकुमार बीते दौर में भी मल्टीस्टारर फिल्मों की जान हुआ करते थे...दूसरे टॉप स्टार राजकुमार के साथ आने से डरा करते थे...बरसों बाद सुभाष घई सौदागर (1991) में राजकुमार और दिलीप कुमार को साथ लाए तो भी पूरी फिल्म में राजकुमार दिलीप साहब के आगे कहीं दबे नहीं...उजाला में शम्मी कपूर हो या वक्त और हमराज में सुनील दत्त, काजल में धर्मेंद्र हो या दिल एक मंदिर में राजेंद्र कुमार, नील कमल में मनोज कुमार हो या मर्यादा में राजेश खन्ना, कर्मयोगी में जीतेंद्र हो या सूर्या में विनोद खन्ना....या फिर मरते दम तक में गोविंदा जैसे नई पीढ़ी के कलाकार...राजकुमार हमेशा इक्कीस ही साबित हुए...


बेमिसाल डॉयलॉग डिलीवरी...गले में मफलर, कंधे पर कोट, पाइप से कश लगाना...राजकुमार का अलग ही अंदाज़ था.. वैसे तो राजकुमार के कई डॉयलॉग बड़े हिट हुए हैं लेकिन वक्त (1965) फिल्म में साथी कलाकार रहमान के सामने राजकुमार की ये लाइन बेजोड़ थी...
चिनॉय सेठ, जिनके घर खुद शीशे के बने हों, वो दूसरों पर पत्थर नहीं उछाला करते...

कश्मीरी मूल के राजकुमार का असली नाम कुलभूषण पंडित था और फिल्मों में आने से पहले वो पुलिस में इंस्पेक्टर थे...अगर सनक की बात की जाए तो राजकुमार का बॉलीवुड में दूर-दूर तक कोई जोड़ नहीं था...अगर राजकुमार की सनक न होती तो आज अमिताभ बच्चन वो अमिताभ बच्चन न होते जिन्हें हम सब जानते हैं...दरअसल 1973 में निर्माता निर्देशक प्रकाश मेहरा की फिल्म ज़ंज़ीर ने अमिताभ को एंग्री यंग मैन के तौर पर फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित किया था...लेकिन कम लोग ही जानते हैं कि अमिताभ को प्रकाश मेहरा ने और कोई विकल्प न होने की स्थिति में मजबूरी में ज़ंज़ीर के लिेए साइन किया था...ज़ंज़ीर के लिए प्रकाश मेहरा की पहली पसंद राजकुमार ही थे...लेकिन जब राजकुमार को प्रकाश मेहरा साइन करने के लिए पहुंचे तो राजकुमार से उन्हें जो जवाब मिला, उसे सुनकर प्रकाश मेहरा ने ज़िंदगी में फिर कभी राजकुमार से मिलने की हिम्मत नहीं दिखाई थी...राजकुमार का जवाब था...
जानी...तुम्हारे पास से बिजनौरी तेल की ऐसी बदबू आ रही है, हम फिल्म तो दूर तुम्हारे साथ एक मिनट और खड़ा होना बर्दाश्त नहीं कर सकते...

राजकुमार की एक और अदा थी...वो किसी साथी कलाकार को उसके सही नाम से नहीं बुलाते थे...राजकुमार के दौर में ही राजेंद्र कुमार, धर्मेंद्र और जीतेंद्र भी फिल्मों में अच्छा मुकाम हासिल कर चुके थे...लेकिन राजकुमार धर्मेंद्र को जीतेंद्र और जीतेंद्र को धर्मेंद्र नाम से संबोधित कर देते थे...इस पर धर्मेंद्र को एक बार ज़बरदस्त गुस्सा भी आ गया था...लेकिन राजकुमार ठहरे राजकुमार...किसी शुभचिंतक ने इस आदत पर राजकुमार को एक बार टोका तो उनका जवाब था...राजेंद्र हो या धर्मेंद्र या जीतेंद्र या बंदर...क्या फर्क पड़ता है...राजकुमार के लिए सब बराबर हैं....

एक और किस्सा जीनत अमान को लेकर है...ज़़ीनत इंसाफ का तराजू आते आते फिल्म इंडस्ट्री की टॉप हीरोइन में शुमार की जाने लगी थीं...एक समारोह में किसी ने जीनत की मुलाकात राजकुमार से कराई तो उनका कहना था...जानी शक्ल-सूरत से तो माशाअल्लाह लगती हो, फिल्मों में ट्राई क्यों नहीं करती...ज़ीनत अमान ने ये सुना तो काटो तो खून नहीं...

लेकिन राजकुमार का सबसे बेहतरीन मास्टरस्ट्रोक मशहूर संगीतकार भप्पी लाहिरी के लिए था...सब जानते हैं भप्पी लाहिरी को जेवरों से लदे रहने का बहुत शौक है...किसी ने भप्पी लाहिरी का राजकुमार से इंट्रोडक्शन कराया तो उन्होंने इन शब्दों से भप्पी लाहिरी का स्वागत किया....जानी और तो सब ठीक है लेकिन तुम्हारा मंगलसूत्र कहां है...

3 जुलाई 1996 को मुंबई में राजकुमार ने 69 साल की उम्र में दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कहा... अगर पाठकों को भी राजकुमार के ऐसे ही कुछ किस्से पता हो तो ज़रूर बताएं...

स्लॉग ओवर

मक्खन का पुतर गुल्ली सरकारी प्राइमरी स्कूल में गिरते-पड़ते पांचवीं पास कर गया...वो स्कूल पांचवी तक ही था...अब प्राइवेट स्कूल में छठी क्लास में दाखिला कराने के लिए मक्खन पंहुचा तो प्रिसिंपल ने कहा कि हम टेस्ट लिए बगैर दाखिला नहीं देते...मक्खन ने कहा...ले लो जी टेस्ट....टेस्ट हो गया...प्रिसिंपल ने टेस्ट का नतीजा देखकर कहा कि हमारे हिसाब से इसे चौथी क्लास में ही एडमिशन दिया जा सकता है...मरता क्या न करता...गुल्ली का चौथी में एडमिशन हो गया...लेकिन महीने बाद ही स्कूल से मक्खन को बुलावा आ गया...प्रिंसिपल ने कहा कि गुल्ली चौथी लायक भी नहीं है...इसे तीसरी में डाल रहे हैं...अब पढ़ाना तो था ही मक्खन ने कहा.. डाल दो जी तीसरी में...लेकिन ये सिलसिला यहीं नहीं थमा...हर हफ्ते-दो हफ्ते बाद मक्खन को बुलावा आता और गुल्ली को एक क्लास और पीछे कर दिया जाता...दूसरी, पहली, केजी...अब जब गुल्ली जी केजी में वापस आ गए तो मक्खन बड़ी तेज़ी से स्कूटर चलाता हुआ घर लौटा...घर के नीचे से ही पत्नी मक्खनी को आवाज दी....नी मक्खनिए...नी मक्खनिए...छेती तैयार हो जा...मुंडा जित्थो आया सी ओथे ही जाण लई बड़ी तेज़ी नाल वापस आ रेया ई....( ओ मक्खनी...ओ मक्खनी...जल्दी से तैयार हो जा...लड़का जहां से आया था, वहीं लौटने के लिए बड़ी तेज़ी से वापस आ रहा है...)

शनिवार, 28 नवंबर 2009

क्या आप सिविल वॉर के लिए तैयार हैं...खुशदीप

पोस्ट का शीर्षक पढ़ कर चौंकिए मत...लेकिन आने वाले वक्त में ये हक़ीक़त बन सकता है...ये मैं नहीं कह रहा, ये स्टडी है यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के एक स्टडी ग्रुप की...स्टडी में कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में आकर कई देश सिविल वॉर या गृह युद्ध के हालात में पहुंच सकते हैं...जिस तरह धरती गर्म होती जा रही है उससे ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी चीज़ें इतनी महंगी हो जाएंगी कि उससे मारकाट जैसी नौबत आ सकती है...ये ख़तरा उन देशों को ज़्यादा है जिनकी अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर करती है...

भारत की 70 फीसदी आबादी का जीने का आधार भी खेत-खलिहान ही हैं...पिछले 10 साल में जहां समूची दुनिया से 7 फीसदी जंगल का सफाया हो गया वहीं भारत में दुनिया की औसत दर से ज़्यादा यानि 9 फीसदी जंगल पूरी तरह साफ़ हो गया...इसी दौर में 11 फीसदी खेती योग्य ज़मीन विकास और ऊर्जा की भेंट चढ़ गई... जितने स्पेशल इकोनामी जोन (एसईजेड) बनाने की दरख्वास्त सरकार के पास लगी हुई और उन्हें सब को मंजूरी मिल गई तो खेती की साढ़े चार फीसदी ज़मीन और कम हो जाएगी...ज़ाहिर है खेती का दायरा इसी तरह सिकुड़ता रहा तो अनाज और दूसरे कृषि उत्पादों की कीमतें आसमान छूने लगेंगी...और जैसे जैसे ये पहुंच से बाहर होती जाएंगी वैसे वैसे अराजकता की स्थिति बढ़ती जाएगी...

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की स्टडी के मुताबिक अगर धरती के तापमान में एक डिग्री का इज़ाफ़ा होता है तो अफ्रीका में 2030 तक सिविल वार होने का जोखिम 55 फीसदी बढ़ जाएगा...सब सहारा इलाके में ही युद्ध भड़कने से तीन लाख नब्बे हज़ार लोगों को मौत के मुंह में जाना पड़ सकता है...जाहिर है ग्लोबल वार्मिंग ने खतरे की घंटी बजा दी है...बस ज़रूरत है हमें नींद से जागने की...

पहले दो विश्व युद्ध इंसान की सनक के चलते ही हुए थे...तीसरे विश्व युद्ध का भी इंसान ही ज़रिया होगा...और उसने विकास की दौड़ में प्रकृति को ही दांव पर लगाकर विनाश की ओर बढ़ना भी शुरू कर दिया है...जब इंसान का वजूद ही मिट जाएगा तो फिर किसके लिए ये सारा विकास...

आज विश्व मंच पर भी ग्लोबल वार्मिंग सबसे गर्म मुद्दा है...अमेरिका ने ऐलान कर दिया है कि वो 2005 के लेवल को आधार मान कर 2020 तक कार्बन गैसों के उत्सर्जन में 17 फीसदी की कमी कर देगा...चीन भी साफ कर चुका है कि 2020 तक स्वेच्छा से 40 से 50 फीसदी प्रति यूनिट जीडीपी के हिसाब से ग्रीन हाउस गैसों में कटौती करेगा...

अमेरिका समेत तमाम विकसित चाहते हैं कि भारत और दूसरे विकासशील देश भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन मे कटौती की घोषणा करे...डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में 8 से 18 दिसंबर तक क्लाइमेट चेंज पर होने जा रहे सम्मेलन में ग्रीन हाउस गैसों में कटौती का मुद्दा ही छाए रहने की उम्मीद है...

आगे बढ़ने से पहले आप सोच रहे होंगे कि ये ग्रीन हाउस गैसें आखिर हैं किस आफ़त का नाम...इस पर डॉ टी एस दराल ने पिछले दिनों अपनी एक पोस्ट में बड़े आसान शब्दों में महत्वपूर्ण जानकारी दी थी...उसी को मैं यहां रिपीट कर रहा हूं....

ज़रा गौर कीजिये, कहीं आप ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा तो नही दे रहे ---

ग्रीन हाउस के बारे में आपने सुना ही होगा कि शीशे या प्लास्टिक के बने कमरे में पौधे उगाने के काम आते हैं ये...सूरज की किरणों से पैदा हुई गर्मी से ग्रीन हाउस के अंदर की हवा गर्म हो जाती है...और ये उष्मा ग्रीन हाउस के अंदर ही कैद रहती है...बाहर नहीं निकल पाती...इस प्रभाव को ही कहते हैं... ग्रीन हाउस इफैक्ट...कुछ इसी तरह का माहौल होता है , हमारी पृथ्वी पर...यानि पृथ्वी की सतह पर कुछ गैसों की एक परत सी होती है, जो सूर्य की किरणों से पैदा हुई गर्मी को वायु में जाने से रोकती हैं...इससे धरती का तापमान एक निश्चित स्तर पर बना रहता है...अगर ये गेसिज न होती तो हम आज भी हम आइस एज में रह रहे होते.


ग्रीन हाउस गेसिज : धरती की सतह पर जो गैस पाई जाती हैं, वे हैं ---वाटर वेपर, कार्बन डाई ओक्स्साइड, मीथेन ,नाइट्रस ओक्साइड, और फलुरोकार्बंस... अब इन गैसों की मात्रा बढ़ने से जो उष्मा ट्रैप्ड होती है, उससे धरती का तापमान धीरे धीरे बढ़ रहा है...इसी को कहते हैं, ग्लोबल वार्मिंग...

इन गैसों के बढ़ने के कारण हैं --सांस लेने से , कोयला, तेल और पेट्रोल के जलने से... पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से CO2 पैदा होती है...चावल की फसल उगाने से , पशु पालन से और लैंड फिल साइट्स से मीथेन गैस पैदा होती है...नाइट्रोजन युक्त खाद, सीवेज ट्रीटमेंट से और समुद्र से नाइट्रस ऑक्साइड गैस पैदा होती है...एयर कंडीशनर और रेफ्रीजेरेटर्स में क्लोरोफ्लुरोकार्बंस पैदा होते हैं, जो ओजोन डिप्लीशन करते हैं...


इस तरह आधुनिक युग की सुख सुविधाएँ और सम्पन्ताएं ही आज इंसान की दुश्मन बन गयी हैं...एक और समाचार से पता चला है की भारत की पर कैपिटा एमिशन रेट अमेरिका के मुकाबले बहुत ही कम है...यानि विकसित देश ही असली गुनाहगार हैं...

ऊपर से तुर्रा ये कि अमेरिका ही ग्रीन हाउस गैसों को मुद्दा बनाकर भारत के कान उमेड़ने में सबसे आगे हैं...अमेरिका और अन्य विकसित देशों का कहना है कि भारत जैसे विकासशील देश अपने-अपने खास फंड बनाएं जिसका इस्तेमाल सिर्फ ग्रीन हाउस गैसों में कटौती लाने के लिए किया जाए...दूसरी तरफ भारत की दलील है कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए अमेरिका और विकसित देश ही सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं...फिर उनके किए-धरे की सज़ा भारत जैसे देश क्यों भुगतें...अगर फंड बनाना ही है तो अमेरिका और विकसित देश अपने पैसे से ही उसका इंतज़ाम करे...बहरहाल इसी मुद्दे पर कोपेनहेगन में गर्मागर्म बहस छिड़ने के पूरे आसार हैं...अमेरिका अब चीन का हवाला देकर भारत पर दबाव बढ़ा सकता है कि जैसे उसने ग्रीन हाउस गैसों में कटौती का ऐलान किया है वैसे ही कदम भारत और अन्य विकासशील देश भी उठाएं...चीन की तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का झुकाव चौंकाने वाला है...भारत-पाकिस्तान संबंधों को सामान्य बनाने के लिए ओबामा बीजिंग जाकर चीन को कोतवाल पहले ही बना आए हैं...अब पर्यावरण को ढाल बनाकर भारत को घेरने की ये अमेरिका और चीन की नई रणनीति तो नहीं है...भारत को ऐसे हालात में बेहद सतर्क होकर चलने की ज़रूरत है...ये ठीक है कि ग्लोबल वार्मिंग पूरे विश्व के साथ भारत के लिए भी बड़ा खतरा है...लेकिन इस मामले में हमारी स्वतंत्र नीति होनी चाहिए...किसी दबाव में आकर हम कोई फैसला न लें...हां...हिमालय, ग्लेशियर, गंगा, यमुना भारत मां के गहने हैं...इन्हें बचाकर रखना हर भारतीय का कर्तव्य है...हम अपनी ओर से इन्हें जितना कम से कम दूषित करें, उतना ही हमारा अस्तित्व भी बचा रहेगा... ये लड़ाई हमारी अपनी है...हमें अपने आप ही लड़नी है...वाशिंगटन या बीजिंग से कोई टॉम, डिक, हैरी आकर न समझाए कि हमें क्या करना है....

स्लॉग ओवर

दिमाग शरीर का सबसे अहम हिस्सा होता है...

24 घंटे, 365 दिन ये एक्टिव रहता है...

इंसान के पैदा होते ही ये काम करना शुरू कर देता है...

और...

इंसान की शादी होने तक ये काम करता रहता है...

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

लेट अस प्रेप्येर फॉर कैंडल मार्च...खुशदीप

"हमको कैंडल लाइट विजिल करना मांगता...आफ्टरऑल 26/11 का फर्स्ट एनिवर्सरी है...हम देश के रिस्पांसिबल सिटीजन है...हमारा भी कुछ मॉरल ड्यूटी बनता है...कैसे पता चलेगा कि हमारा सोशल ऑब्लिगेशन कितना स्ट्रॉन्ग है"...

शहर के इलीट क्लब में 25 नवंबर को यही हॉट डिस्कशन था...एक तरफ किटी की टेबल पर विदेशी परफ्यूम में तर-बतर मोहतरमाएं...और दूसरी तरफ बिलियर्डस की टेबल पर शाट लेते हुए जेंटलमैन
...साइड टेबल पर करीने से लाल परी से भरे क्रिस्टल के पैमाने भी सजे हुए हैं...

हां तो यंग मेन एंड यंग लेडीज़ (यहां उम्र जितनी भी हो जाए लेकिन चेहरे पर पैसे की चमक सबको एवरग्रीन यंग रखती है)...क्या प्रपोजल्स है कल के लिए...सोशल फंड से अभी एडवांस पास करा लेते हैं...कल कोई दिक्कत नहीं आएगी...

सबसे पहले मिसेज दारूवाला उठती हैं...मेरे ख्याल से कल इलीट क्लब से सिटी मॉल तक आधे किलोमीटर का कैंडल लाइट मार्च निकाला जाए...हमारे जैसी सेलिब्रटीज़ इसमें हिस्सा लेंगी तो शहर के आम लोगों को इससे अच्छा इन्सपिरेशन मिलेगा...मिसेज दारूवाला की बात खत्म होने से पहले ही क्लैपिंग से क्लब गूंज उठता है...

मिस्टर हाथी तत्काल मिसेज दारूवाला के प्रपोजल को सेकंड करते हैं...हां तो ठीक रहा कल हम सब शाम को पांच बजे क्लब में मिल रहे हैं...पहले वेलकम मेनू सेट कर लिया जाए...हाई टी और जूस के साथ चीज़ सैंडविच और गार्लिक ब्रेड ठीक रहेगी...भई हम सारे ही कलरी-कॉन्शियस है...ऐसा है सब को वॉक करना है तो सब को पाकेट में रखने के लिए ड्राई-फ्रूट्स के पैक दे दिए जाएंगे...एनर्जी का लेवल मेंटेन रहेगा...आपसे एक रिक्वेस्ट है, ड्राई-फ्रूट्स के पैक पाकेट में ही रखिएगा..ओपन करने से आम लोगों में अच्छा मैसेज नहीं जाएगा...

अभी मिस्टर हाथी ने अपनी बात भी पूरी नहीं की थी कि लड़खड़ाते कदमों से मिस्टर पीके माइक के पास आकर बोले...अरे मिस्टर हाथी मरवाएंगे क्या...इतनी लंबी वॉक...वो भी सूखे-सूखे...गला तर करने का भी कोई प्रपोजल होगा या नहीं..इस पर मिस्टर हाथी ने जवाब दिया...मिस्टर पीके...यू भी न...टू मच...बडी़ जल्दी वरी करने लग जाता है...अरे वॉक के बाद सिटी माल के ओपन टेरेस रेस्तरां में डिनर से पहले कॉकटेल का भी अरेजमेंट रख लेते हैं...वैसे कैंडल लाइट मार्च से थोडी दूरी पर एक मोबाइल कार-ओ-बार भी कन्वीनिएंस के लिए साथ-साथ चलेगी...

अभी ये बात चल ही रही थी कि मिस कलरफुल खडी़ हो गईं...मिस्टर सेक्रेट्री हमको आपसे एक शिकायत होता...पिछली बार जेसिका लाल इश्यू पर कैंडल लाइट मार्च निकाला था तो आपने प्रेस के जिन लोगों को इन्वाइट किया था, उन्हें ज़रा भी न्यूज़-सेंस नहीं था...मैंने उस ओकेशन के लिए स्पेशल चेन्नई से कांजीवरम की साड़ी मंगाया था...लेकिन अगले दिन पेज थ्री पर मेरा एक भी फोटोग्राफ नहीं छपा...मेरा दस हज़ार रुपया पानी में चला गया ...इस बार उन्हें पहले से ही अलर्ट कर दीजिएगा कि कल कैंडल लाइट मार्च को कवर करते हुए वैसा सिली मिस्टेक न हो...चाहें तो एंगल वगैरहा सेट करने के लिए एक बार फुल ड्रेस रिहर्सल भी कर लेते हैं...सभी रिस्पेक्टेड लेडीज़ ने मिस कलरफुल की बात को ज़ोरदार क्लैपिंग के साथ एप्रिशिएट किया...

इसके बाद सभी ने आखिरी नोट पर कल के प्रोग्राम की सक्सेस के लिए चीयर्स किया...

(...धन्य है हमारे ये सोशेलाइट्स)

ठाठ-बाट का राज़...खुशदीप

एक भारतीय सांसद अमेरिका के एक सांसद के न्योते पर वाशिंगटन पहुंचता है...अमेरिकी सांसद भारतीय सांसद को अपने घर डिनर के लिए बुलाता है...भारतीय सांसद अमेरिकी सांसद की कोठी, सुंदर लॉन, भीतर की आलीशान सजावट देखकर बहुत प्रभावित होता है...पूछने से अपने को रोक नहीं पाता...एक सीनेटर के वेतन के ज़रिए आप इतना हाई-फाई लाइफ स्टाइल कैसे रख पाते हैं...

अमेरिकी सांसद भारतीय सांसद की बात सुनकर मुस्कुराते हुए उसे खिड़की के पास ले जाता है...खिड़की का पर्दा हटाकर कहता है...वो नदी दिख रही है...भारतीय सांसद हां में सिर हिलाता है...अमेरिकी सांसद फिर कहता है...नदी पर बना पुल दिख रहा है...भारतीय सांसद फिर हां में जवाब देता है..अमेरिकी सांसद रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहता है...10 परसेंट...

दो साल बाद उसी अमेरिकी सांसद को भारत दौरे का न्योता मिलता है...तब तक अमेरिका गया भारतीय सांसद मंत्री बन चुका होता है...अमेरिकी सांसद मंत्री के घर पहुंचता है तो ठाठ-बाट देखकर उसकी आंखें ही चुंधिया जाती है...घर के नाम पर बड़ा महल...हर तरफ संगमरमर...मखमली गलीचे...नौकरों की पूरी फौज...एक से बढ़कर एक गाड़ियां...अमेरिकी सांसद पूछ ही बैठता है... ये दो साल में ही ज़मीन आसमान का फर्क कैसे...

मंत्री अमेरिकी सांसद को खिड़की के पास ले जाता है...पर्दा हटाता है...पूछता है...वो नदी दिख रही है...अमेरिकी सांसद कहता है...हां दिख रही है...मंत्री फिर पूछता है....नदी पर पुल दिख रहा है...अमेरिकी सांसद आंखों पर बड़ा ज़ोर देता है फिर कहता है...सॉरी मुझे कोई पुल नहीं दिखाई दे रहा...मंत्री का मुस्कान के साथ जवाब आता है...100 परसेंट...

स्लॉग ओवर

एक चूहा लाल गुलाब लेकर शेरनी के पास पहुंच जाता है...

बड़े अदब से पैरों पर झुकते हुए शेरनी को प्रपोज़ करता है...

शेरनी बोली...पहले जा...आईने में जाकर सूरत देख...

चूहा...सूरत पे मत जा पगली...बस कॉन्फिडेंस देख कॉन्फिडेंस...

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

हमारे सांसद, हमारे बच्चे...खुशदीप

देश की हक़ीक़त से आज अपनी इस माइक्रो पोस्ट में रू-ब-रू कराता हूं...

हमारे सांसद-
लोकसभा में करोड़पति सांसदों की संख्या दोगुनी हो गई है...वर्ष 2004 में लोकसभा में सिर्फ 156 सदस्य करोड़पति थे...2009 में ये संख्या बढ़कर 315 हो गई है...लोकसभा में करोड़पति सांसद की औसत आय 2004 में एक करोड़ 86 लाख रुपये सालाना थी जो 2009 में बढ़कर 5.33 करोड़ रुपये हो गई है...सांसदों की औसत संपत्ति 2004 में एक करोड़ 92 लाख रुपये थी जो 2009 में चार करोड़ अस्सी लाख हो गई...20 फीसदी सांसदों के पास पांच करोड़ रुपये की औसतन संपत्ति है...50 फीसदी सांसदों के पास 50 लाख से पांच करोड़ रुपये की औसतन संपत्ति है...

(...एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) की रिपोर्ट)


हमारे बच्चे...
देश के साढ़े पांच करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं यानि उनका वजन उम्र के हिसाब से कम है..देश में रोज़ पांच साल से कम उम्र के पांच हज़ार बच्चे कुपोषण से दम तोड़ देते हैं...हर साल जन्म के पहले महीने में मरने वाले बच्चों का सालाना आंकड़ा दस लाख बैठता है...पांच साल से नीचे के दस लाख और बच्चे हर साल मौत का शिकार होते हैं...बच्चों की हालत को लेकर भारत का दुनिया में 49 वां नंबर है...

(यूनिसेफ की वैश्विक बाल रिपोर्ट)


स्लॉग ओवर

मारुति 800 नई नवेली नैनो कार से पहली बार मिली...

मारुति ने नैनो पर चुटकी ली...ए री तेरी दोनों आंखें बाहर की ओर क्यों निकली हुई हैं...

नैनो...पहले पीछे तशरीफ रखने वाली जगह पर पूरा इंजन ठुकवा...फिर मुझसे बात करना...देखना आंखें बाहर आती हैं या नहीं...

बैक टू 1992...खुशदीप

लो जी...फिर बम फट गया...इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने भूचाल ला दिया है...रिपोर्ट अयोध्या कांड की जांच के लिए बने एम एस लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पर है...अभी लिब्रहान रिपोर्ट संसद में पेश नहीं की गई है...लेकिन अखबार के हाथ रिपोर्ट लग गई...आज अखबार की पहली किस्त ने ही संसद ठप करा दी...दूसरी किस्त आने पर क्या होगा...राम जाने...

अखबार के मुताबिक रिपोर्ट में जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्रहान (जी हां इनका नाम भी मनमोहन सिंह है) ने अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे बीजेपी के दिग्गज नेताओं के लिए कहा है कि इन्हें संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता...न ही ये अभियोज्यता से बच सकते हैं...इसमें कोई शक नहीं कि संघ परिवार ने सुनियोजित साज़िश के तहत अयोध्या में विवादित ढ़ांचे को गिराया...और वाजपेयी, आडवाणी. जोशी राम मंदिर निर्माण आंदोलन के जाने-पहचाने चेहरे रहे हैं, जिनका संघ ने औजार की तरह इस्तेमाल किया...इन तीनों में इतना सामर्थ्य नहीं था कि ये अपने राजनीतिक करियर को नुकसान पहुंचाए बिना संघ के आदेशों की अनदेखी कर सकते...इतिहास इस बात का गवाह है कि नाज़ी सिपाहियों की बचाव में ये दलील मंजूर नहीं की गई थी कि उन्होंने सिर्फ अपने आकाओं के आदेशों का पालन किया था...वाजपेयी, आडवाणी और जोशी तीनों ही संघ के हाथों प्यादे बने हुए थे....

खैर रिपोर्ट में सही में क्या है और अखबार में लीक हुई रिपोर्ट कितनी विश्वसनीय है ये तो तब पता चल ही जाएगा, जब सरकार एक्शन टेकन रिपोर्ट के साथ लिब्रहान रिपोर्ट को इसी शीतकालीन सत्र में संसद में रखेगी...लिब्रहान आयोग ने इस साल 30 जून को ये रिपोर्ट सौंपी थी...लिब्रहान आयोग का गठन 16 दिसंबर 1992 यानि अयोध्या में बाबरी मस्जिद (या विवादित ढांचे) गिराए जाने के दस दिन बाद ही कर दिया गया था...रिपोर्ट भी ज़्यादा से ज्यादा साल छह महीने में आ जानी चाहिए थी...लेकिन लिब्राहन आयोग को एक के बाद एक 48 विस्तार मिले...साढ़े सोलह साल बाद जाकर और आठ करोड़ रुपये खर्च करने के बाद आखिरकार लिब्रहान आयोग ने रिपोर्ट सरकार को सौंपी...इस दौरान 399 सुनवाई हुई और 100 से ज़्यादा चश्मदीदों के बयान दर्ज किेए गए...

ज़ाहिर है आज ये रिपोर्ट अखबार में लीक हुई तो अयोध्या की घटना फिर सुर्खियों में आ गई...बीजेपी का सवाल था कि रिपोर्ट की सिर्फ दो स्तर तक ही पहुंच थी...खुद जस्टिस लिब्रहान और दूसरी सरकार...यानि अगर रिपोर्ट लीक हुई तो इन्हीं दो स्तर पर हुई...इस पर चिदम्बरम का कहना था कि हम इतने नासमझ नहीं है कि पहले रिपोर्ट लीक करें और फिर संसद में सफाई देते फिरें...दूसरी तरफ जस्टिस लिब्रहान से ये सवाल पूछा गया तो उनका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया...उन्होंने सवाल पूछने वाले पत्रकारों को गेट लॉस्ट तक कह दिया...

अब कोई कुछ भी कहे रिपोर्ट तो लीक हुई है...तो क्या सरकार खुद ही रिपोर्ट लीक कर जनता की नब्ज देखना चाह रही है...जैसा रुख दिखेगा, एक्शन टेकन रिपोर्ट को वैसा ही मोड़ दिया जाएगा...दूसरे क्या मुस्लिम वोटों को फिर कांग्रेस के पीछे एकजुट करने के लिए सरकार बीजेपी के दिग्गज नेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई का मन बना रही है...

यूपी में हालिया उपचुनाव के नतीजों में मुलायम सिंह यादव की करारी हार ने साबित कर दिया है कि मुस्लिम वोटर अब अपने लिए नया ठिकाना ढ़ूढ रहा है...ऐसे में कांग्रेस ही उसके सामने एकमात्र विकल्प है...दूसरे ये भी हो सकता है कि 26/11 की बरसी से पहले लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट लीक कर देश का ध्यान दूसरी तरफ मोड़ दिया जाए...क्योंकि अगर 26/11  की बात होगी तो ये सवाल भी उठेगा कि सरकार ने पूरे एक साल किया क्या...पूरी दुनिया ने माना कि पाकिस्तान की सरज़मी से हमलावरों ने समुद्र के रास्ते आकर मुंबई को 60 घंटे तक बंधक बनाए रखा...तमाम सबूतों के बावजूद हम पाकिस्तान को हमलावरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए मजबूर नहीं कर सके...9/11 के बाद अमेरिका आतंक के खिलाफ किसी भी हद तक जाकर अफगानिस्तान में बम बरसा सकता है...फिर हमें ये काम करने के लिए कौन रोक सकता है...क्या ये हमें हक नहीं बनता कि देश के दुश्मन कहीं भी छुपे हों उनका वहीं जाकर काम तमाम कर दिया जाए...इसके लिए हमें अमेरिका या अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इजाजत लेने की बंदिश क्यों...ये सब सवाल हैं जो केंद्र की यूपीए सरकार को मुश्किल में डाल सकते हैं...क्या इन सवालों से बचने के लिए ही सरकार ने लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट को बस्ते से निकाला है....

वैसे अगर सरकार सख्ती से पेश आती है तो बीजेपी की भी जैसे मन की मुराद पूरी हो जाएगी...ये आईसीयू में पड़ी बीजेपी के लिए ऑक्सीजन से कम नहीं होगा...कल्याण सिंह फिर संघम शरणम गच्छामि का जाप जपने लगे हैं...हो सकता है वो मुलायम सिंह से हालिया दो दिन की दोस्ती और फिर दुश्मनी को लेकर कुछ धमाकेदार खुलासे ही कर दें...यानि बीजेपी और संघ की पूरी कोशिश रहेगी कि अयोध्या की हांडी को उग्र हिंदुत्व की आग पर एक बार फिर पकाया जाए...यानि देश का माहौल फिर गरम होने के पूरे आसार बन रहे हैं...

ऐसे में अब हमें और आपको सोचना है...क्या हम भी स्वार्थ की राजनीति करने वाले नेताओं के मोहरे बन जाएं...अयोध्या की घटना को 17 साल हो गए हैं...ऐसे ही बोफोर्स का मुद्दा बाइस साल से रह-रह कर सतह पर आता रहा है...कब तक हम अतीत के बंधक बने रहेंगे...क्यों हम नेताओं को कुछ नया सोचने पर मजबूर नहीं कर देते...ये तभी होगा जब हम सभी भारतवासी धर्म, जात-पांत, प्रांतवाद, भाषा जैसे मुद्दों से उठकर...देश सबसे पहले...का नारा लगाए...गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण और भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा दुश्मन मानें...इन्हें जड़ से मिटाते हुए देश को विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में ले चलने का संकल्प लें...एक बार हम एकजुट होकर देखें...फिर देखिए नेता कैसे सर के बल आपके दिखाए रास्ते पर नहीं चलते...आखिर में यही सोच रहा हूं कि क्या कभी ये सपना सच होगा...

स्लॉग ओवर

मक्खन...गुल्ली पुतर...इधर आ...ज़रा चेक करूं कि स्कूल में क्या पढ़ता है...बता टीपू सुल्तान कौन था...

गुल्ली...पता नहीं...

मक्खन...स्कूल में क्लास में रहा करे तो पता चले न कि टीपू सुल्तान कौन था...

गुल्ली...डैडी जी...टुन्नी अंकल कौन है...पता है...

मक्खन...पता नहीं...वैसे कौन है ये टुन्नी...

गुल्ली...कभी घर में रहा करो तो पता चले न...

सोमवार, 23 नवंबर 2009

अक्साई चिन यानि सफेद नदी का दर्रा...खुशदीप

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमेरिका पहुंच चुके हैं...मंगलवार को व्हाइट हाउस में प्रधानमंत्री की मुलाकात बराक ओबामा से होगी...मनमोहन सिंह दुनिया के पहले नेता हैं जिन्हें व्हाइट हाउस में ओबामा ने राष्ट्रपति बनने के बाद सरकारी अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया है..

जा़हिर है दोनों नेताओं की मुलाकात के दौरान न्यूक्लियर डील की प्रगति के साथ द्विपक्षीय मुद्दों पर तो चर्चा होगी ही...26/11, पाकिस्तान के रवैये, अमेरिका और चीन के हालिया साझा बयान जैसे मुद्दों पर भी बात होगी...बाद में ऐसे बयान भी आएंगे...अमेरिका के लिए भारत के साथ दोस्ती बहुत अहम...अमेरिका मुंबई हमलों की जांच में भारत का पूरा सहयोग करेगा...पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई तेज़ करनी चाहिए...लेकिन अमेरिका ये सब कहते हुए ये कहना भी नहीं भूलेगा कि पाकिस्तान खुद आतंकवाद का शिकार है....

ऐसे बयान देना अमेरिका की फितरत है...जब पाकिस्तान से ज़रदारी या गिलानी अमेरिका पहुंचेंगे तो वाशिंगटन पाकिस्तान की शान में कसीदे पढ़ने वाले बयान जारी करेगा...तो क्या हम बेवकूफ हैं जो अमेरिका के इस डबल-क्रॉस को समझ नहीं पाते...या फिर हम जानबूझकर अपने को धोखा देते रहना चाहते हैं...

ओबामा चीन जाकर वो काम कर आए हैं जो आज तक किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने नहीं किया था...ओबामा ने भारत-पाकिस्तान विवाद को हल करने में चीन की अहम भूमिका बता दी है...वाह ओबामा जी वाह, एक डकैत को ही अधिकार दे दिया है कि वो पंच का चोला ओढ़ कर जितना चाहे, जहां तक चाहे लूट सकता है....हम इस पर औपचारिक विरोध का बयान जारी करने की बस खानापूर्ति ही कर सके...

पाकिस्तान के साथ हमारा जो हिसाब-किताब होना है वो तो है ही लेकिन चीन किस मुंह से अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन पर अपना हक जताता है...अरुणाचल के बारे में तो आप अक्सर सुनते रहते हैं...लेकिन अक्साई चिन पर कम ही जानकारी सामने आ पाती है...आज अक्साई चिन पर ही कुछ तथ्य आपके सामने रख रहा हूं...

अक्साई चिन
अक्साई चिन यानि सफेद नदी का दर्रा...यही नाम है जम्मू-कश्मीर के सबसे पूर्वी छोर और लद्दाख डिवीज़न में आने वाले हिस्से का। उन्नीसवीं सदी तक ये इलाका लद्धाख रियासत का अहम हिस्सा था...उन्नीसवीं सदी में ही डोगराओं और कश्मीर के राजा ने नागम्याल शासकों को मात देकर इस इलाके को अपनी रियासत में मिला लिया था...

37,250 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले अक्साई चिन में चीन के दखल पर भारत ने पहली बार विरोध पचास के दशक के मध्य में जताया था...उस वक्त चीन ने तिब्बत को झिन्जियांग प्रांत से जोड़ने वाली सड़क का निर्माण अक्साई चिन में शुरू कर दिया था...तमाम विरोध के बावजूद 1957 में चीन ने इस सड़क का निर्माण पूरा कर लिया...यही सड़क 1962 में चीन और भारत के बीच जंग की एक अहम वजह थी...

चीन अक्साई चिन को झिंग्जियांग प्रांत की होटान काउंटी का हिस्सा मानता है...जम्मू-कश्मीर को अक्साई चिन से अलग करने वाली लाइन को ही एलएसी या लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के नाम से जाना जाता है...1963 में चीन और पाकिस्तान के बीच सीमा को लेकर हुए समझौते के तहत पाकिस्तान ने ट्रांस काराकोरम ट्रैक चीन के हवाले कर दिया था...वजह यही थी कि इस मोर्चे से भारत की मज़बूत घेराबंदी की जाए...इस समझौते में अक्साई चिन का कहीं कोई जिक्र नहीं था...दरअसल ट्रांस काराकोरम ट्रैक और अक्साई चिन आपस में कहीं नहीं मिलते...समझौते के तहत दोनों देशों ने अक्साई चिन से नौ किलोमीटर पहले ही अपनी सरहद को समाप्त माना था... इसलिए अक्साई चिन का जो भी विवाद है वो भारत और चीन के बीच का मामला है...इसमे पाकिस्तान कहीं कोई पार्टी नहीं हो सकता...

इसलिए इस मुद्दे पर जो भी बात करनी है, उसमें चीन को साफ तौर पर जता दिया जाना कि अक्साई चिन पर उसका अवैध कब्जा है...जब तक वो उसे खाली नहीं करता, भारत और चीन के बीच सीमा विवाद नहीं सुलझ सकता...अभी तीन साल पहले गूगल अर्थ ने सेटेलाइट से ली गई तस्वीरों से पता लगाया था कि चीन ने अक्साई चिन के एक हिस्से में भारी निर्माण गतिविधियां शुरू कर रखी हैं...चीन 1998 से ही इस क्षेत्र को टैंक ट्रेनिंग सेंटर के रूप में विकसित करता आ रहा है...

ज़रूरत है हम अब चाशनी में डूबे कूटनीतिक बयान ही न जारी करें बल्कि अमेरिका को साफ संदेश दे आएं कि भारत अपने फैसले लेने में खुद सक्षम है...चीन हो या पाकिस्तान, भारत किसी की कोई बेजा हरकत बर्दाश्त नहीं करेगा...

स्लॉग ओवर

एक बार चीन के राष्ट्राध्यक्ष भारत के दौरे पर आए...उन्हीं दिनों में दिल्ली में भारत और पाकिस्तान के बीच टेस्ट मैच चल रहा था...चीन के राष्ट्राध्यक्ष को भारत के प्रधानमंत्री टेस्ट मैच दिखाने ले गए...मैच का पहला ओवर शुरू हुआ...हर बॉल पर चीनी राष्ट्राध्यक्ष को बड़ा मज़ा आ रहा था...

एक ओवर बाद ही छोर बदलने के लिए खिलाड़ी इधर से उधर होने लगे...ये देखकर चीनी राष्ट्राध्यक्ष भी ताली बजाते हुए सीट छोड़ कर उठ खड़े हुए...शिष्टाचारवश भारत के प्रधानमंत्री को भी उठना पड़ा...

चीनी राष्ट्राध्यक्ष ने कहा...वेरी इंट्रस्टिंग गेम...मैं अपने देश में भी इसे शुरू करने को कहूंगा...लेकिन आपको नहीं लगता कि इस गेम को खेलने के लिए वक्त थोड़ा कम रख गया है...सिर्फ पांच मिनट...

शनिवार, 21 नवंबर 2009

मैं हूं "ब्रदर इंडिया"...खुशदीप

महफूज़ अली...http://lekhnee.blogspot.com/2009/11/blog-post_18.html

दीपक मशाल...http://swarnimpal.blogspot.com/2009/11/blog-post_20.html

मेरे दो छोटे भाई...दोनों कुंआरे...दोनों मुझे जान से प्यारे...अब इनके हाथ पीले करने की फ़िक्र बड़े भाई को नहीं होगी तो और किसे होगी...सॉरी...सॉरी हाथ पीले तो लड़कियों के होते हैं न...हां तो मुझे दोनों के शरीर नीले करने की फ़िक्र है...अब शादी के बाद रोज़-रोज़ पिटने पर शरीर नीला नहीं होगा तो क्या होगा...अगर मेरी आप-बीती पर यकीन नहीं आता तो फोटो पहेली कर हंसते हंसाने वाले राजीव तनेजा भाई से पूछ लो...वो तो यहां तक आपको बता देंगे कि बेलन आपकी तरफ किस एंगल से आए तो आपको कितने डिग्री पर शरीर को घुमा कर खुद को बचाना है...राजीव भाई की मुस्कुराहट का राज ही ये है...तुम जो इतना मुस्कुरा रहे हो...क्या गम है जिसको छुपा रहे हो...

हां तो मैं बात कर रहा था ब्रदर इंडिया की...पचास के दशक के आखिर में महबूब साहब ने बेहतरीन फिल्म बनाई थी.."मदर इंडिया"...उसमें नर्गिस मदर थीं और सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार उनके दो बेटे...यहां मैं ब्रदर हूं...मैं खुद घर में सभी भाई-बहनों में सबसे छोटा हूं...इसलिए मुझे तो छोटे भाइयों पर रौब झाड़ने या सेवा कराने का मौका मिला नहीं...इसलिए शुक्रिया ब्लॉगिंग के इस शौक का जिसने मुझे दो इतने प्यारे छोटे भाई दे दिए...महफूज़ और दीपक...जैसी मदर इंडिया में स्पिल्ट पर्सनेल्टी सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार की थी...वैसा ही कुछ मामला मेरे इन दो जिगर के टुकड़ों का भी है...सुनील दत्त के किरदार बिरजू की तरह ही मेरा महफूज़ थोड़ा नटखट है...और राजेंद्र कुमार के किरदार की तरह दीपक धीर-गंभीर...

महफूज़ मास्टर दावे तो करता है फ्लर्ट का किंग होने की...लेकिन वायरल बुखार में तपने के बावजूद घर में अकेला ही बार-बार किचन में जाकर चाय बनाता है...कम से कम अपनी एक सखी को ही बुलवा कर ही चाय-पानी की तीमारदारी का सुख ले लेता...हमारे मरहूम अंकल यानि अपने लेफ्टिनेंट कर्नल पिता से सवाल करता था कि आपने इतना हैंडसम बेटा ही क्यों पैदा किया...तो महफूज़ बेटा जी...अब आप जैसे हैंडसम को अपनी लाइफ का सम हल करने के लिए किसी नाज़नीन का हैंड थामने का वक्त आ गया है...ये जो बुखार में उबलने के बावजूद एसी की फर्र-फर्र हवा खाने का शौक चर्राया हुआ है न, ये हमारी बहू बेगम के आते ही हवा में न फुर्र हो जाए तो मुझे कहना...वैसे पापाजी के सामने तो बिगड़े स्कूटर के पुर्जे-पुर्जे अलग-अलग कर दिए थे...लेकिन अगर पराए घर की शहजादी के सामने ऐसी कोई हरकत करने की कोशिश की तो अपने शरीर के ही पुर्जे-पुर्जे होते दिखाई देंगे...

ये तो हुई महफूज़ की बात...अब आता हूं अपने दूसरे बाल गोपाल दीपक मशाल पर...आज अपनी पोस्ट पर बीती खुशी का ज़िक्र कर उसने दिल का कुछ हाल तो दे ही दिया...जनाब चोट गहरी खाए हुए हैं...घर से बाहर परदेस में डेरा है...अब इसके दर्दे-दिल की दवा क्या है...वैसे बचवा दो दिन बाद भारत आ ही रहा है...तब कान पकड़ कर थोड़ी दिल की बात निकालने की कोशिश करूंगा...इसे अब बीती खुशी की जगह बहुत सारी खुशी की ज़रूरत है...वैसे इस दीपक के भोले-भाले मुखड़े से धोखा मत खाइएगा...आज जनाब ने अपनी पोस्ट पर अनिल पुसदकर भाई की टिप्पणी पर जो हाज़िर जवाबी दिखाई है खुद को RAI (Randwa Association of India) का सदस्य बता कर, उसी से समझ लीजिए कि ये भोलू राम भी कम छुपा-रूस्तम नहीं है...

अभी तक सारी ब्लॉगर बिरादरी महफूज़ के सिर पर ही सेहरा देखने की फ़िक्र कर रही थी...जैसा कि टिप्पणियों में बार-बार दिखता ही रहता है...अब इस लिस्ट में दीपक मशाल का नाम और जोड़ लीजिए...और जिस दिन ये घड़ी आएगी...उस दिन की बारात के बारे में सोचिए...ब्लॉगर ही ब्लॉगर...ठीक वैसे ही जैसे शिवजी बियाहने निकले थे...अब भोले की बारात में कौन-कौन बाराती थे...ये भी मुझे बताने की ज़रूरत पड़ेगी क्या...

(आज का स्लॉग ओवर भी इन्हीं दो मोस्ट एलिजेबल बैचलर्स को समर्पित है)

स्लॉग ओवर

महफूज़ और दीपक...शादी के लिए लड़की चुनने से पहले खुशदीप का ज्ञान सुन लो...फिर न कहना...बड़े भाई ने बताया नहीं था...

आप एक हाउस-फ्लाई को बटर-फ्लाई बना सकते हैं...


लेकिन एक बटर-फ्लाई को कभी हाउस-फ्लाई नहीं बना सकते...

ये क्या हो रहा है भाई, ये क्या हो रहा है...खुशदीप

मुंबई हमलों की बरसी को बस अब एक हफ्ता ही बचा है...पूरी दुनिया ने देखा पाकिस्तान की सरज़मीं से आए आतंक के पुतलों ने देश की आर्थिक रीढ़ कहे जाने वाले मुंबई को साठ घंटे तक बंधक बनाए रखा...ठोक बजा कर सारे सबूत भी पाकिस्तान के हवाले कर दिए गए...लेकिन हुआ क्या...पाकिस्तान उलटे हमसे ही सवाल करता रहा...और हम जवाब देते रहे...

हमले का मास्टरमाइंड मोहम्मद हाफिज सईद पाकिस्तान में धड़ल्ले से खुला घूम रहा है...और हमारी सरकार बस हफ्ते-दो हफ्ते बाद वही घिसा-पिटा बयान देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेती है कि पाकिस्तान 26/11 के हमलावरों  के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे...पाकिस्तान अपनी सरज़मी से भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को रोके...हमने कह दिया और पाकिस्तान ने सुन ली...वैसे ही जैसे विभाजन के बाद से सुनता आ रहा है...

पाकिस्तान के साथ तो हमारा मोर्चा सदाबहार है लेकिन इससे कहीं ज़्यादा चिंता चीन से है...ड्रैगन बड़े खतरनाक तरीके से भारत को घेरता जा रहा है...आर्थिक और रणनीतिक दोनों मोर्चों पर...चीन ने एक सोचे समझे प्लान के तहत कश्मीर को भारत से अलग दिखाना शुरू कर दिया है...अब वो कश्मीरियों को साफ संकेत दे रहा है कि उन्हें चीन आने के लिए भारत के अन्य राज्यों के नागरिकों की तरह वीज़ा लेने की आवश्यकता नहीं है...बस कागज के टुकड़े को स्टैप्ल करके ही इस औपचारिकता को पूरी करने की बात चीन कर रहा है..

इस हफ्ते कश्मीर को लेकर भारत के नज़रिए से बेहद खतरनाक घटनाक्रम हुआ है...ग्लोबल पुलिसमैन यानि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चीन जाकर खुले तौर पर भारत-पाक विवाद हल करने में चीन की भूमिका बता दी...ये वही ओबामा है जो पिछले साल राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान जॉर्ज बुश को इसलिए कोस रहे थे कि चीन के खिलाफ तिब्बतियों के मानवाधिकारों को लेकर सख्त रवैया नहीं अपनाया जा रहा...ओबामा ने बीजिंग ओलम्पिक्स का बहिष्कार करने तक की सलाह बुश को दे डाली थी...लेकिन ओबामा ने खुद राष्ट्रपति बनने के बाद क्या किया...तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा को मुलाकात के लिए वक्त देने से ही इनकार कर दिया...दलाई लामा 1991से ही अमेरिका आते-जाते रहे हैं...लेकिन किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि दलाई लामा को मिलने के लिए वक्त न दे...

ये अचानक ओबामा ने यू-टर्न क्यों लिया...बीजिंग जाकर चोर को ही कोतवाल बना दिया...वो चीन जिसने अक्साई चीन को अवैध तरीके से अपने कब्ज़े में लिया हुआ है...ऐसी क्या मजबूरी थी कि ओबामा चीन के लिए इतनी मीठी बोली बोलने लगे...क्या उत्तर कोरिया और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने के लिए मदद का चीन ने कोई वायदा किया है....या फिर अमेरिका को मंदी की मार से बचाने के लिए चीन को इस बात पर राजी कर लिया गया है कि वो अपनी मुद्रा का घटाकर मूल्यांकन नहीं करेगा...

इलाके में चीन और पाकिस्तान के साथ अमेरिका भी आ खड़ा होता है तो भारत के लिए इस घेरेबंदी का तोड़ ढूंढना बड़ा मुश्किल हो जाएगा...इस मुद्दे का सबसे खतरनाक पहलू है कश्मीर में हुर्रियत कान्फ्रेंस के चेयरमैन मीर वायज़ फारूक का खुल कर चीन के समर्थन में बयान देना...दरअसल चीन एक एनजीओ के जरिेए पिछले दो महीने से ही मीर वायज़ पर डोरे डालता आ रहा है...इसका नतीजा आज सामने भी आ गया...मीर वायज डंके की चोट पर कह रहे हैं कि चीन दुनिया की बड़ी शक्ति है...भारत-पाक विवाद से चीन सीधे तौर पर जुड़ा है क्योंकि कश्मीर का एक हिस्सा उसके कब्ज़े में है...ईद के बाद मीर वायज़ पहले पाकिस्तान फिर चीन जाने वाले हैं...अब चीन वहां मीर वायज़ को कौन सी घुट्टी पिला कर भारत वापस भेजता है, ये बड़ा मायने रखेगा...

चीन के साथ भारत के सीमा विवाद में अरुणाचल और अक्साई चिन ही मुख्य और दो बड़े मुद्दे हैं...ज़्यादातर भारतीयों को गलतफहमी है कि पाकिस्तान ने अक्साई चिन का इलाका चीन को सौंप रखा है...अक्साई चिन के बारे में अलग से एक पोस्ट में जानकारी दूंगा...फिलहाल साउथ एशिया में बन रहे नए समीकरणों को देखते हुए भारत को कूटनीतिक और राजनीतिक, दोनों दृष्टियों से अपनी भौगोलिक सीमाओं को लेकर काफी सतर्क रहने की आवश्यकता है...

स्लॉग ओवर

महफूज़ भाई ने अपने जानने वाले एक नवाब से मुलाकात कराई...नवाब साहब के साथ बच्चों की पूरी फौज थी..छह महीने का बालक उनकी गोद में था...मैनें नवाब साहब के दूसरे बच्चों की उम्र जाननी चाही तो उन्होंने गिनानी शुरू की...एक साल, डेढ़ साल, दो साल, ढाई साल, तीन साल, साढ़े तीन साल...चार साल....जैसे-जैसे वो उम्र बता रहे थे मेरे चेहरे पर हैरानी के भाव आते जा रहे थे...
 
मैंने हिम्मत करके पूछ ही लिया...नवाब साहब ये सारे बच्चे आप ही के हैं...
 
नवाब को ताव आ गया...बोले... हां हैं...आपको इससे मतलब जनाब...
 
मैंने कहा...नहीं...नहीं..ऐसा कुछ नहीं...पर दो बच्चों के बीच नौ महीने का अंतर तो ऊपर वाले ने भी फिक्स कर रखा है...फिर ये छह महीने, एक साल, डेढ़ साल, दो साल....बच्चों की उम्र कैसे...
 
नवाब तपाक से बोले...मेरी चार बीवियां हैं...आपको कोई परेशानी है क्या...

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

मक्खन की बेबे (मां) गुम हो गई...खुशदीप

मक्खन के साथ बड़ी बुरी बीत रही है...मक्खन की बेबे (मां) गुम हो गई है...स्लॉग ओवर में उसकी कहानी बताऊंगा...लेकिन पहले बात गन्ने की...गन्ने का नाम लेते ही हमारा मुंह मीठा हो जाता है...लेकिन आज इसी गन्ने की कीमत मुंह पर लाते ही किसान के मुंह कुनैन क्यों घुल रही है...

आज दिल्ली में हज़ारों-हज़ारों किसानों के इसी दर्द को आवाज़ देने के लिए विपक्ष के नेता अपने सारे मतभेद भुला कर कंधे से कंधा मिलाते नज़र आए...विपक्ष की ऐसी एकजुटता बरसों बाद देखने को मिली...आप कहेंगे मैं ये कौन सा मुद्दा आज ले बैठा...लेकिन सच पूछिए तो ये हम सबसे जुड़ा मुद्दा है...

आज चीनी बाज़ार में 45 रुपये किलो मिल रही है...लेकिन केंद्र सरकार ने गन्ने की वसूली कीमत तय की है 129 रुपये 84 पैसे प्रति क्विंटल...यानि करीब 1 रुपये 30 पैसे प्रति किलो...एक अनुमान के मुताबिक दस किलो गन्ने से एक किलो चीनी बनती है...इस हिसाब से एक किलो चीनी के लिए ज़रूरी गन्ने के लिए किसान को 13 रुपये ही मिले...और बाजार में चीनी 32 रुपये ज़्यादा 45 रुपये किलो मिल रही है...ये 32 रुपये किसकी जेब में जाते है....मान लीजिए चीनी को बनाने की लागत पर भी कुछ रकम खर्च होती होगी...लेकिन ये रकम इतनी ज़्यादा होती है कि किसान को मिलने वाले मूल्य से लेकर चीनी बाज़ार तक आते-आते साढ़े तीन गुना महंगी हो जाती है...ज़ाहिर है इस कीमत में बाज़ार का मोटा मुनाफा भी जुड़ा है...

रही बात किसान की तो वो पहले फसल को उगाने के लिए खेत में पसीना बहाता है...फसल तैयार हो जाती है तो उसकी वाजिब कीमत के लिए सड़क पर नारे लगाने में पसीना बहाता है...यहां ये बताना भी ज़रूरी है जहां किसान संगठित है वहां उसे अपने गन्ने की अच्छी कीमत मिल जाती है...जैसे यूपी सरकार ने गन्ने का मूल्य 165-170 रुपये प्रति क्विंटल तय करने के साथ 20 रुपये प्रति क्विंटल बोनस का भी ऐलान किया है...पंजाब और हरियाणा में भी गन्ने की सरकारी कीमत 180 रुपये प्रति क्विंटल रखी गई है...लेकिन देश के दूसरे गन्ना उत्पादक राज्यों में गन्ने की कीमत कमोबेश वही है जो केंद्र सरकार ने पिराई के इस सीजन के लिए तय की है...यानि 129 रुपये 84 पैसे...

जाहिर है किसान की इस ताकत को भुनाने के लिए नेता भी पीछे नहीं रहते...पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के सांसद पुत्र अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल की तो पूरी राजनीति ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश की गन्ना बेल्ट पर ही टिकी हुई है...किसान के दर्द में नेताओं को चुनावी फायदे के लिए वोटों का टानिक नजर आता है...सोचना हमें है... हम 45 रुपये किलो चीनी खरीद रहे हैं लेकिन जो बेचारा किसान इसके लिए गन्ना उगाता है...उसकी जेब में क्या जा रहा है...वो फटेहाल क्यों हैं...महंगाई हमारे लिए इतनी ज़्यादा है तो देश के अन्नदाता किसान को गुज़र बसर करना कितना मुश्किल हो रहा होगा...इसका जवाब सरकार के पास होना चाहिए...लेकिन जो जाग कर भी सोने का बहाना करे, उसे कौन जगा सकता है...

स्लॉग ओवर

मक्खन की बेबे (मां) की मौत हो गई...भाईया जी (पिता) पहले ही दुनिया छोड़ कर जा चुके थे...मक्खन का बेबे से बड़ा जुड़ाव था...बेबे के बिना उसे दुनिया ही बेकार लगने लगी...अपने में ही गुमसुम रहने लगा...इसी तरह एक साल बीत गया...मक्खन के जिगरी ढक्कन से मक्खन की ये हालत देखी नहीं जा रही थी...लेकिन करे तो करे भी क्या...

तभी उसे किसी ने बताया कि शहर में कोई सयाना आया हुआ है...ढक्कन ने सोचा मक्खन को सयाने जी के पास ही ले जाता हूं...शायद वो ही उसे ठीक कर दें...मक्खन ने सयाने को अपना दर्द बताया...सयाना भी पहुंची हुई चीज़ था...उसने मक्खन को ठीक करने के लिए एक तरकीब सोची...उसने मक्खन से कहा...बच्चा, तेरी बेबे से पिछले जन्म में अनजाने में कोई बड़ी भूल हो गई थी...इसलिए ऊपर वाले ने बेबे को सजा के तौर पर इस जन्म में श्वान (कुत्ती) बना कर भेज दिया है...लेकिन जल्द ही तेरी बेबे से मुलाकात होगी...इसलिए परेशान मत हो...मक्खन सुन कर मायूस तो बड़ा हुआ लेकिन बेबे से जल्द मिलने की सोच कर ही थोड़ी तसल्ली हुई...बाहर निकले तो ढक्कन उसे खुश करने के लिए जलेबी की दुकान पर ले गया...दोनों जलेबी खा ही रहे थे कि एक कुत्ती वहां आ गई... और जलेबी के लालच में मक्खन को देख कर ज़ोर ज़ोर से पूंछ हिलाने लगी...मक्खन का कुत्ती को देखकर माथा टनका...सयाने जी के बेबे के बारे में बताए शब्द उसके कानों में गूंजने लगे...मक्खन ने जलेबी का एक टुकड़ा डाल दिया...कुत्ती ने झट से टुकड़ा चट कर लिया...और उचक-उचक कर मक्खन की टांगों पर पंजे मारने लगी...मक्खन ने सोचा हो न हो...ये मेरी बेबे ही लगती है...

मक्खन घर की ओर चला तो कुत्ती जी (सॉरी...बेबे) पीछे पीछे...मक्खन का भी मातृसेवा का भाव अब तक पूरी तरह जाग चुका था...बेबे को साथ लेकर ही मक्खन अपने घर में दाखिल हुआ और मक्खनी को आवाज़ दी...सुन ले भई...तूने बेबे को पहले बड़ा दुख दिया था...लेकिन इस बार बेबे जी को कोई तकलीफ हुई तो तेरी खैर नहीं...मक्खनी भी मक्खन के गुस्से की सोच कर डर गई...लो जी बेबे जी की तो अब मौज आ गई...कहां गली-गली नालियों में मुंह मारते फिरना...और कहां एसी वाला बढ़िया बेडरूम...बेबे जी के लिए बढ़िया बेड बिछ गया...बेड पर पसरे रहते और बढ़िया से बढ़िया खाना वहीं आ जाता...
 
मक्खन भी काम पर आते-जाते बेबे जी के कमरे में जाकर मिलना नहीं भूलता...एक दिन मक्खन काम से घर वापस आया तो आदत के मुताबिक बेबे जी के कमरे में गया...लेकिन ये क्या...बेड पर उसे बेबे जी नहीं दिखे....ये देखते ही मक्खन का पारा सातवें आसमान पर...चिल्ला कर मक्खनी को आवाज़ दी....बेबे जी कहां हैं...तूने फिर कोई उलटी सीधी हरकत की होगी...और वो नाराज़ होकर चली गई होंगी...इस पर मक्खनी ने कहा....नाराज़ न होओ जी...ओ आज शामी बेबे जी नू घुमाण लई भाईया जी आ गए सी, ओन्हा नाल ही सैर ते गए ने...(आज शाम को बेबे जी को घुमाने के लिए भाईया जी आ गए थे...उन्हीं के साथ सैर पर गई हैं...)

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

मिल ही गया एक रुपया...खुशदीप

पहले कल वाले एक रुपया  का पेंच सुलझा लिया जाए और फिर स्लॉग ओवर में दो रामबाण नुस्खे...संगीता पुरी जी, राजीव तनेजा भाई, उन्मुक्त जी, राज भाटिया जी और जी के अवधिया जी ने 45 रुपये का तोड़ निकाल कर सवाल को करीब-करीब सुलझा ही लिया...लेकिन मेरे मोटे भेजे में बात आसानी से आती नहीं...सब के फॉर्मूले देने के बाद भी दिमाग का कीड़ा शांत नहीं हुआ...

ऐसे में फिर वही काम आई जिसने ये सारा टंटा शुरू किया था...यानि मेरी बिटिया पूजन...मुझे परेशान देखकर आखिर बिटिया रानी को तरस आया और उसने के जी के बच्चे की तरह मुझे समझाना शुरू किया...पचास रुपये की दो घड़ी तो एक घड़ी कितनी की हुई...मैंने कहा 25 रुपये की...उसने कहा बिल्कुल ठीक है (जैसे मेरे लिए ये सवाल हल करना ही गुल्ली जैसा हो)...फिर बोली...दुकानदार ने पांच रुपये वापस करने को कहा तो दो घड़ियों की सही कीमत क्या हो गई...मैंने झट से रामानुजन या शकुंतला देवी वाले स्टाइल में जवाब दिया...45 रुपये....बिटिया ने फिर शाबाशी दी और पूछा दो घड़ियों 45 रुपये की तो एक घड़ी की सही कीमत...मैंने थोड़ा सोचा...(अमा भाग करने में थोड़ा टाइम तो लगता है)...फिर जवाब दिया 22 रुपये 50 पैसे ...अब बिटिया ने फिर समझाते हुए कहा...नौकर ने 3 रुपये अपने पास रख लिए थे...तो दोनों घड़ियां की कीमत डेढ़-डेढ़ रुपया और बढ़ गई...मैंने अच्छे बच्चे की तरह हां में मुंडी हिलाई...बिटिया ने फिर कहा...अब एक घड़ी कितने की हो गई...मैंने फिर ट्यूबलाइट की तरह चमकते हुए कहा 24 रुपये...बिटिया से फिर तारीफ मिली...अब उसने कहा...एक घड़ी 24 की तो दो कितने की...थोड़ा टाइम लेते हुए मैंने कहा...48 रुपये.... बिटिया ने कहा बिल्कुल ठीक.. नौकर ने कितने रुपये वापस दिए थे...मैंने कहा...2 रुपये...बिटिया...48 और 2 कितने होते हैं...मैंने कहा 50 रुपये...

बिटिया...फिर परेशानी क्या है...एक रुपये के पीछे क्यों तूफान खड़ा कर रखा है....मैंने अनिल पुसदकर जी वाले स्टाइल में जवाब दिया...धन्य हो मेरी मां...ये कहानी कल ही समझा देती तो क्यों एक रुपये के पीछे ये सारा फच्चर फंसता...

स्लॉग ओवर

1. बच्चा अगर मिट्टी खाता है तो क्या करें...

बच्चे को डाइनिंग टेबल पर आराम से बैठाएं...एक प्लेट में मिट्टी डाले और चम्मच के साथ उसे खाने के लिए पेश करें...साथ ही कहें...बेटा जितनी मर्जी मिट्टी खाओ लेकिन मैनर्स के साथ...फिर देखिए बच्चा मिट्टी के पास कभी फटकेगा भी नहीं....

2. दूध वाला अगर दूध में पानी मिलाता है तो क्या करें...

सुबह दूध वाला आए तो उससे कहिएगा...भईया आज से जो दूध तुम 28 रुपये लीटर देते हो, उस भाव में हम ये दूध नहीं लेंगे...हम तुम्हे एक लीटर दूध के 40 रुपये दिया करेंगे...दूध वाला भैया ये सुनकर थोड़ा हैरान-परेशान होगा...फिर उसकी परेशानी भांपते हुए कहिए...भइया ये फालतू के पैसे इसलिए हैं कि तुम हमारे दूध में मिनरल वाटर मिलाया करो...ये सरकारी नलकों से आने वाले पानी पर हमें कोई भरोसा नहीं है...फिर देखिए अगले दिन से दूध की क्वालिटी...

बुधवार, 18 नवंबर 2009

एक रुपया कहां से आया...खुशदीप

अनिल पुसदकर भाई जी को उनकी लाडली भतीजी युति वक्त-वक्त पर अपने सवालों से लाजवाब करती रहती है...ऐसा ही कुछ 10 साल की मेरी बिटिया पूजन ने मेरे साथ किया है...स्कूल से पता नहीं कहां से बच्चों से सवालनुमा एक पहेली ले आई...लाख दिमाग लगाने के बावजूद मैं तो इस सवाल को सुलझाने में नाकामयाब रहा...आप ही कोशिश करके देख लीजिए...अगर कुछ जवाब सूझे तो मुझे बताइएगा...

एक बार एक शख्स बच्चों की दो घड़ियां लेने एक दुकान पर पहुंचा...उस वक्त दुकान पर मालिक नहीं नौकर बैठा हुआ था...ग्राहक ने 25-25 रुपये की दो घड़ियां पसंद की...50 रुपये देकर दो घड़ियां खरीद ली...ग्राहक दुकान से निकल गया...तभी मालिक आ गया...मालिक को नौकर ने बताया कि उसने 25-25 रुपये की दो घड़ियां बेची हैं...मालिक ईमानदार था...उसने नौकर से कहा...तूने पांच रुपये ज़्यादा ले लिए हैं....जा वापस करके आ...नौकर दुकान से भाग कर ग्राहक के पीछे गया....लेकिन उसके मन में बेईमानी आ गई...उसने पांच रूपये में से तीन रुपये अपने पास रख लिए...और दो रुपये ग्राहक को जाकर वापस कर दिए...इस तरह ग्राहक को पचास में से दो रुपये वापस मिल गए...और उसे 48 रुपये की दो घड़ियां पड़ गईं....अब उसकी जेब से 48 रुपये गए...लेकिन 3 रुपये नौकर ने अपने पास रख लिए थे....48 और 3 यानि 51 रुपये....अब ये फालतू का एक रुपया कहां से आ गया....मैं तो हार गया...अब आप दिमाग लड़ाइए और इस एक रुपये की गुत्थी को सुलझाइए....

स्लॉग ओवर

गुल्ली की शरारतें दिन भर बढ़ती जा रही थीं...अपनी चंडाल चौकड़ी के साथ हर वक्त धमाल मचाता रहता था...पानी जब सिर से गुज़रने लगा तो प्रिसिंपल ने गुल्ली को स्कूल के काउंसिलर (बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ) के पास भेज दिया...

काउंसिलर ने एक घंटे तक गुल्ली को लेक्चर पिलाया...साथ ही वादा लिया कि रोज़ कोई न कोई एक अच्छा काम करेगा...बड़ों का सम्मान करेगा...दूसरों की मदद करेगा...गुल्ली ने हर बात में हामी भरी कि जैसा काउंसिलर कहेंगी, वैसा ही करेगा...

अगले दिन गुल्ली अपनी चंडाल चौकड़ी के साथ फिर स्कूल लेट पहुंचा...प्रिंसिपल का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया...फौरन काउंसिलर के पास गई....बोलीं...आप तो कह रही थीं कि गुल्ली सुधर जाएगा...अब शरारत की जगह रोज कोई अच्छा काम करेगा...देखो पहले दिन ही लेट आया...

काउंसिलर भी नाराज हो गई...गुल्ली को बुलाकर पूछा...क्या यही था तुम्हारा वादा...

गुल्ली बोला...मैडम जी, आपने जो कहा, मैं तो उसी का पालन कर रहा था....आपने कहा था रोज़ एक अच्छा काम करना...आज वही अच्छा काम करते हुए स्कूल आने में लेट हो गया...

काउंसिलर ने पूछा...कौन सा अच्छा काम किया....

गुल्ली...मैडम जी स्कूल आते वक्त हम पांच दोस्तों ने एक बुज़ु्र्ग महिला को पकड़कर सड़क पार करा दी...

काउंसिलर...ये तो वाकई अच्छी बात की...लेकिन एक बात बताओ...तुम महिला को अकेले भी तो सड़क पार करा सकते थे...पांचों दोस्तों की ज़रूरत क्यों पड़ी...

गुल्ली...मैडम जी...वो सड़क पार करना ही नहीं चाहती थी....

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

कहां रे हिमालय ऐसा...खुशदीप

दिनेशराय द्विवेदी सर और बीएस पाबला जी ने आ़ज दिल्ली प्रवास के बाद मेरे से विदाई ली...ऐसा कहीं लगा ही नहीं कि हम सब पहली बार मिले ...सब कुछ वैसा ही जैसे घर से बाहर आने-जाने पर होता है...कोई कुछ कहे भी नहीं, और दूसरा पहले ही उस भाव को पकड़ ले...टेलीपैथी की तरह...लगे ही नहीं कि भौतिक तौर पर हम सैकड़ो-हज़ार किलोमीटर के फासले पर रहते हैं...मिलने के बाद विदा हो तो इसी वादे के साथ...फिर मिलेंगे...और दिल तो ब्लॉग के ज़रिेए हमेशा मिले रहते ही हैं...ज़मीनी दूरी होने के बावजूद आपस में कोई दूरी नहीं...

लेकिन दूसरी ओर बाल ठाकरे हैं...मराठी-गैर मराठी...मुंबईकर-परप्रांतवासी के नाम पर लोगों को बांटना चाहते हैं...मुंबई में रहने वालों के बीच इतनी दूरी बना देना चाहते हैं कि महानगर अलगाववाद की आग में जलने लगे...इस बार निशाना चुना सचिन तेंदुलकर को...सिर्फ इसलिए कि ये क्यों कह दिया कि मुंबई भारत की है...और सचिन खुद के महाराष्ट्रीय होने पर गर्व करते हैं लेकिन साथ ही अपने को भारतीय बताते हैं...बाल ठाकरे ये कहते हुए भूल गए कि सचिन भारत के हर घर के लाडले हैं...उन पर किसी भी प्रांत का उतना ही हक है जितना महाराष्ट्र का...बाला साहेब महाराष्ट्र और मुंबई भारत में ही हैं और वहां भारत का ही संविधान चलता है...उम्र के इस पड़ाव में विधानसभा चुनाव की करारी हार और भतीजे राज ठाकरे के भितरघात ने आपका संतुलन ज़रूर बिगाड़ दिया है...लेकिन सचिन का नाम लेकर अंगारों से मत खेलो...देश के और हिस्से तो क्या महाराष्ट्र में ही आपको ऐसा विरोध सहना पड़ेगा कि चार दशक से चल रही राजनीति की दुकान पर शटर गिराना पड़ जाएगा...

सचिन के लिए बस सब भारतवासियों की भावना सचिन देव बर्मन के गाए इस गीत से समझ लीजिए...

कहां रे हिमालय ऐसा,
कहां बहता पानी,
यही है वो ज़मीन,
जिसकी दुनिया दीवानी...

प्रेम के पुजारी,
हम है रस के भिखारी,
हम हैं प्रेम के पुजारी हो,
प्रेम के पुजारी...


स्लॉग ओवर

गुल्ली मैथ्स का पेपर देकर घर आया....मक्खन घर पर ही था...

मक्खन ने गुल्ली को बुला कर पूछा... गुल्ली पुतर, पेपर कैसा हुआ...

गुल्ली...डैडी जी एक सवाल गलत हो गया...

मक्खन...एक सवाल गलत हो गया...ओ...चलो पुतर जी...कोई बात नहीं...एक ही तो गलत हुआ है...बाक़ी..

गुल्ली...बाक़ी मैंने किए ही नहीं...

रविवार, 15 नवंबर 2009

द्विवेदी सर,पाबलाजी और दिलों की महफ़िल...खुशदीप

आज मैं बहुत खुश हूं...दिनेशराय द्विवेदी सर और यारों के यार बीएस पाबला जी से साक्षात मिलने का सौभाग्य मिला...और ब्लॉग पर दो गुरुदेवों... अनूप शुक्ल जी और समीर लाल जी समीर के अंतर्मन के दर्शन किए...इससे ज़्यादा मैं और क्या चाह सकता हूं ऊपर वाले से....

अनूप शुक्ल जी और समीर लाल जी समीर को लेकर मैं कितना कूपमंडूक था और न जाने क्यों टर्र टर्र कर रहा था...उसका मास्टरस्ट्रोक स्टाइल में अनूप जी और समीर जी ने जवाब दे दिया है...मेरी पिछली पोस्ट में समीर जी की टिप्पणी से सब साफ हो जाता है...

अब रही बात द्विवेदी जी और पाबला जी से मुलाकात की...ये दिन मेरे लिए ज़िंदगी की यादगार बन गया है...अजय कुमार झा जी और पाबला जी की पोस्ट से साफ हो ही गया था कि दिल्ली के लक्ष्मी नगर में कब और कहां पहुंचना है...टाइम ग्यारह बजे का था....नोएडा में घर से निकलने में ही मुझे पौने ग्यारह बज गए...मन में गाना उमड़ रहा था....आज उनसे पहली मुलाकात होगी...फिर होगा...क्या पता, क्या खबर...द्विवेदी जी और पाबला जी का तो मुझे पता था कि वो पक्का आ रहे हैं....राजीव तनेजा भाई ने भी साफ कर दिया था कि सपत्नीक आ रहे हैं...बाकी के बारे में मैं पूरे अंधेरे में था कि और कौन-कौन आ सकता है...

इसी उधेड़बुन में घर से पैदल ही नोएडा के नए नवेले मेट्रो स्टेशन पहुंचा और टिकट काउंटर पर जाकर सीधा लक्ष्मी नगर डिस्ट्रिक्ट सेंटर का टिकट मांगा...टिकट काटने वाले ने मुझे ऐसे देखा कि मैं दुनिया का आठवां अजूबा हूं...बोला... जनाब छह महीने बाद आना....मैने सोचा शायद घर में पत्नी का सताया होगा...इसलिए ऐसे बोल रहा है...मैं ताव में आता, इससे पहले ही वो बोल पड़ा...भईया अभी लक्ष्मीनगर वाले रूट पर तो मेट्रो शुरू ही नहीं हुई है....मैंने भी अपनी अज्ञानता साबित हो जाने के बावजूद चिकना घड़ा बने हुए कहा...ठीक है, ठीक है जो सबसे पास का स्टेशन है उसी का टिकट दो...उसने अक्षरधाम का टोकन थमा दिया...अक्षरधाम से ऑटो पकड़ कर मौका-ए-मुलाकात जी जी रेस्तरां पहुंच गया...

वहां अंदर घुसते ही झा जी और राजीव तनेजा जी ने पहचान लिया...उनके साथ टेबल पर मौजूद पाबला जी ने भी बिना बताए ही मेरा थोबड़ा पहचान लिया...सब ऐसे मिले जैसे मनमोहन देसाई की फिल्मों के आखिरी सीन में बिछड़े भाई मिला करते थे....इस मिला-मिली के चक्कर में मुझसे एक गुस्ताखी भी हो गई...मैं संजू भाभी (राजीव जी की पत्नीश्री) को अभिवादन नहीं कर सका...बाद में संजू  जी के मुझे विश करने पर ही अपनी गलती का अहसास हुआ....

खैर झा जी का अरेंजमेंट टनाटन था...टेबल पर बैठते ही ठंडा जूस और चाइनीज़ आ गया...झा जी और तनेजा दंपति से तो फरीदाबाद ब्लॉगर मीट में पहले मिला हुआ ही था...पाबला जी से वर्चुएलिटी की दुनिया से निकलकर रियल में पहली बार मिलने की उत्सुकता ज्यादा थी...लेकिन पाबला जी ठहरे पाबला जी...पहले ही एक दो जुमले ऐसे कहे कि सारी औपचारिकता गधे के सींग की तरह गायब हो गई...

अब तक शुरू हो गई थी दिलों की महफिल...जी हां दिलों की महफिल....कोई ब्लॉगर मीट नहीं, कोई ब्लॉगर कॉन्फ्रेंस नहीं...बस दिल की बात दिल तक पहुंचाने का सिलसिला...मैं पाबला जी की यादाश्त को देखकर हैरान था...एक-एक टिप्पणी, एक-एक पोस्ट उन्हें जुबानी याद थी...आज मुझे पता चला कि पाबला जी को हर ब्लॉगर का जन्मदिन, शादी की सालगिरह कैसे याद रहती है...हंसी का दौर चल ही रहा था कि सामने से इरफान भाई (कार्टूनिस्ट) आते दिखाई दिए...उनका आना मेरे लिए सरप्राइज से कम नहीं था...खैर इरफान जी ने आते ही बड़ी गर्मजोशी से मुलाकात की...कहीं से लगा ही नहीं कि मैं देश के सर्वश्रेष्ठ कार्टूनिस्टों में से एक से रू-ब-रू हो रहा हूं...बिल्कुल सीधे और हमारे-आपके जैसे ही ब्लॉगर...

ये सब चल ही रहा था कि झा जी के चेहरे से थोड़ी परेशानी झलकने लगी थी...उन्हें चिंता थी कि दिनेशराय द्विवेदी सर अभी तक नहीं पहुंचे थे...द्विवेदी जी को फरीदाबाद के पास बल्लभगढ़ से आना था...कहीं जाम न लगा हो या ठीक से रास्ता पता भी हो या नहीं...एक घंटे बाद द्विवेदी जी का फोन आ गया...झा जी की जान में जान आई...द्विवेदी जी रेस्तरां के बाहर तक आ गए थे...झा जी उन्हें बाहर जाकर ले आए...द्विवेदी जी बड़ी आत्मीयता के साथ सबसे मिले...अभी तक फोटो में ही देखा था...द्विवेदी जी से आशीर्वाद लिया...फिर शुरू हुआ बातों का दौर...द्विवेदी जी ने एक से बढ़कर एक संस्मरण सुनाए....किस तरह वो कभी अकेले दम पर अखबार निकाला करते थे...इरफान भाई ने कार्टून विद्या पर कुछ दिलचस्प बातें बताईं...बीच-बीच में गुदगुदाने वाली फुलझड़िया भी चलती रहीं...

संजू तनेजा जी अकेली महिला थीं...इसलिए वो बोर न हो बीच-बीच में सब उनसे भी बतियाने की कोशिश कर रहे थे...संजू जी के बारे में मुझे जानकारी मिली कि वो खुद भी यदा-कदा ब्लॉगिंग करती हैं...खैर बहुत ही सपोर्टिंग...उन्होंने कहीं भी अहसास नहीं होने दिया कि वो असहज महसूस कर रही हैं...

इस बीच टेबल पर खाना भी लग चुका था...पापड़, अचार, चटनी, रायता, दाल, मटर पनीर, कोफ्ता, दम आलू, चावल...सब कुछ इतना लजीज कि देखते ही मुंह में पानी आ जाए...स्वीट डिश में रसगुल्ला....बाकी द्विवेदी जी भी जेब में ढ़ेर सारी कैंडी लाए हुए थे....जिस प्यार से उन्होंने खिलाई, उसके आगे दुनिया की बढ़िया से बढ़िया स्वीट डिश भी मात खा जाए....खाने के साथ भी बातों का दौर चल रहा था...हर एक के पास बताने के लिए इतना कुछ...इस सब के बीच पाबलाजी का कैमरा बिना रूके लगातार फ्लैश चमका रहा था (फोटो आपको पाबला जी, झा जी और द्विवेदी जी की पोस्ट पर देखने को मिलेंगे)......थोड़ी देर बाद काफी भी आ गई...

इस तरह बातों-बातों में कब पांच घंटे गुजर गए...पता ही नहीं चला..खैर विदा होने का टाइम हो गया....इस बीच झा जी ने जानकारी दी कि अपने महफूज़ अली भाई जल्दी ही बड़े पैमाने पर लखनऊ में ब्लॉगर मीट का आयोजन करने जा रहे हैं...वहीं मिलने के वादे के साथ सबने विदाई ली...इरफान भाई का घर मेरे से ज़्यादा दूर नहीं है...इसलिए उन्होंने मुझे अपनी कार से ही छोड़ दिया...लेकिन घर लौटते समय मैं सोच रहा था कि मेजबान हम थे या पाबला जी...और शायद यही पाबला जी की शख्सीयत का सबसे शानदार पहलू है...

स्लॉग ओवर

झा जी को आइडिया था कि पंद्रह-बीस ब्लागर भाई तो दिल की महफिल में जुटेंगे ही...इसलिए उन्होंने अरेंजमेंट भी उसी हिसाब से कराया हुआ था...प्रेस के भी तीन-चार रिपोर्टरों ने आना था (और वो आए भी)...अब जुम्मा-जुम्मा हम सिर्फ सात-आठ लोग...झा जी को फिक्र थी कि प्रेस वाले आएंगे तो उनके जेहन में यही होगा कि ब्लॉगर्स की कोई मीटिंग हो रही है...आजकल वैसे हिंदी प्रेस वाले ब्लॉगिंग को स्टाइल स्टेटमेंट मानकर काफी भाव देने लगे हैं...मैंने झा जी की दुविधा को भांप कर बिन मांगे आइडिया दिया...जैसे ही प्रेस वाले आए चढ़ जाइएगा...ये कोई टाइम है आने का...कई ब्लॉगर बेचारे आपका इंतज़ार कर-करके चले गए...

शनिवार, 14 नवंबर 2009

ब्लॉगिंग की 'काला पत्थर'...खुशदीप

जब दो बड़े बात करते हैं तो छोटों को चुप रहना चाहिए...संस्कार ने हमें यही सिखाया है...यकीन मानिए यही मेरी दुविधा है...और शायद आज की पोस्ट लिखनी जितनी मेरे लिए मुश्किल है, उतनी जटिल स्थिति में अपने को लिखते हुए कभी नहीं पाया...फिर भी कोशिश कर रहा हूं...अपनी तरफ से पूरा प्रयास है कि शब्दों का चयन सम्मान के तराजू में पूरी तरह तौल कर करूं...फिर भी कहीं कोई गुस्ताखी हो जाए तो नादान समझ कर माफ कर दीजिएगा...आखिर मुझे ये लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ी, इसके लिए जिन ब्लॉगर भाई-बहनों ने कल की मेरी पोस्ट नहीं पढ़ी, उसका लिंक यहां दे रहा हूं...

आज मैं चुप रहूंगा...खुशदीप
http://deshnama.blogspot.com/2009/11/blog-post_14.html

अब आता हूं उस पर जो मन में उमड़-घुमड़ रहा है...बस उसी को पूरी ईमानदारी के साथ आप तक पहुंचा रहा हूं...मैंने इस साल 16 अगस्त से ब्लॉग पर लिखना शुरू किया ..कुछ ही दिन बाद ये पोस्ट लिखी ...

हिंदी ब्लॉगिंग के टॉप टेन आइकन
http://deshnama.blogspot.com/2009/09/blog-post_11.html

हां, वो मेरे आइकन हैं...
http://deshnama.blogspot.com/2009/09/blog-post_14.html

मेरी उस फेहरिस्त में अनूप शुक्ल जी भी हैं और गुरुदेव समीर लाल जी समीर भी...ये मेरी अपनी पसंद है...ये मेरे अपने आइकन है....मैंने एक प्रण लिया...जिस तरह का स्तरीय और लोकाचारी लेखन मेरे आइकन करते हैं...उसी रास्ते पर खुद को चलाने की कोशिश करूंगा...अगर एक फीसदी भी पकड़ पाया तो अपने को धन्य समझूंगा...धीरे-धीरे ब्लॉगिंग करते-करते मुझे तीन महीने हो गए...इस दौरान दूसरी पोस्ट और टिप्पणियों को भी मुझे पढ़ने का काफी मौका मिला...जितना पढ़ा अनूप शुक्ल जी और गुरुदेव समीर के लिए मन में सम्मान और बढ़ता गया...लेकिन एक बात खटकती रही कि दोनों में आपस में तनाव क्यों झलकता है...या वो सिर्फ मौज के लिए इसे झलकते दिखाना चाहते हैं....क्या ये तनाव ठीक वैसा ही है जैसा कि चुंबक के दो सजातीय ध्रुवों के पास आने पर होता है...जितना इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की, मेरे लिए उतनी ही ये रूबिक के पज्जल की तरह विकट होती गई...जैसा पता चलता है कि समीर जी भी शुरुआत में चिट्ठा चर्चा मंडल के साथ जुड़े रहे....किसी वक्त इतनी नजदीकी फिर दूरी में क्यो बदलती गई...

बीच में बबली जी की पोस्ट को लेकर एक विवाद भी हुआ...पता नहीं ये नियति थी या क्या, उस प्रकरण में बबली जी की पोस्ट पर टिप्पणियां देने वालों में मुझे भी कटघरे में खड़ा होना पड़ा...उसी प्रकरण में मैंने अपनी पोस्ट पर गुरुदेव समीर जी को अपनी टिप्पणी में पहली बार खुलकर दिल की बात कहते देखा...

हां, मैं हूं बबली जी का वकील...
http://deshnama.blogspot.com/2009/09/blog-post_18.html

ये प्रकृति का नियम है कि दो पत्थर भी टकराते हैं तो चिंगारी निकलती है...फिर जब दो पहाड़ टकराए तो ज़लज़ला आने से कैसे रोका जा सकता है....हो सकता है ये तनाव की बात मेरा भ्रम हो...जैसा कि कल कि मेरी पोस्ट पर सागर, अनिल पुसदकर जी और सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी ने मुझे आगाह भी किया कि ये दोनों दिग्गज लंबे अरसे से मौज के लिए एक दूसरे की टांग खींचते रहे हैं लेकिन आपस में दोनों एक दूसरे के लिए अपार स्नेह रखते हैं...अगर ये बात सही है तो ऐसा कहने वालों के मुंह में घी-शक्कर...भगवान करे मेरा भ्रम पूरी तरह गलत निकले...

दीपक मशाल भाई ने मुझे अपनी टिप्पणी में लिखा कि मैं तो ऐसा न था...मैं मुद्दे उठाने की जगह ये विवाद को तूल कैसे देने लगा...मैं जानता हूं दीपक मुझे दिल से अपने करीब मानता है...मैं गलतफहमी में ऐसा कुछ न लिख दूं...जिससे मुझे नुकसान उठाना पड़े...बस इसी से रोकने के लिए उसने मुझे ऐसा लिखा...समीर जी और अनूप जी की टिप्पणियां सिर्फ निर्मल हास्य के चलते थी...इसके लिए दीपक ने समीर जी की इस टिप्पणी का हवाला भी दिया...

अरे अरे, भई उ त मजाक किये थे...काहे एतन गंभीर हो गये!!

मैं जानता हूं समीर जी ने बड़े सहज और निश्चल भाव से मेरे लिए अपनी पोस्ट में ये टिप्पणी की थी...बहुत सही पकड़ा खुशदीप...यही तो वजह है कि तुम... :)

ये भाव ठीक वैसा ही था जैसा कि गुरु और शिष्य के बीच होता है....समीर जी की इसी टिप्पणी पर अनूप शुक्ल जी ने उसी पोस्ट पर टिप्पणी की और फिर अपनी पोस्ट...

मन पछितैहै अवसर बीते
http://chitthacharcha.blogspot.com/2009/11/blog-post_12.html में लिखा-


समीरलाल आजकल घणे आध्यात्मिक होते जा रहे हैं। उनके लेखन का स्तर ऊंचा हो गया है और वे अब इशारों में बात करने लगे हैं। आज देखिये उन्होंने क्या पता-कल हो न हो!!-एक लघु कथा के माध्यम से सीख दी कि -जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता-कल हो न हो!!


इस समीर संदेश को पकड़ा खुशदीप सहगल ने और कहा


कल क्या होगा, किसको पता


अभी ज़िंदगी का ले ले मज़ा...


गुरुदेव, बड़ा गूढ़ दर्शन दे दिया....क्या ये पेड़ उन मां-बाप के बिम्ब नहीं है जिनके बच्चे दूर कहीं बसेरा बना लेते हैं....साल-दो साल में एक बार घर लौटते हैं तो मां-बाप उन पलों को भरपूर जी लेना चाहते हैं,,,,


समीरलालजी ने खुशदीप की बात को सही करार दिया और कहा- बहुत सही पकड़ा खुशदीप...यही तो वजह है कि तुम... :) अब इस पकड़म-पकड़ाई में हम यह समझ नहीं पा रहे हैं कि तुम और इस्माइली के बीच क्या है? इसे कौन पकड़ेगा? क्या यह अबूझा ही रह जायेगा?

अनूप जी की इस पोस्ट पर समीर जी की टिप्पणी थी-

हा हा!! बहुत सही टिप्पणी पकड़ लाये यही तो वजह है कि आप...:)


बेहतरीन चर्चा

ये समीर जी की वही शैली थी, जैसी कि उन्होंने मुझे त्वरित टिप्पणी में दिखाई थी...

लेकिन मेरे लिए सबसे अहम और ज़रूरी था, अनूप शुक्ल जी मेरी आज की पोस्ट में क्या कहते हैं...और मैं उनके बड़प्पन की जितनी तारीफ करूं, उतनी कम हैं....उन्होंने ये टिप्पणी भेजी...

खुशदीप जी, यह टिप्पणी मैंने समीरलालजी की टिप्पणी पर की थी। कारण कुछ-कुछ इस चर्चा और इस चर्चा में दिया है! मुझे न इस बारे में कोई शंका है न कोई सवाल। हां आपकी पोस्ट का इंतजार है।

अब अनूप जी ने खुद कहा है कि उन्हें मेरी पोस्ट का इंतज़ार है...ठीक वैसे ही जैसे और ब्लॉगर भाई-बहनों को भी इंतज़ार है....पहली बात तो ये मेरा कल और आज ये पोस्ट लिखने का मकसद कोई हंगामा खड़ा करना नहीं है...मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि अनूप जी और समीर जी हिंदी ब्लॉगिंग के दो शिखर हैं...इन्हें आपस में टकराने की जगह अपने बीच से हिंदी ब्लॉगिंग की बहती धारा को विशाल सागर का रूप देना है...ऐसे मकाम पर ले जाना है कि फिर कोई अंग्रेजी वाला हिंदी ब्लॉगर्स को कमतर आंकने की जुर्रत न कर सके...ये जैसा रास्ता दिखाएंगे, हम नौसीखिए वैसा ही अनुसरण करेंगे...चिट्ठा चर्चाओं के ज़रिए उछाड़-पछाड़ के खेल से हिंदी ब्लॉगिंग में राजनीति के बीजों को पनपने ही क्यों दिया जाए...राजनीति किस तरह बर्बाद करती है ये तो हम पिछले 62 साल से देश के नेताओं को करते देखते ही आ रहे हैं..

और हां दीपक मशाल भाई, क्या हिंदी ब्लॉगिंग की स्वस्थ दिशा और दशा पर सोचना क्या कोई मुद्दा नहीं है...जब अपना घर दुरूस्त होगा तभी तो हम बाहर के मुद्दों पर बात करने की कोई नैतिक हैसियत रखेंगे...ये सब कुछ मैंने इसलिए लिखा क्योंकि टिप्पणी में मेरा नाम आया था...वरना मैं भी शायद चुप ही रहता...

अरे हां याद आया कि मैंने इस पोस्ट का शीर्षक हिंदी ब्लॉगिंग की काला पत्थर क्यों रखा है...दरअसल फिल्मों के जरिए बात कहने में मुझे थोड़ी आसानी हो जाती है...सत्तर के दशक के आखिर में यश चोपड़ा ने एक फिल्म बनाई थी....काला पत्थर...उसमें अमिताभ बच्चन नेवी से बर्खास्त अधिकारी बने थे जो कोयला खदान में आकर काम करने लगते हैं...उसी फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा भी थे जो कोयला खदान के मज़दूर के रूप में खांटी वर्ग की नुमाइंदगी करते थे...अमिताभ और शत्रु दोनों ही जबरदस्त अभिनेता...पूरी फिल्म में दर्शक यही इंतजार करते रहे कि कब अमिताभ और शत्रु आपस में टकराएंगे....मुझे उस सीन पर गूंजने वाली तालियां आज तक याद है जब एक ट्रक पर शत्रु पहले से चढ़े होते हैं...अमिताभ अनजाने में ही उस ट्रक पर चढ़ जाते हैं...शत्रु को पहले से ही पता था कि अमिताभ ट्रक पर चढने वाले हैं और फिर शुरू होती है वही फाइट जिसका दर्शक दम रोक कर इंतज़ार कर रहे थे...ये तो खैर फिल्मी बात थी...लेकिन मुझे अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा दोनों पसंद हैं....मैं यही चाहता हूं कि फिर किसी फिल्म में दोनों साथ-साथ दिखें...मैं यहां ये क्यों कह रहा हूं....क्या ये बताने की ज़रूरत है....

चलो भाई बड़ा अंट-शंट कह दिया...माहौल कुछ सीरियस हो गया है...इसे हल्का करने की भी तो मेरी ज़िम्मेदारी है...तो भईया अपना स्लॉग ओवर किस दिन काम आएगा...

स्लॉग ओवर
एक पति-पत्नी हमेशा आपस में लड़ते झगड़ते रहते थे....इसलिए मैं उनके घर जाने से भी बचा करता था...लेकिन एक दिन बहुत ज़रूरी काम के चलते उनके घर जाना पड़ गया...मैंने देखा वहां शीतयुद्ध के बाद की शांति जैसा माहौल था...मैं चकराया...ये दुनिया का आठवां आश्चर्य कैसे हो गया....मुझसे रहा नहीं गया और मैंने पति महोदय से पूछ ही लिया...आखिर ये क्या जादू हुआ है....पति बोला...जादू वादू कुछ नहीं, हमने सुखी जीवन का फॉर्मूला ढूंढ लिया है...अब हम दोनों हफ्ते में दो बार जोड़े के तौर पर आउटिंग पर जाते हैं....किसी अच्छे रेस्तरां में धीमे-धीमे संगीत और कैंडल-लाइट में डिनर करते हैं...मैं भी खुश और पत्नी भी खुश...मैं मंगलवार को जाता हूं और वो शनिवार को...

आज मैं चुप रहूंगा...खुशदीप

जी हां...आज मैं कुछ नहीं कहूंगा...आज सिर्फ आप सब की सुनुंगा...एक दिन पहले उड़न तश्तरी वाले गुरुदेव ने पेड़, पत्तियों, मौसम, बर्फीली आंधियों को बिम्ब बनाते हुए बड़ी मर्मस्पर्शी पोस्ट लिखी थी-
क्या पता-कल हो न हो!!-एक लघु कथा
http://udantashtari.blogspot.com/2009/11/blog-post_12.html


इस पर मैंने अपनी टिप्पणी भेजी...

कल क्या होगा, किसको पता
अभी ज़िंदगी का ले ले मज़ा...

गुरुदेव, बड़ा गूढ़ दर्शन दे दिया....क्या ये पेड़ उन मां-बाप के बिम्ब नहीं है जिनके बच्चे दूर कहीं बसेरा बना लेते हैं....साल-दो साल में एक बार घर लौटते हैं तो मां-बाप उन पलों को भरपूर जी लेना चाहते हैं...

जय हिंद...

तीन मिनट बाद ही अपनी पोस्ट पर ही समीर लाल समीर जी ने यह टिप्पणी डाली...

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सही पकड़ा खुशदीप...यही तो वजह है कि तुम... :)

इसी पोस्ट पर चार घंटे पचास मिनट बाद अनूप शुक्ल जी ने टिप्पणी भेजी...

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत सही पकड़ा खुशदीप...यही तो वजह है कि तुम... :) लघु कथा का मामला तो खुशदीप ने पकड़ लिया लेकिन ये यहां पर तुम और स्माइली के बीच क्या है इसे कौन पकड़ेगा?

अनूप जी के मन में ये टिप्पणी भेजते हुए क्या था, मैं नहीं जानता...अगर वो कुछ पूछना चाहते हैं तो खुलकर बताएं...ये छायावाद की भाषा मेरी कम ही समझ में आती है...मैं यथाशक्ति उनकी शंका को दूर करने की कोशिश करूंगा...इसलिए नहीं कि मुझे कोई सफाई देने की जरूरत है...बल्कि इसलिए कि मैं अनूप जी का बहुत सम्मान करता हूं...अगर वो सवाल नहीं भी करते तो कल मैं पोस्ट में अपनी बात रखूंगा...

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

अब तंग करके देख...खुशदीप

आज स्लॉग ओवर की बारी है...स्लॉग ओवर में आपको यही सुनाऊंगा...अब तंग करके देख...लेकिन उससे पहले गऊ माता पर लिखी कल वाली पोस्ट का जिक्र...मिथिलेश दूबे भाई के पास ज्ञान का कितना बड़ा खजाना है ये उन्होंने अपनी टिप्पणियों में अच्छी तरह दर्शा दिया...कुछ बिंदुओं पर प्रवीण शाह और मसिजीवी जी ने मिथिलेश से मत-भिन्नता दिखाई...प्रणीण भाई ने कुछ सवाल किए जिसका मिथिलेश ने विस्तृत और शोधपरक जवाब दिया...एस के राय साहब ने भी गाय को लेकर विचारोत्तजक टिप्पणी रखी...

भारत में गाय की दुर्दशा को लेकर अब ऐसी कोई बात या मुद्दा नहीं बचा जो मेरी कल वाली पोस्ट या टिप्पणियों में न उठा हो...
http://deshnama.blogspot.com/2009/11/blog-post_12.html

बस एक दो बात ही कहूंगा...गाय के पौराणिक या धार्मिक महत्व को छो़ड़ भी दिया जाए क्या ये इंसानियत के नाते सही है कि जो गाय दुधारू न रहें उन्हें सड़कों पर लावारिस छोड़ दिया जाए...पर्यावरण की दृष्टि से क्या ये सही है कि पॉलीथीन को कचरे में छोड़ दिया जाए और वो गाय या अन्य पशुओं के पेट में पहुंच कर उनकी मौत का सबब बनता रहे...क्या ऐसी संस्थाओं की मदद करना हमारा फर्ज नहीं बनता जो ऐसे पशुओं की देखभाल के लिए सामने आते हैं...वैसे ये हमारा देश ही है जहां नेता पशुओं का चारा तक खा जाते हैं....

गाय के संदर्भ में ये बताना आपको दिलचस्प होगा कि हमारे यहां शादी में सात फेरे लेने की परंपरा होती है...लेकिन कई जगह चार ही फेरे लिए जाते हैं...इसके पीछे राजस्थान में एक कथा बताई जाती है....राजस्थान के चुरू जिले के अमरपुरा धाम में पाबू जी महाराज की बड़ी मान्यता है कि पाबू जी लक्ष्मण के अवतार थे...बताते हैं कि उनका विवाह हो रहा था...और वो चार ही फेरे ले पाए थे कि किसी ने उन्हें जानकारी दी कि हज़ारों गायों को शत्रु ले जा रहे हैं...पाबू जी महाराज तत्काल उठ गए और युद्ध के लिए निकल पड़े...युद्ध में उनकी जीत हुई और गायों को छुड़ा कर वापस ले आए...तभी से चार फेरों को ही सात फेरे की मान्यता मिल गई...

दूसरी बात मेरे जानने वाले ने मुझे बताई थी....वो ब्लड प्रेशर के मरीज थे...किसी ने उन्हें बताया कि गाय की पीठ पर सिर से लेकर पूंछ तक दोनों हाथ फेरें...इस जगह गाय की सूर्य नाड़ी होती है...इस नाड़ी पर हाथ फेरने से जो घर्षण होता है उससे ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है... मेरे जानने वाले का दावा है कि ऐसा करने से उन्हें बहुत आराम मिला...अब इस दावे को लेकर क्या वैज्ञानिक पहलू हो सकता है, उस बहस में जाने का कोई फायदा नहीं...ये विश्वास या अंधविश्वास भी हो सकता है...लेकिन ऐसा करने से किसी को लाभ मिलता है तो आजमाने में हर्ज ही क्या है....चलिए बहुत हो गई गऊ-माता पर चर्चा....अब आता हूं स्लॉग ओवर पर...

स्लॉग ओवर
मक्खन को कोई सिरफिरा कई दिन से मोबाइल पर तंग कर रहा था...कभी अपशब्द कहता...कभी भद्दे मज़ाक करता..मक्खन बेचारा परेशान हो गया...इस बिन बुलाई मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए मक्खन तोड़ ही ढूंढ रहा था कि किसी ने उसे सिम कार्ड ही बदल देने की सलाह दे दी...मोबाइल में नया सिम कार्ड होगा तो कोई झंझट ही नहीं रहेगा..तंग करने वाले को नया नंबर पता ही नहीं होगा तो फिर वो मक्खन जी को तंग कैसे करेगा...

मक्खन को आइडिया जंच गया...बाज़ार जाकर नया सिम कार्ड खरीद लिया...मोबाइल में नया सिमकार्ड डल जाने के बाद मक्खन जी का चेहरा भी ट्यूब लाइट की तरह चमकने लगा...चलो मिला तंग करने वाले से छुटकारा...इसी खुशी में मक्खन ने नए सिमकार्ड से पहला नंबर ही उसी सिरफिरे को मिलाया जो उन्हें दिन-रात परेशान करा करता था...

सिरफिरे के मोबाइल पर आने पर मक्खन ने कहा...बेटा मैं भी तेरा बाप हूं...मैंने सिमकार्ड ही बदल दिया है...अब तंग करके देख...

मक्खन के कॉल कट करते ही उसके मोबाइल पर अगली कॉल तंग करने वाले सिरफिरे की ही थी....

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

हम भैंस को माता क्यों नहीं कहते...खुशदीप

बचपन से सुनता आया हूं गऊ हमारी माता होती है...सीधा सा तर्क है कि हम गाय का दूध पीते हैं, इसलिए गाय हमारी माता होती है...लेकिन अब हम गाय का दूध कहां पीते हैं...हर जगह भैंस का ही दूध मिलता है...वैसे भी भैंस 15-20 लीटर दूध देती है और गाय सिर्फ 5-7 लीटर...फिर भैंस को हम माता क्यों नहीं कहते...गाय तो अब मिलती कहां हैं...गाय बस गौशालाओं में ही देखने की चीज रह गई है..,खास कर महानगरों में गाय के दर्शन ही दुर्लभ होते जा रहे हैं...

मेरी पत्नीश्री धर्मकर्म को मानने वाली है...किसी से उसने सुन लिया कि गाय को रोज़ रोटी खिलाने से पति पर कष्ट नहीं आता...अब उसे कौन समझाए कि पति पर कष्ट कहां से आएगा, पति तो रोज़-रोज़ खुद एक से एक पकाऊ पोस्ट डालकर ब्लॉगर बिरादरी को कष्ट देता है...लेकिन पत्नीश्री तो ठहरी पत्नीश्री...जो आसानी से मान जाए वो पत्नीश्री ही कहां...

खैर जी मरता क्या न करता, मैंने रोटी लेकर नोएडा शहर में गाय को ढूंढना शुरू किया...लेकिन गऊ माता कहीं नहीं दिखी...कहावत खामख्वाह ही कही जाती है कि ऐसे गायब जैसे गाय के सिर से सींग...यहां सींग तो क्या पूरी की पूरी गाय ही गायब हैं...गाय तो कहीं नहीं मिली हां हर चौपले, नुक्कड़ पर सांड और बैल ज़रूर विचरण करते नज़र आ गए...अब रोटी तो गाय को ही खिलानी है, इसलिए सांड और बैल महाराजों को दूर से ही हमने नमस्कार कर दिया...दो-तीन घंटे तक गाय की तलाश करने के बाद  टाएं बोल गई...घर वापस आ गया...

पत्नीश्री के सामने हाथ खड़े कर दिए...कहा...और कुछ करा लो...चांद-तारे तुड़वा लो...सूरज से आंखे मिलवा लो...लेकिन ये गाय को रोज़-रोज़ ढूंढ कर रोटी खिलाने का टंटा हमसे नहीं होगा...खाली टाइम में अपने लैपटॉप बॉस को छोड़कर गली-गली गऊ माता की तलाश में मारा-मारा फिरूं...ये अपने बस की बात नहीं...एक ही दिन में हलकान हो गया...रोज़ रोज़ ये करना पड़ा तो खुद ही ऐसी हालत में पहुंच जाऊंगा कि बस ढूंढते ही रह जाओगे...

The Indian Blogger Awards 2017

तो जनाब पत्नी को तो मैंने किसी तरह मना लिया कि गली के कुत्तों को ही रोटी डालकर काम चला लिया जाए...लेकिन ये सवाल मुझे ज़रूर परेशान कर रहा है कि अब गाय क्यों नहीं दिखती...पुराण कहते हैं कि जिस दिन गाय दुनिया से खत्म हो जाएंगी उसी दिन सृष्टि का अंत हो जाएगा...तो क्या हमने सृष्टि के अंत की ओर ही बढ़ना शुरू कर दिया है....गाय के गायब हो जाने पर  मैं तथ्यों और आंकड़ों के साथ इस चर्चा को आगे बढ़ाऊंगा...तब तक आपके कुछ विचार हो तो मेरे साथ ज़रूर बांटिए...

बुधवार, 11 नवंबर 2009

नाम है नैनसुख...खुशदीप

आज स्लॉग ओवर की बारी है...लेकिन मूड बनाने के लिए पहले नाम की थोड़ी चर्चा हो जाए...आप कहेंगे कि नाम में रखा क्या है...लेकिन कुछ के लिए तो नाम में ही सब कुछ रखा है...जितना बड़ा नाम उतने बड़े दाम...सितारे, क्रिकेटर, नेता सब नाम की ही तो खाते हैं...हर कोई अपने नाम के साथ चाहता है उसके खानदान का भी नाम चले...यानि पीढ़ी दर पीढ़ी नाम की फसल कटती रहे...

अपने मुलायम सिंह यादव जी को ही देख लीजिए...खुद सांसद, भाई सांसद, बेटा सांसद, भतीजा सांसद, बहू डिंपल रह गई थी उसे भी फिरोजाबाद के रास्ते लोकसभा भेजना चाहते थे...लेकिन पुराने चेले राज बब्बर ही दीवार बनकर आ डटे...बहू हार गई, बब्बर जीत गए....लेकिन बहू की हार से भी ज़्यादा विधानसभा की इटावा और भरथना सीटों पर नेता जी मुलायम के नाम की भद्द पिटी...पिछले विधानसभा चुनाव में भरथना सीट से खुद मुलायम जीते थे...लोकसभा चुनाव जीतने की वजह से भरथना सीट छोड़ने का फैसला किया...और इटावा की तो पहचान ही मुलायम से मानी जाती रही है...लेकिन दोनों ही सीटें बीएसपी ने झटक कर मुलायम की साइकिल पंचर कर दी...

यूपी में माया का गजराज शान से चला तो पश्चिम बंगाल में ममता एक्सप्रेस रफ्तार के साथ दौड़ी...ऐसी रफ्तार की सीपीएम को तिनके की तरह उड़ा दिया...पश्चिम बंगाल में 10 सीटों पर उपचुनाव हुआ और बामुश्किल लेफ्ट फ्रंट की ओर से फॉरवर्ड ब्लॉक ही एक सीट जीत सका...अन्यथा बाकी नौ सीटों पर लेफ्ट के लाल रंग पर पूरी तरह झाड़ू लग गई...तो जनाब, राजनीति के सेंसेक्स में माया और ममता के नाम का ग्राफ ऊपर चढ़ा हुआ है....ऐसी है नाम की महिमा...

लेकिन कई बार नाम भी गजब रखे जाते हैं...जेब में फूटी कौड़ी नहीं और नाम अमीर चंद...दुनिया भर की दौलत जोड़ कर रखने वाला धन्ना सेठ और नाम गरीब दास...इसी तरह हमारे भी एक नैनसुख हैं...

स्लॉग ओवर
नैनसुख अपनी आंखें चेक कराने के लिए आई-स्पेशलिस्ट के पास पहुंचे...डॉक्टर ने आंख में दवाई डालकर चेक करना शुरू किया...

डॉक्टर ने कहा... हां तो सबसे आखिरी लाइन पढ़िए...

नैनसुख बोला...कौन सी आखिरी लाइन...

डॉक्टर...अच्छा चलो जाने दो... ऊपर वाली लाइनें पढ़िए...

नैनसुख...कौन सी ऊपर वाली लाइनें...

डॉक्टर थोड़ा बेचैन हुआ....बोला....घबराइए नहीं वो जो सामने बोर्ड लगा है, उस पर जो लिखा है उसे पढ़ने की कोशिश कीजिए...

नैनसुख...कौन सा बोर्ड....

डॉक्टर और असहज हुआ...बोला...अच्छा तो बोर्ड भी नहीं दिख रहा, हिम्मत से काम लीजिए और सामने वाली दीवार पर ध्यान लगाइए...

नैनसुख....कौन सी दीवार....

डॉक्टर ठंडी सांस लेकर बोला....जनाब, अब आपको मेरे इलाज की नहीं मंजीरे और ढोलकी की ज़रूरत है...बस कहीं भी बैठ जाइए और प्रभु का भजन कीजिए...मैं तो क्या, मेरे पिताजी भी अब आपके लिए चश्मा नहीं बना सकते...

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

हिंदी किस खेत की मूली है...खुशदीप

हिंदी पिटी...बुरी तरह पिटी...अपने देश में ही पिटी...आखिर हिंदी है किस खेत की मूली...राष्ट्रीय भाषा कोई है हिंदी...जो महाराष्ट्र में चलेगी...जी हां, मैं भी इसी भ्रम में जी रहा था कि हिंदी राष्ट्रीय भाषा है...मैं क्या देश की आधी से ज़्यादा आबादी इसी मुगालते में होगी कि हिंदी राष्ट्रीय भाषा है...हिंदी में ब्लॉगिंग करने वाले भी वहम पाले हुए होंगे कि हम तो राष्ट्र की भाषा में लिखते हैं...

महाराष्ट्र विधानसभा में समाजवादी पार्टी के विधायक अबू असीम आजमी की राज ठाकरे के विधायकों ने ठुकाई कर दी...ठुकाई करने वाले चार विधायक चार साल के लिए सदन से निलंबित कर दिए गए...वैसे यहां ये बताना ज़रूरी है कि पिटने वाले अबू असीम आजमी के खाते में आपराधिक मुकदमों की लंबी फेहरिस्त है...और जिन्होंने ठुकाई की वो भी मुकदमों के मामले में अबू आजमी से कहीं से भी उन्नीस नहीं है...

आजमी साहब लोकसभा चुनाव भी लड़े थे लेकिन कामयाब नहीं हो सके थे...विधानसभा चुनाव में अबू आजमी की लाटरी लगी और दो सीटों से चुनाव लड़कर दोनों ही सीटों पर जीत का परचम लहरा दिया...अबू आज़मी की कुल संपत्ति उनके अपने हलफनामे के मुताबिक सिर्फ 126 करोड़ रुपये है...लेकिन मेरी पोस्ट का मुद्दा अबू आजमी या उनकी ठुकाई करने वाले एमएनएस विधायक नहीं है...मेरा मुद्दा ये है कि अबू आज़मी को हिंदी में शपथ लेने से रोकने के लिए पीटा गया...मेरे लिए अहम है हिंदी की वजह से ये सारा ड्रामा हुआ...

मैंने इस प्रकरण पर गौर से सोचा...और फिर सवाल किया कि महाराष्ट्र में आखिर क्यों ली जाए हिंदी में शपथ...आप कहेंगे कि संविधान अधिकार देता है कि हम देश के किसी भी कोने में जाकर बसें और चाहे कोई भी भाषा बोलें...और हिंदी तो हमारी राष्ट्रीय भाषा है...बस यहीं मात खा गया हिंदुस्तान...मैंने भी यही जानने की कोशिश की आखिर सांविधानिक दृष्टि से हिंदी का देश में दर्जा क्या है...और जो मैंने खंगाला वो मेरे लिए भी चौंकाने वाला रहा...पहली बात तो ये समझ लीजिए कि हिंदी केंद्र में सिर्फ राजभाषा है राष्ट्रीय भाषा नहीं...राजभाषा मतलब सरकारी भाषा...इस राजभाषा में भी अंग्रेज़ी का नप्पुझन्ना साथ लगा हुआ है...यानि व्यावहारिक तौर पर विधायिका हो या न्यायपालिका, सारा काम अंग्रेजी में ही होता है...कुछ विभागों में हिंदी पर अहसान करते हुए राजभाषा बताया ज़रूर जाता है लेकिन वो हिंदी इतनी क्लिष्ट होती है कि सुनने वाला एक ही बार में भाग खड़ा होता है...

आइए अब चलते हैं 26 जनवरी 1950 की तारीख में...इसी तारीख को भारत का संविधान लागू हुआ था...संविधान का अनुच्छेद 343 हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा (सरकारी भाषा) का तो दर्जा देता है लेकिन ये कहीं नहीं कहता कि हिंदी भारत की राष्ट्रीय भाषा है...ये अनुच्छेद अंग्रेज़ी को भी अतिरिक्त सरकारी भाषा का दर्जा देता है...लेकिन ये अतिरिक्त भाषा ही पिछले छह दशक में सब कुछ बनी हुई है...

संविधान लागू करते वक्त ये भी साफ किया गया था कि हिंदी और अंग्रेजी सिर्फ 15 साल यानि 26 जनवरी 1965 तक ही केंद्र की सरकारी भाषा रहेगी...उसके बाद जो भी सरकारी भाषा चुनी जाएगी उसे ही राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दे दिया जाएगा...यानि संविधान बनाने वालों को पूरी उम्मीद थी कि 1965 के बाद हिंदी ही देश की सरकारी और राष्ट्रीय भाषा बन जाएगी... लेकिन 1965 से पहले ही दक्षिणी राज्यों में हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया था...1965 आते-आते दक्षिण में हिंदी विरोधी आंदोलन इतना उग्र हो गया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री और हिंदी के प्रबल समर्थक लाल बहादुर शास्त्री को भी हिंदी के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा...उसके बाद भी केंद्र में किसी सरकार की हिम्मत नहीं हुई कि हिंदी को वो सम्मान दिलाए जिसकी कि वो हकदार है...

ये हालत तब है जबकि संविधान के अनुच्छेद 351 में साफ़ उल्लेख है कि ये संघ (केंद्र) का कर्तव्य है कि वो हिंदी भाषा के प्रचार को बढ़ावा दे, हिंदी को इस तरह विकसित करे कि ये भारतीय संस्कृति के समूचे तत्वों को दर्शाने के लिए माध्यम का काम कर सके...लेकिन संविधान के इस अनुच्छेद पर केंद्र में हमारी कितनी सरकारें ईमानदारी से काम करती दिखीं...हालत ये है कि संविधान लागू होने के 59 साल बाद भी हिंदी अपने हाल पर ही रो रही है...पिट रही है...आखिर पिटे क्यों नहीं...हिंदी के लिए आवाज़ उठाने वाला कौन है...हिंदी भी अनुसूची में शामिल देश की 18 अधिकृत भाषाओं की तरह ही सिर्फ अधिकृत भाषा है...इसके आगे कुछ नहीं....

रविवार, 8 नवंबर 2009

नवाब साहब, किस और बबलगम...खुशदीप

पंच परमेश्वरों का निष्कर्ष है कि लेखन का सबसे अच्छा स्टाइल है कि कोई स्टाइल ही न हो...यानि फ्री-स्टाइल...आपकी सलाह सर माथे पर...आज इस माइक्रोपोस्ट में उसी फ्री-स्टाइल के साथ सिर्फ स्लॉग ओवर...

स्लॉग ओवर
कहते हैं बुढ़ापे का इश्क भी गजब होता है...ऐसा ही गजब ढाया हमारे एक नवाब साहब ने...टीवी पर जिस तरह के सीरियल आजकल आते हैं...आप सब जानते हैं...सब घर वालों का साथ बैठकर इन्हें देखना मुश्किल होता है...नवाब साहब और बेगम घर पर अकेले थे...ऐसे ही एक रोमांटिक सीरियल पर नवाब साहब की नज़र पड़ गई...नवाब साहब को अपना गुजरा जमाना याद आ गया...नवाब साहब ने हिम्मत करके झट से बेगम को किस कर लिया...

किस के बाद बेगम ने नवाब साहब से पूछा...क्या बबलगम खाई थी...

नवाब साहब ने कहा...बबलगम तो थी...बस बबलगम का पहला 'ब' उड़ा दो...

शनिवार, 7 नवंबर 2009

बस भौंकना ही भौंकना है...खुशदीप

मुद्दों पर आधारित गंभीर लेखन...हल्का फुल्का लेखन...स्लॉग ओवर...या इनका कॉकटेल...क्या लिखूं...मैं खुद कन्फ्यूजिया गया हूं...और आपकी कुछ टिप्पणियों ने तो मुझे और उलझा दिया
है...कुछ को गंभीर लेखन पसंद आ रहा है.. उनका कहना है कि गंभीर लेखन के साथ स्लॉग ओवर मिसमैच लगता है....बात तो सही है....एकदम से गंभीर ट्रैक से कॉमेडी के ट्रैक पर आना कुछ अटपटा तो लगता है...दूसरी तरफ ऐसी भी टिप्पणियां आई हैं जिसमें कहा गया है कि वो स्लॉग ओवर मिस कर रहे हैं...

अब मैं कौन सा रास्ता निकालूं...काफी दिमाग खपाई के बाद मुझे एक रास्ता नज़र आया है....और ये आइडिया मिला मुझे मेरे बेटे के ट्यूशन शैड्यूल से...वो एक दिन छोड़ कर (आल्टरनेट) एक विषय पढ़ता है...मुझे भी अपनी ब्लॉगिंग के लिए ये आल्टरनेट फॉर्मूला अच्छा लग रहा है...एक दिन मैं लेख लिखूंगा और एक दिन स्लॉग ओवर...मिसमैचिंग का भी खतरा खत्म हो जाएगा और जिसे जो चाहिए, उसे वो भी मिलता रहेगा...इस व्यवस्था पर बाकी जो पंच परमेश्वर (मेरे लिए आप सब परमेश्वर हैं) की राय होगी वो मेरे सिर माथे पर...आज प्रयोग के तौर पर मैं ऐसी चीज लिख रहा हूं जिसमें मुद्दा भी है और गुदगुदाने का मसाला भी...बाकी ये कॉकटेल कैसा रहा, बताइएगा ज़रूर...

स्लॉग ओवर
एक बार हांगकांग में पपी (कुत्ते के बच्चे) बेचने वाली दुकान पर दो ग्राहक पहुंचे...एक भारतीय और एक चीनी नागरिक...संयोग से दोनों को जुड़वा पपी पसंद आ गए....एक पपी को भारतीय ले गया...और एक पपी को चीनी....भारतीय नागरिक पशु कल्याण संस्था से जुड़ा था...लेकिन ये संस्था भी भारत की राष्ट्रीय बीमारी भ्रष्टाचार से पीड़ित थी...महंगे कुत्ते खरीद कर उन पर भारी-भरकम खर्च दिखाकर अनुदान झटक लेने में संस्था के कर्ताधर्ता माहिर थे....पशुओं के कल्याण से हकीकत में उनका कोई लेना-देना नहीं था...

डेढ़-दो साल बाद चीनी नागरिक को भारत में कुछ काम पड़ा...उसने सोचा पपी (जो अब डॉगी बन चुका था) को भी साथ ले चलूं...और मौका मिलेगा तो देखेंगे कि पपी के भाई का क्या हाल है...खैर चीनी नागरिक अपने पपी के साथ भारत आ गया...पशु क्ल्याण संस्था गया तो वहां पपी के भाई का कोई अता-पता नहीं मिला...निराश होकर चीनी नागरिक और पपी वापस जाने लगे...तभी एक नाले से एक कुत्ते के ज़ोर-ज़ोर से भौंकने की आवाज आई...ये आवाज सुनते ही चीन से आए पपी के कान खड़े हो गए...

लहू ने लहू को पहचान लिया...झट से चीन वाला पपी नाले के पास पहुंच गया तो देखा उसका भाई मुंह ऊपर कर लगातार रोने जैसी आवाज़ में भौंक रहा था...अपने भाई की दशा देखकर चीन वाले भाई को बड़ा तरस आया....बिल्कुल मरगिल्ला शरीर...खून जैसे निचुड़ा हुआ (निचुड़े भी क्यों न भारत के सारे कुत्ते-कमीनों का खून धर्मेंद्र भाजी जो पी चुके हैं).... खैर दोनों भाइयों की नज़रें मिलीं...यादों की बारात के बिछुड़े भाइयों की तरह दोनों की आंखों में आंसू आ गए...

भारत वाले पपी ने चीन वाले भाई को देखकर कहा...तेरे तो बड़े ठाठ लगते हैं...घुपला घुपला शरीर उस पर जमीन तक झूलते बाल...बिल्कुल फाइव स्टार लुक...और बता क्या हाल है तेरे चीन में...चीन वाला पपी बोला...क्या बताऊं यार ये चीन वाले खाने को तो बहुत देते हैं...जितना मर्जी खाओ...लेकिन भौंकने बिल्कुल नहीं देते...खैर मेरी छोड तू अपनी बता, तेरी ये हालत कैसे....भारतीय पपी बोला...यहां बस दिन रात भौंकना ही भौंकना है...खाने को कुछ नहीं मिलता...

(निष्कर्ष- और कुछ हो न हो भारत में लोकतंत्र का इतना फायदा तो है कि हम यहां पान की दुकान, गली-नुक्कड़, चौपाल.... जहां चाहे, जिसे चाहे (राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री, वजीर हो संतरी), किसी की भी शान को अपने कटु वचनों से तार-तार कर सकते हैं...कोई कुछ कहने वाला नहीं है...यही काम आप चीन में करके दिखाओ...फिर पता चलेगा आटे-दाल का भाव)

कौन कहता है गुज़रा ज़माना नहीं लौटता...खुशदीप

जी हां, मुबारक हो दुनिया आगे जा रही है और हमने रिवर्स गियर पकड़ लिया है...ऊपर वाले ने चाहा तो हम जल्दी ही 1947 से पहले के उस दौर में पहुंच जाएंगे जहां अंग्रेजों ने हमें छोड़ा था...सरदार पटेल ने बड़ी मुश्किल से रियासतों में बंटे देश को एकसूत्र में जोड़ा था...हमारे देश के कर्णधारों ने लगता है फिर देश को टुकड़ों में तोड़ने की ठान ली है...

मराठी मानुस की राजनीति करने वाले राज ठाकरे ने बाल ठाकरे की तर्ज पर महाराष्ट्र में प्रांतवाद का जो राग छेड़ा, अब वही तान मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के राज में भी सुनी जा सकती है...मध्य प्रदेश देश का पहला हिंदीभाषी राज है जहां के मुख्यमंत्री ने प्रांतवाद की बोली बोली है...शिवराज ताल ठोक कर कह रहे हैं कि मध्य प्रदेश में नौकरियों पर पहला हक प्रदेश के लोगों का बनता है...यानी साफ है कि उत्तर प्रदेश और बिहार से रोजी रोटी की तलाश में मध्य प्रदेश पहुंचे लोग शिवराज के एजेंडे में कहीं नहीं है....

देश का संविधान बेशक हर नागरिक को देश में किसी भी जगह बसने का अधिकार देता हो, लेकिन वोटों की राजनीति अब अपने नियम-कायदे अलग बनाने लगी है...महाराष्ट्र में बाल ठाकरे हो या राज ठाकरे, दोनों को अपनी राजनीति के लिेए सेना चाहिए...इसलिए बाल ठाकरे की शिवसेना हो या राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना..दोनों की रणनीति यही रही है कि पहले दुश्मन बनाओ, फिर समर्थकों की सेना खुद-ब-खुद पीछे खड़ी हो जाएगी...

साठ के दशक में बाल ठाकरे ने.. बजाओ पुंगी, भगाओ लुंगी... का नारा देकर दक्षिण भारतीयों पर निशाना साधा था...वहीं राज ठाकरे ने सियासत में आगाज़ के लिए उत्तर भारतीयों पर निशाना साधा...निशाना कितना सटीक लगा ये राज ठाकरे ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 13 सीट जीत कर दिखा भी दिया...मराठी मानुस के लिए सौ फीसदी रोजगार के राज के नारे को थामकर ही शिवराज मध्य प्रदेश के लोगों को रोजगार का झुनझुना दिखाकर अपने लिए राजनीति में स्थायी रोजगार का जुगाड़ करना चाहते हैं...

ये इत्तेफ़ाक ही है कि शिवराज के नाम में शिव भी है और राज भी...अब शायद शिवराज को दरकार है शिवसेना और राज की सेना की तरह अपनी सेना खड़ी करने की...बांटने की ये आग खतरनाक है...और वोटों के खेल में घर का ही कुछ हिस्सा जलता है तो परवाह किसे है...बाकी बचे घर पर तो अपना कब्ज़ा बना रहेगा..लेकिन इस आग की आंच ऐसे ही एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश तक फैलती गई तो पूरा देश इससे झुलसने से नहीं बचेगा...और अब इस आग से बचाने के लिए कोई सरदार पटेल भी नहीं है हमारे पास...

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

मैं शर्मसार हुआ, क्या आप नहीं हुए...खुशदीप

लिखना आज कुछ और चाहता था...लोकतंत्र की कीमत के मुद्दे पर...लेकिन कल मैं ब्ल़ॉगवाणी पर जाकर कई बार शर्मिंदा हुआ...शर्मसार हुआ एक पोस्ट के शीर्षक की वजह से...और वो शीर्षक सबसे ज़्यादा पढ़े गए वाले कॉलम में सबसे टॉप पर नज़र आ रहा था...जितनी बार भी मेरी नज़र उस शीर्षक पर पढ़ती मन में वितृष्णा और ग्लानि भर जाती थी...

अगर मुझे इतना बुरा लग रहा था तो मातृशक्ति का क्या हाल होगा...ये ठीक है इस तरह के शीर्षक देखते ही हम ऐसी पोस्ट को नमस्कार कह देते हैं...लेकिन एग्रीगेटर पर शीर्षक का क्या करे जो पूरा दिन मुंह चिढ़ाता रहा...ये मेरा मानना है कि ब्लॉगिंग के नाम पर गंदगी फैलाने वालों को किसी भी तरह का भाव नहीं देना चाहिए...

मैं खुद ही अपनी पोस्ट पर कहता रहा हूं कि गेंद को जितना ज़मीन पर मारो वो उतना ही सिर पर चढ़ कर उछलती है...इसलिए गेंद को ज़मीन पर पड़े रहने देना चाहिए...लेकिन इस शीर्षक को देखने के बाद मुझे लगता है कि गेंद उछलने के लिए खुद ही नंगा नाच करने लगे तो उसका कुछ इलाज किया ही जाना चाहिए...ये ठीक है हम ऐसी पोस्ट को नहीं पढ़ते... लेकिन ब्लॉगर के नाम पर कोई घर को गंदा करने लगता है तो क्या हमें चुपचाप बैठे रहना चाहिए...


मैं जिस शीर्षक की बात कर रहा हूं उस पोस्ट का न तो मैं यहां लिंक दूंगा और न ही पोस्ट को लिखने वाले महानुभाव के नाम का उल्लेख करूंगा...क्योंकि वो शीर्षक इतना अश्लील और भद्दा है कि उसे कोई भी सभ्य व्यक्ति रिपीट नहीं कर सकता है....इसलिए उस बेहूदी पोस्ट को मेरी पोस्ट के ज़रिए ज़रा सा भी भाव मिले मैं ये कतई नहीं चाहूंगा....और जिसने ये पोस्ट लिखी है उन्होंने तो लगता है कि ब्लॉगिंग को अपने प्रचार का ज़रिया बनाया हुआ है...इसे भी वो मंच की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं....लेकिन इन बेहूदी बातों पर स्टेज प्रोग्राम में बेशक तालियां मिल जाती हों लेकिन ब्लॉग जगत एक सार्वजनिक मंच है....मातृशक्ति, बुजुर्ग, किशोर सभी एग्रीगेटर पर आते हैं...ऐसे में खुद ही शब्दों के चयन पर बेहद संयम से काम लिया जाना चाहिए....

जिन महानुभाव ने ये शीर्षक दिए हैं वो पहले भी ऐसे ही और भी भद्दे शीर्षकों का इस्तेमाल कर चुके हैं...ऊपर से तु्र्रा ये है कि वो अपनी ताजा पोस्ट के जरिए पाठकों को ही हड़का रहे हैं कि श्रेष्ठ (जिसे उन्होंने खुद ही घोषित किया है) रचना पर ज़्यादा पाठक नहीं आते और जब ऐसा-वैसा शीर्षक लगाया तो पढ़ने वालों के सारे रिकॉर्ड टूट गए...यानि इसमें भी ब्लागर्स का ही कसूर है...वैसे कसूर तो है जो ऐसी घटिया सोच वाली पोस्ट को भी इतने पाठक मिल जाते हैं...लेकिन इसका मतलब क्या है अगर आपको अपनी पोस्ट पर पाठक न मिलने की इतनी छटपटाहट है तो इसका मतलब ये है कि आप चौराहे पर कपड़े उतार कर खड़े हो जाएं....जिससे कि लोग आपको देखें...अगर ये आपकी सोच है, फिर तो इतनी ही प्रार्थना की जा सकती है कि रामजी आपको सदबुद्धि दें...

अब आप ये प्रश्न कर सकते हैं कि मैं ही क्यों दूसरे के फट्टे में हाथ डाल रहा हूं....लेकिन क्या यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी नहीं है कि हम गलत चीज़ देखते हुए भी उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं...चुप बैठे रहते हैं...इससे गलती करने वाले का दुस्साहस और बढ़ता है....मेरा इस पोस्ट को लिखने का मकसद किसी विवाद को न्यौता देना नहीं है...बल्कि मैं चाहता हूं कि हिंदी ब्लॉगिंग स्वस्थ प्रतिमान स्थापित करते हुए आगे बढ़े....अगर कहीं गंदगी दिखे तो उसका प्रतिकार करें...उसे किसी भी तरह से बढ़ावा न दे जिससे कि आगे फिर उसकी कभी हमारा घर गंदा करने की जुर्रत न पड़े...मैंने किसी दूसरी पोस्ट के खिलाफ पहले सिर्फ एक बार आवाज उठाई थी...वो थी तब जब बबली जी को एक पोस्ट के ज़रिए शर्मसार करने की कोशिश की गई थी....आज फिर मुझे कुछ गलत लगा, और मैं चुप नहीं रह सका...मैं सही हूं या नहीं...अब ये आप मुझे बताएं...हां जिस शीर्षक से मैं इतना असहज हुआ, उसको लिखने वाले की मैं कोई परवाह नहीं करता...जिसे मर्यादा का ध्यान नहीं, उसका होना या न होना मेरे लिए एक बराबर है....

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

62 साल,चले अढाई कोस...खुशदीप

आज़ादी के बाद हमने क्या खोया और क्या पाया...आज इस पर विमर्श के लिए सिर्फ और सिर्फ कुछ सवाल रखूंगा...लेकिन उससे पहले आज हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट का उल्लेख...

अमेरिका से 45 वर्षीय वैज्ञानिक शिवा अय्यादुरै को भारत बुलाकर कांउसिंल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च में सलाहकार पद पर नियुक्त किया गया...लेकिन पांच महीने में ही शिवा की छुट्टी कर दी गई...कारण बताया गया है कि शिवा को नौकरी पर रखना बहुत महंगा साबित हो रहा था...शिवा के पास मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलाजी से विज्ञान की चार डिग्रियां हैं...शिवा के नाम के साथ दुनिया का सबसे पहला ई-मेल सिस्टम विकसित करने वाली कंपनी को खड़ा करने का गौरव जुड़ा है...शिवा ने २० अक्टूबर को प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में कहा है कि मुझे सीएसआईआर नौकरी से इसलिए हटा रहा है क्योंकि मैंने अपनी पेशेवर ड्यूटी के दौरान नेतृ्त्व की खामियों के मुद्दे को निरूपित करने की कोशिश की थी...ऐसा करने के पीछे मेरा मकसद सिर्फ भारतीय विज्ञान और अभिनवता की बेहतरी था...


शिवा का उदाहरण मात्र है कि विदेशों में बसे जो भारतवंशी देश लौटकर राष्ट्र के उत्थान में हाथ बंटाना चाहते हैं, उन्हें लालफीताशाही, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद के चलते कैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। आज देश में किसी विदेशी महारानी की नहीं, खुद अपने वोट से चुनी गई हुकूमत है...अब यहां हम किसको दोष दे...हमें अपनी खामियों का ठीकरा फोड़ने के लिेए किसी बाहर वाले के सिर की नहीं अपने खुद के सिर को ओखली में देने की ज़रूरत है....मुद्दा ऐसा है जितना चाहे लिख लो...फिर भी कम पड़ेगा...हां तो अब आता हूं मैं अपने सवालों पर...

1... क्या 62 साल बाद भी हमे टोटल आज़ादी मिल पाई है...(टोटल आज़ादी से मेरा तात्पर्य भूख, अशिक्षा, सांप्रदायिकता, भेदभाव, कुपोषण, भ्रष्टाचार...आदि आदि से छुटकारे से है)


2... गांधी ने कांग्रेस को आज़ादी के बाद खुद को सत्ता की राजनीति से न जुड़ते हुए सिर्फ समाज सेवा को अपना ध्येय बनाने की नसीहत दी थी...कांग्रेस ने क्यों नहीं सलाह मानी...नेहरू को प्रधानमंत्री बनने की इतनी ललक क्यों थी कि आंख मूंदकर लॉर्ड माउंटबेटन के बंटवारे के दस्तावेज को स्वीकार कर लिया...

3...आज़ादी के बाद आरक्षण की व्यवस्था सिर्फ दस साल के लिए रखी गई थी...क्यों इसे हर दस साल बाद बढ़ाया जाता रहा...आज एक भी राजनीतिक दल वोटों के खेल के चलते आरक्षण का खुलकर विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखा सकता...ये नजरिया समाज को एकसार कर रहा है या और भेदभाव पैदा कर रहा है....

4...नेहरू ने गांधी के ग्राम अर्थव्यवस्था के मॉडल को दरकिनार कर औद्योगिकरण की पश्चिमी लीक को अपनाया...इससे मानव-संसाधन का विकास हुआ या आबादी देश पर बोझ बन गई...दूसरी तरफ चीन ने हाथ के काम की ताकत को पहचाना और मानव-संसाधन को अपने विकास का औजार बना लिया...धीरे-धीरे चीन इसी मॉडल को विकसित करते हुए आज ऐसी स्थिति में पंहुच गया है कि अमेरिका जैसी आर्थिक महाशक्ति भी उससे खौफ खाने लगी है.

5...क्या एक कपिल सिब्बल के कहने से देश में हर बच्चे को शिक्षा पर समान अधिकार मिल जाएगा...गांव का बच्चा शहर के बच्चे को मिलने वाली शिक्षा का मुकाबला कर सकेगा... क्यों नहीं बनाया जा सका देश में शिक्षा को बच्चों का मूलभूत अधिकार...

सवाल कई हैं...लेकिन आज विमर्श के लिए इतना ही काफी है...अब इंतज़ार है आपके बेशकीमती विचारों का...

बुधवार, 4 नवंबर 2009

अंग्रेज चले गए और....खुशदीप

अंग्रेज़ों ने हमसे क्या लूटा...और बदले में भारत को क्या दिया...सवाल पुराना है...लेकिन ज्वलंत है...और शायद हमेशा रहेगा भी...अदा जी ने इस मुद्दे पर दो बेहद विचारोत्तेजक और सारगर्भित लेख लिखे...

'रीढ़ की हड्डी' है कि नहीं ....?? http://swapnamanjusha.blogspot.com/2009/11/blog-post_02.html

रीढ़ की हड्डी ??? वो क्या होती है ??? http://swapnamanjusha.blogspot.com/2009/11/blog-post.html

इन लेखों पर प्रतिक्रियाएं भी एक से बढ़ कर एक आईं...प्रवीण शाह भाई ने अंग्रेज़ों को लेकर देश में विचार की जो प्रचलित धारा है, उसके खिलाफ जाकर कुछ सुलगते प्रश्न उठाए...अदा जी ने साक्ष्यों के साथ उनका जवाब भी बखूबी दिया...लेकिन मेरा आग्रह कुछ और है...ये ठीक है हमें अपने अतीत को नहीं भुलाना चाहिए...हमें अपने इतिहास, संस्कृति, धरोहरों पर गर्व करना चाहिए...लेकिन सिर्फ अतीत के भरोसे बैठे रह कर क्या हम सही मायने में विकसित देश बन सकते हैं...

यहां मैं आपसे एक प्रश्न करना चाहूंगा...1945 की 6 अगस्त और 9 अगस्त की काली तारीखों को जापान के हिरोशिमा और नागासाकी को परमाणु बम की विभीषिका ने तबाह करके रख दिया...लेकिन जापान ने क्या किया...क्या वो सिर्फ अमेरिका को कोसता रहा...जापान दोबारा उठ कर खडा नहीं हुआ...64 साल बाद जापान की जो आर्थिक संपन्नता की तस्वीर आज दिखती है वही शायद अमेरिका को सबसे करारा जवाब है...

मेरा इस परिचर्चा को नया मोड़ देने का मकसद सिर्फ यही है कि हम इस पर विचार करें कि आज़ादी के 62 साल बाद हम कहां तक पहुंच पाए हैं...आजादी के मतवालों ने प्राणो का बलिदान देकर हमें खुली हवा में सांस लेने की नेमत बख्शी...लेकिन बदले में हमने क्या किया...

जागृति फिल्म में कवि प्रदीप का गीत था...

हम तूफान से लाए हैं कश्ती निकाल के,
मेरे बच्चों रखना तुम इसको संभाल के...

क्या हम सही में रख पाए उस कश्ती को संभाल के...क्या भूख से हमें आजादी मिल गई है...क्या भेदभाव खत्म हो गया है...दलितों के उत्थान का नारा देते देते क्या समाज समरस हो गया है...अशिक्षा से देश को मुक्ति मिल गई है...राजे-महाराजों की रियासतों की तरह प्रांतवाद नई शक्ल में सिर नहीं उठाने लगा है...अंग्रेजों ने फूट डालो, राज करो को भारत पर हुक्म चलाने के लिए मूलमंत्र बनाया...क्या आज यही काम हमारे राजनेता नहीं कर रहे हैं...मेरी चिंता बीता हुआ कल नहीं आज और आने वाला कल है...यहां मैं अदा जी के लेख पर शरद कोकास भाई की टिप्पणी की आखिरी तीन पंक्तियों का उल्लेख ज़रूर करना चाहूंगा...

स्थितियाँ पूरी तरह से बदल गई हैं । अब केवल अपने गौरव गान से भी कुछ हासिल नही होना है , अतीत की सच्चाइयों का सामना करना होगा और वर्तमान और भविष्य के लिये व्याव्हारिकता के साथ निर्णय लेने होंगे...

शरद भाई ने जो कहा, वही आज का सबसे बड़ा सच है...आज भौगोलिक उपनिवेशवाद नहीं आर्थिक उपनिवेशवाद हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा है...कोकाकोला और पेप्सी के सिप लेते हुए हम मैक़्डॉनल्ड के फिंगरचिप्स के चटखारे ले रहे हैं...माल्स जाकर विदेशी ब्रैंड के कप़ड़े खरीदने को हम अपनी शान समझते हैं...जुबानी जमाखर्च और बौद्धिक जुगाली कितनी भी की जा सकती है लेकिन सच यही है कि हम आईना देखने को तैयार नहीं है...अगर ऐसा नहीं होता तो फिर किसी को ये क्यों कहना पड़ता...

जिन्हें नाज़ है हिंद पर,
कहां हैं, कहां हैं, कहां हैं...